उपदेश 2 (31 में से)

2. परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने के विषय में

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

II. परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने के विषय में।

II. परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने के विषय में।

“मैं परमेश्वर की करुणा पर सदा सर्वदा भरोसा रखूँगा।”—भजन संहिता 52:8।

इस विषय पर विचार करते हुए मैं यह जाँचूँगा कि, I. दया क्या है।

II. प्रभु की दया पर सदा भरोसा रखने में क्या-क्या बातें निहित हैं।

III. उन शर्तों को बताऊँगा जिन पर हम सुरक्षित रूप से परमेश्वर की दया पर भरोसा रख सकते हैं।

IV. उन अनेक भूलों की ओर संकेत करूँगा जो इस विषय में की जाती हैं।

1. परमेश्वर के एक गुण के रूप में दया को केवल भलाई के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए। यह भूल प्रायः की जाती है। यह भूल है, यह आप तुरन्त देख लेंगे यदि आप इस बात पर विचार करें कि दया न्याय के ठीक विपरीत है, जबकि न्याय भलाई का ही एक स्वाभाविक और उचित प्रकटीकरण है। भलाई न्याय के प्रयोग की माँग कर सकती है; वास्तव में वह प्रायः करती भी है; परन्तु यह कहना कि दया न्याय के प्रयोग की माँग करती है, शब्द को बिना अर्थ के प्रयोग करना है। दया यह माँगती है कि न्याय को अलग रख दिया जाए। निस्सन्देह दया और भलाई न्याय के साथ बहुत भिन्न सम्बन्ध रखती हैं, और वे बहुत भिन्न गुण हैं।

2. दया अपराधी को क्षमा करने की प्रवृत्ति है। उसका प्रयोग इसमें है कि जब अपराध के द्वारा व्यवस्था का दण्ड भोगना पड़ गया हो, तब उस दण्ड को रोक दिया जाए और अलग रख दिया जाए। जैसा कहा जा चुका है, वह न्याय के ठीक विपरीत है। न्याय हर एक व्यक्ति के साथ उसकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करता है; दया अपराधी के साथ उससे बिलकुल भिन्न व्यवहार करती है जिसके वह योग्य है। योग्यता कभी भी वह नियम नहीं है जिससे दया संचालित होती है, जबकि न्याय का नियम ठीक यही है।

3. दया का प्रयोग केवल वहीं होता है जहाँ दोष हो। वह सदा दोष को पहले से मानकर चलती है। व्यवस्था का दण्ड पहले ही भोगने योग्य हो चुका होना चाहिए, नहीं तो दया के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता।

4. दया का प्रयोग उससे आगे नहीं हो सकता जितना कोई दण्ड के योग्य है। जब तक दण्ड उचित है तब तक वह अपना प्रयोग जारी रख सकती है, परन्तु उससे अधिक नहीं; जहाँ तक दण्ड-योग्यता जाती है वहाँ तक, परन्तु उससे आगे नहीं। यदि बड़ा दण्ड उचित है, तो बड़ी दया दिखाई जा सकती है; यदि अनन्त दण्ड उचित है, तो असीम दया दिखाए जाने का अवसर है, परन्तु अन्यथा नहीं।

II. मुझे यह दिखाना है कि परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने में क्या-क्या बातें निहित हैं।

II. मुझे यह दिखाना है कि परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने में क्या-क्या बातें निहित हैं।

1. दोष का बोध। किसी के विषय में ठीक से यह नहीं कहा जा सकता कि वह परमेश्वर की दया पर भरोसा रखता है, जब तक उसने अपराध न किए हों और वह इस बात से अवगत न हो। न्याय निर्दोष की रक्षा करता है, और वे अपने बचाव या निवारण के लिए निश्चिन्त होकर उसकी दुहाई दे सकते हैं। परन्तु दोषी के लिए दया पर भरोसा रखने के सिवाय और कुछ नहीं बचता। दया पर भरोसा रखने में सदा व्यक्तिगत दोष का गहरा, हार्दिक बोध निहित होता है।

2. दया पर भरोसा—इसमें सदा यह बात निहित है कि न्याय के आधार पर हमें कोई आशा नहीं है। यदि हमें न्याय से कुछ पाने की आशा होती, तो हम दया की ओर न देखते। मानव हृदय इतना घमण्डी है कि जब तक वह यह समझता है कि न्याय के आधार पर उसका अनुग्रह पर कोई वैध दावा है, तब तक वह अपने आप को दया पर नहीं छोड़ता। इतना ही नहीं, जब हम उचित रूप से न्याय की दुहाई दे सकते हों, तब दया की दुहाई देना न तो परमेश्वर की व्यवस्था माँगती है और न उसका सुसमाचार, और न ही यह यहोवा के शासन के साथ हमारे सम्बन्धों से मेल खा सकता है। वास्तव में, मन के स्वभाव ही के कारण यह बात असम्भव है।

3. दया पर भरोसा रखने में यह बात निहित है कि दया क्या है इसकी ठीक समझ हो। इस बात में बहुत से लोग चूक जाते हैं, क्योंकि वे दया को केवल भलाई के साथ, या अनुग्रह के साथ—जिसे अयोग्य लोगों पर किया गया केवल कृपा का व्यवहार समझा जाता है—गड्डमड्ड कर देते हैं। अनुग्रह वहाँ भी दिखाया जा सकता है जहाँ दया नहीं है, क्योंकि दया शब्द अपराध की क्षमा के लिए प्रयोग किया जाता है। हम सब जानते हैं कि परमेश्वर पृथ्वी के सब दुष्टों पर कृपा, या सामान्य अर्थ में अनुग्रह, दिखाता है। वह बुरों और भलों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है। परन्तु दुष्टों पर, जब तक वे यहाँ परखे जा रहे हैं, दिखाई गई इस सामान्य कृपा पर भरोसा रखना परमेश्वर की दया पर भरोसा रखना नहीं है। जब तक हम सचमुच यह नहीं समझ लेते कि दया क्या है—अर्थात् दोषियों के अपराधों की क्षमा—तब तक हम कभी दया पर भरोसा नहीं रखते।

4. परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने में यह विश्वास निहित है कि वह दयालु है। यदि हमें ऐसा विश्वास न होता तो हम उस पर भरोसा नहीं रख सकते थे। यह विश्वास सदा सच्चे भरोसे की नींव में होना चाहिए। वास्तव में, यह विश्वास इतनी स्वाभाविकता से प्राण के उस बाहर की ओर बढ़ने और परमेश्वर पर टिक जाने को उत्पन्न करता है जिसे हम भरोसा कहते हैं, कि नए नियम के अर्थ में इसमें सामान्यतः दोनों बातें सम्मिलित रहती हैं। विश्वास, या प्रतीति, में प्राण का परमेश्वर को हार्दिक रूप से सौंप देना और उस पर मन से भरोसा रखना सम्मिलित है।

5. “परमेश्वर की दया पर सदा सर्वदा भरोसा रखने” में यह बोध निहित है कि हम अनन्त दण्ड के योग्य हैं। दया की सीमा ठीक उतनी ही है जितनी दण्ड-योग्यता की, और अपने स्वभाव से वह उससे आगे नहीं जा सकती। जितने समय तक हम दण्ड के योग्य हैं उतने समय तक दया के प्रयोग पर निर्भर रहना तर्कसंगत है, परन्तु उससे अधिक नहीं। तीन वर्ष के लिए राज्य के कारागार का दण्ड पाया हुआ कैदी उतने ही समय के लिए क्षमा के रूप में दया के प्रयोग की विनती कर सकता है; परन्तु जब उसे केवल तीन वर्ष के लिए क्षमा की आवश्यकता है, तो वह दस वर्ष के लिए क्षमा नहीं माँगेगा, और न ही अपने तीन वर्ष की अवधि पूरी हो जाने के बाद क्षमा माँगेगा। यह सिद्धान्त पूर्णतः स्पष्ट है; जहाँ दण्ड-योग्यता समाप्त होती है, वहाँ दया भी समाप्त हो जाती है और उस पर हमारा भरोसा भी। जब तक दण्ड-योग्यता बनी रहती है, तब तक दया भी बनी रह सकती है, और उसके प्रयोग पर हमारा भरोसा भी। इसलिए जब भजनकार परमेश्वर की दया पर सदा भरोसा रखता है, तो वह इस सारी आशा का त्याग कर देता है कि न्याय के आधार पर उसे कभी अनुग्रह में ग्रहण किया जाएगा।

6. दया पर भरोसा रखने में यह बात निहित है कि सारे बहाने और बहानेबाज़ी बन्द कर दी जाए। जिस क्षण आप दया पर भरोसा रखते हैं, उसी क्षण आप सारी सफाइयाँ और बहाने एक साथ और पूरी तरह छोड़ देते हैं; क्योंकि इनमें

परमेश्वर के न्याय पर निर्भरता निहित होती है। बहाना या सफाई न्याय की दुहाई से न कम है न अधिक; यह एक ऐसी दलील है जो हमारे आचरण को उचित ठहराने के लिए दी जाती है। दया पर सदा भरोसा रखने में यह बात निहित है कि हमने सारे बहाने सदा के लिए बन्द कर दिए हैं।

इसी प्रकार, दीवानी अदालत के सामने मुकदमे का सामना कर रहा कोई मनुष्य, जब तक अपने पक्ष में औचित्य और बहाने प्रस्तुत करता रहता है, तब तक वह न्याय की दुहाई देता है; परन्तु यदि वह अदालत के सामने जाकर अपना अपराध स्वीकार कर ले, और किसी भी प्रकार का औचित्य या सफाई प्रस्तुत न करे, तो वह अपने आप को अदालत की उदारता पर छोड़ देता है। यह अपने आप को धर्मी ठहराने से बिलकुल भिन्न बात है। कभी-कभी ऐसा होता है कि एक ही मुकदमे में अभियुक्त दोनों उपाय आज़माता है। पहले वह अपना बचाव करने का प्रयत्न करता है; परन्तु जब यह व्यर्थ पाता है, तो वह अपना पक्ष बदल देता है, अपने अपराध और दण्ड-योग्यता को मान लेता है, और अपने आप को अदालत की दया पर छोड़ देता है।

कदाचित वह अदालत से विनती करता है कि उसे शासन के उस प्रमुख की दया के लिए अनुशंसित करे जिसे क्षमा करने का अधिकार दिया गया है।

अब यह सदा समझा जाता है कि जब कोई मनुष्य अपना अपराध मान लेता है तो वह बहाने बनाना छोड़ देता है, और केवल दया की दुहाई देता है। अपने पड़ोसी के साथ किसी निजी मामले में भी ऐसा ही है। यदि मैं अपने आप को पूरी तरह उचित ठहराता हूँ, तो निश्चय ही मेरे पास स्वीकार करने को कुछ नहीं है। परन्तु यदि मैं जानता हूँ कि मैंने उसके साथ अन्याय किया है, तो मैं खुले मन से अपना अपराध मान लेता हूँ, और दया की दुहाई देता हूँ। अपने आप को उचित ठहराना और अपराध-स्वीकार एक दूसरे के ठीक विपरीत खड़े हैं।

माता-पिता के अनुशासन में भी ऐसा ही है। यदि आपका बच्चा हठपूर्वक अपने आप को उचित ठहराता है, तो वह दया की कोई दुहाई नहीं देता। परन्तु जिस क्षण वह आँसू बहाते हुए आपकी छाती से लिपट जाता है, और कहता है, मैं पूरी तरह गलत हूँ, उसी क्षण वह बहाने बनाना छोड़ देता है, और अपने आप को दया पर छोड़ देता है। परमेश्वर के शासन में भी ऐसा ही है। दया पर भरोसा रखना न्याय पर की सारी निर्भरता को अन्तिम रूप से छोड़ देना है। अब आपके पास और कोई बहाना नहीं; आप कोई बहाना नहीं बनाते।

III. इसके बाद हमें उन शर्तों पर विचार करना है जिन पर हम निश्चिन्त होकर और सुरक्षित रूप से परमेश्वर की दया पर सदा भरोसा रख सकते हैं।

1. सार्वजनिक न्याय को सन्तुष्ट किया जाना चाहिए। उसकी माँगों को पूरा किया जाना चाहिए। परमेश्वर एक महान सार्वजनिक न्यायाधिपति है, जो नैतिक जगत के प्रति असीम उत्तरदायित्व वाले सम्बन्ध रखता है। उसे सावधान रहना पड़ता है कि वह क्या करता है।

कदाचित शासन का कोई भी कदम अपने प्रभावों में दया के प्रयोग से अधिक नाज़ुक और कठिन नहीं है। यह अत्यन्त संकटपूर्ण बिन्दु है। इस बात का बड़ा खतरा रहता है कि यह धारणा बन जाए कि दया व्यवस्था को पैरों तले रौंद डालेगी। दया ठीक यही करती है कि वह व्यवस्था के दण्ड को लागू करना अलग रख देती है; खतरा यह है कि कहीं ऐसा न लगे कि इससे व्यवस्था ही को अलग रख दिया गया है। बड़ी समस्या यह है कि व्यवस्था का दण्ड लागू करना पूरी तरह हटा लेने पर भी व्यवस्था अपनी पूरी महिमा कैसे बनाए रख सकती है? यह सदा एक कठिन और नाज़ुक विषय है।

मानवीय शासनों में हम प्रायः देखते हैं कि शासक बड़ी दृढ़ता का प्रयोग करता है। अमेरिकी क्रान्ति की घटनाओं के समय वॉशिंगटन से बड़ी गम्भीरता से आग्रह किया गया कि वह क्षमा कर दे

आंद्रे को। आंद्रे अत्यन्त सौम्य और प्रिय व्यक्ति था; और उसके मामले ने अमेरिकी सेना में गहरी सहानुभूति जगा दी थी। उसके पक्ष में वॉशिंगटन के पास अनेक और तीव्र याचिकाएँ भेजी गईं; परन्तु नहीं, वॉशिंगटन झुक नहीं सकता था। उन्होंने उससे विनती की कि वह आंद्रे से मिल ले, इस आशा में कि आमने-सामने की भेंट से कदाचित उसका हृदय पिघल जाए; परन्तु उसने उससे मिलने तक से इनकार कर दिया। वह अपनी भावनाओं पर भरोसा करने का साहस नहीं कर सका। उसने अनुभव किया कि यह एक बड़ा संकट-काल है, और एक राष्ट्र का कल्याण खतरे में है। इसी कारण उसका वह कठोर, अटल निर्णय था। ऐसा नहीं था कि उसके प्राण में करुणा की कमी थी। उसके पास भी अनुभव करने वाला हृदय था। परन्तु उन परिस्थितियों में वह भली-भाँति जानता था कि अपनी कोमल सहानुभूतियों को पूरा करने के लिए कोई स्थान नहीं दिया जाना चाहिए। उसने इन भावनाओं को सन्तुष्ट करने का साहस नहीं किया, कहीं ऐसा न हो कि उसका दण्ड एक राष्ट्र का विनाश हो।

मानवीय शासनों में ऐसे मामले प्रायः हुए हैं जब प्राण की हर भावना दया के पक्ष में होती है और उसे पूरा करने की प्रबल माँग करती है; परन्तु न्याय इसकी मनाही करता है।

परिवार के शासन में भी प्रायः माता-पिता को वेदनापूर्ण परीक्षा से गुज़रना पड़ता है; वह अपने पुत्र को पीड़ा देने के बजाय स्वयं उससे तिगुनी पीड़ा सहना अधिक पसन्द करेगा; परन्तु कदाचित असीम महत्व के हित दाँव पर लगे हैं, और उसकी करुणा को पूरा करने के द्वारा उन्हें खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए।

