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18. हम पर प्रगट किया गया परमेश्वर का प्रेम।
18. हम पर प्रगट किया गया परमेश्वर का प्रेम।
“परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।”—रोमियों 5:8
यहाँ “प्रगट करने” से क्या अभिप्राय है? सिफ़ारिश करना—किसी बात को स्पष्ट और प्रबल प्रकाश में सामने रखना।
यह प्रेम किसके प्रति किया जाता है? हमारे प्रति—हमारी खोई हुई जाति के सब प्राणियों के प्रति।
हम में से हर एक पर वह यह प्रेम प्रगट करता है। क्या यह नहीं लिखा है, “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए”?
वह इस प्रेम को किस प्रकार प्रगट करता है? अपने पुत्र को हमारे लिये मरने को देकर। ऐसे को देकर जो पुत्र था, और अति प्रिय पुत्र था। लिखा है कि परमेश्वर ने “उसे सब के छुटकारे के दाम में दे दिया,” और यह कि “उसने हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखा।” हमें यह नहीं समझना चाहिए कि वह समस्त मानवजाति के कुल योग के लिये ऐसे अर्थ में मरा कि उसकी मृत्यु सचमुच हर एक व्यक्ति के लिये अलग-अलग न हो। यह एक बड़ी भूल है, जिसमें कुछ लोग पड़ जाते हैं, कि वे समझते हैं कि मसीह सामान्य रूप से जाति के लिये मरा, न कि हर एक व्यक्ति के लिये अलग-अलग। इस भूल के कारण सुसमाचार हमारे हृदयों पर अपनी व्यावहारिक सामर्थ का बहुत भाग खो बैठता है। हमें इसे वैसे ही समझना चाहिए जैसे पौलुस ने समझा था, जिसने यीशु मसीह के विषय में कहा, “जिस ने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।” हमें मसीह की मृत्यु को इसी प्रकार व्यक्तिगत रूप से अपने ऊपर लागू करना चाहिए। निःसन्देह यही पौलुस के पवित्र जीवन का, और सुसमाचार के प्रचार में उसकी बड़ी सामर्थ का बड़ा भेद था। इसलिए हमें यीशु को ऐसा मानना है कि उसने हम से व्यक्तिगत रूप से और अलग-अलग प्रेम किया है।
आइए हम विचार करें कि परमेश्वर ने हमें यह अनुभव कराने के लिये कितना परिश्रम किया है कि उसे हमारी व्यक्तिगत रूप से चिन्ता है।
उसके विधान में भी ऐसा ही है, और उसके सुसमाचार में भी ऐसा ही। वह बड़ी लालसा से चाहता है कि हम अपने आप को भीड़ से अलग करके देखें और यह अनुभव करें कि उसकी प्रेम भरी आँख और उसका हृदय हम पर व्यक्तिगत रूप से लगा हुआ है।
वह किस उद्देश्य से हम पर अपना प्रेम प्रगट करता है? क्या यह दिखावा करने की कोई महत्वाकांक्षा है?
निश्चय ही इसमें कोई दिखावा नहीं हो सकता। परमेश्वर हर प्रकार के दिखावे से असीम रूप से ऊपर है। वह अपने स्वभाव ही से ईमानदारी से कार्य करने को बाध्य है। निःसन्देह अपने प्रेम के इस प्रकटीकरण के लिये उसके पास कोई अच्छा कारण होगा। निःसन्देह वह हमें अपने प्रेम की वास्तविकता का प्रमाण देना चाहता है। हमारी खोई हुई जाति के प्रति अत्यन्त सिद्ध प्रेम रखते हुए, उसने यह उत्तम समझा कि इस प्रेम को प्रगट करे और इसे स्पष्ट कर दे, हम पर भी और अपने सब प्राणियों पर भी। और यदि अपने पुत्र का यह दान उसके प्रेम को प्रमाणित नहीं करता, तो और क्या कर सकता है? आह, इस महान बलिदान में प्रेम कैसी महिमा के साथ प्रगट हुआ है! इससे ईश्वरीय प्रेम सारे विश्व के सामने कैसा स्पष्ट उभरकर दिखाई देता है! वह और क्या कर सकता था जो उसके प्रेम को इतने प्रभावशाली ढंग से प्रमाणित करता?
