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पाठ: “और यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धार्मिक यीशु मसीह।
और वही हमारे पापों का प्रायश्चित है: और केवल हमारे ही नहीं, वरन् सारे जगत के पापों का भी।”—1 यूहन्ना 2:1, 2 बाइबल शासन-व्यवस्था से लिए गए दृष्टान्तों से भरी पड़ी है। ये हमारी शिक्षा के लिए दिए गए हैं; परन्तु यदि हम इनसे शिक्षा पाते हैं, तो इसका कारण यह है कि परमेश्वर के शासन और मानवीय शासनों के बीच बहुत सी बातों में वास्तविक समानता है।
मैं इन बातों की जाँच करना चाहता हूँ: I. वकील (सहायक) क्या है?
I. वकील (सहायक) क्या है?
जब यह शब्द किसी शासकीय पद या सम्बन्ध को व्यक्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है, तब वकील का अर्थ क्या होता है?
वकील वह है जो किसी दूसरे का मुकद्दमा लड़ता है; जो किसी दूसरे का प्रतिनिधित्व करता है और उसके नाम से कार्य करता है; जो किसी दूसरे के अनुरोध पर उसके पक्ष में अपने प्रभाव का उपयोग करता है।
II. वे उद्देश्य जिनके लिए वकील नियुक्त किया जा सकता है।
II. वे उद्देश्य जिनके लिए वकील नियुक्त किया जा सकता है।
1. न्याय प्राप्त कराने के लिए, यदि न्याय से सम्बन्धित कोई प्रश्न न्यायालय में विचार के लिए आए।
2. अभियुक्त का बचाव करने के लिए। यदि किसी पर कोई अपराध करने का आरोप लगाया गया हो, तो उसकी ओर से उसके मुकद्दमे की पैरवी करने के लिए; आरोप के विरुद्ध उसका बचाव करने के लिए, और यदि सम्भव हो तो उसे दोषी ठहराए जाने से बचाने के लिए वकील नियुक्त किया जा सकता है।
3. जब किसी अपराधी को न्याय के अनुसार दण्ड की आज्ञा दी जा चुकी हो और वह सज़ा के अधीन हो, तब उसके लिए क्षमादान प्राप्त करने के लिए वकील नियुक्त किया जा सकता है। अर्थात्, वकील या तो अपने मुवक्किल के लिए न्याय प्राप्त कराने के लिए, या दण्ड की आज्ञा हो जाने पर उसके लिए दया प्राप्त करने के लिए नियुक्त किया जा सकता है; उसे या तो इसलिए नियुक्त किया जा सकता है कि अपराधी दोषी न ठहराया जाए, या दोषी ठहराए जाने के बाद इसलिए कि अपराधी पर व्यवस्था का दण्ड लागू होने से रोक दिया जाए।
III. वह किस अर्थ में मसीह पापियों का वकील है।
III. वह किस अर्थ में मसीह पापियों का वकील है।
वह पापियों का मुकद्दमा लड़ने के लिए नियुक्त है, परन्तु न्याय के कटघरे के सामने नहीं; पाप के आरोप के विरुद्ध उनका बचाव करने के लिए भी नहीं, क्योंकि उनके दोषी होने का प्रश्न तो पहले ही निपट चुका है। बाइबल उन्हें ऐसे लोगों के रूप में दिखाती है जो दोषी ठहर चुके हैं; और तथ्य भी यही है, जैसा कि हर पापी जानता है।
संसार का हर पापी जानता है कि उसने पाप किया है, और इसलिए परमेश्वर की व्यवस्था के द्वारा उसका दोषी ठहराया जाना निश्चित है। तो फिर मसीह पापियों के सम्बन्ध में यह पद न्याय के कटघरे के सामने नहीं, वरन् अनुग्रह के सिंहासन के सामने, सर्वोच्च दया के पाँवों की चौकी के सामने निभाता है। वह इसलिए नियुक्त नहीं है कि पापी को दोषी ठहराए जाने से रोके, वरन् इसलिए कि उस पर दण्ड लागू होने से रोके; इसलिए नहीं कि उसे दोषी ठहराए जाने से बचाए, वरन् इसलिए कि जो पहले से दोषी ठहर चुका है, उसे नरक-दण्ड पाने से बचाए।
