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कुंजियों का अधिकार
अब आइए, हम कुंजियों के अधिकार की गहराई में उतरें, जो वह नींव है जिस पर ये स्वयंभू “पाप-स्वीकारवादी” अपने अधिकार को खड़ा करते हैं।
वे यह प्रश्न उठाते हैं, “क्या कुंजियाँ बिना कारण दी गई थीं? क्या मसीह ने व्यर्थ कहा था, ‘जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे वह स्वर्ग में बँधेगा’?” इसके उत्तर में मैं कहता हूँ कि कुंजियों के दिए जाने के पीछे सचमुच एक गहन कारण है। परन्तु हमें उन दो अंशों में सावधानी से भेद करना चाहिए जहाँ प्रभु साक्षी देता है कि पृथ्वी पर बाँधना और खोलना स्वर्ग में बाँधने और खोलने के अनुरूप है। यह एक शोचनीय अज्ञानता है जो इन जंगली सूअरों को, उनकी सदा की रीति के अनुसार, इन अंशों को गड्डमड्ड करने और उनके अर्थों को उलझा देने की ओर ले जाती है।
इनमें से एक अंश यूहन्ना के सुसमाचार में मिलता है, जहाँ मसीह अपने प्रेरितों को प्रचार के लिए नियुक्त करते हुए उन पर फूँकता और ये शब्द कहता है: “पवित्र आत्मा लो। जिनके पाप तुम क्षमा करो, वे उनके लिए क्षमा किए गए हैं; जिनके तुम रखो, वे रखे गए हैं।” यहाँ स्वर्ग के राज्य की वे कुंजियाँ, जिनकी प्रतिज्ञा पहले सन्त पतरस से की गई थी, उसे और उसके संगी प्रेरितों को सौंपी जाती हैं। पतरस से अकेले कुछ ऐसा प्रतिज्ञा नहीं किया गया जो उसे दूसरों के साथ समान रूप से न मिला हो। उससे कहा गया था, “मैं तुझे स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ दूँगा।” इस अवसर पर सब प्रेरितों को सुसमाचार प्रचार करने की आज्ञा दी जाती है, जो स्वर्गीय राज्य का द्वार उनके लिए खोलता है जो मसीह के द्वारा पिता को खोजते हैं, और उनके लिए उसे बन्द करके बेंड़ा लगा देता है जो इस मार्ग से मुँह मोड़ लेते हैं। पतरस से कहा गया था, “जो कुछ तू पृथ्वी पर बाँधेगा वह स्वर्ग में बँधेगा, और जो कुछ तू पृथ्वी पर खोलेगा वह स्वर्ग में खुलेगा।” उसी प्रकार अब उन सब से सामूहिक रूप से कहा जाता है, “जिनके पाप तुम क्षमा करो, वे उनके लिए क्षमा किए गए हैं; जिनके तुम रखो, वे रखे गए हैं।” इसलिए बाँधने का अर्थ पापों को रख लेना है, और खोलने का अर्थ पापों को क्षमा करना। सचमुच पापों की क्षमा के द्वारा विवेक अपनी सच्ची बेड़ियों से मुक्त होते हैं, जबकि पापों का रखा जाना उन्हें कसकर बँधा रखता है। मुझे इस अंश की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करने दीजिए जो सीधी, यथार्थ और उचित हो, और अत्यधिक सूक्ष्मताओं या खींचातानी की व्याख्याओं से बचे।
पापों को क्षमा करने या रखने की आज्ञा, तथा बाँधने और खोलने के विषय में सन्त पतरस को दी गई प्रतिज्ञा, वचन की सेवकाई के सम्बन्ध में समझी जानी चाहिए। जब हमारे प्रभु ने अपने प्रेरितों के लिए इस सेवकाई को स्थापित किया, तब उसने उन्हें बाँधने और खोलने का अधिकार सौंपा। आखिरकार सुसमाचार का सार इसके सिवा और क्या है कि यह घोषणा कि हम सब, जो पाप और मृत्यु के दास हैं, यीशु मसीह के द्वारा छुटकारा और उद्धार पा सकते हैं? इसके विपरीत, जो मसीह को अपना मुक्तिदाता और छुड़ानेवाला पहचानने और ग्रहण करने में चूकते हैं, वे अनन्त बन्दीगृह के दण्ड के योग्य ठहरते हैं।