अब यदि ऐसे मामलों में दया का प्रयोग कठिन है, तो परमेश्वर के शासन में वह कितना अधिक कठिन होगा? इसलिए दया के प्रयोग की पहली शर्त यह है कि सार्वजनिक न्याय की माँगों को पूरा करने के लिए कुछ किया जाए। यह नितान्त अनिवार्य है कि व्यवस्था बनी रहे।

परमेश्वर क्षमा करने के लिए चाहे कितना ही इच्छुक क्यों न हो, फिर भी वह इतना भला है कि वह किसी ऐसी शर्त पर या किसी ऐसी परिस्थिति में दया का प्रयोग नहीं करेगा जिससे उसकी व्यवस्था की गरिमा घटे, पाप करने की छूट मिले, और अधर्म के सारे बाँध खुल जाएँ। यहोवा ऐसा कभी नहीं कर सकता। वह जानता है कि उसे ऐसा कभी नहीं करना चाहिए।

इस विषय पर अभी केवल इतना कहना आवश्यक है कि यह कठिनाई मसीह के प्रायश्चित के द्वारा पूरी तरह दूर हो गई है।

2. दूसरी शर्त यह है कि हम पश्चाताप करें। निश्चय ही किसी भी पापी के पास दया की आशा करने का तनिक भी आधार नहीं है जब तक वह पश्चाताप न करे। क्या परमेश्वर पापी को उसी समय क्षमा कर देगा जब वह अभी अपने विद्रोह में बना हुआ है? कभी नहीं।

ऐसा करना परमेश्वर की ओर से अत्यन्त अन्यायपूर्ण होगा—सारे जगत के लिए अत्यन्त विनाशकारी होगा। यह वास्तव में यह घोषणा करना होगा कि पाप एक तुच्छ बात से भी कम है—कि परमेश्वर को इसकी कोई चिन्ता नहीं कि पापी का हृदय दुष्टता में कितना जमा हुआ है; वह सबसे विद्रोही हृदय को, बिना दीन हुए, अपनी गोद में लेने को तैयार है। ऐसा करने से पहले परमेश्वर को पवित्र होना छोड़ना पड़ेगा।

3. हमें अपने पापों को मान लेना चाहिए। “जो उनको मान लेता है,” और केवल वही, “उस पर दया की जाएगी।” यहोवा नैतिक जगत के साथ ऐसे सम्बन्ध रखता है कि वह पापी के अपराध-स्वीकार के बिना क्षमा नहीं कर सकता। उसे पापी की वह गवाही चाहिए जो उसके अपने विरुद्ध और व्यवस्था तथा आज्ञाकारिता के पक्ष में हो।

मान लीजिए कि एक मनुष्य दोषी ठहराया गया है और उसे फाँसी का दण्ड सुनाया गया है। वह राज्यपाल से क्षमा के लिए याचिका करता है, परन्तु इतना घमण्डी है कि अपराध स्वीकार नहीं करता, कम से कम सबके सामने तो नहीं। “श्रीमान की कृपा हो,” वह कहता है,

“आपके और मेरे बीच की बात है, मैं यह कहने को तैयार हूँ कि मेरे विरुद्ध लगाया गया वह अपराध मैंने ही किया था, परन्तु आप मुझसे यह न कहें कि मैं संसार के सामने यह स्वीकार करूँ। आप मेरी भावनाओं का और मेरे बहुत से अति प्रतिष्ठित मित्रों की भावनाओं का कुछ ध्यान रखेंगे। इसलिए संसार के सामने तो मैं उस अपराध से इनकार ही करता रहूँगा। फिर भी मुझे भरोसा है कि आप सब परिस्थितियों पर उचित रूप से विचार करके मुझे क्षमा प्रदान करेंगे।” तुझे क्षमा करूँ, दुष्ट, राज्यपाल कहेगा—तुझे क्षमा करूँ, जब तू सारी अदालत और जूरी को अन्यायी और गवाहों को झूठा ठहरा रहा है; तुझे क्षमा करूँ, जब तू राज्य की सम्पूर्ण न्याय-व्यवस्था के विरोध में खड़ा है? कभी नहीं! कभी नहीं! तू इतना घमण्डी है कि अपना उचित स्थान नहीं लेता और अपने असली रूप में सामने नहीं आता; तो मैं कैसे भरोसा करूँ कि तू एक अच्छा नागरिक बनेगा—मैं कैसे आशा करूँ कि तू एक महा-दुष्ट से बढ़कर कुछ और होगा?

तो यह समझ लिया जाए कि परमेश्वर की दया पर भरोसा रख सकने से पहले हमें सचमुच पश्चाताप करना होगा और अपना अपराध-स्वीकार उतना ही सार्वजनिक करना होगा जितना हमने अपना अपराध सार्वजनिक किया है।

फिर मान लीजिए कि एक मनुष्य दोषी ठहराया गया है और क्षमा की याचना करता है, परन्तु कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा।

ओह, वह कहता है, मेरे पास स्वीकार करने को कोई अपराध नहीं है; मैंने कुछ विशेष गलत नहीं किया है; मेरे ऐसा करने का कारण यह है कि मेरा हृदय अत्यन्त दुष्ट है। मैं पश्चाताप नहीं कर सकता और कभी कर भी नहीं सका। मैं नहीं जानता कि ऐसा कैसे होता है कि मैं इतनी आसानी से हत्या कर डालता हूँ; अपने पड़ोसी को मार डालना मेरा दूसरा स्वभाव-सा बन गया है; मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता। मैंने सुना है कि आप बहुत भले हैं, बहुत दयालु हैं, वह राज्यपाल से कहता है; लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि आप साक्षात् प्रेम हैं, और मैं इस पर विश्वास करता हूँ; तो निश्चय ही आप मुझे क्षमा प्रदान करेंगे, आपके लिए यह इतना सरल होगा—और मेरे लिए फाँसी पर लटकाया जाना इतना भयानक है। आप जानते हैं कि मैंने केवल थोड़ा-सा ही गलत किया है, और वह थोड़ा भी केवल इसलिए कि मैं अपने को रोक नहीं सका; आप निश्चय ही इस बात पर अड़े नहीं रह सकते कि मैं कोई अपराध स्वीकार करूँ। क्या! मुझे इसलिए फाँसी दिलाएँगे कि मैं पश्चाताप नहीं करता? आप निश्चय ही इतने दयालु हैं कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे।

मेरे विषय में तेरी इस अच्छी राय के लिए मैं तुझे धन्यवाद नहीं देता, यही क्रोध से भरा उत्तर होना चाहिए; व्यवस्था अपना काम करेगी; तेरा मार्ग फाँसी के तख्ते की ओर है।

उस पापी को देखिए; उसे अपनी प्रार्थना में परमेश्वर का उपहास करते सुनिए: “परमेश्वर की दया पर भरोसा रखो, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है।” क्या आप पश्चाताप करते हैं?

“पश्चाताप के बारे में मैं नहीं जानता—प्रश्न वह नहीं है; परमेश्वर प्रेम है—परमेश्वर इतना भला है कि वह मनुष्यों को नरक में नहीं भेजेगा; जो लोग सोचते हैं कि वह कभी किसी को नरक में भेजता है, वे आंशिक-उद्धारवादी (पार्शियलिस्ट) हैं और परमेश्वर की निन्दा करते हैं।” बहुत भला! आप कहते हैं; बहुत भला! इतना भला कि पापी पश्चाताप करे या न करे, वह क्षमा कर ही देगा; इतना भला कि अपने शासन की बागडोर दृढ़ता से नहीं थाम सकता; इतना भला कि अपने विशाल राज्य के सर्वोत्तम हितों की रक्षा नहीं कर सकता! हे पापी, जिस परमेश्वर की आप कल्पना करते हैं वह आपकी अपनी विक्षिप्त कल्पना से गढ़ा हुआ प्राणी है—वह परमेश्वर नहीं जिसने कठोर पापियों के लिए निराशा का कारागार बनाया है—वह परमेश्वर नहीं जो धार्मिक व्यवस्था के द्वारा सारे जगत पर शासन करता है, और हमारी जाति पर भी एक ऐसी सुसमाचार-व्यवस्था के द्वारा जो उस व्यवस्था की बड़ाई करती और उसे आदरयोग्य ठहराती है।

4. जहाँ तक हमारे बस में है, हमें सचमुच क्षतिपूर्ति करनी चाहिए। इसका महत्व आप एक राजमार्ग के डाकू के मामले में देख सकते हैं। उसने एक यात्री के दस हज़ार डॉलर लूट लिए हैं, और उसे आजीवन राज्य के कारागार का दण्ड सुनाया गया है। वह क्षमा के लिए याचिका करता है। वह अपने अपराध के लिए बहुत दुःखी है; जो भी अपराध-स्वीकार माँगा जाए, चाहे कितना ही सार्वजनिक क्यों न हो, वह करने को तैयार है; परन्तु क्या वह क्षतिपूर्ति करेगा?

वह नहीं; कभी नहीं—उसे उस धन की स्वयं आवश्यकता है। कदाचित वह उसका आधा भाग सरकार को दे देगा; वह एकाएक बड़ा देशभक्त बन गया है, और साथ ही उदार भी; जनहित के लिए पाँच हज़ार डॉलर दान करने को तैयार है! एक बड़ी रकम को अत्यन्त परोपकारी कामों के लिए अर्पित करने को तैयार है; परन्तु किसका धन? जिस मनुष्य को उसने लूटा है उसके प्रति उसका न्याय कहाँ है? अभागे! जो तूने अपने पड़ोसी से छीना है उसे जनता के लिए अर्पित करता है और सरकार के खज़ाने में डालता है! नहीं; ऐसा दान तो तिजोरी को ही जलाकर पार निकल जाएगा! यदि सरकार ऐसे घृणित काम को अनदेखा कर दे तो आप क्या सोचेंगे? आप उनके घिनौने भ्रष्टाचार से घृणा करेंगे।

उस संसारी मनुष्य को देखिए। उसका सारा व्यापारिक जीवन ठगी का ही एक सिलसिला है। वह चुपके से अपने पड़ोसी की जेबों में हाथ डालता है और इस प्रकार अपनी जेबें भरता है। उसका नियम सदा यही है कि कोई वस्तु जितने की है उससे अधिक में बेचे और कम में खरीदे। वह जानता है कि कैसे एकाधिकार जमाकर दाम ऊँचे करे, और फिर अपना जमा किया हुआ सारा माल बेच डाले। उसका मन सदा इसी में लगा रहता है कि कैसे जोड़-तोड़ करके अच्छे सौदे करे। परन्तु अन्त में इस मनुष्य को भी परमेश्वर से मिलने की तैयारी करनी ही है।

इसलिए वह अपने धन की ओर मुड़ता है कि उसी से सब काम बना ले। उसके पास परमेश्वर के लिए एक बड़ा दान है। कदाचित वह एक गिरजाघर बनवाएगा या एक मिशनरी भेजेगा—कम से कम कुछ अच्छा-खासा ही, जिससे उस जीवन के लिए क्षमा खरीद ले जिसके विषय में उसका विवेक बहुत चैन में नहीं है। हाँ, उसके पास परमेश्वर के लिए एक शानदार घूस है। आह, परन्तु क्या परमेश्वर उसे लेगा? कभी नहीं! इस विचार से ही परमेश्वर का क्रोध भड़क उठता है। क्या

परमेश्वर को तेरे लहू का मोल चाहिए—अन्धेर से कमाया हुआ वह लाभ? जा और उसे उन दुःखी कंगालों को लौटा दे जिनकी दुहाई तेरे विरुद्ध परमेश्वर तक पहुँच चुकी है। हाय, कैसी लज्जा की बात है कि अपने भाई से चुराकर परमेश्वर को देने की सोचे! केवल पतरस को लूटकर पौलुस को देना नहीं, वरन् मनुष्य को लूटकर परमेश्वर को देना!

आपके प्राण की क्षमा इस प्रकार नहीं खरीदी जाती!

5. एक और शर्त यह है कि आप सचमुच सुधर जाएँ।

मान लीजिए कि हमारे पड़ोस में एक दुष्ट है जो आसपास के सारे क्षेत्र के लिए आतंक बन गया है। वह पहले ही बीसियों असहाय स्त्रियों और बच्चों की हत्या कर चुका है; रात को हमारे घर जला देता है; प्रतिदिन लूटपाट और डकैती करता है; और हर दिन उसके ऐसे अपराधों के समाचार आते हैं जिन्हें सुनकर हर एक के कान झनझना उठते हैं। कोई एक क्षण के लिए भी अपने आप को सुरक्षित नहीं समझता। वह एक महा-दुष्ट और खूनी है।

अन्त में वह पकड़ा जाता है, और हम सब चैन की साँस लेते हैं। शान्ति फिर से स्थापित हो जाती है। परन्तु यह दुष्ट, मृत्युदण्ड पाने के बाद, क्षमा के लिए याचिका करता है। वह किसी भी प्रकार का पश्चाताप प्रकट नहीं करता, और सुधरने की प्रतिज्ञा तक नहीं करता; फिर भी राज्यपाल उसे पूरी क्षमा देने ही वाला है। यदि वह ऐसा करे, तो कौन यह न कहेगा कि उसे स्वयं गर्दन से तब तक लटकाया जाना चाहिए जब तक वह मर न जाए, मर न जाए! परन्तु वह पापी क्या कहता है? “मैं,” वह कहता है, “परमेश्वर की बड़ी दया पर भरोसा रखता हूँ।

मुझे किसी बात का डर नहीं।” परन्तु क्या वह सुधरता है? नहीं। यदि वह नहीं सुधरता तो परमेश्वर की दया उसका क्या भला कर सकती है?

6. आपको व्यवस्था और उसके दण्ड को उचित ठहराने में पूरी सीमा तक जाना होगा।

उस दोषी ठहराए गए अपराधी पर ध्यान दीजिए। वह नहीं मानता कि सरकार को किसी भी अपराध के लिए प्राण लेने का अधिकार है; वह ऐसी कार्यवाही के न्यायपूर्ण होने पर पूरी तरह आपत्ति करता है, और इसी आधार पर हठ करता है कि उसे क्षमा मिलनी ही चाहिए। क्या उसे क्षमा मिलेगी? क्या राज्यपाल ऐसा पक्ष लेगा जो उसी व्यवस्था और संविधान के सीधे विरुद्ध है जिसे बनाए रखने की उसने शपथ खाई है? क्या वह एक अपराधी को, या हज़ार अपराधियों को भी, बचाने के लिए व्यवस्था को कुचल डालेगा? कदापि नहीं, यदि उसके हृदय में एक शासक की आत्मा है। यदि वह दोषी मनुष्य शासन-प्रमुख से दया पाना चाहता है, तो उसे व्यवस्था और दण्ड के उचित होने को स्वीकार करना होगा; नहीं तो वह अपने आप को व्यवस्था के विरोध में खड़ा करता है और समाज में उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

अब उस पापी की सुनिए। अपनी दण्ड-योग्यता के विरुद्ध और अनन्त दण्ड के न्यायपूर्ण होने के विरुद्ध उसके पास कहने को कितना कुछ है! वह परमेश्वर की व्यवस्थाओं की निन्दा करता है कि वे क्रूरता से और अन्यायपूर्वक कठोर हैं। हे पापी, क्या आप समझते हैं कि जब तक आप ऐसा मार्ग अपनाए हुए हैं, परमेश्वर आपको क्षमा कर सकता है? इसके बजाय तो वह अपनी व्यवस्था को रद्द कर देना और अपना सिंहासन छोड़ देना पसन्द करेगा। आप परमेश्वर के लिए आपको क्षमा करना असम्भव बना देते हैं।

7. कोई भी पापी दया का उचित पात्र नहीं हो सकता जो शासन के उन सब उपायों के प्रति पूरी तरह अधीन न हो जिनके द्वारा वह दोषी ठहराया गया है।

मान लीजिए कि कोई अपराधी यह दलील दे कि उसे घात लगाकर पकड़ने का षड्यन्त्र रचा गया था; कि गवाहों को झूठी गवाही देने के लिए घूस दी गई थी; कि न्यायाधीश ने जूरी को झूठे निर्देश दिए थे, या कि जूरी ने अन्यायपूर्ण निर्णय दिया था; तो क्या वह ऐसे झूठे आरोपों के द्वारा क्षमा पाने की आशा कर सकता है? कदापि नहीं। ऐसे मनुष्य पर किसी भी शासन के अधीन, चाहे मानवीय हो या ईश्वरीय, समाज में व्यवस्था और सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता।

परन्तु उस पापी को शिकायत करते और मीन-मेख निकालते सुनिए। वह कहता है, परमेश्वर ने पाप और परीक्षा को इस संसार में आने ही क्यों दिया? परमेश्वर पापी को जीवित ही क्यों रहने देता है कि वह ऐसे भयानक दण्ड का भागी बने?

