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पश्चाताप पर तीन दृष्टिकोण
परन्तु आगे बढ़ने से पहले आइए हम ऊपर दी गई परिभाषा को भली-भाँति खोलकर देखें, जिसमें तीन आवश्यक तत्त्व हैं। पहला, जब हम पश्चाताप को परमेश्वर की ओर जीवन का मन-परिवर्तन कहते हैं, तो हम केवल बाहरी कार्यों से अधिक की माँग करते हैं। हम मनुष्य की आत्मा की गहराइयों में एक गहन परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं, जिसमें पुराना स्वभाव उतार फेंका जाता है और इस आत्मिक नवीनीकरण के योग्य फल उत्पन्न होने के लिए स्थान बनता है। यह बात भविष्यद्वक्ता की उस आज्ञा में प्रतिध्वनित होती है जिसमें वह जिन्हें पश्चाताप के लिए समझाता है उनसे नया हृदय रखने को कहता है। मूसा ने भी इस्राएल के लोगों को सच्चे मन-परिवर्तन के विषय में समझाते हुए बार-बार इस आवश्यकता पर बल दिया कि वे अपने हृदय और प्राण को पूरी रीति से परमेश्वर की ओर फेरें। भविष्यद्वक्ता भी इस अभिव्यक्ति का बहुत बार प्रयोग करते हैं (यहेजकेल 18:30-31)। परन्तु यिर्मयाह के चौथे अध्याय में हमें एक विशेष रूप से प्रकाश देनेवाला अंश मिलता है, जिसके द्वारा हम पश्चाताप के वास्तविक स्वरूप को समझ सकते हैं। वहाँ परमेश्वर इस प्रकार कहता है: “हे इस्राएल, यदि तू लौटे, तो मेरे ही पास लौट आ। अपने कामों की बुराई को मेरी आँखों के सामने से दूर कर। बुराई करना छोड़ दे, भलाई करना सीख” (यिर्मयाह 4:1-4)। यहाँ हम इस बात की पुष्टि देखते हैं कि धार्मिकता के मार्ग पर चलना आरम्भ करने के लिए मनुष्य को हृदय की गहराई से सारी अभक्ति को जड़ से उखाड़कर आरम्भ करना होगा। इसी कारण यशायाह अपने समय के कपटियों के खोखले प्रयासों का उपहास करता है, जो बाहरी रूप से अपने जीवन को सुधारना चाहते थे, परन्तु अपने हृदयों को जकड़नेवाली अभक्ति की बेड़ियों को तोड़ने के आवश्यक कार्य की उपेक्षा करते थे। एक और अंश में यशायाह निपुणता से यह चित्रित करता है कि सच्चे पश्चाताप से कैसे कार्य निकलने चाहिए (यशायाह 58:1-14)।
अब आइए हम दूसरे पक्ष की ओर ध्यान दें। हम कह चुके हैं कि पश्चाताप परमेश्वर के सच्चे भय से उत्पन्न होता है। निश्चय ही, पापी के विवेक को पश्चाताप की ओर ले जाने से पहले उसे परमेश्वर के न्याय के भार से झकझोरा जाना आवश्यक है। जब मनुष्य के हृदय की गहराई में यह विचार जम जाता है कि एक दिन परमेश्वर अपने न्याय के सिंहासन पर विराजमान होगा और हमारे सब कामों और वचनों का लेखा माँगेगा, तो यह एक निरन्तर चुभनेवाली अंकुश बन जाता है, जो उस दुर्दशाग्रस्त पापी को नया जीवन अपनाने के लिए अथक रूप से उकसाता और विवश करता है। आनेवाले न्याय का यह अटल बोध विश्राम या शान्ति के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता, वरन् पापी को निरन्तर एक बदले हुए जीवन की ओर प्रयास करने को प्रेरित करता है, जिससे वह न्याय-आसन के सामने सुरक्षित खड़ा रह सके। इसलिए जब पवित्रशास्त्र हमें पश्चाताप के लिए समझाता है, तो अकसर वह यह स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर एक दिन संसार का न्याय करेगा। यिर्मयाह के ये शब्द देखो: “ऐसा न हो कि तुम्हारे बुरे कामों के कारण मेरा क्रोध आग की नाईं भड़क उठे, और ऐसा जले कि कोई बुझा न सके” (यिर्मयाह 4:4)। इसी प्रकार एथेंस के लोगों को दिए गए सन्त पौलुस के उपदेश में वह घोषणा करता है कि परमेश्वर ने लोगों को अज्ञानता में चलने दिया, परन्तु अब सब को आज्ञा देता है कि मन फिराओ, क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है जिसमें वह धार्मिकता से जगत का न्याय करेगा (प्रेरितों के काम 17:30–31)। अनेक अन्य अंश भी यही भाव प्रतिध्वनित करते हैं। कभी-कभी पवित्रशास्त्र ऐतिहासिक घटनाओं के द्वारा भी ईश्वरीय न्याय की वास्तविकता को रेखांकित करता है, जो पापियों के लिए एक गम्भीर चेतावनी है कि यदि वे समय रहते अपने मार्ग न सुधारें तो उनके लिए इससे भी बड़ा कष्ट रखा है। इसका एक उदाहरण हमें व्यवस्थाविवरण के उनतीसवें अध्याय में मिलता है (व्यवस्थाविवरण 29:23)।
