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20. पापियों का मन-परिवर्तन कराना—एक मसीही कर्तव्य।
20. पापियों का मन-परिवर्तन कराना—एक मसीही कर्तव्य।
“हे भाइयो, यदि तुम में कोई सत्य के मार्ग से भटक जाए, और कोई उस को फेर लाए। तो वह यह जान ले, कि जो कोई किसी भटके हुए पापी को फेर लाएगा, वह एक प्राण को मृत्यु से बचाएगा, और अनेक पापों पर परदा डालेगा।”—याकूब 5:19, 20।
इस पद में हमारे सामने वर्तमान कर्तव्य का और बड़े व्यावहारिक महत्व का एक विषय रखा गया है। ताकि हम उसे स्पष्ट रूप से समझ सकें, आइए हम इन बातों पर विचार करें—
I. पापी किस बात से पापी बनता है?
1. पापी, मूल रूप से, एक नैतिक कर्ता है। वह और चाहे जो कुछ हो या न हो, इतना तो उसे होना ही चाहिए। उसके पास स्वतन्त्र इच्छा होनी चाहिए, इस अर्थ में कि वह अपने कामों का आरम्भ स्वयं कर सके।
उसे अपने कामों का ऐसा उत्तरदायी कर्ता होना चाहिए कि उसे किसी अटल दबाव से इस या उस ढंग से काम करने के लिए विवश न किया जाए, सिवाय इसके कि वह अपनी ही स्वतन्त्र पसन्द के अनुसार काम करे।
उसके पास बुद्धि भी होनी चाहिए, ताकि वह अपने सम्बन्धों को समझ सके और अपने नैतिक उत्तरदायित्वों को ग्रहण कर सके। एक जड़बुद्धि मनुष्य, जिसमें स्वभाव का यह तत्व नहीं है, नैतिक कर्ता नहीं है और पापी नहीं हो सकता।
उसमें संवेदनशीलता भी होनी चाहिए, ताकि वह काम करने के लिए प्रेरित किया जा सके—ताकि स्वेच्छा से किए जानेवाले काम के लिए उसे कोई प्रेरणा मिल सके, और उसमें सही या गलत काम के उद्देश्यों को अपनाने की क्षमता भी हो।
ये मन के वे आवश्यक तत्व हैं जो किसी को नैतिक कर्ता बनाने के लिए ज़रूरी हैं। फिर भी पापी में जो बातें प्रकट होती हैं, वे केवल इतनी ही नहीं हैं।
2. वह एक स्वार्थी नैतिक कर्ता है जो अपने ही हितों में लगा रहता है और अपने आप को ही अपने कामों का सर्वोच्च लक्ष्य बना लेता है। वह अपनी ही बातों पर ध्यान देता है, दूसरों की बातों पर नहीं। दूसरों के हित नहीं, बल्कि उसके अपने हित ही उसकी मुख्य चिन्ता हैं।
इस प्रकार हर पापी एक नैतिक कर्ता है, जो स्वार्थ की इस व्यवस्था के अधीन काम करता है; उसके पास स्वतन्त्र इच्छा और नैतिक कर्ता की सारी शक्तियाँ हैं, परन्तु वह अपने आप को अपने सारे कामों का महान लक्ष्य बना लेता है। यही पापी है।
3. यहाँ हमें पाप का सच्चा विचार मिलता है। एक महत्वपूर्ण अर्थ में वह भटकना—भूल—है। पापी वह है जो “भटकता है।” “जो कोई किसी पापी को उसके मार्ग की भूल से फेर लाएगा।” यह केवल कोई चूक नहीं है, क्योंकि चूक तो अज्ञान या अक्षमता के कारण होती है। न यह स्वभाव का कोई दोष मात्र है जिसका दोष उसके रचनेवाले पर डाला जा सके। परन्तु यह “उसके मार्ग की भूल” है। यह अपने स्वेच्छा से चुने हुए आचरण में निशाने से चूक जाना है। यह कर्तव्य की रेखा से जान-बूझकर हट जाना है। यह कोई निर्दोष चूक नहीं, बल्कि आवेग के आगे लापरवाही से झुक जाना है। इसमें एक गलत लक्ष्य—एक बुरा अभिप्राय—निहित है, अर्थात् तर्क और विवेक के विरोध में भूख या वासना से प्रभावित होना। यह कर्तव्य के बोध का विरोध करने की कीमत पर कोई तात्कालिक सुख प्राप्त करने का प्रयत्न है।
यह निश्चय ही, पूरे बल के साथ, निशाने से चूक जाना है।
II. मन-परिवर्तन क्या है?
II. मन-परिवर्तन क्या है?
“पापी को उसके मार्ग की भूल से फेर लाने” का क्या अर्थ है?