और परमेश्वर अपने विधान के द्वारा पापी का मार्ग क्यों रोक देता है, और उसे उसके पापों में ही काट डालता है? फिर भी यही पापी परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने की बातें करता है! सचमुच; जबकि वह सारे समय परमेश्वर पर यह दोष लगा रहा है कि वह एक असीम अत्याचारी है, और असहाय, अभागे पापी को कुचल डालना चाहता है! इन मीन-मेखों का क्या अर्थ है? ये एक दोषी विद्रोही की ऊँची उठी हुई आवाज़ के सिवाय और क्या हैं, जो अपने सृजनहार पर इसलिए अभियोग लगाता है कि वह भलाई करता है और अपने ही विद्रोही प्राणियों पर दया दिखाता है?

क्योंकि केवल एक क्षण का विचार यह देखने के लिए पर्याप्त है कि जिस परीक्षा की शिकायत की जाती है वह केवल एक भलाई है जो एक नैतिक कर्ता के सामने इसलिए रखी जाती है कि प्रेम के द्वारा उसका हृदय पिघल जाए। फिर भी इसके विरुद्ध पापी कुड़कुड़ाता है, और परमेश्वर के विरुद्ध अपनी शिकायतें उण्डेलता है। निश्चय जानिए कि जब तक आप परमेश्वर के हर काम को उचित ठहराने में पूरी सीमा तक जाने को तैयार नहीं हैं, वह आपको कभी क्षमा नहीं दे सकता। अपने आप को धर्मी ठहराने वाले विद्रोही को क्षमा करने का परमेश्वर के पास कोई विकल्प नहीं है। असंख्य नैतिक प्राणियों के हित उसे ऐसा करने से रोकते हैं।

जब आप पूरी तरह से इस आधार पर खड़े होंगे कि परमेश्वर को धर्मी ठहराएँ और अपने आप को दोषी ठहराएँ, तब आप अपने आप को वहाँ रखते हैं जहाँ दया आप तक पहुँच सकती है, और तब वह निश्चय पहुँचेगी। उससे पहले नहीं।

8. आपको उद्धार की योजना को पूरे हृदय से अपना लेना चाहिए। यह योजना इस मान्यता पर आधारित है कि हम अनन्त मृत्यु के योग्य हैं और यदि कभी बचाए जाएँगे तो सम्प्रभु अनुग्रह और दया के द्वारा ही बचाए जाएँगे। दया के सिवाय कोई भी वस्तु नहीं बचा सकती—वह दया जो पापी से धूल में मिलती है, जहाँ वह औंधे मुँह पड़ा है, बिना किसी बहाने या सफाई के, सारी महिमा परमेश्वर को देता है और सारा दोष और लज्जा अपने ऊपर लेता है। हे पापी, पूरे हृदय से इस योजना को अपनाने में आपके लिए आशा है।

IV. अब हम उन कुछ भूलों पर ध्यान देते हैं जिनमें बहुत से लोग पड़ जाते हैं।

IV. अब हम उन कुछ भूलों पर ध्यान देते हैं जिनमें बहुत से लोग पड़ जाते हैं।

1. बहुत से लोग वास्तव में दया पर नहीं, न्याय पर भरोसा रखते हैं। वे कहते हैं, “परमेश्वर न्यायी है—परमेश्वर मेरे साथ कोई अन्याय नहीं करेगा—मैं जितना अच्छा कर सकता हूँ उतना करने का इरादा रखता हूँ, और फिर मैं निश्चिन्त होकर अपने आप को एक न्यायी परमेश्वर के हाथों में छोड़ सकता हूँ।” यह सच है कि परमेश्वर आपके साथ कोई अन्याय नहीं करेगा। इसका भय आपको कभी करने की आवश्यकता नहीं। परन्तु यदि परमेश्वर आपके साथ ठीक-ठीक न्याय करे तो कितना भयानक होगा! यदि आपको कोई दया न मिले तो कितना डरावना होगा! यदि परमेश्वर आप पर असीम दया न दिखाए तो आप सदा के लिए नाश हो जाएँगे, उतने ही निश्चय से जितने निश्चय से आप पापी हैं! परमेश्वर के न्याय पर यह भरोसा रखना एक घातक चट्टान है। जो पापी शान्त मन से ऐसा कर सकता है, उसने न तो कभी परमेश्वर की व्यवस्था को देखा है और न अपने हृदय को। भजनकार ने यह नहीं कहा, मैं परमेश्वर के न्याय पर सदा सर्वदा भरोसा रखूँगा।

2. बहुत से लोग उन शर्तों को पूरा किए बिना, जिन पर ही दया दिखाई जा सकती है, परमेश्वर की दया पर भरोसा रखने का दावा करते हैं।

वे मरने तक ऐसे भरोसे को थामे रह सकते हैं—परन्तु उससे अधिक नहीं।

3. पापी इस बात पर विचार नहीं करते कि परमेश्वर उन्हें इन शर्तों को पूरा करने से छूट नहीं दे सकता।

उसे ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है।

ये शर्तें उसके शासन के मूल संविधान से, उसके स्वभाव ही से उत्पन्न होती हैं, और इसलिए इन्हें ठीक-ठीक पूरा किया जाना चाहिए। इनके पूरा किए जाने से छूट देने के बजाय परमेश्वर सारी मानव जाति को, हाँ, सारे जगत को, नरक में भेज देगा। यदि परमेश्वर इन शर्तों को अलग रख दे और किसी पापी को उस दशा में क्षमा कर दे जब वह दीन नहीं हुआ है, पश्चाताप नहीं करता और विश्वास नहीं करता, तो वह अपना सिंहासन उलट देगा, नैतिक जगत को झकझोर देगा, और अपनी ही छाती में एक और नरक सुलगा लेगा।

4. बहुत से लोग अपने आप को धर्मी ठहराने के द्वारा अपने ही उद्धार को विफल कर रहे हैं। ऐसी दलीलें जो अपने आप को निर्दोष बताती हैं, और ऐसी मीन-मेख जो परमेश्वर पर अभियोग लगाती हैं, दोनों समान रूप से और घातक रूप से क्षमा के मार्ग में खड़ी हैं। जब से संसार आरम्भ हुआ है, यह कभी नहीं सुना गया कि किसी पापी ने इस दशा में दया पाई हो।

5. बहुत से लोग दया पर भरोसा रखने का दिखावा करते हैं, जबकि साथ ही यह भी मानते हैं कि जीवन में चलते-चलते उन्हें उनके पापों का दण्ड मिलता जा रहा है। वे दया के द्वारा उद्धार की आशा रखते हैं, और फिर भी इसी जीवन में उन्हें अपने सारे पापों का दण्ड मिल जाता है। इससे अधिक बेतुकी और परस्पर-विरोधी दो बातें कभी एक साथ नहीं रखी गईं।

यहाँ उतना दण्ड पा लिया जितने के वे योग्य हैं, और फिर भी दया के द्वारा उद्धार! वे साफ-साफ यह क्यों नहीं कहते कि मृत्यु के बाद उनका उद्धार न्याय के द्वारा होगा? निश्चय ही यदि चलते-चलते उन्हें उतना सारा दण्ड मिल जाता है जितने के वे योग्य हैं, तो मृत्यु के बाद न्याय और कुछ नहीं माँगेगा।

6. जो लोग शब्दों में दया की विनती करते हैं, वे प्रायः वास्तव में न्याय पर निर्भर रहते हैं। पाप और दण्ड-योग्यता का गहरा बोध उनके प्राण में तब तक नहीं उतरता जब तक वे यह न समझ लें कि दया क्या है, और यह अनुभव न करें कि वे और किसी वस्तु पर निर्भर नहीं रह सकते।

7. कुछ लोग अपने पापों को छिपा रहे हैं, फिर भी स्वर्ग जाने का स्वप्न देखते हैं। क्या वे सोचते हैं कि वे उन पापों को सर्वदर्शी आँख से छिपा सकते हैं? क्या वे परमेश्वर के भयानक वचन के होते हुए भी यह सोचते हैं कि वे “अपने अपराध छिपाकर भी सफल होंगे”?

8. हम अपने माने हुए और अनुभव किए हुए दोष से अधिक दया उचित रूप से नहीं माँग सकते; और जो सोचते हैं कि माँग सकते हैं, वे घातक भूल करते हैं। सचेत दोष के गहरे बोध के बिना हम दया की याचना करने में ईमानदार और सच्चे नहीं हो सकते। उस मनुष्य को प्रार्थना करते सुनिए जो पाप को तुच्छ बात और उसके उचित दण्ड को छोटा-सा मामला समझता है। “हे प्रभु, मुझे थोड़ी-सी दया की आवश्यकता है,

केवल थोड़ी-सी; मेरे पाप थोड़े और मामूली रहे हैं; हे प्रभु, उस छोटे और हल्के दण्ड से मुझे छूट दे जिसके योग्य मेरी थोड़ी-सी भूलें और कमियाँ ठहरी हों।” या उस यूनिवर्सलिस्ट को प्रार्थना करते सुनिए: “हे प्रभु, तू जानता है कि जीवन में चलते-चलते मुझे मेरे पापों का दण्ड मिल चुका है; मैं एक बार बीमार पड़ा, और मुझे तरह-तरह की पीड़ाएँ और हानियाँ झेलनी पड़ीं, तू जानता है कि वे मेरे किए हुए सब पापों का दण्ड देने के लिए लगभग या पूरी तरह पर्याप्त हैं; इसलिए अब मैं प्रार्थना करता हूँ कि

तू अपनी बड़ी दया से मुझे उद्धार दे।” कैसी आश्चर्य की बात है कि स्वस्थ मस्तिष्क वाले मनुष्य ऐसी मूर्खता की बात मानें! एक यूनिवर्सलिस्ट प्रार्थना कर ही कैसे सकता है? वे किस बात के लिए प्रार्थना करें? क्षमा के लिए नहीं, क्योंकि उनके सिद्धान्तों के अनुसार न्याय के आधार पर उन्हें दण्ड से छूट पाने का वैध दावा है, जैसा उस अपराधी को होता है जो राज्य के कारागार में अपनी सज़ा पूरी कर चुका है।

एकमात्र तर्कसंगत प्रार्थना जो की जा सकती है वह यह है कि परमेश्वर उनके साथ न्याय करे और उन्हें छोड़ दे, क्योंकि उन्हें पहले ही पर्याप्त दण्ड मिल चुका है। परन्तु वे इसके लिए प्रार्थना क्यों करें? परमेश्वर पर तो उनकी प्रार्थना के बिना भी न्याय करने का भरोसा किया जा सकता है। मुझे आश्चर्य नहीं कि यूनिवर्सलिस्ट बहुत कम प्रार्थना करते हैं; उनके पास प्रार्थना करने को है ही क्या? अपनी प्रतिदिन की रोटी? ठीक है। परन्तु उनकी योजना के अनुसार उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वे उतना सब भोग लेते हैं जितने के वे योग्य हैं। कैसा सुहावना भ्रम; मानव घमण्ड को पर्याप्त रूप से सहलाने वाला, परन्तु विवेकशील मनों के लिए विचित्र और भयानक रूप से विनाशकारी! पुनःस्थापनावाद भी मूल रूप से यही आधार लेता है, केवल दण्ड का एक भाग शोधन-स्थान (पर्गेटरी) में भुगतने के लिए छोड़ देता है, परन्तु उद्धार का दावा दया के आधार पर नहीं, न्याय के आधार पर करता है। यूनिवर्सलिज़्म की किसी भी व्यवस्था में दया के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। इस व्यवस्था का हर रूप परमेश्वर को न्याय के वस्त्र पहनाता है—अटल, भयानक न्याय के—फिर भी ये लोग, जैसा वे कहते हैं, परमेश्वर की दया पर भरोसा रखते हैं! परन्तु उन्होंने सुसमाचार का क्या किया—दोषियों के लिए सेंत-मेंत की क्षमा के विषय में बाइबल जो कुछ कहती है उस सब का क्या किया? उन्होंने उसे बाइबल से बाहर धकेल दिया है; और उसके बदले उन्होंने हमें क्या दिया है? केवल न्याय, न्याय—इस संसार में, या कम से कम शोधन-स्थान के कुछ वर्षों में, पाप का पर्याप्त दण्ड: पाप एक तुच्छ बात—शासन एक निरा तमाशा—परमेश्वर झूठा—नरक एक हौवा और एक ढकोसला! यह सब उतनी ही भयंकर ईश-निन्दा के सिवाय और क्या है जितनी कभी नरक से निकली हो?

यदि हम थोड़ी-सी ही दया माँगें, तो हमें कुछ भी नहीं मिलेगा। यह विचित्र लग सकता है, परन्तु है यह सच ही। यदि हमें कुछ पाना है, तो हमें बड़ी आशीषें माँगनी होंगी। मान लीजिए कि एक मनुष्य फाँसी के योग्य है, और फिर भी केवल थोड़ी-सी कृपा माँगता है; मान लीजिए वह ऐसा ही कहे, तो क्या उसे क्षमा किया जा सकता है?

नहीं। उसे अपना सारा दोष उसके पूरे और भयानक रूप में मान लेना होगा, और यह दिखाना होगा कि वह उसे अपने प्राण की गहराई में अनुभव करता है। इसी प्रकार, हे पापी, आपको भी आकर अपना सारा दोष जैसा वह है वैसा ही मान लेना होगा, नहीं तो कोई दया नहीं मिलेगी। आइए और परमेश्वर के सामने नीचे झुकिए, नीचे, और नीचे, असीम रूप से नीचे, और वहीं दया पाइए।

उस यूनिवर्सलिस्ट की सुनिए। पहले-पहल वह केवल इतना ही कह सकता है, “मैं हज़ार बातों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ।” परन्तु वह सन्देह करने लगता है कि क्या इतना ही पर्याप्त है। कदाचित उसे इस जीवन में भोगे हुए दण्ड से कुछ अधिक दण्ड की आवश्यकता है; वह अपना कुछ और दोष देखता है; इसलिए वह प्रार्थना करता है कि परमेश्वर उसे नरक के उस दस वर्ष के दण्ड से छोड़ दे जिसके वह योग्य है। और यदि वह कुछ और दोष देखता है, तो वह उतने ही और अधिक दण्ड से छुटकारे की विनती करता है। यदि सत्य उसके प्राण पर चमक उठे और वह यहोवा की व्यवस्था के प्रकाश में अपने हृदय और जीवन को देखे, तो वह नीचे और नीचे झुकता जाता है, जितना नीचे झुक सकता है, और यह प्रार्थना उण्डेलता है कि परमेश्वर उसे उस अनन्त नरक से बचाए जिसके वह योग्य है। “ओह,” वह पुकार उठता है, “क्या परमेश्वर इतने बड़े पापी को क्षमा कर सकता है!” हाँ, और उतनी ही अधिक तत्परता से, जितना अधिक आप अपने आप को दीन करते हैं, और जितनी अधिक बड़ी दया आप माँगते हैं और अनुभव करते हैं कि आपको उसकी आवश्यकता है। बस नीचे आ जाइए और ऐसा स्थान ले लीजिए जहाँ परमेश्वर आपसे मिल सके। उस उड़ाऊ पुत्र को स्मरण कीजिए, और उस पिता को जो दौड़कर उसके गले से लिपट गया, रोते हुए, स्वागत करते हुए, क्षमा करते हुए! ओह! उस पिता का हृदय कैसी कोमलता से उमड़ पड़ा!

