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पाठ: “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”—यूहन्ना 3:16
पाप विश्व की सबसे महँगी वस्तु है। और कोई वस्तु इतनी महँगी नहीं पड़ सकती। चाहे वह क्षमा किया जाए या क्षमा न किया जाए, उसका मूल्य असीम रूप से बड़ा है। यदि वह क्षमा किया जाए, तो उसकी कीमत मुख्य रूप से उस महान प्रायश्चित करनेवाले
स्थानापन्न पर पड़ती है; यदि क्षमा न किया जाए, तो वह दोषी पापी के सिर पर ही पड़नी चाहिए।
पाप का अस्तित्व एक ऐसा तथ्य है जिसका अनुभव हर जगह होता है—जो हर जगह दिखाई देता है। हमारी जाति में हर जगह पाप है, और वह भी भयानक रूप से बढ़ा हुआ।
पाप एक असीम रूप से महत्वपूर्ण व्यवस्था का उल्लंघन है—ऐसी व्यवस्था का जो विश्व की सर्वोच्च भलाई को सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है और उसी के अनुकूल ढाली गई है। इस व्यवस्था का पालन स्वभावतः ही प्राणियों की भलाई के लिए अनिवार्य है। आज्ञापालन के बिना स्वर्ग में भी कोई धन्यता नहीं हो सकती।
क्योंकि पाप एक अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यवस्था का उल्लंघन है, इसलिए उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। कोई भी शासन आज्ञा-उल्लंघन को मामूली बात समझने का जोखिम नहीं उठा सकता, क्योंकि सब कुछ—शासन का और सब शासितों का सम्पूर्ण कल्याण—आज्ञापालन पर ही निर्भर है। जितने मूल्यवान वे हित हैं जो दाँव पर लगे हैं, ठीक उसी अनुपात में व्यवस्था की रक्षा करने और आज्ञा-उल्लंघन को दण्ड देने की आवश्यकता भी है।
परमेश्वर जो कुछ भी करे, उससे उसकी व्यवस्था का अनादर नहीं होना चाहिए। मनुष्य के आज्ञा-उल्लंघन से उसका अनादर हो चुका है; इसलिए यह और भी आवश्यक है कि परमेश्वर उसके पक्ष में दृढ़ता से खड़ा रहे, ताकि उसका सम्मान फिर से स्थापित हो। व्यवस्था का सबसे बड़ा अनादर यह है कि उसे ठुकराया जाए, उसकी आज्ञा न मानी जाए और उसे तुच्छ जाना जाए। पापी मनुष्य ने यह सब कुछ किया है। इसलिए, जब यह व्यवस्था न केवल भली है, बल्कि शासितों के सुख के लिए अपने आप में अनिवार्य भी है, तो सब बातों से बढ़कर यह आवश्यक हो जाता है कि व्यवस्था देनेवाला अपनी व्यवस्था का मान रखे और उसे सही ठहराए। उसे हर हाल में ऐसा करना ही है।
इसलिए पाप ने परमेश्वर के शासन पर बहुत भारी व्यय डाल दिया है। या तो सारी मानव जाति के कल्याण की कीमत पर व्यवस्था को लागू किया जाए, या फिर परमेश्वर अपनी व्यवस्था के अनादर के सबसे बुरे परिणामों को सहने के लिए तैयार हो—ऐसे परिणाम जिनमें किसी न किसी रूप में बहुत भारी व्यय अवश्य होगा।
उदाहरण के लिए कोई भी मानवीय शासन लीजिए। मान लीजिए कि वह जो न्यायपूर्ण और आवश्यक नियम लागू करता है, उन्हें ठुकराया जाता है और उनका अनादर किया जाता है। ऐसी दशा में या तो उल्लंघन किए गए नियम का सम्मान उसके दण्ड को लागू करके किया जाना चाहिए, या फिर कुछ और सहना पड़ेगा जो उससे कम महँगा नहीं, और सम्भवतः उससे कहीं अधिक महँगा होगा। अपराध का मूल्य कहीं न कहीं सुख खोकर चुकाना ही पड़ता है, और वह भी बहुत बड़ी मात्रा में।
परमेश्वर के शासन के विषय में यह उचित समझा गया कि एक स्थानापन्न का प्रबन्ध किया जाए—ऐसा जो पापी को बचाने का उद्देश्य भी पूरा करे और फिर भी व्यवस्था का सम्मान भी करे। जब यह निश्चित हो गया, तो अगला बड़ा प्रश्न यह था—इसका व्यय कैसे पूरा किया जाए?
बाइबल हमें बताती है कि वास्तव में इस प्रश्न का निर्णय कैसे हुआ। क्या मैं इसे स्वेच्छा से दी गई भर्ती कहूँ—या दान? हम इसे चाहे जो भी कहें, यह स्वेच्छा से दी गई भेंट थी। चन्दे की सूची में सबसे पहला नाम किसका होगा? जहाँ इतनी बड़ी राशि जुटानी है, वहाँ आरम्भ कौन करेगा? पहला बलिदान कौन देगा? इतनी विशाल योजना में पहला कदम कौन उठाएगा? बाइबल हमें बताती है। इसका आरम्भ अनन्त पिता से हुआ। उसी ने पहला महान दान दिया। उसने अपना एकलौता
पुत्र दे दिया—आरम्भ के लिए यह—और उसे पहले देकर, वह इस स्थिति की सारी आवश्यकताओं के लिए जो कुछ और चाहिए, वह सब भी सेंत-मेंत देता है। पहले उसने अपने पुत्र को दिया कि वह व्यवस्था के प्रति उचित प्रायश्चित करे; फिर उसने अपना पवित्र आत्मा दिया और भेजा कि वह इस काम का भार सँभाले। पुत्र ने अपनी ओर से पापियों का प्रतिनिधि बनकर खड़ा होना स्वीकार किया, ताकि वह उनके स्थान पर दुःख उठाकर व्यवस्था का सम्मान करे। उसने अपना लहू बहा दिया, दुःख से भरे अपने सारे जीवन को वेदी पर स्वेच्छा से भेंट कर दिया—थूके जाने से अपना मुँह न छिपाया, न कोड़ों से अपनी पीठ—दुष्ट मनुष्य उस पर जो बड़े से बड़ा अपमान ढेर कर सकते थे, उससे भी वह पीछे न हटा। इसी प्रकार पवित्र आत्मा भी उस महान उद्देश्य को पूरा करने के लिए
स्वयं को निरन्तर अत्यन्त आत्म-त्यागपूर्ण प्रयत्नों में लगाए रहता है।
यह एक बहुत छोटा उपाय होता कि वह हमारी जाति के दुष्टों पर अपना हाथ उलट देता, और उन सब को तुरन्त नरक में भेज देता, जैसा उसने एक बार तब किया था जब कुछ स्वर्गदूतों ने “अपने पद को स्थिर न रखा।” स्वर्ग में विद्रोह भड़क उठा था। परमेश्वर ने अपने ऊँचे सिंहासन के चारों ओर उसे अधिक समय तक सहन नहीं किया। परन्तु मनुष्य के विषय में उसने अपना मार्ग बदल दिया—उन सब को नरक में नहीं भेजा, बल्कि उपायों की एक विशाल योजना बनाई, जिसमें अत्यन्त आश्चर्यजनक आत्म-त्याग और आत्म-बलिदान सम्मिलित थे, ताकि मनुष्यों के प्राणों को फिर से आज्ञापालन और स्वर्ग की ओर लौटा लाए।