यह भूल इस बात में है कि उसके जीवन का लक्ष्य गलत है—अर्थात् उसके अपने वर्तमान सांसारिक हित।
इसलिए उसे उसके मार्ग की भूल से फेर लाने का अर्थ है उसे इस मार्ग से मोड़कर परमेश्वर और मनुष्यों की भलाई के लिए परोपकार की भावना से अपने आप को समर्पित करने की ओर ले आना। मन-परिवर्तन का ठीक यही अर्थ है। यह कामों के महान नैतिक लक्ष्य को बदल देना है। यह स्वार्थ को हटा देता है और उसके स्थान पर परोपकार को ले आता है।
III. मनुष्य किस अर्थ में किसी पापी का मन फिराता है?
III. मनुष्य किस अर्थ में किसी पापी का मन फिराता है?
हमारा पद कहता है, “यदि तुम में कोई सत्य के मार्ग से भटक जाए, और कोई उस को फेर लाए”—जिसका अर्थ है कि मनुष्य किसी पापी का मन फिरा सकता है। परन्तु यह किस अर्थ में कहा और किया जा सकता है?
मैं उत्तर देता हूँ, यह परिवर्तन अनिवार्य रूप से स्वेच्छा से होनेवाला परिवर्तन होना चाहिए; यह न प्राण के सार में परिवर्तन है, न शरीर के सार में—न सृजी हुई स्वाभाविक क्षमताओं में कोई परिवर्तन; बल्कि यह वह परिवर्तन है जो मन स्वयं, विभिन्न प्रभावों के अधीन काम करते हुए, अपने कामों के स्वेच्छा से चुने हुए लक्ष्य के विषय में करता है। यह समझ-बूझकर किया गया परिवर्तन है—मन समझदारी से और स्वतन्त्र रूप से काम करते हुए अपना नैतिक मार्ग बदल देता है, और यह ऐसे कारणों से करता है जिन्हें वह समझता है।
बाइबल मन-परिवर्तन का श्रेय विभिन्न कर्ताओं को देती है: 1. परमेश्वर को। परमेश्वर के विषय में कहा गया है कि वह पापियों का मन फिराता है, और मसीही लोग उचित रूप से परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह ऐसा करे।
2. मसीहियों के विषय में कहा गया है कि वे पापियों का मन फिराते हैं। यह हम अपने पद में देखते हैं।
3. सत्य के विषय में भी कहा गया है कि वह पापियों का मन फिराता है।
फिर इस बात पर भी विचार कीजिए कि कोई भी मनुष्य दूसरे के सहयोग और सहमति के बिना उसका मन नहीं फिरा सकता। उसका मन-परिवर्तन इसी में है कि वह अपनी इच्छा को समर्पित कर दे और अपना स्वेच्छा से चुना हुआ मार्ग बदल दे। वह अपनी ही स्वतन्त्र इच्छा के विरुद्ध ऐसा कभी नहीं कर सकता। उसे अपना स्वेच्छा से चुना हुआ मार्ग बदलने के लिए मनाया और प्रेरित किया जा सकता है; परन्तु मनाए जाने का अर्थ केवल यही है कि मनुष्य अपना चुना हुआ मार्ग छोड़कर दूसरा मार्ग चुनने के लिए अगुवाई पाए।
स्वयं परमेश्वर भी किसी पापी का मन उसकी अपनी सहमति के बिना नहीं फिरा सकता। वह नहीं फिरा सकता, इस सीधे से कारण से कि इस बात में ही विरोधाभास है। मन फिराए जाने में उसकी अपनी सहमति निहित है—नहीं तो वह मन-परिवर्तन है ही नहीं। इसलिए परमेश्वर मनुष्यों का मन केवल इसी प्रकार फिराता है कि वह उन्हें उनके स्वार्थी मार्गों की भूल से परोपकार के सही मार्गों की ओर मुड़ने के लिए मनाता है।