आपके पापों की बड़ाई नहीं, वरन् आपके हृदय का घमण्ड आपके उद्धार में बाधा है।

आपके बीते जीवन की कोई बात नहीं, वरन् आपके मन की वर्तमान दशा है जो आपके उद्धार को असम्भव बनाती है। इस पर विचार कीजिए।

आपको परमेश्वर को मनाने के लिए कि वह आपको बचाए, उस पर उपाय करने के लिए ठहरने की आवश्यकता नहीं। वह तो आप पर उपाय कर रहा है कि आपको उद्धार पाने के लिए मनाए। आप ऐसा व्यवहार करते हैं मानो किसी भी सम्भव विनती और अधीनता से परमेश्वर को दया करने के लिए मुश्किल से ही मनाया जा सकता हो। ओह, आप नहीं देखते कि उसका महान हृदय कैसे करुणा से धड़कता है और दया की धाराओं को सब दिशाओं में उमड़ाता है, जीवन के जल की नदी को आपके पाँवों ही के पास बहाता है, और आपके हृदय पर ऐसी विनती का दबाव डालता है कि आपको उसके विरुद्ध अपने आप को कड़ा करना पड़ता है, कहीं ऐसा न हो कि आप पश्चाताप करने के लिए मना लिए जाएँ। ओह, क्या आप देखते हैं कि परमेश्वर कैसे चाहता है कि आपको मनाए और पश्चाताप में आपके हृदय को तोड़ दे, ताकि आपको वहाँ ले आए जहाँ वह क्षमा करने वाली दया के साथ आप तक पहुँच सके—जहाँ वह अपना सिंहासन ही त्यागे बिना आकर आपको आशीष दे सके!

अपनी अनन्त दण्ड-योग्यता से इनकार करना अपने उद्धार को पूरी तरह असम्भव बना देना है।

परमेश्वर इस आधार पर आपको कभी क्षमा नहीं कर सकता, क्योंकि आप न्याय के आधार पर उद्धार पाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यदि आप मिलने वाले हर मनुष्य की हत्या कर डालें, तो भी आप अपने दण्ड को उससे अधिक निश्चित नहीं बना सकते जितना आप इस प्रकार बना देते हैं। आप दया के हाथ बाँध देते हैं और उसे मृत्यु के जबड़ों से आपको निकालने नहीं देते। यह ऐसा है मानो आपके घर में आग लगी हो और आप अपनी भरी हुई बन्दूक उठाकर हर उस मनुष्य को गोली मार दें जो अपनी बाल्टी लेकर आपकी सहायता करने आता है। आप भड़कती हुई आग के बीच अपनी जगह डटे रहते हैं जब तक आप लपटों में समा नहीं जाते। कौन आपकी सहायता कर सकता है? वह मनुष्य क्या कर रहा है जो अपने परिवार को यूनिवर्सलिज़्म पर विश्वास कराने का प्रयत्न कर रहा है? यह ऐसा है मानो जब-जब दया दिखाई दे, तब-तब वह उसके हृदय पर ही अपनी बन्दूक चलाना चाहता हो। ऐसा लगता है कि उसने दया को भगा देने की ठान ली है, और इस उद्देश्य के लिए वह यूनिवर्सलिज़्म के सारे यन्त्र चलाता है और झूठ के इस शरणस्थान के गढ़ में जा घुसता है! ओह! यह कैसा मृत्यु का काम है! दया उस तक या उसके परिवार तक नहीं पहुँचेगी; ऐसा ही वह ठाने हुए प्रतीत होता है—और दया आ नहीं सकती। देखिए वह कैसे स्वर्ग से झुकती है—यहोवा प्रेम से मुस्कराता है—और करुणा से रोता है—और बादलों ही से झुककर क्रूस पर चढ़ाए गए उस जन का छिदा हुआ हाथ बढ़ाता है। परन्तु नहीं! मैं उस दण्ड के योग्य नहीं हूँ; केवल दया के द्वारा दी गई क्षमा का यह अपमान दूर हो! इससे अधिक घातक, इससे अधिक विनाशकारी, प्राण के लिए इससे अधिक सर्वनाशी और क्या हो सकता है?

आप बिलकुल स्पष्ट देखते हैं कि सब लोग क्यों नहीं बचाए जाते। इसका कारण यह नहीं कि परमेश्वर सबको बचाना नहीं चाहता, वरन् यह कि वे उन प्रयत्नों को विफल कर देते हैं जो परमेश्वर उन्हें बचाने के लिए करता है। वे हर सम्भव शरणस्थान और टालमटोल का सहारा लेते हैं; दोष के बोध का विरोध करते हैं, और दया की हर पुकार को ठुकरा देते हैं।

उन जवानों को क्या हो गया है? वे क्या कर रहे हैं? क्या परमेश्वर अपने लाल क्रोध और प्रतिशोध के साथ उतर आया है, कि वे अपनी सारी शक्ति जुटाकर उसका विरोध करें? ओह, नहीं, वह तो केवल दया के साथ आया है—बस इतना ही—और वे उसकी दया से लड़ रहे हैं, न कि उसके प्रतिशोध के

न्यायपूर्ण प्रतिफलों से। यदि यह उसके प्रतिशोध की भयानक भुजा होती तो आप बहुत जल्दी झुक जाते या उसके प्रहार के नीचे टूट जाते। परन्तु परमेश्वर की दया अपनी कोमल फुसफुसाहटों में आती है (काश आप इसे समझ पाते)—वह आपके हृदय को जीतने आती है; और आप क्या कर रहे हैं? आप उसकी पुकारों का विरोध करने के लिए आपस में गुट बनाते हैं—आप हज़ार बहाने गढ़ते हैं—आप बातें करने के लिए इकट्ठे दौड़ते हैं, और बातों में हर गम्भीर विचार को उड़ा देते हैं—आप अपने बेचैन विवेक को राहत दिलाने के लिए किसी नास्तिक या यूनिवर्सलिस्ट के पास दौड़ जाते हैं।

आह, हे पापी, इससे आपका कुछ भला नहीं हो सकता। आप परमेश्वर से दूर भागते हैं—क्यों? बात क्या है? क्या परमेश्वर अपने बड़े क्रोध की बाढ़ उण्डेल रहा है? नहीं, नहीं; परन्तु दया आई है, और चाहती है कि आपको अपने फैले हुए पंखों के नीचे इकट्ठा कर ले जहाँ क्रोध के तूफान कभी नहीं आ सकते। परन्तु नहीं, पापी उसके विरुद्ध दलीलें देता है—मीन-मेख निकालता है, भागता है, लड़ता है, दया के स्वर्गदूत को ठुकराता है—जीवन के जल को अपने होंठों से झटक देता है। हे पापी, यह दृश्य शीघ्र ही समाप्त होने वाला है। समय थोड़ा है। शीघ्र ही परमेश्वर आता है—मृत्यु अपना भाला हिलाती है—वह जवान बीमार है—उसकी कराहें सुनिए। मेरे युवा मित्र, क्या आप मरने वाले हैं? क्या आप तैयार हैं? ओह, मैं नहीं जानता; मुझे बड़ी पीड़ा है। ओह! ओह! मैं ऐसे कैसे जीऊँ?

हाय, मैं कैसे मरूँ? मैं अभी इस पर ध्यान नहीं दे सकता—बहुत देर हो गई—बहुत देर! सचमुच, हे जवान, अब आप निर्बल हैं। परमेश्वर की उँगली ने आपको छू लिया है। ओह, काश मैं आपको मृत्यु-शय्या के उन दृश्यों में से कुछ बता सकता जो मैंने देखे हैं—काश मैं आपको उन्हें दिखा सकता, और आपको अकथनीय वेदना का वह गहरा विलाप सुना सकता जब प्राण काँपता था, थरथराता था, और उस भयानक आँख के सामने से मिटकर शून्य में सिमट जाना चाहता था—और तेज़ी से बहकर नरक में उतर गया! ये वही मनुष्य थे जो दया से दूर भागे थे! दया उन तक नहीं पहुँच सकी, परन्तु मृत्यु पहुँच सकती है। मृत्यु अपने शिकार को पकड़ लेती है। देखिए, वह डरे हुए, चीखते हुए प्राण को नरक के द्वार तक घसीट ले जाती है; वह प्राण कैसे पीछे हटता है—कराहता है—कैसी अलौकिक कराह है—और वह चला गया! प्राणदण्ड की आज्ञा निकल चुकी है और अब कोई मोहलत नहीं। उस पापी ने जब पा सकता था तब दया नहीं ली; अब जब वह चाहता है तब पा नहीं सकता। अब सब कुछ समाप्त हो गया।

हे मरनहार पापी, आप आज ही दया पा सकते हैं, इसमें कोई कठिनाई नहीं। यदि आप केवल पश्चाताप करें और दी जा रही क्षमा को ग्रहण कर लें, तो आपके सारे बीते पाप कोई भी बाधा नहीं हैं। आपका परमेश्वर आपको जीवन देने का प्रस्ताव रखता है।

“मेरे जीवन की सौगन्ध,” प्रभु की यह वाणी है, “मैं तुम्हारे मरने से कुछ भी प्रसन्न नहीं होता; फिर जाओ, फिर जाओ; तुम क्यों मरो?” आप ऐसे दिए जा रहे जीवन को क्यों ठुकराते हैं? और क्या आप अब भी हठ करते रहेंगे? हे आकाश, चकित हो! सचमुच, यदि कभी किसी बात ने सारे जगत को आश्चर्य से भर दिया है, तो वह पापी का दया को ठुकराना है। स्वर्गदूत चकित हुए थे जब उन्होंने परमेश्वर के पुत्र को देहधारी होते देखा, और जब उन्होंने उसे एक काठ पर कीलों से ठोंका हुआ देखा—तो अब यह देखकर वे कितने अधिक चकित होंगे कि दोषी पापी, जो नरक के लिए ठहराया हुआ है, फिर भी दी जा रही क्षमा को लात मार रहा है! वे क्या देखते हैं! वह पापी टालता रहता है, और देर करता रहता है, और फिर भी देर करता रहता है, यहाँ तक कि—क्या? यहाँ तक कि अन्तिम परदा गिर जाता है, और बड़ा घण्टा बजता है, बजता है, बजता है—पापी की अनन्त मृत्यु का भयानक शोक-नाद! वह पापी कहाँ है? उसके पीछे चलिए—वह नीचे जाता है, रोता हुआ, विलाप करता हुआ, गड़हे के किनारों के साथ-साथ—वह अपने अन्तिम घर पहुँच जाता है; अब और सदा के लिए “अपने स्थान” में! दया उसके पीछे-पीछे कगार के अन्तिम छोर तक गई, और उससे आगे न जा सकी। उसने अपना काम कर दिया है।

यदि महिमा के लोक से कोई आत्मा आकर पाँच मिनट आपसे बातें करे—मान लीजिए कोई सम्बन्धी—कदाचित आपकी माता—तो वह क्या कहेगी? या उस निराशा के लोक से कोई आत्मा—ओह, काश ऐसा कोई उस कारागार की भयानक वास्तविकताओं को शब्दों में कह पाता, तो वह क्या

कहता? क्या वह आपसे कहता कि उपदेशक आपसे झूठ बोलता रहा है? क्या वह कहता, भय की इन गढ़ी हुई कहानियों से मत डरो? ओह, नहीं, वरन् यह कि आपको उसका आधा भी नहीं बताया गया और न कभी बताया जा सकता है। ओह, यदि उसे अनुमति होती तो वह आप पर कैसा ज़ोर डालता कि आप आनेवाले क्रोध से भागें!

III. पाप की मजदूरी “पाप की मजदूरी तो मृत्यु है।”—रोमियों 6:23

यहाँ जिस मृत्यु की बात कही गई है वह वही है जो परमेश्वर की व्यवस्था के दण्ड-विधान के रूप में उचित है।

हमारे पाठ के विषय को प्रस्तुत करते हुए मुझे, I. पाप के स्वरूप को एक उदाहरण से स्पष्ट करना है; II. परमेश्वर की व्यवस्था के दण्ड-विधानों के कुछ गुणों का वर्णन करना है;

III. यह दिखाना है कि यह दण्ड क्या होना चाहिए।

I. पाप के स्वरूप को एक उदाहरण से स्पष्ट करना; एक उदाहरण हमें पाप के स्वरूप का सबसे अच्छा व्यावहारिक दृश्य देगा। आपको केवल एक ऐसे शासन की कल्पना करनी है जो शासितों का, और शासन करने वाले अधिकारियों का भी, सर्वोच्च कल्याण सुरक्षित करने के लिए स्थापित किया गया हो। मान लीजिए कि इस शासन का प्रमुख इस कार्य में अपने सारे गुण लगा देता है—अपना सारा धन, अपना सारा समय, अपनी सारी शक्तियाँ—ताकि सर्वोच्च सामान्य भलाई के महान लक्ष्य को प्राप्त करे। इस उद्देश्य के लिए वह सर्वोत्तम सम्भव नियम बनाता है—ऐसे नियम जिनका पालन किया जाए तो प्रजा और राजकुमार दोनों की सर्वोच्च भलाई सुरक्षित होगी। फिर वह ध्यान रखता है कि उनके साथ पर्याप्त दण्ड जोड़े; नहीं तो उसकी सारी चिन्ता और बुद्धि व्यर्थ हो जाएगी। वह अपना सब कुछ जो वह है और जो उसके पास है, बिना किसी रोक-टोक या कटौती के, अपने शासन के हितों में लगा देता है।

परन्तु उसकी प्रजा में से कुछ लोग इस प्रयास के साथ सहानुभूति रखने से इनकार करते हैं। वे कहते हैं, “परोपकार घर से आरम्भ होता है,” और वे पहले अपनी ही चिन्ता करने के पक्ष में हैं; संक्षेप में, वे पूरी तरह स्वार्थी हैं।

यह देखना सरल है कि किसी मानवीय शासन में इसका क्या अर्थ होगा। जो मनुष्य ऐसा करता है वह शासन का और उसकी सारी प्रजा का सामान्य शत्रु बन जाता है। यही पाप है। यह ठीक-ठीक पापी की दशा को स्पष्ट करता है। पाप स्वार्थ है। वह एक स्वार्थी लक्ष्य स्थापित करता है, और उसे पाने के लिए स्वार्थी साधनों का प्रयोग करता है; इसलिए अपने लक्ष्य और अपने साधनों दोनों के विषय में वह परमेश्वर के और सामान्य सुख के उन सब लक्ष्यों के ठीक विरुद्ध है जिन्हें वह सुरक्षित करना चाहता है। वह परमेश्वर के अधिकारों का इनकार करता है; परमेश्वर के हितों को ठुकरा देता है। हर एक पापी यह दावा करता है कि उसकी अपनी इच्छा ही व्यवस्था होगी।