फिर: वह यह दिखाना चाहता था कि उसका प्रेम निःस्वार्थ है, क्योंकि यीशु हमारे लिये मित्रों के रूप में नहीं, बल्कि बैरियों के रूप में मरा। जब हम बैरी ही थे, तभी वह हमारे लिये मरा। इस बात पर पौलुस संकेत करता है कि “किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो दुर्लभ है, परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी हियाव करे।” परन्तु हमारी जाति भले होने से जितनी दूर हो सकती थी उतनी दूर थी। वास्तव में वे धर्मी भी नहीं थे, बल्कि पूरी रीति से दुष्ट थे। किसी अत्यन्त प्रिय मित्र के लिये कोई मरने को तैयार हो सकता है। ऐसे सैनिक हुए हैं जिन्होंने किसी प्रिय अफ़सर का प्राण बचाने के लिये मृत्यु का तीर अपनी छाती पर ले लिया; परन्तु ऐसे मनुष्य के लिये जो केवल न्यायी है और भला तक नहीं, यह बलिदान मुश्किल से ही किया जा सकता है। फिर किसी बैरी के लिये तो कितना कम! इसमें हम देख सकते हैं कि “परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से” कितनी अधिकता से “प्रगट करता है, कि जब हम बैरी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।” इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान दीजिए कि हमारे प्रति परमेश्वर का यह प्रेम आदर या प्रसन्नता का प्रेम नहीं हो सकता, क्योंकि हम में ऐसे प्रेम का कोई आधार नहीं है। यह निःस्वार्थ परोपकार के प्रेम के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। इस प्रेम पर सन्देह किया गया था। शैतान ने अदन में इस पर सन्देह उठाया था। उसने ढिठाई से यह संकेत किया, “क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस बाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?” वह तुम्हें ऐसे सुख से क्यों वंचित रखना चाहेगा? इस प्रकार उस पुराने
साँप ने परमेश्वर के परोपकार पर सन्देह डालने का यत्न किया। इसलिए परमेश्वर के लिये अपने प्रेम को सच्चा प्रमाणित करने का और भी अधिक कारण था।
वह इस प्रेम की महान प्रबलता को भी प्रगट करना चाहता था। हम समझते कि हमने प्रबल प्रेम का प्रमाण दिया है—यदि हम अपने मित्र को बहुत बड़ी धनराशि दे देते। परन्तु किसी प्रिय पुत्र को मरने के लिये सौंप देने की तुलना में कोई भी धनराशि क्या है? आह, निश्चय ही यह सब से बढ़कर प्रेम है, अपार रूप से अद्भुत, कि यीशु ने न केवल परिश्रम किया और दुःख उठाया, बल्कि सचमुच मर भी गया! क्या कभी ऐसा प्रेम हुआ है?
फिर: परमेश्वर ने मनुष्यों के प्रति अपने प्रेम के नैतिक स्वरूप को, और विशेष करके उसके न्याय को, प्रगट करने का भी उद्देश्य रखा। जब तक उसका शासन सुरक्षित न हो जाए और उसकी व्यवस्था का उचित आदर न हो जाए, तब तक वह दोषियों पर कृपा नहीं दिखा सकता था। वह जानता था कि इस बलिदान के बिना क्षमा करना सुरक्षित नहीं हो सकता।
परमेश्वर को अपने सिंहासन का आदर बनाए रखना ही था। उसे यह दिखाना ही था कि वह पाप की ओर से कभी आँख नहीं मूँद सकता। उसने विश्व के सामने पाप को सार्वजनिक रूप से डाँटने की गम्भीर आवश्यकता अनुभव की। यह डाँट और भी अधिक अर्थपूर्ण थी क्योंकि यीशु स्वयं निष्पाप था। निःसन्देह यह देखा जाना चाहिए कि—उसकी मृत्यु में परमेश्वर उसके अपने पाप पर क्रोध नहीं दिखा रहा था, बल्कि उन लोगों के पाप पर जिनके पापों को उसने उठा लिया और जिनके स्थान पर वह खड़ा हुआ।