इसी प्रकार मनुष्य भी किसी पापी का मन केवल इसी अर्थ में फिरा सकता है कि वह उसके सामने वे कारण रखे जो स्वेच्छा से परिवर्तन के लिए प्रेरित करते हैं, और इस प्रकार उसे पश्चाताप करने के लिए मनाए। यदि वह ऐसा कर सके, तो वह पापी को उसके मार्ग की भूल से फेर लाता है। परन्तु बाइबल हमें बताती है कि अकेला मनुष्य न तो कभी किसी पापी का मन फिराता है और न फिरा सकता है।
फिर भी बाइबल यह सिखाती है कि जब मनुष्य नम्रता से, परमेश्वर पर निर्भर होकर काम करता है, तो परमेश्वर उसके साथ और उसके द्वारा काम करता है। मनुष्य “परमेश्वर के सहकर्मी” हैं। वे कारण प्रस्तुत करते हैं और परमेश्वर उन कारणों को मन पर प्रबल करता है। जब पादरी प्रचार करता है, या जब आप पापियों से बातचीत करते हैं, तो मनुष्य सत्य को प्रस्तुत करता है, और परमेश्वर मन को उसे बड़ी स्पष्टता से देखने और उसके व्यक्तिगत प्रयोग को बड़ी सामर्थ के साथ अनुभव करने देता है। मनुष्य मनाता है और परमेश्वर मनाता है; मनुष्य उसके कान से बात करता है—परमेश्वर उसके हृदय से बात करता है। मनुष्य उसकी इन्द्रियों के माध्यम से सत्य को प्रस्तुत करता है ताकि वह उसके स्वतन्त्र मन तक पहुँचे; परमेश्वर उसे उसके मन पर ऐसा दबाता है कि वह स्वेच्छा से उसके दावों के आगे झुक जाए। इसी प्रकार बाइबल पापियों के विषय में कहती है कि उन्हें मनाया जाता है: “तू थोड़े ही समझाने से मुझे मसीही बनाना चाहता है?” इसमें बाइबल की भाषा पूरी तरह स्वाभाविक है। ठीक वैसे ही जैसे आप कहें कि आपने किसी मनुष्य को उसके इरादे से फेर दिया, या आपके तर्कों ने उसे फेर दिया, या सत्य के विषय में उसके अपने बोध ने उसे फेर दिया। इसी प्रकार इस विषय पर बाइबल की भाषा पूरी तरह सरल और निष्कपट है, जो मन के नियमों के साथ पूर्ण सामंजस्य में सीधी-सीधी बात कहती है।
IV. पद में किस प्रकार की मृत्यु से अभिप्राय है—“एक प्राण को मृत्यु से बचाएगा।”
ध्यान दीजिए, मृत्यु से बचाया जानेवाला एक प्राण है, शरीर नहीं; इसलिए इस सम्बन्ध में हम शरीर की मृत्यु का सारा विचार छोड़ सकते हैं। मनुष्य का मन चाहे कितना ही सच्चाई से फिरा हो, उसका शरीर तो फिर भी अवश्य मरेगा।
यह खण्ड प्राण की मृत्यु की बात करता है।
प्राण की मृत्यु से कभी-कभी आत्मिक मृत्यु का अर्थ लिया जाता है, एक ऐसी दशा जिसमें मन सत्य से वैसा प्रभावित नहीं होता जैसा होना चाहिए। मनुष्य पाप के वश में रहता है और सत्य के प्रभाव को ठुकरा देता है।
या प्राण की मृत्यु अनन्त मृत्यु हो सकती है—प्राण का पूर्ण रूप से खो जाना, और उसका अन्तिम विनाश। पापी तो निश्चय ही आत्मिक रूप से मरा हुआ है, और यदि यह दशा अनन्तकाल तक बनी रहे, तो यही अनन्त मृत्यु बन जाएगी। फिर भी बाइबल बिना क्षमा पाए मरनेवाले पापी का चित्रण इस प्रकार करती है कि वह “अनन्त दण्ड में चला जाता है,” और “प्रभु के सामने से, और उसकी शक्ति के तेज से दूर होकर अनन्त विनाश का दण्ड” पाता है। सदा पापी बने रहना ही काफ़ी भयानक है—यह भयंकर आतंक से भरी मृत्यु है; परन्तु जब आप इसकी कल्पना इस रूप में करते हैं कि यह अनन्त दण्ड से और भी बढ़ जाती है, “प्रभु के सामने से, और उसकी शक्ति के तेज से” बहुत दूर, तो यह कितनी भयानक रीति से और भी बढ़ जाती है!
