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4. ऊँचे पर चढ़ाया गया उद्धारकर्ता, और विश्वास की दृष्टि।
4. ऊँचे पर चढ़ाया गया उद्धारकर्ता, और विश्वास की दृष्टि।
“और जिस रीति से मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊँचे पर चढ़ाया जाए; ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”—यूहन्ना 3:14,
“और मैं यदि पृथ्वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा, तो सब को अपने पास खींचूँगा। (ऐसा कहकर उस ने यह प्रगट कर दिया, कि वह कैसी मृत्यु से मरेगा।)”—यूहन्ना 12:32, 33।
इस विषय को स्पष्ट करने के लिए मैं वह खण्ड पढ़ूँगा जिसकी ओर संकेत किया गया है—गिनती 21:6-9।
“सो यहोवा ने उन लोगों में तेज विषवाले साँप भेजे, जो उनको डसने लगे, और बहुत से इस्राएली मर गए। तब लोग मूसा के पास जाकर कहने लगे, हम ने पाप किया है, कि हम ने यहोवा के और तेरे विरुद्ध बातें की हैं; यहोवा से प्रार्थना कर, कि वह साँपों को हम से दूर करे। तब मूसा ने उनके लिये प्रार्थना की। यहोवा ने मूसा से कहा,
एक तेज विषवाले साँप की प्रतिमा बनवाकर खम्भे पर लटका; तब जो साँप से डसा हुआ उसको देख ले वह जीवित बचेगा। सो मूसा ने पीतल का एक साँप बनवाकर खम्भे पर लटकाया; तब साँप के डसे हुओं में से जिस जिस ने उस पीतल के साँप को देखा वह जीवित बच गया।”
यही वह घटना है जिसकी ओर मसीह ने इस पद में संकेत किया। दोनों ही अवस्थाओं में उद्देश्य मनुष्यों को साँप के डसने से बचाना था। साँप के डसने का परिणाम, यदि उसके प्रभाव को रोका न जाए, तो देह की मृत्यु है; और पाप का परिणाम, यदि वह क्षमा न किया जाए और हृदय से धोया न जाए, तो प्राण का विनाश है।
मसीह इसलिए ऊँचे पर चढ़ाया गया है कि पापी उस पर विश्वास करके नाश न हों, परन्तु अनन्त जीवन पाएँ। ऐसे प्रसंग में “नाश होने” का अर्थ पूर्ण विलोप (अस्तित्व का मिट जाना) नहीं हो सकता, क्योंकि यह अवश्य ही अनन्त जीवन का विपरीत होना चाहिए, और अनन्त जीवन स्पष्ट रूप से अनन्त अस्तित्व से कहीं बढ़कर है। वह अवश्य ही अनन्त आनन्द है—अत्यन्त मधुर सुख के अर्थ में सच्चा जीवन। इसका उलटा पक्ष, अर्थात् अनन्त दुःख, “नाश होना” शब्द के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। पवित्रशास्त्र में यह आम बात है कि अन्तहीन दुःख की दशा की तुलना अन्तहीन आनन्द की दशा से की जाए।
हम पीतल के साँप और मसीह के बीच समानता की दो बातें देख सकते हैं।
1. मसीह को उसी प्रकार ऊँचे पर चढ़ाया जाना अवश्य था जैसे जंगल में साँप चढ़ाया गया था। यूहन्ना 12 में से ऊपर उद्धृत खण्ड से यह स्पष्ट है कि इसका संकेत उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने के समय उसके क्रूस पर पृथ्वी से ऊपर उठाए जाने की ओर है।
2. मसीह को पाप के उपचार के रूप में ऊँचा उठाकर प्रस्तुत किया जाना अवश्य है, जैसे पीतल का साँप विष के उपचार के रूप में था। बाइबल में पाप को एक रोग के रूप में चित्रित किया जाना असामान्य बात नहीं है। इस रोग के लिए मसीह के पास चंगा करने की सामर्थ थी। उसने यह दावा किया कि वह पाप क्षमा कर सकता है और प्राण को उसकी नैतिक अशुद्धता से शुद्ध कर सकता है। वह निरन्तर यह दावा करता रहा कि उसके पास यह सामर्थ है, और मनुष्यों को उत्साहित करता रहा कि वे उस पर भरोसा रखें और इस सामर्थ को अपने ऊपर लागू कराने के लिए उसी के पास आएँ। अपनी सब व्यक्तिगत शिक्षाओं में
वह इस बात का ध्यान रखता था कि अपने आप को ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करे जिसके पास यह सामर्थ है, और जो पाप का उपचार देने में समर्थ है।
इस विषय में पीतल का साँप मसीह का प्रतिरूप था। जो कोई इस साँप की ओर देखता था, वह चंगा हो जाता था। इसी प्रकार मसीह केवल दण्ड से ही चंगा नहीं करता—क्योंकि इस पर चंगाई की उपमा कम लागू होती है—परन्तु विशेष रूप से पाप करने से—पाप की ओर झुके हुए मन से—चंगा करता है। वह प्राण को चंगा करता है और उसे फिर से स्वस्थ कर देता है। इसी प्रकार घोषणा करनेवाले स्वर्गदूत ने कहा था, “तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा।” उसकी सामर्थ प्राण को शुद्ध और पवित्र करने में प्रभावशाली है।
