यह हिन्दी संस्करण UECF.NET के लिए AI-सहायता से किए गए पूर्ण अनुवाद और सम्पादकीय गुणवत्ता-समीक्षा के द्वारा तैयार किया गया है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
पवित्रशास्त्र में पुर्गेटरी नहीं
अब हम उन धर्मविज्ञानियों के दोषपूर्ण तर्कों की ओर ध्यान दें, जो पवित्रशास्त्र के कुछ अंशों को झूठे रीति से अपनी भ्रामक मान्यताओं का समर्थक ठहराते हैं। वे कहते हैं कि जब प्रभु घोषणा करता है कि पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप न इस लोक में क्षमा किया जाएगा और न आनेवाले लोक में, तो इसका अर्थ यह है कि कुछ पापों की क्षमा आनेवाले लोक में होती है। इस पर मुझे यह पूछना है: क्या यह प्रत्यक्ष नहीं कि हमारा प्रभु उस अंश में पाप के दोष के विषय में बोल रहा है? यदि सचमुच ऐसा है, तो उनकी पुर्गेटरी के लिए इसका कोई प्रयोजन नहीं, क्योंकि वे तो कहते हैं कि पुर्गेटरी में मनुष्य उन पापों का दण्ड भुगतता है जो इस नश्वर जीवन में पहले ही क्षमा हो चुके हैं।
फिर भी, उनके दावों को पूरी तरह चुप कराने के लिए मैं एक अधिक स्पष्ट समाधान दूँगा। ऐसे घृणित पाप की क्षमा की सारी आशा मिटा देने की इच्छा से हमारे प्रभु ने केवल इतना ही नहीं कहा कि वह कभी क्षमा न किया जाएगा। बात की गम्भीरता पर बल देने के लिए उसने एक विभाजन का प्रयोग किया, और वर्तमान जीवन में मनुष्य के विवेक द्वारा अनुभव किए जानेवाले न्याय तथा पुनरुत्थान के दिन प्रकट होनेवाले अन्तिम न्याय के बीच भेद किया। मानो उसने यह सन्देश दिया हो: "सावधान रहो कि जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध द्वेष न करो, क्योंकि ऐसा विद्रोह अनन्त मृत्यु की ओर ले जाता है। जो लोग अपने सामने प्रस्तुत किए गए आत्मा के प्रकाश को जानबूझकर बुझाने का यत्न करते हैं, उन्हें न इस जीवन में क्षमा मिलेगी, जहाँ पापियों को मन फिराने का अवसर दिया जाता है, और न उस अन्तिम दिन में, जब परमेश्वर के स्वर्गदूत धर्मियों को दुष्टों से अलग करेंगे और उसके राज्य को सब ठोकर के कारणों से शुद्ध करेंगे।"
अब हम उनके उस प्रयास पर विचार करें, जिसमें वे मत्ती के सुसमाचार के दृष्टान्त का दुरुपयोग करते हैं: "अपने मुद्दई से झट मेल-मिलाप कर ले, ऐसा न हो कि वह तुझे न्यायी के हाथ सौंप दे, और न्यायी तुझे प्यादे के हाथ सौंप दे, और तू बन्दीगृह में डाल दिया जाए। मैं तुझ से सच कहता हूँ कि जब तक तू कौड़ी कौड़ी भर न दे तब तक वहाँ से छूटने न पाएगा" (मत्ती 5:25-26)। यदि हम उनकी व्याख्या मान लें कि न्यायी परमेश्वर है, मुद्दई शैतान है, प्यादा एक स्वर्गदूत है, और बन्दीगृह पुर्गेटरी है, तो सम्भवतः वे अपने को विजयी समझें। परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस अंश में मसीह का उद्देश्य यह दिखाना था कि जब लोग मेल-मिलाप से समाधान खोजने के बदले अपने झगड़ों और मुक़द्दमेबाज़ी पर अड़े रहते हैं, तो वे अपने ऊपर कितने ही संकट ले आते हैं। उसका लक्ष्य था कि इस चेतावनी के द्वारा वह हमें प्रेरित करे कि हम सब के साथ मेल-मिलाप का यत्न सदा करते रहें। तब मैं पूछता हूँ, इस दृष्टान्त में उन्हें अपनी पुर्गेटरी कहाँ मिलती है? संक्षेप में, आइए हम इस अंश को उसके सीधे-सादे अर्थ में लें और ग्रहण करें, तब हम पाएँगे कि जो बातें वे इस पर थोपना चाहते हैं उनमें से कोई भी इसमें नहीं है।
