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5. पापियों के बहाने परमेश्वर को दोषी ठहराते हैं “क्या तू मेरा न्याय भी व्यर्थ ठहराएगा? क्या तू आप निर्दोष ठहरने की मनसा से मुझ को दोषी ठहराएगा?”—अय्यूब 40:8।
यद्यपि अय्यूब ने कुल मिलाकर परमेश्वर के विषय में ठीक ही कहा था, तौभी अपनी कठिन परीक्षाओं के बीच अपनी बड़ी वेदना और व्याकुलता में उसने कुछ ऐसी बातें कह दी थीं जो उतावली और अपमानजनक थीं।
इन्हीं बातों के लिए प्रभु ने उसे डाँटा। यह डाँट हमारे पाठ के सन्दर्भ में लिखी है:
“फिर यहोवा ने अय्यूब से यह भी कहा, क्या जो बकवास करता है वह सर्वशक्तिमान से झगड़ा करे? जो ईश्वर से विवाद करता है वह इसका उत्तर दे।
“तब अय्यूब ने यहोवा को उत्तर दिया, देख, मैं तो तुच्छ हूँ, मैं तुझे क्या उत्तर दूँ? मैं अपनी उँगली दाँत तले दबाता हूँ। एक बार तो मैं कह चुका, परन्तु और कुछ न कहूँगा; हाँ, दो बार भी मैं कह चुका, परन्तु अब कुछ और आगे न बढ़ूँगा।
“तब यहोवा ने अय्यूब को आँधी में से यह उत्तर दिया, पुरुष की नाईं अपनी कमर बाँध ले, मैं तुझ से प्रश्न करता हूँ, और तू मुझे बता। क्या तू मेरा न्याय भी व्यर्थ ठहराएगा? क्या तू आप निर्दोष ठहरने की मनसा से मुझ को दोषी ठहराएगा?”—अय्यूब 40:1-8।
परन्तु मेरा उद्देश्य इन शब्दों के मूल अभिप्राय और सन्दर्भ पर विचार करना नहीं है, वरन् यह देखना है कि आज पापियों के मामले पर ये किस प्रकार लागू होते हैं। इस उद्देश्य को पूरा करते हुए मैं— I. यह दिखाऊँगा कि पाप के लिए हर एक बहाना परमेश्वर को दोषी ठहराता है।
II. इनमें से कुछ बहानों पर विस्तार से विचार करूँगा।
III. यह दिखाऊँगा कि पाप के लिए बहाना बनाना अन्याय के ऊपर अपमान भी जोड़ देता है।
I. पाप के लिए हर एक बहाना परमेश्वर को दोषी ठहराता है।
I. पाप के लिए हर एक बहाना परमेश्वर को दोषी ठहराता है।
यह बात तब स्पष्ट हो जाएगी जब हम इन बातों पर विचार करें: 1. कि कोई भी ऐसी बात पाप नहीं हो सकती जिसके लिए कोई न्यायसंगत बहाना हो।
यह बात पूर्णतः स्वयंसिद्ध है। इसलिए इसे न तो व्याख्या की आवश्यकता है और न प्रमाण की।
2. यदि परमेश्वर उस बात को दोषी ठहराता है जिसके लिए कोई अच्छा बहाना है, तो वह अवश्य ही गलत है। यह भी स्वयंसिद्ध है। यदि परमेश्वर उस काम को दोषी ठहराता है जिसे करने का हमारे पास अच्छा कारण है, तो सारे विश्व में कोई भी बुद्धिमान प्राणी उसे उचित नहीं ठहरा सकता।
3. परन्तु परमेश्वर सब पापों को दोषी ठहराता है। वह पाप को पूरी तरह दोषी ठहराता है, और उसके लिए छोटी से छोटी सफ़ाई या बहाने की भी अनुमति नहीं देता। अतः या तो उसके लिए कोई सफ़ाई है ही नहीं, या फिर परमेश्वर गलत है।
4. फलस्वरूप, पाप के लिए हर एक बहाना परमेश्वर पर दोष मढ़ता है, और वास्तव में उस पर अत्याचार का आरोप लगाता है। इसलिए जो कोई पाप के लिए बहाना प्रस्तुत करता है, वह परमेश्वर पर दोष लगाता है।
II. अब हम इनमें से कुछ बहानों पर विचार करेंगे, और देखेंगे कि जो सिद्धान्त मैंने रखे हैं वे न्यायसंगत और सच्चे हैं या नहीं।
1. अयोग्यता (असमर्थता)। इससे अधिक आम कोई बहाना नहीं। यह हर एक मसीही देश में बार-बार गूँजता और प्रतिध्वनित होता रहता है, और युग-युग से पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपा जाता है, कभी भुलाया नहीं जाता। बिना किसी लज्जा के खुले मुँह यह घोषणा की जाती है कि परमेश्वर मनुष्यों से जो माँगता है, उसे वे कर ही नहीं सकते।
आइए, इसकी जाँच करें और देखें कि इसका अर्थ क्या निकलता है। कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्यों से वह माँगता है जो वे कर नहीं सकते। तो क्या वह जानता है कि मनुष्य उसे नहीं कर सकते? निश्चय ही। तब उसके पास उसे माँगने की कोई सफ़ाई नहीं, और यह माँग सर्वथा अनुचित है। मनुष्य की बुद्धि इसे कभी उचित नहीं ठहरा सकती।
यह तो एक स्वाभाविक असम्भवता है।
फिर, जो मनुष्य नहीं कर सकता, उसकी माँग परमेश्वर किस दण्ड की शर्त पर करता है? धमकी में बताया गया दण्ड अनन्त मृत्यु है! हाँ, उन लोगों के विचार के अनुसार जो अयोग्यता को बहाने के रूप में प्रस्तुत करते हैं, अनन्त मृत्यु। परमेश्वर अनन्त मृत्यु के दण्ड की शर्त पर मुझसे वह करने की माँग करता है जिसके विषय में वह जानता है कि मैं उसे नहीं कर सकता। सचमुच, यह परमेश्वर को सबसे बुरे अर्थ में दोषी ठहराता है। आप चाहें तो सीधे-सीधे परमेश्वर पर एक असीम अत्याचारी होने का आरोप लगा दें—बात एक ही है।
इसके अतिरिक्त, यह हमारे हाथ में नहीं है कि इन शर्तों पर हम परमेश्वर पर असीम अत्याचार का आरोप लगाएँ या न लगाएँ, क्योंकि हम ऐसा किए बिना रह ही नहीं सकते। हमारी बुद्धि का नियम यही माँगता है।
अतः जो लोग इस आधार पर खड़े होते हैं, वे परमेश्वर पर असीम अत्याचार का आरोप लगाते हैं।
हे पापी, जब आप अयोग्यता का बहाना प्रस्तुत करते हैं, तो शायद आप तनिक भी नहीं सोचते कि आप वास्तव में परमेश्वर को असीम अत्याचार के आरोप में कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। और हे मसीही, आप जो अयोग्यता के इस मत को अपने “ऑर्थोडॉक्स” (खरे सिद्धान्तवाले) विश्वास-वचन का अंग बनाते हैं, शायद आपने परमेश्वर के चरित्र पर इसके निन्दापूर्ण प्रभावों पर बहुत कम ध्यान दिया हो; परन्तु आपके ध्यान न देने से तथ्य नहीं बदलता। यह काला आरोप अयोग्यता के सिद्धान्त में ही निहित है, और किसी भी व्याख्या के द्वारा उसे उसमें से निकाला नहीं जा सकता।
मैंने संकेत किया है कि यह आरोप परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा है—और यह बिल्कुल सच है। परमेश्वर से ऐसा काम करना दूर रहे! क्या परमेश्वर स्वाभाविक असम्भवताओं की माँग करेगा, और मनुष्यों पर वह काम न करने के कारण अनन्त मृत्यु का दण्ड सुनाएगा जिसे करने की उनमें स्वाभाविक शक्ति ही नहीं? कभी नहीं! तौभी भले और बुरे दोनों प्रकार के लोग मिलकर परमेश्वर पर ठीक यही काम करने का आरोप लगाते हैं—और वह भी केवल एक या दो बार नहीं, बल्कि सब युगों में, सारी मनुष्य जाति के साथ, आदि से लेकर समय के अन्त तक निरन्तर! कितना भयानक! परमेश्वर के सारे शासन में किसी भी बात ने यहोवा का कभी इतना अपमान और तिरस्कार नहीं किया! इससे बढ़कर निन्दापूर्ण और झूठी बात कभी नहीं हुई! परमेश्वर कहता है, “उसकी आज्ञाएँ कठिन नहीं;” परन्तु आप अयोग्यता के इस बहाने के द्वारा घोषणा करते हैं कि परमेश्वर के वचन झूठे हैं। आप कहते हैं कि उसकी आज्ञाएँ न केवल कठिन हैं, वरन् स्वाभाविक रूप से असम्भव भी हैं!
सुनिए! प्रभु यीशु क्या कहता है? “मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है।” और क्या आप इसका इन्कार करते हैं? क्या आप उसके वचनों के ठीक सामने उठ खड़े होकर यह कहते हैं, “हे प्रभु, तेरा जूआ इतना कठोर है कि कोई मनुष्य उसे किसी रीति से सह नहीं सकता; तेरा बोझ इतना भारी है कि कोई मनुष्य उसे कभी उठा नहीं सकता?”
क्या यह उसका खण्डन करना और उसकी निन्दा करना नहीं है, जो झूठ बोल ही नहीं सकता?
परन्तु आप यह पक्ष लेते हैं कि कोई भी मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं कर सकता। जैसा प्रेस्बिटेरियन विश्वास-अंगीकार (कन्फ़ेशन ऑफ़ फ़ेथ) में लिखा है, “कोई भी मनुष्य, न तो अपने आप से और न इस जीवन में प्राप्त किसी अनुग्रह के द्वारा, परमेश्वर की आज्ञाओं का पूर्ण रूप से पालन करने में समर्थ है; वरन् वह प्रतिदिन विचार, वचन और कर्म में उन्हें तोड़ता है।” ध्यान दीजिए, यह केवल यही नहीं कहता कि कोई मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने में समर्थ नहीं, बल्कि यह भी कि कोई मनुष्य “इस जीवन में प्राप्त किसी अनुग्रह के द्वारा” भी ऐसा करने में समर्थ नहीं; इस प्रकार यह घोषणा सुसमाचार पर एक लांछन बन जाती है, और साथ ही उसके रचयिता की व्यवस्था का, और उन दोनों के साथ मनुष्य के सम्बन्ध का भी, एक प्रत्यक्ष गलत चित्रण ठहरती है। विश्वास-अंगीकार के इस कथन को लांछन कहना तो संयमित भाषा ही है। यदि नरक में या नरक के बाहर कहीं भी कोई झूठ है, तो यह झूठ है—या फिर परमेश्वर एक असीम अत्याचारी है। यदि बुद्धि को बोलने ही दिया जाए, तो उसके लिए इससे कम या इससे भिन्न कुछ कहना असम्भव है। और क्या परमेश्वर ने मनुष्य की बुद्धि को इसी उद्देश्य से नहीं रचा कि वह उसके सब मार्गों की खराई को पहचाने?
