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11. पापी की स्वाभाविक सामर्थ और नैतिक दुर्बलता।
11. पापी की स्वाभाविक सामर्थ और नैतिक दुर्बलता।
“जो व्यक्ति जिस से हार गया है, वह उसका दास बन जाता है।”—2 पतरस 2:19
अपने इस वर्तमान उपदेश में मैं पापी की नैतिक दशा पर विचार करना चाहता हूँ।
I. सभी मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्र हैं — ध्यान देने योग्य पहला महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि सभी मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्र हैं, और पापी होने के कारण उनकी यह स्वतंत्रता तनिक भी कम नहीं हो जाती। उन्हें स्वभाव से इच्छा की स्वतंत्रता प्राप्त है।
स्वाभाविक स्वतंत्रता से मेरा अर्थ यह नहीं है कि उन्हें जो चाहें वह करने का अधिकार है; क्योंकि यह किसी भी प्रकार सच नहीं हो सकता। न ही मेरा अर्थ यह है कि वे केवल इस अर्थ में स्वतंत्र कर्ता हैं कि जो करना वे चाहते हैं उसे कर सकते हैं। वास्तव में, मनुष्य कभी तो अपनी इच्छा के संकल्पों को पूरा कर पाते हैं और कभी नहीं कर पाते; परन्तु चाहे जो हो, नैतिक स्वतंत्रता अपने संकल्पों को पूरा करने की सामर्थ में निहित नहीं है। आप जानते हैं कि कुछ पुराने दार्शनिकों ने इच्छा की स्वतंत्रता की परिभाषा यह दी थी कि जो आप करना चाहें उसे कर सकने की सामर्थ ही स्वतंत्रता है। अनेक कारणों से यह इच्छा की स्वतंत्रता का सच्चा विचार नहीं हो सकता। क्योंकि कर्म के उस क्षेत्र को देखिए जो मांसपेशियों की क्रिया में आता है। सीधा-सा तथ्य यह है कि हमारी कुछ मांसपेशियाँ इच्छा के वश में बिलकुल नहीं हैं, जबकि अन्य मांसपेशियाँ अत्यन्त कठोर अनिवार्यता के नियम के द्वारा उसके वश में हैं। इस दूसरे वर्ग के विषय में, जो भी स्वतंत्रता है वह इच्छा की है—उसमें से कुछ भी इच्छा द्वारा नियंत्रित मांसपेशियों की क्रिया की नहीं है। तो फिर जहाँ स्वतंत्रता वास्तव में है वहाँ उसके होने का इन्कार करना, और जहाँ वह नहीं है वहाँ उसे ठहराना, निरी भूल है। यदि विश्व में अनिवार्यता नाम की कोई वस्तु है, तो वह उस पूर्ण नियंत्रण में पाई जाती है जो इच्छा उन शारीरिक मांसपेशियों पर रखती है जो उसके वश में रखी गई हैं। मांसपेशियों का आज्ञापालन पूर्ण है—किसी भी अर्थ में स्वतंत्र या स्वेच्छिक नहीं। इसलिए मानवीय स्वतंत्रता को वहाँ ठहराना बेतुकी बात है।
यह स्वतंत्रता स्वयं इच्छा में है, और उसकी स्वतंत्र चुनाव की सामर्थ में निहित है। करना या न करना—यही उसका विकल्प है। अपने ही स्वभाव से उसमें अपने संकल्पों को स्वयं निर्धारित करने की क्षमता है।
प्राण करने या न करने का संकल्प करता है, और इस प्रकार वह अपनी गतिविधियों पर नैतिक रूप से प्रभुता रखनेवाला स्वामी है। इसी तथ्य में नैतिक कर्ता होने की नींव है। ऐसा प्राणी जिसकी बनावट ऐसी है कि वह करने या न करने का संकल्प कर सकता है, और जिसे इसके अतिरिक्त अपने नैतिक दायित्वों का ज्ञान और बोध भी है, वह नैतिक कर्ता है। दूसरा कोई नैतिक कर्ता नहीं हो सकता।
यहाँ यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि हर मनुष्य जानता है कि उसके पास एक विवेक है जो उसे बताता है कि उसे कैसा आचरण करना चाहिए, और साथ ही एक नैतिक सामर्थ भी है जिसका प्रयोग करके वह विवेक की चेतावनियों पर या तो ध्यान दे सकता है या उन्हें ठुकरा सकता है।