वह जिस हित को प्राप्त करने में स्वयं को लगाता है, वह उस हित के बिल्कुल विपरीत है जिसे परमेश्वर ने अपने शासन में सामने रखा है।

हर व्यवस्था के साथ प्रतिफल-विधान अवश्य होने चाहिए। प्रतिफल-विधान के बिना वह केवल सलाह रह जाएगी। इसलिए व्यवस्था के विशिष्ट और अन्तर्निहित स्वभाव के लिए यह अनिवार्य है कि उसके साथ प्रतिफल-विधान हों।

ये या तो पुरस्कारात्मक होते हैं या दण्डात्मक। वे आज्ञापालन के लिए प्रतिफल की प्रतिज्ञा करते हैं, और आज्ञा न मानने के लिए दण्ड की चेतावनी भी देते हैं। वे दण्डात्मक इस अर्थ में हैं कि वे तोड़ी गई व्यवस्था के सम्मान की रक्षा करते हैं।

फिर, प्रतिफल-विधान या तो स्वाभाविक हो सकते हैं या शासकीय। ईश्वरीय शासन के अतिरिक्त अन्य शासनों में भी अक्सर ये दोनों रूप पाए जाते हैं।

स्वाभाविक दण्ड वे बुरे परिणाम हैं जो शासन के दण्ड देने के लिए किसी प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बिना स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार सब शासनों में शासन के हितैषियों का अनादर अपराधियों पर एक स्वाभाविक दण्ड के रूप में पड़ता है। वे सब भली प्रजा के स्वाभाविक शत्रु होते हैं।

ईश्वरीय शासन में विवेक की चुभन और पछतावा इसी श्रेणी में आते हैं, और वास्तव में और भी बहुत सी बातें, जो एक ओर आज्ञापालन के और दूसरी ओर आज्ञा न मानने के परिणामस्वरूप स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं।

शासकीय प्रतिफल-विधान भी होने चाहिए। हर शासक को अपनी व्यवस्था के उल्लंघन के विरुद्ध अपनी अप्रसन्नता प्रकट करनी चाहिए। आज्ञापालन के सारे प्रश्न को केवल स्वाभाविक परिणामों पर छोड़ देना स्पष्ट रूप से समाज के साथ अन्याय है।

क्योंकि शासन व्यवस्था को बनाए रखने और आज्ञापालन सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किए जाते हैं, इसलिए वे इस काम में अपनी पूरी शक्ति लगाने के लिए बाध्य हैं।

कुछ परिस्थितियों में शासन का एक और प्रासंगिक साधन वह है जिसे हम अनुशासन (ताड़ना) कहते हैं। अनुशासन का एक उद्देश्य यह है कि वह दण्ड दिए जाने से पहले आए, और अनिच्छुक आँखों को बलपूर्वक खोल दे, ताकि वे देखें कि व्यवस्था के पीछे उसे सम्भालनेवाला एक शासन है, और पापी के लिए डरने को एक भयानक दण्ड है। मनुष्यों की परख के समय में, जब तक उन्होंने दण्ड की भयानकता को न देखा है न अनुभव किया है, उन पर आकर इसका उद्देश्य उन्हें चेतावनी देना है—उन्हें सोचने और विचार करने पर विवश करना है। इस प्रकार इसका विशेष उद्देश्य उस प्रजाजन की भलाई है जिस पर यह पड़ता है, और उनकी भी जो इसके प्रयोग को देखते हैं। इसका लक्ष्य उदाहरणस्वरूप दण्ड देकर व्यवस्था की प्रतिष्ठा को बनाए रखना नहीं है। यह पूरी तरह दण्ड के ही क्षेत्र की बात है। इसलिए अनुशासन इस अर्थ में दण्डात्मक नहीं है कि वह अपराध पर उसका उचित दण्ड लाए, परन्तु उसका लक्ष्य यह है कि व्यवस्था के अधीन रहनेवाले को उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करने से रोके।

शुद्ध व्यवस्था के शासन के अधीन अनुशासन का साधन शायद ही हो सकता है, क्योंकि ऐसा शासन दण्ड देने को टाल नहीं सकता। अनुशासन दण्ड के स्थगित रहने की दशा को पहले से मान कर चलता है। इसलिए दण्डात्मक प्रहारों और अनुशासनात्मक प्रहारों में स्पष्ट भेद करना आवश्यक है।

हम पापी हैं, और इसलिए हमें परमेश्वर के शासन की पुरस्कारात्मक विशेषताओं पर अधिक ठहरने का अवसर नहीं है। व्यवस्था के अधीन हमारा प्रतिफल पर कोई दावा नहीं हो सकता, क्योंकि हमारे पाप ने उसे पूरी तरह वर्जित कर दिया है। परन्तु दण्डात्मक विशेषताओं से हमारा पूरा-पूरा सम्बन्ध है। इसलिए अब मैं यह जाँचने की ओर बढ़ता हूँ।

2. परमेश्वर की व्यवस्था के दण्डात्मक विधानों के गुण क्या हैं?

2. परमेश्वर की व्यवस्था के दण्डात्मक विधानों के गुण क्या हैं?

परमेश्वर ने हमें विवेक-बुद्धि दी है। यह नैतिक शासन के सब महान सत्यों की पुष्टि सहज-ज्ञान से और अकाट्य रूप से करती है। कुछ ऐसे गुण हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि वे नैतिक व्यवस्था में अवश्य होने चाहिए; उदाहरण के लिए, उनमें से एक है आन्तरिक न्याय। दण्ड उतनी ही चेतावनी दे जितनी न्यायसंगत है—न उससे अधिक, न कम।

न्याय परमेश्वर की व्यवस्था का गुण अवश्य होना चाहिए; नहीं तो सारा विश्व अनिवार्य रूप से उसे दोषी ठहराएगा।

आन्तरिक न्याय का अर्थ और आशय यह है कि दण्ड उस दायित्व के बराबर हो जिसका उल्लंघन किया गया है।

पाप का दोष इसमें है कि वह दायित्व का उल्लंघन है। इसलिए दोष उस दायित्व की महानता के अनुपात में होना चाहिए जिसका उल्लंघन किया गया है, और फलस्वरूप दण्ड को इसी दायित्व से मापा जाना चाहिए।

शासकीय न्याय एक और गुण है। व्यवस्था की यह विशेषता अपराध के विरुद्ध सुरक्षा देने का प्रयत्न करती है। व्यवस्था शासकीय रूप से तब तक न्यायपूर्ण नहीं है जब तक उसका दण्ड इस प्रकार निर्धारित न हो कि वह पाप के विरुद्ध उतनी ऊँची से ऊँची सुरक्षा दे जितनी उस विषय के स्वभाव में सम्भव है। मान लीजिए किसी शासन में व्यवस्था के प्रतिफल-विधान तुच्छ हैं, और जिस उद्देश्य को प्राप्त करना है उसके अनुपात में बिल्कुल नहीं हैं। ऐसा शासन अपने साथ भी अन्याय करता है, और उन हितों के साथ भी जिनकी रक्षा का भार उसे सौंपा गया है।

इसलिए एक अच्छे शासन को शासकीय रूप से न्यायपूर्ण होना चाहिए, और अपने दण्डों की कठोरता और उनके न्यायपूर्वक दिए जाने की निश्चितता के द्वारा इस बात की सबसे ऊँची गारंटी देनी चाहिए कि उसकी व्यवस्था का पालन होगा।

फिर, दण्डात्मक विधान उस उद्देश्य के योग्य होने चाहिए जिसे व्यवस्था और उसका रचयिता प्राप्त करना चाहते हैं।

शासन केवल एक उद्देश्य तक पहुँचने का साधन है, और वह प्रस्तावित उद्देश्य है सार्वभौमिक आज्ञापालन और उससे मिलनेवाला आनन्द। यदि इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए व्यवस्था अनिवार्य है, तो उसका दण्ड भी उसी के अनुसार निर्धारित होना चाहिए।

इसलिए दण्ड आज्ञा के महत्त्व के अनुसार निर्धारित होना चाहिए। यदि आज्ञा मूलभूत महत्त्व की हो—इतने महत्त्व की कि उसे न मानना सारे शासन के अस्तित्व ही की जड़ खोद दे—तो उसकी रक्षा सबसे बड़े और सबसे गम्भीर विधानों से की जानी चाहिए। उसके उल्लंघन के साथ जुड़े दण्ड सर्वोच्च श्रेणी के होने चाहिए।

दण्ड को उस उद्देश्य के मूल्य के विषय में व्यवस्थादाता के विचारों की पर्याप्त अभिव्यक्ति करनी चाहिए जिसे वह व्यवस्था के द्वारा प्राप्त करना चाहता है; साथ ही अपनी व्यवस्था की पवित्रता के विषय में उसके विचारों की; और आज्ञा न मानने के आन्तरिक दोष के विषय में भी। दण्ड का लक्ष्य व्यवस्थादाता के हृदय को प्रकट करना है—यह दिखाना कि जो उचित है उसे बनाए रखने की, और उस व्यवस्था और कल्याण को सुनिश्चित करने की जो आज्ञापालन पर निर्भर है, उसकी इच्छा कितनी गम्भीर है। दण्ड की महानता में व्यवस्थादाता अपना हृदय प्रकट करता है और अपने चरित्र का सारा प्रभाव अपनी प्रजा पर उँडेल देता है।

दण्ड को कार्यान्वित करने का उद्देश्य भी ठीक यही है; बदला लेने की इच्छा को तृप्त करना नहीं, जैसा कि कुछ लोग समझते प्रतीत होते हैं, बल्कि शासन की प्रजा पर ऐसे प्रभाव डालना जो उन्हें आज्ञापालन की ओर ले जाएँ।

उसका सामान्य उद्देश्य वही है जो स्वयं व्यवस्था का है।

दण्डात्मक विधान व्यवस्थादाता के मन में सार्वजनिक भलाई के प्रति आदर की और उसमें उसकी रुचि की पर्याप्त अभिव्यक्ति होने चाहिए। आज्ञा में उसने कुछ अभिव्यक्ति दी है; दण्ड में वह देता है

और भी अधिक। आज्ञा में हम सामने रखे गए उद्देश्य को देखते हैं और सार्वजनिक हितों के प्रति आदर का प्रकटीकरण पाते हैं; दण्ड में हमें इस आदर का माप मिलता है, जो हमें दिखाता है कि वह कितना बड़ा है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कोई मानवीय कानून हत्या के लिए केवल एक तुच्छ सा दण्ड ठहराए।

बहुत कोमल-हृदय होने के बहाने व्यवस्थादाता हत्या के इस अपराध पर पचास सेंट का जुर्माना लगा देता है! क्या इससे यह प्रकट होगा कि वह अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करता था और उनके जीवन और हितों का बहुत मूल्य समझता था? कदापि नहीं। आप यह अनुभव नहीं कर सकते कि किसी विधायक ने अपना कर्तव्य पूरा किया है, जब तक वह यह न दिखाए कि वह मानव जीवन का कितना मूल्य समझता है, और जब तक वह ऐसा दण्ड न ठहराए जो प्राप्त किए जानेवाले उद्देश्य के कुछ अच्छे अंश तक अनुरूप हो।

मानवीय शासनों में मृत्युदण्ड दिए जाने के विषय में एक बात। इस विषय में मतभेद है कि कौन सा अधिक प्रभावशाली है, आजीवन एकान्त कारावास या मृत्यु।

इस प्रश्न पर कोई टिप्पणी किए बिना, मुझे यह कहना है कि किसी मनुष्य ने कभी इस पर सन्देह नहीं किया कि हत्यारा मरने के योग्य है। यदि मृत्यु के अतिरिक्त कोई और दण्ड अधिक उचित समझा जाए, तो वह किसी भी प्रकार इस कारण नहीं कि हत्यारा मृत्यु के योग्य नहीं है। कोई मनुष्य एक क्षण के लिए भी इस पर सन्देह नहीं कर सकता। यह धार्मिकता के अटल सिद्धान्तों में से एक है कि यदि कोई मनुष्य दूसरे के हित को नष्ट करता है, तो वह अपने हित को नष्ट करता है; आँख की सन्ती आँख; प्राण की सन्ती प्राण।

हम यह पुष्टि किए बिना नहीं रह सकते कि कोई भी शासन मानव जीवन की रक्षा पर पर्याप्त बल नहीं देता जब तक वह इस धरोहर की रक्षा अपने सबसे बड़े दण्डों से न करे। जहाँ जीवन और उसके सब महत्त्वपूर्ण हित दाँव पर लगे हों, वहाँ दण्ड जितना हो सके उतना बड़ा और गम्भीर होना चाहिए।

नैतिक कर्ताओं की संवेदना के दो पक्ष होते हैं: आशा और भय; जिनके सामने आप भलाई की सम्भावना और बुराई का डर रख सकते हैं। मैं अभी दण्ड के विषय में कह रहा हूँ। यह केवल भय को ही सम्बोधित करता है।

मैंने सारांश में यह कहा है कि दण्ड को व्यवस्थादाता के उचित अधिकार की पर्याप्त रूप से घोषणा और रक्षा करनी चाहिए; जहाँ तक हो सके पाप की पर्याप्त भर्त्सना करनी चाहिए, और पाप के स्वभाव के सही आकलन पर आधारित होना चाहिए। परमेश्वर का नैतिक शासन सारे बुद्धिमान विश्व को घेरे हुए है, और अपने विशाल परिणामों के साथ अनन्तकाल तक आगे फैला हुआ है। इसलिए उसके हितों का विस्तार और व्यापकता पूरी तरह असीम है, और फलस्वरूप उसकी व्यवस्था के दण्ड, जो इस शासन के अधिकार की रक्षा के लिए ठहराए गए हैं, माप से बाहर भयानक होने चाहिए। यदि धमकाए गए दण्ड से बढ़कर और उससे अधिक भयानक किसी बात की कल्पना की जा सकती, तो सब मन कहते, “यह पर्याप्त नहीं है।” पाप के सम्बन्धों और उसके दोष के विषय में कुछ भी सही विचार रखते हुए, वे तब तक सन्तुष्ट नहीं हो सकते थे जब तक दण्ड उतना बड़ा न हो जितने की कल्पना की जा सकती है।

पाप इतना घृणित, इतना हानिकारक, इतना भयंकर रूप से विनाशकारी और अपने विनाश में इतना दूर तक फैलनेवाला है कि जब तक और अधिक किया जा सकता है, तब तक नैतिक कर्ता यह अनुभव नहीं कर सकते कि पर्याप्त किया गया है।

3. परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था का दण्ड क्या है?

3. परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था का दण्ड क्या है?

