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आत्मा, वचन और कुंजियाँ
इन दो अंशों को, जैसा मैंने संक्षेप में और सरलता से समझाया है, विवेकहीन लोग पाप-स्वीकार, बहिष्कार, अधिकार-क्षेत्र और व्यवस्थाएँ थोपने के विषय में अपने तर्कों को पुष्ट करने के लिए काम में लाते हैं। वे तो क्षमा-पत्रों की अपनी प्रथा के लिए भी इनसे समर्थन निकालने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु यदि मैं इन विषयों को एक ही प्रहार से काट डालूँ, तो मैं उनके इस दावे को अस्वीकार करूँगा कि उनके याजक प्रेरितों के सच्चे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी हैं। फिर भी इस विषय की जाँच यथासमय अलग से की जाएगी।
यह देखकर सचमुच हँसी आती है कि वे इन दावों से कितने आत्मविश्वास के साथ अपने आप को सुसज्जित करते हैं, यह मानते हुए कि वे इनसे अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर सकते हैं। परन्तु वे एक निर्णायक बात को पहचानने से चूक जाते हैं: मसीह ने अपने प्रेरितों को बाँधने और खोलने का अधिकार तब तक नहीं दिया जब तक उसने उन पर पवित्र आत्मा उण्डेल न दिया। इसलिए मैं दृढ़ता से अस्वीकार करता हूँ कि कुंजियों का अधिकार उनके सिवा किसी और के लिए उपयुक्त है जिन्होंने पवित्र आत्मा पाया है। यह सोचना बेतुका है कि कोई पवित्र आत्मा की मार्गदर्शक और शासक उपस्थिति के बिना, जो उनके कामों को सिखाता और निर्देशित करता है, कुंजियाँ चला सकता है। वे पवित्र आत्मा के होने का घमण्ड कर सकते हैं, परन्तु उनके काम कुछ और ही प्रमाणित करते हैं, जब तक कि वे पवित्र आत्मा को कोई तुच्छ और महत्त्वहीन वस्तु न मानें, जैसा उनके व्यवहार से झलकता है। परन्तु उनके दावों में कोई वज़न नहीं, क्योंकि लोग उन पर भरोसा नहीं रखते।
उनकी सम्पूर्ण योजना ध्यान से जाँचने पर ढह जाती है। वे चाहे जिस द्वार को खोलने की कुंजियाँ रखने का दावा करें, हमें सदा यह पूछना चाहिए कि क्या उनके पास पवित्र आत्मा है, जो कुंजियों का सच्चा निर्देशक और नियन्त्रक है। यदि वे यह कहने का साहस करें कि उनके पास पवित्र आत्मा है, तो हमें उनसे पूछना चाहिए: क्या पवित्र आत्मा चूक सकता है? यद्यपि वे इसे खुले रूप में न मानें, तथापि उनकी शिक्षाएँ परोक्ष रूप से इस सत्य को स्वीकार करती हैं। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि किसी याजक के पास कुंजियों का अधिकार नहीं है। वे सनक में और बिना विवेक के उन्हें बाँध देते हैं जिन्हें हमारा प्रभु छुड़ाना चाहता था, और उन्हें खोल देते हैं जिन्हें वह बाँधना चाहता था। उनके दावे एक दिखावटी आवरण के सिवा कुछ नहीं, जिनकी कोई सच्ची नींव नहीं।
जब उनके सामने स्पष्ट प्रमाण रखा जाता है कि वे बिना भेद किए अन्धाधुन्ध बाँधते और खोलते हैं, तब अपने आप को सही ठहराने के उनके हताश प्रयासों को देखना सचमुच हास्यास्पद है। वे यह जताने की कोशिश करते हैं कि आवश्यक ज्ञान के बिना भी उनके पास अधिकार है। यद्यपि वे उसके उचित प्रयोग के लिए विद्या के महत्त्व को नकारने का साहस नहीं करते, तथापि वे सुविधापूर्वक यह सिखाते हैं कि यह अधिकार उन्हें भी दिया गया है जो उसे बुरी रीति से चलाते हैं। परन्तु चूँकि अधिकार इस कथन में निहित है कि “जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे या खोलोगे वह स्वर्ग में बँधेगा और खुलेगा,” इसलिए या तो यीशु मसीह की प्रतिज्ञा झूठी है, या जिन्हें यह अधिकार सौंपा गया है उन्हें वैसा ही बाँधना और खोलना चाहिए जैसा उचित है। वे यह कहकर अर्थ को तोड़-मरोड़ नहीं सकते कि मसीह की प्रतिज्ञा व्यक्ति की योग्यता या अयोग्यता के आधार पर सीमित है।
हम भी मानते हैं कि जब तक कोई योग्य न हो तब तक उसे न बाँधा जा सकता है न खोला। फिर भी सुसमाचार के दूतों और कलीसिया के पास इस योग्यता को निर्धारित करने के लिए परमेश्वर का वचन है। इसी वचन के द्वारा सुसमाचार के दूत उन सब को, जो मसीह को ग्रहण करते हैं, विश्वास के द्वारा मसीह में पापों की क्षमा की प्रतिज्ञा दे सकते हैं, और जो उसे ठुकराते हैं उन पर दण्ड की घोषणा कर सकते हैं। इसी वचन में कलीसिया घोषित करती है कि जो लोग व्यभिचार, परस्त्रीगमन, चोरी, हत्या, लोभ और पापमय कामों में लगे रहते हैं उनका परमेश्वर के राज्य में कोई भाग नहीं, और वह उन्हें दृढ़ बन्धनों से कसकर रोक सकती है। उसी प्रकार, इसी वचन के द्वारा कलीसिया उन्हें छोड़ सकती है जिन्हें वह तब सान्त्वना देती है जब वे सचमुच पश्चाताप करते हैं।
