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यदि ऐसी सन्तुष्टि (प्रायश्चित) न दी जाती। वास्तव में अपने पुत्र को इस उद्देश्य के लिए बलिदान होने देने को राज़ी होना क्षमा करने की इच्छा का सबसे प्रबल सम्भव प्रदर्शन था। वह अपने पुत्र से प्रेम करता था, और निश्चय ही उसे एक भी अनावश्यक पीड़ा न देता। वह पाप करनेवाली मानवजाति से भी प्रेम करता था, और उस विनाश की गहराई को देखता था जिसकी ओर वे दौड़े चले जा रहे थे। इसलिए वह उन्हें क्षमा करने को लालायित था, और एक ऐसा मार्ग तैयार करना चाहता था जिससे वह सुरक्षित रूप से ऐसा कर सके। वह केवल हर प्रकार की ग़लतफ़हमी से बचना चाहता था। ऐसे प्रायश्चित के बिना क्षमा कर देना, जो पाप के प्रति उसकी घृणा को पर्याप्त रूप से प्रकट करे, बुद्धिमान विश्व को यह सोचने के लिए छोड़ देता कि उसे इस बात की कोई चिन्ता नहीं कि कोई भी प्राणी कितना ही पाप करे। ऐसा नहीं चल सकता था।
यह बात भी ध्यान में रखी जाए कि यीशु मसीह का दे दिया जाना परमेश्वर की ओर से व्यवस्था को बनाए रखने के लिए केवल एक स्वेच्छा से दिया गया बलिदान था, ताकि वह अपने शासन को संकट में डाले बिना क्षमा कर सके। यीशु को किसी भी अर्थ में दण्ड नहीं दिया गया; उसने तो केवल स्वेच्छा से पापियों के लिए दुःख उठाया, ताकि वे शासन की उस आवश्यकता से छूट जाएँ जिसके अनुसार उन्हें दुःख उठाना पड़ता। और क्या इसमें दया प्रकट नहीं हुई?
निश्चय हुई। इससे बढ़कर वह और किस प्रकार प्रकट हो सकती थी?
परन्तु आपत्ति करनेवाला कहता है, परमेश्वर अन्यायी है, क्योंकि वह अनन्त मृत्यु का भय दिखाकर असम्भव बातों की माँग करता है।
सचमुच ऐसा करता है? तो कहाँ? क्या व्यवस्था में, या सुसमाचार में? इन दोनों को मिलाकर हमारे पास परमेश्वर की सब माँगों का योग है। तो फिर आप व्यवस्था या सुसमाचार के किस भाग में वह आज्ञा पाते हैं जो असम्भव बातों की माँग करती है? क्या व्यवस्था में? परन्तु व्यवस्था तो केवल यह कहती है, “तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से प्रेम रखना;” किसी दूसरे मनुष्य के मन से नहीं, बल्कि केवल अपने ही मन से; केवल अपने सारे मन से, सारे से अधिक से नहीं। और आगे पढ़िए: “और अपनी सारी शक्ति से।” किसी स्वर्गदूत की शक्ति से नहीं—अपने सिवा किसी और प्राणी की शक्ति से नहीं, और केवल उतनी शक्ति से जितनी उस समय आपके पास वास्तव में है। आप देखते हैं, व्यवस्था की माँगें ठीक आपकी योग्यता के बराबर हैं; न उससे अधिक, न उससे भिन्न।
उसने कहा, सचमुच, यह तो इस विषय का एक नया दृष्टिकोण है। अच्छा, परन्तु क्या यह ठीक वैसा ही नहीं है जैसा होना चाहिए? क्या व्यवस्था अपने ही शब्दों में अपना औचित्य स्वयं नहीं रखती? कोई यह कैसे कह सकता है कि व्यवस्था हमसे असम्भव सेवा की माँग करती है—ऐसी बातों की जिन्हें करने की हममें सामर्थ ही नहीं? सच तो यह है कि वह हमसे ठीक उतना ही करने की माँग करती है जितना हम कर सकते हैं, उससे अधिक कुछ नहीं। तो फिर बाइबल के विरुद्ध यह आपत्ति कहाँ रही? वह असम्भवता कहाँ है जिसकी आप बात करते हैं?
उसने फिर कहा, परन्तु क्या यह सच नहीं है कि “पतन के बाद से कोई भी केवल मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं का पूरी तरह पालन करने में समर्थ नहीं हुआ, बल्कि प्रतिदिन विचार, वचन और कर्म में उन्हें तोड़ता है?”
आह, मेरे मित्र, यह प्रश्नोत्तरी है, बाइबल नहीं; हमें सावधान रहना चाहिए कि जो कुछ मनुष्यों की बनाई प्रश्नोत्तरियों ने कहा है, वह सब बाइबल के सिर न मढ़ें। बाइबल तो केवल यह माँगती है कि आपके पास वास्तव में जो शक्ति और योग्यताएँ हैं, उन्हें आप परमेश्वर को समर्पित करें; और वह इस दावे के लिए कदापि उत्तरदायी नहीं कि परमेश्वर मनुष्य से उसकी सामर्थ से अधिक की माँग करता है। नहीं, कदापि नहीं; बाइबल कहीं भी परमेश्वर पर ऐसी अनुचित और क्रूर माँग का दोष नहीं लगाती। कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य का मन परमेश्वर की व्यवस्था के ऐसे दृष्टिकोण के विरुद्ध विद्रोह करे। यदि कोई मानवीय व्यवस्था असम्भव बातों की माँग करती, तो उस पर पड़नेवाली निन्दाओं का कोई अन्त न होता। कोई भी मानवीय मन सम्भवतः