हमारा मूल पाठ उत्तर देता है, “मृत्यु।” यह निश्चय ही शारीरिक मृत्यु नहीं है, क्योंकि पवित्र लोग भी मरते हैं और पशु भी, और इनमें से कोई भी पाप की मजदूरी नहीं पा रहा हो सकता। इसके अतिरिक्त, यदि इसके दिए जाने के बाद मनुष्य तुरन्त स्वर्ग चले जाते, तो यह कोई दण्ड ही न होता। ऐसा दण्ड, यदि उसे पाप की मजदूरी माना जाए, तो केवल परमेश्वर के शासन का अपमान होता।

फिर, यह आत्मिक मृत्यु भी नहीं हो सकती, क्योंकि यह व्यवस्था के प्रति पूर्ण आज्ञा-उल्लंघन की दशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। आप इससे अधिक बेतुकी बात की कल्पना भी कठिनाई से कर सकते हैं कि किसी मनुष्य को आज्ञा न मानने का दण्ड यह दिया जाए कि उसे सदा आज्ञा न मानने की दशा में डाल दिया जाए—अर्थात् ऐसे अपराधियों को उस व्यवस्था का सदा उल्लंघन करते रहने के लिए ठहराकर व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयत्न करना—और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

परन्तु यह मृत्यु अनन्त दुर्दशा है, जो मानवीय शासनों में मृत्युदण्ड के अनुरूप है। हर कोई जानता है कि यह क्या है। यह अपराधी को समाज से सदा के लिए अलग कर देता है; उसे तुरन्त और पूरी तरह शासन के सब विशेषाधिकारों से वंचित कर देता है, और उसे आशाहीन विनाश के हवाले कर देता है। इससे अधिक भयानक कुछ नहीं दिया जा सकता। यह चरम दण्ड है, जो किसी भी ऐसे दूसरे दण्ड से अधिक भयानक है जिसे मनुष्य दे सकता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि हमारे मूल पाठ में जिस मृत्यु की बात कही गई है, वह मानवीय शासनों के मृत्युदण्ड के अनुरूप होने के लिए ही अभिप्रेत है।

आप यह भी ध्यान दें कि हमारे मूल पाठ में “परमेश्वर का वरदान,” जो “हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन” है, मृत्यु के, अर्थात् पाप की मजदूरी के, सीधे विपरीत रखा गया है। यह तथ्य इस मृत्यु के स्वभाव सम्बन्धी प्रश्न पर प्रकाश डाल सकता है। हमें “अनन्त जीवन” का विलोम ढूँढ़ना होगा।

अब यह अनन्त जीवन केवल अनन्त अस्तित्व नहीं है। पवित्रशास्त्र में जहाँ कहीं भी “अनन्त जीवन” शब्द का प्रयोग हुआ है, उसका अर्थ कभी भी केवल अनन्त अस्तित्व नहीं होता; परन्तु उसका अर्थ अनन्त आनन्द की दशा अवश्य होता है, जिसकी नींव के रूप में अनन्त पवित्रता निहित है। पवित्रशास्त्र में “जीवन” शब्द का प्रयोग वास्तविक जीवन के अर्थ में—ऐसा जीवन जो जीने योग्य हो, अर्थात् वास्तविक और भरपूर आनन्द—इतना सामान्य है कि उसके लिए किसी विशेष प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं रहती।

इसलिए मृत्यु का दण्ड इसका उलटा है, अर्थात् अनन्त दुर्दशा।

यहाँ मुझे अनन्त दण्ड की इस शिक्षा के विरुद्ध उठाई गई आपत्तियों पर कुछ शब्द कहने हैं।

मैंने अब तक जितनी आपत्तियाँ सुनी हैं, उन सबका सार केवल इतना है कि यह अन्यायपूर्ण है। उन्हें कुछ भिन्न-भिन्न शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है, परन्तु जो विचार उनमें निहित है और जिसका कुछ भी महत्त्व है, वह केवल यही है।

(1.) दावा किया जाता है कि यह अन्यायपूर्ण है क्योंकि “जीवन इतना छोटा है।”

मनुष्य कैसी विचित्र बातें करते हैं! जीवन इतना छोटा है कि मनुष्यों को अनन्त मृत्यु के योग्य होने लायक पाप करने का समय ही नहीं मिलता! क्या मनुष्य भूल जाते हैं कि एक ही पाप पाप करने के लिए ठहराए गए दण्ड का भागी बना देता है? परमेश्वर की व्यवस्था का एक उल्लंघन बनने के लिए कितने पाप होने चाहिए? मनुष्य अक्सर ऐसे बात करते हैं मानो वे समझते हों कि इसके लिए बहुत से पाप चाहिए। मानो किसी मनुष्य को न्यायालय के दण्डादेश के अधीन आने लायक हत्या का अपराध पूरा करने से पहले बहुत सी हत्याएँ करनी पड़ती हों!

3. परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था का दण्ड क्या है?

क्या? क्या कोई मनुष्य न्यायालय के सामने आकर यह निवेदन करेगा कि यद्यपि उसने व्यवस्था को तोड़ा तो अवश्य है, तौभी वह इतने लम्बे समय तक जीवित नहीं रहा, और उसने व्यवस्था को इतनी बार नहीं तोड़ा कि वह उसके दण्ड का भागी हो? पृथ्वी के किस न्यायालय ने ऐसे निवेदन को कभी इसके अतिरिक्त किसी और बात का प्रमाण माना है कि वह उसे प्रस्तुत करनेवाले की मूर्खता और दोष को प्रकट करता है?

(2.) यह भी कहा जाता है कि “मनुष्य इतना छोटा, इतना तुच्छ प्राणी है कि वह सम्भवतः कोई अनन्त पाप कर ही नहीं सकता।” इस आपत्ति का क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ यह है कि पाप सृष्टि का एक कार्य है, और इसलिए उसे उस वस्तु के परिमाण से मापा जाए जिसे वह रचता है? पाप के स्वभाव के विषय में यह अत्यन्त उटपटांग विचार होगा। क्या इस आपत्ति का अर्थ यह है कि मनुष्य अनन्त बल वाले दायित्व का उल्लंघन नहीं कर सकता? तब उसका यह अर्थ सीधे-सीधे झूठा है, जैसा कि हर किसी को जानना चाहिए। क्या उसका आशय यह है कि पाप के दोष को उल्लंघन किए गए दायित्व से नहीं मापा जाना चाहिए? तब वह नहीं जानता कि वह क्या कह रहा है, या वह दुष्टता से ज्ञात सत्य का इन्कार करता है।

क्या? मनुष्य इतना छोटा है कि वह अधिक पाप नहीं कर सकता! क्या मिलते-जुलते मामलों में हम इसी प्रकार तर्क करते हैं? मान लीजिए आपका बच्चा आपकी आज्ञा नहीं मानता। वह आपसे बहुत छोटा है! परन्तु क्या आप इस कारण उसे दोष से मुक्त कर देते हैं? क्या यह कोई ऐसा कारण है जो उसके दोष को मिटा दे? क्या छोटे अपने बड़ों के विरुद्ध कोई पाप कर ही नहीं सकते? क्या समझदार लोग सदा से यह मानने में भूल करते आए हैं कि छोटे और कम आयु वाले कभी-कभी बड़ों और महानों की आज्ञा मानने के दायित्व के अधीन होते हैं? मान लीजिए आप न्यायाधीश को मार गिराते हैं; मान लीजिए आप राजा का अपमान करते हैं, या उसकी हत्या करने का प्रयत्न करते हैं—क्या यह बहुत छोटा अपराध है, इतना क्षमा-योग्य कि उसे अपराध माना ही न जाए, केवल इस कारण कि आप निचले पद पर हैं और वह ऊँचे पद पर? आप कहते हैं, “मैं इतना छोटा, इतना तुच्छ हूँ! मैं इतने बड़े दण्ड के योग्य कैसे हो सकता हूँ?” क्या परमेश्वर के विरुद्ध अपने पापों को छोड़ आप किसी और मामले में इस प्रकार तर्क करते हैं? कभी नहीं।

(3.) फिर, कुछ लोग कहते हैं, “पाप कोई अनन्त बुराई नहीं है।” यह भाषा द्विअर्थी है। क्या इसका अर्थ यह है कि यदि पाप को अनिश्चित काल तक चलते रहने दिया जाए, तो वह अनन्त हानि नहीं करेगा? यह झूठ है, क्योंकि यदि उसके द्वारा केवल एक ही प्राण नष्ट हो, तो उससे होनेवाली हानि अनन्त होगी।

क्या इसका अर्थ यह है कि पाप, अपने वर्तमान परिणामों और सम्बन्धों में जैसा दिखाई देता है, उस रूप में अनन्त बुराई नहीं है?

मान लीजिए यह स्वीकार कर लिया जाए; इससे हमारे विषय के सम्बन्ध में कुछ सिद्ध नहीं होता, क्योंकि यह सच हो सकता है कि हर एक पाप से उत्पन्न होनेवाली बुराई का पूरा योग अनन्तकाल से कम किसी भी अवधि में पूरी तरह प्रकट न हो। तो फिर आप आज जो देखते हैं, उससे पाप की बुराई को कैसे माप सकते हैं?

परन्तु और भी ऐसी बातें हैं जो दिखाती हैं कि व्यवस्था का दण्ड अनन्त होना ही चाहिए।

पाप एक अनन्त स्वाभाविक बुराई है। वह इस अर्थ में ऐसा है कि यदि शासन के द्वारा उसे रोका न जाए, तो जो स्वाभाविक बुराई वह ले आएगा उसकी कोई सीमा नहीं।

यदि पाप केवल एक ही प्राण को नष्ट करे, तो इस प्रकार उसके द्वारा उत्पन्न बुराई की कोई सीमा नहीं ठहराई जा सकती।

फिर, पाप में अनन्त दोष है, क्योंकि वह अनन्त दायित्व का उल्लंघन है। यहाँ एक सामान्य भूल पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है, जो दायित्व के आधार के विषय में विचारों की उलझन से उत्पन्न होती है। इसी से यह भूलें होती हैं कि पाप का दोष किस बात में है। यहाँ

मैं यह दिखा सकता हूँ कि जब आप दायित्व के आधार को गलत समझते हैं, तो आप लगभग अनिवार्य रूप से पाप और दोष के स्वभाव और विस्तार को भी गलत समझेंगे। आइए, हम अपने पहले के उदाहरण पर लौटें। यह एक शासन है, जिसे शासितों की और सब सम्बन्धित लोगों की सर्वोच्च भलाई सुनिश्चित करने के लिए बुद्धिमानी से रचा गया है। आज्ञा मानने का दायित्व कहाँ से उत्पन्न होता है? निश्चय ही उस उद्देश्य के आन्तरिक मूल्य से जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया जा रहा है। परन्तु आज्ञा मानने का यह दायित्व कितना व्यापक है; या दूसरे शब्दों में, उसका सही माप क्या है? मैं उत्तर देता हूँ, वह ठीक उस उद्देश्य के मूल्य के बराबर है जिसे शासन प्राप्त करना चाहता है, और जिसे आज्ञापालन प्राप्त कराएगा, परन्तु जिसे पाप नष्ट कर देगा। परमेश्वर के इसी माप के अनुसार दण्ड निर्धारित होना चाहिए। इसी से व्यवस्थादाता को यह तय करना होता है कि न्याय और परोपकार की माँगों को पूरा करने के लिए उसे अपनी व्यवस्था के साथ कितना प्रतिफल-विधान—पुरस्कारात्मक और दण्डात्मक—जोड़ना चाहिए।

अब परमेश्वर की व्यवस्था का लक्ष्य सर्वोच्च सार्वभौमिक भलाई को सुनिश्चित करना है। उसका मुख्य और अन्तिम उद्देश्य, ठीक-ठीक कहें तो, परमेश्वर को सर्वोच्च श्रद्धा दिलाना नहीं, बल्कि सब बुद्धिमान नैतिक प्राणियों की—परमेश्वर की और उसके सब प्राणियों की—सर्वोच्च भलाई सुनिश्चित करना है। इस दृष्टि से देखने पर आप समझेंगे कि जिस उद्देश्य को प्राप्त करना है उसका आन्तरिक मूल्य ही आज्ञा मानने के दायित्व का वास्तविक आधार है।

इस उद्देश्य के मूल्य का अनुमान लगा लेने पर आपको दायित्व का मूल्य और बल मिल जाता है।

यह स्पष्ट रूप से असीम होने के अर्थ में अनन्त है। इसी अर्थ में हम दायित्व को सीमारहित ठहराते हैं। हम किसी भी दायित्व की पुष्टि करते ही इसी कारण हैं कि व्यवस्था भली है और विश्व की सर्वोच्च भलाई का अनिवार्य साधन है। इसलिए जिस कारण से हम किसी भी दण्ड की पुष्टि करते हैं, वही कारण हमें अनन्त दण्ड के न्याय और आवश्यकता की पुष्टि करने के लिए विवश करता है। हम देखते हैं कि आन्तरिक न्याय उसी कारण से अनन्त दण्ड की माँग अवश्य करता है जिस कारण से वह कोई भी दण्ड माँगता है। यदि कोई भी दण्ड न्यायसंगत है, तो वह इसलिए न्यायसंगत है कि व्यवस्था एक निश्चित भलाई सुनिश्चित करती है। यदि व्यवस्था जिस भलाई को लक्ष्य करती है वह विस्तार में असीम है, तो दण्ड भी वैसा ही होना चाहिए।

इस प्रकार शासकीय न्याय अन्तहीन दण्ड की माँग करता है; नहीं तो वह सार्वजनिक भलाई के लिए कोई पर्याप्त गारंटी नहीं देता।

फिर, व्यवस्था अनन्त भलाई को सुनिश्चित करने का न केवल अभिप्राय रखती है, बल्कि उसकी प्रवृत्ति भी यही है। उसकी प्रवृत्तियाँ सीधे इसी उद्देश्य की ओर हैं। इसलिए उसका दण्ड अनन्त होना चाहिए। व्यवस्था उन हितों के प्रति न्यायपूर्ण नहीं है जिन्हें वह सुनिश्चित करने का लक्ष्य भी रखती है और प्रवृत्ति भी, जब तक वह स्वयं को अनन्त प्रतिफल-विधानों से सुसज्जित न करे।

अनन्त दण्ड से कम कुछ भी उस महान उद्देश्य के मूल्य के विषय में परमेश्वर के विचार की पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं हो सकता, जिस पर उसका मन लगा है। जब मनुष्य यह कहते हैं कि अनन्त मृत्यु पाप के लिए बहुत बड़ा दण्ड है, तो सारे नैतिक विश्व में पाप को रोकने के परमेश्वर के प्रयत्नों के विषय में वे क्या सोचते हैं? उसके अति प्रिय पुत्र की मृत्यु के विषय में वे क्या सोचते हैं? क्या वे समझते हैं कि यह सम्भव है कि परमेश्वर अन्तहीन से कम किसी दण्ड के द्वारा पाप के प्रति अपनी घृणा की पर्याप्त या उसके अनुरूप अभिव्यक्ति कर सके?

इससे कम कुछ भी व्यवस्था के अधिकार के प्रति उसके आदर की पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता।

ओह, यदि परमेश्वर उस व्यवस्था की पवित्रता के प्रति, जिस पर उसके सारे विशाल राज्य का सम्पूर्ण कल्याण टिका है, अपने आदर की पर्याप्त अभिव्यक्ति करने से चूक जाए, तो उसके परिणाम कितने भयानक होंगे, और यह विचार ही कितना चौंका देनेवाला है!

आप यह आग्रह करेंगे कि वह अपनी व्यवस्था के उल्लंघन को वैसे ही देखे जैसे यूनिवर्सलिस्ट देखते हैं। यदि वह

आपकी माँगों के आगे झुक जाए, तो वह निश्चय ही अपने सब बुद्धिमान प्राणियों पर विनाश का हिमस्खलन ले आएगा! यदि वह अपनी व्यवस्था के साथ अन्तहीन दण्ड से कम कुछ भी जोड़ दे, तो कौन सा पवित्र प्राणी उसके शासन के प्रबन्ध पर भरोसा कर सकेगा!