यह महान दान किनके लिए दिया गया? “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा,” अर्थात् सारी मानव जाति से। इस प्रसंग में “जगत” से केवल कोई विशेष भाग नहीं, बल्कि सारी जाति अभिप्रेत है। न केवल बाइबल, बल्कि विषय का स्वभाव भी यह दिखाता है कि प्रायश्चित सारे जगत के लिए ही किया गया होगा। क्योंकि स्पष्ट है कि यदि यह सारी जाति के लिए न किया गया होता, तो इस जाति का कोई भी मनुष्य कभी नहीं जान सकता था कि यह उसके अपने लिए किया गया है, और इसलिए एक भी मनुष्य मसीह पर इस अर्थ में विश्वास नहीं कर सकता था कि वह विश्वास के द्वारा प्रायश्चित की आशीषों को ग्रहण करे।
जब उस सीमित प्रबन्ध में, जिसकी हम इस समय कल्पना कर रहे हैं, सम्मिलित व्यक्तियों के विषय में पूरी अनिश्चितता हो, तो सारा दान विफल हो जाएगा, क्योंकि उसे ग्रहण करने के लिए विवेकपूर्ण विश्वास असम्भव होगा। मान लीजिए कि कोई धनी मनुष्य एक वसीयत बनाता है जिसमें वह कुछ सम्पत्ति कुछ अज्ञात व्यक्तियों के नाम कर देता है, जिनका वर्णन केवल “चुने हुए लोग” इस नाम से किया गया है। इस शब्द के अतिरिक्त उनका और कोई वर्णन नहीं है, और सब इस बात पर सहमत हैं कि यद्यपि वसीयत बनानेवाले के मन में वे व्यक्ति निश्चित रूप से थे, फिर भी उसने उनका ऐसा कोई विवरण नहीं छोड़ा जिसे न तो वे व्यक्ति स्वयं, न न्यायालय, न कोई जीवित मनुष्य समझ सके। अब ऐसी वसीयत अनिवार्य रूप से पूरी तरह निरर्थक और अमान्य है। ऐसी वसीयत के आधार पर कोई जीवित मनुष्य दावा नहीं कर सकता, और यदि इन चुने हुओं का वर्णन ओबरलिन के निवासियों के रूप में भी किया गया होता, तो भी स्थिति कुछ बेहतर न होती। क्योंकि इसमें ओबरलिन के सब निवासी सम्मिलित नहीं हैं, और यह निश्चित नहीं करती कि उनमें से कौन-कौन, इसलिए सब कुछ खो जाता है। सब का बराबर दावा है और किसी का भी निश्चित दावा नहीं, इसलिए कोई भी उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। यदि प्रायश्चित इसी प्रकार किया गया होता, तो सुसमाचार को ग्रहण करने से पहले किसी भी जीवित मनुष्य के पास अपने आप को चुने हुओं में से एक मानने का कोई ठोस कारण न होता। इसलिए उसे विश्वास करने और विश्वास के द्वारा उसकी आशीषों को ग्रहण करने का कोई अधिकार न होता। वास्तव में—इस धारणा के अनुसार—प्रायश्चित पूरी तरह व्यर्थ ही होगा, जब तक कि उन व्यक्तियों पर, जिनके लिए वह अभिप्रेत है, कोई विशेष प्रकाशन न किया जाए।
परन्तु वास्तविक स्थिति यह है कि केवल यह तथ्य कि मनुष्य आदम की जाति का है—यह तथ्य कि वह मनुष्य है, स्त्री से जन्मा है—पूरी तरह पर्याप्त है। यही उसे उस सीमा के भीतर ले आता है। वह उस जगत का एक अंश है जिसके लिए परमेश्वर ने अपना पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।
परमेश्वर के मन में इस महान दान का आन्तरिक प्रेरक कारण प्रेम था—जगत के प्रति प्रेम।
परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने उसके लिए मरने को अपना पुत्र दे दिया। परमेश्वर सारे विश्व से भी प्रेम करता था, परन्तु अपने पुत्र का यह दान हमारे जगत के प्रति प्रेम से उत्पन्न हुआ। यह सच है कि इस महान कार्य में उसने विश्व के हितों का प्रबन्ध करने में भी बड़ी सावधानी बरती। वह इस बात में सावधान रहा कि ऐसा कुछ भी न करे जिससे उसकी व्यवस्था की पवित्रता तनिक भी घटे। उसने अत्यन्त सावधानी से यह ठाना कि अपनी व्यवस्था के प्रति, और अपने नैतिक विश्व में आज्ञापालन और सुख के ऊँचे हितों के प्रति उसके आदर के विषय में कोई गलतफहमी न होने पाए। उसका अभिप्राय यह था कि वह एक ही बार में सदा के लिए इस खतरे को रोक दे कि कहीं कोई नैतिक कर्ता नैतिक व्यवस्था को कम आँकने की परीक्षा में न पड़ जाए।
इससे भी आगे, उसने अपने पुत्र को मरने के लिए केवल प्राणों के प्रति प्रेम के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी अनन्त विवेक-बुद्धि की व्यवस्था की आत्मा के प्रति आदर के कारण भी दे दिया। इसी में अपने
पुत्र को दे देने के संकल्प का उद्गम हुआ। उसकी अपनी विवेक-बुद्धि की व्यवस्था का सम्मान होना और उसे पवित्र माना जाना आवश्यक है। वह ऐसा कुछ नहीं कर सकता जो उसकी आत्मा के विपरीत हो। उसे पाप किए जाने को रोकने के लिए और अपनी प्रजा का भरोसा और प्रेम प्राप्त करने के लिए हर सम्भव काम करना ही है। वह इन महान उद्देश्यों को इतना पवित्र मानता था कि विश्व की भलाई को संकट में डालने के बजाय वह अपने पुत्र को उसके अपने लहू में बपतिस्मा देना पसन्द करता। निःसन्देह, विश्व की सर्वोच्च भलाई के प्रति प्रेम और आदर ही था जिसने उसे अपने प्रिय पुत्र का बलिदान करने के लिए प्रेरित किया।
आइए, अब हम इस प्रेम के स्वभाव पर ध्यान से विचार करें। पाठ इसी पर विशेष बल देता है—परमेश्वर ने ऐसा प्रेम रखा—उसका प्रेम ऐसे स्वभाव का था, अपने स्वरूप में इतना अद्भुत और इतना विलक्षण था, कि उसने उसे अपने एकलौते पुत्र को मरने के लिए दे देने को प्रेरित किया। इस अभिव्यक्ति में केवल उसकी महानता से कहीं अधिक बात स्पष्ट रूप से निहित है। यह अपने स्वरूप में अत्यन्त विलक्षण है। जब तक हम इसे न समझें, तब तक हम यूनिवर्सलिस्ट लोगों की उस अनोखी भूल में पड़ने के खतरे में रहेंगे, जो सदा पापियों के प्रति परमेश्वर के प्रेम की बातें करते रहते हैं, परन्तु इस प्रेम के स्वभाव के विषय में जिनकी धारणाएँ कभी भी पश्चाताप या पवित्रता की ओर नहीं ले जातीं। वे इस प्रेम को मानो केवल भलमनसाहत समझते हैं, और परमेश्वर की कल्पना केवल एक बहुत ही भले स्वभाव वाले व्यक्ति के रूप में करते हैं, जिससे किसी को डरने की आवश्यकता नहीं।