परमेश्वर सच्चा ठहरे, चाहे हर एक मनुष्य झूठा प्रमाणित हो! वर्तमान मामले में यह उल्लेखनीय तथ्य कि कोई भी मनुष्य अपने विवेक को शान्त नहीं कर सकता, और न स्वयं को यह सन्तोष दिला सकता है कि वह सचमुच व्यवस्था का पालन करने में असमर्थ है, यह दिखाता है कि झूठा मनुष्य है, परमेश्वर नहीं।
2. दूसरा बहाना जो पापी बनाते हैं, वह है समय का अभाव।
मान लीजिए मैं अपने किसी पुत्र से कहूँ, “जाओ, यह या वह काम करो, नहीं तो तुम्हें कोड़ों से मार-मारकर मार डाला जाएगा।” वह उत्तर देता है, “पिताजी, मैं इसे किसी रीति से नहीं कर सकता, क्योंकि मेरे पास समय नहीं है। मुझे वह दूसरा काम करते रहना है जिसे करने के लिए आपने मुझसे कहा था; और इसके अलावा, यदि मेरे पास और कोई काम न भी होता, तो भी आप जितना समय देते हैं उसमें मैं यह नया काम किसी रीति से नहीं कर सकता।” अब यदि यह कथन सच है, और आज्ञा देते समय मैं यह जानता था, तो मैं एक अत्याचारी हूँ। इस आरोप से बचने का कोई उपाय नहीं।
अपने पुत्र के प्रति मेरा व्यवहार निरा अत्याचार है।
इसी प्रकार यदि परमेश्वर सचमुच आपसे वह माँगता है जिसे करने का आपके पास समय नहीं, तो वह असीम रूप से दोषी है।
क्योंकि वह निश्चय जानता है कि आपके पास कितना कम समय है, और इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह अपनी माँगों को अत्यन्त भयानक दण्डों के द्वारा लागू करता है। क्या! क्या परमेश्वर न्याय की ऐसी उपेक्षा करनेवाला, अपने प्राणियों के कल्याण के प्रति ऐसा लापरवाह है कि वह दहकते हुए वज्रों से खिलवाड़ करे, और न्याय और धर्म की परवाह किए बिना उन्हें अपने अभागे प्राणियों के बीच फेंके? कभी नहीं! कभी नहीं! यह सच नहीं है; यह तो केवल वह झूठी धारणा है जो पापी तब बना लेता है जब वह यह बहाना प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर उससे जो माँगता है उसे करने के लिए उसके पास समय नहीं है।
हे पापी, मैं आपसे पूछता हूँ, परमेश्वर जो पहला बड़ा कर्तव्य माँगता है—अर्थात् उसे अपना हृदय दे देना—उसे करने में आपको कितना समय लगेगा? इसमें कितनी देर लगेगी? परमेश्वर की सेवा करने और उससे प्रेम करने का निश्चय करने में आपको कितनी देर लगनी चाहिए? क्या आप नहीं जानते कि यह काम, जब किया जाएगा, तो एक ही क्षण में हो जाएगा? और स्वयं को यह करने के लिए राज़ी करने में आपको कितनी देर लगनी चाहिए?
शायद आपका अर्थ यह हो: हे प्रभु, तेरी सेवा करने का निश्चय करने में मुझे इतना समय लगता है कि ऐसा लगता है मुझे इसके लिए कभी पर्याप्त समय मिलेगा ही नहीं; अपने मन को इस अप्रिय निर्णय तक लाने के लिए तो सारा जीवन भी मुझे लगभग बहुत छोटा लगता है। हे पापी, क्या आपका यही अर्थ है?
परन्तु आइए, इस विषय को हर ओर से देखें। मान लीजिए मैं अपने पुत्र से कहूँ, “बेटा, यह काम अभी करो;” और वह उत्तर दे, “पिताजी, मैं नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे वह दूसरा काम करना है जो आपने मुझे करने को कहा था।” क्या
परमेश्वर ऐसा करता है? नहीं। परमेश्वर हर एक क्षण का कर्तव्य केवल उसी के समय पर माँगता है। बस इतना ही। वह हमसे केवल इतना चाहता है कि जो-जो सामर्थ उसने हमें दी है, ठीक उस सब का हम विश्वासयोग्यता से उपयोग करें—इससे अधिक कुछ नहीं। वह केवल यह माँगता है
कि हम जितना अच्छा कर सकते हैं उतना करें। जब वह यह ठहराता है कि कितना प्रेम उसे प्रसन्न करेगा,
तो वह यह नहीं कहता—तू प्रभु अपने परमेश्वर से एक स्वर्गदूत की शक्तियों के साथ—एक साराप के धधकते हृदय के साथ प्रेम रखना—नहीं, केवल “अपने सारे मन से”; बस इतना ही। पापी का यह बहाना असीम रूप से हास्यास्पद है कि वह उतना अच्छा नहीं कर सकता जितना वह कर सकता है—कि वह अपने ही सारे मन, और प्राण, और बुद्धि, और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकता। परमेश्वर पापी से कहता है, जितना अच्छा तू कर सकता है, उतना कर। आह, पापी कहता है, मैं वह करने में समर्थ नहीं। ओह, कैसी मूर्खतापूर्ण बकवास!
आप आरोप लगाते हैं कि परमेश्वर अनुचित माँग करता है। सच तो यह है कि परमेश्वर सब प्राणियों में सबसे अधिक न्यायसंगत और विवेकपूर्ण है। वह केवल इतना माँगता है कि हम हर एक क्षण का उपयोग उसके लिए करें—परिश्रम में या विश्राम में, जो भी उसकी महिमा के लिए सबसे अधिक हो। वह केवल इतना चाहता है कि जो समय, प्रतिभाएँ और शक्ति उसने हमें दी हैं, उनके द्वारा हम उसकी सेवा के लिए जितना कर सकते हैं उतना करें।
वह माता कहती है, “मैं धार्मिक कैसे बनूँ? मुझे अपने सब बच्चों की देखभाल करनी पड़ती है।” अच्छा! और क्या आपको परमेश्वर की सेवा के लिए समय नहीं मिल सकता? परमेश्वर आपसे क्या चाहता है? क्या यह कि आप अपने बच्चों को छोड़ दें और उनकी उपेक्षा करें? कदापि नहीं; वह आपसे कहता है कि अपने बच्चों की देखभाल करें—अच्छी देखभाल करें; और यह सब परमेश्वर के लिए करें। वह आपसे कहता है—ये मेरे बच्चे हैं; और वह उन्हें आपके हाथों में सौंपकर कहता है—मेरे लिए इनकी देखभाल कर, और मैं तुझे मज़दूरी दूँगा। अब क्या परमेश्वर के लिए अपने बच्चों की देखभाल करने में, अपने लिए उनकी देखभाल करने से अधिक समय लगेगा? ओह, परन्तु आप कहती हैं, मैं धार्मिक नहीं बन सकती, क्योंकि मुझे सुबह उठकर नाश्ता तैयार करना होता है। तो परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए नाश्ता तैयार करने में, अपने आप को प्रसन्न करने के लिए वही काम करने से कितना अधिक समय लगेगा? अपने कर्तव्यों को स्वार्थ से करने की अपेक्षा उन्हें धार्मिक भाव से करने के लिए आपको कितना अधिक समय चाहिए?
तो फिर इस बहाने से आपका अर्थ क्या है? सच तो यह है कि ये सब बहाने दिखाते हैं कि बहाना बनानेवाला उन्मत्त है—मानसिक रोगी नहीं, पर उन्मत्त। क्योंकि परमेश्वर ऐसी कौन सी बड़ी बात माँगता है कि समय के अभाव में आप उसे न कर सकें? केवल यह, कि आप सब कुछ परमेश्वर के लिए करें। जो लोग यह बहाना बनाते हैं, वे मानो धर्म के वास्तविक स्वरूप को, और परमेश्वर की उन माँगों को जो वह उनसे करता है, पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं। अयोग्यता के बहाने के साथ भी यही बात है। पापी कहता है, “मैं असमर्थ हूँ।” किस काम को करने में असमर्थ? ठीक उसी को जो आप कर सकते हैं? क्योंकि परमेश्वर इससे आगे कभी कुछ नहीं माँगता। इसलिए जब तक आप यह न मान लें कि परमेश्वर आपसे आपकी सामर्थ से अधिक माँगता है, तब तक आपका बहाना झूठा, बल्कि हास्यास्पद भी है। दूसरी ओर, यदि आप यह नहीं मानते, तो आपका बहाना, यदि सच भी हो, परमेश्वर को अन्यायी सिद्ध नहीं करेगा।
परन्तु मैं कह रहा था कि धार्मिक बनने के लिए समय न होने के इस बहाने में मनुष्य धर्म के सच्चे विचार को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं या उसे बिगाड़ देते हैं। किसान बहाना करता है, “मैं धार्मिक नहीं बन सकता; मैं परमेश्वर की सेवा
नहीं कर सकता—मुझे अपना गेहूँ बोना है।” अच्छा, अपना गेहूँ बोइए, पर उसे प्रभु के लिए बोइए। ओह, पर आपके पास तो बहुत काम है! तो सब कुछ प्रभु के लिए कीजिए। कोई दूसरा धार्मिक नहीं बन सकता, क्योंकि उसे अपना पाठ याद करना है। अच्छा, अपना पाठ याद कीजिए, पर उसे प्रभु के लिए याद कीजिए, और यही धर्म होगा। जो मनुष्य धार्मिक बनना चाहने के कारण अपना गेहूँ बोने या अपना पाठ याद करने की उपेक्षा करे, वह पागल है। वह सबसे सीधी-सादी बातों को सबसे बुरी रीति से बिगाड़ देता है। यदि आपको धार्मिक होना है, तो आपको परिश्रमी होना ही होगा। किसान को अपना गेहूँ बोना ही है, और विद्यार्थी को अपना पाठ याद करना ही है। एक आलसी
मनुष्य शैतान से बढ़कर धार्मिक नहीं हो सकता। यह धारणा कि मनुष्य धार्मिक नहीं बन सकते क्योंकि उन्हें कुछ काम-धन्धा करना है, निरी बकवास है। यह इस महान सत्य को पूरी तरह अनदेखा कर देती है कि परमेश्वर हमें जीवन के उचित काम-धन्धे करने से कभी नहीं रोकता, वरन् केवल यह माँगता है कि हम सब कुछ उसी के लिए करें। यदि परमेश्वर सचमुच यह माँगता कि हम उसकी सेवा इस रीति से करें जिससे हमें जीवन के व्यावहारिक कर्तव्यों की उपेक्षा करनी पड़े, तो सचमुच यह कठिन स्थिति होती। परन्तु वास्तव में पूरा सत्य यह है कि वह हमसे ठीक इन्हीं कर्तव्यों को करने की, और उन सबको ईमानदारी और विश्वासयोग्यता से उसके लिए, और सबसे अच्छी रीति से करने की माँग करता है। किसान अपने खेत की देखभाल करे, और ध्यान रखे कि वह उसे अच्छी तरह करे, और सबसे बढ़कर, उसे परमेश्वर के लिए करे। वह परमेश्वर का खेत है, और हर एक किसान का हृदय भी परमेश्वर का है; इसलिए खेत परमेश्वर के लिए जोता जाए, और हृदय केवल उसी को समर्पित किया जाए।
3. मनुष्य अपने बहाने के रूप में पापी स्वभाव को प्रस्तुत करते हैं। तो बताइए, यह पापी स्वभाव क्या है? क्या आपका अर्थ यह है कि आपकी बनावट की हर एक शक्ति, यहाँ तक कि उसका मूल तत्व भी, आदम में विषैला और पापमय बना दिया गया, और इसी अशुद्ध दशा में विरासत के द्वारा आप तक पहुँचा? क्या आपका अर्थ यह है कि आप ऐसे पाप में जन्मे कि आपके अस्तित्व का सार पूरी तरह उसमें सना हुआ है, यहाँ तक कि आपकी बनावट की सब शक्तियाँ स्वयं ही पाप हैं? क्या आप इस पर विश्वास करते हैं?
मैं मानता हूँ कि यदि यह सच होता, तो यह बड़ी कठिन स्थिति होती। सचमुच बड़ी कठिन स्थिति! जब तक मेरी बुद्धि के नियम नहीं बदल जाते, यह मुझे खुलकर यह कहने को विवश करता—हे प्रभु, यह कितनी कठिन बात है कि तू मेरे स्वभाव को ही पापी बनाए, और फिर उसके पाप का दोष मुझ पर लगाए! मैं यह कहे बिना रह न सकता; मेरे भीतरी अस्तित्व की गहरी गूँजें इसे बिना रुके घोषित करतीं, और मेरे सिर पर दस हज़ार वज्रों का टूटना भी मुझे ऐसा सोचने और कहने से न रोक पाता। परमेश्वर की दी हुई मेरी बुद्धि सदा इसकी पुष्टि करती रहती।
परन्तु यह मत नितान्त बेतुका है। क्योंकि बताइए, पाप क्या है? परमेश्वर उत्तर देता है, “व्यवस्था का विरोध।” और अब आप मानते हैं कि आपका स्वभाव स्वयं ही परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन है—बल्कि आदम से लेकर आपके जन्म के दिन तक वह सदा परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन रहा है; आप मानते हैं कि इस पाप की धारा आपकी जाति की नसों और लहू में होकर नीचे उतरी है—तो उसे ऐसा बनाया किसने?