सार्वजनिक भलाई के प्रति उसका आदर उसे अपनी व्यवस्था के साथ कोई हल्का या सीमित दण्ड जोड़ने से रोकता है।

वह अपनी प्रजा से बहुत अधिक प्रेम करता है। कुछ लोगों के मन में इस विषय में विचित्र धारणाएँ हैं कि किसी शासक को अपनी प्रजा के प्रति अपना आदर किस प्रकार प्रकट करना चाहिए। वे चाहेंगे कि वह दोषियों के प्रति इतना कोमल-हृदय हो कि वे उसकी सारी सहानुभूति और आदर को अपने में समेट लें। वे शायद उसे हत्या के अपराध के लिए छह पेंस के जुर्माने का दण्ड ठहराने देंगे, परन्तु उससे अधिक बहुत कुछ, यदि कुछ भी, नहीं। बेचारे हत्यारे की पत्नी और बच्चे इतने अनमोल हैं कि आपको उसका अधिक धन नहीं छीनना चाहिए, और जहाँ तक उसकी स्वतन्त्रता या उसके प्राण को छूने की बात है—इन दोनों में से किसी के विषय में सोचना भी नहीं चाहिए।

क्या! क्या आप नहीं जानते कि मानव स्वभाव बहुत दुर्बल और परीक्षा में पड़नेवाला है, और इसलिए आपको हत्या के दण्डों के विषय में बहुत कम कठोरता बरतनी चाहिए? शायद वे कहेंगे, आप हत्यारे को एक रात जगाए रखकर दण्ड दे सकते हैं—केवल एक रात, अधिक नहीं; और परमेश्वर हत्या के अपराध के लिए किसी दोषी मनुष्य के विवेक को लगभग इतनी ही मात्रा तक उसे परेशान करने दे सकता है! यूनिवर्सलिस्ट हमें सचमुच यह बताते हैं कि वे परमप्रधान परमेश्वर को इतनी अनुमति देंगे कि यदि कोई मनुष्य हत्या करे तो वह उसे ऐसा विवेक दे जो उसे थोड़ा सा परेशान करे—थोड़ा सा, मान लीजिए पहले और शायद दूसरे अपराध के लिए; परन्तु वे इस तथ्य पर ध्यान देने के आदी नहीं हैं कि परेशान करनेवाले विवेक के इस दण्ड के अधीन, मनुष्य जितना अधिक पाप करता है, उसे उतना ही कम दुख उठाना पड़ता है। इस घटते हुए पैमाने के काम करने से शीघ्र ही यह स्थिति आ जाएगी कि हत्यारे को एक रात की नींद खोने जितना दण्ड भी नहीं मिलेगा। परन्तु जब मनुष्य सीधी विवेक-बुद्धि की पुष्टियों से और परमेश्वर के प्रकट किए हुए वचन से पूरी तरह हटकर चलते हैं, तो वे ऐसी ही धारणाओं पर पहुँचते हैं।

अब उन लोगों से बात करते हुए जिनके पास उचित बात की पुष्टि करने के लिए नैतिक बोध है और व्यवस्था के काम को देखने के लिए आँखें भी हैं, मैं जानता हूँ कि आप परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था के लिए मृत्युदण्ड की तार्किक आवश्यकता का इन्कार नहीं कर सकते। इनमें से हर एक प्रस्थापना में एक ऐसी तार्किक पकड़ है जिससे आप बच नहीं सकते।

अनन्त और अन्तहीन से कम कोई भी दण्ड पाप के विरुद्ध परमेश्वर की अप्रसन्नता की, और उसका विरोध करने और उसे दण्ड देने के उसके दृढ़ संकल्प की पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं हो सकता। दण्ड तब तक चलते रहना चाहिए जब तक उससे प्रभावित होनेवाली प्रजा है—जब तक पाप के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और उसके शासकीय व्यवहार के किसी प्रदर्शन की आवश्यकता है।

इससे कम कुछ भी वह सबसे बड़ा दण्ड नहीं है जो परमेश्वर दे सकता है, क्योंकि वह निश्चय ही अन्तहीन और अनन्त दण्ड दे सकता है। इसलिए यदि परिस्थिति उस सबसे बड़े दण्ड की माँग करती है जो वह दे सकता है, तो दण्ड यही होना चाहिए—परमेश्वर से निर्वासन और अन्तहीन मृत्यु।

परन्तु अब मुझे आगे बढ़कर यह कहना है कि सुसमाचार भी सब कहीं यही बात मानकर चलता है। वह यह मानता है कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी परमेश्वर के सामने धर्मी नहीं ठहर सकता। वास्तव में, वह न केवल इसकी पुष्टि करता है, बल्कि अपनी प्रायश्चित और अनुग्रह की सारी व्यवस्था इसी नींव पर खड़ी करता है। वह निरन्तर यह मानकर चलता है कि ऋण चुकाने और दायित्व को रद्द करने जैसी कोई बात है ही नहीं, और इसलिए पापी का एकमात्र छुटकारा छुड़ानेवाले लहू के द्वारा मिलनेवाली क्षमा है।

फिर एक बार, यदि दण्ड अन्तहीन मृत्यु नहीं है, तो वह क्या है? क्या वह अस्थायी दुख है? तो वह कितने समय तक रहता है? वह कब समाप्त होता है? क्या कभी कोई पापी उसे पार कर चुका है; अपना

समय पूरा करके स्वर्ग में ले जाया गया है? ऐसे किसी मामले को सिद्ध करने के लिए हमारे पास कोई गवाही नहीं है, एक की भी नहीं; परन्तु यह सिद्ध करने के लिए कि ऐसा मामला कभी हो ही नहीं सकता, हमारे पास यीशु मसीह की गम्भीर गवाही है। वह हमें बताता है कि नरक से स्वर्ग में या स्वर्ग से नरक में जाना हो ही नहीं सकता।

बीच में एक भारी गड़हा ठहराया गया है, जिसे कोई कभी पार न करेगा। आप पृथ्वी से स्वर्ग में जा सकते हैं, या पृथ्वी से नरक में; परन्तु भविष्य के संसार की ये दोनों दशाएँ एक-दूसरे के दूर के छोर हैं, और कोई मनुष्य या स्वर्गदूत उस गड़हे को पार न करेगा जो उन्हें अलग करता है।

परन्तु आप मेरे प्रश्न का—दण्ड क्या है?—यह उत्तर देते हैं—यह केवल पाप के वे स्वाभाविक परिणाम हैं जो परेशान विवेक में प्रकट होते हैं। तब इससे यह निकलता है कि मनुष्य जितना अधिक पाप करता है, उसे उतना ही कम दण्ड मिलता है, यहाँ तक कि दण्ड घटते-घटते इतना नगण्य रह जाता है कि पापी उसकी कुछ भी परवाह नहीं करता। इस पर कौन विश्वास कर सकता है? इस व्यवस्था के अनुसार, यदि कोई मनुष्य दण्ड से डरता है, तो उसे केवल इतना करना है कि और अधिक इच्छा और शक्ति के साथ पाप में कूद पड़े; उसे यह अनुभव करने की सान्त्वना मिलेगी कि वह बहुत शीघ्र अपनी सारी आत्म-ग्लानि से पार पा सकता है, और हर प्रकार के दण्ड से परे पहुँच सकता है! और क्या आप विश्वास करते हैं कि पाप के लिए परमेश्वर का केवल यही दण्ड है?

आप इस पर विश्वास नहीं कर सकते।

यूनिवर्सलिस्ट सदा अनुशासन को दण्डात्मक विधानों के साथ मिलाकर गड़बड़ कर देते हैं। वे इस मूलभूत भेद को अनदेखा करते हैं और जो कुछ भी मनुष्य यहाँ इस संसार में दुख उठाते हैं, उस सबको केवल दण्डात्मक मानते हैं।

जबकि वह शायद ही दण्डात्मक है, वरन् मुख्य रूप से अनुशासनात्मक है। वे पूछते हैं, किसी पापी को अन्तहीन नरक में भेजने से उसकी क्या भलाई होगी? क्या परमेश्वर पूर्ण रूप से परोपकारी नहीं है; और यदि है, तो

उसका इसके अतिरिक्त कोई और उद्देश्य कैसे हो सकता है कि वह पापी की जितनी भलाई कर सकता है, करे?

मैं उत्तर देता हूँ, दण्ड का अभिप्राय उस पापी की भलाई करना नहीं है जिसे दण्ड दिया जाता है। उसकी दृष्टि किसी और, अधिक दूर की, और कहीं बड़ी भलाई पर है। जब वह पृथ्वी पर था, तब अनुशासन मुख्य रूप से उसकी व्यक्तिगत भलाई चाहता था; दण्ड दूसरे परिणामों की ओर देखता है। यदि आप पूछें, क्या परमेश्वर दण्ड के द्वारा सारी सार्वजनिक प्रजा की भलाई करने का लक्ष्य नहीं रखता? तो मैं उत्तर देता हूँ, हाँ, ऐसा ही है; ठीक यही वह करना चाहता है।

मानवीय शासनों में दण्ड का लक्ष्य कुछ हद तक सुधारना भी हो सकता है। उस हद तक वह अनुशासन है।

परन्तु मृत्युदण्ड—जब सारा स्थगन बीत चुका होता है और घातक प्रहार आ पड़ता है—सुधारने का लक्ष्य नहीं रखता, और वह अनुशासन नहीं, केवल दण्ड है। दोषी मनुष्य को विशाल सार्वजनिक वेदी पर रखा जाता है और सार्वजनिक भलाई के लिए बलि बना दिया जाता है। इसका उद्देश्य जनता के मन पर अपराध की बुराई और उसके परिणामों की भयानकता की एक भयावह, भीषण छाप डालना है। अनुशासन व्यवस्था को सम्भालने की ओर उतना नहीं देखता जितना अपराधी को वापस लाने की ओर। परन्तु न्याय के दिन का खोए हुए पापी को सुधारने से कोई सम्बन्ध नहीं है। वह दिन और उसके सब परिणाम पूरी तरह दण्डात्मक हैं। यह विचित्र बात है कि इन स्पष्ट तथ्यों को अनदेखा कर दिया जाए।

एक और बात है जिसकी अक्सर उपेक्षा की जाती है, अर्थात् यह कि अनुशासन के किसी भी सुरक्षित प्रबन्ध के नीचे एक नैतिक व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए, जो पर्याप्त और भयानक प्रतिफल-विधानों से सम्भाली गई हो, ताकि व्यवस्थादाता का अधिकार सुरक्षित रहे और उसके शासन का प्रताप और सम्मान बना रहे। अनुशासन की किसी व्यवस्था पर भरोसा करना सुरक्षित न होगा, और वास्तव में यह आशा नहीं की जा सकती कि वह विनाश में पड़े हुओं को अधिक बल से पकड़ सकेगी, यदि वह व्यवस्था और दण्ड की किसी व्यवस्था से सम्भाली न गई हो। जो पापी सुधरा नहीं, उस पर आनेवाला यह दण्डात्मक प्रहार एक भयावह तथ्य के रूप में सदा खड़ा रहना चाहिए, यह दिखाने के लिए कि न्याय पूरा हुआ, व्यवस्था की रक्षा हुई, परमेश्वर का सम्मान हुआ; और पाप की बुराई की, और उसके विरुद्ध परमेश्वर के अनन्त विरोध की एक स्थायी और भयानक छाप डालने के लिए।

टिप्पणियाँ — हम भविष्य के दण्ड के विरुद्ध बहुत से कुतर्क सुनते हैं। इन पर हमें इतना आश्चर्य न होता, यदि यह तथ्य न होता कि सुसमाचार इस सत्य को मानकर चलता है, और फिर एक उपाय प्रस्तुत करता है।

कोई स्वाभाविक रूप से यह समझेगा कि जब केवल व्यवस्था के सम्बन्धों पर विचार किया जाता है, तो मन उन भयानक निष्कर्षों से पीछे हटेगा जिनकी ओर वह धकेला जाता है; परन्तु जब सुसमाचार बचाने के लिए बीच में आता है, तब यह अत्यन्त विचित्र हो जाता है कि मनुष्य सुसमाचार की वास्तविकता को तो स्वीकार करें, और फिर भी व्यवस्था और उसके दण्डों को अस्वीकार करें। वे अनुग्रह की बात करते हैं; परन्तु अनुग्रह से उनका क्या अर्थ है? जब मनुष्य पाप के तथ्य का ही इन्कार करते हैं, तो सुसमाचार में अनुग्रह के लिए न कोई स्थान रहता है, न कोई अवसर। नाममात्र को पाप के तथ्य को स्वीकार करते हुए, परन्तु वास्तव में उसके दोष का इन्कार करते हुए, अनुग्रह केवल एक नाम रह जाता है। परमेश्वर की व्यवस्था के प्रतिफल-विधानों को ठुकराते हुए, और उनकी वास्तविकता को झूठा सिद्ध करने में परिश्रम करते हुए, मनुष्यों को यह दावा करने का क्या अधिकार है कि वे सुसमाचार का आदर करते हैं? वे उसे केवल एक तमाशा बना देते हैं—या कम से कम व्यवस्था के प्रबन्ध के अधीन अनुचित रूप से कठोर विधान की क्षतिपूर्ति की एक व्यवस्था। जो मनुष्य व्यवस्था की इस प्रकार निन्दा करते हैं, वे यह न समझें कि वे परमेश्वर के सुसमाचार की सराहना करके उसका आदर करते हैं!

दुष्टों के अन्तिम दण्ड के विषय में बाइबल के चित्रण अत्यन्त प्रभावशाली हैं। आत्मिक सत्य प्राकृतिक वस्तुओं के द्वारा प्रकट किए गए हैं: उदाहरण के लिए, स्वर्गीय दशा के वैभव और महिमा को प्रस्तुत करने के लिए नए यरूशलेम के फाटक और शहरपनाह। एक आत्मिक दूरबीन हमारे हाथों में दी गई है; हमें उसे उस महिमामय नगर की ओर लगाने की अनुमति है “जिसका रचने और बनानेवाला परमेश्वर है;” हम उसके भीतरी पवित्रस्थान को देख सकते हैं, जहाँ आराधना करनेवाली सेनाएँ निरन्तर परमेश्वर की स्तुति करती हैं। हम उनके लहराते हुए श्वेत वस्त्र देखते हैं—उनके हाथों में विजय की खजूर की डालियाँ—उनके चेहरों पर चमकता आनन्द—उनके प्राणों में अवर्णनीय आनन्द के प्रकटीकरण। यह प्रतीकों में चित्रित स्वर्ग है। कौन समझता है कि इसका अभिप्राय अतिशयोक्ति है?

कौन इन चित्रणों पर यह दोष लगाता है कि ये वाणी में बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए हैं, मानो इनका उद्देश्य बात को बढ़ाकर बताना, या अनुचित आशाएँ जगाना हो? कोई मनुष्य ऐसा नहीं मानता। बाइबल स्वर्ग के विषय में जो कहती है, उसके विरुद्ध कोई मनुष्य कभी यह दोष नहीं लगाता। चित्रण की यह आलंकारिक शैली अपनाने का उद्देश्य क्या है? निस्सन्देह, उद्देश्य तथ्यों की सबसे अच्छी सम्भव धारणा देना है।

फिर हमारे सामने दूसरा पक्ष है। परदा उठाया जाता है, और आप नरक के ठीक किनारे तक आते हैं कि देखें वहाँ क्या है। जहाँ एक ओर सब कुछ महिमामय था, वहाँ दूसरी ओर सब कुछ भयानक और भयावहताओं से भरा है।

एक अथाह कुण्ड है। एक अमर प्राण उसमें डाला जाता है; वह डूबता है और डूबता है और डूबता चला जाता है, उस भयानक कुण्ड में नीचे जाता हुआ जिसका कोई तल नहीं, नीचे जाते हुए रोता और विलाप करता है, और आप उसकी कराहें सुनते हैं जब वे दुख की उस भयावह गुफा की दीवारों से टकराकर गूँजती और फिर-फिर गूँजती हैं!