IV. उसके पापियों का वकील होने में क्या-क्या बातें निहित हैं।
IV. उसके पापियों का वकील होने में क्या-क्या बातें निहित हैं।
1. उसका न्याय के कटघरे के सामने नहीं, वरन् अनुग्रह के सिंहासन के सामने पापियों के लिए—पापी होने के नाते उनके लिए—विनती करने को नियुक्त होना; उनके लिए नहीं जिन पर केवल पाप का आरोप लगा है परन्तु आरोप सिद्ध नहीं हुआ। इसमें यह निहित है कि पापी का दोष पहले ही निश्चित हो चुका है, दोषी होने का निर्णय सुनाया जा चुका है, व्यवस्था की सज़ा घोषित की जा चुकी है, और पापी अपने दण्ड के कार्यान्वयन की प्रतीक्षा कर रहा है।
2. परमेश्वर के द्वारा उसका पापियों के वकील के रूप में नियुक्त किया जाना यह प्रकट करता है कि परमेश्वर का स्वभाव दयालु है। यदि परमेश्वर पापियों के प्रति दया का भाव न रखता, तो कोई वकील नियुक्त न किया जाता, और क्षमा का कोई प्रश्न ही न उठता।
3. इसमें यह भी निहित है कि कुछ शर्तों पर दया दिखाना सम्भव है। परमेश्वर केवल दया का भाव ही नहीं रखता, वरन् पाप की वास्तविक क्षमा में इस भाव को प्रकट करना सम्भव भी है। यदि ऐसा न होता, तो कोई वकील नियुक्त न किया जाता।
4. इसमें यह निहित है कि तब तो दोषी ठहराए हुओं के लिए आशा है। पापी बन्दी हैं; परन्तु इस संसार में वे अभी निराशा के बन्दी नहीं, वरन् आशा के बन्दी हैं।
5. इसमें यह निहित है कि शासन की दृष्टि से किसी वकील के बीच में पड़ने की आवश्यकता है; कि पापी के सम्बन्ध ऐसे हैं, और उसका चरित्र ऐसा है, कि उसे अपने ही नाम से अपना मुकद्दमा आप लड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वह दोषी ठहराया जा चुका है; अब उसका मुकद्दमा नहीं चल रहा है। इस दृष्टि से वह प्राणदण्ड के योग्य अपराध के कारण सज़ा के अधीन है; इसलिए वह विधि से बहिष्कृत है, और शासन उसे किसी भी वैधानिक कार्य को करने के योग्य नहीं मान सकता। शासन के साथ उसके सम्बन्ध उसे इस बात की अनुमति नहीं देते कि वह अपने नाम से या स्वयं अपने व्यक्तित्व में परमेश्वर के सामने उपस्थित हो। जहाँ तक शासन पर उसके अपने व्यक्तिगत प्रभाव का प्रश्न है, वह एक मरे हुए मनुष्य के समान है—वह नागरिक दृष्टि से मर चुका है। इसलिए, यदि उसकी सुनवाई होनी ही है, तो उसे अपने निकटतम मित्र के द्वारा, या अपने वकील के द्वारा उपस्थित होना होगा। वह अपने नाम से और स्वयं अपने व्यक्तित्व में उपस्थित नहीं हो सकता, वरन् उसे ऐसे वकील के द्वारा उपस्थित होना होगा जो शासन को ग्रहणयोग्य हो।
V. ऐसी परिस्थितियों में वकील की अनिवार्य योग्यताएँ।
1. उसे शासन का अडिग मित्र होना चाहिए। ध्यान दीजिए, वह उस दोषी पक्ष पर, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है, दया किए जाने की विनती करने के लिए उपस्थित होता है। निश्चय ही उसे स्वयं उस शासन का शत्रु नहीं होना चाहिए जिससे वह इतना बड़ा अनुग्रह माँग रहा है; वरन् उसे उस शासन के समर्पित मित्र के रूप में जाना जाना चाहिए, जिसकी दया वह दोषी पर दिखाए जाने की विनती करता है।