मनुष्य की नसों और लहू को किसने रचा? यह शारीरिक बनावट और यह मानसिक बनावट किसके हाथ से निकली? क्या मनुष्य अपना सृजनहार आप था? क्या आपकी शारीरिक और मानसिक बनावट को रचने में कुछ काम पाप ने भी किया? क्या आप ऐसी कोई बात मानते हैं? नहीं, आप अपने स्वभाव और उसकी मूल शक्तियों का श्रेय परमेश्वर को देते हैं, और इसलिए अपने पापी स्वभाव के दोषपूर्ण रचयिता होने का आरोप आप उसी पर लगाते हैं।
परन्तु यह कैसी विचित्र बात है! यदि मनुष्य अपने पापी स्वभाव के लिए दोषी है, तो नीली या काली आँखें होने के लिए मनुष्य को दोषी क्यों न ठहराया जाए? सच तो यह है कि पाप कभी किसी स्वभाव के होने में, या स्वभाव जैसा है उसमें, नहीं हो सकता; वह केवल और केवल उस बुरे उपयोग में है जो हम अपने स्वभाव का करते हैं। बस इतना ही। हमारा सृजनहार उस बात के लिए हमें कभी दोष नहीं देगा जो उसने स्वयं किया या बनाया है; निश्चय ही नहीं। यदि हम केवल अपनी शक्तियों का—अपनी बुद्धि, अपनी संवेदनशीलता और अपनी इच्छा का—सही उपयोग करें, तो वह हमें दोषी नहीं ठहराएगा। वह हमें हमारे मूल स्वभाव के लिए कभी उत्तरदायी नहीं ठहराता। यदि आप
ध्यान दें, तो आप पाएँगे कि परमेश्वर ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं दी जो यह ठहराए कि हमारा स्वभाव और हमारी बनावट की शक्तियाँ किस प्रकार की हों। इन बातों पर उसने कोई व्यवस्था नहीं दी, जिसका उल्लंघन—यदि वह दी गई होती—कुछ हद तक पाप की परिभाषा से मेल खा सकता। परन्तु अब जबकि स्वभाव के विषय में कोई व्यवस्था है ही नहीं, तो स्वभाव कोई उल्लंघन नहीं हो सकता।
यहाँ मैं यह कह दूँ कि यदि परमेश्वर यह ठहरानेवाली व्यवस्था बनाता कि मनुष्य का स्वभाव या बनावट कैसी हो, तो वह अन्यायपूर्ण और बेतुकी हुए बिना रह ही नहीं सकती थी, इस कारण कि मनुष्य का स्वभाव व्यवस्था, आज्ञा और दण्ड का उचित विषय ही नहीं है, क्योंकि वह स्वेच्छा से किए गए कार्य की, बल्कि मनुष्य के किसी भी कार्य की, सीमा से पूरी तरह बाहर है। फिर भी हज़ारों मनुष्यों ने यह मत रखा है कि पाप बहुत हद तक पापी स्वभाव होने में ही है। हाँ, पिछले इतिहास के लम्बे युगों में गम्भीर धर्मविज्ञानियों ने बड़ी गम्भीरता से यह भयंकर मत सिखाया है; यह मंचों (पल्पिटों) से गूँजता रहा है, और छापेखाने के लिए पक्के साँचों में ढाला गया है, और लोग खरे सिद्धान्त (ऑर्थोडॉक्सी) की सबसे पक्की कसौटी के रूप में इस मत का गुणगान करते कभी थकते नहीं दिखे! ऑर्थोडॉक्सी!! यहोवा पर इससे अधिक घिनौना लांछन कभी नहीं लगाया गया! ऐसा दूसरा मत बताना कठिन होगा जो सामान्य समझ का इससे अधिक घोर अपमान करता हो। यह बकवास है—बेतुकी और निरी बकवास! मैं परमेश्वर से चाहता हूँ कि काश यह बकवास से भी बदतर न होता! सोचिए, इसने कितनी हानि की है! सोचिए, इसने परमेश्वर की व्यवस्था, उसके शासन और उसके चरित्र को कितना कलंकित किया है! सोचिए, अपने जन्म के दिन से आज की घड़ी तक इसने पापियों के मुँह को कितने बहानों से भर दिया है!
अब मेरा यह आशय नहीं कि जिन लोगों ने यह मत रखा है, उन्होंने जान-बूझकर इसके द्वारा परमेश्वर का अपमान किया है। मेरा यह आशय नहीं कि वे यहोवा पर इस मत के अधर्मी, बल्कि निन्दापूर्ण प्रभावों से अवगत रहे हैं; मुझे यह सोचकर प्रसन्नता है कि कम से कम कुछ लोगों ने यह सारी हानि अनजाने में की है। परन्तु जिस सच्ची अज्ञानता में यह भूल और हानि हुई, उसके कारण वह भूल और हानि किसी भी प्रकार कम नहीं हो गई।
4. पापी अपने बचाव में कहते हैं कि वे मसीही बनने को इच्छुक हैं। वे कहते हैं कि वे पवित्र किए जाने को इच्छुक हैं। ओह हाँ, वे बड़े इच्छुक हैं; परन्तु कोई बड़ी कठिनाई और पीछे पड़ी है, या कोई और बात—शायद वे ठीक-ठीक नहीं जानते कि कहाँ—पर वह कहीं न कहीं है, और वह उन्हें मसीही बनने नहीं देती।
अब सच यह है कि यदि हम सचमुच इच्छुक हैं, तो इससे अधिक हम कुछ कर ही नहीं सकते। इस विषय में नैतिक रूप से हमें केवल इच्छा ही करनी है, और हम केवल इतना ही कर सकते हैं। परन्तु पापी के मुँह में यह बहाना यह ठहराता है कि परमेश्वर हमसे वह माँगता है जो स्वाभाविक रूप से असम्भव है। वह यह मान लेता है कि परमेश्वर हमसे ठीक इच्छा करने से बढ़कर कुछ और माँगता है; और वह, चाहे जो भी हो, निस्सन्देह हमारे लिए एक असम्भवता है। यदि मैं अपनी पेशियों को हिलाने की इच्छा करूँ, और कोई हलचल न हो, तो मैंने वह सब कर लिया
जो मैं कर सकता हूँ; कठिनाई मेरी पहुँच से बाहर है, और उसके अस्तित्व के लिए या उसकी रुकावट के लिए मुझ पर कोई दोष नहीं। ठीक इसी प्रकार, यदि मैं परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा करूँ, और उसका बिल्कुल कोई फल न निकले,
तो मैंने अपना भरसक कर लिया, और परमेश्वर इससे अधिक कुछ कभी नहीं माँग सकता। वास्तव में, इच्छा करना ही वह बात है जिसे परमेश्वर माँगता है। “यदि मन की तैयारी हो, तो वह ग्रहण किया जाता है।” हे माता-पिता, मुझे बताइए, यदि आपने अपने बच्चे से कोई काम करने को कहा होता, और आप देखते कि वह अपनी पूरी शक्ति लगा रहा है, तो क्या आप उससे कुछ और माँगते? यदि आप किसी माता-पिता को अपने बच्चे से, चाहे वह कितना भी इच्छुक हो, उससे अधिक माँगते और बलपूर्वक करवाते देखें जितना वह किसी रीति से कर सकता है, तो क्या आप उस माता-पिता को अत्याचारी कहकर धिक्कार न करते? निश्चय करते। दास-चालक भी, जब देखता है कि उसका दास जितना कर सकता है उतना करने को इच्छुक है, तो प्रायः उसे नहीं पीटता।
यह बहाना पूरी तरह झूठा है, क्योंकि कोई भी पापी जैसा वह वास्तव में है उससे ज़रा भी बेहतर होने को इच्छुक नहीं। यदि इच्छा ठीक है, तो सब कुछ ठीक है; और सर्वत्र इच्छा की दशा ही किसी के नैतिक चरित्र का माप है। इसलिए जो लोग यह बहाना बनाते हैं कि वे मसीही बनने को इच्छुक हैं, जबकि वे अपने पापों में ही बने रहते हैं, वे निरी बकवास करते हैं।
5. पापी कहते हैं कि वे परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फ़िलाडेल्फ़िया में एक महिला कई वर्षों से बड़ी मानसिक व्यथा में थी। उससे मिलने जाने पर मैंने पूछा, “परमेश्वर आपसे क्या चाहता है?
आपकी दशा क्या है?” “ओह,” उसने कहा, “मेरे उसे खोजना आरम्भ करने से पहले परमेश्वर ने बहुत समय तक मेरी प्रतीक्षा की, और अब मुझे उसकी उतनी ही देर प्रतीक्षा करनी चाहिए जितनी उसने मेरी की।
मेरे पादरी मुझसे यही कहते हैं। इसलिए आप देखते हैं कि मैं बड़ी व्यथा में परमेश्वर की प्रतीक्षा कर रही हूँ कि वह मुझे ग्रहण करे।”
अब इसका वास्तविक अर्थ क्या है? इसका सार यह है: परमेश्वर मुझ पर कर्तव्य करने का दबाव डालता है, पर मेरे उसे करने के लिए वह तैयार नहीं है; वह मुझसे सुसमाचार के भोज में आने को कहता है, और मैं तैयार हूँ; परन्तु वह मुझे भीतर आने देने को तैयार नहीं।
अब क्या यह सारा दोष परमेश्वर पर नहीं डाल देता? क्या कोई बात इससे अधिक पूरी तरह ऐसा कर सकती है? पापी कहता है, “मैं तैयार हूँ, और इच्छुक हूँ, और प्रतीक्षा कर रहा हूँ; परन्तु परमेश्वर अभी इसके लिए तैयार नहीं कि मैं पाप करना छोड़ूँ। उसकी घड़ी अभी नहीं आई।
जब मैंने पहले-पहल प्रचार करना आरम्भ किया, तो मैंने पाया कि यह धारणा लगभग सर्वत्र फैली हुई थी। प्रायः, लोगों पर कर्तव्य का दबाव डालने के बाद, लोग मुझसे आकर कहते, “क्या! आप सारा दोष पापी पर डालते हैं!” “हाँ, निश्चय डालता हूँ,” मेरा उत्तर होता। एक बार प्रचार के बाद एक वृद्ध महिला मुझसे मिली और बोल उठी,
“क्या! आप लोगों को स्वयं धर्म प्राप्त करने में लगाते हैं! आप उनसे कहते हैं कि वे स्वयं पश्चाताप करें? आपका यह अर्थ तो नहीं है, है ना?” “निश्चय यही अर्थ है,” मैंने कहा। वह बहुत वर्षों से यह सिखाती आ रही थी कि पापी का मुख्य कर्तव्य परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना है।
6. पापी बहाना बनाते हैं कि उनकी परिस्थितियाँ बहुत विशेष हैं। मैं अपना कर्तव्य भली-भाँति जानता हूँ, पर मेरी परिस्थितियाँ बड़ी विशेष हैं। तो क्या परमेश्वर आपकी परिस्थितियों को नहीं समझता? बल्कि, क्या उसके विधान का उन्हें वैसा बनाने में हाथ नहीं रहा जैसी वे हैं? यदि ऐसा है, तो आप दोष परमेश्वर पर डाल रहे हैं। आप कहते हैं, “हे प्रभु, तू कठोर स्वामी है, क्योंकि तू ने मेरी परिस्थितियों का कभी कोई ध्यान नहीं रखा।”
परन्तु हे पापी, यह बहाना बनाने में आपका वास्तविक आशय कितना है? क्या आपका अर्थ यह है कि आपकी परिस्थितियाँ इतनी विशेष हैं कि परमेश्वर को आपको धार्मिक बनने से, कम से कम अभी के लिए, छूट दे देनी चाहिए? यदि आपका आशय इतना नहीं है, तो आप अपनी परिस्थितियों को बहाना बनाते ही क्यों हैं? यदि आपका यही आशय है, तो आप जितना भूल में हो सकते हैं उतना ही भूल में हैं। क्योंकि परमेश्वर आपसे माँगता है कि आप अपनी परिस्थितियों के बावजूद अपने पाप को त्याग दें। अब यदि आपकी परिस्थितियाँ इतनी विशेष हैं कि उनमें रहकर आप परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते, तो आपको
उन्हें त्यागना होगा, नहीं तो अपना प्राण खोना होगा। यदि वे ऐसी हैं कि उनमें रहते हुए आप परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, तो तुरन्त ऐसा कीजिए।
परन्तु आप कहते हैं, “मैं अपनी परिस्थितियों से बाहर नहीं निकल सकता।” मेरा उत्तर है, आप निकल सकते हैं; आप उनकी दुष्टता से बाहर निकल सकते हैं; क्योंकि यदि परमेश्वर की सेवा करने के लिए आवश्यक हो, तो आप उन्हें बदल सकते हैं; और यदि नहीं, तो आप उन्हीं में रहते हुए पश्चाताप कर सकते हैं और परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं।
7. पापी का अगला बहाना यह है कि उसका मिज़ाज विशेष है। “ओह,” वह कहता है, “मैं बहुत घबरानेवाले स्वभाव का हूँ; या मेरा मिज़ाज बहुत सुस्त है—मुझमें मानो कोई संवेदना ही नहीं।” अब
परमेश्वर क्या माँगता है? क्या वह आपसे आपकी अपनी संवेदनशीलता के अतिरिक्त किसी दूसरी या भिन्न संवेदनशीलता की माँग करता है? या वह केवल इतना माँगता है कि जो आपके पास है, उसका आप प्रेम की व्यवस्था के अनुसार उपयोग करें?
