उपदेश 26 (31 में से)

19. बड़ी कटनी को इकट्ठा करने के लिए प्रार्थना और परिश्रम

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19. बड़ी कटनी को इकट्ठा करने के लिए प्रार्थना और परिश्रम।

19. बड़ी कटनी को इकट्ठा करने के लिए प्रार्थना और परिश्रम।

“जब उस ने भीड़ को देखा तो उस को लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों की नाईं जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए से थे। तब उस ने अपने

चेलों से कहा, पक्के खेत तो बहुत हैं पर मजदूर थोड़े हैं। इसलिये खेत के स्वामी से बिनती करो, कि वह अपने खेत काटने के लिये मजदूर भेज दे।”—मत्ती 9:36-38।

इस विषय पर विचार करते हुए, मेरा प्रस्ताव है कि मैं—I. यह विचार करूँ कि यह आज्ञा किसे दी गई है; II. इसका अर्थ क्या है; III. जिस प्रार्थना की माँग की गई है उसमें क्या-क्या निहित है; IV. यह दिखाऊँ कि मन की वह दशा, जिसमें इस आज्ञा का पालन निहित है, उद्धार की एक अनिवार्य शर्त है।

I. यह आज्ञा किसे दी गई है। निःसन्देह यह आज्ञा उन सब को दी गई है जिन पर परोपकारी होने का दायित्व है; अतः उन सब वर्गों और उन सब प्राणियों को जिन पर प्रेम की व्यवस्था लागू की गई है। परिणामस्वरूप, यह सब मनुष्यों को दी गई है, क्योंकि जो कोई मनुष्य है वह नैतिक उत्तरदायित्व रखता है—उसे अपने संगी मनुष्यों के प्राणों की चिन्ता करनी चाहिए, और इसलिए वह स्वाभाविक रूप से इस माँग के व्यापक दायरे में आ जाता है।

मसीह के इस कथन के अवसर पर ध्यान दीजिए। वह अपने देश के नगरों और गाँवों में फिरता हुआ, “उन की सभाओं में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता” था। उसने अपने सामने भीड़ की भीड़ देखी, जो अधिकतर परमेश्वर और उद्धार के विषय में घोर अज्ञान में थी; और उसका अत्यन्त करुणामय हृदय द्रवित हो उठा, “क्योंकि उसने देखा कि वे उन भेड़ों की नाईं जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए थे।”

हाय! वे स्वर्ग की रोटी के अभाव में नाश हो रहे थे, और कौन जाकर उसे तोड़कर उनके भूखे प्राणों को देता?

उसकी भावनाएँ इसलिए और भी अधिक उमड़ पड़ीं क्योंकि उसने देखा कि वे भूख का अनुभव कर रहे थे। वे न केवल जीवन की रोटी के लिए भूखों मर रहे थे, वरन् ऐसा प्रतीत होता था कि उन्हें इस बात का कुछ बोध भी था।

उस समय वे ठीक कटनी के उस खेत की दशा में थे, जिसका पका हुआ सफ़ेद अन्न हँसिये के लिए तैयार है और काटनेवालों के आने की बाट जोह रहा है। इसी प्रकार वह भीड़ कटनी के महान स्वामी के खत्ते में बटोरे जाने को तैयार थी। कोई आश्चर्य नहीं कि इस दृश्य ने उसके परोपकारी हृदय की गहरी से गहरी करुणा को छू लिया।

II. इस आज्ञा का वास्तविक अभिप्राय क्या है, “खेत के स्वामी से बिनती करो, कि वह अपने खेत काटने के लिये मजदूर भेज दे?”

बाहरी आचरण से सम्बन्ध रखनेवाली हर आज्ञा की एक आत्मा होती है और एक अक्षर भी; अक्षर का सम्बन्ध बाहरी बात से है, पर आत्मा का भीतरी बात से; फिर भी सच्चे आज्ञापालन में दोनों सम्मिलित हैं। प्रस्तुत विषय में, आज्ञा का अक्षर प्रार्थना की माँग करता है; पर कोई यह न समझे कि केवल प्रार्थना के शब्द बोल देना ही सच्चा आज्ञापालन है। शब्दों के अतिरिक्त मन की प्रार्थनामय दशा भी होनी चाहिए। यह आज्ञा हमसे यह माँग नहीं करती कि हम परमेश्वर के सामने झूठ बोलें और कपटी बनें। कोई भी क्षण भर के लिए भी ऐसा नहीं मान सकता। इसलिए यह मानना ही पड़ेगा कि यह आज्ञा अक्षर के साथ-साथ प्रार्थना की आत्मा की भी माँग करती है। मूल्य की दृष्टि से पहले यह मन की प्रार्थनामय दशा की माँग करती है, और फिर प्रार्थना के रूपों में उसकी उचित अभिव्यक्ति की भी।

तो फिर, इस आज्ञा की सच्ची आत्मा क्या है? उत्तर है, प्राणों के लिए प्रेम। निश्चय ही यह हमसे यह माँग नहीं करती कि हम अपनी प्रार्थना में बिना कोई हृदय लगाए मनुष्यों के लिए प्रार्थना करें; वरन् यह कि हम सच्चे हृदय से प्रार्थना करें, ऐसे हृदय से जो मनुष्यों के कल्याण के लिए सच्चे प्रेम से भरा हो—अमर प्राणों के लिए प्रेम और उनके उद्धार के लिए गहरी चिन्ता से भरा हो। निःसन्देह यह वही करुणा माँगती है जो स्वयं यीशु में प्राणों के लिए थी। उसका हृदय मरते हुए प्राणों के लिए सच्ची करुणा से उमड़ रहा था, और वह जानता था कि उसकी अपनी मन की दशा उचित थी। इसलिए वह अपने सब लोगों से इससे कम की माँग नहीं कर सकता था कि उनकी भी मन की दशा वैसी ही हो। अतः वह माँग करता है कि हम में प्राणों के लिए सच्ची और गहरी करुणा हो, ऐसी करुणा जो सचमुच हृदय को द्रवित कर दे, क्योंकि स्पष्ट है कि उसकी करुणा ऐसी ही थी।

इसमें इस लक्ष्य के प्रति प्राण का पूर्ण समर्पण सम्मिलित है। मसीह ने मनुष्यों का उद्धार करने के महान परिश्रम के लिए अपना प्राण समर्पित कर दिया था; इसी के लिए उसने परिश्रम और कठोर श्रम किया; इसी के लिए उसका हृदय वेदना से तड़पा; इसी के लिए उसका जीवन बलिदान होने को तैयार था; इसलिए वह अपने लोगों से भी इससे कम की माँग नहीं कर सकता था।