2. उसे अपमानित व्यवस्था का अडिग मित्र होना चाहिए। पापी ने व्यवस्था और व्यवस्था देनेवाले दोनों का बहुत अपमान किया है, और अपने आचरण के द्वारा दोनों की निन्दा की है। अपनी निरन्तर आज्ञा-उल्लंघन के द्वारा पापी ने अत्यन्त ज़ोरदार ढंग से यह घोषणा की है कि व्यवस्था आज्ञा मानने योग्य नहीं है, और व्यवस्था देनेवाला एक अत्याचारी है। अब वकील को इस व्यवस्था का मित्र होना चाहिए; उसे व्यवस्था के अपमान के लिए अपने आप को बेचना नहीं चाहिए, न ही उसके अपमान में सहमति देनी चाहिए।
उसे व्यवस्था पर दोष नहीं लगाना चाहिए; क्योंकि ऐसी दशा में वह व्यवस्था देनेवाले को ऐसी स्थिति में डाल देता है कि यदि वह दण्ड को हटाकर दया दिखाए, तो वह व्यवस्था के अपमान में सहमति देगा, और एक सार्वजनिक कार्य के द्वारा स्वयं ही व्यवस्था को दोषी ठहराएगा। वकील यह चाहता है कि व्यवस्था का दण्ड लागू न किया जाए; परन्तु उसे इसका कारण यह नहीं बताना चाहिए कि व्यवस्था अनुचित और अन्यायपूर्ण है। क्योंकि ऐसी दशा में वह व्यवस्था देनेवाले के लिए यह असम्भव बना देता है कि वह इस दावे को स्वीकार किए बिना दण्ड को हटा सके कि व्यवस्था अच्छी नहीं है। उस दशा में व्यवस्था देनेवाला पापी के बदले स्वयं को ही दोषी ठहराएगा। तो यह स्पष्ट है कि उसे व्यवस्था का अडिग मित्र होना चाहिए, नहीं तो वह व्यवस्था देनेवाले को स्वयं व्यवस्था का अपमान करने के अपराध में फँसाए बिना कभी दया प्राप्त नहीं करा सकता।
3. वकील को धर्मी होना चाहिए; अर्थात् उसे पापी के अपराध में किसी भी प्रकार की सहभागिता से मुक्त होना चाहिए। पापी के अपराध से उसकी कोई संगति न हो; वकील पर दोष का कोई आरोप या सन्देह न हो। जब तक वह स्वयं उस अपराध से मुक्त न हो जिसका आरोप अपराधी पर है, तब तक वह दया के सिंहासन के सामने उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए उचित व्यक्ति नहीं है।
4. उसे पापी का करुणामय मित्र होना चाहिए—उसके पापों का नहीं, वरन् स्वयं पापी का। यह भेद बहुत स्पष्ट है। हर कोई जानता है कि माता-पिता अपने बच्चों की दुष्टता का बहुत विरोध कर सकते हैं, जबकि उनके प्रति उनके मन में बड़ी करुणा होती है। वह पापी का सच्चा मित्र नहीं है जो वास्तव में उसके पापों से सहानुभूति रखता है। मैंने कई बार पापियों को मसीही न बनने के बहाने के रूप में यह कहते सुना है कि उनके मित्र इसके विरोधी थे।
उनके बहुत से प्रिय मित्र हैं जो इस बात के विरोधी हैं कि वे मसीही बनें और परमेश्वर की आज्ञा मानें। वे चाहते हैं कि ये अपने पापों में ही जीते रहें। वे नहीं चाहते कि ये बदलें और पवित्र बनें, वरन् चाहते हैं कि ये अपनी सांसारिकता और पापमयता में ही बने रहें।
मैं ऐसे लोगों से कहता हूँ कि वे उनके उसी अर्थ में मित्र हैं जिस अर्थ में शैतान उनका मित्र है।
और क्या वे शैतान को अपना अच्छा मित्र, अपना दयालु मित्र कहेंगे, इसलिए कि वह उनके पापों से सहानुभूति रखता है और चाहता है कि वे मसीही न बनें? क्या आप किसी ऐसे मनुष्य को अपना
मित्र कहेंगे जो चाहता हो कि आप हत्या करें, या डाका डालें, झूठ बोलें, या कोई भी अपराध करें?
मान लीजिए कि वह आकर आपसे अपील करे, और इस कारण कि आप उसके मित्र हैं, आपसे कोई बड़ा अपराध करवाना चाहे, तो क्या आप उस मनुष्य को अपना मित्र समझेंगे?
