उपदेश 16 (31 में से)

8. बुराई करने पर तुला हुआ दुष्ट मन

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

8. बुराई करने पर तुला हुआ दुष्ट मन।

8. बुराई करने पर तुला हुआ दुष्ट मन।

“बुरे काम के दण्ड की आज्ञा फुर्ती से नहीं दी जाती; इस कारण मनुष्यों का मन बुरा काम करने की इच्छा से भरा रहता है।”—सभोपदेशक 8:11।

यह पद स्पष्ट रूप से यह मानकर चलता है कि वर्तमान जीवन प्रतिफल और दण्ड की वह अवस्था नहीं है जिसमें मनुष्यों के साथ उनके चरित्र और आचरण के अनुसार व्यवहार किया जाता हो। यह बात यहाँ सचमुच कही तो नहीं गई है, परन्तु मान ली गई है, जैसे कि सारी बाइबल में हर कहीं मान ली गई है। हर कोई जानता है कि हमारी यह अवस्था वर्तमान प्रतिफल और दण्ड की अवस्था नहीं है; हर मनुष्य का अनुभव और अवलोकन इस तथ्य की गवाही ऐसी सामर्थ से देता है कि वह मन को पूरा निश्चय करा देती है। इसलिए यह पूरी तरह उचित है कि बाइबल इसे एक जानी-पहचानी सच्चाई मानकर चले। जो कोई अपनी बाइबल पढ़ता है, उसे अवश्य दिखाई देगा कि उसमें बहुत सी बातें सत्य मान ली गई हैं, और ये ठीक वही बातें हैं जिन्हें हर मनुष्य सत्य जानता है, और जिन्हें कोई भी इससे अधिक निश्चय के साथ न जान सकता, चाहे परमेश्वर बाइबल के हर पृष्ठ पर उनकी पुष्टि क्यों न कर देता। इस सच्चाई के विषय में, हर मनुष्य जानता है कि इस वर्तमान जीवन में उसे स्वयं वैसा दण्ड नहीं मिलता जैसे का वह योग्य है। हर मनुष्य अपने पड़ोसियों के विषय में भी यही बात देखता है। भजनकार इस संसार में धर्मियों और दुष्टों की अलग-अलग दशाओं के बीच दिखाई देनेवाले प्रत्यक्ष अन्याय से ऐसा चकित हुआ कि उसे बड़ी ठोकर लगी, “जब तक कि,” वह कहता है, “मैं ने ईश्वर के पवित्रस्थान में जाकर उन लोगों के परिणाम को न सोचा।”

इस खण्ड में यह भी मान लिया गया है कि सब मनुष्यों का स्वभाव से एक ही सा मन है। उन सब के विषय में एक सामान्य तथ्य कहा गया है, और इस प्रकार यह मान लिया गया है कि उन सब का चरित्र एक सा है। “मनुष्यों का मन बुरा काम करने की इच्छा से भरा रहता है।” दूसरी जगह भी ऐसा ही है: “परमेश्वर ने देखा कि उसके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है।” परमेश्वर अपने वचन में पापियों के विषय में इसी सामान्य रीति से बात करता है। वह सदा यह मानकर चलता है कि स्वभाव से उन सब का झुकाव एक सा है।

यह पद यह भी दिखाता है कि पापी के मन का नैतिक स्वरूप क्या है: वह “बुराई करने पर पूरी तरह तुला हुआ” है।

परन्तु यहाँ हमें थोड़ा ठहरकर यह पूछना चाहिए कि हमारे इस खण्ड में “मन” शब्द से क्या अभिप्राय है। यह स्पष्ट है कि बाइबल में यह शब्द अर्थ की विभिन्न छटाओं में प्रयोग किया गया है; कभी विवेक के लिए, जैसे उस खण्ड में जो कहता है, “जिस बात में हमारा मन हमें दोष देगा, तो परमेश्वर हमारे मन से बड़ा है,” और उससे यह आशा की जा सकती है कि वह हमें और भी अधिक दोषी ठहराएगा; कभी यह शब्द बुद्धि के लिए प्रयोग होता है; परन्तु यहाँ यह बिल्कुल स्पष्ट रूप से इच्छा(-शक्ति) के लिए है, क्योंकि मन की यही एकमात्र शक्ति है जिसके विषय में कहा जा सकता है कि वह किसी निश्चित ऐच्छिक कार्य-मार्ग पर ठनी हुई—स्थिर—झुकी हुई और दृढ़ निश्चित है। इच्छा ही वह शक्ति है जो अपने आप को किसी चुने हुए मार्ग पर स्थिर कर देती है; इसलिए हमारे पद में “मन” शब्द से इच्छा ही का अभिप्राय होना चाहिए; नहीं तो इस खण्ड का कोई समझ में आने योग्य अर्थ नहीं निकाला जा सकता।

परन्तु दुष्ट मनुष्यों की इच्छा किस दिशा में और किस लक्ष्य पर पूरी तरह लगी हुई है? उत्तर है, बुराई करने पर। परमेश्वर का वचन गम्भीरता से यही घोषित करता है।

परन्तु, स्पष्टीकरण के रूप में यह कह देना चाहिए कि इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य बुराई को केवल बुराई के लिए करते हैं; इसका यह अर्थ नहीं कि पाप करना, अर्थात् परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करना, ही उनका सीधा लक्ष्य होता है—नहीं; पियक्कड़ इसलिए नहीं पीता कि पीना दुष्टता है, परन्तु वह पीता है यद्यपि पीना दुष्टता है। वह उस वर्तमान सुख के लिए पीता है जिसकी वह आशा दिलाता है—पाप करने के लिए नहीं। झूठ बोलनेवाले मनुष्य के विषय में भी ऐसा ही है। उसका उद्देश्य परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ना नहीं, परन्तु झूठ बोलकर अपने लिए कोई लाभ पाना है; तौभी वह परमेश्वर के निषेध के बावजूद झूठ बोलता है।

उसका मन इस बात पर पूरी तरह तुल सकता है कि जब कभी उसे सुविधाजनक लगे, और उस लाभ के लिए जिसे वह इस प्रकार पाने की आशा करता है, वह झूठ बोले; और परमेश्वर का भयानक निषेधों और दण्डों के द्वारा उसे इस मार्ग से रोकने का परिश्रम करना व्यर्थ ठहरता है। चोरी, व्यभिचार और दूसरे पापों के विषय में भी ऐसा ही है। हमें यह नहीं समझना चाहिए कि मनुष्य शुद्ध दुष्टता के प्रेम के कारण इन पापों पर अपना मन लगाते हैं; परन्तु वे उस लाभ के लिए दुष्टता करते हैं जिसे वे उसके द्वारा पाने की आशा रखते हैं। कामुक मनुष्य शायद प्रसन्न होता यदि अपनी वासना को तृप्त करना दुष्टता न होती; परन्तु यद्यपि वह दुष्टता है, तौभी वह उसे करने पर अपना मन लगा देता है। आदम और हव्वा ने वर्जित फल खाया; क्यों? क्योंकि उन्होंने देखा कि वह सुन्दर है, और उनसे कहा गया था कि वह उन्हें बुद्धिमान बना देगा; इसलिए, उस लाभ के लिए जिसकी उन्हें आशा थी, और परमेश्वर के निषेध के बावजूद, उन्होंने लेकर खा लिया। मैं जानता हूँ कि कभी-कभी कहा जाता है कि पापी पाप को पाप ही के लिए प्रेम करते हैं, पाप होने के नाते पाप के शुद्ध प्रेम से, केवल इसलिए कि वह परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन है, एक स्वाभाविक रुचि के साथ, जैसे भेड़िये मांस से प्रेम करते हैं; परन्तु यह सत्य नहीं है—कम से कम बहुत से मामलों में तो निश्चय ही नहीं; सीधी सच्चाई यह है कि मनुष्य पाप पर उसी के लिए अपना मन नहीं लगाते, परन्तु उस लाभ के लिए पाप करने पर मन लगाते हैं जिसे वे उससे पाने की आशा रखते हैं।

अब इस भाषा पर विशेष ध्यान दीजिए, “मन बुराई करने पर पूरी तरह तुला हुआ है।” एक मनुष्य लोभी है; वह धनी बनने पर अपना मन लगाता है, हो सके तो ईमानदारी से, परन्तु धनी तो किसी न किसी तरह बनना ही है; हो सके तो उचित साधनों से धन पाना, परन्तु पाना अवश्य। दूसरा महत्वाकांक्षी है। प्रतिष्ठा का प्रेम उसके प्राण में भरा रहता है और उसे जलाता रहता है, और इसलिए शायद वह अपने व्यवहार में बहुत शिष्ट और बहुत मिलनसार बन जाता है—कभी-कभी बहुत धार्मिक भी—यदि धर्म लोकप्रिय हो, परन्तु पूरी तरह स्वार्थी, और इतना अधिक धार्मिक होने के कारण वह कुछ कम स्वार्थी नहीं हो जाता।

स्वार्थ हज़ारों रूप और प्रकार धारण कर लेता है; परन्तु वे सब के सब, और उनमें से हर एक, पापमय हैं, क्योंकि सारे मन को परमेश्वर की सेवा करने में, और तर्क-बुद्धि पर प्रगट किए गए हर कर्तव्य को पूरा करने में, अपने आप को सौंप देना चाहिए। हव्वा ने क्या किया? उसने ज्ञान की अपनी लालसा को, और आत्म-भोग के सुख को, तृप्त करने में अपने आप को सौंप दिया। उसने उस झूठी आत्मा पर विश्वास करने की सहमति दी जिसने उससे कहा कि वह वृक्ष “बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य” है। उसने सोचा कि यह तो बहुत महत्वपूर्ण बात होगी। वह देखने में भी खाने के लिए अच्छा जान पड़ता था, और उसकी भूख बहुत भड़क उठी; जितना अधिक वह देखती गई उतनी ही अधिक उत्तेजित होती गई, और अब वह क्या करे? परमेश्वर ने उसे छूने से मना किया था: क्या वह परमेश्वर की आज्ञा माने, या अपनी भड़की हुई भूख की? परमेश्वर की आज्ञा के बावजूद उसने उसे खा लिया। क्या वह पाप था? बहुत से लोग उसे बहुत छोटा पाप समझेंगे; परन्तु वह परमेश्वर के विरुद्ध सच्चा विद्रोह था, और वह उस पर अपनी भयानक अप्रसन्नता प्रगट किए बिना रह ही नहीं सकता था!

इसी प्रकार हर कहीं, परमेश्वर के अधिकारपूर्ण दावों के विरुद्ध भूख और वासना की माँगों के आगे झुक जाना घोर पाप है। सब मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और उसकी आज्ञा मानने के लिए बाध्य हैं, चाहे इसमें कितना ही आत्म-त्याग और बलिदान क्यों न करना पड़े।

मैंने कहा कि स्वार्थ प्रायः धार्मिक रूप धारण कर लेता है। आरम्भ में मन सुसमाचार की कुछ महान और हिला देनेवाली सच्चाइयों से बहुत प्रभावित हो सकता है; परन्तु शीघ्र ही वह पूरी तरह स्वार्थी दृष्टिकोण अपना लेता है, केवल दण्ड से बचने की चिन्ता करता है, और धर्म को लाभ का विषय बना लेता है। यह देखकर आश्चर्य होता है कि ऐसे मामलों में मन सुसमाचार के उद्देश्य को कैसे पूरी तरह गलत समझ लेता है, और इस महान तथ्य को बिल्कुल आँखों से ओझल कर देता है कि सुसमाचार मनुष्य के स्वार्थ को जड़ से उखाड़ना और उसके मन को शुद्ध परोपकार (निःस्वार्थ प्रेम) की ओर खींच लाना चाहता है। यह मूलभूत भूल करके, वह सुसमाचार की सारी व्यवस्था को छूटों (इंडल्जेंस) की एक योजना समझ बैठता है। इसका उदाहरण आप उस दृष्टिकोण में देख सकते हैं जो कुछ लोग मसीह की धार्मिकता के आरोपण के विषय में रखते हैं, जिसे वे समझते हैं कि उनके पाप में जीते रहते हुए भी उनके नाम गिन ली जाती है। अर्थात्, वे समझते हैं कि वे व्यवस्था तोड़ने के दण्ड से पूरी छूट पा लेते हैं, और पूर्ण आज्ञाकारिता के सम्मान और प्रतिफल भी पा लेते हैं, जबकि पाप के जीवन के सारे आत्म-भोग भी उनके पास बने रहते हैं। कितनी भयानक बात!

क्या रोमी (कैथोलिक) पाप-मोचन-पत्र (इंडल्जेंस) कभी इससे भी बुरे थे?