फिर, इस प्रार्थना को ईमानदारी से करने में यह निहित है कि हम इस बात के लिए तैयार हों कि परमेश्वर अपने कटनी के खेत में हमें जिस किसी भी रूप में चाहे, काम में लाए। जब किसान अपनी फसल इकट्ठी करता है, तो बहुत से काम करने होते हैं, और उन्हें करने के लिए उसे प्रायः बहुत से हाथों की आवश्यकता होती है। कुछ को वह अन्न काटने के लिए भेजता है, दूसरों को पूले बाँधने के लिए; कुछ उसे खलिहान में इकट्ठा करते हैं, और दूसरे खेत में बालें बीनते हैं, ताकि कुछ भी नष्ट न हो। इसी प्रकार मसीह के पास महान कटनी के खेत में अपने सेवकों के लिए तरह-तरह के काम होंगे; और कोई भी मनुष्य उसके लिए सचमुच उपयोगी नहीं हो सकता जब तक वह अपने स्वामी की सेवा के किसी भी विभाग में काम करने को तैयार न हो, और ऐसे स्वामी के लिए और ऐसे उद्देश्य के लिए छोटी से छोटी सेवा करने के सौभाग्य के लिए भी कृतज्ञ न हो।

अतः इस लक्ष्य के लिए ईमानदार प्रार्थना में यह निहित है कि हम सचमुच इस काम के लिए समर्पित हैं, और हमने पृथ्वी पर मसीह और उसके उद्देश्य के लिए जो कुछ हम कर सकते हैं वह सब करने के लिए अत्यन्त सच्चाई से और पूरी रीति से अपने आप को सौंप दिया है। हम सदा उपस्थित रहते हैं, किसी भी परिश्रम या किसी भी दुःख के लिए तैयार।

क्योंकि स्पष्ट है, यदि हमारा यह मन नहीं है, तो हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि हम किसी भले उद्देश्य से प्रार्थना कर रहे हैं। यह कहना तो एक तुच्छ और अपमानजनक प्रार्थना होगी, “हे प्रभु, सारा कठिन काम करने के लिए किसी और को भेज दे, और मुझे थोड़ा बहुत या कुछ भी न करने दे।” सब जानते हैं कि ऐसी प्रार्थना केवल परमेश्वर का अपमान करेगी और प्रार्थना करनेवाले पर शाप लाएगी।

अतः मसीह के उद्देश्य के लिए सच्ची प्रार्थना में यह निहित है कि आप उसके हितों को बढ़ाने के लिए जो कुछ कर सकते हैं वह सब करने को तैयार हैं, और इस लक्ष्य के लिए अपनी सारी शक्तियों और साधनों को वास्तव में और पूर्ण रूप से अर्पित कर देते हैं। आप अपनी सन्तान को भी रोक नहीं रख सकते। परमेश्वर की वेदी पर चढ़ाने के लिए कोई भी वस्तु आपको बहुत प्रिय न ठहरे।

मान लीजिए कोई मनुष्य कुछ भी न दे—अपने सब साधनों को रोक रखे और सब प्रयत्नों को दबा दे, केवल यह कहे कि वह प्रार्थना करेगा। वह प्रार्थना करने का दावा तो करता है। पर क्या आप समझते हैं कि उसकी प्रार्थना में कुछ भी हृदय है? क्या वह जो कहता है उसका अर्थ भी रखता है? क्या वह इस लक्ष्य से बाकी सब वस्तुओं से बढ़कर प्रेम करता है? कदापि नहीं। आप कभी नहीं कह सकते कि कोई जवान मसीह की कटनी के लिए जो कुछ कर सकता है वह सब कर रहा है, यदि वह खेत में काम करने के लिए जाने से इनकार करता है; और न यह कह सकते हैं कि कोई वृद्ध, परन्तु धनी, मनुष्य जो कुछ कर सकता है वह सब कर रहा है, यदि वह खेत के मजदूरों के पालन-पोषण में सहायता के लिए कुछ भी देने से इनकार करता है।

III. तो फिर, इस आज्ञा का सचमुच पालन करने में क्या-क्या निहित है?

III. तो फिर, इस आज्ञा का सचमुच पालन करने में क्या-क्या निहित है?

1. संसार के उद्धार के विषय में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का बोध। कोई भी मनुष्य इस आज्ञा का पालन करना आरम्भ ही नहीं करता जब तक वह इस बात में ऐसा व्यक्तिगत उत्तरदायित्व अनुभव न करे जो इसे उसके प्राण पर उसके अपने काम के रूप में उतार दे। उसे सचमुच यह अनुभव करना चाहिए, “यह जीवन भर के लिए मेरा काम है। इसी के लिए मुझे जीना है और अपना बल लगाना है।” इस बात में इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आप परदेश के मिशन-क्षेत्र में जाने के लिए पर्याप्त जवान हैं या नहीं, अथवा सुसमाचार की सेवकाई के योग्य हैं या नहीं; आपको उत्तरदायित्व का ऐसा बोध होना चाहिए कि आप जो कुछ कर सकते हैं वह सब प्रसन्नता से और पूरे हृदय से करें। आप लकड़ी काटने या पानी भरने का काम कर सकते हैं, चाहे आप अधिक उत्तरदायित्व वाले पदों को न भी सँभाल सकें। एक ईमानदार और समर्पित हृदय किसी भी प्रकार का परिश्रम करने को—किसी भी प्रकार का बोझ उठाने को—तैयार रहता है। जब तक आप वह हर काम करने को तैयार नहीं हैं जिसे आप सफलता और बुद्धिमानी से कर सकते हैं, तब तक आप प्रार्थनामय मन की दशा की शर्तों को पूरा नहीं करेंगे।

दूसरा तत्व प्राणों के मूल्य का बोध है। आपको गहराई से यह दिखाई देना चाहिए कि प्राण बहुमूल्य हैं—कि जब तक वे क्षमा न किए गए पाप में हैं, तब तक उनका दोष भयानक है और उनका खतरा अत्यन्त भयावह है। दाँव पर लगे हितों के मूल्य के ऐसे बोध के बिना, आप उत्कट, प्रबल अभिलाषा के साथ प्रार्थना नहीं करेंगे; और उनके दोष, खतरे और उपाय की उचित समझ के बिना, आप परमेश्वर के हस्तक्षेप करनेवाले अनुग्रह के लिए विश्वास से प्रार्थना नहीं करेंगे। वास्तव में, आपके प्राण में परमेश्वर का इतना प्रेम—पापियों के लिए परमेश्वर के प्रेम जैसा प्रेम—होना चाहिए कि आप किसी भी बलिदान या किसी भी परिश्रम के लिए तैयार हों। आपको वैसा ही अनुभव करना चाहिए जैसा परमेश्वर अनुभव करता है। उसने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने

अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो। आपको भी संसार से ऐसा प्रेम रखना चाहिए कि आपका प्रेम आपको वैसे ही बलिदान करने और वैसे ही परिश्रम करने के लिए खींच ले। प्राणों के लिए प्रेम—उसी प्रकार का प्रेम जो परमेश्वर में अपने पुत्र को मरने के लिए दे देने में था, और जो मसीह में स्वयं को बलिदान करने के लिए प्रसन्नता से नीचे उतर आने में था—परमेश्वर के हर सेवक में होना ही चाहिए, नहीं तो इस लक्ष्य के लिए उसकी प्रार्थनाओं में थोड़ा ही हृदय होगा और परमेश्वर के सामने उनमें कोई सामर्थ न होगी। प्राणों के लिए यह प्रेम उस ग्रहणयोग्य प्रार्थना में सदा निहित रहता है कि परमेश्वर अपने खेत में मजदूर भेजे। मैंने प्रायः सोचा है कि बहुत से लोग जो प्राणों के उद्धार के लिए केवल रीति से प्रार्थना करते हैं, हृदय से नहीं, उसका कारण यह है कि उनमें नाश होते हुए लोगों के प्राणों के लिए परमेश्वर के प्रेम जैसा यह प्रेम नहीं है।

इस लक्ष्य के लिए ग्रहणयोग्य प्रार्थना में यह निहित है कि इस काम को आगे बढ़ाने के लिए परमेश्वर की सामर्थ, बुद्धि और इच्छा पर भरोसा हो। कोई भी मनुष्य उस बात के लिए प्रार्थना नहीं कर सकता जिसके विषय में वह समझता है कि वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध हो सकती है, या उसकी सामर्थ से परे है, या उसकी बुद्धि के लिए बहुत उलझी हुई है। यदि आप

परमेश्वर से मजदूर भेजने की बिनती करते हैं, तो वह प्रार्थना ही यह मानकर चलती है कि आप इस काम को भली-भाँति करने की उसकी सामर्थ पर, और प्रार्थना के उत्तर में इसे आगे बढ़ाने की उसकी इच्छा पर भरोसा रखते हैं।

प्रार्थना का विचार ही यह प्रकट करता है कि आप यह समझते हैं कि यह ईश्वरीय योजना का एक भाग है—कि मसीहियों को इस महान काम को आगे बढ़ाने के लिए परमेश्वर की हस्तक्षेप करनेवाली सामर्थ और बुद्धि के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। आप तब तक प्रार्थना नहीं करते जब तक आप यह न देख लें कि परमेश्वर आपको यह सौभाग्य देता है, इस कर्तव्य की आज्ञा देता है, और आपको यह निश्चय दिलाकर इसके लिए प्रोत्साहित करता है कि यह एक आवश्यक साधन है, सफलता देने के लिए उसके अपनी सामर्थ से हस्तक्षेप करने की एक अनिवार्य शर्त है। आपको स्मरण है कि लिखा है, “इस्राएल के घराने में फिर मुझ से बिनती की जाएगी कि मैं उनके लिये यह करूँ।”

फिर, इस शर्त की आत्मा का पालन कोई नहीं करता जो अपनी पूरी शक्ति से—उत्कटता से और बड़े धीरज और आग्रह के साथ—उस आशीष के लिए प्रार्थना नहीं करता। उसे एक महान उद्देश्य का दबाव अनुभव करना चाहिए, और इसके अतिरिक्त यह भी अनुभव करना चाहिए कि परमेश्वर की हस्तक्षेप करनेवाली सामर्थ के बिना वह उद्देश्य सफल नहीं हो सकता। इन बातों के दबाव में, वह अत्यन्त उत्कट बिनतियों के साथ अपना प्राण उण्डेल देगा।

जब तक कलीसिया प्रार्थना की आत्मा से परिपूर्ण न हो, परमेश्वर अपने खेत में मजदूर नहीं भेजेगा। स्पष्ट है कि ऐसे मजदूरों के लिए प्रार्थना करने की आज्ञा में यह निहित है कि परमेश्वर प्रार्थना की अपेक्षा करता है, और जब तक वह की न जाए तब तक प्रतीक्षा करेगा। प्रार्थना उसकी योजना में ठहराए गए साधनों में से एक के रूप में आती है, और उसे किसी भी रीति से छोड़ा नहीं जा सकता। निःसन्देह प्रार्थना के उत्तर में ही परमेश्वर ने स्वर्गारोहण के बाद इतने अधिक सामर्थी पुरुषों को भेजा। कितनी स्पष्टता से प्रार्थना और परमेश्वर के विशेष हाथ ने तरसुस के शाऊल जैसे व्यक्ति को भीतर ले आकर उसे अन्यजाति संसार के पूरे-पूरे कुलों और जातियों को बुला लाने के लिए भेजा! और उसके साथ एक बड़ी सेना थी। “प्रभु आज्ञा देता है, तब शुभ समाचार सुनानेवालियों की बड़ी सेना हो जाती है।”

यह कि यह प्रार्थना विश्वास से होनी चाहिए, और परमेश्वर की सनातन प्रतिज्ञा पर निश्चय के साथ टिकी होनी चाहिए, इतना स्पष्ट है कि इसके लिए किसी प्रमाण या उदाहरण की आवश्यकता नहीं।

ईमानदार, सच्ची प्रार्थना में यह निहित है कि हम अपने आप को और अपना सब कुछ उसकी वेदी पर रख देते हैं। हमें यह अनुभव करना चाहिए कि यह हमारा काम है, और हमारी उपलब्ध शक्ति और साधन इसे आगे बढ़ाने में लगाए जाने हैं। तो फिर, केवल तभी, जब हम इस काम के लिए सौंप दिए गए हों, हम ईमानदारी से परमेश्वर से माँग सकते हैं कि वह मजदूर खड़े करे और काम को आगे बढ़ाए। जब किसी मनुष्य के होंठ कहते हैं, “हे प्रभु, मजदूर भेज;” पर उसका जीवन धीमे स्वर में यह घोषणा करता है, “मुझे इसकी कोई परवाह नहीं कि कोई जाए या न जाए; मैं इस काम में कोई सहायता नहीं करूँगा,” तो आप निश्चय ही जान लेंगे कि वह परमेश्वर के सामने केवल कपटी बन रहा है।