मनुष्य अपनी गतिविधियों को स्वयं निर्धारित करने के अर्थ में स्वतंत्र है, यह हर मनुष्य की अपनी चेतना से सिद्ध होता है। इस प्रमाण के लिए तर्कों की किसी शृंखला की आवश्यकता नहीं है। बिना किसी तर्क के ही यह उतना दृढ़ है जितना होना चाहिए। मनुष्य को अपने कार्यों का आरम्भ स्वयं करने का उतना ही और उतनी ही अच्छी तरह से बोध है जितना उसे कुछ भी करने का बोध है। क्या वह सचमुच स्वयं कार्य करता है? हाँ। और क्या वह जानता है कि वह स्वयं कार्य करता है? हाँ। वह इन बातों को कैसे जानता है? चेतना के द्वारा। परन्तु स्वतंत्र होने का भी उसके पास वही प्रमाण है—क्योंकि यह भी उसकी अपनी चेतना से उतना ही सिद्ध होता है।
इससे भी आगे: मनुष्य उन कार्यों में, जिनमें वह स्वतंत्र है, और उन कार्यों में, जिनमें उस पर उसके अपने चुनाव से स्वतंत्र प्रभाव काम करते हैं, भेद कर सकता है। वह जानता है कि कुछ बातों में वह उन प्रभावों और क्रियाओं को ग्रहण करनेवाला है जो उस पर डाली जाती हैं, जबकि अन्य
बातों में वह उस अर्थ में ग्रहण करनेवाला नहीं, बल्कि स्वेच्छा से कार्य करनेवाला कर्ता है। यह भेद कर पाने का तथ्य ही सिद्ध करता है कि उसके पास स्वतंत्र कर्ता होने का गुण है।
जिस अन्तर की ओर मैं अभी संकेत कर रहा हूँ, वह प्रतिदिन की चेतना की बात है। कभी-कभी मनुष्य नहीं बता सकता कि उसके विचार कहाँ से आते हैं। उसके मन पर ऐसी छापें पड़ती हैं जिनके उद्गम का वह पता नहीं लगा सकता। वे ऊपर से हो सकती हैं—वे नीचे से हो सकती हैं: वह उनके स्रोत के विषय में बहुत कम जानता है, और उनके विषय में भी बहुत कम, सिवाय इसके कि वे उसके अपने स्वतंत्र संकल्प नहीं हैं। परन्तु अपनी इच्छा के कार्यों के विषय में ऐसी कोई अनिश्चितता नहीं हो सकती। वह उनका उद्गम जानता है। वह जानता है कि वे उसके भीतर की एक मूल सामर्थ का फल हैं, जिसके प्रयोग के लिए उसे विवश होकर मुख्य रूप से स्वयं को ही उत्तरदायी मानना पड़ता है।
उसके पास केवल यह प्रत्यक्ष चेतना ही नहीं है, बल्कि, जैसा पहले संकेत किया जा चुका है, उसके अपने विवेक की गवाही भी है। यह शक्ति अपने स्वभाव ही से उसके नैतिक कार्यों पर ध्यान देती है, इच्छा के कुछ कार्यों की माँग करती है और कुछ का निषेध करती है। यह शक्ति स्वतंत्र नैतिक कर्ता होने की एक अनिवार्य शर्त है। इसके, और मनुष्य की अन्य मानसिक शक्तियों के होते हुए, उसका स्वतंत्र होना और नैतिक दायित्व के अधीन होना अवश्य है।
यह कल्पना से परे है कि मनुष्य स्वतंत्र नैतिक कार्य की सामर्थ के बिना नैतिक व्यवस्था और शासन के अधीन हो। मनुष्य में विवेक के अस्तित्व की तर्कसंगत शर्त यही है कि वह स्वतंत्र हो।
मनुष्य स्वतंत्र है, यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि उसे अपने प्रशंसा-योग्य या दोष-योग्य होने का बोध होता है।
यदि यह एक मूल सत्य न होता कि वह स्वतंत्र है, तो वह उचित रीति से स्वयं को दोषी नहीं ठहरा सकता था। मूल सत्य से मेरा अर्थ ऐसे सत्य से है जिसे सब लोग अपने ही स्वभाव की अनिवार्यता से जानते हैं। ऐसे सत्य होते हैं—ऐसे सत्य जिन्हें जानने से कोई बच नहीं सकता, चाहे वे उनकी कितनी भी उपेक्षा करना चाहें। अब, यदि यह एक मूल सत्य न होता, जिसे सब अनिवार्य रूप से जानते हैं, कि मनुष्य स्वतंत्र है, तो वह न अपनी प्रशंसा कर सकता था और न स्वयं को दोषी ठहरा सकता था।
जैसे विवेक नैतिक कर्ता होने का संकेत देता है, वैसे ही जहाँ विवेक है वहाँ मनुष्यों के लिए नैतिक उत्तरदायित्व का वास्तव में इन्कार करना असम्भव है। मनुष्य गलत काम करने के लिए स्वयं को दोषी ठहराए बिना रह ही नहीं सकते।
जब उन्हें इस बात का बोध है कि विवेक ने उस गलत काम के विरुद्ध उन्हें पहले से चेतावनी दी थी, तो वे इस निश्चय से कैसे बच सकते हैं कि वह काम गलत था?