मसीह और साँप, दोनों में से प्रत्येक, उपचार के रूप में ऊँचे पर रखे गए, और यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है—एक पूर्ण और पर्याप्त उपचार के रूप में। तेज विषवाले साँपों से डसे हुए प्राचीन इब्रानियों को चंगाई में सहायता के लिए अपनी ही गढ़ी हुई नीम-हकीमी दवाइयाँ नहीं मिलानी थीं: उनके लिए यही पूरी तरह पर्याप्त था कि वे परमेश्वर के अपने ठहराए हुए उपचार की ओर दृष्टि करें। परमेश्वर चाहता था कि वे समझ लें कि चंगाई पूरी तरह उसी का काम है। खम्भे पर लटका साँप ही एकमात्र बाहरी वस्तु थी जो उनकी चंगाई से जुड़ी थी; उसी की ओर उन्हें देखना था, और इसी अत्यन्त सरल रीति से—केवल आशा भरी एक दृष्टि से, जो सरल विश्वास का चिह्न थी—उन्होंने अपनी चंगाई पाई।
मसीह को वर्तमान उपचार के रूप में ऊँचा उठाया जाना है। वैसा ही साँप भी था। उस समय जो चंगाई होती थी वह वर्तमान और तत्काल थी। उसमें कोई विलम्ब नहीं था।
यह साँप परमेश्वर का ठहराया हुआ उपचार था। वैसा ही मसीह भी है—परमेश्वर का ठहराया हुआ उपचार, जो इसी विशेष उद्देश्य से स्वर्ग से नीचे भेजा गया। यह सचमुच बड़ी अद्भुत बात थी कि परमेश्वर ऐसे उद्देश्य के लिए पीतल का साँप ठहराए—ऐसे रोग के लिए ऐसा उपचार; और यह भी कुछ कम अद्भुत नहीं कि मसीह पीड़ा और लहू में ऊँचे पर चढ़ाया जाए, ताकि वह पाप के दण्ड और हृदय पर उसकी शक्ति, दोनों का उपचार हो।
पीतल का साँप परमेश्वर द्वारा प्रमाणित उपचार था; वह कोई ऐसी नीम-हकीमी दवा नहीं थी जैसी हज़ारों दवाइयाँ ऊँचे-ऊँचे नामों और चमक-दमक भरे प्रशंसा-पत्रों के साथ तैयार की जाती हैं; परन्तु वह एक ऐसा उपचार था जिसे स्वयं परमेश्वर ने तैयार करके प्रस्तुत किया, और उसके भरपूर चंगा करनेवाले गुणों का प्रमाण-पत्र स्वयं उसी ने दिया।
वैसा ही मसीह भी था। पिता इस बात की गवाही देता है कि यीशु मसीह पाप के उपचार के रूप में पूर्ण रूप से पर्याप्त है।
अब यीशु मसीह को मंच (पल्पिट) से ऐसे व्यक्ति के रूप में ऊँचा उठाकर प्रस्तुत किया जाना अवश्य है जो मनुष्यों के पापों के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया।
उसकी उद्धार करने की महान सामर्थ उसकी प्रायश्चित करनेवाली मृत्यु में निहित थी।
उसे केवल मंच से ऊँचा उठाकर प्रस्तुत ही नहीं किया जाना चाहिए, वरन् उसके व्यक्तित्व और कार्य की इस प्रस्तुति की पुष्टि उन लोगों के अनुभव से होनी चाहिए जो उसकी ओर देखते हैं, न कि उनके अनुभव से उसका खण्डन हो।
मान लीजिए कि मूसा के समय में यह दिखाई देता कि देखनेवालों में से बहुत से फिर भी मर रहे हैं; तो मूसा की इस बिना शर्त घोषणा पर कौन विश्वास कर सकता था कि “जो साँप से डसा हुआ उसको देख ले वह जीवित बचेगा”? यही बात यहाँ सुसमाचार और उसके पात्रों के विषय में है। निस्सन्देह इब्रानियों की आँखों के सामने बहुत से जीवित गवाह थे जिन्हें साँप ने डसा था और जिनके शरीर पर अब भी उन घावों के निशान थे; परन्तु जो देखने के द्वारा चंगे हो गए थे। ऐसा हर एक उदाहरण परमेश्वर के वचन में और उसकी बचाने की अपनी सामर्थ में लोगों के विश्वास को दृढ़ करता था। इसी प्रकार मसीह को उसकी परिपूर्णता में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, और इस प्रस्तुति की पुष्टि उसके मित्रों के अनुभव से सामर्थ के साथ होनी चाहिए। मसीह अपने आप को ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जो बचाने के लिए तैयार और इच्छुक है। इसलिए यही बात दिखाई जानी है। इसकी पुष्टि उसके जीवित गवाहों की गवाही से होनी चाहिए। जैसे समानता की पहली बात उस वस्तु का ऊँचा उठाया जाना है जिसकी ओर देखना है, वैसे ही दूसरी बात स्वयं यह देखना ही है।
लोगों ने इस आशा से साँप की ओर देखा कि ईश्वरीय सामर्थ उन्हें चंगा करेगी। उस अपेक्षाकृत अन्धकारमय युग में भी वे प्राचीन लोग यह समझते थे कि साँप केवल एक प्रतिरूप था, स्वयं उद्धार का वास्तविक कारण नहीं।
इसी प्रकार विश्वास और चंगाई के सम्बन्ध में कुछ बड़ी उल्लेखनीय बात है। उदाहरण के लिए, उस स्त्री को लीजिए जिसे लहू बहने का रोग था। उसने यीशु के विषय में कुछ सुना था, और किसी प्रकार उसके मन में यह विचार आ गया था कि यदि वह उसके वस्त्र का आँचल ही छू ले, तो चंगी हो जाएगी। देखिए, वह भीड़ में से अपना मार्ग बनाती हुई आगे बढ़ रही है—दुर्बलता से मूर्छित-सी, पीली और काँपती हुई; यदि आपने उसे देखा होता तो शायद आप पुकार उठते, यह बेचारी मरती हुई रोगिणी क्या करना चाहती है?
वह जानती थी कि वह क्या करने का प्रयत्न कर रही है। अन्त में, सब की दृष्टि से बचकर, वह उस स्थान तक पहुँच गई जहाँ वह पवित्र जन खड़ा था, और उसने अपना निर्बल हाथ बढ़ाकर उसके वस्त्र को छू लिया। अचानक वह मुड़कर पूछता है, मुझे किसने छुआ? किसी ने मुझे छुआ है: वह कौन था?