नहीं! कोई भी मनुष्य पापी का सच्चा मित्र नहीं है, जब तक वह यह न चाहे कि पापी अपने पापों को छोड़ दे। यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि आप अपने पापों में बने रहें, तो वह आपके प्राण का विरोधी है। किसी भी उचित अर्थ में आपका मित्र होने के बदले, वह आपको नाश करने के लिए शैतान की भूमिका निभा रहा है।
अब ध्यान दीजिए: मसीह पापियों का करुणामय मित्र है, सबसे अच्छे और सबसे सच्चे अर्थ में मित्र। वह आपके पापों से सहानुभूति नहीं रखता, परन्तु उसका मन आपको आपके पापों से बचाने पर लगा है। मैंने कहा कि उसे पापियों का करुणामय मित्र होना चाहिए; और उसकी करुणा मृत्यु से भी अधिक प्रबल होनी चाहिए, नहीं तो वह इस स्थिति की आवश्यकताओं को कभी पूरा नहीं कर सकेगा।
5. एक और योग्यता यह होनी चाहिए कि वह उस व्यवस्था का पर्याप्त रूप से सम्मान करने में समर्थ हो, जिसका पापियों ने अपने अपराध के द्वारा अपमान किया है। वह परमेश्वर की अपमानित व्यवस्था के दण्ड को लागू होने से बचाना चाहता है। पाप के द्वारा व्यवस्था का सर्वोच्च मात्रा में अपमान हुआ है, इसलिए या तो अपराधी पर उसका दण्ड लागू करके उसका सम्मान किया जाए, या व्यवस्था देनेवाले को किसी और रीति से व्यवस्था के पक्ष में गवाही देनी होगी, तभी वह न्यायपूर्वक उसके दण्ड के कार्यान्वयन को छोड़ सकता है। व्यवस्था रद्द नहीं की जा सकती; व्यवस्था का अपमान नहीं होना चाहिए। यह परमेश्वर के स्वभाव की व्यवस्था है, उसके शासन की अटल व्यवस्था है, स्वर्ग की सनातन व्यवस्था है, सब लोकों में, सब कालों में और अनन्तकाल तक नैतिक कर्ताओं के शासन के लिए व्यवस्था है। पापियों ने इसकी आज्ञा मानने से पूरी तरह इनकार करके, इसका तिरस्कार करके, इसके विरुद्ध अत्यन्त ज़ोरदार गवाही दी है। अब पाप को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए; इस व्यवस्था का सम्मान होना ही चाहिए।
परमेश्वर उस सारी जाति पर, जिसने इस व्यवस्था को तुच्छ जाना है, इसका दण्ड लागू करके इस पर महिमा की एक ज्योति डाल सकता था। यह इसके अधिकार को बनाए रखने और इसके दावों को सही ठहराने के लिए परमेश्वर की गम्भीर गवाही होती। यदि हमारा वकील पाप की क्षमा माँगने के लिए परमेश्वर के सामने उपस्थित होता है, कि इस व्यवस्था का दण्ड हटा दिया जाए और लागू न किया जाए, तो तुरन्त यह प्रश्न उठता है: परन्तु इस व्यवस्था के अपमान से कैसे बचा जाए? उस लापरवाह और निन्दापूर्ण तिरस्कार की भरपाई किससे होगी जिसके साथ इस व्यवस्था से व्यवहार किया गया है? पाप को प्रत्यक्ष रूप से हल्का ठहराए बिना वह कैसे क्षमा किया जाए?
यह स्पष्ट है कि पाप ने सारे प्रश्न को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि परमेश्वर को किसी न किसी रीति से अत्यन्त ज़ोरदार ढंग से पाप के विरुद्ध, और इस अपमानित व्यवस्था के अधिकार को बनाए रखने के लिए, गवाही देनी ही होगी।
पापियों के वकील के लिए यह उचित है कि वह अपने लिए ऐसी दलील तैयार रखे जो इस कठिनाई का समाधान करे। यदि वह दण्ड को हटवाना चाहता है, तो उसे इस आवश्यकता को पूरा करना ही होगा।
उसे व्यवस्था के दण्ड के कार्यान्वयन के लिए एक पर्याप्त विकल्प प्रस्तुत करने में समर्थ होना चाहिए। उसे ऐसा कुछ करने में समर्थ होना चाहिए जो व्यवस्था के पक्ष में और पाप के विरुद्ध उतनी ही प्रभावशाली गवाही दे जितनी अपराधी पर व्यवस्था का दण्ड लागू करने से होती। दूसरे शब्दों में, उसे सार्वजनिक न्याय की माँगों को पूरा करने में समर्थ होना चाहिए।
6. उसे स्वेच्छा से निःशुल्क सेवा करने के लिए तैयार होना चाहिए। न्याय के आधार पर उससे यह माँग नहीं की जा सकती कि वह स्वेच्छा से सेवा करे, या पापियों के लिए दुःख उठाए। वह स्वेच्छा से अपनी सेवा अर्पित कर सकता है और वह स्वीकार की जा सकती है; परन्तु यदि वह स्वेच्छा से अपनी सेवा अर्पित करता है, तो उसे इस स्थिति की माँग पूरी करने के लिए जो भी पीड़ा या बलिदान आवश्यक हो, उसे सहने में समर्थ और उसके लिए तैयार होना चाहिए।