V. किसी प्राण को मृत्यु से बचाने का महत्व।
V. किसी प्राण को मृत्यु से बचाने का महत्व।
हमारा पद कहता है कि जो किसी पापी का मन फिराता है वह एक प्राण को मृत्यु से बचाता है। फलस्वरूप वह उसे उस सारे दुःख से बचाता है जो उसे अन्यथा अवश्य सहना पड़ता। इतना सारा दुःख बच जाता है।
और बचाए गए प्रत्येक पापी के मामले में यह मात्रा उस सब से अधिक है जो आज की घड़ी तक हमारे पूरे संसार में अनुभव किया गया है। पहली दृष्टि में यह बात आपको चौंका सकती है और अविश्वसनीय लग सकती है। फिर भी आपको केवल इस बात पर ध्यान से विचार करना है, और आप देखेंगे कि यह अवश्य सच है। जिसका कोई अन्त नहीं—जो हमारी गणना की सारी क्षमताओं से पूरी तरह परे बढ़ता चला जाता है—वह किसी भी सीमित मात्रा से, चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों न हो, अवश्य बढ़कर होगा।
फिर भी इस संसार में जो वास्तविक दुःख अनुभव किया गया है उसकी मात्रा बहुत बड़ी रही है। जब आप किसी भी देश के बड़े नगरों में घूमते हैं तो आप उसे देखे बिना नहीं रह सकते। मान लीजिए आप किसी ऊँची चोटी पर चढ़ सकते और एक पूरे महाद्वीप पर अपनी दृष्टि फैला सकते, ताकि एक ही दृष्टि में उसके सारे दुःखों को देख लें। मान लीजिए आपके पास ऐसी आँख होती जो मानव-वेदना के सब रूपों को देख सके और उनके परिमाण को माप सके—दासता, अत्याचार, मद्यपान, युद्ध, वासना, रोग, हृदय-वेदना की सारी विपत्तियाँ; मान लीजिए आप किसी युद्ध-भूमि के ऊपर खड़े होकर उसकी सारी कराहों और शापों को एक ही ऊपर उठती हुई ध्वनि के रूप में सुन सकते, और उसकी अकथनीय विपत्तियों का माप और परिमाण ले सकते; मान लीजिए आप उसकी यातनाओं की वह गूँज सुन सकते जब वे आकाश तक उठती हैं; तो आपको कहना पड़ेगा—सचमुच यहाँ यातना का एक सागर है; फिर भी यह सब उस विशाल मात्रा की तुलना में, जो हर गणना को चुनौती देती है, बाल्टी में एक बूँद के समान है, जिसे प्रत्येक खोया हुआ पापी अवश्य सहेगा, और जिससे प्रत्येक मन फिराया हुआ पापी बचाया जाता है। यदि आप रेलगाड़ी के डिब्बों को एक साथ दर्जन भर मनुष्यों के ऊपर से दौड़ते हुए, उनके माँस और हड्डियों को पीसते हुए देखें, तो आप वह दृश्य सह न सकेंगे। शायद आप मूर्च्छित भी हो जाएँ। ओह, यदि आप पृथ्वी की सारी यातनाओं को एक साथ इकट्ठा देख सकते, और उन भयानक कराहों को एक ही कान फाड़ देनेवाली गर्जना के रूप में ऊपर उठते सुन सकते जो पृथ्वी को ही हिला दे, तो आपकी नसें कैसे काँप उठतीं! फिर भी यह सब एक खोए हुए प्राण की अनन्त पीड़ाओं की तुलना में कुछ भी नहीं होगा! और यह बात सच है, इस खोए हुए प्राण की पीड़ा उसके अस्तित्व के प्रत्येक क्षण में चाहे कितनी ही कम मात्रा में क्यों न हो।
इससे भी आगे। इस प्रकार बचाई गई पीड़ा की मात्रा न केवल उस सब से बढ़कर है जो अब तक इस संसार में सही गई है, बल्कि उस सब से भी बढ़कर है जो इस संसार में कभी सही जाएगी। और यह बात तब भी सच है, जब यह मान लिया जाए कि यहाँ के निवासियों की संख्या दस लाख गुना बढ़ जाए, और उनके दुःख भी उसी अनुपात में बढ़ जाएँ। पापी जो पीड़ा सहेगा उसकी मात्रा चाहे कितनी ही कम क्यों न हो, फिर भी हमारी यह कल्पना—कि पृथ्वी की जनसंख्या दस लाख गुना बढ़ जाए और उसके दुःखों का कुल योग उसी अनुपात में बढ़ जाए—खोई हुई आत्मा की यातनाओं को मापना आरम्भ भी नहीं कर सकती।
या हम अपनी तुलना को और बढ़ा सकते हैं और उस सब को इसमें सम्मिलित कर सकते हैं जो अब तक सारे विश्व में सहा गया है—इस घड़ी तक पृथ्वी की सारी यातनाएँ और नरक की सारी यातनाएँ मिलाकर—हाँ, तब भी हमारा यह कुल योग उस पीड़ा की मात्रा को मापने के लिए बिल्कुल ही अपर्याप्त है जो एक पापी के मन फिराने पर बच जाती है। नहीं, इससे भी बढ़कर, इस प्रकार बचाई गई मात्रा उससे भी अधिक है जो सृजा हुआ विश्व किसी भी सीमित अवधि में कभी सह सकता है। हाँ, यह उससे भी अधिक है, असंख्य गुना अधिक, जिसकी