परन्तु बहुत से बहानों की यही शैली है। एक में बहुत कम उत्तेजना है; दूसरे में बहुत अधिक; इसलिए दोनों में से कोई भी किसी रीति से पश्चाताप करके परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता! एक महिला मेरे पास आई, और उसने यह बहाना बनाया कि वह स्वभाव से बहुत अधिक उत्तेजित होनेवाली है, और अपने आप पर भरोसा करने का साहस नहीं कर सकती; और इसलिए पश्चाताप नहीं कर सकती। दूसरे की कठिनाई उलटी है—बहुत सुस्त—शायद ही कभी आँसू बहाता है—और इसलिए यदि वह प्रयत्न भी करे तो धर्म से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। परन्तु क्या परमेश्वर आपसे माँगता है कि आप स्वाभाविक रूप से जितने आँसू बहा सकते हैं उससे अधिक बहाएँ? या वह केवल यह माँगता है कि आप उसकी सेवा करें? निश्चय बस इतना ही। जो शक्तियाँ उसने आपको दी हैं, उन्हीं के साथ उसकी सेवा कीजिए। आपकी नसें चाहे कितनी भी उत्तेजनशील हों, आइए, और उन काँपती हुई संवेदनाओं को परमेश्वर के हाथों में सौंप दीजिए—उस संवेदनशीलता को परमेश्वर के हृदय में उंडेल दीजिए! वह केवल इतना ही माँगता है। मैं उस महिला के साथ सहानुभूति रखना जानता हूँ, क्योंकि मैं धधकती संवेदनशीलता के विषय में बहुत कुछ जानता हूँ; परन्तु क्या
परमेश्वर भावना और उत्तेजना माँगता है? या केवल हमारी सब शक्तियों का अपने प्रति सिद्ध समर्पण?
8. परन्तु कोई और कहता है, मेरा स्वास्थ्य इतना खराब है कि मैं सभा में नहीं जा सकता, और इसलिए धार्मिक नहीं बन सकता।
अच्छा, परमेश्वर क्या माँगता है? क्या वह यह माँगता है कि आप सब सभाओं में, चाहे वे सन्ध्या को हों या दिन में, जाएँ, चाहे आपका स्वास्थ्य इसके योग्य हो या न हो? इससे असीम रूप से दूर। यदि आप सभा में जाने योग्य नहीं हैं, तौभी आप परमेश्वर को अपना हृदय दे सकते हैं। यदि आप खराब मौसम में नहीं जा सकते, तो निश्चय जानिए कि परमेश्वर अब तक अस्तित्व में रहे सब प्राणियों में असीम रूप से सबसे अधिक विवेकपूर्ण है।
वह हर एक परिस्थिति का पूरा-पूरा ध्यान रखता है। क्या वह आपकी सारी निर्बलता नहीं जानता?
निश्चय जानता है। और क्या आप सोचते हैं कि वह आपके रोगी-कक्ष में आकर आपको इसलिए धिक्कारता है कि आप सभा में नहीं जा सकते, या असमर्थ होते हुए भी जाने का प्रयत्न नहीं करते, या बीमारी में वह सब नहीं करते जो आप स्वस्थ रहकर कर सकते? नहीं, वह ऐसा नहीं करता; वह तो पिता के रूप में आपके रोगी-कक्ष में आता है। वह दया और प्रेम में अपने हृदय की गहरी से गहरी करुणा उंडेलने आता है; तो फिर आप उसकी करुणा का उत्तर क्यों न दें? वह आपके पास आकर कहता है, “हे मेरे बच्चे, अपना हृदय मुझे दे।” और अब आप उत्तर देते हैं, “मेरे पास हृदय ही नहीं है।” तब उसके पास आपसे माँगने को कुछ नहीं—उसने तो सोचा था कि आपके पास हृदय है; और यह भी सोचा था कि उसने आपके हृदय को प्रेम और कृतज्ञता में अपनी ओर खींचने के लिए पर्याप्त किया है। वह पूछता है, “मैंने तेरे साथ जो-जो व्यवहार किया है, उस सब में तुझे कौन सी बात दुःखदायी लगती है? यदि कोई नहीं, तो तू पाप के बचाव में ऐसे बहाने क्यों प्रस्तुत करता है जो परमेश्वर पर आरोप लगाते और उसे दोषी ठहराते हैं?”
9. एक और बहाना इस रूप में होता है, “मेरा हृदय इतना कठोर है कि मैं कुछ अनुभव नहीं कर सकता।” यह धर्म का अंगीकार करनेवालों और अंगीकार न करनेवालों, दोनों में बहुत आम है। वास्तव में यह अयोग्यता के बहाने का ही एक दूसरा रूप है। सच तो यह है कि पापी के सब बहानों का सार केवल यही है, “मैं असमर्थ हूँ,” “परमेश्वर जो माँगता है वह मैं नहीं कर सकता।” यदि कठोर हृदय का बहाना कोई बहाना है भी, तो वह वास्तविक अयोग्यता के आधार पर ही हो सकता है।
परन्तु हृदय की कठोरता क्या है? क्या आपका अर्थ यह है कि आपकी संवेदनशीलता में इतनी अधिक उदासीनता है कि आप कोई भावना उत्पन्न ही नहीं कर सकते? या आपका अर्थ यह है कि आपमें ठीक इच्छा करने या ठीक कार्य करने की शक्ति ही नहीं? अब इस विषय में यह ध्यान रखना चाहिए कि भावनाएँ पूरी तरह अनैच्छिक होती हैं।
वे परिस्थितियों के अनुसार आती-जाती रहती हैं, और इसलिए परमेश्वर की व्यवस्था उन्हें कभी नहीं माँगती, और ठीक-ठीक कहें तो वे न स्वयं धर्म हैं, न उसका कोई अंग। अतः यदि कठोर हृदय से आपका अर्थ मन्द संवेदनशीलता है, तो आपका अर्थ ऐसी बात से है जिसका इस विषय से कोई सम्बन्ध नहीं।
परमेश्वर आपसे माँगता है कि आप अपनी इच्छा उसके अधीन कर दें, और अपने स्नेह उसी को समर्पित करें; और वह यह माँगता है, चाहे आपमें कोई भावना हो या न हो।
बाइबल में इस वाक्यांश के प्रयोग के अनुसार हृदय की वास्तविक कठोरता का अर्थ इच्छा की हठधर्मिता है। इसी प्रकार बच्चे में, कठोर हृदय का अर्थ है ऐसी इच्छा जो अपने माता-पिता की आज्ञा मानने के विरुद्ध दृढ़ हठ में अड़ी हुई है। इसके साथ-साथ बच्चे में बहुत या थोड़ी भावना हो सकती है। उसकी संवेदनाएँ तीव्र और पूरी तरह जागी हुई हो सकती हैं, या वे सोई हुई हो सकती हैं; तौभी दोनों ही दशाओं में हठीली इच्छा वहाँ हो सकती है।
अब परमेश्वर पापी में जिस हृदय की कठोरता की शिकायत करता है, वह ठीक इसी प्रकार की है। पापी अपने आत्म-भोग से चिपका रहता है, और उसे नहीं छोड़ता, और फिर हृदय की कठोरता की शिकायत करता है। आप उस बच्चे के विषय में क्या सोचेंगे जिससे एक अत्यन्त उचित काम करने को कहा जाए, और वह कहे, “मेरा हृदय इतना कठोर है, मैं झुक नहीं सकता।” “ओह,” वह कहता है, “मेरी इच्छा अपनी मनमानी करने पर इतनी अड़ी हुई है कि मैं किसी रीति से अपने पिता के अधिकार के आगे नहीं झुक सकता।”
यह शिकायत अत्यन्त आम है। बहुत से पापी यह शिकायत करते हैं, जिन्हें बार-बार चेतावनी दी गई है, जिनके साथ बार-बार प्रार्थना की गई है और जिनके लिए आँसू बहाए गए हैं, और जिन्हें बहुत बार पाप का बोध हुआ है।
और क्या इस बहाने से उसका सचमुच यह अर्थ है कि वह अपनी इच्छा को इतना हठीला पाता है कि परमेश्वर के दावों के आगे झुकने का निश्चय कर ही नहीं सकता? क्या उसका यही अर्थ है, और क्या वह सचमुच अपनी ही लज्जा का ढिंढोरा पीटना चाहता है? मान लीजिए आप नरक में दुष्टात्माओं के पास जाएँ, और उन पर परमेश्वर के दावों का ज़ोर दें, और वे उत्तर दें, “ओह, मेरा हृदय इतना कठोर है, मैं नहीं कर सकता”—तो उनका अर्थ क्या होगा? केवल यह: मैं इतना हठी हूँ—मेरी इच्छा पाप में इतनी जमी हुई है कि मैं एक क्षण के लिए भी पश्चाताप का विचार मन में नहीं आने दे सकता। उनका यही अर्थ होगा; और यदि पापी अपने विषय में सच बोलता है, और भाषा का सही प्रयोग करता है, तो उसका भी यही अर्थ होना चाहिए। परन्तु ओह, इस घोषणा के द्वारा वह अन्याय के ऊपर कैसा अपमान जोड़ता है! मान लीजिए कोई बच्चा यह बहाना बनाए—मैं अपने मन में अपने पिता और अपनी माता से प्रेम करने की बात नहीं ला सकता; उनके प्रति मेरा हृदय इतना कठोर है; मैं उनसे कभी प्रेम नहीं कर सकता;
मुझे केवल उनके साथ दुर्व्यवहार करने और उनके अधिकार को पैरों तले रौंदने में ही आनन्द आता है। यह कैसा बहाना है? क्या यह अन्याय के ऊपर अपमान का ढेर नहीं लगाता? या मान लीजिए किसी हत्यारे को अदालत के सामने लाया जाए, और दण्ड सुनाए जाने से पहले उसे बोलने की अनुमति दी जाए कि यदि उसे कुछ कहना हो कि दण्ड क्यों
न सुनाया जाए: मान लीजिए वह उठकर कहे, “अदालत की अनुमति हो तो, मेरा हृदय बहुत समय से चक्की के पाट के समान कठोर रहा है। मैंने इतने मनुष्यों की हत्या की है, और इतने लम्बे समय से यह करता आया हूँ, कि मैं अपने विवेक में ज़रा भी चुभन के बिना किसी मनुष्य को मार सकता हूँ। वास्तव में,
मुझमें लहू की ऐसी न बुझनेवाली प्यास है कि जब भी मुझे अच्छा अवसर मिलता है, मैं हत्या किए बिना रह ही नहीं सकता। सच तो यह है कि मेरा हृदय इतना कठोर है कि मुझे यह धन्धा किसी भी और काम के बराबर ही अच्छा लगता है।”
तो बताइए, अदालत कब तक ऐसे बहाने को सुनती रहेगी? “रुको! बस, रुको!” न्यायाधीश चिल्ला उठेगा, “अरे कुख्यात दुष्ट, हम ऐसे बहाने और नहीं सुन सकते! यहाँ आओ, शेरिफ़, फाँसी का तख़्ता ले आओ, और इस मनुष्य को न्याय के इन्हीं दीवारों के भीतर फाँसी पर लटका दो, क्योंकि जब तक मैं इसे मरा हुआ न देख लूँ, मैं इस न्यायासन से नहीं उठूँगा! यदि इसका बस चले तो यह इस भवन में हम सब की हत्या कर डालेगा!”