फिर, बाइबल सदा मनुष्यों से स्वतंत्र कर्ताओं के समान व्यवहार करती है, और उन्हें कुछ करने या न करने की आज्ञा ऐसे देती है मानो निश्चय ही उनके पास ऐसी आज्ञाओं को मानने के लिए आवश्यक पूरी सामर्थ है। एक बार एक युवा पादरी ने मुझसे कहा, “मैं यह प्रचार करता हूँ कि मनुष्यों को पश्चाताप करना चाहिए, परन्तु यह कभी नहीं कि वे पश्चाताप कर सकते हैं।” मैंने कहा, “आप यह प्रचार भी क्यों नहीं करते कि वे कर सकते हैं?” उसने उत्तर दिया, “बाइबल यह नहीं कहती कि वे कर सकते हैं।” इस पर मैंने उत्तर दिया कि किसी मानवीय विधान-सभा के लिए, कुछ कार्यों की माँग करने के बाद, आगे बढ़कर यह घोषणा करना कि उसकी प्रजा में आज्ञा मानने की सामर्थ है, निरी बचकानी और व्यर्थ बात होगी। स्वयं वह माँग ही इस बात की सबसे प्रबल सम्भव घोषणा है कि विधान बनानेवाली सत्ता के विश्वास में प्रजा माँगी गई बातों को करने में समर्थ है। यदि विधि-निर्माता ऐसा विश्वास न करते, तो वे तर्कसंगत रूप से उसकी माँग कैसे कर सकते थे? अच्छे शासकों के विषय में सबसे पहली बात जो मान ली जाती है वह यह है कि उनमें साधारण समझ और साधारण ईमानदारी है। वास्तव में इस बात का इन्कार करना कि परमेश्वर में ये गुण हैं, परमेश्वर की निन्दा है।
इच्छा की स्वतंत्रता हमारे सबसे आरम्भिक और सबसे अदम्य निश्चयों में से है। सम्भवतः आज जीवित कोई भी व्यक्ति “कर्तव्य” के अपने पहले विचार को—सही और गलत के अपने पहले बोध को—स्मरण नहीं कर सकता। यह हमारे सबसे अटल निश्चयों में से भी है। हम बिलकुल आरम्भ से ही अपनी इच्छा की स्वतंत्रता को मानकर चलते हैं। छोटा बच्चा अपने उद्देश्यों को पूरा करने के अपने पहले शैशव प्रयासों में ही इसकी पुष्टि करता है। उसे अपना भोजन या अपने खिलौने लेने के लिए हाथ बढ़ाते देखिए। स्वतंत्र रूप से कार्य करनेवाले कर्ता का यह छोटा-सा यंत्र, उसके समझ पाने से बहुत पहले ही, चलना आरम्भ कर देता है। वह यह आँक पाने से बहुत पहले कि यह उत्तरदायित्व क्या है या कितना बड़ा है, अपने ही उत्तरदायित्व पर कार्य करना आरम्भ कर देता है। व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का तथ्य हम पर ऐसा जकड़ा हुआ है कि इस निश्चय से बच निकलना उतना ही असम्भव है जितना स्वयं से बच निकलना।
II. मनुष्य नैतिक बन्धन में हैं — यद्यपि यह बात किसी भी तर्कसंगत इन्कार से परे सत्य है कि मनुष्यों में नैतिक स्वतंत्रता का यह गुण है, तो भी यह उतना ही सत्य है कि वे नैतिक रूप से दास बने हुए हैं—नैतिक बन्धन में हैं। स्वतंत्रता उन्हें अपनी सृष्ट बनावट से मिली है; बन्धन उनकी शक्तियों के स्वेच्छिक विकृतिकरण और दुरुपयोग से आता है।
बाइबल मनुष्यों को बन्धन में पड़ा हुआ दिखाती है। ऐसे लोगों के रूप में जिनमें पाप की परीक्षा का सामना करने की सामर्थ तो है, पर जो फिर भी स्वेच्छा से उन परीक्षाओं के आगे झुक जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हमारे मोम जैसे ढुलमुल राजनीतिज्ञ दास-प्रथा की सत्ता की माँगों का विरोध कर तो सकते हैं, पर करते नहीं और करेंगे भी नहीं। परीक्षा के अधीन पापियों का बन्धन ठीक ऐसा ही है। बाइबल शैतान को ऐसा दिखाती है कि वह अपनी इच्छा के अनुसार मनुष्यों के मनों पर शासन करता है, ठीक वैसे ही जैसे दक्षिण की दास-प्रथा की सत्ता चलानेवाले लोग उत्तर के मोम जैसे ढुलमुल नेताओं पर अपनी इच्छा के अनुसार शासन करते हैं, और हमारे राष्ट्रपतियों के चुनाव तथा संघीय सरकार के सम्पूर्ण विधान को निर्देशित करते हैं। इसी प्रकार शैतान ने वाटिका में हव्वा पर शासन किया; इसी प्रकार वह अब भी “आज्ञा न माननेवालों में कार्य करता है।”