चेले, ऐसी परिस्थितियों में पूछे गए ऐसे प्रश्न से चकित होकर उत्तर देते हैं—भीड़ तुझे चारों ओर से दबा रही है, और हर घड़ी बीसियों लोग तुझे छू रहे हैं; फिर तू क्यों पूछता है—मुझे किसने छुआ?
बात यह थी कि किसी ने इस विश्वास के साथ उसे छुआ था कि उसके द्वारा वह चंगा हो जाए, और वह जानता था कि चंगा करनेवाली सामर्थ उसमें से निकलकर किसी विश्वास करनेवाले हृदय तक पहुँची है। सरल विश्वास का यह कैसा सुन्दर उदाहरण है! और विश्वास और चंगाई के बीच का सम्बन्ध कैसा अद्भुत है!
ठीक इसी प्रकार इब्रानियों ने केवल पीतल के साँप की ओर देखने के द्वारा वह अद्भुत चंगा करनेवाली सामर्थ पाई। निस्सन्देह यह उनके लिए एक बड़ा भेद था, फिर भी यह उतना ही सच्चा तथ्य था। वे देखें; देखना ही चंगाई लाता है, यद्यपि उनमें से एक भी नहीं बता सकता कि चंगा करनेवाली सामर्थ कैसे आती है। इसी प्रकार हमें सचमुच मसीह की ओर देखना है, और देखते हुए चंगा करनेवाली सामर्थ पानी है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हम उस रीति को कितना कम समझते हैं जिससे देखना हमें पाप का उपचार दिलाने का काम करता है।
यीशु की ओर इस देखने का अर्थ है कि हम अपने आप से दृष्टि हटा लें। उस महान उपचार के साथ नीम-हकीमी दवाइयाँ नहीं मिलानी हैं। ऐसा मार्ग सदा निश्चय ही विफल होता है।
हज़ारों लोग ठीक इसी प्रकार विफल होते हैं—वे सदा इस प्रयत्न में लगे रहते हैं कि कुछ तो अपने मूर्खतापूर्ण, हठीले कामों के द्वारा और कुछ यीशु मसीह के द्वारा चंगे हो जाएँ। मनुष्य की ओर, या मनुष्य के किसी काम या मनुष्य की सहायता की ओर कोई दृष्टि नहीं होनी चाहिए। सारी निर्भरता केवल मसीह पर ही होनी चाहिए। जैसे यह बात क्षमा के विषय में सच है, वैसे ही पवित्रीकरण के विषय में भी सच है। यह मसीह में विश्वास के द्वारा होता है।
केवल विश्वास के द्वारा और विश्वास से ही आप वह ईश्वरीय प्रभाव पाते हैं जो प्राण को पवित्र करता है—अर्थात् परमेश्वर का आत्मा; और यही, अपने कार्य के किसी न किसी रूप में, वह सामर्थ थी जिसने जंगल में इब्रानियों को चंगा किया।
मसीह की ओर देखने का अर्थ है अपने आप से दृष्टि हटा लेना, इस अर्थ में कि जिस चंगाई की हमें लालसा है उसके लिए हम अपने कामों पर—यहाँ तक कि विश्वास के कामों पर भी—तनिक भी भरोसा न रखें। यह देखना
केवल मसीह की ओर है, जो हमारा सर्वप्रबल, सर्वपर्याप्त और वर्तमान उपचार है।
मसीहियों में यह निरन्तर प्रवृत्ति पाई जाती है कि वे मसीह में सरल विश्वास पर नहीं, बल्कि अपने कामों पर निर्भर रहें। लहू बहने के रोगवाली स्त्री, ऐसा जान पड़ता है, मसीह के पास आने से पहले बहुत वर्षों तक राहत पाने के लिए परिश्रम करती रही थी; निस्सन्देह उसने हर किसी के नुस्खे आज़माए थे, और इसके अतिरिक्त अपनी बुद्धि को भी उसकी पूरी क्षमता तक लगा दिया था, परन्तु सब व्यर्थ रहा। अन्त में उसने यीशु के विषय में सुना। कहा जाता था कि वह बहुत से अद्भुत काम करता है। उसने अपने मन में कहा—यह अवश्य ही वह प्रतिज्ञा किया हुआ मसीहा होगा—जो “हमारी बीमारियों को उठा” लेनेवाला और मनुष्यों के सब रोगों को चंगा करनेवाला था। ओह, मैं दौड़कर उसके पास जाऊँ, क्योंकि यदि मैं उसके वस्त्र का आँचल ही छू लूँ, तो चंगी हो जाऊँगी।
वह चंगाई की रीति पर दार्शनिक विचार करने के लिए नहीं रुकी; उसने किसी मनुष्य के दर्शनशास्त्र का सहारा नहीं लिया, और उसका अपना कोई दर्शनशास्त्र था ही नहीं; उसने बस इतना कहा—मैंने एक ऐसे के विषय में सुना है जो बचाने में सामर्थी है, और मैं भागकर उसी की शरण लेती हूँ।
हमारे पापों से चंगे होने के विषय में भी ऐसा ही है। अपने आप में या मसीह के नाम को छोड़ किसी और नाम में सहायता की सब आशा छोड़कर, और इस बात का निश्चय रखकर कि उसमें चंगाई करने की सामर्थ है, हम उसी से इसकी आशा रखते हैं और इसे पाने के लिए उसके पास आते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में कई बार, जब लोग मेरे पास यह प्रश्न लेकर आए हैं कि क्या मैं किसी भी प्रकार अपने पापों से बच सकता हूँ—सचमुच बच सकता हूँ, ऐसा कि उन्हीं परीक्षाओं में पड़कर फिर उन्हीं पापों में न गिरूँ? तो मैंने कहा है—क्या आपने कभी यीशु की ओर देखकर परखा है?