अब हम उस पापी के विषय में क्या सोचें जो यही बात कहता है? वह कहता है, हे परमेश्वर, मेरा हृदय इतना कठोर है कि मैं तुझ से कभी प्रेम नहीं कर सकता। मैं तुझ से इतनी सच्ची घृणा करता हूँ कि मैं अपना यह हृदय प्रेम और स्वेच्छापूर्ण अधीनता में तुझे सौंप देने का निश्चय कभी नहीं कर सकता।
हे पापियो, आप में से (इस भवन में) कितनों ने यह बहाना बनाया है, “मेरा हृदय इतना कठोर है कि मैं पश्चाताप नहीं कर सकता। मैं परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकता और उसकी सेवा नहीं कर सकता!” जाइए, इसे लिख डालिए; सारे विश्व में इसका प्रचार कर दीजिए—इस बात पर घमण्ड कीजिए कि आप इतने कठोर-हृदय हैं कि परमेश्वर का कोई भी दावा आपको कभी हिला नहीं सकता। मुझे ऐसा लगता है कि यदि आप ऐसा बहाना प्रस्तुत करें, तो आप आधी बात भी न कह पाएँगे कि सारा विश्व आपको फुफकारकर अपने सामने से निकाल देगा और इन आकाशों के सामने से आपको खदेड़ देगा, यहाँ तक कि आप चिल्ला उठेंगे कि कोई चट्टानें या पहाड़ आपको उनकी झुलसा देनेवाली फटकारों से छिपा लें! उनके क्रोध का स्वर उठकर दस हज़ार बवण्डरों की गर्जना के समान स्वर्ग के मेहराब में गूँज उठेगा, और आपको अकथनीय घबराहट और लज्जा में डुबो देगा! क्या! क्या आप महान यहोवा का अपमान और तिरस्कार करते हैं? ओह! क्या आप उसी परमेश्वर को दोषी ठहराते हैं जिसने अकथनीय प्रेम से आपकी रखवाली की है—आपकी बीमारी में अपनी कोमल बयार से आपको पंखा झला है—अपनी ही मेज़ पर आपको भोजन कराया है, और आप न तो उसका धन्यवाद करते, न उसके प्रबन्ध करनेवाले हाथ पर ध्यान ही देते?
और फिर जब आपके मसीही मित्रों की सहानुभूति ने आपसे पश्चाताप करने की विनती करते हुए आप पर ज़ोर डाला है, और उन्होंने आपको अपनी प्रार्थनाओं का विशेष विषय बनाया है—जब स्वर्गदूत आप पर रोए हैं, और अदृश्य आत्माओं ने नरक की ओर जानेवाले आपके मार्ग में अपनी चेतावनी का शब्द उठाया है—तब आप अपना पीतल जैसा निर्लज्ज मुँह यहोवा की ओर उठाते हैं, और उससे कहते हैं कि आपका हृदय इतना कठोर है कि आप पश्चाताप नहीं कर सकते, और आपको इसकी कोई परवाह नहीं कि आप कभी पश्चाताप करें या न करें! आप एक भाला उठाकर उस क्रूस पर चढ़ाए हुए के हृदय में भोंक देते हैं, और फिर चिल्लाते हैं, “मुझे दुःख नहीं हो सकता, मुझे तो बिलकुल नहीं; मेरा हृदय पत्थर के समान कठोर है! मुझे कोई परवाह नहीं, और मैं पश्चाताप नहीं करूँगा।” हे पापी, यदि आपका बहाना यही है, तो आप कितने अभागे दुष्ट हैं!
परन्तु आपके बहाने का सार क्या है? केवल यह—कि आपका मन बुराई करने पर पूरी तरह लगा हुआ है।
पवित्र लेखक ने आपकी दशा को अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रगट किया है, “बुरे काम के दण्ड की आज्ञा फुर्ती से नहीं दी जाती; इस कारण मनुष्यों का मन बुरा काम करने की इच्छा से भरा रहता है।” आप ठीक इसी दुस्साहसी, निन्दापूर्ण मुद्रा में प्रभु के सामने खड़े हैं, और आपका मन बुराई करने पर पूरी तरह लगा हुआ है।
10. इसी बहाने का एक और रूप यह है, मेरा हृदय इतना दुष्ट है कि मैं नहीं कर सकता। कुछ लोग हृदय की इस दुष्टता को खुलकर मान लेने में संकोच नहीं करते। इससे उनका क्या अर्थ है? क्या उनका अर्थ यह है कि वे पाप में इतने कठोर हो गए हैं, और इतने अत्यन्त दुष्ट हैं, कि वे झुकेंगे नहीं? उनकी भाषा का यही एकमात्र उचित अर्थ है, और यही ठीक-ठीक सत्य है।
हे पापी, क्योंकि आप इसे अपने बहाने के रूप में आगे रखते हैं, इसलिए आपका उद्देश्य हृदय की इस दुष्टता का दोष परमेश्वर पर मढ़ना ही होगा। शायद छिपे ढंग से, परन्तु वास्तव में, आप यह संकेत करते हैं कि उस दुष्ट हृदय को रचने में परमेश्वर का हाथ है! बात यही है, और पूरी बात बस यही है। यदि इसमें यह मौन संकेत न होता कि आपके दुष्ट हृदय के लिए परमेश्वर दोषी है, तो इस बहाने में आपकी कोई रुचि न होती, और यह कभी आपके होठों से न निकलता। यह केवल अयोग्यता का बहाना है, जो अपनी जुड़वाँ बहन, अर्थात् मूल पाप, के साथ जुड़ा हुआ है—वह मूल पाप जो सृष्टिकर्ता की ज़िम्मेदारी के अधीन, मानव जाति के सृजे हुए लहू और नसों में उतरता चला आया है।
11. एक और मिलता-जुलता बहाना यह है, मेरा हृदय इतना धोखेबाज़ है। मान लीजिए कोई मनुष्य अपने पड़ोसी को धोखा देने के लिए यह बहाना बनाए, “मैं आपको ठगे बिना नहीं रह सकता। मैं आपसे झूठ बोले बिना और आपके साथ दुर्व्यवहार किए बिना नहीं रह सकता; मेरा हृदय इतना धोखेबाज़ है!” क्या कोई भी समझदार मनुष्य कभी यह सोचेगा कि यह गलत काम करने के लिए कोई सफ़ाई या बहाना हो सकता है? कभी नहीं। निस्सन्देह, जब तक पापी इस बहाने के द्वारा अपना ही अपराध प्रगट करने और स्वयं को दोषी ठहराने का अर्थ न रखता हो, तब तक वह इसे किसी न किसी प्रकार के औचित्य के रूप में ही प्रस्तुत करता होगा; और यदि ऐसा है, तो वह उसी हद तक दोष परमेश्वर पर डालता होगा। और सामान्यतः उसका आशय यही होता है। उसका अर्थ सच्चे मन से अपना अपराध मान लेना नहीं होता; नहीं, वह अपने धोखेबाज़ हृदय का दोष परमेश्वर पर मढ़ता है।
12. कोई और यह बहाना बनाकर अपने आपको निर्दोष ठहराता है, मैंने मसीही बनने का प्रयास किया है। जो कुछ मैं कर सकता हूँ, वह सब मैंने किया है; मैंने बार-बार, सच्चे मन से, और लम्बे समय तक प्रयास किया है।
तो आप कहते हैं कि आपने मसीही बनने का प्रयास किया है; मसीही होना क्या है? अपना हृदय परमेश्वर को दे देना। और अपना हृदय परमेश्वर को देना क्या है? अपनी इच्छा-शक्ति की सामर्थों को उसके प्रति समर्पित कर देना; अपने लिए जीना छोड़कर परमेश्वर के लिए जीना। यही मसीही होना है—वही अवस्था जिसे पाने का आप प्रयास करते रहने का दावा करते हैं।
इससे अधिक आम कोई बहाना नहीं है। और मसीही बनने के इस प्रयास में उचित रूप से क्या निहित है? इसमें सदा यह निहित होता है कि आप अपना कर्तव्य करने को तैयार हैं; कि हृदय, अर्थात् इच्छा, पहले से ही ठीक है; और यह प्रयास केवल [मूल स्कैन का अपठनीय अंश] ऐसे परमेश्वर को! क्यों न आप उस मनुष्य के साथ यह कहें जिसने स्वप्न देखा कि वह नरक में जाने ही वाला है, और जब वह अपने भाई से विदा ले रहा था—जो, उसके स्वप्न के अनुसार, स्वर्ग जा रहा था—तो उसने कहा, “मैं नरक में जा रहा हूँ, परन्तु मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी ओर से परमेश्वर से कहना कि मैं उसकी उन दस हज़ार दयाओं के लिए उसका अत्यन्त आभारी हूँ जिनके मैं कभी योग्य न था;
उसने मेरे साथ कभी तनिक भी अन्याय नहीं किया; उसने मेरे साथ जो सारी अनर्जित भलाई की है, उसके लिए उसे मेरा धन्यवाद देना।” इसी क्षण उसकी नींद खुल गई, और उसने पाया कि वह स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता के प्रति पश्चाताप और कृतज्ञता के आँसुओं में भीगा हुआ है। ओह, यदि मनुष्य केवल उतनी ही समझदारी से काम करें जितनी समझदारी से उस मनुष्य ने स्वप्न देखा, तो यह उत्तम होगा—यह उचित होगा। यदि, जब वे यह समझ लें कि उन्होंने पाप करते-करते अनुग्रह का दिन गँवा दिया है, तब वे कहें, “मैं जानता हूँ कि परमेश्वर भला है—मैं कम से कम उसे अपना धन्यवाद तो भेज दूँ—उसने मेरे साथ कोई अन्याय नहीं किया।” यदि वे यह मार्ग अपनाएँ, तो कम से कम उन्हें यह सन्तोष तो मिल सकता है कि उनकी परिस्थितियों में यह एक उचित और योग्य मार्ग है।
हे पापी, क्या आप ऐसा करेंगे?
14. कोई और, जब उस पर ज़ोर डाला जाता है, तो कहता है, “मैंने अपना हृदय मसीह को देने की पेशकश की है, परन्तु वह मुझे ग्रहण नहीं करता। मेरे पास कोई प्रमाण नहीं कि वह मुझे ग्रहण करता है या कभी करेगा।” पिछली जिज्ञासुओं की सभा में एक युवती ने मुझसे कहा कि उसने अपना हृदय प्रभु को देने की पेशकश की थी, परन्तु उसने उसे ग्रहण नहीं किया। यह सीधे-सीधे मसीह पर झूठ का दोष लगाना था, क्योंकि उसने कहा है, “जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।” आप कहते हैं, मैं आया और मैंने अपने आपको अर्पित किया, और उसने मुझे ग्रहण नहीं किया। यीशु मसीह कहता है, “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई”—किसी विशेष व्यक्ति की, किसी कृपापात्र की बात नहीं—परन्तु यदि कोई “मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आऊँगा।” और फिर भी जब आपने उसे अपना हृदय अर्पित किया, तो क्या उसने आपको ठुकराकर दूर कर दिया?