ऐसे किसी मामले की पूरी जाँच कीजिए और आप देखेंगे कि उसमें जितना भी धर्म है, उस सब की तह में स्वार्थ ही है। वह मनुष्य पहले सांसारिक था और अब भक्त है; परन्तु भक्त उसी कारण से है जिस कारण से वह सांसारिक था। स्वार्थी मन ही दोनों व्यवस्थाओं की समान नींव है।

उसी आत्मा से वही लक्ष्य खोजे जाते हैं; नैतिक चरित्र वैसा का वैसा बना रहता है। शायद वह प्रार्थना करता है; परन्तु यदि करता है, तो वह परमेश्वर से माँगता है कि वह उसके लिए कुछ बड़े-बड़े काम करे, जिनसे उसके अपने स्वार्थी उद्देश्य आगे बढ़ें। उसे इस बात का तनिक भी विचार नहीं कि वह अपने आप को परमेश्वर के हितों के लिए ऐसा सौंप दे कि आगे से वह परमेश्वर के साथ पूरी सहानुभूति में रहे, केवल परमेश्वर ही के हितों की इच्छा करे और उन्हीं को खोजे, और उसके पास परमेश्वर के हितों के सिवा सेवा करने के लिए कोई दूसरा हित ही न रहे।

इस बात को स्पष्ट करने के लिए, मान लीजिए कि एक पिता अपने बच्चों से कहे, “यदि तुम मेरे साथ काम करोगे, और सचमुच अपने हितों को मेरे हितों के साथ एक कर लोगे, तो मैं अपनी सम्पत्ति तुम्हें दे दूँगा; और यदि तुम ऐसा करने को तैयार नहीं हो, तो मैं तुम्हें उत्तराधिकार से वंचित कर दूँगा।” अब कुछ बच्चे इस प्रस्ताव के विषय में पूरी तरह स्वार्थी दृष्टिकोण अपना सकते हैं, और मन ही मन कह सकते हैं—अब मैं पिताजी के लिए बस उतना ही करूँगा जितने से उनका धन मुझे मिल जाए; मैं उन्हें यह जताऊँगा कि मैं उनके हितों के लिए बहुत उत्साही हूँ, और मैं बस उतना ही करूँगा जितने से प्रस्तावित प्रतिफल पक्के हो जाएँ; पर मैं इससे अधिक क्यों करूँ?

या किसी मानवीय सरकार का उदाहरण लीजिए जो अपराधियों को इस शर्त पर प्रतिफल देने का प्रस्ताव करती है कि वे फिर से आज्ञाकारिता में लौट आएँ। उस प्रस्ताव की सच्ची आत्मा यहाँ तक जाती है कि वह सरकार की सर्वोत्तम भलाई के लिए उनके मनों की सच्ची भक्ति माँगती है। परन्तु वे इस विषय में पूरी तरह स्वार्थी दृष्टिकोण अपना सकते हैं, और यह ठान सकते हैं कि वे प्रस्ताव को केवल उतना ही स्वीकार करेंगे जितने से प्रतिफल पक्के हो जाएँ, और केवल प्रतिफलों ही के लिए। शासक उनके मनों की सच्ची सहानुभूति—उनकी वास्तविक सद्भावना—चाहता है और उसी की आशा रखता है; और यदि यह दी जाए, तो वह उन्हें बहुत अधिकाई से प्रतिफल देना चाहेगा; परन्तु यदि वे पूरी तरह स्वार्थी हों तो वह उनसे कैसे सन्तुष्ट हो सकता है?

अब एक मनुष्य प्रार्थना करने में भी उतना ही स्वार्थी हो सकता है जितना चोरी करने में, बल्कि कहीं अधिक दुष्ट भी: क्योंकि वह परमेश्वर का और भी घोर ठट्ठा कर सकता है, और सर्वशक्तिमान को घूस देकर अपने स्वार्थी उद्देश्यों की पूर्ति में लगाने का और भी अधर्मी प्रयत्न कर सकता है। मानो वह सोचता हो कि वह मनों के जाँचनेवाले को अपना औज़ार बना सकता है; वह ढिठाई से उसे इस बात के लिए उकसाने का प्रयत्न कर सकता है कि वह उसके हाथों का खिलौना बनकर उसकी चाल चले, और इस प्रकार वह उसके मुँह पर ही उसकी बहुत घोर परीक्षा कर सकता है।

परन्तु यह पद घोषित करता है कि “मनुष्यों का मन बुरा काम करने की इच्छा से भरा रहता है।” शायद आप में से कुछ लोग ऐसा नहीं सोचते; आप ऐसी भ्रष्टता पर विश्वास नहीं करते। ‘ओह,’ वह स्नेहमयी माता कहती है, ‘मैं सोचती हूँ कि मेरी बेटी धर्म की मित्र है। क्या आप सोचते हैं कि उसका मन-परिवर्तन हो गया है?’ ओह नहीं, मन-परिवर्तन तो नहीं हुआ, परन्तु मैं सोचती हूँ कि वह धर्म की मित्र है; धर्म के प्रति उसकी भावना अनुकूल है। क्या वह परमेश्वर के अधिकारपूर्ण दावों को उसी प्रकार पूरा करती है जैसे उसकी सरकार और उसकी प्रतिष्ठा का कोई मित्र करेगा? इस विषय में मैं कुछ नहीं कह सकती। उससे पश्चाताप करने को कहिए और वह क्या कहती है? वह आपसे कहेगी कि वह नहीं कर सकती।”

यह तथ्य कितना चौंका देनेवाला है कि आप समाज की सारी श्रेणियों में घूम आइए और लगभग हर कहीं आपको यही रुख मिलेगा; पापी कहता है, “मैं पश्चाताप नहीं कर सकता—मैं विश्वास नहीं कर सकता।”

बात क्या है? कठिनाई कहाँ है? उस बेटी के पास जाइए, जिसे धर्म की इतनी मित्र समझा जाता है; वह इतनी मिलनसार और कोमल है कि किसी को कष्ट पहुँचाया जाता हुआ देख नहीं सकती; परन्तु ध्यान दीजिए; उसके सामने परमेश्वर के अधिकारपूर्ण दावे रखिए और वह क्या कहती है? मैं नहीं कर सकती; नहीं, मैं नहीं मान सकती

परमेश्वर की, उसकी किसी एक माँग में भी। मैं अपने पाप से पश्चाताप नहीं कर सकती, वह कहती है। परन्तु पश्चाताप करना है क्या, कि यह मिलनसार स्त्री, जो साथ ही धर्म की इतनी मित्र भी है, पश्चाताप करने में असमर्थ हो? बात क्या है? क्या परमेश्वर अपनी माँगों में ऐसा अनुचित है कि वह आप पर ऐसी बातें लादता है जिन्हें करना आपके लिए बिल्कुल असम्भव है? या बात यह है कि आप उसकी भावनाओं की इतनी उपेक्षा करती हैं और सत्य के प्रति इतनी लापरवाह हैं कि अपने आप को धर्मी ठहराने के लिए आप उस पर सबसे घोर अन्याय का दोष लगाएँगी, और झूठ-मूठ यह जताएँगी कि—सारा दोष उसी की ओर है और आपकी ओर कुछ भी नहीं? क्या यह आपके चरित्र का बहुत मनभावना गुण है? क्या यह आपके उन प्रमाणों में से एक है कि मनुष्य का मन बुराई करने पर पूरी तरह तुला हुआ नहीं है?

आप पश्चाताप नहीं कर सकते और परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकते! आपको परमेश्वर की सेवा करने और उसे प्रसन्न करने का मन बना लेना बिल्कुल असम्भव लगता है!

बात क्या है? क्या आपके मन के सामने ऐसे कोई पर्याप्त कारण दिखाई नहीं देते कि आप अपना मन परमेश्वर को सौंप दें? कोई कारण नहीं? स्वर्ग, पृथ्वी और नरक सब मिलकर परमेश्वर का भय मानने और उससे प्रेम करने के अपने कारण आप पर उंडेल सकते हैं, और तौभी आप नहीं कर सकते! क्यों? क्योंकि आपका मन भलाई के बदले बुराई करने पर आपके भीतर पूरी तरह तुला हुआ है। आप पूरी तरह अपने आप को प्रसन्न करने के लिए बँधे हुए हैं। यीशु आपसे विनती कर सकता है—आपके मित्र विनती कर सकते हैं; स्वर्ग और नरक मिलकर अपनी आवाज़ उठाकर विनती कर सकते हैं, और हर वह प्रेरणा जो तर्क, विवेक, आशा और भय से, स्वर्गदूतों और शैतानों से, परमेश्वर और मनुष्य से मन पर दबाव डाल सकती है, एक लम्बी और चमचमाती पंक्ति में आपके मन के सामने से गुज़र सकती है—परन्तु हाय! आपका मन बुराई करने पर इतना पूरी तरह तुला हुआ है कि बदलने की कोई प्रेरणा आपको डिगा नहीं सकती। यह “नहीं कर सकता” है क्या? एक प्रबल “नहीं करूँगा” से न कम, न अधिक!

वह मिलनसार स्त्री ज़ोर देकर कहती है कि वह बहुत भ्रष्ट नहीं है। ओह नहीं, वह तो बिल्कुल नहीं। वह चोरी नहीं करेगी! सच है, उसका स्वार्थ बहुत कोमल और नाज़ुक रूप धारण कर लेता है। उसकी संवेदनाएँ उमड़ पड़ती हैं; वह एक बिल्ली के बच्चे को भी संकट में नहीं देख सकती; परन्तु उसे परमेश्वर के अधिकारों की क्या परवाह है? यीशु मसीह के अधिकारों की क्या परवाह? उसे परमेश्वर की भावनाओं की क्या परवाह है? उसे क्रूस पर चढ़ाए गए परमेश्वर के पुत्र की भावनाओं और सहानुभूतियों की क्या परवाह है? बिल्कुल कुछ भी नहीं। तो फिर उसकी सारी कोमल संवेदनाओं का मूल्य ही क्या है? कबूतरों और बिल्ली के बच्चों में तो यह उससे भी अधिक होती है। निःसन्देह उसके बहुत से कोमल बन्धन हैं, परन्तु वे सब एक पूरी तरह स्वार्थी मन के वश में हैं।

माता हव्वा भी बहुत मनभावनी थी। वास्तव में, पाप करने से पहले वह सचमुच एक भक्त स्त्री थी—और आदम ने निःसन्देह सोचा होगा कि उस पर हर कहीं भरोसा किया जा सकता है; परन्तु देखिए, उसका पतन कितना भयानक हुआ! ऐसी ही उसकी बेटियाँ हैं। एक परिष्कृत स्वार्थ को अपना मन सौंपकर वे परमेश्वर के अत्यन्त धर्मी दावों को ठुकरा देती हैं, और वे गिर चुकी हैं!

इसी प्रकार समाज की सारी श्रेणियों में घूम आइए और आप यही बात देखेंगे। समुद्री डाकुओं के जहाज़ पर जाइए, जहाँ कप्तान सिर से पाँव तक हथियारों से लैस है और उसकी आँखों में नरक की आग है; उससे कहिए कि वह प्रस्तुत किए गए

उद्धारकर्ता को ग्रहण करे और अपने पापों से पश्चाताप करे, और वह ठीक वही उत्तर देता है जो वह मिलनसार बेटी देती है—वह पश्चाताप नहीं कर सकता। उसका मन भी उसके भीतर बुराई करने पर इतना पूरी तरह तुला हुआ है कि वह अपने पापों से फिरकर परमेश्वर की ओर आने के लिए अपनी ही सहमति नहीं जुटा पाता।

ओह, बुराई करने के लिए मन का यह भयानक बन्धन! केवल यही कारण है कि पापी का मन बदलने के लिए पवित्र आत्मा की आवश्यकता है। यदि यह न होता तो आपको पवित्र

आत्मा की उतनी ही कम आवश्यकता होती जितनी ज्योति के किसी स्वर्गदूत को होती है। ओह, पापी का मन परमेश्वर के विरुद्ध कितना भयानक रूप से दृढ़ है! ठीक जहाँ परमेश्वर के अधिकारपूर्ण दावे सामने आते हैं, वहीं उसमें विरोध करने और सामना करने की मानो लगभग सर्वशक्तिमान सामर्थ आ जाती है! सत्य की प्रेरणाएँ पहाड़ जैसी ऊँची लहरों में उठकर उसके लोहे के मन पर टकरा सकती हैं, तौभी देखिए, वह परमेश्वर का सामना करने के लिए अपनी नसों को कैसे कस लेता है! ऐसा क्या है जिसका वह, अपनी इच्छा परमेश्वर के अधीन करने के बदले, सामना न कर ले? इस पद में एक और बात भी प्रसंगवश सामने आती है—मान ली गई है, परन्तु कही नहीं गई—अर्थात्, यह कि पापी पहले ही से दण्ड की आज्ञा के अधीन हैं। पद कहता है, “बुरे काम के दण्ड की आज्ञा फुर्ती से नहीं दी जाती,” जिसका अर्थ यह है कि दण्ड की आज्ञा पहले ही सुना दी गई है और वह केवल अपने ठहराए हुए समय की बाट जोह रही है कि उसे कार्यान्वित किया जाए। आप में से जो न्यायालयों में गए हैं, वे जानते हैं कि मुकदमे और दोषसिद्धि के बाद दण्ड की आज्ञा आती है। अपराधी मुजरिमों की बेंच पर बैठता है। न्यायाधीश उठ खड़ा होता है—सब कुछ मृत्यु के समान सन्नाटा है; वह मामले की समीक्षा करता है, और शीघ्र ही उस गम्भीर निष्कर्ष पर पहुँचता है: यह न्यायालय तुम्हें उस अपराध का दोषी ठहराता है जिसका तुम पर आरोप है, और अब तुम्हें तुम्हारी सज़ा सुनाई जाएगी। तब दण्ड की आज्ञा सुना दी जाती है।

इस गम्भीर कार्यवाही के बाद, परिस्थितियों के अनुसार, दण्ड का निष्पादन प्रायः कुछ कम या अधिक समय के लिए टाल दिया जाता है। इसका उद्देश्य या तो यह हो सकता है कि अपराधी को क्षमा प्राप्त करने का अवसर मिले, या यदि इसकी कोई आशा न हो, तो कम से कम उसे गम्भीर चिन्तन के लिए कुछ दिन या सप्ताह मिल जाएँ जिनमें वह परमेश्वर के साथ अपने प्राण की शान्ति प्राप्त कर सके। ऐसे कारणों से फाँसी सामान्यतः टाल दी जाती है। परन्तु दण्ड की आज्ञा के बाद मामले का पूरा फैसला हो चुका होता है। दोष के विषय में कोई और सन्देह बीच में आकर मामले पर प्रभाव नहीं डाल सकता; क्षमा की सम्भावना ही एकमात्र बची हुई आशा है।