परन्तु क्या आपने यह आशा रखी है कि यीशु की ओर देखने के द्वारा आप सचमुच पाप से बचाए जाएँगे, और विश्वास, प्रेम और पवित्रता से भर जाएँगे? नहीं; मैंने यह आशा नहीं रखी थी।
अब मान लीजिए कि किसी मनुष्य ने केवल प्रयोग करके देखने के लिए पीतल के साँप की ओर देखा।
देखने से चंगे होने के विषय में परमेश्वर जो कहता है उस पर उसे कोई विश्वास नहीं, परन्तु वह इसे आज़माने की ओर झुका हुआ है।
वह थोड़ा-सा देखेगा और अपनी भावनाओं पर ध्यान रखेगा कि इसका उस पर क्या प्रभाव पड़ता है। वह परमेश्वर के वचन पर विश्वास नहीं करता, फिर भी क्योंकि वह पक्का नहीं जानता कि कहीं यह सच न हो, इसलिए वह मानो कृपा करके इसे आज़मा लेगा। हमारे इस पद के अर्थ में यह देखना बिलकुल देखना नहीं है। इससे डसा हुआ
इस्राएली चंगा न होता; यह बेचारे पापी को चंगा नहीं कर सकता। इसमें कोई विश्वास नहीं है।
पापियों को उद्धार पाने की इच्छा और उद्देश्य, दोनों के साथ मसीह की ओर देखना चाहिए। उद्धार ही वह लक्ष्य है जिसके लिए वे देखते हैं।
मान लीजिए किसी ने पीतल के साँप की ओर देखा, परन्तु चंगा होने की कोई इच्छा या उद्देश्य न रखा। इससे उसका कुछ भला नहीं हो सकता था। वैसे ही पापियों का भी कुछ भला नहीं हो सकता यदि वे मसीह के विषय में उद्धारकर्ता के रूप में, और अपने ही पापों के उद्धारकर्ता के रूप में, न सोचकर किसी और रूप में सोचें।
पापियों को मसीह की ओर सब पापों के उपचार के रूप में देखना चाहिए। कुछ अपवाद रखने की इच्छा करना—कुछ पापों को बचाए रखना, पर दूसरे पापों को छोड़ने के लिए राज़ी होना—हृदय के घोर विद्रोह को प्रकट करता है, और इससे वह सर्वदर्शी कभी धोखा नहीं खा सकता। जो हृदय अपने सामने केवल आंशिक रूप से पाप से छुटकारा खोजने का लक्ष्य रखता है, उसमें ईमानदारी नहीं हो सकती।
पापी तुरन्त मसीह की ओर देख सकते हैं—बिना तनिक भी विलम्ब के। उन्हें तब तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं जब तक वे अपने रोग के कारण लगभग मर न जाएँ। डसे हुए इस्राएली के लिए यह व्यर्थ था कि वह प्रतीक्षा करे और साँप की ओर देखना तब तक टालता रहे जब तक वह अपने आप को मृत्यु के जबड़ों में न पाए। वह कह सकता था—मैं डसा तो साफ़-साफ़ गया हूँ, पर मुझे नहीं दिखता कि अभी सूजन बहुत बढ़ी है; मुझे अपने शरीर में विष फैलता हुआ महसूस नहीं होता; मैं अभी नहीं देख सकता, क्योंकि मेरी दशा अभी पर्याप्त निराशाजनक नहीं हुई; अपनी वर्तमान दशा में मैं प्रभु की दया को जगाने की आशा नहीं कर सकता, और इसलिए
मुझे प्रतीक्षा करनी होगी। मैं कहता हूँ, उस समय ऐसे विलम्ब की न कोई आवश्यकता थी और न कोई लाभ। और न आज पापी की दशा में इसकी कोई अधिक आवश्यकता या लाभ है।
हमें प्रतिज्ञा की हुई आशीषों के लिए मसीह की ओर देखना है—कामों के द्वारा नहीं, परन्तु विश्वास के द्वारा। यह देखना विचित्र है कि इस बात पर कितनी भूलें की जाती हैं। बहुत से लोग यही मानते हैं कि छुटकारे की आशा करने से पहले बड़ी मानसिक वेदना, लम्बे उपवास, बहुत से कड़वे आँसू और दया के लिए ऊँची पुकार अवश्य होनी चाहिए। वे यह सोचते ही नहीं कि शोक और व्याकुलता के ये सब प्रदर्शन तनिक भी काम के नहीं हैं, क्योंकि ये न तो सरल विश्वास हैं, न विश्वास का कोई अंश, और न सचमुच विश्वास की ओर कोई सहायता; और न उद्धारकर्ता की सहानुभूति को जगाने के लिए किसी भी प्रकार इनकी आवश्यकता है। यह सब ऐसा ही है मानो जंगल में साँपों की महामारी के समय लोग नीम-हकीमी दवाइयाँ गढ़ने में अपनी बुद्धि लगा देते; लेप और मलहम तैयार करते, और शरीर पर रक्त निकालने, जुलाब देने और लहू शुद्ध करनेवाली दवाओं का प्रयोग करते रहते। यह सारा उपचार कुछ काम न आता; केवल एक ही प्रभावशाली इलाज था, और यदि कोई मनुष्य डसा गया हो और यह जानता हो, तो बस यही उसकी चंगाई के लिए आज्ञा के अनुसार देखने की एकमात्र आवश्यक पूर्व-तैयारी होती।
पापी की दशा में भी ऐसा ही है। यदि वह पापी है और यह जानता है, तो यही यीशु के पास आने के लिए उसकी तैयारी और योग्यता है। उसका नीम-हकीमी नुस्खे तैयार करने में लगना, और परमेश्वर के ठहराए हुए उस महान उपचार के साथ अपने गढ़े हुए उपचार मिलाना, सब व्यर्थ है। फिर भी धार्मिक प्रयत्नों में ठीक इसी बात की ओर निरन्तर प्रवृत्ति रहती है—आत्मिक नीम-हकीमी उपचारों की एक अनगिनत भीड़ और विविधता गढ़ने और उन पर भरोसा रखने की ओर। उस पापी को देखिए। वह कितना परिश्रम करता है और कितनी वेदना सहता है! वह अपना उद्धार स्वयं अपने ढंग से, अपनी ही प्रतिष्ठा के लिए, अपने ही कामों के द्वारा पूरा करने के लिए आकाश और पृथ्वी एक कर देगा।
देखिए, वह अपनी ही अनगिनत युक्तियों में कैसे अपने आप को थका डालता है! सामान्यतः सरल विश्वास तक पहुँचने से पहले वह अपने आप को निराशा के गहरे दलदल में पाता है। हाय, वह पुकारता है, मेरे लिए कोई आशा नहीं हो सकती! ओह! मेरा प्राण खो गया!
