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अंगीकार: पवित्रशास्त्र से दूसरा तथाकथित प्रमाण
ये धर्मवैज्ञानिक, जो अपने रूपकों के सदा प्रेमी हैं, अपना दूसरा तर्क उसी स्रोत से ऐसे प्रस्तुत करते हैं मानो रूपकों में अपनी शिक्षाओं को प्रमाणित करने की कोई बड़ी सामर्थ्य हो! फिर भी, यदि केवल रूपक ही पर्याप्त होते तो मैं सन्तुष्ट हो जाता, विशेषकर इसलिए कि मैं उन पर उनसे कहीं अधिक वैध रूप से अधिकार जता सकता था। वे कहते हैं कि यीशु ने लाज़र को मरे हुओं में से जिलाने के पश्चात् अपने चेलों को आज्ञा दी कि उसे खोलकर जाने दो (यूहन्ना 11:44)। पहली बात, अपने दावे में वे खुला छल करते हैं, क्योंकि कहीं यह नहीं लिखा कि उसने अपने चेलों को ऐसा कार्य करने की आज्ञा दी। कहीं अधिक सम्भव यह है कि उसने ये शब्द घटनास्थल पर उपस्थित यहूदियों से कहे, ताकि आश्चर्यकर्म निःसन्देह प्रकट हो और छलावे का कोई सन्देह न रहे। उसकी सामर्थ्य और भी विस्मयकारी दिखाई देती, क्योंकि उसने मरे हुए को केवल अपने वचन के बल से जिलाया, बिना शारीरिक स्पर्श के। सच तो यह है कि मैं इसे इसी प्रकार समझता हूँ: हमारा प्रभु यहूदियों के मन से हर दुष्ट सन्देह दूर करना चाहता था, इसलिए उसने चाहा कि वे पत्थर को लुढ़का दें, सड़ाँध की दुर्गन्ध को पहचानें, मृत्यु के अचूक चिह्नों को देखें, और तब लाज़र को केवल उसकी आज्ञा देनेवाली वाणी की सामर्थ्य से जी उठा हुआ देखें। वे ही सबसे पहले लाज़र को छूनेवाले होते, और आश्चर्यकर्म के जीवित गवाह बनते। फिर भी, मान लेते हैं, केवल कल्पना के रूप में, कि ये शब्द चेलों से कहे गए थे। तब ये धर्मवैज्ञानिक इससे क्या निष्कर्ष निकालते हैं? अपने प्रिय रूपक के द्वारा वे इस अंश की और क्या व्याख्या कर सकते हैं? सम्भवतः वे यह सुझाएँगे कि हमारा प्रभु अपने विश्वासियों को सिखाना चाहता था कि जिन्हें उसने जिलाया है उन्हें वे खोल दें। अर्थात् वे उन पापों को स्मरण न करें जिन्हें उसने भुला दिया है, और जिन्हें उसने क्षमा किया है उन्हें दोषी न ठहराएँ। जिन बातों के लिए उसने क्षमा दी है, उनके विषय में वे आरोप न लगाएँ, और दण्ड देने में कठोर और अटल न बनें, जबकि उसने अपनी दया में क्षमा देने में अनुग्रहकारी, कोमल और करुणामय होना चुना है! अहा, ये धर्मवैज्ञानिक अपने रूपकों की प्रतिभा को निहारें और उन्हें अपनी ढाल और अपना अधिकार बनाएँ!