वह भयानक दण्ड-आज्ञा उसके विनाश पर मुहर लगा देती है—जब तक कि क्षमा मिलना सम्भव न हो। वह दण्ड-आज्ञा—वह दोषी अपराधी के मन में कैसे धँस जाती है! “अब तुम,” न्यायाधीश कहता है,

“उसी स्थान को लौटाए जाते हो जहाँ से तुम आए थे; वहाँ ठहराए हुए दिन तक तुम्हें बेड़ियों में, कड़ी कैद में रखा जाएगा; फिर तुम्हें तुम्हारे बन्दीगृह से, जैसा भी हो, दस और बारह बजे के बीच निकाला जाएगा, और गले से तब तक लटकाया जाएगा जब तक तुम मर न जाओ। और परमेश्वर तुम्हारे प्राण पर दया करे!” दण्ड की आज्ञा अब सुना दी गई है—न्यायालय ने अपना काम कर दिया है; अब केवल यह शेष है कि शेरिफ़ न्याय को कार्यान्वित करनेवाले के रूप में अपना काम करे, और वह भयानक दृश्य समाप्त हो जाए।

बाइबल पापी की दशा को ऐसा ही दिखाती है। वह दण्ड की आज्ञा के अधीन है, परन्तु उसकी दण्ड-आज्ञा फुर्ती से पूरी नहीं की जाती। उसे कुछ मोहलत दी जाती है। ईश्वरीय शासन की व्यवस्था को किसी न्यायालय की, किसी जूरी की आवश्यकता नहीं; व्यवस्था स्वयं कहती है, “जो प्राणी पाप करे वही मर जाएगा;” “जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह स्त्रापित है;” इस प्रकार व्यवस्था के आदेश में हर पापी पर व्यवस्था की दण्ड-आज्ञा सम्मिलित है—ऐसी दण्ड-आज्ञा जिससे क्षमा के सिवा न कोई बचाव हो सकता है और न कोई मोहलत। पापी के लिए यह कैसी स्थिति है!

परन्तु अब एक और विचित्र तथ्य पर विचार कीजिए। क्योंकि दण्ड की आज्ञा फुर्ती से पूरी नहीं की जाती; क्योंकि दण्ड के निष्पादन में कुछ विलम्ब होता है; क्योंकि दया प्रबल होकर दोषी ठहराए गए अपराधी के लिए कुछ दिनों की मोहलत दिला देती है, ताकि दण्ड अपराध के ठीक पीछे-पीछे न आ पड़े, इस कारण

“मनुष्यों का मन बुरा काम करने की इच्छा से भरा रहता है।” यह कितनी चकित कर देनेवाली बात है! तुरन्त निष्पादन से थोड़ी सी मोहलत देने में राजा के अनुग्रहपूर्ण उद्देश्य का यह कैसा विकृत रूप और कैसा दुरुपयोग है!

आइए देखें कि हमारे किसी मित्र या पड़ोसी के मामले में यह कैसा दिखाई देगा। उसने एक भयानक अपराध किया है, वह पकड़ा जाता है, उस पर मुकदमा चलता है, वह दोषी ठहराया जाता है, उसे दण्ड की आज्ञा सुनाई जाती है, और अपनी फाँसी के दिन और घड़ी की प्रतीक्षा करने के लिए उसे शेरिफ़ के हाथ सौंप दिया जाता है। न्यायाधीश कहता है, मैं फाँसी को इसलिए टालता हूँ कि तुम्हें गवर्नर से क्षमा प्राप्त करने का अवसर मिले। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि गवर्नर अत्यन्त करुणामय व्यक्ति है—उसे क्षमा देना अच्छा लगता है; वह पहले ही हज़ारों को क्षमा कर चुका है; यदि तुम अपनी विद्रोही आत्मा को छोड़ दोगे तो वह बड़ी उदारता से तुम्हें सब कुछ क्षमा कर देगा; इसलिए मैं तुमसे विनती करता हूँ कि तुम अपने आप को निर्दोष ठहराने का कोई प्रयत्न न करना; उसकी दया पर अपने आप को छोड़ देने के सिवा किसी और रीति से मृत्यु से बचने की बात भी न सोचना; अपने आप को इस धोखे में न रखना कि कोई और शरण हो सकती है।

अब मान लीजिए कि यह मनुष्य कहने लगे, “मैंने कुछ नहीं किया—बिल्कुल कुछ भी नहीं। मैं तो केवल सत्य और न्याय के लिए सतायी जानेवाला एक शहीद हूँ! जो भी हो, मैंने कुछ बहुत बुरा नहीं किया—ऐसा कुछ नहीं जिस पर किसी सरकार को ध्यान देना चाहिए। मैं विश्वास नहीं करता कि मुझे दण्ड की आज्ञा सुनाई जाएगी—(वह मनुष्य तो पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है!) मैं तुम में से सबसे अच्छे व्यक्ति जितना ही जीऊँगा।” इस प्रकार वह बहाने बनाने में लग जाता है। वह ऐसे काम में जुट जाता है मानो वह किसी मुकदमे की तैयारी कर रहा हो, और मानो वह न्यायालय के सामने अपनी निर्दोषता सिद्ध करने की आशा रखता हो। नहीं, शायद वह सरकार का विरोध करने और उसे कोसने में भी लग जाता है, उसकी व्यवस्थाओं और उसके अधिकारियों की निन्दा करता है, उनके विषय में कोई भी बात कहने को बहुत बुरी नहीं समझता, अत्यन्त उग्र विरोध में अपने आप को छोड़ देता है, और उन्हीं लोगों को गालियाँ देता है जिनकी दया ने उसके ज़ब्त हो चुके जीवन को बचा रखा है! ऐसा मामला देखकर—ऐसे मनुष्य को देखकर जो सारी मर्यादा का इस प्रकार अपमान करे कि वह उसी सरकार को गालियाँ देने में लग जाए जिसकी धर्मी व्यवस्थाएँ उसने अभी-अभी तोड़ी हैं और फिर जिसकी क्षमाशीलता का उसने अत्यन्त घोर दुरुपयोग किया है—सब मनुष्य कितने स्तब्ध रह जाएँगे! तौभी यह पद घोषित करता है कि पापी का मामला ठीक यही है, और सारा अवलोकन इसकी पुष्टि करता है। आपने इसे दस हज़ार बार दोहराया जाता देखा है; आप पीछे मुड़कर इसे अपने ही मामले में देख सकते हैं। आप जानते हैं कि यह सब सच है—भयानक रूप से, डरावने रूप से सच।

यदि आज रात किसी चौंका देनेवाली, भयानक रीति से आप पर यह प्रगट कर दिया जाए कि आपका प्राण दण्डित होकर नाश के लिए ठहर चुका है, तो आप वज्र से मारे हुए के समान स्तब्ध रह जाएँगे। आप यहोवा की उस सीधी-सादी घोषणा पर विश्वास नहीं करते जो बाइबल के पृष्ठों पर लिखी हुई है। आप निरन्तर अपने आप से कहते रहते हैं—अन्त में मैं दोषी नहीं ठहराया जाऊँगा—मैं जोखिम उठाकर चलता रहूँगा। मैं अभी और भी उसकी सहनशीलता की परीक्षा करने का साहस करूँगा। मैं बिल्कुल विश्वास नहीं करता कि वह मुझे नरक में भेजेगा। कम से कम, मैं कुछ समय और जोखिम उठाकर चलूँगा और आगे चलकर, यदि मुझे बिल्कुल उचित लगे, तो पलट जाऊँगा; परन्तु अभी मैं उस मार्ग पर पूरी तरह मन लगाने से क्यों डरूँ जिसे परमेश्वर ने मना किया है?

ऐसी दुष्टता की बराबरी आपको कहाँ मिलेगी? जरा ऐसी नैतिक ढिठाई की अवस्था के विषय में सोचिए जो परमेश्वर की सबसे बड़ी दयाओं का दुरुपयोग कर सकती है—जो ठंडे मन से कह सकती है—परमेश्वर इतना भला है कि मैं जितना हो सके उतना उसका दुरुपयोग करूँगा; परमेश्वर मुझसे इतना प्रेम करता है कि मैं बिना डरे उसका

अपमान करता रहूँगा और उसकी सहनशीलता को इस हद तक बिगाड़ूँगा कि मेरा प्राण पाप और विद्रोह में पूरी तरह कठोर हो जाए।

हर पापी ध्यान दे—निष्पादन का दिन सचमुच ठहराया जा चुका है। परमेश्वर उसे टाल नहीं देगा।

जब वह आ पहुँचेगा, तब और कोई विलम्ब नहीं हो सकता। परमेश्वर इसलिए प्रतीक्षा नहीं करता कि उसे दण्ड-आज्ञा के न्यायपूर्ण होने में सन्देह है—न इसलिए कि उसके भयानक निष्पादन को देखकर उसका मन आशंका से भर जाता है; परन्तु केवल इसलिए कि वह आपके साथ साधनों का प्रयोग करे और देखे कि क्या वह आपको दया को अपनाने के लिए मना नहीं सकता। बस इतना ही; यही एकमात्र कारण है कि न्याय इतने लम्बे समय से रुका हुआ है और न्याय की तलवार ने बहुत पहले ही आपको मार नहीं गिराया।

यहाँ एक और विचित्र तथ्य है। परमेश्वर ने न केवल निष्पादन को टाला है, परन्तु बड़ी भारी कीमत चुकाकर दया के सुरक्षित प्रयोग के लिए साधन भी तैयार किए हैं। आप जानते हैं कि दया करना स्वभाव से ही एक जोखिम भरी बात है—इसमें यह बड़ा खतरा रहता है कि कहीं इससे व्यवस्था की शक्ति कमज़ोर न हो जाए और मनुष्य दण्ड से बच निकलने की आशा में उसे रौंदने के लिए प्रोत्साहित न हो जाएँ। परन्तु परमेश्वर ने व्यवस्था के पक्ष में एक महिमामय गवाही का प्रबन्ध किया है, जो यह दिखाती है कि उसके मन में यह है कि वह हर बलिदान देकर भी उसे स्थिर रखे,

वह तब तक पाप को क्षमा नहीं कर सकता था जब तक उसकी आहत और अपमानित व्यवस्था का सारे विश्व के सामने सम्मान न हो जाए।

कलवरी पर अपने ही पुत्र के बलिदान में यह सब कुछ कर चुकने के बाद, वह परिणामों के भय के बिना क्षमा कर सकता है, केवल इस शर्त पर कि क्षमा का हर उम्मीदवार पहले पश्चाताप करे।

इसलिए अब परमेश्वर का दयालु मन पूरी तरह खुल गया है, और सेंत-मेंत की क्षमाओं से बुरे परिणामों का कोई भय उसकी दया के प्रयोग में बाधा नहीं डालता। प्रायश्चित से पहले, न्याय तलवार उठाए खड़ा था, और दोषियों से पलटा लेने की माँग कर रहा था; परन्तु प्रायश्चित के लहू के द्वारा और उसी के कारण, परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था को संकट से छुड़ा लिया—उसने उसे अपराधी के अधर्मी पाँव के नीचे से उठा लिया, और उसे सुरक्षा और महिमा के साथ ऊँचे पर स्थापित कर दिया; और अब वह दया का धन्य द्वार पूरा खोल देता है। अब वह अपने आत्मा के रूप में आता है और आपको भीतर आने का निमन्त्रण देता है। हे पापी, वह आपके ठीक मन और कमरे तक आता है, ताकि आपके सारे पापों के लिए आपको पूरी से पूरी सेंत-मेंत की क्षमा दे। क्या आप अपने द्वार पर वह धीमी सी खटखटाहट सुनते हैं? “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ।” उन हाथों को देखिए। क्या वे बेधे नहीं गए? क्या आप उन हाथों को पहचानते हैं? क्या आप जानते हैं कि वे कहाँ गए थे जहाँ उन्हें आर-पार कीलों से ठोंका गया? ओस से भीगी उन लटों को देखिए। आह, द्वार खुलने की प्रतीक्षा में वे कितनी देर से बाहर रखी गई हैं! वह कौन है जो आता है?

क्या वह न्याय का शेरिफ़ है? क्या वह आपको घसीटकर फाँसी पर ले जाने के लिए अपने हथियारबन्द आदमियों के साथ आया है?

ओह, नहीं, नहीं; परन्तु एक जन अपने हाथों में दया का प्याला लिए आता है; वह आपके बन्दीगृह के फाटक के पास आता है, उसकी आँखें करुणा के आँसुओं से भीगी हैं, और आपकी सलाखों की जाली के बीच से वह दया के उस प्याले को आपके सूखे होंठों तक बढ़ाता है। क्या आप वह चेहरा देखते हैं, जो किसी भी मनुष्य से बढ़कर बिगड़ा हुआ है—और तौभी आप बुराई करने पर और भी अधिक पूरी तरह तुल जाते हैं? आह, हे जवान! हाय, हे युवती! क्या दया के परमेश्वर के प्रति आपका मन ऐसा ही है? ऐसे अपराध की बराबरी हम कहाँ पा सकते हैं? क्या इस पागल संसार को छोड़ सारे विश्व में कहीं और यह पाया जा सकता है?