ऐसी धारणाओं का पवित्रता की ओर तनिक भी प्रभाव नहीं होता, बल्कि ठीक उल्टा होता है। जब हम यह समझने लगते हैं कि अपने स्वभाव में यह प्रेम क्या है, केवल तभी हम पवित्रता को बढ़ानेवाली उसकी नैतिक सामर्थ का अनुभव करते हैं।
उचित रूप से यह पूछा जा सकता है कि यदि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा, जिसकी विशेषता महानता थी, और केवल महानता ही, तो उसने अपने
पुत्र का बलिदान किए बिना सारे जगत को क्यों नहीं बचा लिया? यह प्रश्न हमें यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि इस शब्द “ऐसा” में गहरा अर्थ है, और इसे हमें इस अर्थ का सावधानी से अध्ययन करने को प्रेरित करना चाहिए।
1. यह प्रेम अपने स्वभाव में प्रसन्नता का प्रेम नहीं है—अर्थात् मानव जाति के चरित्र में आनन्द लेना नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता था, क्योंकि उनके चरित्र में कुछ भी प्रेम करने योग्य नहीं था। यदि परमेश्वर ऐसी जाति से प्रसन्न होकर प्रेम रखता, तो यह स्वयं उसके लिए असीम रूप से लज्जाजनक होता।
2. यह केवल एक भावना या अनुभूति नहीं थी। यह कोई अन्धा आवेग नहीं था, यद्यपि बहुत से लोग ऐसा ही समझते प्रतीत होते हैं। प्रायः यह मान लिया जाता है कि परमेश्वर ने वैसा ही किया जैसा मनुष्य तब करते हैं जब वे किसी तीव्र भावना में बह जाते हैं। परन्तु इसमें कोई सद्गुण नहीं हो सकता था। कोई मनुष्य भावना के ऐसे अन्धे आवेग में अपना सब कुछ दे डाले, तो भी वह इससे तनिक भी अधिक सद्गुणी नहीं होगा। परन्तु यह कहते हुए हम परोपकार के प्रेम से, या खोए हुए जगत के प्रति परमेश्वर के प्रेम से, सारी भावना को अलग नहीं कर देते। उसमें भावना थी, परन्तु केवल भावना ही नहीं। वास्तव में बाइबल सब जगह हमें सिखाती है कि अपने पापों में खोए हुए मनुष्य के प्रति परमेश्वर का प्रेम पिता का प्रेम था—एक पिता का अपनी सन्तान के प्रति प्रेम—और इस प्रसंग में, एक विद्रोही, हठीली, उड़ाऊ सन्तान के प्रति। निश्चय ही इस प्रेम में गहरी से गहरी करुणा भी घुली-मिली होगी।
3. मध्यस्थ के रूप में देखे गए मसीह की ओर से यह प्रेम भाई का प्रेम था। “वह उन्हें भाई कहने से नहीं लजाता।” एक दृष्टि से वह भाइयों के लिए काम कर रहा है, और दूसरी दृष्टि से सन्तानों के लिए। पिता ने उसे इस काम के लिए दे दिया, और निश्चय ही वह उस प्रेम में सहभागी है जो इन सम्बन्धों के उपयुक्त है।
4. यह प्रेम पूरी तरह निःस्वार्थ ही होगा, क्योंकि उसे न किसी बात की आशा थी न किसी बात का भय—यदि उसकी सन्तान बच जाए तो उनसे उसे कोई लाभ नहीं कमाना था। वास्तव में परमेश्वर को स्वार्थी मानना असम्भव है, क्योंकि उसका प्रेम सब प्राणियों और सब हितों को उनके वास्तविक मूल्य के अनुसार अपने में समेटे हुए है। निःसन्देह उसे हमारी जाति को बचाने में आनन्द मिला—क्यों न मिलता? यह हर अर्थ में एक महान उद्धार है, और यह स्वर्ग के आनन्द को बहुत बढ़ा देता है—यह अनन्त परमेश्वर की महिमा और धन्यता पर भी बड़ा प्रभाव डालेगा। ऐसे निःस्वार्थ प्रेम के कारण वह अनन्तकाल तक स्वयं का आदर करेगा। वह यह भी जानता है कि उसके सब पवित्र प्राणी इस काम के लिए और उस प्रेम के लिए जिसने इसे जन्म दिया, अनन्तकाल तक
उसका आदर करेंगे। परन्तु यह भी कहा जाए कि वह जानता था कि वे इस महान कार्य के लिए उसका आदर तब तक नहीं करेंगे, जब तक वे यह न देखें कि उसने यह पापियों की भलाई के लिए किया।
5. यह प्रेम उत्साहपूर्ण था—वह ठंडे हृदय की मनोदशा नहीं जैसा कुछ लोग समझते हैं—कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि गहरा, उत्साही, सच्चा प्रेम, जो उसके प्राण में ऐसी आग के समान जलता था जिसे कोई भी बुझा नहीं सकता।
6. यह बलिदान अत्यन्त आत्म-त्यागपूर्ण था। क्या पिता को अपने प्रिय पुत्र को दुःख उठाने और ऐसी मृत्यु मरने के लिए दे देने में कुछ भी कीमत नहीं चुकानी पड़ी? यदि यह आत्म-त्याग नहीं, तो फिर क्या हो सकता है? इस प्रकार अपने पुत्र को इतने दुःख के लिए दे देना—क्या यह सबसे श्रेष्ठ आत्म-त्याग नहीं है? ऐसे उदाहरण के बिना विश्व को महान आत्म-त्याग का कभी कोई विचार ही न होता।
7. यह प्रेम व्यक्तिगत था क्योंकि यह सार्वभौमिक था; और सार्वभौमिक भी था क्योंकि यह व्यक्तिगत था। परमेश्वर ने प्रत्येक पापी से व्यक्तिगत रूप से प्रेम किया, और इसलिए सब से प्रेम किया। क्योंकि उसने बिना पक्षपात, बिना किसी का मुँह देखे, सब से निष्पक्ष प्रेम किया, इसलिए उसने प्रत्येक से व्यक्तिगत रूप से प्रेम किया।
8. यह अत्यन्त धीरजवन्त प्रेम था। ऐसा माता-पिता मिलना कितना दुर्लभ है जो अपनी सन्तान से इतना प्रेम करे कि कभी अधीर न हो। मैं आपके बीच घूमकर पूछूँ, हे माता-पिताओ, आप में से कितने कह सकते हैं कि आप अपनी सब सन्तानों से इतना अच्छा, इतना अधिक, और इतनी बुद्धिमानी से संयमित प्रेम रखते हैं कि आपने उनमें से किसी के प्रति कभी अधीरता अनुभव नहीं की—कि आप बड़े से बड़े उकसावे में भी उन्हें अपनी बाँहों में ले सकते हैं और प्रेम से उन्हें जीत सकते हैं, प्रेम से उन्हें उनके पापों से निकाल सकते हैं, प्रेम से उन्हें पश्चाताप और सन्तान की सी आत्मा में ला सकते हैं? अपनी किस सन्तान के विषय में आप कह सकते हैं, परमेश्वर का धन्यवाद हो,
मैं उस बच्चे पर कभी नहीं खीझा—किसके विषय में, यदि आप स्वर्ग में उससे मिलें, आप कह सकेंगे, मैंने उस बच्चे को कभी नहीं खिझाया? मैंने बहुधा माता-पिताओं को कहते सुना है, मैं अपने बच्चों से प्रेम करता हूँ, परन्तु हाय, मेरा धीरज कैसे जवाब दे देता है! और जब वे प्यारे बच्चे मर जाते हैं, तब आप उनकी कड़वी
कराहें सुन सकते हैं, हाय, मेरे प्राण, मैं अपने बच्चे के लिए इतनी ठोकर और इतने पाप का कारण कैसे बन सका!