यह एक और चित्र है। आपके सामने “आग और गन्धक की झील” है, और आप खोए हुए पापियों को उसकी उमड़ती आग की लहरों में फेंके जाते देखते हैं; और वे उसके जलते हुए किनारे पर छटपटाते हैं, और पीड़ा के मारे अपनी जीभ चबाते हैं। वहाँ उनका कीड़ा नहीं मरता, और आग नहीं बुझती, और “पानी की एक बूँद भी” उन तक “उनकी जीभ को ठंडी करने” के लिए नहीं पहुँच सकती—“उस ज्वाला में तड़पते हुए।”

आप क्या सोचते हैं? क्या परमेश्वर ने ये बातें हमारे बेचारे प्राणों को डराने के लिए कही हैं? क्या वह अपने मनोरंजन के लिए हमारे भय से खेलना चाहता था? क्या आप ऐसा सोच सकते हैं? नहीं, क्या इससे उलटे उसका हृदय दुखी नहीं होता कि उसे ऐसा नरक बनाना पड़ता है, और उसमें उन पापियों को डालना पड़ता है जो उसकी व्यवस्था का आदर नहीं करेंगे—उसके अनुग्रह के द्वारा पाप करने से उद्धार को ग्रहण नहीं करेंगे? आह, मृत्यु की लहरें उस पवित्र और करुणामय की आँखों के नीचे अन्धकारमय होकर लुढ़कती हैं! उसे पापी के मरने से कुछ भी प्रसन्नता नहीं होती! परन्तु उसे अपना सिंहासन सम्भाले रखना है, और यदि हो सके तो अपनी स्वामिभक्त प्रजा को बचाना है।

एक और दृश्य की ओर मुड़िए। यह एक मृत्यु-शय्या है। क्या आपने कभी किसी पापी को मरते देखा है? क्या आप उस दृश्य का वर्णन कर सकते हैं? क्या वह कोई मित्र था, कोई सम्बन्धी, आपके हृदय का प्रिय, अति प्रिय? उसे मरने में कितना समय लगा? क्या आपको ऐसा लगा कि मृत्यु की यह पीड़ा कभी समाप्त ही न होगी? जब मेरी अन्तिम सन्तान मरी, तो संघर्ष लम्बा था; ओह, वह भयानक रूप से लम्बा और पीड़ादायक था—चौबीस घण्टे शरीर के टूटते जाने की पीड़ाओं में! इससे मेरा जी घबरा गया—मैं उसे देख न सका! परन्तु मान लीजिए वह अब तक चलता रहता। ऐसा दृश्य देखने की वेदना और स्नायविक थकावट से मैं स्वयं कब का मर गया होता। हमारे सब मित्र भी ऐसे ही मर जाते। ऐसी भयानक मृत्यु के अन्तिम अन्त तक कौन जीवित रह सकता? कौन यह न पुकार उठता, “हे मेरे परमेश्वर, इसे छोटा कर दे, दया करके इसे छोटा कर दे!” जब मेरी पत्नी मरी, तो उसका मृत्यु-संघर्ष लम्बा और हृदय-विदारक था। यदि आप वहाँ होते, तो आप परमेश्वर से बड़े ज़ोर से पुकारते, “इसे छोटा कर दे! ओह, इसे छोटा कर दे और इस भयानक पीड़ा से छुटकारा दे!” परन्तु मान लीजिए वह चलता रहता, आगे और आगे, दिन और रात—दिन पर दिन, अपने धीरे-धीरे सरकते घण्टों में से होकर, और रात पर रात—लम्बी रातें, मानो कोई भोर हो ही नहीं सकती। हमारे मूल पाठ का रूपक एक अनन्त मरते रहने की कल्पना करता है। आइए, हम ऐसी एक स्थिति की कल्पना करें।

मान लीजिए यह सचमुच सहानुभूति रखनेवाले मित्रों के किसी प्रिय घेरे में घटित हो। एक बेचारा मनुष्य मर नहीं सकता! वह मृत्यु-पीड़ा में एक महीना, एक वर्ष, पाँच वर्ष, दस वर्ष पड़ा रहता है—यहाँ तक कि उसके सब मित्र टूट जाते हैं, और उस दृश्य की असहनीय भयावहता के नीचे अपनी कब्रों में जा पड़ते हैं: परन्तु फिर भी वह बेचारा मनुष्य मर नहीं सकता! वह एक पीढ़ी से अधिक जीवित रहता है—फिर दूसरी और फिर तीसरी से; सौ वर्ष तक वह प्राणघातक पीड़ा में मरता रहता है, और फिर भी अन्त के कुछ भी निकट नहीं आता! ऐसे दृश्य के विषय में आप क्या सोचेंगे? यह एक उदाहरण होगा—बस इतना ही—भयानक “दूसरी मृत्यु” का एक दुर्बल सा उदाहरण!

परमेश्वर चाहता है कि हम समझें कि पाप कितनी भयानक वस्तु है, और वह कैसे भयानक दण्ड के योग्य है। वह ऐसे रूपकों के द्वारा हमें यह दिखाना चाहता है कि हठी पापी का अन्त कितना भयंकर होगा। क्या आपने कभी किसी पापी को मरते देखा है? और क्या आप पुकार नहीं उठे—निश्चय ही परमेश्वर का शाप इस संसार पर भारी होकर पड़ा है! आह, यह तो उस अधिक भारी शाप का एक धुँधला सा प्रतीक मात्र है जो “दूसरी मृत्यु” में आता है!

मूल पाठ यह पुष्टि करता है कि मृत्यु “पाप की मजदूरी” है। यह ठीक वही है जिसके योग्य पाप है। परिश्रम मजदूरी कमाता है, और ऐसे पारिश्रमिक पर एक उचित दावा उत्पन्न करता है। इसी प्रकार यह माना गया है कि जब मनुष्य पाप करते हैं तो वे मजदूरी कमाते हैं। वे अपने वेतन के अधिकारी हो जाते हैं। परमेश्वर स्वयं को उन्हें उनकी भली-भाँति कमाई हुई मजदूरी देने के लिए बाध्य समझता है।

जैसा मैंने अक्सर कहा है, यदि कोई आशा और कोई दया सम्भव न होती, तो मैं आपके प्राणों को दुखी करने के लिए इस दिशा में एक शब्द भी न कहता। क्या मैं आपको समय से पहले पीड़ा दूँ? परमेश्वर

न करे! क्या मैं वह भयानक दण्ड आपके सामने रखूँ, और आपसे कहूँ कि कोई आशा नहीं है? नहीं। मैं ये बातें इसलिए कहता हूँ कि आप अनुभव करें कि आपको अपना प्राण लेकर भाग निकलने की आवश्यकता है।

इस पर विचार कीजिए: “पाप की मजदूरी तो मृत्यु है!” परमेश्वर एक ऐसा स्मारक खड़ा करना चाहता है जो सारे विश्व में यह घोषणा करे—भय मानो और पाप मत करो! ताकि जब कभी वे इस भयानक अभिव्यक्ति पर दृष्टि करें, तो वे कहें—पाप कितनी भयानक वस्तु है! लोग यह चिल्लाने के आदी हैं—ओह, दण्ड कितना भयंकर है! वे पाप के भयंकर दोष और उसकी दण्ड-योग्यता को अनदेखा करने के लिए बहुत ही तत्पर रहते हैं! जब परमेश्वर किसी पापी को हमारी आँखों के सामने उसकी मृत्यु-शय्या पर लिटाता है, तो वह हमें पाप के दण्ड पर दृष्टि करने का निमन्त्रण देता है। वहाँ वह पड़ा है, तड़पता हुआ, कराहता हुआ, काँपता हुआ, पीड़ा से छटपटाता हुआ, फिर भी वह जीवित है, और जीवित रहता चला जाता है। मान लीजिए वह इस मरणासन्न दशा में एक दिन, एक सप्ताह, एक महीना, एक वर्ष, बीस वर्ष, एक शताब्दी, एक हज़ार वर्ष, एक हज़ार युग जीवित रहता है, और फिर भी जीवित रहता चला जाता है,

“सदा मरता हुआ, फिर भी कभी मृत नहीं:” अन्त में विश्व टल जाता है; आकाश पुस्तक के पत्र के समान लपेट दिया जाता है—और तब क्या? वहाँ वह दुख उठानेवाला अब भी पड़ा है। वह ऊपर देखता है और पुकार उठता है,

“कब तक, ओह, कब तक?” अनन्त मृत्यु के घण्टे की शोक-ध्वनि के समान उत्तर उस पर उतरता है, “अनन्तकाल तक, अनन्तकाल तक।” अनन्त युगों का एक और चक्र बीत जाता है, और वह फिर साहस करके पूछता है, कब तक? और फिर उत्तर लौटकर गूँजता है, “अनन्तकाल तक, अनन्तकाल तक!” ओह, यह भयानक उत्तर पीड़ा और निराशा के सारे लोकों में से होकर कैसे गरजता हुआ उतरता है!

हमें बताया गया है कि पृथ्वी के दृश्यों की अन्तिम समाप्ति पर, “न्याय होने लगेगा और पुस्तकें खोली जाएँगी।” हम वहाँ होंगे, और इससे भी बढ़कर, वहाँ हम अपने प्रभु के साथ अपना हिसाब चुकता करेंगे और अपना भाग पाएँगे। उस अन्तिम हिसाब के दिन आप क्या लेंगे? पाप की मजदूरी? क्या आप कहते हैं, “मुझे मेरी मजदूरी दो—मुझे मेरी मजदूरी दो; मैं मसीह का ऋणी नहीं रहूँगा?” हे पापी, वह आपको मिलेगी। परमेश्वर आपको बिना चूके और बिना कमी किए चुका देगा। उसने सब आवश्यक प्रबन्ध कर रखे हैं, और आपकी मजदूरी तैयार रखी है। परन्तु सावधान रहिए कि आप क्या करते हैं! अपनी अन्तिम छलाँग लगाने से पहले एक बार फिर देख लीजिए। शीघ्र ही परदा गिर जाएगा, परख का समय बन्द हो जाएगा, और सारी आशा नष्ट हो चुकी होगी। तब मैं कहाँ होऊँगा? और आप, कहाँ?

दाहिनी ओर या बाईं ओर?

बाइबल नरक को स्वर्ग की दृष्टि में स्थित बताती है। उनकी पीड़ा का धुआँ, जब वह युगानुयुग ऊपर उठता है, स्वर्गीय नगर की ऊँचाइयों से पूरी तरह दिखाई देता है। वहाँ आप स्तुति और आराधना करते हैं; परन्तु जब आप दूर उस ओर दृष्टि डालते हैं जहाँ वह धनवान पड़ा था, तो आप देखते हैं कि पाप करने का मूल्य क्या है। वहाँ उनकी जलती जीभों को ठंडा करने के लिए पानी की एक बूँद भी नहीं पहुँच सकती। वहाँ से उनकी पीड़ा का धुआँ सदा-सर्वदा उठता और उठता रहता है। आज आप जो करते हैं, उसमें सावधान रहिए!

मान लीजिए आप एक विशाल ज्वालामुखी के मुख में झाँक रहे हैं, जहाँ पिघले हुए लावे की लहरें उबलती और ऊपर उमड़ती हैं, और लुढ़कती और फूलती हैं, और बार-बार विशाल ढेर उगलती हैं जो नीचे के मैदानों को डुबा देते हैं।

अपने जीवन में एक बार मैं एटना के सामने खड़ा हुआ, और मैंने उसके भयानक मुख में नीचे दृष्टि डाली। मैं यह पुकारे बिना न रह सका, “भयंकर, भयंकर!” मैंने कहा, वहाँ नरक का एक चित्र है! हे पापी, नरक के विषय में सोचिए, और अपने आपको उसमें धकेले जाते हुए सोचिए। वह सदा अपने धुएँ और ज्वाला के अम्बार उगलता रहता है, कभी रुकता नहीं, कभी चुकता नहीं। उस दृश्य को विश्व देख सकता है और उसमें पढ़ सकता है, “पाप की मजदूरी तो मृत्यु है! ओह, पाप मत करो, क्योंकि जिस पापी को क्षमा नहीं मिली उसका अन्त ऐसा है!” सोचिए, परमेश्वर के शासन में यह कैसा प्रमाण है! यह उसके पवित्र न्याय का, और उसके सारे विशाल राज्य में पवित्रता और आनन्द के हितों को बनाए रखने के उसके अटल संकल्प का कैसा प्रदर्शन है! क्या यह परमेश्वर के, और उसकी नैतिक शासन की महान योजना की पवित्रता के योग्य नहीं है?

हे पापी, आप अब इस भयानक अन्त से बच सकते हैं। यही कारण है कि परमेश्वर ने अपने विश्वासयोग्य वचन में नरक को प्रकट किया है। और अब क्या यह प्रकाशन आपके लिए व्यर्थ, बल्कि व्यर्थ से भी बुरा, ठहरेगा?

आप क्या सोचेंगे यदि यह सारी मंडली किसी अदम्य शक्ति के द्वारा धकेलकर नरक के ठीक किनारे तक पहुँचा दी जाए: परन्तु ठीक जब ऐसा लगे कि हम सब उस भयानक किनारे से नीचे धकेल दिए जाने को हैं, एक स्वर्गदूत दौड़ता हुआ भीतर आए, मानो साराप की तुरही के स्वर से पुकारता हुआ, “उद्धार सम्भव है—परमेश्वर की महिमा हो, परमेश्वर की महिमा हो, परमेश्वर की महिमा हो!”

आप ऊँचे स्वर से पुकार उठते हैं—क्या यह सम्भव है? हाँ, हाँ, वह पुकारता है, मुझे अपनी चौड़ी, प्रेम भरी बाँहों में आपको उठाने दीजिए, और आपको यीशु के चरणों तक ले जाने दीजिए, क्योंकि वह बचाने में सामर्थी है और बचाने को तैयार भी!

क्या यह सब केवल बातें ही हैं? ओह, यदि मैं अपने होंठों को स्वर्ग की ओस से भिगो सकता, और अपनी जीभ को उसके वाक्-पटुता के सोतों में नहला सकता, तब भी मैं इन वास्तविकताओं का वर्णन न कर पाता।

हे मसीही लोगो, क्या आप थोड़ी सी सम्पत्ति पाने के लिए हिसाब पर हिसाब लगाते फिरते हैं, और फिर भी प्राणों की उपेक्षा करते हैं? सावधान रहिए, कहीं आप उन प्राणों का नाश न कर दें जो फिर कभी जीवित नहीं हो सकते! क्या आप कहते हैं—मैंने सोचा था कि वे यह सब जानते हैं? वे आपको उत्तर देते हैं, “मैंने नहीं सोचा था कि आप स्वयं इसके एक शब्द पर भी विश्वास करते हैं। आपने ऐसा आचरण नहीं किया मानो आप विश्वास करते हों। क्या आप स्वर्ग जा रहे हैं? तो ठीक है, मैं नीचे नरक में जा रहा हूँ! अब मेरे लिए कोई सहायता नहीं है। तब आप कभी-कभी मुझे याद करेंगे, जब आप महिमामय आकाश के आर-पार मेरी पीड़ा का धुआँ अन्धकारमय होकर उठते देखेंगे। जब मुझे वहाँ बहुत, बहुत समय हो चुका होगा, तब आप कभी-कभी सोचेंगे कि मैं, जो कभी आपके पास रहता था, वहाँ हूँ। ओह, स्मरण रखिए, तब आप मेरे लिए प्रार्थना नहीं कर सकेंगे; परन्तु आपको यह स्मरण आएगा कि एक समय था जब आप मुझे चेतावनी दे सकते थे और मुझे बचा सकते थे।”

ओह, मुझे लगता है, यदि स्वर्ग में कड़वाहट हो सकती है, तो वह ऐसे ही किसी मार्ग से प्रवेश करेगी और वहाँ आपके आनन्द को बिगाड़ देगी!

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