यदि आज्ञापालन के द्वारा व्यवस्था का सम्मान होना ही है; यदि “बिना लहू बहाए क्षमा नहीं होती;” यदि पाप के विरुद्ध और व्यवस्था के सम्मान में शासन की ओर से ज़ोरदार गवाही दी जानी ही है; यदि उसे पापियों का प्रतिनिधि बनकर सारे विश्व के सामने पाप के प्रायश्चित के रूप में स्वयं को अर्पित करना है, तो उसे इस स्थिति की माँग पूरी करने और बलिदान करने के लिए तैयार होना चाहिए।
7. उसके पास एक अच्छी दलील होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, जब वह दया के आसन के सामने उपस्थित हो, तो उसे ऐसे कारण प्रस्तुत करने में समर्थ होना चाहिए जो वास्तव में इस स्थिति की आवश्यकताओं को पूरा करें, और परमेश्वर के लिए क्षमा करना सुरक्षित, उचित, सम्मानजनक और महिमामय बना दें।
VI. पापियों के पक्ष में उसकी दलील क्या है।
VI. पापियों के पक्ष में उसकी दलील क्या है।
यह स्मरण रखना चाहिए कि यह अपील न्याय से नहीं की जाती। मनुष्य के पतन के समय से परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से हमारी जाति पर कठोर न्याय के कार्यान्वयन को स्थगित कर रखा है। वास्तव में हमारे लिए वह दया के सिंहासन पर बैठा है। जब से मनुष्य पाप में फँसे हैं, तब से न्याय नहीं, वरन् दया उसके प्रशासन का नियम रही है।
यह सीधा-सादा तथ्य है। मनुष्य पाप करते हैं, और वे तुरन्त काट डाले जाकर नरक में नहीं भेजे जाते।
न्याय का कार्यान्वयन स्थगित है; और परमेश्वर को अनुग्रह के सिंहासन पर, या दया के आसन पर बैठा हुआ दिखाया गया है। यहीं, दया के आसन के सामने, मसीह पापियों के वकील का पद निभाता है।
2. पापियों के लिए मसीह की दलील यह नहीं हो सकती कि वे दोषी नहीं हैं। वे दोषी हैं, और दोषी ठहराए जा चुके हैं। उनके दोष और उनकी दण्ड-योग्यता के विषय में कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता; ऐसे प्रश्न निपट चुके हैं। मुझे प्रायः यह बात विचित्र लगी है कि मनुष्य इस तथ्य को अनदेखा कर देते हैं कि वे दोषी ठहर चुके हैं, और उनके दोष या दण्ड की योग्यता के विषय में कभी कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
3. हमारा वकील होने के नाते मसीह न तो औचित्य की दलील दे सकता है, और न उसे इसकी आवश्यकता है। औचित्य की दलील लगाए गए आरोप के तथ्य को स्वीकार करती है; परन्तु यह दावा करती है कि उन परिस्थितियों में अभियुक्त को वैसा करने का अधिकार था जैसा उसने किया। यह दलील मसीह कभी नहीं दे सकता। यह पूरी तरह अनुचित है, क्योंकि मुकद्दमे का विचार पहले ही हो चुका है और सज़ा सुनाई जा चुकी है।
4. वह ऐसी कोई दलील नहीं दे सकता जिससे किसी भी रीति से व्यवस्था पर दोष आए। वह यह दलील नहीं दे सकता कि व्यवस्था अपनी आज्ञा में बहुत कठोर थी, या अपने दण्ड में बहुत कड़ी थी; क्योंकि उस दशा में वह वास्तव में दया के लिए नहीं, वरन् न्याय के लिए विनती करता। उस दशा में वह यह विनती करता कि अपराधी के साथ कोई अन्याय न किया जाए। क्योंकि यदि वह संकेत करता है कि व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं है, तो पापी दण्ड के योग्य नहीं है; इसलिए उसे दण्ड देना अन्याय होगा, और उसकी दलील का अर्थ यह होगा कि पापी को दण्ड न दिया जाए, क्योंकि वह उसके योग्य नहीं है। परन्तु यदि इस दलील को प्रबल होने दिया जाए, तो यह परमेश्वर की ओर से सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करना होगा कि उसकी व्यवस्था अन्यायपूर्ण थी। परन्तु ऐसा कभी नहीं हो सकता।
5. वह ऐसी कोई दलील नहीं दे सकता जिससे व्यवस्था देनेवाले के प्रशासन पर दोष आए।