परन्तु परमेश्वर कभी नहीं खीझता—कभी अधीर नहीं होता। उसका प्रेम इतना गहरा और इतना महान है कि वह सदा धीरज रखता है।
कभी-कभी जब माता-पिता की सन्तान अभागी होती है—करुणा के योग्य बेचारे जीव—तो वे उनकी हर बात सह लेते हैं; परन्तु जब वे बहुत दुष्ट होते हैं, तो उन्हें लगता है कि अधीर होने के लिए वे पूरी तरह क्षम्य हैं। परमेश्वर के विषय में, ये अभागी सन्तान नहीं, बल्कि अत्यन्त दुष्ट हैं—जान-बूझकर दुष्ट। परन्तु आह, उसका अद्भुत धीरज—वह उनकी भलाई पर इतना मन लगाए हुए है, उनके सर्वोच्च कल्याण की इतनी लालसा रखता है, कि वे उसके साथ चाहे कितना भी दुर्व्यवहार करें, वह
फिर भी उन्हें आशीष देने में, और उनके स्थान पर अपने पुत्र की मृत्यु के द्वारा रो-रोकर उन्हें जीत लेने और पिघलाकर पश्चाताप और प्रेम में ले आने में लगा रहता है!
9. यह जलन रखनेवाला प्रेम है, बुरे अर्थ में नहीं, बल्कि अच्छे अर्थ में—इस अर्थ में कि वह अत्यन्त सावधान रहता है कि कहीं ऐसा कुछ न हो जाए जिससे उनको हानि पहुँचे जिनसे वह प्रेम करता है। ठीक वैसे ही जैसे पति और पत्नी जो एक-दूसरे से सच्चा प्रेम करते हैं, एक-दूसरे के कल्याण के विषय में सदा जागती रहनेवाली जलन रखते हैं, और सदा एक-दूसरे के सच्चे हितों को बढ़ाने के लिए जो कुछ कर सकते हैं वह करने का यत्न करते हैं।
यह दान पहले ही दिया जा चुका है—सच्चे मन से दिया गया है—केवल प्रतिज्ञा ही नहीं की गई, बल्कि वास्तव में दिया गया है। जो प्रतिज्ञा बहुत पहले दी गई थी, वह पूरी हो चुकी है। पुत्र आ चुका है, मर चुका है, छुड़ौती दे चुका है, और उसे प्रस्तुत करने के लिए जीवित है—उन सब के लिए तैयार किया हुआ उद्धार जो उसे अपनाएँगे।
परमेश्वर का पुत्र किसी प्रतिशोध को शान्त करने के लिए नहीं मरा, जैसा कि कुछ लोग समझते प्रतीत होते हैं, बल्कि व्यवस्था की माँगों के अधीन मरा। व्यवस्था के उल्लंघन से उसका अनादर हुआ था। इसलिए मसीह ने अपना दुःखमय जीवन और अपनी प्रायश्चित करनेवाली मृत्यु उसकी माँगों के लिए सौंपकर उसका सम्मान करने का बीड़ा उठाया। यह परमेश्वर में किसी बदला लेनेवाली आत्मा को शान्त करने के लिए नहीं था, बल्कि दया के एक प्रबन्ध में विश्व की सर्वोच्च भलाई सुनिश्चित करने के लिए था।
क्योंकि यह प्रायश्चित किया जा चुका है, इसलिए मानव जाति के सब मनुष्यों का उस पर अधिकार है। यह हर उस व्यक्ति के लिए खुला है जो इसे अपनाएगा। यद्यपि यीशु अब भी पिता का पुत्र है, फिर भी अनुग्रह के अधिकार से वह एक महत्वपूर्ण अर्थ में मानव जाति का है—हर एक का; यहाँ तक कि हर पापी का उसके लहू में भाग है, यदि वह केवल नम्रता से आगे आकर उसका दावा करे। परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत का उद्धारकर्ता होने के लिए भेजा—उन सब का, जो कोई भी विश्वास करे और इस महान उद्धार को स्वीकार करे।
परमेश्वर इस उद्धार को मनुष्यों पर लागू करने के लिए अपना आत्मा देता है। वह हर मनुष्य के द्वार पर आता है और खटखटाता है, कि यदि हो सके तो भीतर आने पाए, और हर पापी को दिखाए कि वह अभी उद्धार पा सकता है।
आह, यह प्रेम का कैसा परिश्रम है!
यह उद्धार, यदि ग्रहण किया जाए तो, विश्वास ही के द्वारा ग्रहण किया जाना चाहिए। यही एकमात्र सम्भव मार्ग है। पापियों पर परमेश्वर का शासन नैतिक है, भौतिक नहीं, क्योंकि पापी स्वयं एक नैतिक कर्ता है, भौतिक कर्ता नहीं। इसलिए परमेश्वर हम पर किसी भी प्रकार से प्रभाव नहीं डाल सकता, जब तक हम उस पर अपना भरोसा न रखें। वह हमें केवल स्वर्ग नाम के किसी स्थान में उठा ले जाकर कभी नहीं बचा सकता—मानो स्थान बदलने से इच्छा से चलनेवाला हृदय बदल जाएगा। इसलिए साधारण विश्वास के अतिरिक्त उद्धार पाने का कोई भी सम्भव मार्ग नहीं हो सकता।
अब भूल से यह न समझिए कि सुसमाचार को अपनाने का अर्थ केवल इन ऐतिहासिक तथ्यों पर विश्वास करना है, बिना मसीह को सचमुच अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण किए। यदि यही योजना होती, तो मसीह को केवल नीचे आकर मरने की आवश्यकता होती; फिर स्वर्ग लौटकर चुपचाप यह देखने की प्रतीक्षा करता कि कौन इन तथ्यों पर विश्वास करता है। परन्तु वास्तविक स्थिति कितनी भिन्न है! अब मसीह प्राण को अपने ही जीवन और प्रेम से भरने के लिए नीचे आता है। पश्चाताप करनेवाले पापी यीशु के विषय में सत्य को सुनते और उस पर विश्वास करते हैं, और फिर मसीह को अपने प्राण में ग्रहण करते हैं कि वह वहाँ सर्वोपरि होकर सदा जीवित रहे और राज्य करे। इस बात में बहुत से लोग भूल करते हैं, और कहते हैं, यदि मैं इतिहास की बातों के रूप में इन तथ्यों पर विश्वास कर लूँ तो यह पर्याप्त है। नहीं! नहीं! यह किसी भी प्रकार से वह बात नहीं है। “धार्मिकता के लिये मन से विश्वास किया जाता है।” प्रायश्चित वास्तव में इसलिए किया गया कि मार्ग तैयार हो, ताकि यीशु मनुष्यों के हृदयों तक नीचे आ सके और उन्हें अपने साथ एकता और सहानुभूति में खींच ले—ताकि परमेश्वर अपने प्रेम की बाँहें नीचे झुकाकर पापियों को गले लगा सके—ताकि पापियों के प्रति परमेश्वर द्वारा दिखाए गए मित्रता के ऐसे चिह्नों से व्यवस्था और शासन का अनादर न हो। परन्तु प्रायश्चित पापियों को किसी भी प्रकार से नहीं बचाएगा, सिवाय इसके कि वह उनके लिए परमेश्वर के साथ हृदय की सहानुभूति और संगति में आने का मार्ग तैयार करता है।
अब यीशु हर पापी के द्वार पर आता है और खटखटाता है। सुनिए! यह क्या है? यह क्या है? यह खटखटाना क्यों? यदि प्रणाली यही होती, तो वह चला क्यों न गया और स्वर्ग में ही क्यों न रहा, जब तक मनुष्य केवल ऐतिहासिक तथ्यों पर विश्वास करके बपतिस्मा न ले लें, जैसा कि कुछ लोग उद्धार के लिए पर्याप्त समझते हैं?