सारे सीमित मन कभी कल्पना कर सकते हैं। आप सारे सीमित मनों की, हर मनुष्य और हर स्वर्गदूत की, परमेश्वर के मन को छोड़ सारे मनों की, पूरी कल्पना को एक साथ समेट लें, फिर भी जो मनुष्य एक प्राण को मृत्यु से बचाता है, वह उस एक ही काम में इस सारी अपार मात्रा से भी अधिक दुःख को सहे जाने से बचा लेता है। वह उससे असंख्य गुना अधिक दुःख बचा लेता है जिसकी कल्पना सृजे हुए मनों का सारा विश्व कर सकता है।
मुझे डर है कि आप में से बहुतों ने इस विषय पर सोचने का कभी कष्ट ही नहीं उठाया।
आप यह कहकर इस भयानक निष्कर्ष से बच नहीं सकते कि पीड़ा तो पाप का केवल स्वाभाविक परिणाम है, और यह कि शासन की ओर से कोई दण्ड नहीं दिया जाता। पीड़ा शासन की ओर से हो या स्वाभाविक, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। मैं अभी केवल उसकी मात्रा की बात कर रहा हूँ। यदि वह अपने पापों में बना रहे, तो वह स्वाभाविक नियम के द्वारा सदा के लिए दुःखी रहेगा; और इसलिए जो मनुष्य किसी पापी को उसके पापों से फेर लाता है, वह इस सारी अपार पीड़ा को बचा लेता है।
आपको शायद उस उदाहरण की याद हो जिसका प्रयोग एक पुराने धर्मविज्ञानी ने इस विचार की एक अनुमानित धारणा देने के प्रयत्न में किया था—समझ के द्वारा एक विस्तृत धारणा।
अनन्त का अध्ययन करने और उसे समझने का प्रयत्न करने के दो तरीके हैं: एक तर्क-बुद्धि के द्वारा, जो सीधे-सीधे अनन्त की पुष्टि करती है, और दूसरा समझ के द्वारा, जो सीमित वस्तुओं की धारणाओं और अनुमानों के द्वारा केवल उसके निकट पहुँचने का प्रयत्न करती है। धारणा के ये दोनों तरीके अभ्यास से विकसित किए जा सकते हैं। कोई मनुष्य किसी जहाज़ के डेक पर खड़ा होकर जल के उस विस्तार पर दृष्टि डाले जिसका कोई किनारा नहीं दिखता, तो उसे विशालता का कुछ विचार मिल सकता है; या, इससे भी अच्छा, वह बाहर जाकर संध्या के धुँधले प्रकाश में तारों को देखे; तब उसे उनकी संख्या का, और उस आकाश की विशालता का, जिसमें वे चारों ओर बिखरे हुए हैं, कुछ विचार मिल सकता है।
दूसरी ओर, उसकी तर्क-बुद्धि उसे तुरन्त बताती है कि यह आकाश असीम है। उसकी समझ केवल इस महान विचार के निकट पहुँचने में उसकी सहायता करती है। जब वह आकाश के अनगिनत तारों को निहारे, तो कल्पना करे कि उसमें इच्छानुसार अन्तरिक्ष में ऊपर उठने की शक्ति है, और वह हज़ारों वर्षों तक बिजली की सी गति से ऊपर चढ़ता जाता है। उन महिमामय पिण्डों के एक के बाद एक निकट पहुँचते हुए, वह उनके परिमाण की और अधिक स्पष्ट और भव्य धारणाएँ ग्रहण करता है, जब वह चन्द्रमा, सूर्य, और अनुपम तेज और महिमा वाले अन्य सूर्यों के पार उड़ता चला जाता है। अनन्तकाल के महान विचार के सम्बन्ध में समझ की धारणाओं का भी यही हाल है।
जिस पुराने लेखक की ओर मैंने संकेत किया, वह कल्पना करता है कि एक पक्षी हज़ार वर्ष में एक बार रेत का केवल एक कण उठाकर पृथ्वी के पूरे गोले को हटा रहा है। इसमें लगभग कैसा अनन्तकाल लगेगा! और फिर भी इससे अनन्तकाल नापा नहीं जा सकता।
हे पापी, मान लीजिए कि इस पूरी अवधि में पीड़ा सहनेवाले आप ही हैं, और आपके भाग्य में तब तक पीड़ा सहना लिखा है जब तक यह कल्पित पक्षी रेत का अन्तिम कण न हटा दे।
मान लीजिए कि आपको उससे अधिक कुछ न सहना पड़े जितना आपने कभी-कभी अनुभव किया है; फिर भी मान लीजिए कि उस पक्षी को इसी धीमी प्रक्रिया से न केवल इस संसार को हटाना है—क्योंकि यह तो तुलना में एक छोटा सा कण मात्र है—बल्कि सारे भौतिक विश्व को भी। एक बार में केवल एक ही कण!
