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“जो उसके साथ हैं, वे बुलाए हुए, और चुने हुए, और विश्वासी हैं।”—प्रकाशितवाक्य 16:14।
जापान में लोगों की भौतिकवादिता ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। उन्हें लगा कि वहाँ धर्म के प्रति गहरी उदासीनता है, और आत्मिक स्वभाव को की गई अपीलों का बहुत कम प्रभाव होता है, जबकि धन का लोभ, सत्ता का प्रेम, और वहाँ फैली हुई भयानक अनैतिकता देखकर उनका हृदय भय से सिहर उठा। राष्ट्रीय धर्म की लोगों पर बहुत कम पकड़ प्रतीत होती थी, और उन्होंने देखा कि मन्दिरों में उपासकों से अधिक दर्शक और गाइड भरे रहते थे। जीवन की भाग-दौड़ और हड़बड़ी ने उन्हें व्याकुल कर दिया।
योकोहामा के एक मित्र ने लिखा :—
उन्होंने एक बार विदेशी समुदाय के सामने भाषण दिया और उनके सटीक दृष्टान्तों से हम सब चकित रह गए, और जब उन्हें अपने मन-परिवर्तन की कहानी सुनाने के लिए राज़ी किया जा सका, तो वह हमें सन्त पौलुस के मन-परिवर्तन के एक आधुनिक रूप के समान लगी।
एक अन्य लेखक आगे कहते हैं :—
उस सिख बालक की कहानी, जिसने इतनी लगन से सत्य की खोज की, सुनकर शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी गहरी से गहरी भावनाएँ न जाग उठें। सन्त पौलुस स्वर्गीय दर्शन देखने के बाद उसकी गवाही दिए बिना नहीं रह सके। बीसवीं शताब्दी के ये साधु कहते हैं, “अब मैं मसीह के विषय में केवल जानता ही नहीं; मैंने उसे देखा है”; और जब वे यह कहानी सुनाते हैं, तो आप भी उनके साथ वही विस्मय अनुभव करते हैं जो उन्होंने तब अनुभव किया था जब अचानक घायल हाथों वाला मसीह उनके सामने खड़ा हो गया।
जबकि टोक्यो से एक मिशनरी का एक और पत्र आया, जिसमें उन्होंने लिखा :—
आत्मिक विषयों को वे जिस स्पष्टता से रखते थे, वह बहुत प्रभावशाली थी। उनके वचन के पीछे एक आत्मिक अधिकार था। वे यहाँ हमारे अतिथि रहे और बाद में पेकिंग में भी हमारे साथ एक ही घर के अतिथि थे।
ओकासाकी के जापानी पास्टर, रेवरेंड तकाहारु तकामात्सु ने लिखा :—
उन्होंने क्योतो में रहने वाले बहुत से अमेरिकी मिशनरियों को प्रेरणा दी, परन्तु मेरे विचार में स्थानीय पादरियों को तो और भी अधिक प्रेरणा मिली।
क्योतो के तीसरे राष्ट्रीय कॉलेज की वरिष्ठ कक्षा का एक जापानी युवक साधु के आने से पहले से मेरे घर आया करता था। वह प्राकृतिक विज्ञान पढ़ रहा है और उसका मन बहुत तर्कवादी है। वह ज्योति की खोज में था और उसे केवल धुँधला सा दिखाई देता था। वह साधु की सभाओं में उपस्थित नहीं हो सका, परन्तु जब मैंने अपनी बाइबल कक्षा में उनके विषय में बताया, तब वह वहाँ आया। वह बहुत चुप रहा और सिर झुकाए बैठा रहा। कुछ दिन बाद वह कॉलेज जाते हुए सवेरे 7:30 बजे मुझसे मिलने आया। उसके दाहिने हाथ पर पट्टी बँधी थी। उसने मुझे बताया कि पिछली रात उसने परमेश्वर की सामर्थ्य का अनुभव किया था।
वह रात 3:30 बजे एक बहुत स्पष्ट स्वप्न देखकर जाग उठा, जिसमें उसके पिता ने उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए विवश किया था। वह अपने बिछौने से उठा, और उसने अपने भीतर एक आत्मिक शक्ति को काम करते हुए अनुभव किया, जो उसके मन पर वैसा ही नियन्त्रण कर रही थी जैसा उसके पिता ने शारीरिक रूप से किया था। उसने उसका विरोध करने का प्रयत्न किया, परन्तु जितना अधिक वह उससे लड़ा, उतना ही अधिक उसने अनुभव किया कि उसे झुकना ही पड़ेगा। अनजाने में उसके हाथ जुड़ गए, और वह ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगा, यहाँ तक कि उसका सारा मन और शरीर अकथनीय आनन्द से भर गया। वह ऐसे ऊँचे स्वर से रोया कि पास के कमरे में उसके मित्र जाग उठे और यह देखने को भीतर आए कि क्या बात है।