परन्तु अब देखिए कि वह कैसे नीचे आता है—पापी को बताता है कि उसने क्या किया है—अपना सारा प्रेम प्रकट करता है—उसे बताता है कि वह प्रेम कितना पवित्र और कितना पावन है, इतना पावन कि वह अपनी व्यवस्था की पवित्रता और अपने शासन की शुद्धता का ध्यान रखे बिना किसी भी प्रकार कार्य नहीं कर सकता। इस प्रकार हृदय पर अपनी पवित्रता और शुद्धता के सबसे गहरे और व्यापक विचार अंकित करते हुए, वह गहरे पश्चाताप की आवश्यकता और सब पापों को त्याग देने के पवित्र कर्तव्य पर बल देता है।
टिप्पणियाँ — 1. बाइबल सिखाती है कि पापी अपने पहिलौठे के अधिकार को खो सकते हैं और स्वयं को दया की पहुँच से परे कर सकते हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब मैंने आपसे इस स्पष्ट आवश्यकता के विषय में कुछ कहा था कि परमेश्वर अपने प्रेम के दुरुपयोग से अपनी रक्षा करे। परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनसे ऐसे दुरुपयोग का सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न होता है, और इसलिए उसे पापियों को यह जता देना चाहिए कि वे उसके प्रेम का दुरुपयोग न करें, और ऐसा करके वे दण्ड से बच नहीं सकते।
2. सुसमाचार के अधीन पापी सबसे बड़ी सम्भव ज़िम्मेदारी की स्थिति में हैं।
वे परमेश्वर के पुत्र ही को अपने पाँवों तले रौंदने के अत्यन्त खतरे में हैं।
वे कहते हैं, आओ, हम उसे मार डालें, तब मीरास हमारी हो जाएगी। जब परमेश्वर सब के अन्त में अपने ही प्रिय पुत्र को भेजता है, तो वे क्या करते हैं? अपने अन्य सब पापों और विद्रोहों में वे इस महिमामय पुत्र का सबसे बड़ा अपमान और जोड़ देते हैं! मान लीजिए कि किसी मानवीय शासन के अधीन ऐसा ही कुछ किया जाए। किसी प्रान्त में विद्रोह हो जाता है। राजा अपने ही पुत्र को भेजता है, किसी सेना के साथ नहीं कि उन्हें उनके विद्रोह में तुरन्त काट डाले, बल्कि वह बड़ी कोमलता, नम्रता और धीरज से उनके बीच जाता है, राज्य के नियमों को समझाता है और उन्हें आज्ञा मानने के लिए समझाता-बुझाता है। ऐसे में वे क्या करते हैं? वे एक मन होकर उसे पकड़ने और मार डालने के लिए मिल जाते हैं!
परन्तु आप इस बात के लागू होने से इनकार करते हैं, और मुझसे पूछते हैं, परमेश्वर के पुत्र की हत्या किसने की? क्या वे यहूदी नहीं थे? हाँ, और हे पापियो, क्या इस हत्या में आपका कोई हाथ नहीं? क्या यीशु मसीह के साथ आपके व्यवहार ने यह नहीं दिखाया कि परमेश्वर के पुत्र की हत्या में आप उन प्राचीन यहूदियों के साथ पूरी तरह सहमत हैं? यदि आप वहाँ होते, तो क्या कोई आपसे अधिक ऊँचे स्वर में चिल्लाता, ले जा! उसे ले जा—उसे क्रूस पर चढ़ा, क्रूस पर चढ़ा? क्या आप सदा यही नहीं कहते आए, हम से दूर हो—तेरी गति जानने की हम को इच्छा नहीं रहती?
3. मसीह के विषय में कहा गया है कि वह धनी होकर भी कंगाल बन गया, ताकि उसके कंगाल हो जाने से हम धनी हो जाएँ। यह कितना स्पष्ट रूप से सच है? हमारे छुटकारे की कीमत मसीह को अपने प्राण देकर चुकानी पड़ी; उसने उसे धनी पाया, पर कंगाल बना दिया; उसने हमें असीम रूप से कंगाल पाया, पर हमें धनी बना दिया, यहाँ तक कि स्वर्ग के सारे धन तक। परन्तु इन धनों में कोई भी तब तक भागी नहीं हो सकता जब तक हर एक अपने लिए उन्हें उचित रीति से स्वीकार न करे। उन्हें प्रस्तावित शर्तों पर ही ग्रहण करना होगा, नहीं तो यह प्रस्ताव पूरी तरह जाता रहेगा, और आप उससे भी अधिक कंगाल रह जाएँगे जितने तब होते जब ऐसा कोई खज़ाना आपके पाँवों पर कभी रखा ही न गया होता।
बहुत से लोग इस विषय को पूरी तरह गलत समझते प्रतीत होते हैं। वे परमेश्वर की बात पर विश्वास करते नहीं दिखते, पर यही कहते रहते हैं, यदि, यदि, यदि मेरे लिए कोई उद्धार होता—यदि मेरे पापों की क्षमा के लिए कोई प्रायश्चित प्रबन्धित होता। यह उन अन्तिम बातों में से एक थी जो मेरे मन में स्पष्ट हुईं, इससे पहले कि मैंने परमेश्वर पर भरोसा करने के लिए अपने प्राण को पूरी तरह सौंप दिया। मैं प्रायश्चित का अध्ययन कर रहा था; मैंने उसके दार्शनिक पहलुओं को देखा—देखा कि वह पापी से क्या माँगता है; परन्तु इससे मुझे चिढ़ हुई, और मैंने कहा—यदि मैं मसीही बन जाऊँ, तो मैं कैसे जानूँ कि परमेश्वर मेरे साथ क्या करेगा? इसी चिढ़ में मैंने मसीह के विरुद्ध मूर्खतापूर्ण और कड़वी बातें कहीं—यहाँ तक कि मेरा अपना प्राण अपनी ही दुष्टता से काँप उठा, और मैंने कहा—यदि यह सम्भव हो तो मैं मसीह के साथ इस सब का निपटारा करके मेल कर लूँगा।
इसी प्रकार बहुत से लोग सुसमाचार के प्रोत्साहनों की ओर ऐसे बढ़ते हैं मानो यह केवल एक संयोग की बात हो, एक प्रयोग हो। वे हर अगला कदम बड़ी सावधानी से, डरते और काँपते हुए उठाते हैं, मानो इसमें बहुत बड़ा सन्देह हो कि उनके लिए कोई दया हो भी सकती है या नहीं।