अब हम उस तर्क पर विचार करें जो वे सन्त पौलुस के इन शब्दों से प्रस्तुत करते हैं: "कि यीशु के नाम पर हर एक घुटना झुकेगा, चाहे स्वर्ग में, चाहे पृथ्वी पर, चाहे पृथ्वी के नीचे" (फिलिप्पियों 2:10)। ये धर्मविज्ञानी पूरे भरोसे से दावा करते हैं कि "पृथ्वी के नीचे के लोगों" से अनन्त दण्ड पानेवालों का अर्थ नहीं लिया जा सकता, वरन् पुर्गेटरी की आत्माओं का। यह तर्क उचित होता यदि प्रेरित का "घुटना झुकाना" कहना विश्वासियों द्वारा परमेश्वर को चढ़ाई जानेवाली सच्ची आराधना की ओर संकेत करता। परन्तु प्रेरित तो केवल यह सिखा रहा है कि यीशु मसीह ने पिता से समस्त सृष्टि पर सर्वोच्च प्रभुता पाई है। इसलिए यदि "पृथ्वी के नीचे के लोगों" से हम उन दुष्टात्माओं को समझें जो सचमुच प्रभु के सिंहासन के सामने उपस्थित होकर भय और थरथराहट के साथ अपने न्यायी को स्वीकार करेंगी, तो इसमें क्या अनुचित है? सन्त पौलुस स्वयं एक और स्थान पर इस भविष्यद्वाणी को स्पष्ट करता है, जब वह कहता है, "हम सब के सब परमेश्वर के न्याय-सिंहासन के सामने खड़े होंगे; क्योंकि लिखा है, प्रभु कहता है, मेरे जीवन की शपथ कि हर एक घुटना मेरे सामने टिकेगा" (रोमियों 14:10-11)। अब वे प्रकाशित वाक्य के एक अंश की ओर संकेत करके उत्तर दे सकते हैं: "और मैंने स्वर्ग में, और पृथ्वी पर, और पृथ्वी के नीचे, और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और उनमें जो कुछ है, उन सब को यह कहते सुना, कि जो सिंहासन पर बैठा है उसकी, और मेम्ने की स्तुति और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!" (प्रकाशित वाक्य 5:13)। यह बात मैं उन्हें सहर्ष मान लेता हूँ। परन्तु आइए देखें कि यहाँ किन सृजे हुए प्राणियों की बात है। स्पष्ट है कि इनमें वे भी सम्मिलित हैं जिनमें न आत्मा है न समझ। इसलिए इसका अर्थ यह है कि संसार के सब तत्त्व, सबसे ऊँचे आकाश से लेकर पृथ्वी की गहराइयों तक, अपने-अपने स्थान में अपने सृष्टिकर्ता की महिमा का गुणगान करते हैं।
मक्काबियों के इतिहास के उनके हवालों के विषय में मैं चुप रहूँगा, क्योंकि मैं उस पुस्तक को प्रामाणिक पवित्रशास्त्र का भाग नहीं मानता। परन्तु उन्हें लगता है कि सन्त पौलुस के इन शब्दों में उन्हें अभेद्य दुर्ग मिल गया है: "यदि किसी का काम जल जाए, तो वह हानि उठाएगा, पर वह आप बच जाएगा, परन्तु जलते-जलते" (1 कुरिन्थियों 3:15)। वे पूछते हैं, "सन्त पौलुस किस आग की बात कर रहा है, यदि पुर्गेटरी की नहीं, जो हमारे दागों को धोकर हमें इस योग्य बनाती है कि हम शुद्धता में परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें?" इसके उत्तर में मैं यह बताना चाहूँगा कि आरम्भिक कलीसिया के अनेक पिताओं ने इन शब्दों की व्याख्या भिन्न रीति से की। उन्होंने यहाँ उल्लिखित "आग" को क्लेशों और परीक्षाओं का चिन्ह समझा, जो क्रूस से संकेतित हैं, और जिनके द्वारा प्रभु अपने लोगों को परखता और उन्हें सब अशुद्धताओं से शुद्ध करता है। सचमुच यह व्याख्या पुर्गेटरी की धारणा से कहीं अधिक सम्भाव्य प्रतीत होती है।