उस युवक ने इतनी लगन से प्रचार किया कि वह बार-बार अपना दाहिना हाथ मेज़ पर मारता रहा, यहाँ तक कि उसमें चोट लग गई।
जब उसने मुझे यह कहानी सुनाई, तो मैंने उसे समझाया कि मसीह उसे बुला रहा है, और उसे उसका अंगीकार करना चाहिए और दूसरों को अपना अनुभव बताना चाहिए।
उसी सन्ध्या दो विद्यार्थियों के साथ कॉलेज से लौटते हुए, जिनमें एक चिकित्सा का विद्यार्थी मित्र था और दूसरा एक विधर्मी हो चुका मसीही, वह बड़ी लगन से उद्धारकर्ता के विषय में बोलने लगा, और सुनने के लिए चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो गई। वह विधर्मी मसीही उसकी बातें सुनकर पश्चाताप के आँसू बहाने लगा, और उसने कहा कि पहली बार उसने मसीहियत को समझा है और वह मसीह के पीछे चलेगा। इस प्रकार साधु की यह थोड़े दिनों की यात्रा हमारे लोगों के जीवन में फल ला रही है।
जापानी मसीहियों को ऐसी बड़ी बातों पर गम्भीरता से विचार करने के लिए बुलाया गया है, जैसे परमेश्वर के साथ एकता की लालसा में मन की एकाग्रता और अभिलाषा की पवित्रता; यह कि प्रार्थना केवल वरदान माँगना नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ संगति में प्रवेश करना है; और यह कि मसीह के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण का अर्थ है उसकी इच्छा को पूरा करने और उसके लिए दुःख उठाने की आनन्द भरी तत्परता, चाहे उसके कारण प्राण तक का बलिदान क्यों न देना पड़े। ऐसे ही एक व्यक्ति कहते हैं :—
क्योंकि वे कुछ दिशाओं में जहाँ तक जाना सम्भव है, वहाँ तक पूरे चले गए हैं, इसलिए वे परमेश्वर की ओर से भेजे गए सन्देशवाहक के रूप में अधिकार के साथ बोलते हैं।
एक जापानी महिला ने यह सुनकर कि सुन्दर ने मसीह को कैसे पाया, कहा :—
मेरे एक प्रिय मित्र ने, जो (अपने धर्म की) पुरानी शिक्षा से बहुत असन्तुष्ट था, ज्योति पाने के लिए बड़ा संघर्ष किया, परन्तु असफल होकर जब वह केवल अठारह वर्ष का था, उसने अपने आप को एक झरने में झोंक दिया। हाय! मेरा मित्र मसीह के विषय में कुछ नहीं जानता था, अपने अन्धकार में उसके पास जाने के लिए कोई न था; उसके पैरों तले से धरती खिसक गई, और इस प्रकार उसने अपना जीवन समाप्त कर लिया।
ऐसे ही लोगों की सहायता के लिए सुन्दर सिंह जापान गए।
चीन में साधु ने पाया कि लोगों में अब भी अपने प्राचीन धर्मों के प्रति प्रेम और श्रद्धा है, और वे कहते हैं कि वे लोग ऊँची आत्मिक उन्नति करने के योग्य हैं। जापान और चीन दोनों में यह देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ कि भारत के समान जाति-भेद न होने के कारण सामाजिक दृष्टि से मसीहियत को ग्रहण करना कितना अधिक सरल हो गया था।
पेकिंग से एक मिशनरी ने लिखा :—
पेकिंग में उनका आना बहुत ही उचित समय पर हुआ, और मुझे भरोसा है कि उससे पेकिंग कैथेड्रल की मंडली को बड़ा बल मिला है। यह देखना अच्छा लगा कि कैथेड्रल में एक मेथोडिस्ट साधु के लिए अनुवाद कर रहा था। वह किसी भी रविवार की अपेक्षा अधिक भरा हुआ था, और सोमवार की सभा में—जिसकी घोषणा अचानक की गई थी—कैथेड्रल फिर से भर गया। अंग्रेज़ी में बातों को रखने का उनका ढंग सुसमाचारों के नमूने पर है।
रविवार की सन्ध्या उन्होंने यूनियन चर्च में यूरोपियों और अमेरिकियों को प्रचार किया। पेकिंग से उन्होंने लिखा कि उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा है और वे वहाँ की उत्तम जलवायु की असली ठण्ड का आनन्द ले रहे हैं।