इससे पाप के प्रति परमेश्वर की घृणा प्रगट होती है, क्योंकि यीशु हमारे प्रतिनिधि के रूप में खड़ा था। जब वह इस स्थिति में खड़ा था, तब परमेश्वर उसे न छोड़ सका, बल्कि हमारे अधर्म की ताड़ना उस पर डाल दी। आह, वह पाप की कैसी डाँट थी! इसने कैसे अर्थपूर्ण ढंग से दिखाया कि परमेश्वर पाप से घृणा करता है, फिर भी पापी से प्रेम करता है! ये उन महान उद्देश्यों में से थे जो उसके सामने थे—कि हमारे प्राणों में यह दोहरा बोध उत्पन्न करे: हमारे प्रति उसके प्रेम का, और उसके विरुद्ध हमारे पाप का। वह इन बोधों को दृढ़ और स्थायी बनाना चाहता था। इसलिए वह क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु को हमारी आँखों के सामने रखता है—जो किन्हीं भी मात्र शब्दों से कहीं अधिक अर्थपूर्ण बात है। यह कहना कि वह हम से प्रेम करता है, इस प्रकटीकरण की प्रबलता और प्रभाव के आस-पास भी नहीं पहुँच सकता था। किसी और रीति से वह इसे इतना वास्तविक—इतना मर्मस्पर्शी और इतना अभिभूत कर देनेवाला—नहीं दिखा सकता था। इस प्रकार वह इसे हमारे ध्यान के योग्य ठहराता है। इस प्रकार वह हमें इसे देखने का निमन्त्रण देता है। वह हमें बताता है कि स्वर्गदूत भी इसे ध्यान से देखने की लालसा रखते हैं। वह चाहता है कि हम इस महान तथ्य को तौलें, इसके सब पहलुओं की जाँच करें, जब तक कि यह अपनी उद्धार देनेवाली सामर्थ के साथ हमारे प्राणों पर पूरी रीति से न छा जाए। वह इसे हमारे सामने इसलिए प्रगट करता है कि उसका उत्तर प्रेम से दिया जाए, मानो वह हमें उससे प्रेम करने को उकसाना चाहता है जिसने हम से ऐसा प्रेम किया है। निःसन्देह वह चाहता है कि हम इस प्रेम को समझें और इसका मूल्य पहचानें, ताकि बदले में हम उत्तर देनेवाले प्रेम से इसका प्रतिफल दें। यह हमारे लिये एक उदाहरण है कि हम अपने बैरियों से प्रेम करें, और अपने भाइयों से तो और भी अधिक। आह, जब इस प्रेम ने हमारे हृदयों पर अपना प्रभाव डाला है, तब हम कितनी गहराई से अनुभव करते हैं कि हम किसी ऐसे व्यक्ति से घृणा नहीं कर सकते जिसके लिये मसीह मरा! तब अपने पड़ोसी को स्वार्थ से धक्का देकर हटाने के बदले, और उस भलाई को हड़पने के बदले जिस पर उसका दावा हमारे जितना ही बड़ा है, हम उससे ऐसे गहरे और ऐसे शुद्ध प्रेम से प्रेम करते हैं कि हमारे हृदय में उसकी कोई हानि करने की बात आ ही नहीं सकती।
इस प्रकार यह ईश्वरीय उद्देश्य का एक भाग था कि हमें दिखाए कि सच्चा प्रेम क्या है। जैसा किसी ने प्रार्थना में कहा, “हे पिता, हम तेरा धन्यवाद करते हैं कि तू ने हमें प्रेम करना सिखाने के लिये अपना पुत्र हमें दे दिया।”
हाँ, परमेश्वर हमें यह बताना चाहता था कि वह स्वयं प्रेम है, और इसलिए यदि हम उसकी सन्तान होना चाहें, तो हमें भी उससे प्रेम करना होगा और एक दूसरे से प्रेम करना होगा। वह अपने प्रेम को इस प्रकार प्रगट करना चाहता था कि हमें अपने साथ सहानुभूति में खींच ले और हमें अपने समान बना दे। क्या आप नहीं समझते कि मसीह में प्रगट हुए परमेश्वर के प्रेम पर भली भाँति विचार करना वास्तव में हमें सिखाता है कि प्रेम क्या है, और हमारे प्राणों को ऐसे प्रेम में खींच लाने का काम करता है? प्राय: यह प्रश्न पूछा जाता है—मैं
कैसे प्रेम करूँ? इसका उत्तर इस उदाहरण में दिया गया है। प्रेम इसी में है! इसे देखिए और इसकी आत्मा को पी लीजिए।
मनुष्य स्वभाव से अपने आप से सब से बढ़कर प्रेम करने की ओर झुका रहता है। परन्तु यहाँ उससे बिलकुल ही भिन्न प्रकार का प्रेम है।
यह प्रेम इस बात से अपने आप को प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे, तभी मसीह हमारे लिये मरा। यह हमारे स्वार्थ को कितनी प्रबलता से डाँटता है! हमारे संकीर्ण स्वार्थ को वश में करने के लिये, और हमारे अविश्वास को लज्जित करने के लिये, हमें इस पाठ की कितनी आवश्यकता है!