बाइबल जो इस प्रकार दिखाती है, अनुभव उसे सत्य सिद्ध करता है। दुष्ट मनुष्य जानते हैं कि वे शैतान के बन्धन में हैं। आपके विचार में जवानों के मन में अधर्म की युक्तियाँ रचने और उसे पानी की नाईं पीने की बात कौन डालता है? क्या वह शैतान नहीं है? हम कितने ही ऐसे जवानों से मिलते हैं जिनमें परीक्षा आने पर विरोध करने के लिए कोई नैतिक दृढ़ता दिखाई नहीं देती, बल्कि वे परीक्षा के पहले ही झोंके में बह जाते हैं।
मनुष्य अपनी भूखों और लालसाओं के बन्धन में हैं। उत्तेजित भूख उन्हें वैसे ही भटका ले जाती है जैसे उसने हव्वा और आदम को भटकाया था। इसका क्या कारण हो सकता है कि कुछ जवानों को तम्बाकू का प्रयोग छोड़ना इतना कठिन लगता है? वे जानते हैं कि यह आदत गंदी और घिनौनी है; वे जानते हैं कि यह अवश्य उनके स्वास्थ्य को हानि पहुँचाएगी; परन्तु भूख लालायित होती है, और शैतान उसकी माँगों को बढ़ावा देता है; बेचारा शिकार अपने को छुड़ाने का एक दुर्बल प्रयास करता है, परन्तु शैतान पेंच को फिर से कस देता है और उसे और भी कसकर जकड़ लेता है, और फिर उसे घसीटकर और भी कठोर बन्धन में लौटा ले जाता है।
यही हाल उस मनुष्य का है जो शराब के बन्धन में है, और यही हाल विषय-भोग के हर रूप का है।
शैतान विषय-वासना के प्रभाव को बढ़ावा देता है, और उसे इस बात की अधिक चिन्ता नहीं कि उसका विशेष रूप क्या है, बशर्ते उसकी शक्ति प्राण का नाश करने के लिए पर्याप्त हो। यह सब उसी के हाथ में खेलता है और उसके मुख्य उद्देश्य को आगे बढ़ाता है।
इसी प्रकार मनुष्य धन के लोभ के बन्धन में हैं; संसार के फैशनों के बन्धन में हैं; मनुष्यों की रायों के बन्धन में हैं। इनके द्वारा वे दास बनाए जाते हैं और कर्तव्य की माँगों के विरुद्ध आगे खींचे जाते हैं। हर वह मनुष्य जो वास्तव में अपने कर्तव्य के बोध के विपरीत खींचा जाता है, सचमुच दास है। वह केवल तभी स्वतंत्र है जब वह उस बोध के अनुसार कार्य करता है। स्वतंत्रता का सच्चा विचार यही है। मनुष्य केवल तभी स्वतंत्र है जब बुद्धि और विवेक उसकी इच्छा पर नियंत्रण रखते हैं—क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्यों को बुद्धिमान और नैतिक प्राणी इसलिए बनाया कि वे अपने ही प्रकाशित विवेक और बुद्धि के प्रभाव में स्वाभाविक रीति से कार्य करें। यह वही स्वतंत्रता है जिसका परमेश्वर स्वयं प्रयोग और आनन्द करता है; इससे ऊँची या श्रेष्ठ कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती।
परन्तु जब कोई नैतिक कर्ता अपनी नीच भूखों और वासनाओं के बन्धन में होता है, और उनके द्वारा अपने विवेक और अपनी बुद्धि के आदेशों की उपेक्षा करने के लिए खींचा जाता है, तो वह केवल एक गुलाम-नाविक है जो जहाज़ में चप्पू खेने को बँधा है, और वह भी एक बहुत कठोर और क्रूर स्वामी के अधीन।
परमेश्वर ने मनुष्यों को स्वतंत्र होने के लिए बनाया, और उन्हें ठीक वैसी ही मानसिक शक्तियाँ दीं जिनकी उन्हें अपनी गतिविधियों को उस प्रकार नियंत्रित करने के लिए आवश्यकता है जैसा एक विवेकशील प्राणी को चाहना चाहिए। तो फिर उनका बन्धन पूरी तरह स्वेच्छिक है। वे बुद्धि के नियंत्रण का विरोध करना, और भूख तथा वासना के नियंत्रण के अधीन होना, चुनते हैं।