इससे मेरा यह अभिप्राय नहीं कि मसीह के हर ईमानदार सेवक को यह अनुभव करना ही चाहिए कि वह सेवकाई के लिए बुलाया गया है, और उसे उसमें प्रवेश करना ही चाहिए; कदापि नहीं; क्योंकि परमेश्वर हर भक्त मनुष्य को इस क्षेत्र में नहीं बुलाता, वरन् उसके पास बहुत से अन्य क्षेत्र और काम हैं जो उस महान सम्पूर्ण के आवश्यक अंग हैं। मुझे जो बात कहनी है वह यह है कि परमेश्वर की व्यवस्था हमें जो भी भाग सौंपे, हमें उसके लिए तैयार रहना चाहिए।

जब हम जा सकते हैं, और ऐसी स्थिति में हैं कि आवश्यक शिक्षा प्राप्त कर सकें, तब हमारे पाठ की प्रार्थना की सच्ची आत्मा में यह निहित है कि हम यह प्रार्थना करें कि परमेश्वर हमें भेजे। यदि हम जाने की स्थिति में हैं, तो स्पष्ट है कि इस प्रार्थना में यह निहित है कि हमारे पास अपने लिए यह सौभाग्य माँगने का हृदय हो कि परमेश्वर हमें अपने मिशन के काम में लगा दे। तब हम प्राचीन भविष्यद्वक्ता के साथ कहेंगे, “मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज।” क्या आप नहीं समझते कि मसीह यह अपेक्षा करता था कि उसके चेले जाएँगे, और जाने की अभिलाषा रखेंगे? क्या वह यह मानकर नहीं चला कि वे इस बहुमूल्य ज़िम्मेदारी में लगाए जाने के सौभाग्य के लिए प्रार्थना करेंगे? हम मसीह के साथ सच्ची सहानुभूति में कैसे हो सकते हैं जब तक हम इस सुसमाचार की कटनी में परिश्रम करने के काम से प्रेम न करें, और यह लालसा न करें कि हमें आज्ञा देकर भेजा जाए कि हम जाकर अपने ही हाथ से अपना हँसिया लगाएँ? निश्चय ही, यदि हम मसीह की आत्मा में होते तो हम

कहते—मुझे तो एक बपतिस्मा लेना है, और जब तक वह न हो ले तब तक मैं कैसी सकेती में हूँ? हम पुकार उठते, हे प्रभु, मुझे जाने दे! मुझे जाने दे—क्योंकि मरते हुए करोड़ों लोग ठीक इसी समय अपने पापों में नाश हो रहे हैं। यदि मैं हृदय में स्वयं जाने को तैयार नहीं हूँ, तो मैं परमेश्वर से दूसरों को भेजने की प्रार्थना कैसे कर सकता हूँ? मैंने बहुतों को यह कहते सुना है—काश मैं जवान होता; तो मैं स्वयं जाने में कितना आनन्दित होता।

यह मन की ऐसी दशा प्रतीत होती है जो ईमानदारी से परमेश्वर से मजदूर भेजने की प्रार्थना कर सकती है।

इस प्रार्थना की आत्मा में यह निहित है कि हम जाने के लिए कोई भी व्यक्तिगत त्याग करने को तैयार हैं। क्या मनुष्य अपने हृदय की अभिलाषा के महान लक्ष्य को पाने के लिए सदा व्यक्तिगत त्याग करने को तैयार नहीं रहते? क्या कभी किसी व्यापारी ने, जो अच्छे मोतियों की खोज में था, एक बहुमूल्य मोती पाया हो और वह जाकर अपना सब कुछ बेचकर उसे मोल लेने को पूरी रीति से तैयार न रहा हो?

इसके अतिरिक्त, इस प्रार्थना में परमेश्वर के सामने ईमानदार हृदय होने में यह निहित है कि आप इस काम को पूरा करने के लिए अपने आप को तैयार करने में जो कुछ कर सकते हैं वह सब करने को तैयार हैं। हर जवान पुरुष या जवान स्त्री को यह कहना चाहिए कि परमेश्वर इस काम में मुझसे कुछ चाहता है। हो सकता है परमेश्वर आपको किसी मिशनरी परिवार में सेवक के रूप में चाहता हो; यदि ऐसा है, तो आप जाने को तैयार हैं। काम चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर के लिए या मनुष्य के लिए किया गया कोई भी परिश्रम हीन नहीं है। इस प्रार्थना की आत्मा में आप कहेंगे—यदि मैं अपने प्रभु के सेवकों के पाँव ही धो सकूँ, तो मुझे उसमें भरपूर आनन्द मिलेगा। सब जवान लोगों को विशेष रूप से, यह अनुभव करते हुए कि जीवन उनके सामने है, यह कहना चाहिए—मुझे अपने उद्धारकर्ता के उद्देश्य की उन्नति के लिए, सबसे प्रभावशाली ढंग से, अपने आप को समर्पित कर देना है। मान लीजिए कोई मनुष्य परमेश्वर के सामने उत्कट प्रार्थना में अपने प्राण को झुकाकर कहता है, “हे प्रभु, इस कटनी के खेत में मनुष्यों की सेनाएँ भेज,” तो क्या इसमें यह निहित नहीं कि वह अपनी पूरी शक्ति से इस काम के लिए कमर कसता है? क्या इसमें यह निहित नहीं कि वह किसी भी रीति से जितना अधिक से अधिक कर सकता है, करने को तैयार है?

फिर, ईमानदारी से की गई यह प्रार्थना इस बात को प्रकट करती है कि हम दूसरों को बाहर जाने के लिए तैयार करने में जो कुछ कर सकते हैं वह सब करते हैं। हमारी प्रार्थना यह होगी, “हे प्रभु, हमें ऐसा हृदय दे कि हम दूसरों को तैयार करें, और इस बड़ी कटनी को इकट्ठा करने के लिए जितने अधिक हो सकें उतने लोगों को, और जितनी अच्छी तरह हो सके उतनी अच्छी तरह तैयार करें।”

निश्चय ही इसमें यह भी निहित है कि हम हर उस बात से दूर रहें जो हमें रोके, और ऐसी कोई व्यवस्था न करें जो हमारे हाथ बाँध दे। बहुत से जवान मसीही ऐसा करते हैं, कभी-कभी बिना सोचे-समझे, प्रायः ऐसे ढंग से जो दिखाता है कि वे सबसे पहले परमेश्वर का काम करने के लिए किसी भी रीति से पूरी तरह तत्पर नहीं हैं।