परन्तु अन्त में घने अन्धकार को चीरकर एक विचार की किरण चमकती है, “हो सकता है यीशु मेरी सहायता कर सके! यदि वह कर सके, तो मैं जीवित रहूँगा, परन्तु और किसी प्रकार नहीं, क्योंकि निश्चय ही उसे छोड़ मेरे लिए और कहीं सहायता नहीं।” वह अपनी निराशा में वहाँ पड़ा है—प्राण की थकान से झुका हुआ, और दूसरे उपायों से अपनी सहायता करने के व्यर्थ प्रयत्नों से चूर-चूर। अब उसे ऊपर से आनेवाली सहायता का ध्यान आता है। “मैं और कुछ नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि अपनी सारी निराशा के साथ अपने आप को पूरी तरह यीशु मसीह पर डाल दूँ। क्या
वह मुझे ग्रहण करेगा? शायद करेगा; और मेरे लिए इतना जानना ही बहुत है।” वह थोड़ा और आगे सोचता है, “शायद, हाँ, शायद वह करेगा; नहीं, इससे भी बढ़कर, मुझे लगता है वह करेगा, क्योंकि लोग मुझे बताते हैं कि उसने दूसरे पापियों के लिए ऐसा किया है। मुझे लगता है वह करेगा—हाँ, मैं जानता हूँ वह करेगा—और यह रहा मेरा दोषी हृदय!
मैं उस पर भरोसा रखूँगा—हाँ, चाहे वह मुझे घात करे, तौभी मैं उस पर भरोसा रखूँगा।”
क्या आप में से किसी ने कभी कुछ ऐसा अनुभव किया है?
“शायद वह मेरी विनती स्वीकार करे,
शायद मेरी प्रार्थना सुन ले।”
पहले-पहल पापी यहीं तक आगे बढ़ने का साहस कर सकता है। परन्तु शीघ्र ही आप उसे पुकारते सुनते हैं—वह कहता है कि वह करेगा; मुझे उस पर विश्वास करना ही होगा! तब विश्वास पकड़ लेता है और प्रतिज्ञा की हुई विश्वासयोग्यता पर टिक जाता है, और इससे पहले कि उसे पता चले, उसका “प्राण अम्मीनादाब के रथों के समान” हो जाता है, और वह अपने हृदय को ऐसी शान्ति और आनन्द से भरा पाता है मानो वह स्वर्ग की सीमा पर खड़ा हो।
1. जब यूहन्ना 12 में कहा गया है, “यदि मैं ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा, तो सब को अपने पास खींचूँगा,” तो भाषा का रूप अवश्य सार्वभौमिक है, परन्तु इसका अर्थ पूर्ण रूप से सार्वभौमिक नहीं लगाया जा सकता, नहीं तो यह बाइबल की सच्चाई और ज्ञात तथ्यों के विरोध में आ जाएगा। यह वास्तव में बड़ी भीड़ को सूचित करने के लिए बोलचाल का एक सामान्य ढंग ही है। मैं बहुत बड़ी संख्या को खींचूँगा—एक विशाल “भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता।” यहाँ न तो प्रसंग में और न विषय में ऐसी कोई बात है जो पूर्ण रूप से सार्वभौमिक व्याख्या की माँग करे।
2. पीतल के साँप का यह उपाय निस्सन्देह इस्राएलियों के विश्वास को परखने के लिए ठहराया गया था। परमेश्वर प्रायः उनके विश्वास को परखता था, और प्रायः अपने विधानों को उनके विश्वास को शिक्षित करने के अनुकूल बनाता था—उसे बाहर लाने और विकसित करने के लिए। उसने उन्हें परखने के लिए बहुत से काम किए। वैसा ही अब भी है।
उन्होंने पाप किया था। तेज विषवाले साँप उनके बीच आ गए और चारों ओर बहुत से लोग विष से पीड़ित होकर मर रहे थे। परमेश्वर ने कहा, पीतल का एक साँप बनाकर खम्भे पर रख, और उसे सब लोगों की आँखों के सामने ऊँचा उठा। अब पीड़ित लोग इस साँप की ओर देखें और वे जीवित रहेंगे। इसने उनके विश्वास को परखा।
3. यह सोचा जा सकता है कि बहुत से लोग केवल अविश्वास के कारण नाश हुए, यद्यपि उनके उद्धार का प्रबन्ध अत्यन्त भरपूर था। हम, और पीतल के साँप की ओर देखें—वे तिरस्कार से कह सकते थे—मानो इस भीड़ में ढोंग और धोखे पहले ही कुछ कम थे, कि मूसा हमें एक और दे! शायद कुछ लोग इस विषय पर दार्शनिक तर्क करने बैठ गए। हम तो, वे कहते हैं, इन “बूढ़ियों की सी कहानियों” की अपेक्षा अपने परखे हुए वैद्यों पर कहीं जल्दी भरोसा करेंगे। पीतल के एक टुकड़े की ओर देखने और साँप के डसने से चंगे होने के बीच कोई भी मनुष्य कौन-सा दार्शनिक सम्बन्ध देख सकता है?