हर पश्चाताप न करनेवाले मनुष्य को इस बात का बोध है कि वह वास्तव में परीक्षा के बन्धन में है। कौन-सा ऐसा मनुष्य, जो अनुग्रह के द्वारा पाप से बचाया नहीं गया, यह नहीं जानता कि वह स्वयं अपने लिए एक पहेली है? मेरे मन में ऐसे मनुष्य के लिए बहुत कम आदर होगा जो कहे कि उसे अपने ऊपर कभी लज्जा नहीं आई, और उसने स्वयं को कभी ऐसे काम करते नहीं पाया जिनका वह ठीक-ठीक कारण न बता सके। विशेषकर, यदि मैं किसी विद्यार्थी को यह कहते सुनूँ कि उसे कभी अपनी नैतिक दुर्बलता का एहसास नहीं हुआ, तो मुझे लज्जा भी आएगी और भय भी लगेगा। ऐसी अनभिज्ञता केवल यही दिखाएगी कि उसमें आत्म-चिन्तन का पूरा अभाव है, और इसी कारण वह अपने भीतरी जीवन की सबसे स्पष्ट नैतिक घटनाओं पर भी ध्यान नहीं दे पाता। क्या! क्या वह नहीं जानता कि उसकी बुद्धि और विवेक के सबसे प्रबल निश्चयों के विपरीत होने पर भी, उसकी सबसे दुर्बल इच्छाएँ उसकी इच्छा-शक्ति को बहा ले जाती हैं?
यह अत्यन्त दोषपूर्ण दशा है, क्योंकि यह इतनी पूरी तरह स्वेच्छिक है—इतनी अनावश्यक है, और उसकी बुद्धि तथा उसकी समझ के निश्चयों के इतनी विरुद्ध है, और साथ ही परमेश्वर की धर्मी माँगों के विषय में उसके निश्चयों के भी इतनी विरुद्ध है। ऐसे निश्चयों के विपरीत चलने के लिए, उसका परम दोषी होना अवश्य है।
निस्सन्देह ऐसा आचरण अत्यन्त आत्मघाती होगा। पापी अपने ही सर्वोत्तम हितों के अत्यन्त निश्चित विरोध में कार्य करता है, इतना कि यदि उसमें स्वयं का नाश करने की सामर्थ है तो यह मार्ग निश्चय ही उसका नाश कर देगा। जिस मार्ग पर वह चलता है, वह अन्य सब मार्गों से बढ़कर देह और प्राण दोनों का नाश करने के योग्य है; तो फिर वह आत्मघाती के सिवा और क्या हो सकता है? व्यवहार में वह सारे नैतिक दायित्व का इन्कार करता है।
और फिर भी वह अपने नैतिक दायित्व के तथ्य को जानता है, और अपने सबसे स्पष्ट निश्चयों के सामने उसका इन्कार करता है। यह आत्मघाती के सिवा और क्या हो सकता है? मैंने अनेक बार पापियों से पूछा है कि वे अपने आचरण का क्या कारण बता सकते हैं। जो ईमानदार हैं वे उत्तर देते हैं, “मैं बिलकुल नहीं बता सकता; मैं स्वयं अपने लिए एक पहेली हूँ।” वास्तविक व्याख्या यह है कि यद्यपि अपनी सृष्ट बनावट के अनुसार वे स्वतंत्र नैतिक कर्ता हैं, तो भी पाप की मोह-माया के कारण उन्होंने स्वयं को नैतिक बन्धन में बेच दिया है, और वास्तव में शैतान के और अपनी ही अभिलाषाओं के दास हैं।
यह गहरी नैतिक अधोगति की दशा है। अपने आप में यह अत्यन्त लज्जाजनक है। पाप के कुछ रूपों और पापियों के कुछ वर्गों के विषय में हर कोई यह अनुभव करता है। हम सब अनुभव करते हैं कि पियक्कड़पन पशुता है। पियक्कड़ को हम ऐसा मानते हैं जो पशु बनने की ओर बहुत दूर तक जा चुका है। उसे लड़खड़ाते हुए, मानसिक रूप से जड़ बने हुए और अपनी ही गन्दगी में सने हुए देखिए! क्या वह लगभग पशु नहीं है? नहीं, बल्कि क्या हमें इस तुलना के लिए सब पशुओं से क्षमा नहीं माँगनी चाहिए? क्योंकि उनमें से एक भी इतना नीच और इतना घृणित नहीं है—एक भी हमारे हृदय में स्वेच्छा से अपनाई गई अधोगति का ऐसा भाव नहीं जगाता। अपने आप को जड़ बना लेनेवाले पियक्कड़ की तुलना में उनमें से हर एक श्रेष्ठ प्राणी है।
इस प्रकार हम सब केवल अपने मानवीय दृष्टिकोण से देखते हुए कहते हैं। परन्तु एक और, और उससे उत्तम, दृष्टिकोण भी है। स्वर्गदूत इस स्वयं-निर्मित पियक्कड़ को कैसे देखते हैं? वे उसमें एक ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो उनसे थोड़ा ही कम बनाया गया था, और जो उनकी संगति पाने की आकांक्षा कर सकता था; फिर भी उसने स्वयं को सूअरों के स्तर तक गिरा देना चुना! ओह, उनके प्राण
ऐसी स्वयं-निर्मित अधोगति के दृश्य से कैसे सिहर उठते होंगे! बुद्धि के श्रेष्ठ गुण को त्यागा हुआ देखना; और उससे भी श्रेष्ठ नैतिक गुणों को अस्वीकार किया हुआ, और ऐसे पाँवों तले रौंदा हुआ देखना मानो वे केवल एक बोझ हों—यह स्वर्गदूतों के सहने से बाहर है। उन्हें कैसा लगता होगा!