या मान लीजिए कि विश्व जितना है उससे दस लाख गुना अधिक विस्तृत होता, और फिर यह कि आपको इस पूरे समय तक पीड़ा सहते रहना है, जबकि वह पक्षी धीरे-धीरे हर हज़ार वर्ष में एक बार एक ही नन्हा सा
कण हटाता है! क्या यह आपको अनन्तकाल जैसा नहीं लगेगा? यदि आप जानते कि आपको सारे समय के लिए सब प्रकार के सुख से वंचित रहना है, तो क्या यह ज्ञान पूरी तरह कुचल देनेवाले बल के साथ आपके प्राण में नहीं धँस जाता?
परन्तु आख़िरकार, यह तो केवल समझ की एक धारणा है। इस प्रकार नापे गए इस समय को तब तक बीतने दीजिए जब तक वह सब कुछ न हट जाए जिसे परमेश्वर ने कभी सृजा है या कभी सृज सकता है; तब भी यह मुश्किल से कोई तुलना प्रस्तुत करता है, क्योंकि अनन्तकाल का कोई अन्त नहीं। आप उसके अन्त के निकट पहुँच भी नहीं सकते। जितनी लम्बी से लम्बी अवधि की आप कल्पना कर सकते हैं, उसके बीत जाने के बाद भी आप उसके अन्त के उससे अधिक निकट नहीं पहुँचे जितने आप तब थे जब आपने आरम्भ किया था। हे पापी, “जिस दिन परमेश्वर आपसे ऐसा व्यवहार करेगा, क्या उस दिन आपका हृदय दृढ़ और आपके हाथ स्थिर रह सकेंगे?”
परन्तु आइए इस बात के एक और पहलू पर दृष्टि डालें। जो किसी पापी का मन फिराता है वह न केवल अधिक दुःख बचाता है, बल्कि उस सब से अधिक आनन्द प्रदान करता है जो सारे संसार ने, या सारे सृजे हुए विश्व ने भी, अब तक भोगा है। क्या आपने किसी पापी का मन फिराया है? सचमुच! तो सोचिए कि क्या प्राप्त हुआ है! क्या कोई पूछता है—तो क्या हुआ? इस बात के तथ्य ही उत्तर दें। वह समय आएगा जब वह कहेगा—परमेश्वर और ईश्वरीय बातों के अपने अनुभव में मैंने उस सब से अधिक आनन्द भोगा है जो सारे सृजे हुए विश्व ने सामान्य न्याय के दिन तक भोगा था—हमारे संसार की पूरी अवधि में सारे प्राणियों के कुल आनन्द से भी अधिक; और फिर भी मेरा आनन्द तो अभी आरम्भ ही हुआ है! आगे, और आगे—सदा आगे ही आगे मेरी धन्यता की गहरी लहर बहती जाती है, और सदा बढ़ती ही जाती है!
फिर उस काम को भी देखिए जिसमें यह मन फिराया हुआ मनुष्य लगा है। ज़रा उसे देखिए। किसी उजले समय में जब आपने परमेश्वर की और उसके प्रेम की झलकें पाई हैं, और कहा है—हाय, काश यह सदा बना रहता! हाय, आपने कहा है, काश यह तूफ़ानी संसार मेरे चारों ओर न होता!
“भला होता कि मेरे कबूतर के से पंख होते तो मैं उड़ जाता और विश्राम पाता।” वे तो स्वर्ग के विश्राम के लिए केवल लालसाएँ थीं—और यह, जिसका आनन्द मन फिराया हुआ मनुष्य ऊपर उठाता है, स्वयं स्वर्ग है।
इसमें आपको अनन्त विस्तार—निरन्तर वृद्धि—का समृद्ध और महिमामय विचार भी जोड़ना होगा।
उसकी धन्यता न केवल सदा बनी रहती है, बल्कि सदा बढ़ती भी रहती है। और यही हर मन फिराए हुए पापी का परम आनन्द है।
यदि ये बातें सच हैं, तो— 1. पापियों का मन फिराना ही मसीही जीवन का काम है। यही वह महान काम है जिसके लिए हम मसीही होने के नाते विशेष रूप से ठहराए गए हैं। इसमें कौन सन्देह कर सकता है?