मेरे साथ भी ऐसा ही था। मैं अपने दफ़्तर की ओर जा रहा था, जब यह प्रश्न मेरे मन के सामने आया—तू किस बात की प्रतीक्षा कर रहा है? तुझे इतना हंगामा खड़ा करने की आवश्यकता नहीं। सब कुछ पहले ही किया जा चुका है।
तुझे केवल इस प्रस्ताव पर सहमति देनी है—अपना हृदय एकदम उसे सौंप देना है—बस इतना ही। ठीक ऐसा ही है। सब मसीहियों और पापियों को यह समझना चाहिए कि सारी योजना पूरी हो चुकी है—कि सम्पूर्ण मसीह—उसका चरित्र, उसका कार्य, उसकी प्रायश्चित करनेवाली मृत्यु, और उसकी सदा जीवित रहनेवाली मध्यस्थता—हर एक और प्रत्येक मनुष्य का है, और केवल उसे स्वीकार करने की आवश्यकता है। यह एक भरा हुआ समुद्र है। वह वहाँ है। उसे न लेने के बजाय आप उसे ले ही लें। यह ऐसा है मानो आप कोमल, शुद्ध जल के समुद्र के किनारे खड़े हों, प्यास से मरे जा रहे हों; आपको पीने की पूरी छूट है, और आपको यह डर नहीं होना चाहिए कि आप उस समुद्र को खाली कर देंगे, या स्वयं पीकर किसी और को भूखा-प्यासा रखेंगे।
आपको यह अनुभव करने की आवश्यकता नहीं कि उस जल-समुद्र पर आपका अधिकार नहीं है; आपको पीने का निमन्त्रण दिया जाता है और आग्रह किया जाता है—हाँ, भरपूर पीने के लिए! यह समुद्र आपकी सारी आवश्यकता पूरी करता है। आपको अपने भीतर यीशु मसीह के गुण रखने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उसके गुण हर सम्भव उपयोग के लिए व्यावहारिक रूप से आपके हो जाते हैं। जैसा पवित्रशास्त्र कहता है—वह परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा, अर्थात धार्मिकता, और पवित्रता, और छुटकारा। आपको किस बात की आवश्यकता है? ज्ञान की? वह यहाँ है।
धार्मिकता की? वह यहाँ है। पवित्रीकरण की? वह भी यहाँ आपके लिए है। सब कुछ मसीह में है। क्या आप अपनी नैतिक शुद्धता या अपनी उपयोगिता के लिए किसी भी आवश्यक वस्तु की कल्पना कर सकते हैं जो यहाँ मसीह में न हो? कुछ भी नहीं। यहाँ सब कुछ प्रबन्धित है। इसलिए आपको यह कहने की आवश्यकता नहीं, मैं जाकर प्रार्थना करूँगा और प्रयत्न करूँगा, जैसा कि वह भजन कहता है, “मैं यीशु के पास जाऊँगा, यद्यपि मेरा पाप पहाड़ के समान ऊँचा उठ गया है; शायद वह मेरी विनती स्वीकार करे; शायद वह मेरी प्रार्थना सुन ले।”
किसी “शायद” की आवश्यकता नहीं। द्वार सदा खुले हैं। न्यू यॉर्क के ब्रॉडवे टैबरनेकल के द्वारों के समान, जो ऐसे बनाए गए थे कि वे घूमकर पूरे खुल जाएँ और अपने आप खुले ही अटक जाएँ, ताकि वे वापस घूमकर उन भीड़ों पर बन्द न हो सकें जो उनमें से होकर जाने के लिए उमड़ती थीं। जब वे बनाए जाने वाले थे, तो मैं स्वयं कारीगरों के पास गया और उनसे कहा कि वे हर हाल में उन्हें ऐसा लगाएँ कि वे अवश्य घूमकर खुलें और अपने आप उसी स्थिति में अटक जाएँ।
इसी प्रकार उद्धार का द्वार सदा खुला है—खुला ही जड़ा हुआ है, और कोई मनुष्य उसे बन्द नहीं कर सकता—न पोप भी, न शैतान, न स्वर्ग का और न नरक का कोई दूत। वह वहाँ खड़ा है, पूरी तरह पीछे घूमा हुआ, और मार्ग पूरा खुला है, कि हमारी जाति का हर पापी, यदि चाहे, भीतर प्रवेश करे।
फिर, पाप विश्व की सबसे महँगी वस्तु है। हे पापी, क्या आप भली भाँति जानते हैं कि आपके लिए कितना बड़ा मूल्य चुकाया गया है, ताकि आप छुड़ाए जाएँ और परमेश्वर और स्वर्ग के वारिस बनाए जाएँ? आह, पाप में लिप्त रहना आपके लिए कितना महँगा व्यापार है!
और इस प्रान्त को उसके विनाश से छुड़ाने के लिए परमेश्वर के शासन ने कितना भारी कर चुकाया है! ग्रेट ब्रिटेन के निर्धन-कर की बात कीजिए, और उसमें अन्य सब राष्ट्रों के कर भी जोड़ दीजिए; यहोवा के शासन के पाप-कर के सामने यह सब कुछ भी नहीं—वह भयानक पाप-कर! सोचिए, पापियों को बचाने के लिए कितनी मशीनरी चालू रखी जाती है! परमेश्वर का पुत्र नीचे भेजा गया—स्वर्गदूत उद्धार पानेवालों के लिए सेवा टहल करनेवाली आत्माओं के रूप में भेजे जाते हैं; मिशनरी भेजे जाते हैं, मसीही परिश्रम करते हैं, और गहरी और व्याकुल चिन्ता में प्रार्थना करते और रोते हैं—यह सब खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने के लिए। पाप को दूर करने और पापी को बचाने के लिए विश्व के परोपकार पर कितना अद्भुत, कितना भारी कर लगाया जाता है! यदि इस कीमत की गणना ठोस सोने में की जा सकती, तो वह कितना विशाल होता—अपने आप में ठोस सोने का एक पूरा गोला! स्वर्गदूतों, यीशु मसीह, ईश्वरीय आत्मा, और जीवित मनुष्यों की ओर से परिश्रम और व्यय का कैसा विशाल समूह! धिक्कार है उन पापियों पर जो उन्हें बचाने के इन सब परोपकारी प्रयत्नों के बावजूद पाप से चिपके रहते हैं! जो लज्जित होकर पाप से निकल आने के बजाय यह कहते हैं—परमेश्वर ही इस कर को चुकाए; किसे परवाह है! मिशनरी परिश्रम करते रहें, भक्त स्त्रियाँ इस सारी मानवीय मशीनरी को चालू रखने के लिए धन जुटाने में अपनी उँगलियाँ घिस डालें; कोई बात नहीं: इन सब से मुझे क्या? मैंने अपने सुख-विलासों से प्रेम किया है, और मैं उन्हीं के पीछे जाऊँगा! यह कैसा निष्ठुर हृदय है!