यदि वह यह दलील दे कि व्यवस्था देनेवाले ने मनुष्यों के साथ कठोर व्यवहार किया है, चाहे उनकी सृष्टि में, या अपने विधान की व्यवस्थाओं के द्वारा, या उन्हें इतनी परीक्षा में पड़ने देकर—या यदि वह किसी भी रीति से ऐसी दलील सामने लाए जिससे सृष्टि में या अपने शासन के प्रशासन में व्यवस्था देनेवाले पर दोष आता हो, तो व्यवस्था देनेवाला स्वयं को दोषी ठहराए बिना उसकी दलील सुनकर पापी को क्षमा नहीं कर सकता। उस दशा में, इस बात पर ज़ोर देने के बदले कि पापी पश्चाताप करे, वास्तव में स्वयं व्यवस्था देनेवाले से पश्चाताप करने की माँग की जाती।
6. वह पापी के दोष को घटाने के लिए, या उसके आचरण को हल्का ठहराने के लिए, उसकी ओर से कोई भी बहाना प्रस्तुत नहीं कर सकता। क्योंकि यदि वह ऐसा करे, और व्यवस्था देनेवाला ऐसी दलील के उत्तर में क्षमा कर दे, तो वह मान लेगा कि वह गलत था, और पापी उस सज़ा के योग्य नहीं था जो उसके विरुद्ध सुनाई गई थी।
VI. पापियों के पक्ष में उसकी दलील क्या है।
वह यह दलील नहीं दे सकता कि पापी नरक के दण्ड के योग्य नहीं है; क्योंकि यदि वह यह दलील प्रस्तुत करे, तो वास्तव में वह परमेश्वर के न्याय पर दोष लगाएगा, और यह ऐसी विनती के समान होगी कि पापी को अन्यायपूर्वक नरक में न भेजा जाए। यह दया के लिए उचित विनती नहीं, वरन् न्याय के साथ विवाद होगा। यह इस बात की माँग होगी कि पापी को नरक में न भेजा जाए, परमेश्वर की दया के कारण नहीं, वरन् इस कारण कि परमेश्वर का न्याय इसकी अनुमति नहीं देता। ऐसा कभी नहीं होगा।
7. हमारा वकील होने के नाते वह यह दलील नहीं दे सकता कि उसने हमारा ऋण ऐसे अर्थ में चुका दिया है कि वह न्याय के आधार पर हमारी रिहाई की माँग कर सके। उसने हमारा ऋण ऐसे अर्थ में नहीं चुकाया है कि अब हम उसके ऋणी न रहें। उसने हमारे पापों का प्रायश्चित ऐसे अर्थ में नहीं किया है कि अब हमें उनके लिए न्यायपूर्वक दण्ड न दिया जा सके। वास्तव में ऐसी बात असम्भव और बेतुकी है। एक प्राणी दूसरे के लिए ऐसे अर्थ में दुःख नहीं उठा सकता कि उस दूसरे का दोष मिट जाए। वह दूसरे के दोष के लिए ऐसे अर्थ में दुःख उठा सकता है कि उस पापी को, जिसके लिए दुःख सहा गया है, क्षमा करना सुरक्षित हो जाए; परन्तु स्थानापन्न का दुःख उठाना अपराधी के वास्तविक दोष को कभी रत्ती भर भी कम नहीं कर सकता। हमारा वकील यह दलील दे सकता है कि उसने हमारे लिए ऐसा दुःख सहा है जिससे उस व्यवस्था का सम्मान हुआ जिसका हमने अपमान किया था, कि अब हम पर दया करना सुरक्षित है; परन्तु वह कभी इस आधार पर हमारी रिहाई की माँग नहीं कर सकता कि हम दण्ड के योग्य नहीं हैं। हमारे वास्तविक दोष का तथ्य बना रहता है, और सदा बना रहेगा; और हमारी क्षमा ठीक उतनी ही सर्वोच्च दया का कार्य है, मानो मसीह हमारे लिए कभी मरा ही न हो।
8. परन्तु मसीह व्यवस्था की पुष्टि करने के लिए अपनी पापबलि की दलील दे सकता है, एक ऐसी शर्त को पूरा करने के रूप में, जिस पर हमें क्षमा किया जा सकता है।
इस बलिदान को ऐसा आधार नहीं समझना चाहिए जिस पर न्याय हमारी क्षमा की माँग करता है। हमारा वकील इस बलिदान को ऐसे अर्थ में चुकौती के रूप में प्रस्तुत नहीं करता कि अब वह न्याय से यह माँग कर सके कि हम मुक्त किए जाएँ। नहीं। जैसा मैंने पहले कहा, यह केवल एक ऐसी शर्त का पूरा होना है, जिस पर परमेश्वर की दया के लिए पश्चातापी पापी के मामले में व्यवस्था के दण्ड के कार्यान्वयन को रोकना और हटाना सुरक्षित है।
कुछ धर्मविज्ञानी मुझे ऐसे प्रतीत होते हैं कि वे इस भेद को देख नहीं पाए। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मसीह का प्रायश्चित हमारी क्षमा का आधार है। वे यह मानकर चलते प्रतीत होते हैं कि उसने शाब्दिक रूप से हमारे लिए दण्ड को ऐसे अर्थ में सहा कि अब मसीह दया से अपील नहीं करता, वरन् हमारे लिए न्याय की माँग करता है। अपने विचार में सुसंगत रहने के लिए उन्हें यह मानना होगा कि मसीह हमारे लिए दया के आसन के सामने विनती नहीं करता, वरन् हमारा ऋण चुकाकर न्याय के सिंहासन के सामने उपस्थित होता है और हमारी रिहाई की माँग करता है।