और केवल पियक्कड़ ही नहीं है जिस पर उसकी विषय-भोग सम्बन्धी अधोगति के कारण तिरस्कार आता है। तम्बाकू पीनेवाले को देखिए। समाज की उचित रुचि यह माँग करती है कि सामाजिक नियमों के द्वारा उसे बैठकों, भाप-जहाज़ों के केबिनों, प्रथम श्रेणी के रेल-डिब्बों, गिरजाघरों, और वास्तव में सभी सचमुच शिष्ट स्थानों से बाहर रखा जाए। फिर भी, इस नीच भोग के लिए, धूम्रपान करनेवाला अशिष्ट स्थानों में उतर जाने को तैयार रहता है। उसे देखिए कि वह रेल-डिब्बे में प्रतिष्ठित लोगों के बीच अपना स्थान छोड़कर चुपके से खिसक जाता है, और अपने गन्दे भोग के लिए धूम्रपान-डिब्बे में उपद्रवी लोगों के साथ झुंड बनाकर बैठता है।
यदि उसे पूरे दिन उसी संगति में यात्रा करने को विवश किया जाए जिसमें वह इस भोग के कारण स्वयं को गिरा लेता है, तो शायद इससे उसे अपनी विषय-भोग की कीमत की चेतावनी मिल जाए! शायद इससे उसकी आँखें खुलने में सहायता मिले!
मैंने विषय-भोग के इन रूपों को पाप की वास्तविक अधोगति के उदाहरणों के रूप में लिया है। इन उदाहरणों में मनुष्यजाति की सद्बुद्धि उस पतन की श्रेणी से प्रकट हुई है जिसमें वह नीच आत्म-भोग के इन उपासकों को रखती है। यदि हम बातों को उनके सही प्रकाश में देखते, तो नैतिकतावादी के विषय में भी हमारा यही दृष्टिकोण होता। मुझे स्मरण है कि एक बड़े नैतिकतावादी से बात करते समय उसने कहा, “मैं परमेश्वर के प्रति या सही बात के प्रति आदर के कारण कैसे कार्य कर सकता हूँ? मैं परमेश्वर को प्रसन्न करने के ऊँचे उद्देश्य से आराधना-सभा में कैसे जा सकता हूँ? मैं अपने स्वार्थी उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की इच्छा से तो जा सकता हूँ, परन्तु परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए कैसे जा सकता हूँ?”
हाँ, ठीक यही उसकी कठिनाई और उसका दोष है। उसे इस बात की कोई चिन्ता नहीं कि वह परमेश्वर को कितना कम प्रसन्न करता है! यह उसकी सबसे छोटी चिन्ता है। सबसे निचले दर्जे के उद्देश्य उसकी इच्छा और उसके जीवन को चलाते हैं। वह सबसे ऊँचे और सबसे श्रेष्ठ उद्देश्यों की पहुँच से पूरी तरह दूर खड़ा है। इसी में उसकी स्वयं-निर्मित अधोगति और उसका अत्यन्त बड़ा दोष है।
यही बात कंजूस की है जब वह जमाखोरी के लोभ को छोड़ सब उद्देश्यों से परे चला जाता है; जब उसका व्यावहारिक प्रश्न यह नहीं होता कि, मैं अपनी जाति का सम्मान कैसे बढ़ाऊँ, या अपनी पीढ़ी को आशीष कैसे दूँ, या अपने सृजनहार की महिमा कैसे करूँ; बल्कि यह कि, मैं कुछ पैसे कैसे कमा लूँ? यहाँ तक कि जब उससे प्रार्थना करने का आग्रह किया जाता है, तब भी वह पूछेगा,
“यदि मैं उस से बिनती करूँ तो मुझे क्या लाभ होगा?” जब आप किसी मनुष्य को इस प्रकार श्रेष्ठ उद्देश्यों से प्रेरित होने में असमर्थ पाते हैं, तो वह कैसा अभागा है! कैसा अवर्णनीय रूप से नीच!