पापी अपने संगी पापियों को बचाने के लिए भली भाँति त्याग कर सकते हैं। पौलुस अपने संगी पापियों के लिए ऐसा कर सका। उसने अनुभव किया कि पापियों को बनाने में उसने अपना भाग निभाया था, और अब उसके लिए यह उचित था कि उन्हें परमेश्वर की ओर फेर लाने में भी अपना भाग निभाए। परन्तु वहाँ देखिए—वह युवक सोचता है कि पादरी बनना उसके बस की बात नहीं, क्योंकि उसे डर है कि उसका भली भाँति भरण-पोषण नहीं होगा।
क्या उस पर उस अनुग्रह का कुछ भी ऋण नहीं जिसने उसके प्राण को नरक से बचाया? क्या उसे कुछ त्याग नहीं करने हैं, जब यीशु ने उसके लिए इतने त्याग किए हैं, और उससे पहले मसीह में रहनेवाले मसीहियों ने भी—क्या उन्होंने उसके प्राण के उद्धार के लिए प्रार्थना नहीं की, दुःख नहीं उठाया और परिश्रम नहीं किया? जहाँ तक प्रभु के काम में उसे रोटी की कमी होने के खतरे की बात है, वह अपने महान स्वामी पर भरोसा रखे। फिर भी मैं यह भी कहूँ कि कलीसियाएँ अपने पास्टरों का भली भाँति भरण-पोषण न करने के लिए बहुत दोषी हो सकती हैं। वे यह जान लें कि
यदि वे अपने सेवकों को भूखा रखेंगी, तो परमेश्वर निश्चय ही उन्हें भूखा रखेगा। यदि वे लोभ के कारण उन्हें भूखा रखती हैं जिन्हें परमेश्वर अपने विधान में उन्हें जीवन की रोटी खिलाने के लिए भेजता है, तो उनके अपने प्राण और उनकी सन्तानों के प्राण मृत्यु के समान बंजर हो जाएँगे।
समाज को पाप के कुछ रूपों से छुटकारा दिलाने में कितनी कीमत लगती है, उदाहरण के लिए, दासता। कितना कुछ पहले ही व्यय हो चुका है, और इससे पहले कि यह भयंकर बुराई और श्राप और पाप हमारे देश से जड़ से उखाड़ा जाए, अभी और कितना व्यय होना शेष है! यह परमेश्वर के महान उद्यम का एक भाग है, और वह इसे पूरा होने तक आगे बढ़ाता रहेगा। फिर भी कितनी आश्चर्यजनक कीमत पर! इस एक पाप से छुटकारा पाने के लिए कितने प्राण और कितनी पीड़ा!
हाय उन पर जो मनुष्यों के पापों से लाभ कमाते हैं! ज़रा शराब बेचनेवाले के विषय में सोचिए—वह मनुष्यों को परीक्षा में डालता है, जबकि परमेश्वर उन्हें पाप और मृत्यु के मार्गों पर दौड़ पड़ने से रोकने का प्रयत्न कर रहा है!
उन लोगों के दोष के विषय में सोचिए जो इस प्रकार स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा करते हैं! इस प्रकार मसीह को शराब बेचनेवालों से संघर्ष करना पड़ता है, जो उसके काम में बाधा डालने के लिए जो कुछ कर सकते हैं, सब करते हैं।
हमारा विषय पाप के स्वभाव को निरे स्वार्थ के रूप में स्पष्ट रीति से दर्शाता है। उसे इसकी कोई परवाह नहीं कि यीशु मसीह को उसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ती है—कलीसिया को कितनी कीमत चुकानी पड़ती है, पृथ्वी और स्वर्ग के सब भले लोगों की परोपकारी सहानुभूति और आत्म-बलिदानी परिश्रम पर वह कितना बोझ डालता है; कोई बात नहीं; पापी को अपनी इच्छाओं की तृप्ति प्रिय है और जब तक हो सके वह उसे पाकर ही रहेगा। आप में से कितनों के कारण आपके मित्रों को आपको पाप के मार्गों से वापस लाने के लिए अनगिनत आँसू बहाने और कष्ट उठाने पड़े हैं? जब आपके लिए इतना कुछ किया गया है, तब भी आपको अपने पाप छोड़कर परमेश्वर और पवित्रता की ओर फिरने के लिए राज़ी नहीं किया जा सकता—क्या आप इस पर लज्जित नहीं हैं?
मनुष्य के लिए परमेश्वर की ओर से किया गया सारा प्रयत्न दुःख उठाने और आत्म-त्याग का प्रयत्न है। अपने ही प्रिय पुत्र के बलिदान से आरम्भ होकर, यह निरन्तर नए-नए बलिदानों और कठिन परिश्रमों के साथ—बड़े और अद्भुत व्यय पर—आगे बढ़ाया जाता है। ज़रा सोचिए, ये प्रयत्न अब तक कितने लम्बे समय से चलते आ रहे हैं—इसमें पानी के समान बहाए गए कितने आँसू लगे हैं—इस उद्यम ने कितने रूपों में कितनी पीड़ा उत्पन्न की है और इसकी कितनी कीमत चुकाई गई है—हाँ, उसी पाप के कारण जिसे आप एक मीठे कौर के समान अपनी जीभ के नीचे दबाए रखते हैं! जब परमेश्वर देखता है कि इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ती है, तो उसका इससे घृणा करना उचित ही है, और वह कहता है—आह, यह घृणित काम मत करो, जिससे मैं घृणा रखता हूँ!
फिर भी परमेश्वर इन आत्म-त्यागों में दुःखी नहीं है। परिणामों में उसका आनन्द इतना बड़ा है कि वह सारे दुःख को तुलना में एक छोटी सी बात समझता है, ठीक वैसे ही जैसे सांसारिक माता-पिता उन प्रयत्नों में आनन्द लेते हैं जो वे अपनी सन्तान को आशीष देने के लिए करते हैं। उन्हें देखिए; वे काम करते-करते मानो अपने हाथ ही घिस डालते हैं; माताएँ रात भर जागकर सुई चलाती रहती हैं, यहाँ तक कि थकान और आँखों के धुँधलेपन से लड़खड़ाने लगती हैं; परन्तु यदि आप उनका परिश्रम देखें, तो बहुधा आप उनका आनन्द भी देखेंगे, क्योंकि वे अपनी सन्तान से इतना गहरा प्रेम करती हैं।
मानव उद्धार के अपने महान कार्य में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का परिश्रम, आनन्द और आत्म-त्याग ऐसा ही है। वे बहुधा इस बात से शोकित होते हैं कि इतने लोग उद्धार पाने से इनकार करेंगे। एक साझी सहानुभूति में परिश्रम करते हुए, उचित सीमाओं के भीतर ऐसा कुछ भी नहीं जो वे अपना महान कार्य पूरा करने के लिए न करें या न सहें। यह सोचना अद्भुत है कि सारी सृष्टि भी इस कार्य में और इसके आवश्यक दुःखों में कैसे सहानुभूति रखती है। मसीह के दुःखों के दृश्य की ओर लौट चलिए। क्या आकाश का सूर्य ऐसे दृश्य को बिना विचलित हुए देख सकता था?
नहीं, वह उसे देख भी न सका—बल्कि उसने उस दृश्य से अपना मुँह ढाँप लिया! सारी प्रकृति ने मानो अपने सबसे गहरे शोक के वस्त्र पहन लिए। वह दृश्य निर्जीव प्रकृति के लिए भी सहने से बाहर था। सूर्य ने मुँह फेर लिया और ऐसे दृश्य को नीचे देख न सका!
यह विषय प्राण के मूल्य को प्रबल रूप से दर्शाता है। क्या आप सोचते हैं कि परमेश्वर यह सब करता, यदि इस विषय में उसके विचार भी वैसे ही तुच्छ होते जैसे प्रायः पापियों के होते हैं?