क्या उसने कहा—दूर हो, हे पापी, चला जा? नहीं, हे पापी, उसने ऐसा कभी नहीं किया, कभी नहीं। उसने कहा है कि वह ऐसा कभी नहीं करेगा। उसके अपने शब्द ये हैं, “जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।”
“जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।” परन्तु आप कहते हैं, मैंने ढूँढ़ा और मैंने नहीं पाया। क्या आप यह सिद्ध करना चाहते हैं कि यीशु मसीह झूठा है? क्या आपने उसके मुँह पर ही उस पर यह दोष लगाया है? क्या आप यह गम्भीर घोषणा करते हैं, “हे प्रभु, मैंने सचमुच ढूँढ़ा—मैंने अपने आपको तेरे फाटक पर डाल दिया और खटखटाया—परन्तु सब व्यर्थ रहा?” और क्या आप अपने इस बहाने को यीशु मसीह के विरुद्ध और परमेश्वर के विरुद्ध झूठ का एक गम्भीर आरोप बनाकर प्रस्तुत करना चाहते हैं? इसका निपटारा होने से पहले यह आपके लिए एक गम्भीर मामला बन जाएगा।
15. परन्तु कोई और कहता है, “मेरे लिए कोई उद्धार नहीं है।” क्या आपका अर्थ यह है कि मसीह ने आपके लिए कोई प्रायश्चित नहीं किया? परन्तु वह तो कहता है कि उसने हर एक मनुष्य के लिए मृत्यु का स्वाद चखा। यह घोषित किया गया है कि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह अनन्त जीवन पाए। और अब क्या आप यह दृढ़ता से कहते हैं कि आपके लिए कोई उद्धार तैयार नहीं किया गया और आपके लिए उद्धार सम्भव नहीं? क्या आप नरक तक सारे मार्ग इसलिए विलाप करते हुए जा रहे हैं कि आप किसी भी प्रकार उद्धार नहीं पा सकते? जब उद्धार का कटोरा आपके होठों से लगाया जाता है, तो क्या आप यह कहते हुए उसे झटककर फेंक देते हैं कि वह मेरे लिए नहीं हो सकता? और क्या आप यह जानते हैं? क्या आप इसे स्वयं परमेश्वर के वचन के विरुद्ध भी
सिद्ध कर सकते हैं? तो यदि परमेश्वर की इस पाँवों की चौकी पर ऐसा कोई पापी हो, तो वह आगे आकर खड़ा हो—यदि आपके पास परमेश्वर के विरुद्ध ऐसा कोई आरोप है, और यदि आप उसे सच सिद्ध कर सकते हैं, तो उसे खुलकर कहिए। आह, क्या कोई आशा नहीं? बिलकुल भी नहीं? ओह, कठिनाई यह नहीं है कि आपके लिए कोई उद्धार तैयार नहीं किया गया और आपको दिया नहीं जा रहा, परन्तु यह है कि आपका मन उसे चाहता ही नहीं। “बुद्धि मोल लेने के लिये मूर्ख अपने हाथ में दाम क्यों लिए है? वह उसे चाहता ही नहीं।”
16. परन्तु शायद आप बहाने के रूप में कहते हैं, “मैं अपना हृदय स्वयं नहीं बदल सकता।” नहीं बदल सकते? मान लीजिए आदम ने यही बहाना बनाया होता जब परमेश्वर ने उसके पहले पाप के बाद उसे पश्चाताप करने के लिए बुलाया। प्रभु ने उससे कहा, “अपना मन नया और अपनी आत्मा ठीक बना लो।” आदम उत्तर देता है, “मैं अपना हृदय स्वयं नहीं बदल सकता।” सचमुच? उसका सृष्टिकर्ता उत्तर देता है, तुमने अपना हृदय स्वयं बदले कितना समय हुआ है? कुछ ही घण्टे पहले तुमने इसे पवित्रता से पाप की ओर बदल डाला, और क्या तुम अपने सृष्टिकर्ता से कहोगे कि तुम इसे पाप से पवित्रता की ओर नहीं बदल सकते?
पापी को यह विचार करना चाहिए कि हृदय का परिवर्तन एक स्वैच्छिक बात है। आपको इसे स्वयं करना होगा, नहीं तो यह कभी नहीं होगा। यह सच है कि एक अर्थ में परमेश्वर हृदय को बदलता है, परन्तु वह अर्थ केवल यह है: परमेश्वर पापी को बदलने के लिए प्रेरित करता है, और फिर पापी उसे बदलता है। यह परिवर्तन पापी का अपना स्वैच्छिक कार्य है।
17. फिर आप कहते हैं कि अधिक पाप-बोध के बिना आप अपना हृदय नहीं बदल सकते। क्या इससे आपका अर्थ यह है कि आपको अपने कर्तव्य और अपने पाप का पर्याप्त ज्ञान नहीं है? आप यह नहीं कह सकते। आप अपने पाप और अपने कर्तव्य को जानते हैं। आप जानते हैं कि आपको अपने आपको परमेश्वर को समर्पित कर देना चाहिए। तो फिर आपका अर्थ क्या है? क्या आप वह नहीं कर सकते जो आप जानते हैं कि आपको करना चाहिए? आह, यही तो वह पुराना झूठ है—झूठ का वह निर्लज्ज शरणस्थान—अयोग्यता का वही घिनौना सिद्धान्त। इसके इस नए रूप में क्या निहित है? यह—कि परमेश्वर आपको इतना पाप-बोध देने को तैयार नहीं है कि आपके लिए पश्चाताप करना सम्भव हो सके। परमेश्वर के लिए एक काम और एक ज़िम्मेदारी है, और वह अपना काम नहीं करेगा—अपनी ज़िम्मेदारी नहीं उठाएगा। इसलिए, हाय, आपके पास नरक में उतर जाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है। और वह इसलिए कि परमेश्वर आपके उद्धार के लिए अपना भाग नहीं करेगा! हे पापी, क्या आप सचमुच इस पर विश्वास करते हैं?
18. फिर आप बहाने के रूप में कहते हैं कि पहले आपको आत्मा का और अधिक भाग मिलना चाहिए। और फिर भी आप प्रतिदिन आत्मा का विरोध करते हैं। परमेश्वर आपको अपना आत्मा देने की पेशकश करता है, नहीं, इससे भी बढ़कर, परमेश्वर अपना आत्मा आपको प्रदान करता है, परन्तु आप उसका विरोध करते हैं। तो फिर जब आप आत्मा के और अधिक प्रभाव की चाह का दिखावा करते हैं, तो आपका अर्थ क्या है?
सच्चाई यह है कि आप उसे नहीं चाहते—आप केवल यह दिखाना चाहते हैं कि परमेश्वर पश्चाताप करने में आपकी सहायता करने के लिए अपना भाग नहीं करता, और क्योंकि आप उसकी सहायता के बिना पश्चाताप नहीं कर सकते, इसलिए आपके पश्चाताप न करने का दोष परमेश्वर पर है। यह झूठ का केवल एक और शरणस्थान है—परमेश्वर पर लगाई गई पुरानी निन्दा का एक और रूप—कि उसने मुझे अयोग्य बनाया है और मेरी अयोग्यता से बाहर निकलने में मेरी सहायता नहीं करेगा।
19. पापी यह कहकर भी अपने आपको निर्दोष ठहराता है—परमेश्वर को मेरा हृदय बदलना होगा। परन्तु जिस अर्थ में परमेश्वर आपसे यह करने की माँग करता है, उस अर्थ में वह इसे स्वयं नहीं कर सकता। परमेश्वर के विषय में हृदय बदलने की बात केवल इस अर्थ में कही जाती है कि वह आपको इसे करने के लिए मना लेता है। जैसे किसी मनुष्य के राजनीतिक विचार बदलने के विषय में कोई कह सकता है, “अमुक व्यक्ति ने मेरा मन बदल दिया—वह मुझे अपनी ओर ले आया,” जिसका अर्थ किसी भी प्रकार यह नहीं है कि आपने अपना मन स्वयं नहीं बदला। सीधा अर्थ यह है कि उसने आपको मनाया, और आप मान गए।
परन्तु पापी द्वारा अपने बहाने के रूप में प्रस्तुत किए गए इस तर्क में यह निहित है कि पापी के धार्मिक बन सकने से पहले परमेश्वर को कुछ और करना बाकी है। मैंने धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत से लोगों को यही पक्ष लेते सुना है। हाँ, हज़ारों मसीही पादरियों ने भी पापी से कहा है,
“परमेश्वर की बाट जोहो। वह अपने ही उत्तम समय में तुम्हारा हृदय बदलेगा; तुम इसे स्वयं नहीं कर सकते, और तुम बस इतना ही कर सकते हो कि अपने आपको ऐसे मार्ग में रखो जहाँ प्रभु तुम्हारा हृदय बदल सके। जब वह समय आएगा, तब वह तुम्हें नया हृदय दे देगा, शायद जब तुम सो रहे हो, अचेत अवस्था में। परमेश्वर इस विषय में एक सम्प्रभु के रूप में कार्य करता है, और अपना काम अपने ही ढंग से करता है।”
वे ऐसा ही सिखाते हैं—पापी के मुँह को बहानों से भरते हुए और उसके विवेक पर परमेश्वर के वास्तविक दावों के विरुद्ध उसके हृदय को हीरे के समान कठोर बनाते हुए।
20. पापी फिर यह बहाना बनाता है, “यदि मैं मसीही बन भी जाऊँ तो मैं मसीही जीवन नहीं जी सकता।
जब मैं इतने लोगों को असफल होते देखता हूँ, तो मेरा यह आशा करना अनुचित है कि मैं सफल हो जाऊँगा।” मुझे एक मनुष्य की बात याद है जिसने कहा था, “मेरे लिए पश्चाताप करने और मसीही बनने का कोई लाभ नहीं, क्योंकि मेरा यह आशा करना पूरी तरह तर्कहीन है कि मैं उन लोगों से अच्छा करूँगा जो मुझसे पहले हो चुके हैं।” इसी प्रकार जो पापी
यह बहाना बनाते हैं, वे बड़ी नम्रता से आगे आकर परमेश्वर से कहते हैं, “मैं बहुत दीन हूँ; हे प्रभु, तू देखता है कि मैं अपने विषय में बहुत छोटी राय रखता हूँ; मैं तेरे सम्मान के लिए इतना उत्साही हूँ, और इतना डरता हूँ कि कहीं मैं तेरे कार्य पर कलंक न ले आऊँ; मेरे लिए मसीही बनने की बात सोचना भी बिलकुल उचित नहीं जान पड़ता, मुझे तेरे नाम का अनादर करने से इतना भय लगता है।”
हाँ; तो फिर क्या? “इसलिए, मैं पाप करता रहूँगा और धन्य सुसमाचार को अपने पैरों तले रौंदूँगा। हे मेरे परमेश्वर, मैं तुझे सताऊँगा और तेरे कार्य के विरुद्ध युद्ध करूँगा, क्योंकि धर्म का अंगीकार करके फिर अपने अंगीकार को कलंकित करने से कहीं अच्छा यह है कि धर्म का अंगीकार ही न किया जाए।” कैसा तर्क है! पापी के बहानों की मूर्खता का यह एक अच्छा नमूना है।
यह बहाना यह मानकर चलता है कि आत्मा को मसीही जीवन में सँभाले रखने के लिए पर्याप्त अनुग्रह का प्रबन्ध नहीं किया गया और वह दिया नहीं जा रहा। सिद्धान्त यह है कि यह आशा करना तर्कहीन है कि हम इस जीवन में मिलनेवाले किसी भी अनुग्रह के द्वारा परमेश्वर की व्यवस्था का पूर्ण रूप से पालन कर सकते हैं। परमेश्वर की ओर से पर्याप्त अनुग्रह और सहायता दी ही नहीं जाती! और यह बाइबल का धर्मविज्ञान कहकर सिखाया जाता है! ऐसी शिक्षा को उसी अधोलोक के गड्ढे में लौटा दो जहाँ से वह आई है!
क्या! क्या परमेश्वर इतना निर्बल है कि वह उस आत्मा को सँभाल नहीं सकता जो अपने आपको उस पर डाल देती है? या क्या वह अपनी अनुग्रहपूर्ण सहायता देने में इतना कंजूस है कि यह आशा करनी पड़े कि वह अपने आश्रित और उस पर निर्भर रहनेवाले बच्चे की आवश्यकताओं को पूरा करने में सदा कम ही पड़ेगी? आप तो ऐसा ही मानते जान पड़ते हैं। प्रभु को मनाकर उससे अनुग्रह का एक कण भी पाना इतना कठिन! सम्मान के साथ मसीही जीवन जीने के लिए पर्याप्त अनुग्रह मिल ही नहीं सकता! यह परमेश्वर पर पर्याप्त अनुग्रह रोक रखने का दोष लगाने के सिवा और क्या है?