मैं इस विचार को स्वीकार नहीं कर सकता। मैं इस बात पर ज़ोर देता हूँ कि उसका बलिदान हमारे नरक-दण्ड की वास्तविक योग्यता के प्रश्न को छू नहीं सकता था। उसकी अपील परमेश्वर की असीम दया से है, क्षमा करने के उसके प्रेमपूर्ण स्वभाव से है; और वह अपने प्रायश्चित की ओर संकेत करता है, हमारी रिहाई की माँग के रूप में नहीं, वरन् एक ऐसी शर्त को पूरा करने के रूप में जिस पर हमारी रिहाई परमेश्वर के लिए सम्मानजनक है। व्यवस्था के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और अपने लहू के बहाए जाने को वह हम पर व्यवस्था का दण्ड लागू किए जाने के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकता है—संक्षेप में, वह परमेश्वर-मनुष्य और मध्यस्थ के रूप में अपने सम्पूर्ण कार्य की दलील दे सकता है। इस प्रकार
वह हमें उस सब का पूरा लाभ दे सकता है जो उसने व्यवस्था के अधिकार को बनाए रखने और व्यवस्था देनेवाले के चरित्र को सही ठहराने के लिए किया है, उन शर्तों को पूरा करने के रूप में जिन्होंने परमेश्वर के लिए यह सम्भव बना दिया है कि वह न्यायी भी रहे और फिर भी पश्चातापी पापी को धर्मी ठहराए।
9. परन्तु यह दलील परमेश्वर के दयालु स्वभाव से की जाती है। वह उस प्रतिज्ञा की ओर संकेत कर सकता है जो यशायाह के 52वें अध्याय में पद 13 से अन्त तक, और 53वें अध्याय के पद 1, 2 में उससे की गई है: “देखो, मेरा दास बुद्धि से काम करेगा, वह ऊँचा, महान् और अति महान् हो जाएगा।
“जैसे बहुत से लोग तुझे देखकर चकित हुए (क्योंकि उसका रूप यहाँ तक बिगड़ा हुआ था कि मनुष्य का सा न जान पड़ता था, और उसकी सुन्दरता भी आदमियों की सी न रह गई थी), “वैसे ही वह बहुत सी जातियों को पवित्र करेगा, और उसको देखकर राजा शान्त रहेंगे; क्योंकि वे ऐसी बात देखेंगे जिसका वर्णन उनके सुनने में भी नहीं आया, और ऐसी बात उनकी समझ में आएगी जो उन्होंने अभी तक सुनी भी न थी।
“जो समाचार हमें दिया गया, उसका किस ने विश्वास किया? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?
“क्योंकि वह उसके सामने अंकुर के समान, और ऐसी जड़ के समान उगेगा जो सूखी भूमि में फूट निकले; उसकी न तो कुछ सुन्दरता है न रूप; और जब हम उसे देखेंगे, तो उसमें ऐसी कोई शोभा न होगी कि हम उसको चाहें।”
10. वह यह दलील भी दे सकता है कि वह हमारा जामिन बनता है, कि वह हमारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है, कि वही हमारा ज्ञान, और धार्मिकता, और पवित्रीकरण, और छुटकारा है; और वह अपने पदीय सम्बन्धों की ओर संकेत कर सकता है; अपनी असीम परिपूर्णता की ओर, और हमें आज्ञाकारिता में फिर से ले आने तथा हमें स्वर्ग की सेवा, वहाँ के कार्यों और वहाँ के आनन्दों के योग्य बनाने की अपनी इच्छा और सामर्थ की ओर। कहा गया है कि वह व्यवस्था की वाचा से उत्तम वाचा का जामिन ठहराया गया है; और ऐसी वाचा का जो उत्तम प्रतिज्ञाओं पर बाँधी गई है।
11. वह हमारी क्षमा के लिए कारण के रूप में इस बात पर ज़ोर दे सकता है कि व्यवस्था के दण्ड को हटाने से परमेश्वर को कितना बड़ा आनन्द मिलेगा। “दया न्याय पर जयवन्त होती है।” न्याय करना उसका अनोखा काम है; परन्तु वह करुणा से प्रीति रखता है।
विक्टोरिया के विषय में कहा जाता है कि जब उनके प्रधान मंत्री ने एक क्षमा-पत्र प्रस्तुत किया, और उनसे पूछा कि क्या वे किसी ऐसे व्यक्ति के मामले में, जिसे मृत्युदण्ड सुनाया गया था, क्षमा-पत्र पर हस्ताक्षर करेंगी, तो उन्होंने झट से कलम उठा ली और कहा, “हाँ! पूरे मन से!” क्या आप सोचते हैं कि एक स्त्री के हृदय से ऐसी अपील की जा सकती थी और वह इस बात पर आनन्द से उछल न पड़ता कि उसे ऐसी स्थिति में रखा गया है जिसमें वह एक संगी मनुष्य का प्राण बचा सके?