फिर भी, मुझे आदरपूर्वक इस मत से असहमत होना पड़ता है, क्योंकि मेरा विश्वास है कि मेरी समझ अधिक स्पष्ट और अधिक निश्चित है। आइए हम देखें कि प्रेरित रूपकों और दृष्टान्तों का प्रयोग किस प्रकार करता है, जब वह मानव मन की गढ़ी हुई शिक्षाओं को "घास, भूसा और खर" कहता है (1 कुरिन्थियों 3:12)। इस दृष्टान्त का प्रयोजन ध्यान से देखने पर प्रकट हो जाता है: जैसे लकड़ी आग के सम्पर्क में आते ही शीघ्र भस्म हो जाती है, वैसे ही ये मानवीय शिक्षाएँ पूर्णतः निर्बल सिद्ध होती हैं और परीक्षा को सह नहीं सकतीं। अब यह बात सर्वविदित है कि यह परीक्षा पवित्र आत्मा के द्वारा की जाती है। इसलिए दृष्टान्त की संगति बनाए रखने के लिए प्रेरित पवित्र आत्मा द्वारा परखे जाने की प्रक्रिया को "आग" कहता है (1 कुरिन्थियों 3:13)। जिस प्रकार सोना और चाँदी तीव्र ताप में अधिक भली-भाँति परखे जाते हैं और उनकी शुद्धता पहचानी जाती है, उसी प्रकार जब परमेश्वर का सत्य आत्मिक जाँच से गुज़रता है तो उसका अधिकार और अधिक सुदृढ़ और स्थापित हो जाता है। जब लकड़ी, घास और भूसा आग में डाले जाते हैं, तो वे तुरन्त जलकर राख हो जाते हैं। उसी प्रकार, वे सब मानवीय आविष्कार जिनके पास परमेश्वर के वचन की नींव नहीं है, आत्मा की शोधन करनेवाली जाँच को सह नहीं सकते और अन्ततः नष्ट हो जाते हैं। सारांश यह कि यदि विचाराधीन शिक्षाओं की तुलना लकड़ी, भूसे और घास से की गई है, जो आग से भस्म और पराजित होती हैं, और यदि इन शिक्षाओं का नाश और निष्प्रभावी किया जाना केवल परमेश्वर के आत्मा से ही होता है, तो तर्क से यही निष्कर्ष निकलता है कि आत्मा ही वह आग है जिससे वे परखी जाती हैं। इसी परख को सन्त पौलुस "प्रभु का दिन" कहता है (1 कुरिन्थियों 3:13), और यह पवित्रशास्त्र की उस भाषा का प्रयोग है जो प्रभु की उपस्थिति के प्रकटीकरण को विभिन्न रूपों में सूचित करती है। मुख्यतः उसका मुखमण्डल हम पर तब चमकता है जब उसका सत्य हमारे हृदयों और मनों को प्रकाशित करता है।
हम पहले ही स्थापित कर चुके हैं कि सन्त पौलुस की समझ में आग पवित्र आत्मा द्वारा की गई परख के सिवा और कुछ नहीं है। अब आइए यह समझने में गहराई से उतरें कि जिनके काम की हानि होती है वे इस आग के द्वारा कैसे बचाए जाएँगे। यदि हम ध्यान से विचार करें कि यहाँ किन लोगों की बात हो रही है, तो यह खोज कठिन न होगी। सन्त पौलुस उनका उल्लेख करता है जो कलीसिया की उन्नति की सच्ची लालसा में विश्वास की ठोस नींव पर टिके रहते हैं, फिर भी उस पर ऐसी विभिन्न वस्तुएँ जोड़ देते हैं जो उसके अनुकूल नहीं हैं। दूसरे शब्दों में, वे विश्वास के मूलभूत और आधारभूत सिद्धान्तों