परन्तु यहोवा का वचन और उसकी शपथ क्या कहते हैं? हम पढ़ते हैं कि “जब परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ़ रीति से प्रगट करना चाहा कि उसका उद्देश्य बदल नहीं सकता, तो शपथ को बीच में लाया। ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्वर का झूठा ठहरना अनहोना है, हमारा दृढ़ता से ढाढ़स बन्ध जाए, जो शरण लेने को इसलिये दौड़े हैं कि उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त करें।”
परन्तु आप कहते हैं, “यदि मैं भागकर इस आशा को पकड़ भी लूँ, तो भी अनुग्रह की कमी के कारण मैं असफल हो जाऊँगा।
जो झूठ नहीं बोल सकता, उसके वचन पर भरोसा रखने में मुझे कोई ‘ढाढ़स’ नहीं मिल सकता। अपरिवर्तनीय परमेश्वर की शपथ मेरे लिए कभी पर्याप्त नहीं हो सकती।”
इस प्रकार आप परमेश्वर के वचन को झुठलाते हैं, और अपने पश्चाताप न करने के लिए एक अत्यन्त खोखली और दोषपूर्ण सफ़ाई गढ़ लेते हैं।
21. एक और बहाना यह दावा करता है कि यह एक बहुत ही अंधकारपूर्ण, रहस्यमय विषय है। विश्वास और नए जन्म का यह विषय—मैं इसे समझ नहीं सकता।
हे पापी, क्या आप कभी यह आपत्ति लेकर प्रभु के सामने गए हैं, और क्या आपने कहा है, “हे प्रभु, तू ने मुझसे ऐसे काम करने की माँग की है जिन्हें मैं समझ नहीं सकता?” आप जानते हैं कि आप यह भली-भाँति समझ सकते हैं कि आप पापी हैं—कि मसीह आपके लिए मरा—कि आपको उस पर विश्वास करना है और पश्चाताप के द्वारा अपने पापों को छोड़ देना है। यह सब इतना स्पष्ट है कि “बटोही चाहे मूर्ख भी हो, तौभी उसमें न भटकेगा।” इसलिए आपका बहाना जितना घिनौना है, उतना ही झूठा भी है। यह परमेश्वर पर एक नीच निन्दा के सिवा और कुछ नहीं!
22. परन्तु आप कहते हैं, “मैं विश्वास नहीं कर सकता।” आपका अर्थ (है न?) यह है कि जैसे आप किसी साथी मनुष्य पर विश्वास कर सकते हैं, वैसे आप असीम सच्चाईवाले परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते? क्या आप यह संकेत करना चाहते हैं कि परमेश्वर आपसे ऐसी बातों पर विश्वास करने को कहता है जो वास्तव में अविश्वसनीय हैं—ऐसी बातें जो तर्क के लिए इतनी घृणित हैं कि आप उन्हें किसी भी गवाही के आधार पर स्वीकार नहीं कर सकते, चाहे वह गवाही स्वयं परमेश्वर ही क्यों न प्रस्तुत करे?
और क्या आप परमेश्वर के विरुद्ध यह मुकद्दमा सिद्ध कर लेने की आशा रखते हैं? क्या आप स्वयं इसकी पहली बात पर भी विश्वास करते हैं?
परन्तु आप फिर ज़ोर देकर कहते हैं कि आप इन बातों को अनुभव नहीं कर सकते। आप इन बातों को सच जानते हैं, परन्तु आप उन्हें अनुभव नहीं कर सकते—आप यह अनुभव नहीं कर सकते कि बाइबल सच है—कि परमेश्वर सचमुच क्षमा करने की पेशकश करता है—कि उद्धार वास्तव में तैयार किया गया है और आपकी पहुँच में रखा गया है। आपके जैसे मामले के लिए क्या सहायता हो सकती है? कौन-सी बात इन सच्चाइयों को और अधिक निश्चित बना सकती है? परन्तु आपके अपने ही कथन के अनुसार, आपको और अधिक प्रमाण नहीं चाहिए। तो फिर आप जाने हुए सत्य के अनुसार काम क्यों नहीं करते? आप और क्या माँग सकते हैं?
क्या आप कभी अपना मामला परमेश्वर के सामने ले जाकर कहते हैं, “हे प्रभु, तू कहता है कि मसीह मेरे लिए मरा, परन्तु मैं यह अनुभव नहीं कर सकता कि ऐसा ही है; और इसलिए, हे प्रभु, मैं किसी भी प्रकार उसे अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण नहीं कर सकता?” क्या यह एक तर्कसंगत बहाना होगा?
परन्तु आप यह बहाना भी बनाते हैं कि आप पश्चाताप नहीं कर सकते। आपको इस बात का दुःख नहीं हो सकता कि आपने परमेश्वर का तिरस्कार किया है। आप अभी सब पापों से नाता तोड़ लेने का निश्चय नहीं कर सकते। यदि यह सचमुच ऐसा ही है, तो आप परमेश्वर की आज्ञा मानने का निश्चय नहीं कर सकते, और तब आप नरक जाने का ही निश्चय कर लें तो अच्छा है!
कोई दूसरा विकल्प नहीं है!
परन्तु जो भी हो, आप अभी मसीही नहीं बन सकते। आपका इरादा है कि किसी न किसी समय आपका मन-परिवर्तन हो जाए, परन्तु आप अभी इसका निश्चय नहीं कर सकते। अच्छा, परमेश्वर इसकी माँग अभी करता है, और निस्सन्देह आपको या तो झुकना होगा या उसके परिणाम भुगतने होंगे।
परन्तु क्या आप कहते हैं, आप अभी नहीं कर सकते? तब तो इसकी माँग करने के लिए परमेश्वर बहुत दोषी है। परन्तु यदि सच्चाई यह है कि आप कर सकते हैं, तो झूठ आपकी ओर है, और वह आपके सृष्टिकर्ता के विरुद्ध एक अत्यन्त लज्जाजनक और अपमानजनक झूठ है।
III. पाप के लिए सब बहाने अन्याय के ऊपर अपमान भी जोड़ देते हैं।
III. पाप के लिए सब बहाने अन्याय के ऊपर अपमान भी जोड़ देते हैं।
1. ऐसा बहाना जो न्यायालय या व्यवस्था देनेवाले पर हानिकारक आक्षेप करता है, मूल अपराध को और भी गम्भीर बना देता है। सब न्यायालयों में इसे सदा ऐसा ही माना जाता है। पापी और उसके असीम व्यवस्था देनेवाले और न्यायी के बीच तो यह और भी अधिक विशेष रूप से ऐसा ही होना चाहिए।
2. अपने आपको निर्दोष ठहराने के लिए प्रस्तुत किए गए किसी भी बहाने के विषय में भी यही सत्य है। यदि वह झूठा हो, तो उसे लगाए गए अपराध को और भी गम्भीर बनानेवाला माना जाता है। ऐसा मामला कभी-कभी होता है, और जब भी होता है, तो माना जाता है कि यह नया अपमान और नया अन्याय जोड़ देता है। किसी अपराधी का आकर न्यायालय के अभिलेखों पर अपना झूठ फैला देना—उस बात की घोषणा करना जिसे वह जानता है कि वह झूठी है; इससे बढ़कर कोई भी बात उसके मामले को इतना भयानक रूप से बिगाड़ नहीं सकती।
दूसरी ओर, जब न्यायालय के सामने कोई मनुष्य ईमानदार दिखाई देता है, और अपना अपराध मान लेता है, तो न्यायाधीश, यदि उस मामले में उसे कुछ विवेकाधिकार है, उसकी सज़ा को यथासम्भव न्यूनतम स्तर तक घटा देता है। परन्तु यदि अपराधी टालमटोल का सहारा लेता है—यदि वह गोलमोल बातें करता है और झूठ बोलता है, तो आप देखेंगे कि व्यवस्था की बलवन्त भुजा उस पर टूट पड़ती है। न्यायाधीश न्याय के प्रताप और आतंक की पूरी गर्जनाओं के साथ सामने आता है, और अनुभव करता है कि वह अपने उस शिकार को छोड़ नहीं सकता। क्यों?
उस मनुष्य ने न्याय के न्यायालय के ही सामने झूठ बोला है। वह मनुष्य सारी व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हो जाता है, और उसे दबाया ही जाना चाहिए, नहीं तो व्यवस्था स्वयं गिर जाती है।
3. पापी का परमेश्वर का तिरस्कार करना, और फिर उसके लिए अपने आपको निर्दोष ठहराने का बहाना बनाना, सचमुच घृणित है। आह, यह तो दोषियों का वही पुराना ढंग है। जब आदम और हव्वा ने वाटिका में प्रभु का शब्द पास आते सुना, तो वे भागकर छिप गए। और उन्होंने क्या किया था? प्रभु उन्हें बाहर बुलाता है और उनकी जाँच करने लगता है: “आदम, तू ने क्या किया है? क्या तू ने वाटिका के बीच के उस वर्जित वृक्ष का फल खाया है?” आदम काँप उठा, परन्तु एक बहाने की शरण में भागा: “जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया।” वह कहता है कि परमेश्वर ने ही उसे उसका परखनेवाला दिया। उसके बहाने के अनुसार, इस पूरे मामले में मुख्य दोष परमेश्वर का था।
इसके बाद वह स्त्री की ओर मुड़ता है: “तू ने यह क्या किया है?” उसके पास भी एक बहाना है:
“सर्प ने मुझे बहका दिया, तब मैं ने खाया।” आह, दोष को बार-बार घुमाकर परमेश्वर पर डाल देने का यह निरन्तर खेल! आदम का अनुकरण करनेवालों की लम्बी पंक्ति में यह आज तक चलता आया है। छः हज़ार वर्षों से परमेश्वर यह सुनता आ रहा है, और फिर भी संसार को छोड़ा गया है, और परमेश्वर का प्रतिशोध अब तक फूटकर उसकी निन्दा करनेवाले सब दोषियों को नरक में नहीं पटक चुका है! ओह! परमेश्वर में कैसा धीरज है! और इस भवन के पापियों से बढ़कर किसने कभी उसके धीरज का दुरुपयोग किया है और अपने बहानों से उसका अपमान किया है?
टिप्पणियाँ — 1. सुसमाचार के प्रकाश के अधीन रहनेवाला कोई भी पापी, किसी न किसी बहाने के बिना, चाहे वह मौन हो या खुलकर कहा गया, जिसके द्वारा वह अपने आपको निर्दोष ठहराता है, एक घण्टा भी पाप में नहीं जीता। ऐसा जान पड़ता है कि मनुष्य के बुद्धिमान स्वभाव का यह एक नियम है कि जब उस पर गलत काम का आरोप लगाया जाता है, चाहे उसके विवेक के द्वारा या किसी और के द्वारा, तो उसे या तो अपना दोष मानना होता है या अपने आपको उचित ठहराना होता है। पश्चाताप न करनेवाले सब पापी दूसरा मार्ग अपनाते हैं। इसीलिए उन्हें बहानों की इतनी आवश्यकता पड़ती है, और इसीलिए उन्हें उनकी इतनी अधिक विविधता रखना सुविधाजनक लगता है। यह उल्लेखनीय है कि वे कितनी सरलता से एक बहाने से दूसरे की ओर भाग जाते हैं, मानो झूठ के ये शरणस्थान जो बल में कम हैं, उसे गिनती से पूरा कर देंगे। यह जानते हुए भी कि इस पूरी भीड़ में से एक भी बहाना सत्य और न्याय की दृष्टि से मान्य नहीं है, फिर भी जब एक पर उन पर ज़ोर डाला जाता है, तो वे दूसरे की ओर भागते हैं, और जब एक-एक करके सब से खदेड़ दिए जाते हैं, तो वे लौटकर फिर उसी भूमि पर दोबारा लड़ने को तैयार रहते हैं। सब बहानों को त्याग देना और इस दीन करनेवाले सत्य को मान लेना कि वे स्वयं पूरी तरह गलत हैं और परमेश्वर पूरी तरह सही है, उनके लिए इतना कठिन है।
इसलिए सुसमाचार के सेवक का यह बड़ा काम हो जाता है कि वह पापी के बहानों को खोज निकाले और उन्हें उजागर करे; चारों ओर घूम-घूमकर, यदि सम्भव हो, पापी के झूठ के शरणस्थानों को ढा दे, और उसके हृदय को सत्य के बाणों के सामने खोल दे।
2. बहाने पश्चाताप को असम्भव बना देते हैं। क्योंकि बहाने अपने आपको उचित ठहराना हैं; और कौन नहीं जानता कि अपने आपको उचित ठहराना अंगीकार और पश्चाताप का ठीक उलटा है? इसलिए बहानों को खोजना और अपनाना, अपने आपको पश्चाताप से यथासम्भव सबसे अधिक दूरी पर रख देना है।
निस्सन्देह, अपने आपको निर्दोष ठहरानेवाला पापी परमेश्वर के लिए उसे क्षमा करना असम्भव बना देता है। वह परमेश्वर को अपने प्रति ऐसी स्थिति में रख देता है, और, मैं कह सकता हूँ, अपने आपको परमेश्वर के शासन के प्रति ऐसी मुद्रा में रख देता है, कि उसकी क्षमा परमेश्वर के सिंहासन ही का विनाश होगी। यदि परमेश्वर किसी पापी को उस समय क्षमा कर दे जब वह अपने बहानों के द्वारा अपने आपको निर्दोष और अपने सृष्टिकर्ता को दोषी ठहरा रहा हो, तो स्वर्ग क्या कहेगा, और नरक भी, और इनके अलावा पृथ्वी भी?