कितनी विचित्र बात है कि मनुष्य परमेश्वर के प्रेम को वास्तविक रूप में अनुभव नहीं करते! एक पादरी की पत्नी ने, जिसने स्वयं भी बहुत सी जागृतियों में परिश्रम किया था, मुझ से कहा, “कुछ ही दिन पहले तक मैं कभी नहीं जानती थी कि परमेश्वर प्रेम है।” मैंने कहा, “आपका क्या अर्थ है?” “मेरा अर्थ यह है कि इससे पहले मैंने इसे इसके सब पहलुओं में कभी नहीं समझा था।” आह, मैं आपको निश्चय दिलाता हूँ, यह एक महान और धन्य सत्य है, और इसे जैसा यह है वैसा ही देख लेना एक बड़ी बात है! जब यह प्राण के लिये वास्तविकता बन जाता है, और आप इसकी प्रबल सहानुभूति के अधीन आ जाते हैं, तब आप पाएँगे कि सुसमाचार सचमुच उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ है। पौलुस ने इफिसुस के अपने नए विश्वासियों के लिये प्रार्थना की कि वे “सब पवित्र लोगों के साथ भली भाँति समझने की शक्ति पाएँ कि उसकी चौड़ाई, और लम्बाई, और गहराई, और ऊँचाई कितनी है; और परमेश्वर के उस प्रेम को जान सकें जो ज्ञान से परे है, कि वे परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाएँ।”
इस प्रकार हम पर अपना प्रेम प्रगट करके, परमेश्वर ने हमारे दासत्व के भय को वश में करना चाहा। किसी ने कहा, “जब मैं जवान था, तब मुझे यह तो ज्ञात था कि मैं परमेश्वर से डरता हूँ, परन्तु मैं जानता था कि मैं उससे प्रेम नहीं करता। जो शिक्षा मुझे मिली उसने मुझे डरना तो सिखाया, परन्तु प्रेम करना नहीं।” जब तक हम परमेश्वर के विषय में केवल ऐसा ही सोचते हैं कि वह डरने के योग्य है, प्रेम करने के योग्य नहीं, तब तक उसके विरुद्ध यह पूर्वाग्रह बना रहेगा कि वह मित्र से अधिक बैरी है। हर पापी जानता है कि वह इस योग्य है कि परमेश्वर उससे घृणा करे। वह स्पष्ट देखता है कि परमेश्वर के पास उससे अप्रसन्न होने का उचित कारण अवश्य होगा। स्वार्थी पापी परमेश्वर को अपने ही अनुसार आँकता है। यह जानते हुए कि जिसने उसके साथ अन्याय किया हो उसके प्रति वह स्वयं कैसा अनुभव करता, वह अनजाने में यह निष्कर्ष निकाल लेता है कि परमेश्वर भी हर पापी के प्रति ऐसा ही अनुभव करता होगा। जब वह प्रार्थना करने का यत्न करता है, तो उसका हृदय साथ नहीं देता; वह केवल आतंक ही आतंक है। वह परमेश्वर की ओर कोई आकर्षण, कोई सच्चा प्रेम अनुभव नहीं करता। सन्तान की आत्मा परमेश्वर के सामने आती है, रोती हुई तो अवश्य, परन्तु प्रेम और भरोसा रखती हुई। अब भावना की वह दशा, जो केवल डरती है, परमेश्वर बड़ी लालसा से दूर करना चाहता है, और हमें उसे बिलकुल अपने ही समान नहीं समझना चाहिए। वह हमारा भ्रम दूर करना चाहता है और हमें यह अनुभव कराना चाहता है कि यद्यपि वह हमारे विरुद्ध बोला है, फिर भी वह हमें अब तक दृढ़ता से स्मरण करता है। वह चाहता है कि हम उसके व्यवहारों का अर्थ निष्पक्षता से और बिना पूर्वाग्रह के लगाएँ। वह देखता है कि जब वह मनुष्यों की योजनाओं को विफल करता है, तो वे उसे गलत समझने पर कैसे तुले रहते हैं। वे यही सोचेंगे कि उसे उनके कल्याण की कोई परवाह नहीं, और वे इस बहुमूल्य सत्य की ओर से अंधे रहते हैं कि वह उनके प्रति अपने सब मार्ग प्रेम और करुणा से ठहराता है। वह हमें इस प्रकार निर्णय करने की ओर ले जाना चाहता है कि यदि परमेश्वर ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये सेंत-मेंत दे दिया, तो वह और सब वस्तुएँ भी हमें और भी अधिक सेंत-मेंत देगा।
फिर भी: वह हमें इस ओर ले जाना चाहता है कि हम प्रेम से उसकी सेवा करें, दासत्व में नहीं। वह हमें परमेश्वर के पुत्रों की स्वतंत्रता में खींच लाना चाहता है। उसे हृदय की आज्ञाकारिता देखना प्रिय है। वह इतना प्रेम उत्पन्न करना चाहता है कि हमारी सारी सेवा स्वतंत्र, प्रसन्न और आनन्द से भरी हो। यदि आप चाहते हैं कि दूसरे आप से प्रेम करें, तो आपको उन्हें अपना प्रेम देना होगा। अपने सेवकों को अपने हृदय का प्रेम दिखाइए, तो आप उनका दासत्व तोड़ देंगे, और उनकी सेवा को प्रेम की सेवा बना देंगे। इसी रीति से परमेश्वर हमारे प्रति अपना प्रेम प्रगट करता है, ताकि हमारे हृदयों को अपनी ओर जीत ले, और इस प्रकार हमें अपने अनन्त घर में सदा वास करने के लिये तैयार और योग्य बना दे। उसका अन्तिम उद्देश्य हमें हमारे पापों से बचाना है, ताकि वह हमें सदा के लिये अपने ही आनन्द और शान्ति से भर दे।