अब, क्योंकि परमेश्वर की ओर हमारे फिरने का आरम्भ पाप के प्रति गहरी घृणा और भय में निहित है, इसलिए प्रेरित ठीक ही कहता है कि ईश्वरीय शोक पश्चाताप का प्रेरक है। वह इसे “ईश्वरीय शोक” कहता है (2 कुरिन्थियों 7:10), क्योंकि वह केवल दण्ड का भय नहीं, वरन् पाप से ही गहरी घृणा और उसकी निन्दा है। यह शोक इस समझ से उत्पन्न होता है कि पाप परमेश्वर को अप्रिय है, और इसलिए हम अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से उससे घृणा और अरुचि करते हैं।
अब हम तीसरे पक्ष पर विचार करें, जिसमें हम कहते हैं कि पश्चाताप के दो मूलभूत अंग हैं: शरीर का मारा जाना और आत्मा का जिलाया जाना। यद्यपि भविष्यद्वक्ताओं ने अपनी सरलता में ये सत्य अज्ञानता में डूबे लोगों तक पहुँचाए, फिर भी उनकी शिक्षाएँ पश्चाताप के सार की भली-भाँति व्याख्या करती हैं। उन्होंने घोषणा की, “बुराई करना छोड़ और भलाई कर,” और पुकारा, “अपने आप को धोकर पवित्र करो, अपने बुरे मार्गों को त्याग दो, भलाई करना सीखो, धार्मिकता और दया का पीछा करो” (भजन संहिता 34:14; यशायाह 1:16-17), इत्यादि। लोगों को बुराई से फिरने के लिए बुलाकर उन्होंने उनके भीतर की सम्पूर्ण पापी प्रकृति के क्रूसित होने और मरने से कम कुछ नहीं माँगा। परन्तु इस आज्ञा की कठिनाई को हम कम न आँकें, क्योंकि इसके लिए स्वयं का पूर्ण त्याग और हमारे अपने अस्तित्व का विनाश आवश्यक है। शरीर को सचमुच मार डालने के लिए (रोमियों 8:13) हमें हर उस वस्तु का त्याग करना होगा जो हमारी अपनी है और उसे शून्य में विलीन हो जाने देना होगा। देखो, हमारी पतित प्रकृति से निकलनेवाली हर प्रवृत्ति और भावना परमेश्वर के विरोध में खड़ी है और उसकी धार्मिकता की शत्रु है। इसलिए व्यवस्था की आज्ञाकारिता की ओर हमारा पहला कदम यह माँगता है कि हम अपनी प्रकृति का त्याग करें और अपनी इच्छा का परित्याग करें। इसके अतिरिक्त, भविष्यद्वक्ता के शब्द आगे के कार्यों, जैसे धार्मिकता, न्याय और दया, के द्वारा जीवन के नए हो जाने को भी सूचित करते हैं। केवल बाहरी कार्यों में लगे रहना अपर्याप्त सिद्ध होगा, जब तक हमारी आत्माएँ पहले उनके प्रति सच्चा प्रेम और झुकाव उत्पन्न न करें। यह परिवर्तन तब होता है जब परमेश्वर का आत्मा अपनी पवित्रता में हमारी आत्माओं को नया रूप देता है, उन्हें नए विचारों और भावनाओं की ओर ले जाता है, और उन्हें उनकी पूर्व दशा की तुलना में पहचानने के योग्य नहीं रहने देता। देह-दमन और जीवन-संचार, दोनों का स्रोत मसीह के साथ हमारी एकता में है। निश्चय ही, यदि हम उसकी मृत्यु के सच्चे भागीदार हैं (रोमियों 6:3 आगे), तो उसके बलिदान की सामर्थ्य हमारे पुराने मनुष्यत्व को क्रूस पर चढ़ाती है, हमारे भीतर जमा पाप को मार डालती है, और हमारी मूल प्रकृति में भ्रष्टता के गढ़ को निर्बल करती है। और यदि हम उसके पुनरुत्थान में सहभागी होते हैं, तो हम एक ऐसे नए जीवन में जिलाए जाते हैं जो परमेश्वर की धार्मिकता के अनुरूप है। मसीह के साथ सहभागिता के द्वारा ही ये परिवर्तनकारी प्रक्रियाएँ हमारे भीतर प्रकट होती हैं।
सारतः, पश्चाताप को एक आत्मिक नया जन्म समझा जा सकता है, एक ऐसी प्रक्रिया जिसका उद्देश्य हमारे भीतर परमेश्वर के स्वरूप को पुनःस्थापित करना है, वह स्वरूप जो आदम के अपराध के द्वारा धुँधला हो गया और लगभग मिट गया था। प्रेरित इस परिवर्तन का वर्णन ठीक ही हमारी आँखों से परदे के हटाए जाने के रूप में करता है, जिससे हम परमेश्वर की महिमा को प्रतिबिम्बित करें और उसके आत्मा के कार्य के द्वारा उसके स्वरूप में बदलते जाएँ। वह हमसे आग्रह करता है कि हम अपने भीतरी मनुष्यत्व में नए किए जाएँ, और उस नए मनुष्यत्व को पहिन लें जो परमेश्वर के स्वरूप में रचा गया है और धार्मिकता तथा सच्ची पवित्रता से युक्त है (2 कुरिन्थियों 3:18; इफिसियों 4:23-24; कुलुस्सियों 3:10)। मसीह के अनुग्रह से सम्पन्न इस नए जन्म के द्वारा हम परमेश्वर की उस धार्मिकता में पुनःस्थापित किए जाते हैं जिससे हम आदम के पाप के कारण बाहर कर दिए गए थे। परमेश्वर को यह भाता है कि जिन सब को वह अनन्त जीवन की मीरास में गोद लेता है, उन्हें पूरी रीति से पुनःस्थापित करे और अपना निज बनाकर फिर से अपना ले।