जब हम ईमानदारी से परमेश्वर से मजदूर भेजने की प्रार्थना करते हैं, और हमारी अपनी परिस्थितियाँ हमें जाने देती हैं, तो हमें यह आशा रखनी चाहिए कि वह हमें भेजेगा। क्या! परमेश्वर को हर प्रकार के मजदूरों की आवश्यकता है, और क्या वह हमें नहीं भेजेगा? निश्चय जानिए, वह उस मनुष्य को भेजेगा जो ठीक रीति से प्रार्थना करता है, और जिसका हृदय गहराई से और पूरी तरह परमेश्वर के साथ है। और हमें यह सन्देह करने की आवश्यकता नहीं कि कहीं परमेश्वर में अपने कामों को भली-भाँति चलाने के लिए आवश्यक बुद्धि की कमी न हो। वह अपने सब जनों को वहीं लगाएगा जहाँ उन्हें होना चाहिए, उन क्षेत्रों में जिन्हें भरने के लिए वे सबसे अधिक योग्य हैं। अच्छे लवनेवाले को हाथ में हँसिया लिए उसके स्थान पर लगाया जाएगा; और यदि कुछ दुर्बल हैं जो केवल बालें बीन सकते हैं, तो वह उन्हें वहाँ लगा देता है।

जब जवानों के पास स्वास्थ्य और शिक्षा प्राप्त करने के साधन हों, तो उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमेश्वर उन्हें इस काम के लिए बुलाता है। उन्हें यह मानना चाहिए कि परमेश्वर उनसे अपेक्षा करता है कि वे इस क्षेत्र में प्रवेश करें। वे इस काम पर अपनी दृष्टि अपने ही काम के रूप में लगाएँगे। परमेश्वर की सच्ची सन्तानों के उस बड़े समूह के विषय में सोचते हुए जो यह प्रार्थना उठा रहे हैं, “हे प्रभु, जातियों को

तेरे पुत्र के पास इकट्ठा करने के लिए मजदूर भेज,” वे निश्चय ही यह निष्कर्ष निकालेंगे कि प्रभु इन प्रार्थनाओं का उत्तर देगा और अपने सब विश्वासयोग्य, योग्य और सच्चे जनों को इस क्षेत्र में भेजेगा। निश्चय ही, यदि परमेश्वर ने आपको बुद्धि, प्रशिक्षण, व्यवहार-कुशलता, हृदय, और सारी आवश्यक तैयारी पाने का अवसर दिया है, तो आप जान सकते हैं कि वह आपको भेजेगा। क्या! क्या यह सम्भव है कि मैं तैयार हूँ, उद्यत हूँ, प्रतीक्षा कर रहा हूँ, और कलीसिया की सेनाएँ प्रार्थना कर रही हैं कि परमेश्वर मजदूर भेजे, और फिर भी वह मुझे न भेजे! असम्भव!

इस तैयारी का एक अनिवार्य भाग है इसके लिए हृदय का होना। यह अत्यन्त स्पष्ट है, क्योंकि परमेश्वर अपने कटनी के खेत में ऐसे मनुष्य नहीं चाहता जिनके हृदय वहाँ न हों। आप अपने खेत में ऐसे काम करनेवाले नहीं चाहेंगे जिनका अपने काम में कोई मन न हो। परमेश्वर भी नहीं चाहता। पर वह हमसे यह तैयारी रखने की अपेक्षा करता है। और वह सेवा से छूट पाने के लिए किसी मनुष्य का यह बहाना स्वीकार नहीं करेगा कि उसके पास इसमें लगने का हृदय नहीं है। इस काम के लिए हृदय का न होना आपका दुर्भाग्य नहीं, वरन् आपका दोष है, आपका बड़ा और दण्ड के योग्य ठहरानेवाला पाप है।

यह मुझे मेरी अगली सामान्य प्रस्थापना पर ले आता है, IV. कि मन की यह दशा उद्धार की एक अनिवार्य शर्त है।

कलीसिया के बहुत से लोग उद्धार की शर्तों के विषय में भयानक अन्धकार में हैं।

मैं एक बार इस विषय पर प्रचार कर रहा था, और इस बात पर बल दे रहा था कि पवित्रता उद्धार की एक शर्त है, “जिस के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा,” तब एक डॉक्टर ऑफ़ डिविनिटी (धर्मविज्ञान के विद्वान) ने मेरा सामना किया और दृढ़ता से मेरा विरोध किया। उसने कहा, बाइबल विश्वास को उद्धार की एकमात्र शर्त ठहराती है। उसने कहा, पौलुस ने प्रचार किया कि विश्वास ही शर्त है, और उसका स्पष्ट अभिप्राय हर दूसरी शर्त को अलग कर देना था। पर मैंने उत्तर दिया, पौलुस ने विश्वास के द्वारा उद्धार के सिद्धान्त पर इतना अधिक बल क्यों दिया और उसे इतनी प्रमुखता से क्यों प्रस्तुत किया? क्योंकि उसे कर्मों के द्वारा उद्धार की यहूदियों की बड़ी भूल का विरोध करना था। उस समय ऐसे प्रचार की बहुत अधिक और विशेष आवश्यकता थी, और पौलुस उस संकट का सामना करने के लिए मैदान में उतर पड़ा। पर जब व्यवस्था-विरोधवाद (एन्टिनोमियनवाद) प्रकट हुआ, तो याकूब को उतनी ही दृढ़ता से इस सिद्धान्त का समर्थन करने के लिए खड़ा होना पड़ा कि कर्म बिना विश्वास मरा हुआ है, और भले कर्म जीवित विश्वास का उचित फल हैं, और उसके जीवन और सच्चाई को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक हैं। इससे तुरन्त सुसमाचार के विश्वास के स्वरूप के विषय में एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ। याकूब का मत यह था कि सुसमाचार का हर सच्चा विश्वास प्रेम के द्वारा कार्य करता ही है। वह एक स्नेहपूर्ण, सन्तान जैसा भरोसा होना चाहिए, ऐसा जो प्राण को मसीह के साथ सहानुभूति में खींच लाए, और उसे सामर्थ के साथ आगे ले चले कि वह सब कुछ

बहुत से अंगीकार करनेवाले मसीही यह मानते हैं कि केवल विश्वास और पश्चाताप के सिवा और कुछ आवश्यक नहीं, और यह कि विश्वास सच्चे परोपकार के बिना, और फलस्वरूप भले कर्मों के बिना भी, हो सकता है।