इसी प्रकार आज बहुत से लोग सुसमाचार का उपहास करते हैं। वे अचम्भा करते हैं कि सुसमाचार के विश्वास से कोई चंगा करनेवाली सामर्थ कैसे आ सकती है। यह सच है कि वे कुछ लोगों को कहते सुनते हैं कि वे चंगे हो गए हैं, और कि वे जानते हैं कि चंगा करनेवाली सामर्थ उनके प्राण की गहराई तक पहुँची है, और वे पुकारते हैं, “मैंने यीशु की ओर देखा और मैं चंगा हो गया, और उसी घड़ी से पूरी तरह स्वस्थ हो गया।” परन्तु वे यह सब केवल धर्मोन्माद का भ्रम समझते हैं। उन्हें इसमें अपना कोई दर्शनशास्त्र दिखाई नहीं देता।
परन्तु क्या यह धर्मोन्माद है? क्या यह इससे कुछ अधिक विचित्र है कि विषैले साँपों का डसा हुआ मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा पर पीतल के साँप की ओर देखने से चंगा हो जाए?
4. बहुत से लोग सुसमाचार की सरलता से ठोकर खाते हैं। वे कुछ अधिक समझ में आने योग्य बात चाहते हैं! वे उसके आर-पार देखना चाहते हैं। जिसे वे समझा नहीं सकते, उस पर वे भरोसा नहीं करेंगे। इसी आधार पर बहुत से लोग मसीह में विश्वास के द्वारा पवित्रीकरण के सिद्धान्त पर ठोकर खाते हैं। यह इतना सरल है कि उनका दर्शनशास्त्र इसके आर-पार नहीं देख पाता।
फिर भी हमारे पद में दी गई समानता पूर्ण है। मनुष्यों को यीशु की ओर देखना है ताकि वे नाश न हों, परन्तु अनन्त जीवन पाएँ। और कौन नहीं जानता कि अनन्त जीवन में सम्पूर्ण पवित्रीकरण सम्मिलित है?
5. शारीरिक (स्वाभाविक) मनुष्य सदा उद्धार का कोई ऐसा मार्ग खोजता है जिससे पूरा श्रेय उसी को मिले। वह अपनी किसी न किसी प्रकार की स्वधार्मिकता गढ़ना चाहता है और केवल मसीह पर भरोसा रखने के विषय में कुछ नहीं जानता। यह उसे न स्वाभाविक लगता है और न दार्शनिक।
6. दूर-दूर की बहुत सी कलीसियाओं में एक अद्भुत और अत्यन्त चिन्ताजनक दशा है: उनके अनुभव में मसीह लगभग है ही नहीं। यह बिलकुल प्रकट है कि उनके हृदयों में उसका स्थान अत्यन्त छोटा है। यह जानना तो दूर रहा कि उद्धार ऐसी वस्तु है जो केवल मसीह पर विश्वास करने से प्राप्त होती है, वे आपको केवल इस प्रकार का अनुभव सुना सकते हैं। आप मसीही कैसे बने? मैंने बस प्रभु की सेवा करने का मन बना लिया। क्या बस इतना ही? बस इतना ही। क्या आप जानते हैं कि केवल यीशु की ओर देखने के द्वारा अनन्त जीवन पाना क्या है? कह नहीं सकता कि मैं यह समझता हूँ। तो आप मसीही नहीं हैं। मसीहियत आरम्भ से अन्त तक सरल विश्वास के द्वारा मसीह से प्राप्त की जाती है। इसी प्रकार, और केवल इसी प्रकार, पाप की क्षमा प्राण तक पहुँचती है, और केवल इसी प्रकार परमेश्वर की वह शान्ति आ सकती है जो सारी समझ से परे है, और जो विश्वास और प्रेम के साथ प्राण में बसती है। इसी प्रकार मसीह में विश्वास के द्वारा पवित्रीकरण आता है।
तो फिर उस धर्म के विषय में हम क्या सोचें जो मसीह को दृष्टि से बाहर छोड़ देता है?
बहुत से लोग किसी अद्भुत चिह्न या निशानी की बाट जोह रहे हैं, यह न समझते हुए कि विश्वास ही के द्वारा वे पूरी तरह मसीह के साथ सहानुभूति में और उसके अपने जीवन की सहभागिता में लाए जाते हैं। विश्वास के द्वारा मसीह उन्हें अपने साथ जोड़ लेता है। प्रेम के द्वारा प्रभाव करनेवाला विश्वास उन्हें उसके अपने नैतिक अस्तित्व के साथ जीवित एकता में खींच लाता है। यह सब इस प्रकार होता है कि मन केवल विश्वास से मसीह की ओर देखता है।
जब साँप ऊँचे पर रखा गया, तो निस्सन्देह बहुत से लोग इसलिए नाश हुए कि वे उपचार की इतनी सरल योजना को स्वीकार करके उसके अनुसार चलना नहीं चाहते थे। बहुत से लोग इसलिए नाश हुए कि उन्होंने अपने खतरे को नहीं समझा और समझना भी नहीं चाहा। यदि वे लोगों को चंगा होते देखते, तो कहते—हम नहीं मानते कि यह खम्भे पर के पीतल के साँप से हुआ। उन लोगों को अधिक विष नहीं चढ़ा था—वे वैसे भी न मरते। वे मान लेते हैं कि जो लोग अपनी चंगाई का श्रेय परमेश्वर की सामर्थ को देते हैं, वे भूल में हैं।
बहुत से लोग विलम्ब के कारण भी नाश हुए। वे यह देखने के लिए प्रतीक्षा करते रहे कि उन्हें मरने का खतरा है या नहीं।
और वे फिर भी प्रतीक्षा करते रहे—यहाँ तक कि वे ऐसे चकरा गए और बौरा गए कि केवल लेटकर मर ही सकते थे।
सुसमाचार के विषय में आज भी ऐसा ही है। कुछ लोग इस समय दूसरी अधिक महत्वपूर्ण बातों में व्यस्त हैं, और इसलिए स्वाभाविक है कि उन्हें विलम्ब करना ही पड़ेगा। बहुत से लोग दूसरों की रायों से प्रभावित होते हैं। वे बहुत सी कहानियाँ सुनते हैं। अमुक मनुष्य ने देखा, फिर भी उसकी जान चली गई। दूसरे ने नहीं देखा, फिर भी बच गया। इसी प्रकार लोगों की अपने उन पड़ोसियों के विषय में अलग-अलग रायें होती हैं जो मसीही होने का अंगीकार करते हैं, और इससे बहुत से लोग ठोकर खाते हैं। वे सुनते हैं कि कुछ लोगों ने धर्म के लिए बड़े जोश से आरम्भ किया, पर वे विफल होते दिखाई देते हैं।
उन्होंने, जैसा वे समझते थे, देखा तो, पर सब व्यर्थ रहा। शायद ऐसा ही हुआ हो; क्योंकि हो सकता है उन्होंने सच्चे विश्वास के बिना देखा हो। कुछ लोग तब तक दार्शनिक तर्क करते रहेंगे जब तक अपने आप को यह विश्वास न दिला लें कि देखना सब भ्रम है। उन्हें लगता है कि वे बहुतों को देखने का ढोंग करते और देखते हुए दिखाई देते पाते हैं, जिन्हें फिर भी कोई चंगाई नहीं मिलती। जहाँ इतनी ठोकरें हों, वहाँ कौन विश्वास कर सकता है?