1. हम देखते हैं कि उद्धार देनेवाला विश्वास इस महान तथ्य पर हृदय का विश्वास होना चाहिए कि परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया। उद्धार देनेवाला विश्वास मसीह की मृत्यु को हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण करता है। और किसी प्रकार का विश्वास—किसी और बात पर विश्वास—हमारे हृदय को परमेश्वर से प्रेम करने के लिये नहीं जीतता। उद्धार देनेवाला विश्वास हमें हमारे दासत्व से और उसके विरुद्ध हमारे पूर्वाग्रह से बचाता है। यही बात उसे उद्धार देनेवाला बनाती है। कोई भी विश्वास जो इस महान सत्य को छोड़ देता है, हमें बचाने में अवश्य असफल होगा। यदि विश्वास का कोई एक तत्व प्राणाधार है, तो वह यही है। कोई मनुष्य मसीह में परमेश्वर के प्रेम के इस तथ्य पर सन्देह करे, तो मैं उसके सारे धर्म का कुछ भी मूल्य न दूँगा। वह निकम्मा है।
2. पुराने नियम की व्यवस्था इसी विचार से भरी है। वे सब लहू वाले बलिदान इसी से भरे हैं।
जब याजक सब लोगों की ओर से आगे आता और निर्दोष बलिपशु के सिर पर अपना हाथ रखता, और फिर अपने पापों और सब के पापों को मान लेता, और फिर जब यह पशु बलि किया जाता और उसका लहू प्रभु के सामने उण्डेला जाता, और वह ऐसे चिह्न देता कि उसने चढ़ावे को ग्रहण कर लिया है, तो यह इस बात का गम्भीर प्रकटीकरण था कि परमेश्वर ने पापी को मिलनेवाले दुःखों के स्थान पर एक निर्दोष मेम्ने की मृत्यु को रख दिया। उस प्राचीन व्यवस्था में आरम्भ से अन्त तक हम यही विचार पाते हैं, जो दिखाता है कि परमेश्वर कैसे चाहता था कि मनुष्य अपने निज प्रिय पुत्र के दान में उसके प्रेम को देखें।
3. मनुष्यों को पश्चाताप करना और परमेश्वर के अधीन होना इतना कठिन लगने का एक बड़ा कारण यह है कि वे इस महान तथ्य को ग्रहण नहीं करते—इसे सरल विश्वास से स्वीकार नहीं करते। यदि वे इसे स्वीकार कर लें और इसे अपने हृदयों तक पहुँचने दें, तो यह अपने साथ ऐसी सामर्थ लाएगा जो हृदय को वश में करके अधीनता और प्रेम तक ले आएगी।
4. जवान पुरुषों के इतना डरने का, कि कहीं वे सेवकाई के लिये बुलाए न जाएँ, एक कारण यह है कि उन्हें इस प्रेम पर भरोसा नहीं है। आह, यदि वे इस महान प्रेम को देखते और इस पर विश्वास करते, तो निश्चय ही वे अस्सी करोड़ लोगों को इस सुसमाचार से अनजान रहते हुए नरक में जाने न देते! आह, इससे उनका हृदय कैसी वेदना से भर जाता कि इतने सारे लोग अपनी कब्रों में और अनन्त नरक में चले जाएँ, और अपने नाश होते प्राणों के प्रति यीशु के प्रेम को कभी न जानें! और फिर भी यहाँ एक जवान पुरुष है जिसके लिये मसीह मरा है, जो जाकर उन्हें यह बताना सह नहीं सकता कि उनका एक उद्धारकर्ता है! उसकी उदारता के विषय में आप क्या सोचते हैं? उसका हृदय मसीह के हृदय के कितना समान है? क्या आपको आश्चर्य होता है कि पौलुस चुप न रह सका, बल्कि उसने अनुभव किया कि उसे पृथ्वी की छोर तक जाकर उस नाम का प्रचार करना ही है, अर्थात्
यीशु के नाम का, जहाँ वह पहले कभी नहीं जाना गया था? उसने कितनी गहराई से अनुभव किया कि उसे बड़े आनन्द का यह सुसमाचार संसार को बताना ही है! कितनी आश्चर्य की बात है कि आज जवान पुरुष सुसमाचार को अनजाना ही मर जाने दे सकते हैं और खोए हुओं को आशीष देने के लिये निकलकर नहीं जाते! आह, क्या उन्होंने कभी इसकी धन्यता का स्वाद चखा है? क्या उन्होंने कभी इसकी सामर्थ को जाना है? और क्या आप गम्भीरता से इसे छिपाए रखने का विचार रखते हैं, ताकि यह आपके मरते हुए भाइयों को कभी आशीष न दे?