इससे बड़ी कोई भूल नहीं हो सकती। परमेश्वर मनुष्य से जो सबसे बड़ी माँग करता है वह यह है कि वह सचमुच परोपकारी बन जाए। यही सारे सच्चे धर्म का सार है, मन की ऐसी दशा जिसमें मानव प्राणों के लिए परमेश्वर की करुणा जैसी करुणा हो; जो उनके उद्धार के लिए उत्कट प्रार्थना में पुकार उठे, और जो इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए किसी भी परिश्रम से पीछे न हटे। इसलिए यदि सच्चा धर्म उद्धार की एक शर्त है, तो हमारे पाठ में प्रकट की गई मन की दशा भी एक शर्त है।

1. मन की यह दशा पापियों पर भी उतनी ही बाध्यकारी है जितनी पवित्र लोगों पर। सब मनुष्यों को प्राणों के लिए यह करुणा अनुभव करनी चाहिए। क्यों नहीं? क्या कोई भी ऐसा कारण बताया जा सकता है कि एक पापी को प्राणों के लिए उतनी करुणा क्यों न अनुभव करनी चाहिए जितनी एक मसीही को? या उसे परमेश्वर और मनुष्य से उतनी ही उत्कटता से प्रेम क्यों न करना चाहिए?

2. धर्म का अंगीकार करनेवाले जो इन आज्ञाओं की सच्ची आत्मा का पालन नहीं करते, बिना किसी अपवाद के कपटी हैं। वे सच्चे धर्मी होने का दावा करते हैं, पर क्या वे हैं? निश्चय ही नहीं, जब तक वे वेदी पर न हों, परमेश्वर के काम के लिए समर्पित न हों, और हृदय से सच्चाई के साथ उसमें सहभागी न हों।

इसके बिना, उनमें से हर एक कपटी है। आप मसीह की आत्मा रखने का दावा करते हैं; पर जब आप भीड़ को वैसे देखते हैं जैसे उसने देखा था, सुसमाचार की ज्योति के अभाव में नाश होते हुए, तो क्या आप उनके प्राणों के लिए करुणा के साथ सामर्थी प्रार्थना में पुकार उठते हैं? यदि आपमें यह आत्मा नहीं है, तो अपने आप को कपटी लिख लीजिए।

3. बहुत से लोग इसलिए प्रार्थना नहीं करते कि परमेश्वर मजदूर भेजे, क्योंकि वे डरते हैं कि वह उन्हें भेज देगा। मुझे स्मरण है कि एक समय धर्म मुझे अप्रिय लगता था क्योंकि मुझे डर था कि यदि मेरा मन-परिवर्तन हो गया, तो परमेश्वर मुझे सुसमाचार प्रचार करने के लिए भेज देगा। पर मैंने इस विषय पर और आगे सोचा।

मैंने कहा, परमेश्वर को अधिकार है कि वह जैसा चाहे मेरे साथ करे, और मुझे विरोध करने का कोई अधिकार नहीं। यदि मैं विरोध करूँ, तो वह मुझे नरक में डाल देगा। यदि परमेश्वर चाहता है कि मैं उसके सुसमाचार का सेवक बनूँ और मैं विरोध और विद्रोह करूँ, तो उसे निश्चय ही मुझे नरक में डाल देना चाहिए, और निःसन्देह वह डालेगा।

पर इस कॉलेज में बहुत से जवान हैं जो संसार के मन-परिवर्तन के लिए कभी प्रार्थना में नहीं लगते, इस डर से कि कहीं परमेश्वर उन्हें इस काम में न भेज दे। आप यह प्रार्थना करने में लज्जित होंगे, “हे प्रभु, मजदूर भेज, पर मुझे मत भेज।” यदि आपके न जाना चाहने का कारण यह है कि आपके पास इसके लिए हृदय नहीं, तो आप अपने आप को कपटी लिख सकते हैं, और इसमें कोई भूल नहीं।

यदि आप कहते हैं, “मेरे पास इस काम के लिए हृदय तो है, पर मैं जाने के योग्य नहीं हूँ,” तो आप यह समझ लीजिए कि परमेश्वर आपको तब तक नहीं बुलाएगा जब तक आप योग्य न हों या योग्य न बन सकें। वह अपनी सेवा में अयोग्य मनुष्य नहीं चाहता।

4. पिछले पच्चीस वर्षों से सेवकाई इसी कारण अपमान में पड़ गई है; बहुत से जवान उसमें आ गए हैं जिन्हें कभी नहीं आना चाहिए था। उनके हृदय स्थिर नहीं हैं, और वे मसीह और उसके उद्देश्य के लिए त्याग करने से कतराते हैं। इसलिए वे सीधे आगे नहीं बढ़ते, न उचित बात के प्रति सच्चे रहते हैं, न सताए हुओं के पक्ष में दृढ़ रहते हैं, न हर भले वचन और काम में दृढ़ होते हैं। पूरी की पूरी टुकड़ियों में वे उस स्थान से पीछे हट जाते हैं जिसकी रक्षा करने की उन्होंने शपथ खाई है। भीड़ की भीड़ साधारण भाई-बहनों के हृदय बड़े दुःख में हैं, और वे इस भयानक पथभ्रष्टता पर विलाप कर रहे हैं। एक पादरी से, जो अपने वर्ग पर लगाए जा रहे सार्वजनिक कलंक की शिकायत कर रहा था, बोस्टन के एक साधारण विश्वासी ने उत्तर दिया, “मुझे खेद है कि इसके लिए इतना अधिक कारण है;

परमेश्वर सेवकाई को डाँटना चाहता है, और उसे उन्हें डाँटना ही चाहिए क्योंकि वे इसके पूरे योग्य हैं।” मुझे ऐसा कहता हुआ न समझिए कि सेवकाई की यह डाँवाडोल स्थिति सर्वत्र है; नहीं, कदापि नहीं;

मुझे यह जानकर आनन्द है कि अपवाद भी हैं; पर फिर भी दुःखद सच्चाई यह है कि बहुत से लोग फिर गिर गए हैं, और परिणामस्वरूप, एक वर्ग के रूप में, उनकी प्रतिष्ठा जाती रही है, और इसने बहुत से जवानों को सेवकाई में प्रवेश करने से निरुत्साहित कर दिया है।

अब ऐसा और न होने दें। जो जवान अभी सेवकाई के लिए तैयारी कर रहे हैं, वे अपने स्वामी की आत्मा तक ऊपर उठें और युद्ध की अगली पंक्ति में दौड़ पड़ें। वे प्राणों की भलाई के लिए कठोर परिश्रम करें, और इस परिश्रम से वैसा ही प्रेम करें जैसा उनके महान प्रभु ने उनसे पहले किया था। इस प्रकार वे अपनी विश्वासयोग्यता के द्वारा इस वर्ग के लोगों की प्रतिष्ठा को उस कलंक से छुड़ाएँ जिसके नीचे वह अभी पड़ी है। वे अपनी पूरी शक्ति के साथ एकत्र हों और एक मन होकर अपने आप को परमेश्वर की वेदी पर रख दें।

ऐसा करने से, एक पीढ़ी भी न बीतने पाएगी कि यह कहा जाएगा—इन विश्वासयोग्य लोगों को देखो; इन मनुष्यों पर ध्यान दो जिनका हृदय अपने काम में और अपने काम पर लगा है; सेवकाई का उद्धार हो गया है!