से नहीं भटकते, वरन् परमेश्वर के प्रकट किए हुए सत्य के साथ मानवीय अटकलों को मिला देने के जाल में फँस जाते हैं। फलस्वरूप ऐसे लोगों के लिए अपने कामों की हानि उठाना आवश्यक हो जाता है। इसका अर्थ है उनके अपने जोड़े हुए अंशों का हटा दिया जाना, जो दैवी वचन में मिला दिए गए थे और जिन्हें निरर्थक और महत्त्वहीन ठहरा दिया गया। फिर भी इस प्रक्रिया के बीच उनके प्राण स्वयं बचा लिए जाएँगे। यह ध्यान रखना चाहिए कि परमेश्वर उनकी भूलों या अज्ञानता का समर्थन या अनुमोदन नहीं करता। तो भी अपने आत्मा के अनुग्रहपूर्ण कार्य के द्वारा हमारा प्रभु उन्हें वापस खींच लाएगा और उन्हें उनके भटके हुए मार्गों से छुड़ाएगा। इसलिए उन सब के लिए जिन्होंने पवित्रशास्त्र की पवित्र शुद्धता को पुर्गेटरी की अशुद्धता से दूषित किया है, उचित है कि वे अपने प्रयत्न छोड़ दें और अपने कामों को ढह जाने और फेंक दिए जाने दें।
-----
मोनर्जिज़्म बुक्स
पश्चाताप, जॉन कैल्विन, कॉपीराइट © 2020
अन्तरराष्ट्रीय तथा पैन-अमेरिकी कॉपीराइट सम्मेलनों के अन्तर्गत सर्वाधिकार सुरक्षित। अपेक्षित शुल्क के भुगतान द्वारा आपको इस ई-पुस्तक का पाठ स्क्रीन पर देखने और पढ़ने का अनन्य-रहित, अहस्तान्तरणीय अधिकार दिया गया है। मोनर्जिज़्म बुक्स की स्पष्ट लिखित अनुमति के बिना इस पाठ का कोई भी भाग किसी भी रूप में या किसी भी साधन से, चाहे इलेक्ट्रॉनिक हो या यान्त्रिक, जो अब ज्ञात हो या आगे आविष्कृत हो, पुनःप्रस्तुत, प्रसारित, डाउनलोड, डीकम्पाइल, रिवर्स इंजीनियर, या किसी सूचना-संग्रह और पुनःप्राप्ति प्रणाली में संग्रहीत या उसमें प्रविष्ट नहीं किया जा सकता।
ePub और .mobi संस्करण, मई 2023। जानकारी के अनुरोध इस पते पर भेजे जाएँ: मोनर्जिज़्म बुक्स, PO Box 491, West Linn, OR 97068
विषय-सूची
भूमिका
सामान्य रूप में पश्चाताप
पश्चाताप की गहरी समझ
पश्चाताप पर तीन मत
आँसू और उपवास
मसीह और उसके प्रेरितों द्वारा प्रचारित पश्चाताप
पश्चाताप और जीवन परिवर्तन
विद्वत्तावादियों द्वारा पश्चाताप को न समझा जाना
विद्वत्तावादियों द्वारा सिखाया गया हृदय-विदारण का सिद्धान्त
पाप-स्वीकार: पवित्रशास्त्र से तथाकथित एक प्रमाण
पाप-स्वीकार: पवित्रशास्त्र से तथाकथित दूसरा प्रमाण
पाप-स्वीकार: नए नियम के दो पाठों की जाँच
कलीसिया के इतिहास में पाप-स्वीकार
पवित्र शास्त्र के अनुसार पापों का स्वीकार
रोमन कैथोलिक मत की कुंजियों के अधिकार पर झूठी शिक्षा
अनिवार्य पाप-स्वीकार: विवेक पर क्रूर पीड़ा
कर्ण-स्वीकार: एक महामारी
कुंजियों का अधिकार
आत्मा, वचन और कुंजियाँ
क्षमा-पत्रों का व्यापार
पुण्यों का कोई भण्डार नहीं
धर्मविज्ञानियों के प्रायश्चित्त-सिद्धान्त का खण्डन
घातक और साधारण पाप
"फिरौती" और "बलिदान"
दण्ड और प्रायश्चित
परमेश्वर का क्रोध बनाम परमेश्वर की ताड़ना
परमेश्वर की मुफ़्त क्षमा सचमुच मुफ़्त है
लूका 7:36 की व्याख्या
आरम्भिक कलीसिया में प्रायश्चित्त का सिद्धान्त
प्रायश्चित्त और पुर्गेटरी
पवित्रशास्त्र में पुर्गेटरी नहीं