5. परमेश्वर के प्रेम को प्रगट करने की यह रीति सब से प्रबल और सब से अर्थपूर्ण है जिसे वह काम में ला सकता था। किसी और सम्भव रीति से वह हमारी जाति के प्रति अपने महान प्रेम को इतनी प्रबलता से प्रमाणित नहीं कर सकता था।
इसलिए, यदि यह मनुष्यों के बैर, पूर्वाग्रह और अविश्वास को वश में करने में असफल हो जाए, तो और क्या काम आ सकता है?
जब यह निष्फल सिद्ध हो जाए, तो इसके बाद वह कौन से उपाय काम में लाए? बाइबल पूछती है, “तो हम लोग ऐसे बड़े उद्धार से निश्चिन्त रहकर क्योंकर बच सकते हैं?” वह यह अपील ठीक ही करती है, क्योंकि यदि यह हमें जीतने में असफल हो जाए, तो और क्या सफल हो सकता है?
6. यदि हम उसके मित्र होते, तो उसे हमारे लिये मरने की कोई आवश्यकता न होती। केवल इसी कारण कि हम पापी ही थे, वह हमारे लिये मरा। तो फिर हमारे हृदयों पर इस प्रेम का दावा कितना बड़ा है!
7. पापी प्रायः सोचते हैं कि परमेश्वर उनसे प्रेम नहीं कर सकता। इसलिए वे कुछ भले काम करके उसका प्रेम जीतने का यत्न करते हैं। वे हर ऐसी रीति से यत्न करते हैं कि परमेश्वर उनसे प्रेम करने लगे, और विशेष करके अपने हृदयों के बदले अपने आचरण को सुधारकर। हाय, वे यह जानते ही नहीं जान पड़ते कि उनका पाप में इतना नीचे गिर जाना ही वह बात है जो परमेश्वर के हृदय को उसकी नींव तक हिला रही है! एक निष्पाप स्वर्गदूत परमेश्वर की प्रसन्नता का आनन्द लेता है, परन्तु उसकी दया का नहीं; वह दया का पात्र नहीं है, और उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। एक भले बच्चे के विषय में भी यही सच है। उसे अपने माता-पिता की प्रसन्नता मिलती है, परन्तु उनकी करुणा नहीं।
परन्तु मान लीजिए कि यह बच्चा दुराचारी हो जाता है। तब उसके माता-पिता उसके पतन पर शोक करते हैं, और उनकी करुणा उमड़ पड़ती है। जब वे उसे दुराचार, अपराध और पतन की गहराइयों में उतरते देखते हैं, तो वे दया और चिन्ता के साथ उसकी ओर देखते हैं। ज्यों-ज्यों वह पाप की गन्दगी और घृणित कामों में नीचे और नीचे धँसता जाता है, त्यों-त्यों वे उसके लिये और अधिक शोक करते हैं; और जब वे देखते हैं कि वह कितना बदल गया है, तो वे आँसू बहाते हुए खड़े रहकर कहते हैं—हाय, यह हमारा बेटा है, हमारा कभी का आदरणीय बेटा! परन्तु अब कैसा गिर गया है! उसके लिये हमारा मन भर आता है, और यदि हम उसे बचा सकें, तो ऐसा कुछ नहीं जो हम न करें या न सहें!
इसी प्रकार पापी का बड़ा पतन उसके ईश्वरीय पिता की करुणा को उसकी गहराइयों तक उमड़ा देता है। जब प्रभु पास से होकर जाता है और उसे खुले मैदान में अपने लहू में लोटता हुआ देखता है, तो वह कहता है—वह मेरा पुत्र है! वह अपने सृजनहार का स्वरूप धारण किए हुए है। “जब जब मैं उसके विरुद्ध बातें करता हूँ,
तब तब मुझे उसका स्मरण दृढ़ता से होता है; इसलिये मेरा मन उसके कारण भर आता है; और मैं निश्चय उस पर दया करूँगा, यहोवा की यही वाणी है।” पापियों को स्मरण रखना चाहिए कि उनका पापी होना ही वह बात है जो परमेश्वर की करुणा और दया को उभारती है। क्या आप कहते हैं—मैं नहीं देखता कि परमेश्वर मुझ जैसे पापी को क्षमा करने और उससे प्रेम करने को अपनी पवित्रता के अनुकूल कैसे बना सकता है?
मैं आपको बता सकता हूँ कि कैसे—आपके स्थान पर मरने के लिये अपने निज पुत्र को देकर!