पृथ्वी के दृश्यों और घटनाओं को देखकर स्वर्ग में अद्भुत रुचि जागती होगी। स्वर्गदूत भी इन बातों को ध्यान से देखने की लालसा रखते हैं। ओह, सारा विश्व कैसी जिज्ञासा भरे आश्चर्य से देखता है कि मसीह ने क्या किया है, और जिन पापियों के लिए उसने दुःख उठाया और सब कुछ किया, वे उसके अद्भुत प्रेम का कैसा बदला देते हैं! जब वे आपको बुराई करने पर और भी अधिक पूरी तरह मन लगाते देखते हैं, तो वे ऐसी अनुपम दुष्टता को देखकर भौचक्के होकर पीछे हट जाते हैं! ऐसे पापियों के लिए इसके सिवा और क्या किया जा सकता है कि उन्हें उनके अपने चुनाव के पागलपन और परिणाम पर छोड़ दिया जाए?

परमेश्वर के पास और कोई विकल्प नहीं है। यदि आप उसका दुरुपयोग करेंगे, तो उसे अपनी व्यवस्था को, और उसकी अनन्त मृत्यु की भयानक दण्ड-आज्ञा को, कार्यान्वित करना ही होगा। मान लीजिए कि यह कोई मानवीय सरकार होती और वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न होतीं; कौन नहीं देखता कि दण्ड देने से रुक जाने से तो अच्छा यही होता कि वह सरकार तुरन्त पद त्याग दे? परमेश्वर के विषय में भी ऐसा ही है। यद्यपि वह पापी के मरने से कुछ भी प्रसन्न नहीं होता, और यद्यपि

वह आपको इसलिए कभी नहीं मारेगा कि उसे इसमें आनन्द मिलता है, तौभी यदि वह अपनी व्यवस्था को स्थिर रखना चाहता है तो वह उसे कार्यान्वित करने के सिवा और कर ही क्या सकता है? और उसे स्थिर रखने में किसी भी चूक के लिए वह अपने आप को निर्दोष कैसे ठहरा सकता है? क्या आप उसके विरुद्ध अड़े रहेंगे, और अपने आप को यह धोखा देंगे कि वह आप पर अपनी भयानक दण्ड-आज्ञा को कार्यान्वित करने से चूक जाएगा? ओह, हे पापी, इस बात की कोई सम्भावना नहीं कि आप ठहराए हुए समय को बिना निष्पादन के पार कर जाएँ। मानवीय व्यवस्थाएँ सम्भवतः कार्यान्वित होने से चूक सकती हैं: परमेश्वर की व्यवस्थाएँ कभी नहीं चूक सकतीं! और वह कौन है जो कहता है, “जो दण्ड की आज्ञा उन पर पहिले से हो चुकी है, उसके आने में कुछ भी देर नहीं, और उन का विनाश ऊंघता नहीं?”

1. मैं धर्म का अंगीकार करनेवालों से पूछना चाहता हूँ—क्या आप सोचते हैं कि आप इन सच्चाइयों पर विश्वास करते हैं? मान लीजिए कि इस घर में एक पिता और एक माता भी हैं, और आपकी एक सन्तान है जिसके विषय में आप जानते और मानते हैं कि वह मृत्यु-दण्ड की आज्ञा के अधीन है। आप नहीं जानते कि कहीं आज ही वह दिन और घड़ी न हो जो उसकी फाँसी के लिए ठहराई गई है। आप कितना अनुभव करते हैं? क्या ऐसे तथ्यों का ज्ञान और उन पर विश्वास आपकी शान्ति भंग करता है? अब आपका सिद्धान्त तो यह है कि आपकी सन्तान की दशा इससे अनन्त गुना बुरी है।

आप जानते हैं कि नरक में अनन्त मृत्यु पृथ्वी पर होनेवाली किसी भी सार्वजनिक फाँसी से कहीं अधिक भयानक होगी। यदि आपके अपने बेटे को पृथ्वी पर फाँसी की दण्ड-आज्ञा दी गई होती, तो आपको कैसा लगता?

यह अंगीकार करते हुए कि आप विश्वास करते हैं कि वह नरक की कहीं अधिक भयानक दण्ड-आज्ञा के अधीन है, आप वास्तव में कैसा अनुभव करते हैं?

परन्तु आइए, इस मामले को थोड़ा और फैलाकर देखें। उस बूढ़े पिता और माता को अपने सामने रखिए।

उनका बेटा बरसों पहले समुद्री यात्रा पर गया था। बहुत समय से उन्होंने न उसे देखा है और न उसका एक शब्द भी सुना है। उनके व्याकुल मन कितनी बार उसके विषय में सोचते रहे हैं! वे नहीं जानते कि उसका क्या हाल है, परन्तु उन्हें सबसे बुरे की आशंका है। उनके पास यह जानने का कारण था कि जब उसने घर छोड़ा तब उसके सिद्धान्त बहुत पक्के नहीं थे, और उन्हें डर है कि वह बुरी और उससे भी बुरी संगति में पड़ गया होगा, यहाँ तक कि हो सकता है वह एक ढीठ अपराधी बन गया हो। जब वे इन बातों पर बातचीत कर रहे होते हैं, और समय-समय पर जितने भी समाचारपत्र मिल सकें उन सब को टटोलते रहते हैं, ताकि यदि हो सके तो अपने बेटे के जीवन का कोई सुराग मिल जाए, तब अचानक दरवाज़े की घंटी बजती है; एक सन्देशवाहक भीतर आकर एक पत्र देता है; बूढ़ा पिता उसे लेता है, मुहर तोड़ता है—एक शब्द पढ़ता है और अचानक अपनी कुर्सी पर पीछे गिर पड़ता है, पत्र उसके हाथ से छूट जाता है; ओह, वह उसे पढ़ नहीं सकता! माता अचम्भा करती है और पूछती है; वह लपककर आगे बढ़ती है और गिरे हुए पत्र को उठा लेती है; वह एक शब्द पढ़ती है और उसका मन वेदना से टूट जाता है। बात क्या है? उनके बेटे को मृत्यु-दण्ड की आज्ञा दी गई है, और उसने पुछवाया है कि क्या उसके पिता और माता उसके मरने से पहले उससे मिलने आ सकते हैं। भोर होते ही वे चल पड़ते हैं।

सहानुभूति रखनेवाले पड़ोसी आसपास इकट्ठे हो जाते हैं; सब उदास हैं, क्योंकि यह दुःख की बात है और वे इसे गहराई से अनुभव करते हैं। माता-पिता उतावली से बन्दीगृह पहुँचते हैं, और उस दुःखद मामले का पूरा विवरण जानते हैं। वे एक ही दृष्टि में देख लेते हैं कि क्षमा के सिवा छुटकारे की कोई आशा नहीं हो सकती। गवर्नर पास ही रहता है, वे दौड़कर उसके घर जाते हैं; परन्तु हाय, वे उसे कठोर और अटल पाते हैं। धड़कते हुए मनों और दुखती हुई छातियों पर बोझ लिए, वे विनती पर विनती करते हैं, परन्तु सब व्यर्थ प्रतीत होता है। वह कहता है—तुम्हारा बेटा इतना दुष्ट रहा है और उसने ऐसे अपराध किए हैं कि उसे फाँसी दी ही जानी चाहिए। राष्ट्र की भलाई इसकी माँग करती है, और मैं अपनी सहानुभूतियों को अपनी न्याय-भावना और जन-कल्याण के विषय में अपने दृढ़ विश्वासों पर हावी नहीं होने दे सकता। परन्तु व्याकुल माता-पिता को डटे रहना ही है। ओह, उनके मनों में कैसा संघर्ष है! यह मामला उनके मनों में कैसी जलन पैदा करता है! अन्त में माता बोल उठती है: महोदय, क्या आप पिता हैं? क्या आपका कोई बेटा है? हाँ, एक बेटा। वह कहाँ है? कैलिफ़ोर्निया गया है। आपने उसका समाचार कब से नहीं सुना? मान लीजिए कि वह भी गिर जाए! मान लीजिए कि आपको भी हमारे जैसे दुःख झेलने पड़ें, और एक गिरे हुए बेटे के लिए विलाप करना पड़े! गवर्नर पाता है कि वह भी एक पिता है। पिता के मन की सारी दबी हुई संवेदनाएँ उसके भीतर जाग उठती हैं।

अपने निजी सचिव को बुलाकर वह कहता है, इनके बेटे के लिए क्षमा-पत्र तैयार करो! ओह, वे कैसी भावनाओं की बाढ़ उंडेल देते हैं!

यह सब बहुत स्वाभाविक है। कोई भी मनुष्य इसे बिल्कुल भी विचित्र नहीं समझता।

परन्तु ठीक इसके सामने, उस पापी का मामला देखिए जिसे अनन्त नरक की दण्ड-आज्ञा मिल चुकी है। यदि आपके आत्मिक कान खुले होते, तो आप रथ के पहियों की घड़घड़ाहट सुनते—उस महान न्यायी को अपने गर्जन के रथ पर आते हुए; आप मृत्यु की तलवार को हवा में चमकते और कठोर मनवाले पापी को मार गिराने के लिए तैयार देखते। परन्तु सुनिए, वह मसीही होने का अंगीकार करनेवाला पिता अपने भक्तिहीन बेटे के लिए कैसे प्रार्थना करता है। वह सोचता है कि उसे दिन में एक या दो बार उसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए, इसलिए वह आरम्भ करता है; परन्तु आह, वह अपना विषय लगभग भूल ही गया है। वह मुश्किल से जानता या सोचता है कि वह किस बात के लिए प्रार्थना कर रहा है।

परमेश्वर कहता है, अपने मरते हुए बेटे के लिए प्रार्थना करो! जब तक दया अभी ठहरी हुई है और क्षमा मिल सकती है, उसके लिए अपनी दोहाई ऊँची करो। परन्तु हाय! कहाँ हैं वे मसीही माता-पिता जो ऐसे बेटे के लिए प्रार्थना करते हों जिसे दण्ड की आज्ञा मिल चुकी है और जिसे शीघ्र फाँसी दी जानेवाली है! वे कहते हैं कि वे बाइबल पर विश्वास करते हैं, परन्तु क्या सचमुच करते हैं? क्या वे ऐसा व्यवहार करते हैं मानो वे दण्ड-आज्ञा पाए हुए उन पापियों के विषय में, जो अनन्त नरक में उतरने को तैयार हैं, बाइबल की भयानक सच्चाइयों के आधे पर भी विश्वास करते हों? तौभी ध्यान दीजिए—ज्योंही वे आत्मिक रूप से जाग उठते हैं, तब वे कैसा अनुभव करते हैं! और कैसा व्यवहार करते हैं!

उस अंगीकार करनेवाले को क्या हुआ है जिसमें न प्रार्थना की आत्मा है और न परमेश्वर के साथ कोई सामर्थ? वह नास्तिक है! क्या, जब परमेश्वर कहता है कि उसके बेटे को मृत्यु की दण्ड-आज्ञा मिल चुकी है और मृत्यु का दूत एक ही घड़ी में आकर उसे उसके दोष और पाप में काट गिरा सकता है, और उसकी आत्मा को तुरन्त नरक में भेज सकता है, और तौभी पिता या माता को इस विषय में कोई भावना नहीं होती, तो वे नास्तिक हैं; वे उस पर विश्वास नहीं करते जो परमेश्वर कहता है।

2. फिर भी एक और कल्पना कीजिए। ये दुःखी माता-पिता गवर्नर के पास गए हैं; उन्होंने उसके सामने अपने दुःख उंडेल दिए हैं और अन्त में उसके कठोर हाथों से क्षमा-पत्र छीन लाए हैं। वे उसके घर से बन्दीगृह की ओर ऐसे आनन्द से दौड़ते हैं कि उनके पाँव मानो धरती को छूते ही नहीं; पास पहुँचकर वे रंगरलियों के गीत सुनते हैं, और कहते हैं, हमारा बेटा ऐसी अनुपयुक्त और बेमेल संगति और दृश्यों के कारण कैसी वेदना में होगा! वे शेरिफ़ से मिलते हैं। वे पूछते हैं, यह कौन है जो बन्दीगृह में इतनी मस्ती से गा सकता है? वह आपका अपना बेटा है। उसे फाँसी दिए जाने का कोई विचार ही नहीं है; वह शपथ खाकर कहता है कि वह गवर्नर का घर जला देगा; वास्तव में, वह अत्यन्त हठीली आत्मा दिखाता है, मानो उसका मन बुराई करने पर पूरी तरह तुला हुआ हो। आह, वे कहते हैं, यह तो दुःखदायी है; परन्तु हम उसके दुष्ट और घमण्डी मन को वश में कर सकते हैं। हम उसे क्षमा-पत्र दिखाएँगे और उसे बताएँगे कि गवर्नर कैसा अनुभव करता है। हमें निश्चय है कि इससे वह वश में आ जाएगा। वह ऐसी कृपा और करुणा का सामना नहीं कर सकता।

वे दरवाज़े पर आते हैं; उन्हें भीतर जाने दिया जाता है और वे उसे क्षमा-पत्र दिखाते हैं। वे उसे बताते हैं कि इसके लिए उन्हें कितना मूल्य चुकाना पड़ा है और गवर्नर इस मामले में कितनी कोमलता से अनुभव करता है। वह उसे झपट लेता है, उसके टुकड़े-टुकड़े कर देता है, और उसे अपने पाँवों तले रौंद डालता है! ओह, वे कहते हैं, वह अवश्य पागल हो गया है! परन्तु मान लीजिए कि यह केवल मन की भ्रष्टता है, और वे इसे देख लेते हैं, और जान लेते हैं कि बात यही होगी। हाय, वे चिल्ला उठते हैं, यह तो सबसे बुरा है! क्या! क्षमा पाने को तैयार नहीं—उद्धार पाने को तैयार नहीं! यह तो बाकी सब से भी बुरा है। अच्छा, हमें अपने उजड़े हुए घर लौट जाना चाहिए। हमने तो

अपने बेटे से हाथ धो लिया! हमने अपने आँसुओं से उसके लिए क्षमा-पत्र पाया, परन्तु वह उसे नहीं लेगा। अब हम उसके लिए और कुछ नहीं कर सकते।