यह पवित्र कार्य अपने प्रेरितों को सौंपकर हमारे प्रभु ने उसके ईश्वरीय उद्गम की पुष्टि की और उसमें अपनी भागीदारी प्रकट की। यह स्वयं प्रेरितों के लिए भी, और उनके लिए भी जो पृथ्वी की जातियों में इस सन्देश को ग्रहण करेंगे, बड़ी सान्त्वना का स्रोत था। यह इस ईश्वरीय दूतावास की प्रामाणिकता और महत्त्व की साक्षी थी।
प्रेरितों के सामने बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ थीं; वे अटल समर्पण से परिश्रम करते, भारी बोझ उठाते, जोखिम-भरा कार्य करते और अन्त में अपने प्रचार पर अपने ही लहू की मुहर लगाते थे। उनके लिए यह अत्यावश्यक था कि उन्हें अटल निश्चय हो कि उनका परिश्रम व्यर्थ या निरुद्देश्य नहीं, वरन् ईश्वरीय सामर्थ्य से भरपूर है। क्लेशों, विपत्तियों और सन्निकट संकटों के बीच उन्हें इस आश्वासन की आवश्यकता थी कि वे परमेश्वर का ही कार्य कर रहे हैं। अपने विरोधी शत्रुतापूर्ण संसार के सामने उन्हें यह जानने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर उनके पक्ष में है। यद्यपि उनकी शिक्षा के स्रोत मसीह की शारीरिक उपस्थिति पृथ्वी पर उनके साथ न थी, तथापि वे जानते थे कि वह स्वर्ग में निवास करता है और उनकी घोषणा की सच्चाई की पुष्टि करता है।
इसके अतिरिक्त, श्रोताओं को इसका अकाट्य प्रमाण देना भी अनिवार्य था कि यह शिक्षा स्वयं प्रेरितों से नहीं, वरन् सर्वशक्तिमान परमेश्वर से आई है। इस बात पर बल देना अत्यावश्यक था कि यह सन्देश पार्थिव स्रोतों से नहीं निकला, वरन् स्वर्ग से उतरा है। केवल मानवीय क्षमताओं से न पापों की क्षमा, न अनन्त जीवन का आश्वासन, न उद्धार की घोषणा हो सकती थी। इसलिए मसीह ने स्वयं साक्षी दी कि सुसमाचार के प्रचार में प्रेरित केवल साधन थे, जिनके द्वारा वह बोलता और प्रतिज्ञाएँ करता था। पापों की जिस क्षमा की उन्होंने घोषणा की वह परमेश्वर की सच्ची प्रतिज्ञा थी, और जिस दण्ड के विरुद्ध उन्होंने चेताया वह परमेश्वर का निश्चित न्याय था। यह साक्षी सदा-सर्वदा के लिए अटल है, और हमें आश्वस्त करती है कि सुसमाचार, चाहे प्रचारक कोई भी हो, स्वयं परमेश्वर का वचन है। वह उसके स्वर्गीय सिंहासन से घोषित होता है, जीवन की पुस्तक में लिखा जाता है, और स्वर्गीय लोकों में पुष्ट और स्थिर किया जाता है।
इसलिए हम समझ पाते हैं कि कुंजियों का अधिकार और कुछ नहीं, सुसमाचार का प्रचार ही है। वस्तुतः यह व्यक्तियों को दिया गया कोई प्रभुत्व-सम्पन्न अधिकार नहीं, वरन् एक ईश्वरीय सेवकाई है जो उन्हें परमेश्वर के वचन के भण्डारियों के रूप में सौंपी गई है। मसीह ने यह अधिकार केवल मनुष्यों को नहीं दिया, वरन् अपने वचन को दिया, जिसके द्वारा उसने व्यक्तियों को सेवक ठहराया है।
अब हम अपना ध्यान एक और अंश की ओर मोड़ें, जिसकी व्याख्या हमें भिन्न रीति से करनी चाहिए। मत्ती के सुसमाचार में लिखा है: “यदि तेरा भाई कलीसिया की भी न माने, तो वह तेरे लिए अन्यजाति और अपवित्र जन के समान ठहरे। मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, जो कुछ तुमने पृथ्वी पर बाँधा है वह स्वर्ग में बँधेगा, और जो कुछ तुमने खोला है वह वहाँ खुलेगा।” (मत्ती 18:17- 18)। तथापि हमें इन दोनों अंशों को पूर्णतः असमान नहीं मानना चाहिए, क्योंकि उनमें बड़ी समानता है और उनका आपस में गहरा सम्बन्ध है। दोनों अंश सामान्य शब्दों में बोलते हैं, और परमेश्वर के वचन पर आधारित बाँधने और खोलने के उसी अधिकार को प्रकाशित करते हैं। उनमें बाँधने और खोलने की एक-सी आज्ञा है और वे एक ही प्रतिज्ञा बताते हैं।