5. मुझे दुःख के साथ यह कहने को विवश होना पड़ता है—बहुत से लोगों को इसकी कोई परवाह नहीं कि यह काम हो या न हो। वे पूरी तरह महत्वाकांक्षी अभिलाषाओं में डूबे हुए हैं। कौन नहीं जानता कि वे यीशु मसीह के साथ सहानुभूति नहीं रखते?

प्रियो, मैं आपसे पूछूँ कि क्या आप ईमानदारी से यह जानते हैं कि आप अपने महान अगुवे के साथ सहानुभूति रखते हैं? मैं हमारे सामने के इस खण्ड को कभी भी पढ़ नहीं पाता बिना इस बात से द्रवित हुए कि इसमें मसीह की कोमलता और प्रेम का कैसा प्रकटीकरण है। वहाँ उसके सामने भीड़ की भीड़ उमड़ रही थी।

केवल बाहरी आँख को तो सब कुछ ठीक-ठाक दिख सकता था; पर जो उनकी आत्मिक दशा के विषय में सोचता, उसके लिए करुणा के गहरे सोतों को उमड़ा देने के लिए पर्याप्त कारण था। मसीह ने उन्हें उन भेड़ों की नाईं भटके हुए देखा जिनका कोई रखवाला न हो। उनके पास कोई शिक्षक या मार्गदर्शक न थे जिन पर वे भरोसा रख सकें। वे अन्धकार और नैतिक मृत्यु में थे। मसीह उन पर रोया, और उसने अपने चेलों को बुलाया कि वे उनकी दशा में सहानुभूति रखें, और उसके साथ मिलकर खेत के स्वामी से सामर्थी प्रार्थना करें कि वह मजदूर भेजे। ऐसी थी उसकी आत्मा। और अब, प्रिय जवानो, क्या आपको इसकी परवाह है कि यह काम हो या न हो?

6. बहुत से लोग इस परिश्रम से बचने और इसे पूरी तरह दूसरों के करने के लिए छोड़ देने पर तुले हुए प्रतीत होते हैं। वास्तव में, वे इस प्रश्न पर विचार तक करना कठिनाई से स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर उनसे कौन सा भाग लेने और पूरा करने को चाहता है।

अब मैं आपसे पूछूँ—क्या ऐसे लोगों का अन्त में न्याय के भाग्य-निर्णय का घोषक यह पुकारते हुए स्वागत और प्रशंसा करेगा, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दासो, अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो?” कभी नहीं; नहीं, कभी नहीं!

7. बहुत से लोग कहते हैं—मैं बुलाया नहीं गया हूँ, पर वास्तव में वे इस काम के प्रति ऐसे समर्पित ही नहीं हैं कि उन्हें इसकी चिन्ता हो कि वे बुलाए गए हैं या नहीं। वे बुलाए जाना ही नहीं चाहते—बिलकुल नहीं!

अब यह तथ्य ही कि आपके पास आवश्यक योग्यताएँ, साधन और तैयारी की सुविधाएँ हैं, परमेश्वर की बुलाहट का संकेत है। ये ही उसकी व्यवस्था की वाणी हैं, जो कहती है, आगे बढ़ो, और मेरी दाख की बारी में परिश्रम के लिए तैयारी करो! वहाँ आपकी विद्या है; उसका उपयोग कीजिए: वहाँ वे कक्षाएँ हैं जिनमें आपको प्रवेश करना है; भीतर जाइए और तब तक लगे रहिए जब तक आप उद्धारकर्ता की कटनी के बड़े-बड़े पके हुए खेतों में प्रवेश करने को तैयार न हो जाएँ। यदि परमेश्वर की व्यवस्था के संकेत अनुकूल हों, तो आपको उनकी पुकार के साथ कदम मिलाकर चलने का प्रयत्न करना चाहिए; पवित्र आत्मा के बपतिस्मों के लिए प्रार्थना कीजिए; ईश्वरीय अभिषेक की खोज कीजिए, और तब तक अपने आप को विश्राम न दीजिए जब तक आप उस काम के लिए, जो परमेश्वर आपको सौंपता है, सब बातों में सुसज्जित न हो जाएँ।

यह देखना दुःखदायी है कि बहुत से लोग किसी न किसी रीति से अपने आप को इस काम के विरुद्ध बाँध रहे हैं। वे अपने आप को ऐसी स्थिति में डाल रहे हैं जो अपने आप में ही उन्हें

इसमें लगने से रोक देती है। पर जवानो, मुझे आपसे यह पूछने दीजिए, जब आपके पास इस काम में लगने की शक्ति और साधन हैं, तब यदि आपके पास इसके लिए हृदय ही नहीं, तो क्या आप कभी उद्धार पाने की आशा कर सकते हैं? नहीं, कदापि नहीं! आप धन्य लोगों के फाटक पर व्यर्थ ही खटखटाएँगे! आप वहाँ जाकर खटखटा सकते हैं, पर उत्तर क्या मिलेगा? क्या तुम मेरे विश्वासयोग्य दास हो? क्या तुम उन थोड़े लोगों में थे, जो अविश्वासयोग्यों के बीच विश्वासयोग्य रहे—अपने स्वामी की पुकार पर फुर्तीले और तैयार? हाय नहीं, नहीं; तुम तो यही सोचते रहे कि परिश्रम से कैसे बचें और आत्म-त्याग से कैसे कतराएँ! मैं तुम्हें नहीं जानता! तुम्हारा भाग नगर की शहरपनाह के बाहर है!