3. पापियों को अपने सब बहाने एक साथ परमेश्वर के सामने रख देने चाहिए। निश्चय ही यह अत्यन्त उचित है।
क्यों नहीं? यदि कोई मनुष्य मेरा कर्ज़दार हो, और समझता हो कि कर्ज़ न चुकाने के लिए उसके पास एक उचित बहाना है, तो उसे मेरे पास आकर पूरा मामला मुझे समझा देना चाहिए। शायद वह मुझे सन्तुष्ट कर दे कि उसके विचार सही हैं।
अब, हे पापी, क्या आपने परमेश्वर के सम्बन्ध में कभी ऐसा किया है? क्या आपने कभी एक भी बहाना प्रभु के सामने लाकर कहा है, “तू मुझसे पवित्र होने की माँग करता है, परन्तु मैं पवित्र नहीं हो सकता; हे प्रभु, तेरी आज्ञा न मानने के लिए मेरे पास एक अच्छा बहाना है?” नहीं, हे पापी; आपको ऐसा करने की आदत नहीं है—सम्भवतः अपने पूरे जीवन में आपने अब तक पहली बार भी ऐसा नहीं किया है। सच तो यह है कि अपने बहानों को परमेश्वर के सामने ले जाने के लिए आपके पास कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं है, क्योंकि आपके पास अब तक एक भी ऐसा बहाना नहीं है जिसे आप स्वयं झूठ के शरणस्थान का काम देने के सिवा किसी और काम का समझते हों।
आपके बहाने आपकी अपनी बुद्धि और विवेक की कसौटी पर ही नहीं टिकते। तो फिर आप कैसे आशा कर सकते हैं कि वे यहोवा की जाँचनेवाली आँख के सामने टिकेंगे? यह तथ्य कि आप अपने बहाने लेकर कभी परमेश्वर के पास नहीं आते, यह दिखाता है कि आपको उन पर कोई भरोसा नहीं है।
4. जिन बहानों को आप अभी परमेश्वर के सामने लाने का साहस नहीं करते, उन पर टिके रहना कितना असीम पागलपन है!
यदि आपके बहाने इतने तुच्छ हैं कि आप इस संसार में उनमें से किसी एक को भी परमेश्वर के सामने लाने की बात गम्भीरता से सोच नहीं सकते, तो न्याय के दिन आप परमेश्वर के सामने कैसे खड़े रह सकेंगे? ओह, हे पापी, वह आनेवाला दिन अब तक देखी हुई किसी भी बात से कहीं अधिक जाँचनेवाला और भयानक होगा। उस बड़े श्वेत सिंहासन के सामने खड़ी पापियों की उस घनी भीड़ को देखिए—जहाँ तक दृष्टि जाती है, वे उमड़ते हुए चले आते हैं—एक अनगिनत भीड़; और अब वे खड़े हैं, और परमेश्वर की भयानक तुरही उन्हें आगे बुलाती है कि वे पाप के लिए अपने बहाने प्रस्तुत करें। अरे पापियो—आप में से कोई भी, या आप सब—आपके पास क्या कहने को है कि आप पर दण्ड की आज्ञा क्यों न सुनाई जाए? वे सब बहाने कहाँ हैं जिन्हें बनाने में आप कभी इतने स्वतन्त्र और निडर थे? वे सब कहाँ हैं? अब आप उन्हें क्यों नहीं बनाते?
सुनिए! परमेश्वर प्रतीक्षा करता है; वह सुनता है; स्वर्ग में सन्नाटा छा जाता है—एकत्रित भीड़ में सर्वत्र—आधे घण्टे तक—ऐसा भयानक सन्नाटा जिसे अनुभव किया जा सके; परन्तु एक भी शब्द नहीं—वहाँ इकट्ठे हुए असंख्य पापियों में से एक भी होंठ नहीं हिलता; और अब वह महान और भयानक न्यायी उठता है और अपनी गर्जनाओं को छोड़ देता है। ओह, देखिए, घोर दण्ड की लहरें उस सागर पर लुढ़कती चली जाती हैं—अपने आप से दोषी ठहरे हुए पापियों के समूहों पर! क्या आपने कभी न्यायालय में न्यायाधीश को किसी अपराधी पर मृत्युदण्ड सुनाने के लिए अपने आसन से उठते देखा है? वहाँ, देखिए, वह बेचारा मनुष्य लड़खड़ाता है—वह औंधे मुँह गिर पड़ता है—उसमें अब कोई शक्ति नहीं रही, क्योंकि मृत्यु उस पर आ पड़ी है और उसकी अन्तिम आशा नष्ट हो गई है!
ओह, हे पापी, जब उस भयानक सिंहासन से वह दण्ड की आज्ञा तुझ पर पड़ेगी! जब आप गड्ढे की ढलानों से नीचे सबसे निचले नरक में गिरते चले जाएँगे, तब आपके बहाने आपके गले में चक्की के पाटों के समान होंगे!
5. पापियों को अपने बहानों की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर एक भी बहाना नहीं माँगता। वह आपसे यह माँग नहीं करता कि आप अपने आपको निर्दोष ठहराएँ—बिलकुल नहीं। यदि आपके उद्धार के लिए आपको उनकी आवश्यकता होती, तो मैं आपसे सहानुभूति रख सकता था, और निश्चय ही जितनी हो सकती, आपकी सहायता करता। परन्तु आपको उनकी आवश्यकता नहीं है। आपका उद्धार इस बात पर निर्भर नहीं है कि आप अपने आपको सफलतापूर्वक निर्दोष सिद्ध कर दें। आपको बहाने ढूँढ़ने के लिए अपना दिमाग खपाने की आवश्यकता नहीं है।
अच्छा यह है कि आप कहें, मुझे वे नहीं चाहिए—मैं उनके योग्य नहीं—मेरे पास एक भी ऐसा बहाना नहीं जिसका मूल्य एक तिनके के बराबर भी हो।
अच्छा यह है कि आप कहें, “मैं दुष्ट हूँ। परमेश्वर जानता है कि यही सत्य है, और मेरा इसे छिपाने का प्रयास करना व्यर्थ होगा। मैं दुष्ट हूँ, और यदि मैं कभी जीवित रहूँ, तो वह केवल दया के सहारे ही होगा!”
मुझे वह वर्ष भली-भाँति याद है जब मैं बहानों के सहारे जीता था, और यह भी कि उन्हें छोड़ने में मुझे कितना समय लगा। मैंने कभी किसी पादरी को इस विषय पर प्रचार करते नहीं सुना था। फिर भी, मैंने अपने अनुभव से यह पाया कि मेरे बहाने और झूठ ही मेरे मन-परिवर्तन के मार्ग की बाधाएँ थे। जैसे ही मैंने इन्हें पूरी तरह छोड़ दिया, मैंने दया के फाटक को पूरा खुला पाया। और हे पापी, आप भी ऐसा ही पाएँगे।
6. पापियों को अपने बहानों पर लज्जित होना चाहिए, और उनसे पश्चाताप करना चाहिए। शायद आपने इसे सदा इतना स्पष्ट नहीं देखा जितना अब देख सकते हैं। अब जो प्रकाश आपके सामने है, उसके रहते आपको सावधान रहना उचित है। ध्यान रखिए कि आप फिर कभी कोई बहाना न बनाएँ, जब तक कि आपका इरादा परमेश्वर का
अत्यन्त भयानक रीति से तिरस्कार करने का न हो। परमेश्वर की दृष्टि में इससे बढ़कर कोई घोर घृणित बात नहीं हो सकती कि कोई पापी ऐसे बहाने बनाए जिन्हें वह जानता है कि वे पूरी तरह झूठे और निन्दापूर्ण हैं।
ओह, आपने परमेश्वर का जो अपमान अब तक किया है, उसके लिए आपको पश्चाताप करना चाहिए—और वह भी अभी, कहीं ऐसा न हो कि आप अपने आपको दया के फाटक से धकेलकर दूर किया हुआ पाएँ।
7. आप अपना दायित्व स्वीकार करते हैं, और इसलिए निस्सन्देह आप बहाने बनाने से वर्जित हैं। क्योंकि यदि आपके पास कोई अच्छा बहाना है, तो आप दायित्व के अधीन नहीं हैं। यदि आप में से किसी के पास परमेश्वर की आज्ञा न मानने का कोई अच्छा बहाना है, तो आप अब उसकी आज्ञा मानने के दायित्व के अधीन नहीं हैं। परन्तु क्योंकि आप दायित्व को स्वीकार करने के लिए विवश हैं, इसलिए आप बहानों को छोड़ने के लिए भी विवश हैं।
8. क्योंकि आप अपना दायित्व स्वीकार करते हैं और आपको उसे स्वीकार करना ही पड़ता है, इसलिए यदि आप फिर भी बहाने बनाते हैं, तो आप परमेश्वर के मुँह पर उसका अपमान करते हैं। आप उस पर असीम अत्याचार का दोष लगाकर उसका अपमान करते हैं।
अब, आप इस उपदेश का क्या उपयोग करने का विचार रखते हैं? क्या आप यह कहने को तैयार हैं, “मैं अब से अपने सब बहानों को छोड़ दूँगा, अभी और सदा के लिए; और परमेश्वर को मेरा पूरा हृदय मिलेगा?”
आप क्या कहते हैं? क्या आप कोई नया बहाना ढूँढ़ निकालने में लग जाएँगे? क्या आप कम से कम यह कहते हैं, “मुझे पहले घर जाने दीजिए—मुझ पर यहीं इसी स्थान पर परमेश्वर के आगे झुकने के लिए ज़ोर मत डालिए—मुझे घर जाने दीजिए और तब मैं झुक जाऊँगा?” क्या आप यही कहते हैं? और क्या आप जानते हैं कि यह क्षण कितना नाज़ुक है—यह बीतती हुई घड़ी कितनी निर्णायक है? स्मरण रखिए, आप पर यह दावा मैं नहीं रख रहा—परन्तु परमेश्वर रख रहा है। परमेश्वर
स्वयं आपको आज—इसी घड़ी—पश्चाताप करने की आज्ञा देता है। आप अपना कर्तव्य जानते हैं—आप जानते हैं कि धर्म क्या है—परमेश्वर को अपना हृदय देना क्या है। और अब मैं अन्तिम प्रश्न पर आता हूँ: क्या आप ऐसा करेंगे? क्या आप अपने सब बहानों को छोड़कर, अपने आप से दोषी ठहरे हुए पापी के रूप में, प्रेम के परमेश्वर के सामने गिर पड़ेंगे, और अपने आपको—अपने हृदय को, और अपने पूरे अस्तित्व को—अब से सदा के लिए उसके आगे सौंप देंगे? क्या आप आएँगे?