हम मान सकते हैं कि इन निराश करनेवाली बातों ने जंगल में कुछ लोगों को निराशा में धकेल दिया; और निश्चय ही हम देखते हैं कि यहाँ पापियों की दशा में भी वही कारण वही परिणाम उत्पन्न करते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि उन्होंने अक्षम्य पाप कर लिया है। वे अपने आप को उन लोगों में गिनते हैं “जिन्होंने एक बार ज्योति पाई है,” और जिनके लिये “पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं, हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है।” कुछ लोगों को निश्चय है कि अब उनके लिए बहुत देर हो चुकी है। उनका हृदय चक्की के निचले पाट के समान कठोर है। सब कुछ कब्र के समान अन्धकारमय और उजाड़ है। उसे देखिए; उसका चेहरा ही खोए हुए प्राण जैसा है! आह, आप में से कुछ शायद ठीक इसी प्रकार तर्क कर रहे हैं और अविश्वास कर रहे हैं!
बहुतों ने इसलिए उपेक्षा की कि उन्हें लगा वे अच्छे हो रहे हैं। उन्होंने अपनी समझ के अनुसार लक्षणों में कुछ परिवर्तन देखा। पापियों के साथ भी ऐसा ही है; सभा में जाने से वे अपने आप को अच्छा अनुभव करते हैं, और वास्तव में इतना सुधार दिखाई देता है कि वे मान लेते हैं कि निस्सन्देह उनकी दशा अच्छी चल रही है।
हो सकता है कि बहुत से प्राचीन इब्रानियों ने इसलिए देखने से इन्कार किया कि उनके पास कोई अच्छी आशा नहीं थी; क्योंकि वास्तव में वे सन्देहों से भरे थे। यदि आप वहाँ होते, तो आप बहुत प्रकार के परस्पर विरोधी विचार पाते—प्रायः भाइयों और बहनों, पिताओं और माताओं, माता-पिता और बच्चों के बीच भी। कुछ ठट्ठा करते हैं; कुछ क्रोध में हैं; कुछ किसी भी प्रकार विश्वास नहीं करेंगे।
और क्या मुझे यह कहना ही पड़ेगा—कुछ पापी, जिन्हें मसीह को खोजना चाहिए, ऐसे कारणों से रुक जाते हैं जो इन्हीं के समान ओछे और मूर्खतापूर्ण हैं।
पीतल के साँप की ओर और उद्धारकर्ता मसीह की ओर देखने की रीति में, और न देखने के कारणों में जो समानता है, उसे हम सब सहज ही देख सकते हैं। मुझे इस समानता को उसके छोटे-छोटे विवरणों तक और आगे ले जाने की आवश्यकता नहीं। परन्तु अब आप सब के लिए प्रश्न यह है: क्या आप सचमुच विश्वास करते हैं कि जैसे “मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी ऊँचे पर चढ़ाया गया है, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।” क्या आप विश्वास के सरल उपचार को समझते हैं? शायद आप पूछें—उन्हें किस बात पर विश्वास करना था? इस बात पर, कि यदि वे सचमुच खम्भे पर के पीतल के साँप की ओर देखेंगे, तो उन्हें निश्चय ही आवश्यक चंगाई का अनुभव होगा। वह परमेश्वर का प्रमाणित उपचार था, और उन्हें उसे ऐसा ही मानना था। और अब आपको किस बात पर विश्वास करना है? इस बात पर, कि मसीह जंगल में ऊँचे पर चढ़ाए गए उस साँप का महान मूल-स्वरूप है (जिसका वह साँप प्रतिरूप था), और कि आपको सरल विश्वास के द्वारा उससे पूर्ण और सेंत-मेंत के उद्धार की सब आशीषें पानी हैं। सरल विश्वास के द्वारा, मैं कहता हूँ; और क्या आप यह समझते हैं? क्या मैं आपको इन बातों के उत्तर में यह कहते सुनता हूँ—क्या, मैं, एक पापी, बस सरल विश्वास से अपनी दृष्टि यीशु पर टिका सकता हूँ? कौन—कौन ऐसा कर सकता है? क्या मैं? यह कैसे हो सकता है कि मुझे यह सौभाग्य मिले?