8. मसीह हमारे लिये इसलिए मरा कि वह हमें हमारे पापों में नहीं, वरन् हमारे पापों से बचाए। तो क्या यह उसे अत्यन्त दुःख न देता होगा कि हम पाप में बने रहें? आप क्या सोचते हैं? मान लीजिए कि आप यीशु को आमने-सामने देखें, और वह आपको अपने हाथों और अपनी पसली के वे घाव दिखाए, और कहे—मैं तेरे लिये इसलिए मरा क्योंकि मैंने तुझे आशा से परे खोया हुआ देखा, और क्योंकि मैं तुझे तेरे पापों से बचाना चाहता था; और अब, क्या तू उन पापों को फिर दोहराएगा? क्या तू अब भी मेरे विरुद्ध पाप करता चला जा सकता है?
9. हमारे विषय से आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यदि आप सचमुच पश्चाताप करें और यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करें, तो वह आपको क्रोध से बचाने को अवश्य तैयार होगा। आप इस पर सन्देह कैसे कर सकते हैं? जब उसने इसी उद्देश्य के लिये मृत्यु तक दुःख उठाया है, तो निश्चय ही अब केवल यह शेष है कि आप शर्तों को पूरा करें, और आप उसके द्वारा क्रोध से बच जाएँगे।
10. आप यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि परमेश्वर, जिसने अपने पुत्र को भी न रख छोड़ा, उसके साथ आपको और सब कुछ भी सेंत-मेंत देगा: आपकी सब आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पर्याप्त अनुग्रह; अपने विधान की कृपालु देखभाल;
अपने हृदय का प्रेम; हर वह वस्तु जिसकी आपको आवश्यकता हो सकती है। ऐसे अनुग्रह और प्रेम के होते हुए भी पाप में बने रहना कितनी भयानक बात होगी! यह उसके हृदय को अत्यन्त दुःख देता होगा।
मेरे एक मित्र, जिनके अधीन एक सुधार-विद्यालय में एक सौ पचास लड़के हैं, उनका यह नियम है कि जब लड़के बुरा व्यवहार करते हैं, तो वे उन्हें कुछ समय के लिये रोटी और पानी पर रखते हैं। आप क्या सोचते हैं कि इनमें से कुछ मामलों में वे स्वयं क्या करते हैं? वे जाकर स्वयं भी उनके साथ रोटी और पानी पर रहने लगते हैं! विद्यालय के लड़के यह देखते हैं, और वे अपने अधीक्षक और पिता से प्रेम करना सीखते हैं। अब, जब वे अपराध करने की परीक्षा में पड़ते हैं, तो उन्हें अपने मन में कहना ही पड़ता है, “यदि मैं गलत काम करूँ, तो मुझे रोटी और पानी पर रहना पड़ेगा; परन्तु सब से बुरी बात यह है कि मेरे पिता आकर मेरे साथ और मेरे कारण रोटी और पानी खाएँगे; और मैं यह कैसे सह सकता हूँ? मैं यह कैसे सह सकता हूँ कि मेरे पिता, जो मुझ से इतना प्रेम करते हैं, मेरे कारण अपने आप को रोटी और पानी तक सीमित कर लें!”
इसी प्रकार यीशु ने अपने आप को पीड़ा और लज्जा और मृत्यु के अधीन कर दिया, ताकि आपको आनन्द और जीवन मिले—ताकि आप क्षमा किए जाएँ और पाप करने से बचाए जाएँ; और अब क्या आप और अधिक पाप करते चले जाएँगे? क्या आपके पास उसके मरते हुए प्रेम का मूल्य पहचानने के लिये कोई हृदय नहीं है? क्या आप कलवरी पर आपको दिखाए गए उस सारे प्रेम के बावजूद, उससे तनिक भी कम न होकर, और भी अधिक पाप करते चले जा सकते हैं?
आप समझते हैं कि मसीह आपको पाप से छुड़ाने के लिये मरा। मान लीजिए कि आपकी अपनी आँखें उसे आमने-सामने देखें, और वह आपको वह सब बताए जो उसने आपके लिये किया है। बहन, वह कहता है, मैं तुझे उस पाप से बचाने के लिये मरा; क्या तू उसे फिर करेगी? क्या तू ठीक वैसे ही पाप करती चली जा सकती है मानो मैं तेरे लिये कभी मरा ही न था?
