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कुंजियों के अधिकार पर रोमी कैथोलिक मत की झूठी शिक्षा
पवित्रशास्त्र के पृष्ठों की जाँच करने पर हमें उस पाप-स्वीकार-प्रथा का कोई चिह्न नहीं मिलता जिसे उन धर्मशास्त्रियों ने गढ़ा है। अरे नहीं, उन्होंने तो अपनी ही एक भव्य योजना रच डाली है! उनके आदेश के अनुसार स्त्री-पुरुष सब लोग, विवेक की आयु को पहुँचते ही, वर्ष में कम से कम एक बार अपने-अपने पल्ली-याजक के सामने एक-एक पाप का स्वीकार करने को बाध्य हैं। जहाँ तक पापों की क्षमा का प्रश्न है, वह स्वीकार करने के अटल इरादे पर निर्भर है। यदि अवसर आने पर वह इरादा पूरा न किया जाए, तो स्वर्गलोक में प्रवेश की सब आशाएँ टूट जाती हैं। इसके अतिरिक्त याजक के पास कुंजियों की वह बहुचर्चित शक्ति है, अर्थात् पापी को बाँधने या खोलने का अधिकार। वे बड़े आग्रह से कहते हैं कि मसीह के वे वचन कि जो कुछ वे पृथ्वी पर बाँधेंगे वह स्वर्ग में बँधेगा (मत्ती 16:19; तुलना कीजिए मत्ती 18:18), निरर्थक नहीं ठहराए जा सकते।
परन्तु यहीं से उनकी पंक्तियों में विवाद उठता है। कुछ कहते हैं कि वस्तुतः केवल एक ही कुंजी है, अर्थात् बाँधने और खोलने की शक्ति, और यद्यपि उसे ठीक रीति से चलाने के लिए ज्ञान चाहिए, वह केवल एक सहायक अंग है, उसका सार नहीं। अन्य लोगों ने, यह देखकर कि ऐसी धारणा कितनी अव्यवस्थित है, कुंजियों का विभाजन गढ़ लिया: विवेक और शक्ति। और कुछ और लोगों ने, याजकों की मनमानी पर अंकुश लगाने की इच्छा से, अतिरिक्त कुंजियाँ चलाई हैं: भेद करने का अधिकार (जो निर्णायक फैसले सुनाते समय प्रयुक्त होता है) और शक्ति (जो उन फैसलों को लागू करने में प्रयुक्त होती है)। उन्होंने तो ज्ञान को भी सलाहकार के रूप में जोड़ दिया है। हाय! वे बाँधने और खोलने का सीधा अर्थ पापों की क्षमा और मुक्ति करने का साहस नहीं करते, क्योंकि वे स्वयं प्रभु को उसके भविष्यद्वक्ता के द्वारा यह कहते सुनते हैं, “मैं ही अपने नाम के निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूँ” (यशायाह 43:25)। इसके बदले वे यह दावा करते हैं कि यह घोषित करना याजक का विशेषाधिकार है कि कौन बँधा है और कौन खुला है, कौन-से पाप रखे गए हैं और कौन-से क्षमा हुए हैं। उनका कहना है कि याजक ये घोषणाएँ पाप-स्वीकार के कार्य के समय करता है, जब वह पापों को क्षमा करता या रोक रखता है, अथवा अपने उस फैसले के द्वारा, जब वह बहिष्कृत करता है या बहिष्कार से मुक्त करता है।
फिर भी वे इस अकाट्य तथ्य से बच नहीं सकते कि अयोग्य लोग प्रायः अपने याजकों द्वारा बाँधे या खोले जाते हैं, जबकि उन कामों के लिए याजकों के पास स्वर्गीय अधिकार नहीं होता। अपने अन्तिम बचाव के रूप में वे यह तर्क देते हैं कि कुंजियों का दिया जाना कुछ सीमाओं के साथ ही समझना चाहिए। वे कहते हैं कि मसीह ने यह प्रतिज्ञा की थी कि जब याजक का फैसला उस व्यक्ति की योग्यता के अनुसार, जिसे बाँधा या खोला जा रहा है, न्यायसंगत रीति से सुनाया जाएगा, तब स्वर्ग में उसकी पुष्टि होगी। इसके अतिरिक्त उनका कहना है कि ये कुंजियाँ सब याजकों को दी गई थीं, और अध्यक्षों द्वारा उपयाजक से याजक के पद पर उनके अभिषेक के समय उन्हें सौंपी जाती हैं। तथापि इस शक्ति का प्रयोग कलीसियाई पद पर रहनेवालों तक ही सीमित है। इस प्रकार कुंजियाँ सदा याजकों के पास रहती हैं, चाहे वे बहिष्कृत या निलम्बित हों, यद्यपि जंग लगी और निष्प्रभावी हुई।
जो लोग ऐसे दावे करते हैं वे उन अन्य लोगों की तुलना में कुछ-कुछ तर्कसंगत प्रतीत हो सकते हैं जिन्होंने नई कुंजियाँ गढ़ ली हैं, मानो अपने मनचाहे ताले बना रहे हों, ताकि उसकी रखवाली करें जिसे वे “कलीसिया का भण्डार” कहते हैं। वे बड़े दुस्साहस से यीशु मसीह, प्रेरितों, शहीदों और अन्य सन्तों की योग्यताओं को इस तथाकथित भण्डार का नाम देते हैं। उनका दावा है कि इस तिजोरी की सर्वोच्च संरक्षकता रोम के अध्यक्ष को सौंपी गई है, जिसके पास इन आत्मिक वस्तुओं के आरम्भिक वितरण की कुंजी है। वह बदले में उन्हें दूसरों को दे सकता है और उन्हें आगे बाँटने का अधिकार भी सौंप सकता है। और इस प्रकार क्षमा-पत्रों का जन्म हुआ; कभी पोप द्वारा पूर्ण क्षमा के रूप में, कभी निश्चित वर्षों की संख्या के लिए, जबकि कार्डिनलों को सौ दिन मिले और अध्यक्षों को केवल चालीस।