2. यह जीवन का महान काम है क्योंकि इसका महत्व माँग करता है कि ऐसा ही हो। यह महत्व में किसी भी दूसरे काम से इतना बढ़कर है कि इसे तर्कसंगत रूप से जीवन के महान काम के सिवा और कुछ, या उससे कम कुछ, नहीं माना जा सकता।
3. इसे जीवन का महान काम बनाया जा सकता है, क्योंकि यीशु मसीह ने इसका प्रबन्ध कर दिया है।
उसका प्रायश्चित सारी मानव जाति को ढाँप लेता है और ऐसी चौड़ी नींव डालता है कि जो कोई चाहे वह आ सकता है। इस काम में हर मसीही की सहायता करने के लिए उसके आत्मा की प्रतिज्ञा भी उतनी ही चौड़ी है, और उसका उद्देश्य यह था कि प्राणों को बचाने के इस काम में हर एक के लिए परमेश्वर का सहकर्मी बनने का मार्ग खुल जाए।
V. किसी प्राण को मृत्यु से बचाने का महत्व।
4. परोपकार इससे कम पर कभी रुक नहीं सकता। जहाँ इतनी भलाई की जा सकती है और इतना दुःख रोका जा सकता है, वहाँ यह कैसे सम्भव है कि परोपकार अपना पूरा ज़ोर लगाने से चूक जाए?
5. दूसरों को बचाने के लिए जीना स्वयं अपने उद्धार की शर्त है। कोई भी मनुष्य जो दूसरों को बचाने के लिए नहीं जीता, सचमुच मन फिराया हुआ नहीं है। हर सचमुच मन फिराया हुआ मनुष्य स्वार्थ से परोपकार की ओर मुड़ता है, और परोपकार निश्चय ही उसे अपने संगी मनुष्यों के प्राणों को बचाने के लिए जो कुछ वह कर सकता है वह सब करने की ओर ले जाता है। परोपकारी कार्य का यही अपरिवर्तनीय नियम है।
6. जो स्वयं धोखे में हैं, उन्हें सदा इस विशेषता से पहचाना जा सकता है—वे अपने आप को बचाने के लिए जीते हैं। उनके सारे धर्म का मुख्य लक्ष्य यही है। उनके सारे धार्मिक प्रयत्न और गतिविधियाँ इसी एकमात्र उद्देश्य की ओर झुकी रहती हैं। यदि वे अपने मन-परिवर्तन को ऐसा पक्का कर लें कि उसके विषय में काफ़ी निश्चिन्त हो जाएँ, तो वे सन्तुष्ट हो जाते हैं। कभी-कभी स्वाभाविक सहानुभूति के बन्धन उन लोगों को भी समेट लेते हैं जो उनके विशेष रूप से निकट हैं; परन्तु स्वार्थ सामान्यतः इससे आगे नहीं जाता, सिवाय इसके कि अच्छा नाम कमाने की इच्छा उन्हें आगे बढ़ाए।
7. कुछ लोग पापियों का मन फिराने के लिए कोई परिश्रम नहीं करते, बल्कि ऐसा व्यवहार करते हैं मानो इस बात का कोई महत्व ही न हो। वे मनुष्यों को परमेश्वर से मेल कर लेने के लिए मनाने का परिश्रम नहीं करते।
कुछ लोग ऐसे लगते हैं मानो किसी चमत्कारी हस्तक्षेप की प्रतीक्षा कर रहे हों। वे अपने बच्चों या मित्रों के लिए कोई परिश्रम नहीं करते। बहुत कुछ ऐसे मानो उन्हें इस महान परिणाम में कोई रुचि ही न हो, वे प्रतीक्षा करते रहते हैं कि परमेश्वर या कोई चमत्कार कुछ करे। हाय, मानव जीवन के इस महान काम में वे कुछ भी नहीं करते!