जिस सुधार-विद्यालय की मैंने चर्चा की, उसमें सब से बुरे लड़कों पर भी, उन्हें दिखाए गए प्रेम से जो प्रभाव उत्पन्न होते हैं, वे सचमुच आश्चर्यजनक हैं। अधीक्षक लम्बे समय से इस बात पर अड़े रहे थे कि उन्हें अपने लड़कों को बन्द रखने के लिये तालों और सलाखों की आवश्यकता नहीं है। निदेशकों ने कहा था—आपको उन्हें ताले में बन्द करना ही होगा; यदि आप ऐसा न करेंगे तो वे भाग जाएँगे। एक अवसर पर अधीक्षक को दो सप्ताह के लिये बाहर जाना था। एक निदेशक उनके पास आया और आग्रह करने लगा कि जाने से पहले उन्हें लड़कों को ताले में बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति में वे निश्चय भाग जाएँगे। अधीक्षक ने उत्तर दिया—मैं ऐसा नहीं सोचता; मुझे उन लड़कों पर भरोसा है। परन्तु, निदेशक उत्तर देता है, हमें कोई ज़मानत दीजिए।
क्या आप अपने नगर के भूखण्ड को इस शर्त पर गिरवी रखने को तैयार हैं कि यदि वे भाग जाएँ, तो वह भूखण्ड सुधार-विद्यालय कोष का हो जाएगा? थोड़ा सोचने के बाद वे मान जाते हैं, “यदि मेरे जाने के बाद मेरा कोई लड़का भाग जाए, तो मैं अपना भूखण्ड—संसार में जो थोड़ी सी सम्पत्ति मेरे पास है, वह सब—आपको दे दूँगा।” जाने से पहले वे सब लड़कों को इकट्ठा करते हैं; उन्हें अपनी इस गिरवी के विषय में समझाते हैं; उनसे कहते हैं कि वे उनके आश्रित परिवार को देखें, और फिर उनके सम्मान और उनके प्रति उनके प्रेम से अपील करते हैं। “क्या तुम मुझे मेरी सारी सम्पत्ति से वंचित होते देखना चाहोगे? मैं समझता हूँ कि मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ।” वे चले गए; और एक शनिवार की रात कुछ अचानक और देर से लौटे। अभी वे आँगन में घुसे ही थे कि सोते हुए कमरों में यह बात गूँज उठी, “हमारे पिता आ गए हैं!” और लगभग पल भर में वे सब वहाँ पहुँचकर उनका स्वागत करते हुए चिल्ला रहे थे, “हम सब यहीं हैं! हम सब यहीं हैं!”
क्या मसीह के प्रेम में इतनी सामर्थ नहीं हो सकती? क्या सुधार-विद्यालय के लड़कों का अपने पदाधिकारी पिता के प्रति प्रेम उसकी अनुपस्थिति के लम्बे दिनों और रातों में उन्हें अपने स्थान पर टिकाए रखे; और क्या हमारे प्रति मसीह का प्रेम हमें पाप करने से न रोके? आप क्या कहते हैं?
क्या आप ऐसा कहेंगे? “यदि मसीह मुझ से इतना प्रेम करता है, तो स्पष्ट है कि वह मुझे नरक में नहीं भेजेगा, और इसलिए मैं जितना चाहूँ पाप करता चला जाऊँगा।” क्या आप यह कहते हैं? तब आपके लिये कोई आशा नहीं है। जो सुसमाचार आपको बचाना चाहिए, वह आपके लिये इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता कि आपको नैतिक और अनन्त विनाश में और भी गहरा डुबो दे। आपने इसे अपने पूर्ण सर्वनाश के लिये बिगाड़ने की पूरी ठान ली है! यदि वे
सुधार-विद्यालय के लड़के ऐसा कहते, “हमारे पिता हम से इतना प्रेम करते हैं कि वे हमारे साथ रोटी और पानी खाएँगे, और इसलिए हम जानते हैं कि वे हमें हानि पहुँचाने के लिये दण्ड नहीं देंगे,” तो क्या वे निश्चय ही अपने ऊपर शाप न ले आते? क्या उनका सुधार पूरी रीति से आशाहीन न हो जाता? ऐसा ही उस पापी का हाल है जो उद्धारकर्ता के मरते हुए प्रेम को तुच्छ समझ सकता है। आह, क्या यह सम्भव है कि जब यीशु आपके प्राण को पाप से और नरक से बचाने के लिये आपके लिये मर गया है, तब भी आप उसे फिर और फिर कर सकें? क्या आप केवल इसलिए और भी अधिक पाप में जीते रहेंगे कि उसने आप से इतना प्रेम किया है?
इस पर विचार कीजिए और अपना मन पक्का कर लीजिए। “यदि मसीह मुझे पाप से छुड़ाने के लिये मरा है, तो अब से और सदा के लिये सब पाप करना दूर हो; मैं इसी घड़ी से अपने सब पापों को त्याग देता हूँ! मैं अपने छुड़ानेवाले के साथ जीने या मरने की सामर्थ रखता हूँ; क्यों नहीं? परमेश्वर मेरी सहायता करे। मेरे पास और कुछ नहीं है।