कोई अपने आप को यह कहकर क्षमा न करे कि वह बुलाया नहीं गया, क्योंकि परमेश्वर सब को कटनी के इस बड़े खेत में किसी न किसी प्रकार के परिश्रम के लिए बुलाता है। इसलिए आपको कभी भी अपने आप को यह कहकर क्षमा करने की आवश्यकता नहीं कि आप अपने प्रभु और स्वामी की किसी सेवा के लिए बुलाए नहीं गए। और कोई अपने आप को सेवकाई से तब तक क्षमा न करे जब तक उसका हृदय वेदी पर न हो और वह स्वयं जाने के लिए प्रार्थना और लालसा न कर रहा हो, और केवल परमेश्वर की ओर से, उसकी व्यवस्था के द्वारा, इस महान परिश्रम के किसी अन्य भाग के लिए स्पष्ट बुलाहट के कारण ही रुका हुआ न हो।

बहुत से लोग अन्त में इस विषय के साथ ऐसा व्यवहार करने के कारण, जैसा उन्होंने किया है, हृदय में इतने स्वार्थ के साथ, नरक में भेजे जाएँगे! मैं उस जवान को जानता हूँ जो बहुत समय तक इस दृढ़ बोध के बीच कि परमेश्वर ने उसे सेवकाई के लिए बुलाया है, और इस काम में लगने के प्रति बड़ी अरुचि के बीच संघर्ष करता रहा। मैं जानता हूँ कि यह भावना क्या है, क्योंकि मैंने स्वयं बहुत समय तक इसे अनुभव किया। बहुत समय तक मेरे भीतर यह गुप्त बोध था कि मुझे पादरी बनना चाहिए, यद्यपि मेरा हृदय इससे दूर भागता था। वास्तव में, मेरा मन-परिवर्तन बहुत कुछ इसी बात पर टिका था कि मैं परमेश्वर के साथ यह संघर्ष छोड़ दूँ, और परमेश्वर की बुलाहट के विरुद्ध अपनी भावना की इस अरुचि को वश में कर लूँ।

8. आप देख सकते हैं कि मसीही होना क्या है, और परमेश्वर मन-परिवर्तन के समय मनुष्यों से क्या माँगता है।

निर्णायक बिन्दु यह है—क्या आप सचमुच और ईमानदारी से परमेश्वर की सेवा करेंगे? विशेषकर विद्यार्थियों के सामने प्रायः यह प्रश्न होता है—क्या आप अपनी सारी महत्वाकांक्षी योजनाओं को छोड़कर अपने आप को कंगालों को मसीह का सुसमाचार सुनाने के दीन, महत्वाकांक्षा-रहित परिश्रम में लगा देंगे? इस वर्ग के अधिकांश लोग महत्वाकांक्षी और ऊँचे उठने के अभिलाषी होते हैं; उनके पास आत्म-उन्नति की योजनाएँ होती हैं, जिन्हें पूरी तरह त्याग देना उनके लिए एक परीक्षा होगी। इसलिए आपके विषय में, आपका मसीही होना और अन्त में उद्धार पाना बहुत कुछ, शायद पूरी तरह, इस बात पर निर्भर करेगा कि आप सुसमाचार की आत्मा के सच्चे आत्म-त्याग में अपने आप को इस काम के लिए सौंप देते हैं या नहीं।

9. बहुत से लोग इस काम के लिए बुलाए गए हैं, जो बाद में पीछे हट जाते हैं और इसे छोड़ देते हैं। वे अच्छी शुरुआत करते हैं, पर पीछे हट जाते हैं; अपने कर्तव्य के विषय में बड़ी उलझन की दशा में पड़ जाते हैं; शायद

बिलाम के समान, वे अपना कर्तव्य देखने के लिए इतने अनिच्छुक और उससे बचने के लिए इतने उत्सुक होते हैं कि परमेश्वर उनके साथ और अधिक संघर्ष नहीं करता, वरन् उन्हें उनके लोभ, या उनकी महत्वाकांक्षा के वश में छोड़ देता है।

हे जवान, क्या आप उत्कटता से पुकार रहे हैं, “हे प्रभु, तू मुझ से क्या कराना चाहता है?” निश्चय जानिए, परमेश्वर आपको अपने खेत में कहीं न कहीं चाहता है; उसने अपनी कटनी को नाश होने के लिए नहीं छोड़ दिया है; वह आपको उसमें चाहता है, पर वह चाहता है कि पहले आप पश्चाताप करें और सुसमाचार की सेवकाई के लिए अपना हृदय तैयार करें। जब तक आप ऐसा न कर लें, तब तक आपको उसमें प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं।

बहुत से लोग किसी चमत्कारी बुलाहट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह एक बड़ी भूल है। परमेश्वर मनुष्यों को किसी चमत्कारी रीति से नहीं बुलाता। उसकी व्यवस्था की उँगली मार्ग दिखाती है, और जो योग्यता वह आपको देता है वह उस काम की ओर संकेत करती है जो आपको करना है। आपको डरने की आवश्यकता नहीं कि परमेश्वर आपको गलत बुलाएगा।

वह वह काम दिखाएगा जो वह चाहता है कि आप करें। इसलिए उससे माँगिए कि वह इस बड़े खेत में आपको ठीक स्थान पर ले चले। वह निश्चय ही ऐसा करेगा।

जवानो, क्या आप इस विषय में मेरे स्वामी के साथ कृपालुता और सच्चाई से व्यवहार करेंगे? क्या आप कहते हैं, “हे मेरे परमेश्वर, मैं उपस्थित हूँ, उस काम के किसी भी भाग के लिए तैयार जो तू मुझसे करवाना चाहता है?”

आप क्या कहते हैं? क्या आप यह स्थान लेने को तैयार हैं? क्या आप अपनी शिक्षा इस काम के लिए समर्पित करेंगे? क्या आप अपने प्रभु के काम के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार और उत्सुक हैं?

क्या आप कहते हैं, “हाँ, परमेश्वर मेरी सारी शक्तियों को, पूरी तरह और सदा के लिए, ले लेगा?” “इसलिये हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूँ, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।” परमेश्वर की वेदी आपके सामने है। सम्पूर्ण बलिदान ही वह वस्तु है जिसकी माँग की गई है। क्या आप अपनी सारी स्वार्थी योजनाओं को छोड़ने को तैयार हैं? हे आप लोगो जिनके पास सेवकाई के योग्य बनानेवाली प्रतिभाएँ हैं, क्या आप अपने पूरे प्राण से उन्हें इस काम के लिए समर्पित करेंगे? कहिए, क्या आप मेरे स्वामी के साथ ईमानदारी और सच्चाई से व्यवहार करेंगे? कहिए, क्या आप उसके उद्देश्य से प्रेम करते हैं, और खोए हुए मनुष्यों की जातियों को अपने छुड़ानेवाले के भेड़शाले में इकट्ठा करने में परमेश्वर के सहकर्मी होने को अपनी सबसे बड़ी महिमा समझते हैं?

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