इसी प्रकार मैं आपके सामने उस महत्त्वाकांक्षी विद्यार्थी को ला सकता हूँ, जिसके लक्ष्य इतने नीचे हैं कि भलाई करने का उच्च उद्देश्य उस पर प्रभाव नहीं डालता, और जिसे केवल वही बात छूती है जो उसकी प्रतिष्ठा को छूती है। क्या यह अत्यन्त नीच और तुच्छ नहीं है? आप उस प्रचारक के विषय में क्या सोचेंगे जो प्राणों के कल्याण की सारी चिन्ता खो दे, और केवल अपनी प्रतिष्ठा बटोरने की सोचे?
आप उसके विषय में क्या कहेंगे? आप घोषणा करेंगे कि वह जीने के लिए बहुत ही नीच और बहुत ही दुष्ट है, और केवल नरक के योग्य है! आप उस व्यक्ति के विषय में क्या सोचेंगे जो बुद्धि और प्रतिभा के भोर के तारों के बीच लूसिफ़र के समान चमक सकता था, परन्तु जो स्वयं को गिराकर वाहवाही के पीछे सूँघते फिरने और अपनी प्रतिभाओं की प्रशंसा बटोरने के नीच और दयनीय धन्धे में लग जाए? क्या आप यह नहीं कहेंगे कि ऐसी स्वार्थ-खोज अकथनीय रूप से घृणित है? जबकि ऊपर से सारा स्वर्ग उन्हें ऊँचे उद्देश्यों और प्रयासों की ओर बुला रहा है, वहाँ वे अपनी “कूड़ा-खुरचनी” चला रहे हैं, और अपने छोटे-से स्वयं के लिए किसी छोटे-से लाभ के पीछे नाक रगड़ते फिर रहे हैं!
उस महत्त्वाकांक्षी मनुष्य को देखिए जो सबको प्रसन्न करने के लिए इतना लालायित है कि वह अपनी रायों को हर किसी की रायों के अनुरूप ढाल लेता है, और उसकी कभी कोई ऐसी राय नहीं होती जो वास्तव में उसकी अपनी हो! क्या वह उन लोगों में से किसी को भी सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त नीचे नहीं गिर गया होगा जिनकी महत्त्वाकांक्षा विचित्र रीति से उलट गई प्रतीत होती है, ताकि वे केवल गोता लगाने और डूबने की आकांक्षा करते हैं—कभी ऊँचा उड़ने की नहीं; जिनकी सारी प्रेरणाएँ नीचे की ओर झुकती हैं और कभी ऊपर की ओर नहीं?
कोई सोचेगा कि उनके पास किसी भी साधारण महत्त्वाकांक्षा को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त अधोगति होगी।
यह सब नीच स्वार्थ के बन्धन से आता है। हाय, कि हमारे संसार में यह इतना अधिक है कि जनमत शायद ही कभी इसे किसी भी प्रकार इसके वास्तविक स्वरूप के अनुसार आँकता है!
हमारा विषय उन लोगों की दशा को प्रकट करता है जिन्हें सही बात का बोध तो है, परन्तु जिन्हें उसे करने के लिए मनाया नहीं जा सकता।
उदाहरण के लिए, संयम के विषय में, उसे अपने कर्तव्य का बोध है—वह जानता है कि उसे पूरी तरह सुधर जाना चाहिए, परन्तु फिर भी वह नहीं बदलेगा। संयम पर हर व्याख्यान उसके मन में बोध उत्पन्न करता है, परन्तु अगली परीक्षा उसे बहा ले जाती है, और वह कुत्ते के समान अपनी छाँट की ओर लौट जाता है। परन्तु यह ध्यान दीजिए—संयम-बोध और परीक्षा की विजय की हर अगली प्रक्रिया उसे पहले से अधिक दुर्बल छोड़ जाती है, और बहुत जल्द आप उसे पूरी तरह धराशायी पाएँगे। अभागा मनुष्य! वह कितनी निश्चितता से अपने पापों में मरेगा!