वे उदास होकर मुड़ जाते हैं, उससे विदा लेने की भी परवाह नहीं करते। वे दोहरे दुःख के साथ घर जाते हैं—इस बात का दुःख कि वह अपने मूल अपराधों के लिए भी मृत्यु के योग्य है, और प्रस्तुत की गई क्षमा को ठुकराने के अपने उससे भी बड़े अपराध के लिए भी।

फाँसी का दिन आ पहुँचता है; शेरिफ़ अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए उपस्थित है; वह अपने अपराधी को बन्दीगृह से निकालकर फाँसी के स्थान पर ले जाता है; भीड़ चारों ओर उमड़ पड़ती है और उदास होकर साथ-साथ चलती है—अचानक एक सन्देशवाहक दौड़ता हुआ आता है और अपराधी से कहता है, “तुमने एक क्षमा-पत्र तो फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर डाला, परन्तु यह रहा एक और; क्या तुम इसे लोगे?” वह घमण्डभरी घृणा से क्षमा के इस अन्तिम प्रस्ताव को भी ठुकरा देता है! अब सारे देश की सहानुभूति कहाँ है? क्या लोग कहते हैं,

एक जवान को फाँसी देना कितनी क्रूरता है, और वह भी केवल ऐसे अपराध के लिए? अहा, नहीं; ऐसी कोई बात बिलकुल नहीं।

वे कानून और न्याय की आवश्यकता देखते हैं; वे जानते हैं कि जिस कानून का ऐसा घोर अपमान किया गया हो, उसे अपराधी को फाँसी देकर अपने आप को सही ठहराने दिया ही जाना चाहिए। और अब शेरिफ़ घोषणा करता है, “जीने के लिए केवल पन्द्रह मिनट शेष हैं;” और ये मिनट भी वह गवर्नर को गालियाँ देने और कानून की महिमा का अपमान करने में बिताता है।

वह भयानक घड़ी आ पहुँचती है, और उसका अन्तिम क्षण भी—तख्ता गिरता है; वह मृत्यु की पकड़ में एक मिनट तक काँपता है, और फिर सब कुछ सदा के लिए शान्त हो जाता है! वह चला गया, और कानून ने अपने दण्ड को भयानक रीति से पूरा करके अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखी है। सब लोग अनुभव करते हैं कि यह न्यायसंगत है। वे किसी और प्रकार से सोच ही नहीं सकते। उन बूढ़े माता-पिता के पास भी शिकायत का एक शब्द कहने को नहीं है।

वे गवर्नर के कदम को उचित मानते हैं; वे दण्ड-आज्ञा का समर्थन करते हैं। वे कहते हैं, हमें सचमुच आशा थी कि वह क्षमा स्वीकार कर लेगा! परन्तु जब उसने स्वीकार नहीं की, तो वह स्रापित हो! हम अच्छे शासन से प्रेम करते हैं; हम समाज में कानून और व्यवस्था की आशीषों से अधर्म और अपराध की अपेक्षा अधिक प्रेम करते हैं। वह सचमुच हमारा बेटा था, परन्तु वह शैतान का बेटा भी था!

परन्तु आइए, अब हम अपनी ही मंडली के इन पापियों में से कुछ की फाँसी में उपस्थित हों।

आपको फाँसी के लिए बाहर आने का बुलावा भेजा जाता है। हम सन्देशवाहक को देखते हैं; हम दण्ड-आज्ञा पढ़ी जाती सुनते हैं—हम देखते हैं कि आपकी घातक घड़ी आ पहुँची है। क्या हम मुड़कर परमेश्वर को कोसेंगे? नहीं, नहीं! हम ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे। जब आपका तख्ता गिरेगा, और आप हाँफते-हाँफते मर जाएँगे, और आपका दोषी, आतंक से भरा प्राण विलाप करता हुआ गड्ढे की ढलानों से नीचे उतरता जाएगा, तब क्या हम वहाँ से जाकर परमेश्वर और उसके न्याय की शिकायत करेंगे? नहीं। क्यों नहीं? क्योंकि आप दया पा सकते थे, परन्तु आपने चाहा ही नहीं।

क्योंकि परमेश्वर ने बहुत समय तक आपकी बाट जोही, परन्तु आपका मन बुराई करने पर और भी पूरी रीति से तुलता गया।

सारा विश्व इस मामले के तथ्यों को देखता है; और एक स्वर से, जो स्वर्ग के विशाल मेहराब में गूँज उठता है, सब पुकार उठते हैं, “तू अपने सब मार्गों में न्यायी और धर्मी है, हे परम—

कौन कहता है कि यह क्रूरता है? क्या! क्या सारा विश्व यहोवा के विरुद्ध हथियार उठाएगा? नहीं।

जब सारा विश्व उस बड़े श्वेत सिंहासन के चारों ओर इकट्ठा होगा, और वह भयानक दण्ड-आज्ञा सुनाई जाएगी, “हे स्रापित लोगो, चले जाओ;” और वे घनी और विशाल भीड़ों में ऐसे चल पड़ेंगे मानो पुराना महासागर बह निकला हो—नीचे, और नीचे, वे अपने अन्धकारमय घर की गहराइयों में डूबते जाएँगे; परन्तु पवित्र लोग

दृढ़ कदमों से, फिर भी गम्भीर मन से, यह घोषणा करेंगे कि परमेश्वर की व्यवस्था सही ठहराई गई है; व्यवस्था और दया दोनों की अपमानित महिमा अब आदर के साथ स्थिर की गई है, और सब कुछ ठीक है।

स्वर्ग गम्भीर है, परन्तु आनन्दित; पवित्र लोग गम्भीर हैं, फिर भी वे अपने महिमामय पिता में आनन्द किए बिना नहीं रह सकते। उन भीड़ों और समूहों को देखिए, जब वे स्वर्ग की ओर ऊपर चढ़ते हैं। वे पीछे मुड़कर सदोम के मैदानों पर दृष्टि करते हैं और उसके जलने का धुआँ बड़ी भट्ठी के धुएँ के समान ऊपर उठता देखते हैं। परन्तु वे उसे न्यायसंगत ठहराते हैं, और उनके पास शिकायत का एक शब्द भी कहने को नहीं होता।

जो पापी अभी जीवित है, उससे मुझे आज यह कहना है कि आपकी फाँसी की घड़ी अभी नहीं आई है। एक बार फिर वह लहूलुहान हाथ दया का कटोरा आपके होठों की ओर बढ़ाता है। एक क्षण सोचिए; आपका उद्धारकर्ता अब आपको दया दे रहा है। आइए, हाँ, अभी आइए और उसे स्वीकार कीजिए।

आप क्या कहेंगे? क्या यह कि मैं अपने पापों में ही चलता रहूँगा? तब भी हम इतना ही कह सकते हैं कि ईश्वरीय प्रेम का अन्तःकरण आपके लिए गहराई से द्रवित है—कि परमेश्वर ने आपको बचाने के लिए वह सब कुछ किया है जो वह बुद्धिमानी से कर सकता है। परमेश्वर के लोगों ने आपके लिए गहरी और वेदनापूर्ण चिन्ता अनुभव की है और वे अभी पुकारने को तैयार हैं,

हम उन्हें कैसे छोड़ दें? परन्तु हम और क्या कर सकते हैं—परमेश्वर भी और क्या कर सकता है? लहूलुहान हृदय और काँपते होठों के साथ दया ने आपका पीछा किया है। यीशु ने स्वयं कहा, “मैं ने कितनी ही बार चाहा कि तुम्हें इकट्ठा करूँ— हे यरूशलेम, हे यरूशलेम! कितनी ही बार मैं ने चाहा कि तुम्हें बचा लूँ, पर तुम ने न चाहा!” क्या यीशु आपको देखकर आप पर रोएगा, और कहेगा, “क्या ही भला होता कि तू, हाँ, तू ही, इसी दिन में जानता—परन्तु अब वह तेरी आँखों से छिपा है?” हे मरनेवाले पापी, आप क्या कहेंगे? क्या आपका उत्तर यह न होगा, “बस, बहुत हो चुका—मैं बहुत समय तक और बड़ी दुष्टता से उद्धार के कटोरे को ठुकराता रहा हूँ; अब आपको एक शब्द भी और कहने की आवश्यकता नहीं। आह, वह लहूलुहान हाथ! वे रोती हुई आँखें! क्या यह सम्भव है कि मैंने इतने समय तक एक उद्धारकर्ता के प्रेम का विरोध किया? मैं अब दया की भीख माँगने को तैयार हूँ; और मैं यह सुनकर आनन्दित हूँ कि हमारे परमेश्वर का हृदय पिता का हृदय है।”

वह जानता है कि आपने बड़े और घोर पाप किए हैं, परन्तु आह, वह कहता है—मेरी करुणा इन बहुत दिनों से तुम्हारे लिए लहू बहाती और उमड़ती रही है। क्या आप अभी दया की शर्तों को स्वीकार करके यीशु के पास आएँगे? आप क्या कहते हैं?

मान लीजिए कि एक स्वर्गदूत अत्यन्त शुद्ध और श्वेत वस्त्र पहने नीचे उतरता है; अपने कागज़ खोलता है, और आपके नाम का एक क्षमा-पत्र निकालता है, जिस पर यीशु के अपने लहू की मुहर लगी है। वह पवित्र पुस्तक खोलता है और ठीक वही अंश पढ़ता है जो परमेश्वर के प्रेम को प्रगट करता है, और आपसे पूछता है कि क्या आप उस पर विश्वास करके उसे अपनाएँगे?

और मैं अपने प्रभु और स्वामी से क्या कहूँगा? जब मैं उसे इस विषय का विवरण देने आऊँगा, तो क्या मुझे यह गवाही देनी पड़ेगी कि आपने सुनना न चाहा? जब मसीह आपके इतने निकट आता है, और आपको अपने गर्म हृदय से लगा लेना चाहता है, तब आप क्या करेंगे? क्या आप फिर से वही घातक चुनाव दोहराएँगे, कि उसके प्रेम को ठुकराएँ और उसके आहत न्याय को ललकारें?

“मनुष्यों के मन में बुराई भरी हुई है, और जब तक वे जीवित रहते हैं उनके मन में बावलापन रहता है।”—सभोपदेशक 9:3।

बाइबल अक्सर उन मनुष्यों पर, जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ, एक ही साझा हृदय या स्वभाव आरोपित करती है। वह हमारी जाति के सदा दो वर्ग बनाती है, और केवल दो—पवित्र लोग और पापी; एक वर्ग वह जो अपने पाप से फिरकर परमेश्वर का सच्चा मित्र बन गया है; दूसरा वह जो बिना मन-परिवर्तन के उसका शत्रु बना रहता है।

इसलिए बाइबल के अनुसार, जिन मनुष्यों का नया जन्म नहीं हुआ, उन सब में हृदय अपने सामान्य चरित्र में एक-सा है। नूह के दिनों में परमेश्वर ने गवाही दी “कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है।”

ध्यान दीजिए, वह उनके मन के विचार की बात ऐसे करता है मानो उन सबका एक ही साझा हृदय हो—नैतिक चरित्र में सब एक समान। इसी प्रकार पौलुस के द्वारा परमेश्वर गवाही देता है कि “शरीर पर मन लगाना परमेश्वर से बैर रखना है,” और यह गवाही वह किसी एक मनुष्य के, या थोड़े से मनुष्यों के विषय में नहीं, वरन् शारीरिक मन वाले सब मनुष्यों के विषय में देता है। इसी प्रकार हमारे मूल पाठ में भी शब्द-रचना अर्थपूर्ण है: “मनुष्यों के मन में बुराई भरी हुई है”—मानो मनुष्यों का एक ही हृदय हो—सब का साझा—और यही एक हृदय “बुराई से भरा” हो। आप ध्यान देंगे कि यह कथन एक या दो मनुष्यों के विषय में, या केवल कुछ मनुष्यों के विषय में नहीं किया गया; वरन् “मनुष्यों के” विषय में, मानो उन सब के विषय में।

1. परन्तु यह कहने का क्या अभिप्राय है कि “जब तक वे जीवित रहते हैं उनके मन में बावलापन रहता है?”