फिर भी उनके बीच एक भेद है। पहला अंश विशेष रूप से प्रचार से सम्बन्ध रखता है, जिसके लिए वचन के सेवक नियुक्त किए गए हैं। वह सुसमाचार की घोषणा और उनको दिए गए अधिकार पर केन्द्रित है जो उसके नाम में सेवा करते हैं। दूसरा अंश, इसके विपरीत, कलीसियाई अनुशासन के क्षेत्र को समेटता है, विशेषकर बहिष्कार के कार्य को, जिसे करने की कलीसिया को अनुमति है। जब कलीसिया किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करती है, तब वह प्रतीकात्मक रूप से उसे बाँधती है, जो उसके जीवन और आचरण पर न्याय का संकेत है और उसके कामों के सम्भावित परिणामों की चेतावनी का काम करता है। यह उसे अनन्त विनाश और सदा की निराशा के दण्ड में डालने का कार्य नहीं है। इसके विपरीत, जब कलीसिया किसी को अपनी संगति में ग्रहण करती है, तब वह प्रतीकात्मक रूप से उसे खोलती है, और उसे उस सहभागिता और एकता में स्वागत देती है जो यीशु मसीह में पाई जाती है।
इसलिए हम देख सकते हैं कि बाँधने और खोलने का अधिकार दोनों क्षेत्रों में कार्य करता है, और प्रचार तथा अनुशासन के क्षेत्रों को आपस में गूँथ देता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा सेवक सुसमाचार का प्रचार करने और परमेश्वर की क्षमा की घोषणा करने में इस अधिकार का प्रयोग करते हैं। उसी प्रकार कलीसिया अपनी अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के द्वारा इस सामर्थ्य का प्रयोग करती है, जिनमें वह सही और गलत में भेद करती, सम्भावित दण्ड की चेतावनी देती, और उनको गले लगाती है जो पश्चाताप करते और मेल-मिलाप चाहते हैं। दोनों स्थितियों में बाँधने और खोलने का अधिकार पार्थिव और स्वर्गीय लोकों की एकता से प्राप्त होता है, क्योंकि कलीसिया की सेवकाई के द्वारा परमेश्वर की ईश्वरीय योजना कार्यान्वित होती है।
इसलिए, इस धारणा को दूर करने के लिए कि कलीसिया का न्याय कोई तुच्छ विषय या केवल मानवीय राय है, हमारा प्रभु स्वयं साक्षी देता है कि ऐसा न्याय उसके ईश्वरीय निर्णय की घोषणा से कम कुछ नहीं। वह हमें आश्वस्त करता है कि जो कुछ विश्वासी पृथ्वी पर ठहराएँगे वह स्वर्ग में पुष्ट किया जाएगा। विश्वासियों के पास परमेश्वर का वचन है, जिसके द्वारा वे दुष्टों और कुटिलों को पहचानते और उनका न्याय करते हैं, और उसी वचन के द्वारा वे उन पर अनुग्रह और मेल-मिलाप बढ़ाते हैं जो पश्चाताप करते और अपने मार्ग सुधारते हैं। उनका न्याय परमेश्वर की धर्ममय व्यवस्था के अनुरूप है, जो केवल पार्थिव राय नहीं, वरन् उसकी पवित्र इच्छा और स्वर्गीय वाणी है।
इसके अतिरिक्त, यह समझना अत्यावश्यक है कि जब मसीह “कलीसिया” का उल्लेख करता है, तब वह पादरियों के किसी चुने हुए समूह की ओर संकेत नहीं कर रहा जिनके पास अधिकार के कुछ बाहरी चिह्न हैं, जैसे मुण्डन या मुण्डित सिर। वह तो उसके नाम में एकत्र विश्वासियों के सम्पूर्ण समुदाय की बात कर रहा है। हम उन लोगों के उपहास से विचलित न हों जो पूछते हैं कि कोई बिखरी और छितरी हुई कलीसिया के सामने शिकायत कैसे प्रस्तुत कर सकता है। मसीह स्पष्ट करता है कि वह हर मसीही मण्डली की बात कर रहा है, जो अलग-अलग स्थानों और प्रदेशों में स्थापित है।
जैसा वह घोषणा करता है, “जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ” (मत्ती 18:20)।