शहीद और पवित्र लोग अपने दुःखों में आनन्द मनाते हैं—मसीह के क्लेशों की घटी को अपने में पूरी करते हुए; ठीक-ठीक प्रायश्चित में नहीं, बल्कि किए जानेवाले कार्य के गौण भागों में। सच्चे धर्म का स्वभाव ही यह है कि वह आत्म-त्याग से प्रेम करता है।
परिणाम सारे व्यय को पूरी तरह उचित ठहराएँगे। परमेश्वर ने आरम्भ करने से पहले ही भली भाँति लागत का हिसाब लगा लिया था। नैतिक विश्व की रचना करने से बहुत पहले ही वह भली भाँति जानता था कि पापियों को छुड़ाने में
उसे क्या कीमत चुकानी पड़ेगी, और वह जानता था कि परिणाम सारी कीमत को भरपूर उचित ठहराएगा। वह जानता था कि दया का एक आश्चर्यकर्म होगा—कि मसीह से जो दुःख माँगा गया,
वह चाहे कितना भी बड़ा हो, सहा जाएगा; और उससे असीम रूप से महिमामय परिणाम निकलेंगे।
उसने समय के मार्ग पर नीचे दूर-दूर के युगों तक दृष्टि डाली—जहाँ, जैसे-जैसे युगों के चक्र घूमते जाएँगे, छुड़ाए हुए पवित्र लोगों के आनन्द दिखाई दे सकते थे, जो अपने गीत गा रहे हैं और अनन्त गीत के साथ अपनी वीणाओं को नए सिरे से बजा रहे हैं, अपनी धन्यता की लम्बी, लम्बी, बहुत ही लम्बी अनन्तता भर; और क्या यह असीम प्रेम के हृदय के आनन्द के लिए पर्याप्त नहीं था? और हे मसीही, आप इसके विषय में क्या सोचते हैं? क्या आप अब कहेंगे, मुझे क्षमा माँगने में लज्जा आती है? मैं
ऐसी दया ग्रहण करना कैसे सह सकता हूँ! यह लहू का मूल्य है, और मैं इसे कैसे स्वीकार करूँ? मैं यीशु पर इतना व्यय कैसे डालूँ?
आप यह कहने में ठीक हैं कि आपके कारण उसे बड़ा व्यय उठाना पड़ा है—परन्तु वह व्यय प्रसन्नता से चुकाया जा चुका है—सारी पीड़ा सही जा चुकी है, और उसे फिर से सहने की आवश्यकता नहीं होगी, और यदि आप इसे स्वीकार करें तो इसकी कीमत उससे तनिक भी अधिक नहीं होगी जितनी आपके अस्वीकार करने पर; और इससे भी बढ़कर, यह भी ध्यान रखा जाए कि यीशु मसीह ने मूर्खता से काम नहीं किया; उसने प्राण के छुटकारे के लिए अधिक मूल्य नहीं चुकाया—परमेश्वर के शासन के हितों ने जितना माँगा और प्राण का मूल्य जितने को उचित ठहराता, उससे एक भी पीड़ा अधिक नहीं।
आह, जब आप उसे आमने-सामने देखेंगे, और उसे बताएँगे कि आप इसके विषय में क्या सोचते हैं—जब आप अब से कुछ हज़ार वर्ष और बड़े हो जाएँगे, तब क्या आप उस बुद्धि की आराधना नहीं करेंगे जो इस योजना का संचालन करती है, और उस असीम प्रेम की जिसमें इसका जन्म हुआ? आह, तब आप उस अद्भुत दीनता के विषय में क्या कहेंगे जो यीशु को आपको बचाने के लिए नीचे ले आई! बताइए,
हे मसीही, क्या आपने बहुधा अपने उद्धारकर्ता के सामने अपना प्राण उण्डेलकर यह स्वीकार नहीं किया कि आपके कारण उसे कितना व्यय उठाना पड़ा है, और ऐसा लगा मानो भीतर कुछ ऊपर उठ रहा हो, मानो आपके प्राण की गहराई ही ऊपर उठ आएगी, और आप अपना सारा हृदय उण्डेल देंगे? यदि किसी ने आपको देखा होता तो वह चकित होता कि आपके साथ ऐसा क्या हुआ है जिसने आपके प्राण को कृतज्ञता और प्रेम में इस प्रकार पिघला दिया है।
अब बताइए, हे पापियो, क्या आप अपने पहिलौठे का अधिकार बेच देंगे? आप उसके लिए कितना लेंगे? मसीह में अपने भाग के लिए आप कितना लेंगे? आप अपना प्राण कितने में बेचेंगे? अपने मसीह को बेच देंगे! प्राचीन काल में उन्होंने उसे चाँदी के तीस सिक्कों में बेच दिया था; और तब से आकाश हमारे दोषी जगत पर लहू के आँसू बरसाता रहा है। यदि शैतान आपसे कहे कि वह रकम तय कीजिए जिसके बदले आप अपना प्राण बेच देंगे, तो आप क्या मूल्य बताएँगे? लोरेन्ज़ो डाउ एक बार किसी नियत सभा को पूरा करने के लिए एक सुनसान सड़क पर घोड़े पर जा रहे थे, तब उनकी भेंट एक मनुष्य से हुई, और उन्होंने उससे कहा—मित्र, क्या तुमने कभी प्रार्थना की है? नहीं। आगे कभी प्रार्थना न करने के लिए तुम कितना लोगे?
एक डॉलर। डाउ ने वह दे दिया, और आगे बढ़ गए। उस मनुष्य ने पैसा अपनी जेब में रखा, और सोचता हुआ आगे चला। जितना अधिक वह सोचता, उतना ही बुरा उसे लगता। उसने कहा, देखो, मैंने अपना प्राण एक डॉलर में बेच दिया! अवश्य ही मेरी भेंट शैतान से हुई है! और कोई मुझे इस प्रकार परीक्षा में न डालता। मुझे अपने सारे प्राण से पश्चाताप करना होगा, नहीं तो मैं सदा के लिए नरक-दण्ड पाऊँगा!
आपने कितनी बार अपने उद्धारकर्ता को चाँदी के तीस सिक्कों से भी कम में बेचने का सौदा किया है!
नहीं, एक निरी तुच्छ वस्तु के लिए!
अन्त में, परमेश्वर को इस महान कार्य को आगे बढ़ाने के लिए स्वयंसेवक चाहिए। परमेश्वर ने स्वयं को दे दिया है, और अपने पुत्र को दे दिया है, और अपना आत्मा भेजा है; परन्तु अभी और मज़दूरों की आवश्यकता है; और आप क्या
देंगे? पौलुस ने कहा, मैं प्रभु यीशु के दागों को अपनी देह में लिये फिरता हूँ। क्या आप ऐसे सम्मान की अभिलाषा रखते हैं? आप क्या करेंगे—आप क्या सहेंगे? यह न कहिए कि मेरे पास देने को कुछ नहीं। आप स्वयं को दे सकते हैं—अपनी आँखें, अपने कान, अपने हाथ, अपना मन, अपना हृदय, सब कुछ; और निश्चय ही आपके पास ऐसा कुछ भी नहीं जो ऐसी पुकार पर ऐसे कार्य के लिए समर्पित किए जाने के लिए बहुत पवित्र या बहुत अच्छा हो!
कितने युवक जाने के लिए तैयार हैं? और कितनी युवतियाँ? किसका हृदय उछलकर पुकार उठता है, मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज?