यह क्रोध का बावलापन नहीं, वरन् पागलपन का है। यह सच है कि कभी-कभी लोग क्रोध से बावले हो जाते हैं; परन्तु हमारे मूल पाठ का यह अर्थ नहीं है। बाइबल, और साधारण बोलचाल भी, इस शब्द “बावलापन” का प्रयोग पागलपन को व्यक्त करने के लिए करती है। हम समझते हैं कि यहाँ इसका यही अर्थ है।

पागलपन दो प्रकार का होता है। एक सिर का; दूसरा हृदय का। पहले में बुद्धि विकृत हो जाती है; दूसरे में इच्छा और स्वैच्छिक शक्तियाँ। बौद्धिक पागलपन नैतिक कर्तृत्व को नष्ट कर देता है। जो मनुष्य बौद्धिक रूप से पागल है, वह उस समय के लिए नैतिक कर्ता नहीं रहता; उसका नैतिक उत्तरदायित्व स्थगित हो जाता है, क्योंकि वह अपना कर्तव्य जान नहीं सकता, और उसे करने या न करने के विषय में उत्तरदायी रूप से चुनाव नहीं कर सकता। यह सच है कि जब कोई मनुष्य स्वयं को अस्थायी रूप से पागल बना लेता है, जैसे मतवालेपन के द्वारा, तो अदालतें उसे उस दशा में किए गए कामों के लिए उत्तरदायी ठहराने को बाध्य होती हैं; परन्तु वास्तव में दोष उस स्वैच्छिक कार्य पर लगता है जो पागलपन को उत्पन्न करता है। जो मनुष्य समझ-बूझकर ऐसी वस्तु पीकर मतवाला हो जाता है जिसके विषय में वह जानता है कि वह नशा चढ़ाती है, उसे उसके बाद के नशे की दशा में किए गए कामों के लिए उत्तरदायी ठहराया ही जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि वह खतरे को पहले से देख सकता है, और सहज ही उससे बच सकता है।

सामान्य नियम यह है कि जब तक बुद्धि अपनी सामान्य शक्ति बनाए रखती है, तब तक नैतिक दायित्व ज्यों का त्यों बना रहता है।

दूसरी ओर, नैतिक पागलपन इच्छा का बावलापन है। मनुष्य की बौद्धिक शक्तियाँ ज्यों की त्यों बनी रहती हैं, परन्तु वह अपना मन पूरी रीति से बुराई करने पर लगा लेता है। वह अपने विवेक की माँगों के आगे झुकने से इनकार करता है। वह व्यवहार में नैतिक उत्तरदायित्व के दायित्वों को त्याग देता है। उसके पास स्वतंत्र नैतिक कर्तृत्व की शक्तियाँ हैं, परन्तु वह लगातार उनका दुरुपयोग करता है। उसके पास ऐसी तर्कबुद्धि है जो दायित्व की पुष्टि करती है, परन्तु वह उसकी पुष्टियों का पालन करने से इनकार करता है।

पागलपन के इस रूप में तर्कबुद्धि ज्यों की त्यों रहती है; परन्तु हृदय जान-बूझकर आज्ञा नहीं मानता।

मूल पाठ में जिस पागलपन की बात कही गई है वह नैतिक है—हृदय का पागलपन। यहाँ हृदय (मन) से अभिप्राय इच्छा से है—स्वैच्छिक शक्ति से। यद्यपि मनुष्य बौद्धिक रूप से स्वस्थचित्त है, फिर भी वह ऐसा आचरण करता है मानो वह बौद्धिक रूप से पागल हो।

इस मानसिक दशा के कुछ प्रगटीकरणों की ओर संकेत करना महत्त्वपूर्ण है। चूँकि बाइबल यह पुष्टि करती है कि यह एक तथ्य है कि पापी मन से बावले हैं, इसलिए हम स्वाभाविक रूप से इसके कुछ प्रगटीकरण देखने की आशा कर सकते हैं। यह देखना अक्सर आश्चर्यजनक होता है कि बाइबल मानव-चरित्र का कैसा हूबहू चित्र उतारती है; क्या उसने इस विषय में भी ऐसा किया है? आइए देखें।

नैतिक रूप से पागल कौन हैं?

वे, जो बौद्धिक रूप से पागल न होते हुए भी ऐसा आचरण करते हैं मानो वे पागल हों।

उदाहरण के लिए, जो बौद्धिक रूप से पागल हैं, वे कल्पना को ऐसे मानते हैं मानो वह वास्तविकता हो, और वास्तविकता को ऐसे मानो वह कल्पना हो। वे ऐसा आचरण करते हैं मानो सत्य सत्य न हो, और मानो झूठ सत्य हो।

हर मनुष्य जानता है कि पागल लोग सचमुच अपनी कल्पना के उन्मत्त सपनों के पीछे ऐसे चलते हैं मानो वे सबसे ठोस वास्तविकता हों, और उन्हें किसी भी सचमुच वास्तविक वस्तु का बल अनुभव कराना लगभग असम्भव होता है।

इसी प्रकार मनुष्य अपने पापों में आत्मिक जगत की वास्तविकताओं को ऐसे मानते हैं मानो वे वास्तविक न हों, परन्तु इस संसार की सबसे खोखली छायाओं के पीछे ऐसे चलते हैं मानो वे ठोस वास्तविकताएँ हों।

वे ऐसा आचरण भी करते हैं मानो ‘स्वयं’ सर्वोच्च महत्त्व का हो, और बाकी सब कुछ तुलना में किसी महत्त्व का न हो। मान लीजिए आप साधारण जीवन में किसी मनुष्य को यह बात आचरण में उतारते देखें। वह दिन-प्रतिदिन यह मानकर घूमता है कि वही सर्वोच्च परमेश्वर है, और व्यवहार में इस बात पर अड़ा रहता है कि हर किसी को उसके अधिकारों का सर्वोच्च ध्यान रखना चाहिए, और दूसरे लोगों के अधिकारों का तुलना में थोड़ा या कुछ भी ध्यान नहीं। अब, यदि आप किसी मनुष्य को यह कहते और आचरण में उतारते देखें, तो क्या आप उसे या तो परमेश्वर की निन्दा करनेवाला या पागल न समझेंगे?

अब इस अद्भुत तथ्य पर ध्यान दीजिए, कि यद्यपि दुष्ट मनुष्य इतनी समझदारी से बात करते हैं कि उससे प्रगट होता है कि वे इससे अच्छा जानते हैं, फिर भी वे ऐसा आचरण करते हैं मानो यह सब सत्य हो—मानो वे समझते हों कि उनका अपना स्वार्थ-हित विश्व की हर वस्तु से अधिक महत्त्वपूर्ण है, और परमेश्वर के हित, और उसके अधिकार भी, उसकी तुलना में कुछ भी नहीं। व्यवहार में हर पापी यही करता है।

यह सब पाप का एक अनिवार्य तत्त्व है। स्वार्थी मनुष्य किसी दूसरे के अधिकारों का कभी ध्यान नहीं रखते, जब तक कि वे किसी रीति से उनके अपने अधिकारों से जुड़े न हों।

यदि दुष्ट मनुष्य सचमुच यह विश्वास करते कि उनके अपने अधिकार और हित विश्व में सर्वोच्च हैं, तो इससे वे बौद्धिक रूप से पागल सिद्ध होते, और हम उन्हें शीघ्र ही निकटतम पागलखाने में बन्द कर देते; परन्तु जब वे दिखाते हैं कि वे इससे अच्छा जानते हैं, फिर भी अपने बेहतर ज्ञान के विपरीत इस निराधार धारणा पर आचरण करते हैं, तो हम बाइबल के साथ कहते हैं कि “जब तक वे जीवित रहते हैं उनके मन में बावलापन रहता है।”

फिर, समय और अनन्तकाल के विषय में उसके तुलनात्मक मूल्यांकन में इस बावलेपन को प्रगट होते देखिए। उसका सारा जीवन यह घोषित करता है कि उसकी दृष्टि में अनन्तकाल की भलाई की अपेक्षा इस समय (के जीवन) की भलाई प्राप्त करना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। फिर भी, यदि कोई मनुष्य इस प्रकार तर्क करे—इसे सिद्ध करने के लिए बहस करे, और गम्भीरता से इसका दावा करे—तो आप जान लेंगे कि वह पागल है, और उसे पागलखाने पहुँचाने में सहायता करेंगे। परन्तु मान लीजिए कि वह यह कहता नहीं—कहने का साहस नहीं करता—जानता है कि यह सत्य नहीं है; फिर भी निरन्तर इसे आचरण में उतारता है, और इसके सत्य होने की धारणा पर जीता है, तब क्या? बस यही—कि वह नैतिक रूप से बावला है। उसके मन में बावलापन है।

अब ठीक यही आप में से हर एक का आचरण है जो पाप में जी रहा है। आप अनन्तकाल की अपेक्षा समय को प्राथमिकता देते हैं। आप व्यवहार में कहते हैं—आह, मुझे समय के आनन्द दो: मैं अभी से

अनन्तकाल की तुच्छ बातों के विषय में अपने आप को क्यों परेशान करूँ?

इसी आत्मा से आप यह मान लेते हैं कि देह प्राण से बढ़कर है। परन्तु यदि कोई मनुष्य इसका दावा करे और इसे सिद्ध करने का प्रयत्न करता फिरे, तो आप जान लेंगे कि वह पागल है। आह, यदि वह आपका मित्र होता, तो उसके इस दुखद दुर्भाग्य पर—उसकी बुद्धि के खो जाने पर—आपका हृदय कैसे टूट जाता! परन्तु यदि वह इससे अच्छा जानता है, फिर भी व्यवहार में ऐसे जीता है मानो ऐसा ही हो, तो आप केवल यह कहते हैं कि वह नैतिक रूप से पागल है—बस इतना ही!

मान लीजिए आप किसी मनुष्य को अपनी ही सम्पत्ति नष्ट करते देखें, दुर्घटना या भूल से नहीं, वरन् जान-बूझकर; और अपने स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचाते देखें, मानो उसे अपने हितों की कोई चिन्ता ही न हो; तो आप उसका मामला किसी न्यायाधीश के सामने ले जा सकते हैं और उसके विरुद्ध पागलपन की जाँच का आदेश (कमीशन) निकलवा सकते हैं; जिसके अन्तर्गत उस मनुष्य की सम्पत्ति उसके अपने नियंत्रण से ले ली जाएगी, और उसे आगे उसे उड़ाने नहीं दिया जाएगा। फिर भी आत्मिक बातों में दुष्ट मनुष्य जान-बूझकर अपने ही सबसे प्रिय हितों के विरुद्ध काम करते हैं; बुद्धि मोल लेने के लिए उनके हाथ में दाम दिया जाता है, पर वे उसका उपयोग नहीं करते; स्वर्ग के खज़ाने उनकी पहुँच में रखे जाते हैं, पर वे उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करते; केवल स्वीकार कर लेने भर के लिए धन्यता का अनन्त भण्डार उनके सामने रखा जाता है, पर वे उसे दान के रूप में नहीं लेते। सचमुच! यह कितना स्पष्ट है कि यदि मनुष्य सांसारिक बातों में वैसा ही आचरण करें जैसा वे आत्मिक बातों में करते हैं, तो हर कोई उन्हें पागल घोषित कर देगा। कोई भी मनुष्य इसकी शपथ खा लेगा। वे कहेंगे—ज़रा देखो; यह मनुष्य हर बात में अपने ही हितों के विरुद्ध काम करता है! कौन इनकार कर सकता है कि वह पागल है? निश्चय ही स्वस्थचित्त मनुष्य ऐसा कभी नहीं करते!

परन्तु नैतिक प्रश्नों में दुष्ट मनुष्य अपने ही हितों को उलट देने, और स्वयं को सदा के लिए दिवालिया बना देने में भरसक परिश्रम करते जान पड़ते हैं! आह, जब वे स्वर्ग का धन पा सकते थे, तब भी वे अपने प्राणों को कैसा कंगाल बना डालते हैं।

फिर, वे प्रत्यक्ष असम्भव बातों को साकार करने का प्रयत्न करते हैं। उदाहरण के लिए, वे अपने पापों और अपने स्वार्थ में स्वयं को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं, फिर भी वे जानते हैं कि वे ऐसा नहीं कर सकते। उनसे पूछिए, और वे मान लेंगे कि यह बात बिलकुल असम्भव है; और फिर भी, इस दृढ़ धारणा के बावजूद, वे निरन्तर इसका प्रयत्न करते रहते हैं—मानो उन्हें आशा हो कि आगे चलकर वे एक प्रत्यक्ष असम्भव बात को साकार कर लेंगे। अब, नैतिक बातों में यह आपको विशेष रूप से विचित्र न लगे, क्योंकि यह अत्यन्त सामान्य है; परन्तु मान लीजिए कि संसार की बातों में आप किसी मनुष्य को इसी प्रकार का काम करते देखें, तो आप उसके विषय में क्या सोचेंगे? उदाहरण के लिए, आप उसे एक बहुत लम्बी सीढ़ी बनाने में कड़ा परिश्रम करते देखते हैं, और उससे पूछते हैं कि किसलिए। वह कहता है, “मैं चाँद पर चढ़ने जा रहा हूँ।” आप उसे अपना श्रम और अपना धन, और जीवन भर का परिश्रम लगाते देखते हैं, ताकि वह एक विशालकाय सीढ़ी खड़ी करे जिससे चाँद पर चढ़ सके! क्या आप न कहेंगे—वह निश्चय ही पागल है?