परीक्षा का रूप चाहे जो हो, जो व्यक्ति अपने कर्तव्य का निश्चय हो जाने पर भी उसके अनुरूप कोई कार्य नहीं करता, वह विनाश के राजमार्ग पर है। अनिवार्य रूप से यह बन्धन अपनी शक्ति की हर नई परीक्षा के साथ और भी दृढ़ होता जाता है। हर बार जब आपको कर्तव्य का बोध होता है और फिर भी आप उस बोध का विरोध करते हैं, और उसके अनुसार कार्य करने से इन्कार करते हैं, तो आप और अधिक असहाय होते जाते हैं; आप स्वयं को अपने लौह-हृदय स्वामी के नियंत्रण में और अधिक सौंपते जाते हैं। हर नया अवसर आपको और भी पूरी तरह एक असहाय दास बना देता है।
यहाँ शायद कुछ ऐसे जवान हों जिन्होंने पहले ही स्वयं को नैतिक रूप से टूटा हुआ जहाज़ बना लिया है।
शायद ऐसे लड़के भी हों जो अभी सोलह वर्ष के भी नहीं हुए, और जिन्होंने पहले ही अपने विवेक को पूरी तरह अपने पाँवों तले दबा दिया है। शायद आप पहले ही अपने कर्तव्य के सारे निश्चयों के विरुद्ध चलना सीख चुके हैं।
कितनी भयानक बात! आपके बन्धन हर दिन और दृढ़ होते जा रहे हैं। हर दिन के विरोध के साथ आपका प्राण और भी गहराई से और निराशाजनक रूप से खोता जा रहा है। बेचारे, अभागे, मरते हुए पापी! “जो बार बार डाँटे जाने पर भी हठ करता है, वह अचानक नष्ट हो जाएगा और उसका कोई भी उपाय काम न आएगा!” अचानक आप तट की चट्टानों से टकराते हैं और चले जाते हैं! आपके मित्र गम्भीरता से तट पर चलते हैं, और दण्ड की उन चट्टानों की ओर देखते हैं जिन पर आपका प्राण रूपी जहाज़ टूट गया है, और चलते-चलते रोते हुए वे शोक से कहते हैं, “वह रहा उस व्यक्ति का टूटा हुआ जहाज़ जो अपना कर्तव्य जानता था, परन्तु उसने उसे नहीं किया। हजारों बार पाप-बोध की पुकारें उसके हृदय तक पहुँचीं, परन्तु उसने उनका विरोध करना सीख लिया—उसने विरोध करना अपना काम बना लिया, और हाय! वह इसमें बहुत ही सफल रहा!”
यह भ्रम कितना पागलपन भरा है कि पापी की दशा, जब वह अभी अपने पापों में ही है, सुधरती जा रही है! पियक्कड़ भी ऐसा ही सोच सकता है कि वह सुधरता जा रहा है क्योंकि संयम पर हर व्याख्यान उसे उसके पाप और लज्जा का बोध कराता है, जबकि अगले ही दिन की परीक्षा उसे पहले की तरह ही नशे में धुत छोड़ जाती है! सुधरता जा रहा है! इससे अधिक झूठा और इससे अधिक घातक कोई भ्रम नहीं हो सकता!
इस भ्रम की शक्ति आप और भी स्पष्ट प्रकाश में देखते हैं जब आप ध्यान देते हैं कि परमेश्वर के चरित्र और राज्य के सारे विशाल उद्देश्यों के विरुद्ध प्राण को कितनी तुच्छ बातें डिगा देती हैं।
क्या वह एक प्रबल और भयानक भ्रम न होगा जो इतनी तुच्छ बातों को इतने विशाल और महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों से भारी बना सकता है?
इस दशा के दोष का अनुमान उन उद्देश्यों की तुच्छता से लगाना चाहिए जो मन को नियंत्रित करते हैं। आप उस युवक के विषय में क्या सोचेंगे जो छह पैसे के सिक्के के लिए अपने पिता की हत्या कर सकता है?
क्या! आप चिल्ला उठेंगे, इतनी तुच्छ-सी रकम के लिए घूस लेकर अपने पिता की हत्या करना! प्रलोभन जितना छोटा होगा, आप उसके दोष को उतना ही बड़ा मानेंगे।
हमारा विषय दिखाता है कि पापियों के हृदयों पर सत्य की छाप डालने के लिए पवित्र आत्मा की आवश्यकता है।
आप यह भी देख सकते हैं कि यदि पापी परमेश्वर के आत्मा को शोकित करके दूर कर दें तो वे कितनी निश्चितता से नाश हो जाएँगे।
आपके सांसारिक मित्र निराश हो सकते हैं, और फिर भी आप उद्धार पा सकते हैं; परन्तु यदि परमेश्वर का आत्मा निराश होकर आपको छोड़ दे, तो आपका भाग्य सदा के लिए मुहरबन्द हो जाता है। “जब मैं उन से दूर हो जाऊँगा, तब उन पर हाय!” पापी से परमेश्वर का यह हट जाना उसके खोए हुए प्राण के लिए मृत्यु-घंटा बजाने का संकेत है। तब वह पराक्रमी स्वर्गदूत अनन्तकाल का बड़ा घंटा बजाना आरम्भ करता है—टन, टन, टन! एक और प्राण अपने अनन्त दण्ड की ओर जा रहा है!