परन्तु यदि कोई यह न जानता हो कि क्या बाँधना या खोलना है, तो वह कैसा अधिकार है? ज्ञान के बिना कोई कैसे बाँध या खोल सकता है? तब वे यह दावा क्यों करते हैं कि वे कथित रूप से दिए गए अधिकार के बल पर क्षमा-दान करते हैं, जबकि क्षमा-दान स्वयं अनिश्चित है? इस काल्पनिक अधिकार का क्या प्रयोजन है जब उसका कोई प्रभाव ही नहीं? ये प्रश्न उनके दावों की त्रुटियों को उजागर करते हैं और उनके कथित अधिकार को अर्थहीन ठहराते हैं।
अपने प्रयोग की प्रभावशीलता का बचाव करने के उनके दुर्बल प्रयासों को देखना सचमुच हास्यास्पद है, जिसे शून्य, या अधिक से अधिक अत्यन्त अनिश्चित, के सिवा और कुछ नहीं माना जा सकता। वे स्वयं मानते हैं कि अधिकांश याजक कुंजियों का ठीक प्रयोग नहीं करते, साथ ही यह भी मानते हैं कि जब कुंजियों का प्रयोग वैध रीति से न हो तो उनका अधिकार निष्प्रभावी है। इसे देखते हुए, कौन इसकी गारंटी दे सकता है कि जिसने मुझे क्षमा-दान दिया उसने कुंजियों का सही प्रयोग किया ही है? यदि याजक अयोग्य है, तो मुझे केवल एक सनकी क्षमा-दान मिलता है, जो कुछ इस प्रकार का है: “मैं निश्चित नहीं कि तुझ में क्या बाँधा या खोला जाना चाहिए, क्योंकि कुंजियों की मुझे कोई समझ नहीं। फिर भी, यदि तू योग्य है, तो मैं तुझे क्षमा-दान देता हूँ।” ऐसे क्षमा-दान का उतना ही वज़न है मानो वह किसी और ने कहा हो, चाहे वह कोई साधारण जन हो (यद्यपि इसका उल्लेख उन्हें नाराज़ कर सकता है) या कोई तुर्क या शैतान ही। सारतः इसका अर्थ यह कहना है, “मेरे पास परमेश्वर का निश्चित और पक्का वचन नहीं, जो बाँधने और खोलने का भरोसेमन्द मार्गदर्शक है। फिर भी, यदि तू संयोग से योग्य हो, तो तुझे क्षमा-दान देने का अधिकार मेरे पास है।”
स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य तब प्रकट हो जाता है जब वे यह दावा करते हैं कि कुंजियों में भेद करने का अधिकार और अपने निर्णयों को पूरा करने की शक्ति सम्मिलित है, और विद्या केवल उचित प्रयोग के लिए एक सलाहकार का काम करती है। अपनी अव्यवस्था और उच्छृंखलता में वे परमेश्वर और उसके वचन के बिना राज्य करना चाहते हैं, ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता को फेंककर अपने आप को क्षमा-दान का परम निर्णायक बना लेते हैं। परमेश्वर के अधिकार और उसके अचूक वचन की नींव के बिना काम करने के उनके प्रयासों में वे कितने दुस्साहसी और पथभ्रष्ट हैं।
यह देखकर सचमुच हँसी आती है कि वे अपनी कुंजियों को भिन्न-भिन्न द्वारों और तालों में बैठाने का प्रयत्न करते हैं, मानो इन कुंजियों का कोई सार्वभौमिक अधिकार-क्षेत्र हो जिसे पाप-स्वीकार, आदेशों, बहिष्कारों और न जाने किस-किस पर लागू किया जा सके। मुझे इस विषय का संक्षिप्त स्पष्टीकरण देने दीजिए।
जब हम यूहन्ना के सुसमाचार में मसीह की अपने चेलों को दी गई उस आज्ञा पर विचार करते हैं, जहाँ वह उन्हें पापों को खोलने या रखने का अधिकार देता है (यूहन्ना 20:23), तब यह ध्यान देना आवश्यक है कि वह उन्हें विधायक, अधिकारी, प्रतिलिपिकार, या विनम्र प्रार्थी भी नहीं ठहरा रहा। इसके बदले वह उन्हें एक विशेष साक्षी सौंपता है, और उन्हें अपने वचन के सेवक के रूप में सम्मानित करता है।
इसी प्रकार, मत्ती के सुसमाचार में, जब मसीह अपनी कलीसिया को बाँधने और खोलने का अधिकार देता है (मत्ती 16:19), तब वह उन्हें यह आज्ञा नहीं दे रहा कि किसी मुकुटधारी और सींगधारी व्यक्ति के अधिकार पर, मोमबत्तियाँ बुझाने और घण्टियाँ बजाने के साथ, उन बेचारे लोगों को बहिष्कृत करें जो अपने महाजनों को सन्तुष्ट करने में असमर्थ हैं। वरन् वह चाहता है कि दुष्टों के भटकाव को कलीसियाई अनुशासन के द्वारा, अपने वचन के अधिकार से, और अपनी कलीसिया की सेवकाई के द्वारा सुधारा जाए।
हम उनकी काल्पनिक व्याख्याओं और कुंजियों के उलझे हुए प्रयोगों में बह न जाएँ। इसके बदले हम इन कुंजियों के सच्चे सार और उद्देश्य को समझने का यत्न करें, अर्थात् हृदयों के परिवर्तन और गिरे हुओं की पुनःस्थापना को लाना, यह सब परमेश्वर के वचन के सामर्थ्य और उसकी कलीसिया की विश्वासयोग्य सेवकाई के द्वारा।