क्योंकि यदि वह सचमुच पागल न होता, तो वह जानता कि यह पूर्णतः असम्भव है। परन्तु आत्मिक बातों में मनुष्य हर समय एक ऐसे परिणाम को साकार करने का प्रयत्न कर रहे हैं जो कम से कम उतना ही असम्भव है—अर्थात् पाप में सुखी होना—अपनी ही स्वाभाविक शक्तियों के बीच विद्रोह रहते हुए सुखी होना, जब हृदय तर्कबुद्धि और विवेक के विरुद्ध युद्ध कर रहा हो। पाप में सुख की खोज ऐसी है मानो कोई मनुष्य अपने ही मांस को क्षत-विक्षत करके, अपनी ही आँखें निकालकर, अपने दाँत तोड़कर स्वयं को सुखी करना चाहता हो। फिर भी मनुष्य उतनी ही सच्चाई से जानते हैं कि वे पाप और स्वार्थ में सुख प्राप्त नहीं कर सकते, जितनी सच्चाई से वे जानते हैं कि अपने ही मांस को काट-काटकर और अपनी ही नसों को चीरकर वे स्वास्थ्य और आराम सुनिश्चित नहीं कर सकते। जिस बात के विषय में वे जानते हैं कि वह सच्चे सुख को सदा विफल करेगी और कभी सुनिश्चित नहीं करेगी, उसी को इस प्रकार बावलेपन से करते हुए, वे स्वयं को नैतिक रूप से पागल प्रगट करते हैं।

बौद्धिक पागलपन का एक और प्रगटीकरण है अपने सबसे अच्छे मित्रों पर से भरोसा उठ जाना।

अक्सर यह पागलपन के पहले और सबसे पीड़ादायक प्रमाणों में से एक होता है—वह बेचारा मनुष्य इसी बात पर अड़ा रहता है कि उसके सबसे प्रिय मित्र उसका नाश करने पर तुले हुए हैं। कितने ही प्रमाण देने पर भी उसे यह नहीं समझाया जा सकता कि वे उसके सच्चे मित्र हैं।

ठीक इसी प्रकार पापी अपने बावलेपन में परमेश्वर से व्यवहार करते हैं। यद्यपि वे भीतर ही भीतर जानते हैं कि वह उनका सच्चा मित्र है, फिर भी व्यवहार में वे उससे ऐसा बर्ताव करते हैं मानो वह उनका सबसे बड़ा शत्रु हो। किसी भी प्रेरणा से उन्हें यह नहीं समझाया जा सकता कि वे मित्र जानकर उस पर भरोसा करें। वास्तव में, वे उससे ऐसा बर्ताव करते हैं मानो वह विश्व का सबसे बड़ा झूठा हो। कहते हुए भी आश्चर्य होता है कि वे व्यवहार में परमेश्वर और शैतान के प्रति क्रमशः उचित आदर को उलट देते हैं—शैतान से ऐसा बर्ताव करते हैं मानो वह परमेश्वर हो, और परमेश्वर से ऐसा मानो वह शैतान हो। शैतान पर वे विश्वास करते हैं और उसकी आज्ञा मानते हैं; परमेश्वर को वे अस्वीकार करते हैं, उसका अनादर करते हैं, और उसकी आज्ञा नहीं मानते। वे वस्तुओं के क्रम को कैसा विचित्र रूप से उलट देना चाहते हैं! वे शैतान को विश्व के सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं, उसे स्वर्ग का सबसे ऊँचा आसन देना चाहते हैं; और सर्वशक्तिमान और पवित्र परमेश्वर को वे नरक में भेज देना चाहते हैं। वे अपने ही हृदयों पर प्रभुता का वह स्थान, जो केवल परमेश्वर का अधिकार है, शैतान को सौंप देने में संकोच नहीं करते।

मैं पहले ही इस तथ्य की ओर ध्यान दिला चुका हूँ कि पागल लोग अपने सबसे अच्छे मित्रों से ऐसा बर्ताव करते हैं मानो वे उनके सबसे बड़े शत्रु हों, और यह अक्सर पागलपन का पहला प्रमाण होता है। यदि वह पति है, तो वह इसी बात पर अड़ा रहेगा कि उसकी प्रिय पत्नी उसे विष देने का प्रयत्न कर रही है। मेरी स्मृति में एक घटना है—पागलपन का पहला वास्तविक मामला जो मैंने कभी देखा, और शायद इसी कारण उसने मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ी। मैं घोड़े पर सवार होकर जा रहा था, और एक घर के निकट पहुँचकर मैंने देखा कि ऊपर के एक कमरे की खिड़की खुली है और मैंने एक अत्यन्त अमानवीय-सी चीख सुनी। ज्योंही मैं इतना निकट पहुँचा कि शब्द पकड़ सकूँ, मैंने एक अत्यन्त उन्मत्त, गिड़गिड़ाती हुई आवाज़ सुनी, “परदेशी, परदेशी, यहाँ आओ—यहाँ बाबुल की बड़ी वेश्या है; वे मुझे मार डालने का प्रयत्न कर रहे हैं, वे मुझे मार डालेंगे।” मैं घोड़े से उतरा; घर के पास आया, और वहाँ मैंने एक मनुष्य को पिंजरे में बन्द पाया, जो अपनी पत्नी के विषय में अत्यन्त कड़वाहट से शिकायत कर रहा था। जब मैं उसकी ओर मुड़ा तो मैंने देखा कि वह उदास दिख रही थी, मानो उसके हृदय पर दुःख का भारी बोझ पड़ा हो। उसकी आँख में एक आँसू काँप रहा था। हाय, उसका प्रिय पति एक पागल था! तब मैंने पहली बार जाना कि पागल लोग अपने सबसे अच्छे मित्रों को किस दृष्टि से देखा करते हैं।

अब, पापी परमेश्वर के विषय में और अपने दूसरे सच्चे मित्रों के विषय में इससे अच्छा जानते हैं; और फिर भी वे बहुधा उनसे ठीक इसी प्रकार का बर्ताव करते हैं। ठीक ऐसे मानो वे सार्वजनिक स्थानों पर जाकर सब खड़े लोगों के सामने ऊँचे स्वर से पुकारें—अरे, तुम सब सुनो—तुम्हें मालूम हो कि

“महान परमेश्वर एक सर्वशक्तिमान अत्याचारी है! वह भरोसे या प्रेम के योग्य नहीं है!”

अब, हर कोई जानता है कि वे व्यवहार में परमेश्वर से ऐसा ही बर्ताव करते हैं। वे परमेश्वर की सेवा को—धर्म को—ऐसे मानते हैं मानो वह उनके वास्तविक और सर्वोच्च सुख से मेल न खाती हो। मुझे अक्सर ऐसे पापी मिले हैं जो यह समझते जान पड़ते थे कि उन्हें मसीही बनाने का हर प्रयत्न उन्हें फँसाकर दासत्व में बेच देने की कोई चाल है। वे धर्म को कदापि ऐसा नहीं आँकते मानो वह प्रेमी परमेश्वर की ओर से आया हो। व्यवहार में वे धर्म को ऐसा मानते हैं मानो उसे अपना लेने से उनका सर्वनाश हो जाएगा। फिर भी इन सब में वे अपनी ही दृढ़ धारणाओं के बिलकुल विरुद्ध काम करते हैं। वे इससे अच्छा जानते हैं।

यदि वे न जानते, तो उनका दोष अभी की तुलना में बहुत ही कम होता।

पागलपन का एक और उल्लेखनीय प्रगटीकरण है—तुच्छ बातों के विषय में अत्यन्त उत्तेजित होना, और विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण बातों के प्रति उदासीन रहना। मान लीजिए आप किसी मनुष्य को तिनकों और कंकड़ों के विषय में उत्तेजित देखें—वह उन्हें ढेरों में इकट्ठा करने और खज़ानों की तरह सँभालकर रखने में अथक परिश्रम करता है; फिर भी जब उसके घर के चारों ओर आग भड़क उठती है और सारा गाँव लपटों में होता है, तो वह उस पर कोई ध्यान नहीं देता, और कोई रुचि अनुभव नहीं करता; या चारों ओर लोग महामारी से मरते रहें, पर वह उसकी परवाह नहीं करता; तो क्या आप न कहेंगे कि वह अवश्य पागल होगा? परन्तु पापियों के विषय में ठीक यही सच है। वे सांसारिक भलाई के विषय में—जो परमेश्वर के प्रस्तुत खज़ानों की तुलना में तिनके और कंकड़ ही हैं—लगभग असीम रूप से उत्तेजित रहते हैं; परन्तु आह, विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं के प्रति वे कितने उदासीन हैं! उनके प्राणों के विशाल विषय मुश्किल से ही उनमें एक भी गम्भीर विचार जगाते हैं।

यदि वे इससे अच्छा न जानते, तो आप कहते—निश्चय ही उनकी तर्कबुद्धि सिंहासन से उतार दी गई है; परन्तु चूँकि वे इससे अच्छा जानते हैं, इसलिए आप इससे कम कुछ नहीं कह सकते कि वे नैतिक रूप से पागल हैं, “जब तक वे जीवित रहते हैं उनके मन में बावलापन रहता है।”

पश्चाताप न करनेवाले मनुष्यों का आचरण अविवेक की पराकाष्ठा है। जब आप उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है, तो आपको अविवेक का इतना सही और सजीव विचार मिलेगा जितना किसी और स्रोत से नहीं मिल सकता। आप इसे उन लक्ष्यों में देखते हैं जिनके लिए वे स्वयं को समर्पित करते हैं, और उन साधनों में भी जिनका प्रयोग वे उन्हें प्राप्त करने के लिए करते हैं। सब कुछ पूर्णतः तर्कहीन है। बावलेपन से चुना गया लक्ष्य—बावलेपन से गढ़े गए साधनों द्वारा खोजा गया; यही उन जनसमूहों के जीवन का इतिहास है जो परमेश्वर को अस्वीकार करते हैं। यदि यह गलत बौद्धिक निर्णयों का परिणाम होता, तो हम तुरन्त कह देते कि मानवजाति पागल हो गई है।

स्वयं बेडलम पागलखाना भी बौद्धिक पागलपन का इससे बड़ा प्रमाण नहीं देता, जितना हर पापी नैतिक पागलपन का देता है। आप कोलंबस जाकर पागलखाने के निवासियों के हर कमरे को देख सकते हैं; आपको वहाँ एक भी पागल व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जो बौद्धिक पागलपन का इससे बड़ा प्रमाण देता हो जितना हर पापी नैतिक पागलपन का देता है। यदि बेडलम स्वयं इस बात का प्रमाण देता है कि उसके निवासी बौद्धिक रूप से विक्षिप्त हैं, तो हर पापी भी इस बात का प्रमाण देता है कि वह नैतिक रूप से बावला है।

पापी ऐसा आचरण करते हैं मानो उन्हें डर हो कि कहीं उनका उद्धार न हो जाए। अक्सर वे अपने उद्धार को यथासम्भव कठिन बनाने का प्रयत्न करते जान पड़ते हैं। उदाहरण के लिए, वे सब जानते हैं कि मसीह ने धन के खतरे और धनवानों के उद्धार की कठिनाई के विषय में क्या कहा है। उन्होंने उसके मुख से निकला यह वचन पढ़ा है, “धनवानों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!” “परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।” यह वे जानते हैं, और फिर भी उनमें से कितने धनी बनने की बावली जल्दबाज़ी में हैं! इस उद्देश्य के लिए कुछ अपने विवेक का बलिदान करने को तैयार हैं—कुछ अपने स्वास्थ्य का—और सब जान-बूझकर अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार जान पड़ते हैं! वे अपने ही नरकदण्ड को इससे अधिक निश्चित कैसे कर सकते थे!

इस प्रकार वे नरकदण्ड को ऐसा मानते हैं मानो वह उद्धार हो, और उद्धार को ऐसा मानो वह नरकदण्ड हो।

वे नरकदण्ड की ओर ऐसे लपकते हैं मानो वह स्वर्ग हो, और उद्धार से ऐसे भागते हैं मानो वह नरक हो।

क्या यह अतिशयोक्ति है? नहीं; यह केवल सीधा-सादा सत्य है। पापी नरक के मार्ग पर ऐसे आगे बढ़ते हैं मानो वह उनके अस्तित्व की सबसे बड़ी भलाई हो, और स्वर्ग के मार्ग से ऐसे बचते हैं मानो वह बुराई की पराकाष्ठा हो। हे पापी, यह आपकी अपनी नैतिक दशा है। यह चित्र बिना किसी अतिशयोक्ति के केवल इस मामले के नग्न तथ्य प्रस्तुत करता है।

3. यह नैतिक पागलपन निरी दुष्टता की दशा है। इसकी वह विशेष बात जो इसे दोषपूर्ण दशा बनाती है, यह है कि यह पूर्णतः स्वैच्छिक है। यह तर्कबुद्धि के खो जाने से नहीं, वरन् तर्कबुद्धि के दुरुपयोग से उत्पन्न होता है। इच्छा तर्कबुद्धि और विवेक के विरुद्ध काम करने पर अड़ी रहती है।

तर्कबुद्धि की पुष्टियों के बावजूद, और विवेक की चेतावनियों की परवाह किए बिना, पापी परमेश्वर और भलाई के विरुद्ध अपने विद्रोह के मार्ग पर आगे बढ़ता जाता है। ऐसी स्वैच्छिक दुष्टता में क्या अपने आप में दोष नहीं होना चाहिए?

इसके अतिरिक्त, यह कार्य अक्सर सोच-समझकर किया जाता है। मनुष्य अपने शान्त, विचारशील क्षणों में भी पाप करता है, और अपने उत्तेजित क्षणों में भी। यदि वह अपने उत्तेजित क्षणों में सबसे खुलकर और ढिठाई से पाप करता है, तो वह अपने विचारशील क्षणों में पश्चाताप नहीं करता और परमेश्वर के प्रति अपनी स्थिति नहीं बदलता, वरन् तब वास्तव में अपने अधिक उत्तेजित घंटों के जल्दबाज़ी भरे संकल्पों का समर्थन करता है। इससे उसका दोष और बढ़ जाता है।

फिर, उसके पाप के संकल्प हठीले और अडिग हैं। दस हज़ार रीतियों से परमेश्वर उसके मन पर ऐसे प्रभाव डाल रहा है कि उसके संकल्प बदल जाएँ; परन्तु प्रायः व्यर्थ। पाप का यह मार्ग उसके सब दायित्वों का उल्लंघन है। कौन यह नहीं जानता? पापी कभी सही उद्देश्यों से काम नहीं करता—कभी दायित्व-बोध के प्रभुत्व के आगे नहीं झुकता—कभी व्यवहार में यह नहीं मानता कि उसका दायित्व है कि वह अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखे, या प्रभु अपने परमेश्वर का आदर करे।

यह परमेश्वर की व्यवस्था और सुसमाचार दोनों का पूर्ण तिरस्कार है। व्यवस्था का वह पालन नहीं करेगा; क्षमा का सुसमाचार वह स्वीकार नहीं करेगा। वह यहोवा की सर्वशक्तिमत्ता का सामना करने और उसके पलटे को ललकारने पर तुला हुआ जान पड़ता है। क्या वह अपनी मूरतों पर बावला नहीं है? जब बाइबल यह पुष्टि करती है, “जब तक वे जीवित रहते हैं उनके मन में बावलापन रहता है,” तो क्या यह बहुत अधिक कहना है?