आज मैं यहाँ कुछ ऐसे चेहरे देख रहा हूँ जिन्हें मैंने पिछली पतझड़ में पूछताछ-सभाओं में देखा था। आप क्या करते रहे हैं? क्या आप अपने आप को किसी निश्चित मानसिक दशा में ढालने का प्रयत्न करते रहे हैं? क्या आप तीव्र इच्छा कर रहे हैं कि काश आप ऐसा-ऐसा अनुभव कर पाते—अपने मन में बसे किसी आदर्श के अनुसार? क्या आप समझते हैं कि आपको सचमुच विश्वास से देखना है, और विश्वास की यह दृष्टि आपके लिए वैसी ही हो जैसा लहू बहने के रोगवाली उस बेचारी स्त्री का छूना उसकी मरती हुई देह के लिए था—यह विश्वास करते हुए कि यदि आप सरल भरोसे के साथ देखेंगे तो वह निश्चय ही आपको ग्रहण करेगा, और आपको अपना ईश्वरीय प्रेम और शान्ति और जीवन और ज्योति देगा, और सचमुच उन्हें आपके सम्पूर्ण नैतिक अस्तित्व में स्पन्दित कर देगा? क्या आप इस पर विश्वास करते हैं? नहीं, क्या आप नहीं देखते कि आप इस पर विश्वास नहीं करते? ओह, परन्तु आप कहते हैं, “यह तो बड़ा भेद है!” मैं इसे समझाने नहीं जा रहा, और न मैं यह मान बैठूँगा कि मैं ऐसा कर सकता हूँ, ठीक वैसे ही जैसे मैं यह नहीं समझा सकता कि वह स्त्री उद्धारकर्ता के वस्त्र का आँचल छूने से कैसे चंगी हो गई। उस घटना में छूना और इस घटना में देखना, केवल साधन हैं, वे माध्यम हैं जिनके द्वारा सामर्थ प्राप्त की जानी है। परमेश्वर किस रीति से कार्य करता है, यह हमारे लिए छोटे महत्व की बात है; हम इसी से सन्तुष्ट रहें कि हम जानते हैं कि जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातों में उसके ईश्वरीय आत्मा के कार्य को पाने के लिए हमें क्या करना चाहिए।
निस्सन्देह उद्धार के मार्ग के विषय में आपकी धारणाएँ उलझी हुई रही हैं; शायद आप युक्तियाँ गढ़ते, अटकलें लगाते, और अपनी भावनाओं पर काम करते रहे हैं। अब आप प्रार्थना करते हैं, और प्रार्थना करके कहते हैं, अब मुझे ध्यान से देखने दो कि इस प्रार्थना से मुझे उद्धार मिला या नहीं! यह मार्ग बहुत कुछ ऐसा है मानो इब्रानी लोग, साँपों से डसे जाने और पीतल के साँप की ओर देखने की आज्ञा पाने पर, यहाँ लेप, वहाँ फफोला डालनेवाली दवा, और फिर सलाई लगाने में लग जाते, और इस पूरे समय उस एक ही बात को आँखों से ओझल करते जिसके विषय में परमेश्वर ने उनसे कहा था कि वह अचूक रूप से चंगा करेगी। ओह! मनुष्य क्यों भूल जाएँ, और क्यों न समझें कि हमें जिस-जिस भलाई की आवश्यकता है, वह सब परमेश्वर की ओर से सरल विश्वास को मिलती है? जब भी हमें कोई घटी दिखाई दे, तो वहाँ मसीह है, जिसे केवल विश्वास से ग्रहण करना है; और उसकी प्रतिज्ञाएँ किसी भी घटी को बिना प्रबन्ध के नहीं छोड़तीं।
अब यदि उद्धार का मार्ग यही है, तो कितने आश्चर्य की बात है कि पापी मसीह को छोड़ हर दूसरी ओर देखें, और अपने उद्धारकर्ता की ओर तुरन्त सरल विश्वास से देखने के प्रयत्न को छोड़ और हर प्रकार का प्रयत्न करें! कितनी बार हम उन्हें निराश और व्याकुल देखते हैं, जो इतना कठिन परिश्रम करते हैं और पूरी तरह व्यर्थ! कोई आश्चर्य नहीं कि वे इतने अधिक भटका दिए जाते हैं। कलीसियाओं में घूमकर पूछिए। क्या आपने कभी यह आशा रखी कि आप इसी संसार में पाप से बचाए जाएँगे?
नहीं; परन्तु आप मृत्यु के समय बचाए जाने की आशा रखते हैं। चूँकि आपके जीवन भर आपके प्राण को पवित्र करने के उसके प्रयत्न काफ़ी असफल रहे हैं, इसलिए आप सोचते हैं कि वह ठीक समय पर मृत्यु भेज देगा ताकि वह काम पूरा हो जाए!
क्या आप इस पर विश्वास कर सकते हैं?
जब तक मसीही लोग मसीह में विश्वास के द्वारा वर्तमान पवित्रीकरण के इस महिमामय सिद्धान्त को—कि वह अभी मिलता है, और हर एक के विश्वास के अनुसार उसके लिए किया जाता है—अस्वीकार करते हैं, तब तक यह आशा नहीं की जा सकती कि वे पापियों को स्पष्टता से समझने योग्य रीति से सिखाएँगे कि क्षमा के लिए सरल विश्वास से मसीह की ओर कैसे देखें। जब उन्हें अपने अनुभव में विश्वास की सामर्थ का इतना कम ज्ञान है, तो वे दूसरों को प्रभावशाली ढंग से, या सच्चाई से भी, कैसे सिखा सकते हैं? इस प्रकार जब अन्धा अन्धे को मार्ग दिखाता है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि दोनों वहीं एक साथ पाए जाते हैं जहाँ बाइबल की कहावत अगुवों और उनके पीछे चलनेवालों, दोनों के आपसी सम्बन्ध का अन्त होते दिखाती है। ऐसे अन्त का कोई उपाय नहीं दिखता, सिवाय इसके कि मसीही होने का अंगीकार करनेवाले जगत की ज्योति बनें; और इस उद्देश्य से, सरल विश्वास का अर्थ सीखें और उसका अनुभव जानें। एक बार विश्वास सीख लेने पर वे उसकी रूपान्तरित करनेवाली सामर्थ का अनुभव करेंगे, और दूसरों को जीवन का मार्ग सिखाने योग्य होंगे।