हांकाउ में इन्फ्लूएंज़ा फैला हुआ था, फिर भी वे कुछ काम कर सके। महान मिशनरी हडसन टेलर के पुत्र ने उनके लिए चीनी भाषा में अनुवाद किया। फिर वे और आगे शांसी प्रान्त में उस स्थान पर गए जहाँ 1900 में बहुत से मिशनरी बड़ी संख्या में चीनियों के साथ शहीद किए गए थे। जब उन्होंने सुना कि उन्होंने कितनी वीरता से दुःख सहा, और कैसे लड़के भी, अपने माता-पिता को मार डाले जाते देखते हुए, अपने दुःख उठाने की बारी आने से पहले दृढ़ खड़े रहे, तो उनका प्राण अपनी गहराइयों तक हिल उठा।
वे अचानक नानकिंग पहुँचे, इसलिए उनके लिए कोई तैयारी नहीं की गई थी। रेवरेंड जे. जी. मैगी एक मित्र से मिलने स्टेशन गए थे, और वहाँ साधु को पाकर वे उन्हें अपने घर ले गए। श्री मैगी कहते हैं :—
उन्होंने हाल ही में खुले एक चैपल में प्रचार किया, और लोग उनके व्यक्तित्व से, और अनोखे दृष्टान्तों से भरे उनके प्रभावशाली सन्देश से बहुत प्रभावित हुए। वे अब भी उनके विषय में बातें करते हैं। आज ही एक चीनी युवक ने, बिना मेरे यह विषय छेड़े, मुझसे कहा कि कलीसिया के सदस्य सुन्दर सिंह पर विश्वास करते थे। उसका अर्थ यह था कि सुन्दर सिंह जितनी पूर्णता से मसीही जीवन जी रहे थे, वैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था।
दोपहर को उन्होंने नये विश्वासियों के एक समूह से, और रात को मिशनरियों की एक सभा में “गवाही देना” विषय पर बात की। लेखक आगे कहते हैं, “ऐसे विषय पर ऐसे श्रोताओं के सामने उनके शब्दों का क्या प्रभाव हुआ, यह आपको बताने की आवश्यकता नहीं।”
फिर उन प्रदेशों में उनका अपना गवाही देना समाप्त हुआ, और थोड़े ही समय में वे मद्रास में मित्रों के बीच थे, और उनकी सहायता से शीघ्र ही शिमला पहुँच गए। वहाँ से वे सुबाथू गए, जहाँ उन्होंने फिर से उस कमरे में निवास किया जिसमें चौदह वर्ष पहले, बहुत प्रार्थना के बाद, उन्होंने साधु का वेश धारण किया था और यह गम्भीर प्रतिज्ञा की थी कि मसीह जहाँ कहीं ले जाए, वे उसके पीछे चलेंगे।
कोटगढ़ में पैर में घाव हो जाने के कारण वे बिस्तर पर पड़ गए, और उनके बड़े खेद के साथ उनकी तिब्बत-यात्रा में देर हुई। परन्तु 4 जुलाई को वे स्वस्थ हो गए, और एक बार फिर सभ्यता और मित्रों से मुँह मोड़कर अपने चुने हुए कार्य-क्षेत्र के बर्फ़ीले ऊँचे पठारों की ओर अपनी एकाकी यात्रा पर निकल पड़े, जहाँ हिम से ढके हिमालय के विशाल एकान्त स्थानों के बीच उन्होंने फिर से परमेश्वर के साथ ऊँची संगति की।
तिब्बत के वे आँधी से झकझोरे पठार भी, जिनकी थोड़ी सी आबादी उनके सन्देश को ठुकरा देती है और उन्हें भूखा ही जंगल में खदेड़ देती है, उनके लिए वे महान अनुभव जुटाते हैं जिनके विषय में वे इतना कम बोलते हैं, परन्तु जो प्रमाणित करते हैं कि वे विशेष रूप से परमेश्वर के बुलाए हुए हैं और जब मनुष्य की सहायता विफल हो जाती है, तब परमेश्वर उनकी सुधि लेता है। महीनों तक साधु ऐसे प्रदेशों में अकेले घूमते रहे हैं जहाँ मनुष्य के पैर विरले ही पड़ते हैं, और उन्होंने उन पर्वत-शिखरों से प्रेम करना सीखा है जहाँ वे परमेश्वर के सामर्थी कामों को देखते हैं और प्रायः उसका “दबा हुआ धीमा शब्द” सुनते हैं।
ऐसे दृश्यों के बीच सुन्दर सिंह ने न केवल दर्शन देखे हैं, बल्कि मैदानों की भीड़ के बीच अपनी सेवकाई के लिए सामर्थ्य भी संचित की है। और यद्यपि उनका कोमल प्राण लालसा के साथ उन खुले विस्तारों की ओर मुड़ता है जहाँ वे परमेश्वर के साथ अकेले रह सकते हैं, फिर भी वे अनगिनत परीक्षाओं से होकर गुज़रे हैं और उन सबके बीच भी उस अनबिगड़ी मधुरता और सरलता को बनाए रखे हुए हैं जो मसीह के लिए कष्ट भरे उनके एकाकी जीवन ने उन्हें दी है।