1. पापी विचित्र रीति से पवित्र लोगों पर बावले और पागल होने का दोष लगाते हैं। ज्योंही मसीही लोग ऐसा आचरण करने लगते हैं मानो जिस सत्य पर वे विश्वास करते हैं वह वास्तविकता है, त्योंही दुष्ट मनुष्य चिल्ला उठते हैं, “देखो, ये पागल होते जा रहे हैं।” फिर भी वे ही पापी बाइबल को सत्य मानते हैं, और जिन बातों को मसीही सत्य मानकर विश्वास करते हैं उन्हें वास्तव में सच मानते हैं; और इससे भी आगे, वे यह भी मानते हैं कि वे

मसीही केवल वही कर रहे हैं जो उन्हें करना चाहिए, और केवल वैसा ही जैसा स्वयं उन पापियों को भी करना चाहिए; फिर भी वे उन पर पागलपन का दोष लगाते हैं। यह विचित्र बात है कि वे पापी स्वयं भी जानते हैं कि ये

मसीही ही पृथ्वी पर एकमात्र विवेकशील मनुष्य हैं। मुझे भली भाँति स्मरण है कि मैंने अपने मन-परिवर्तन से पहले यह बात स्पष्ट देखी थी। मैं तब जानता था कि सारे संसार में केवल मसीही ही ऐसे लोग थे जिनका स्वस्थचित्त समझे जाने का कोई उचित दावा था।

2. यदि बौद्धिक पागलपन एक भयावह तथ्य है, तो नैतिक पागलपन कितना अधिक? मैंने एक बौद्धिक रूप से पागल व्यक्ति को देखने पर अपनी पहली छाप का उल्लेख किया है, परन्तु नैतिक पागलपन का मामला इससे कहीं अधिक दुःखदायी और चकित करनेवाला समझा जाना चाहिए। मान लीजिए किसी वेबस्टर का मामला हो। उसका मस्तिष्क कोमल पड़ जाता है; वह एक मूढ़ बन जाता है! सारे देश में ऐसा एक भी मनुष्य न होगा जो गम्भीर न हो जाए। क्या! डैनियल वेबस्टर—वह महान पुरुष, एक मूढ़! शूरवीर क्योंकर गिर पड़े हैं! कैसा भयानक दृश्य!

परन्तु उसे नैतिक मूढ़ बनते देखना कितना अधिक भयानक होगा—एक स्वार्थी हृदय को उसकी विशाल बुद्धि के स्पष्ट निर्णयों को रौंदते हुए उच्छृंखल होते देखना—स्वार्थी महत्वाकांक्षा की माँगों के सामने उसके नैतिक सिद्धान्तों को फीके पड़ते देखना—ऐसे मनुष्य को पियक्कड़, लम्पट, आवारा बनते देखना; यदि किसी डैनियल वेबस्टर के साथ ऐसा हो, तो यह कितना अवर्णनीय रूप से भयावह होगा!

इसकी तुलना में बौद्धिक मूढ़ता का तो नाम भी नहीं लिया जा सकता!

3. यद्यपि कुछ पापी बाहर से भले दिखाई दें, और स्वभाव और चरित्र में सौम्य जान पड़ें, फिर भी हर वास्तविक पापी वास्तव में पागल है। अनन्तकाल की इन सब गम्भीर बातों के सामने भी वह इसी पर अड़ा रहता है कि केवल समय (इस लोक) की बातें ही उसे नियंत्रित करें। एक स्वर्गदूत की शक्तियाँ रखते हुए भी वह एक स्वार्थी हृदय की नीच खोजों से ऊपर का लक्ष्य नहीं रखता। स्वर्गदूत ऐसे मामले को किस दृष्टि से देखते होंगे! अनन्तकाल इतना विशाल, और उसके परिणाम इतने भयानक, फिर भी यह पापी नरक की ओर ऐसे अंधाधुंध दौड़ता है मानो वह स्वर्ग के राजमार्ग पर हो! और यह सब केवल इसलिए कि वह पाप में थोड़े दिन के सुख पर मोहित है। पहली दृष्टि में ऐसा जान पड़ता है कि उसने सचमुच नरक को स्वर्ग समझने की भूल की है; परन्तु निकट से जाँचने पर आप देखते हैं कि यह बुद्धि की कोई वास्तविक भूल नहीं है; वह नरक और स्वर्ग का अन्तर भली भाँति जानता है; परन्तु वह अपने बावले हृदय की प्रेरणाओं के वश में होकर व्यवहार में स्वयं को धोखा दे रहा है! दुःखद तथ्य यह है कि वह पाप से प्रेम करता है, और उसके पीछे वह चलेगा ही! हाय, हाय! ऐसा पागल, वह अपने ही नरकदण्ड की ओर लालच से ऐसे लपकता है, मानो वह स्वर्ग की खोज में हो!

हम इस विचार से ही काँप उठते हैं कि हमारे कोई मित्र मूढ़ या पागल होते जा रहे हैं; परन्तु यह उनमें से किसी के दुष्ट बन जाने का आधा भी बुरा नहीं है। किसी पूरे परिवार का मूढ़ हो जाना इससे अच्छा है कि उनमें से एक भी कठोर पापी बन जाए। वास्तव में, बाद वाले की तुलना में पहला कुछ भी नहीं है। क्योंकि मूढ़ सदा मूढ़ नहीं रहेगा। जब यह नश्वर देह

कब्र में रख दी जाएगी, तो प्राण स्वतंत्रता की खुली हवा में फिर से ऐसे बाहर झाँक सकेगा मानो वह कभी किसी अँधेरे बन्दीगृह में बन्द ही न रहा हो; और देह, फिर से जिलाई जाकर, अनन्त बल और सौन्दर्य में खिल सकेगी; परन्तु हाय, नैतिक पागलपन तो सदा बिगड़ता ही चला जाता है! इसकी जड़ किसी रोगी मस्तिष्क में नहीं, वरन् रोगी हृदय और प्राण में है, इसलिए मृत्यु इसे चंगा नहीं कर सकती; पुनरुत्थान उसे केवल नामधराई और सदा तक घिनौने ठहरने के लिए जिलाएगा; और अनन्त लोक उसके बावलेपन को केवल यह अवसर देगा कि वह बढ़े हुए बल और अधिक विस्तार के साथ सदा तक भड़कता रहे।

कुछ लोग दुष्ट कहलाने की अपेक्षा पागल कहलाने से अधिक डरते हैं। निश्चय ही वे उस घातक भ्रम को प्रगट करते हैं जो उनके हृदयों पर छाया हुआ है।

बौद्धिक पागलपन केवल दया के योग्य है, लज्जाजनक नहीं; परन्तु नैतिक पागलपन अकथनीय रूप से लज्जाजनक है। किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि परमेश्वर कहे, “कितने नामधराई और सदा तक अत्यन्त घिनौने ठहरने के लिये जाग उठेंगे।”

परमेश्वर की ओर मन-परिवर्तन नैतिक रूप से स्वस्थचित्त हो जाना है। यह इच्छा और भावनाओं को बुद्धि, तर्कबुद्धि और विवेक के उचित नियंत्रण में फिर से ले आने में है, ताकि मनुष्य फिर एक बार अपने आप से मेल में आ जाए—उसकी सब शक्तियाँ अपने सच्चे स्थानों और उचित कार्यों में ठीक बैठ जाएँ।

कभी-कभी वे लोग जिनका मन-परिवर्तन तो हुआ है, परन्तु जो भली भाँति स्थिर नहीं हुए, पीछे हटकर नैतिक पागलपन में फिर जा गिरते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कभी-कभी लोग प्रत्यक्षतः पूरी तरह स्वस्थ हो जाने के बाद फिर से बौद्धिक पागलपन में जा गिरते हैं। यह एक दुःखद मामला है, और मित्रों के हृदयों पर शोक लाता है।

फिर भी, कोई भी मामला उतना दुःखद नहीं हो सकता जितना पीछे हटकर नैतिक पागलपन में जा गिरने का मामला।

बौद्धिक पागलों का पागलखाना एक शोकपूर्ण स्थान है। कोई भी संवेदनशील मानव-हृदय ऐसे दृश्य पर तीव्र शोक के बिना कैसे विचार कर सकता है? जब आप उन गलियारों से होकर गुज़रते हैं, तो बौद्धिक विनाश के चिह्नों पर ध्यान दीजिए; वहाँ एक कुलीन दिखनेवाली स्त्री है, पूरी तरह पागल; वहाँ भव्य रूप और ठाठ वाला एक पुरुष है—सब कुछ खण्डहर! कितना भयानक! तो, यदि यह ऐसा है, तो नरक कैसा स्थान होगा! ये बौद्धिक पागलखाने भयानक हैं; तो नैतिक पागलखाना कितना अधिक भयानक होगा!

मान लीजिए हम कोलंबस जाएँ और उसका पागलखाना देखें; उसके सब वार्डों में घूमें और हर निवासी के मामले का अध्ययन करें; फिर हम इंडियाना जाएँ; फिर न्यूयॉर्क, और इसी प्रकार हर एक राज्य के सब पागलखानों में। फिर हम लंदन और उसका पागलखाना देखें, जहाँ शायद हमें उतने पागल मिलें जितने हमारे सारे संघ में हैं। क्या यह एक शोकपूर्ण दृश्य न होगा? क्या आप हमारे समाप्त करने से बहुत पहले ही चिल्ला न उठेंगे—बस! बस! मैं बावले मनुष्यों के ये दृश्य कैसे सह सकता हूँ! मैं ऐसी उजाड़ दशा को देखना कैसे सहूँ!

तो मान लीजिए, इसके बाद हम विश्व के महान नैतिक पागलखाने में जाएँ—खोए हुए प्राणों के नरक में; क्योंकि यदि मनुष्य स्वयं को बावला बना लेंगे, तो परमेश्वर को उन्हें एक विशाल पागलखाने की कोठरी में बन्द करना ही होगा।

वह क्यों न करे? उसके साम्राज्य का कल्याण यह माँग करता है कि उसके राज्य का सारा नैतिक पागलपन पवित्र लोगों की संगति से हटा लिया जाए, और अलग और अकेला बन्द कर दिया जाए।

वहाँ वे हैं जिनकी बुद्धि तो ठीक है, परन्तु जिनके हृदय पूरी तरह गलत हैं। आह, अपना अनन्तकाल बिताने के लिए वह कैसा स्थान होगा! विश्व का महान पागलखाना!

कभी-कभी यहाँ पापी, अपने ही पागलपन से अवगत होकर, इस भयानक दशा की झलकें पा लेते हैं।

मुझे स्मरण है कि एक समय मुझे यह विचार आया कि केवल मसीही ही ऐसे लोग हैं जो विवेकशील होने का दावा कर सकते हैं, और तब मैंने अपने आप से पूछा—मैं भी ऐसा क्यों न करूँ? क्या परमेश्वर की

आज्ञा मानने से मेरी कोई हानि होगी? क्या इससे मेरी शान्ति नष्ट होगी, या इस जीवन या अगले जीवन के लिए मेरी सम्भावनाओं को हानि पहुँचेगी? मैं ऐसे क्यों चलता जा रहा हूँ?

मैंने अपने आप से कहा—मैं इसका कोई कारण नहीं बता सकता, सिवाय इसके कि मैं बावला हूँ। मैं बस इतना ही कह सकता हूँ कि मेरा हृदय अधर्म पर लगा है, और वह फिरेगा नहीं।

हाय, बेचारा पागल! अभागा नहीं, वरन् दुष्ट! आप में से कितने जानते हैं कि यही आपकी वास्तविक दशा है? हे जवान, जब आपके पिता ने आपको यहाँ भेजा, तब क्या उन्होंने सोचा था कि आप स्वस्थचित्त हैं?

आह, शायद आप बौद्धिक रूप से तो ऐसे थे, परन्तु नैतिक रूप से नहीं। आपके नैतिक स्वभाव और कार्यों के विषय में, सब कुछ पूरी तरह विकृत था। मेरे प्रिय युवा मित्र, क्या आपका अपना नैतिक आचरण आपके विवेक और आपकी तर्कबुद्धि को उचित जान पड़ता है? यदि नहीं, तो आप एक नैतिक पागल के सिवाय और क्या हैं?

हे युवक, हे युवती, क्या आपको सचमुच अपने आप को नैतिक पागल लिखना पड़ेगा?

अन्त में, यह विषय आत्मा को न बुझाने के महत्त्व को दिखाता है। नैतिक पागलों को चंगा करने के लिए यही परमेश्वर का साधन है। आह, यदि आप अपने प्राणों से उसकी ज्योति को बुझा देंगे, तो आपके लिए केवल सदा का घोर अन्धकार ही शेष रहेगा! लेन सेमिनरी में एक जवान ने, जो अपने पापों में मर रहा था, कहा—तुमने मुझे क्यों नहीं बताया कि अनन्त नरकदण्ड जैसी कोई वस्तु है?

वेल्ड, तुमने मुझे क्यों नहीं बताया? मैंने बताया था। ओह, मैं वहाँ जा रहा हूँ—मैं ऐसे कैसे मरूँ? अँधेरा होता जा रहा है; रोशनी लाओ! और इस प्रकार वह ज्योति और आशा के इस संसार से चला गया!

हे पापी, सावधान रहिए कि परमेश्वर ने आपके अँधेरे हृदय में जो ज्योति डाली है उसे आप बुझा न दें, कहीं ऐसा न हो कि जब आप इस संसार से जाएँ तो भरी दोपहर में आपके प्राण के लिए अँधेरा हो जाए—वह अँधेरा जो सदा के घोर अन्धकार का द्वार है।

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