बहुत से अंगीकार करनेवाले मसीहियों को परमेश्वर की आशीष पर कोई विश्वास नहीं, और इसलिए सफलता की कोई आशा भी नहीं। फलस्वरूप वे विश्वास के साथ कोई प्रयत्न नहीं करते। उनका अपना अनुभव उनकी सहायता के लिए किसी काम का नहीं, क्योंकि उन्होंने कभी विश्वास नहीं रखा, इसलिए उन्हें कभी सफलता भी नहीं मिली। बहुत से पादरी ऐसा प्रचार करते हैं कि उससे कोई भलाई नहीं होती। इतने लम्बे समय तक असफल रहने के कारण उन्होंने सारा विश्वास खो दिया है। वे सफलता की आशा के साथ काम में नहीं लगे, और इसलिए उन्हें सफलता नहीं मिली।
धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत से लोग, जो पादरी नहीं हैं, ऐसा लगता है कि सारा भरोसा खो चुके हैं। उनसे पूछिए कि क्या वे कुछ कर रहे हैं, तो वे सच ही उत्तर देते हैं—कुछ भी नहीं। परन्तु यदि उनके हृदय प्राणों के प्रेम से या मसीह के प्रेम से भरे होते, तो वे निश्चय ही प्रयत्न करते। कम से कम वे पापियों को उनके मार्ग की भूल से फेर लाने का प्रयत्न तो अवश्य करते। वे धर्म को जीते—उसकी ज्योति को एक स्वाभाविक, सहज बात के रूप में ऊँचा उठाए रखते।
हर एक को, चाहे पुरुष हो या स्त्री, किसी भी आयु का, और जीवन में किसी भी स्थिति में क्यों न हो, प्राणों को बचाना अपना काम बना लेना चाहिए। निस्सन्देह और भी बहुत से काम करने हैं; उन्हें उनका स्थान मिले। परन्तु सब से बड़े काम की उपेक्षा न कीजिए।
बहुत से अंगीकार करनेवाले मसीही ऐसे लगते हैं कि उन्होंने कभी किसी पापी का मन नहीं फिराया। मैं आपसे पूछूँ, आपका क्या हाल है? आप में से कुछ उत्तर दे सकते हैं—परमेश्वर की कृपा से मैं कुछ प्राणों के उद्धार का साधन बना हूँ।
परन्तु आप में से कुछ तो इतना भी नहीं कह सकते। आप जानते हैं कि आपने इस उद्देश्य के लिए कभी ईमानदारी से और पूरे हृदय से परिश्रम नहीं किया। और आप नहीं जानते कि आप कभी एक भी पापी के मन-परिवर्तन का साधन बने हों।
यहाँ के उन नए विश्वासियों के विषय में मैं क्या कहूँ? क्या आपने अपने आप को इस काम के लिए सौंप दिया है? क्या आप परमेश्वर के लिए परिश्रम कर रहे हैं? क्या आप अपने पश्चाताप न करनेवाले मित्रों के पास, यहाँ तक कि उनके कमरों तक, गए हैं, और व्यक्तिगत, प्रेमपूर्ण अनुनय के द्वारा उनसे बिनती की है कि वे परमेश्वर से मेल कर लें?
V. किसी प्राण को मृत्यु से बचाने का महत्व।
क्या आपने अपनी लेखनी से, और अपने अधिकार के हर प्रकार के प्रभाव से, प्राणों को बचाने और इस काम में जो कुछ आप कर सकते हैं वह करने का प्रयत्न किया है? क्या आप सफल हुए हैं?
मान लीजिए इस मंडली में धर्म का अंगीकार करनेवाले सब लोग ऐसा करें, हर एक अपने-अपने क्षेत्र में, और हर एक वह सब करते हुए जो वह अलग-अलग कर सकता है, तो कितने लोग बिना मन फिराए रह जाएँगे? यदि हर एक कहे, “इस काम के लिए मैं अपने आप को अपने परमेश्वर की वेदी पर रखता हूँ; मैं अपनी सारी पिछली चूकों को मान लेता हूँ; अब से, परमेश्वर मेरी सहायता करे, यही मेरे जीवन का परिश्रम होगा;” यदि हर एक सारे पुराने अपराधों और ठोकर के कारणों को दूर करने से आरम्भ करे—अपनी ढिलाई और सार्वजनिक अपराध के हर दूसरे रूप को सबके सामने मान ले और उस पर शोक करे, यह मान ले कि आपने प्राणों के लिए कितना कम किया है, और पुकार उठे: हाय, इस विषय में मैं कैसी दुष्टता से जीता रहा हूँ! परन्तु मुझे सुधरना होगा, मान लेना होगा, पश्चाताप करना होगा, और अपने जीवन का मार्ग पूरी तरह बदलना होगा; यदि आप सब ऐसा करें और फिर हर एक अपने-अपने स्थान पर, पूरी गम्भीरता से अपने पड़ोसी पर हाथ रखकर उसे आग में से खींच निकालने में लग जाए—तो इसका परिणाम कितना महिमामय होगा!
परन्तु दूसरों के प्राणों की उपेक्षा करना और यह सोचना कि आप स्वयं फिर भी बच जाएँगे, दोष की सबसे बुरी भूलों में से एक है! क्योंकि जब तक आप दूसरों को बचाने के लिए नहीं जीते, तब तक आप स्वयं बचाए जाने की आशा कैसे रख सकते हैं? “यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।”