कहा गया है कि “एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने आनन्द होता है;” और क्या आप नहीं सोचते कि अभागे पापी को क्षमा करने और उसे नरक के विनाश से बचाने में समर्थ होने से परमेश्वर को सच्चा से सच्चा आनन्द मिलता है? हमारी मृत्यु से उसे कोई प्रसन्नता नहीं होती।
पापियों पर अपनी व्यवस्था का दण्ड लागू करने के लिए विवश होना उसके लिए दुःख की बात है; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमें क्षमा करने में उसे उससे असीम रूप से अधिक आनन्द मिलता है जितना हमें क्षमा पाने में मिलता है। वह भली-भाँति जानता है कि नरक और अनन्त दण्ड की अकथनीय भयानकताएँ क्या हैं। वह जानता है कि पापी उसे सह नहीं सकता। वह कहता है, “जिन दिनों में मैं तेरा न्याय करूँगा, क्या उन में तेरा हृदय दृढ़ और तेरे हाथ स्थिर रह सकेंगे? और जब मैं तुझे दण्ड दूँगा तब तू क्या करेगा?” हमारा वकील जानता है कि पापी को दण्ड देना ऐसी बात है जिसमें परमेश्वर को कोई प्रसन्नता नहीं होती—कि वह क्षमा करेगा और पूरे मन से क्षमा-पत्र पर हस्ताक्षर करेगा।
VI. पापियों के पक्ष में उसकी दलील क्या है।
और क्या आप सोचते हैं कि परमेश्वर के हृदय से, उसके दयालु स्वभाव से की गई ऐसी अपील का कोई फल न होगा? हमारे वकील मसीह के विषय में कहा गया है कि “उस आनन्द के लिए जो उसके आगे धरा था, उसने लज्जा को तुच्छ जानकर क्रूस का दुःख सहा।” हमारे लिए हमारे वकील का प्रेम इतना महान था कि उसने हमें नरक से बचाने को ऐसा बड़ा सुख और आनन्द समझा कि क्रूस की लज्जा और पीड़ा को उसने मात्र एक तुच्छ बात गिना—उसने उन्हें तुच्छ जाना।
तो यह हमारे वकील के हृदय का प्रकाशन है। और वह कितने निश्चय के साथ यह मान सकता है कि सम्मानपूर्वक हम पर क्षमा की मुहर लगा सकने से परमेश्वर को सच्चा से सच्चा आनन्द, अनन्त आनन्द मिलेगा।
12. वह उस महिमा पर ज़ोर दे सकता है जो इस कार्य में परमेश्वर के पुत्र ने जो भाग लिया है, उसके कारण पुत्र को प्राप्त होगी।
क्या यह पुत्र के लिए अनन्तकाल तक सम्मान की बात न होगी कि उसने पापियों का मुकद्दमा लड़ा? कि उसने स्वयं इतनी बड़ी कीमत चुकाकर ऐसा निराशाजनक मुकद्दमा अपने हाथ में लिया? और ऐसी पीड़ा और लहू की कीमत पर उसे अन्त तक पूरा किया?
क्या सृष्टि के सारे प्राणी सदा तक आश्चर्य और आराधना न करते रहेंगे, जब वे इस वकील को उन प्राणों की असंख्य भीड़ से घिरा हुआ देखेंगे जिनके पक्ष में उसकी वकालत प्रबल हुई है?
13. हमारा वकील छुड़ाए हुए लोगों की कृतज्ञता, और सब भले प्राणियों के गहरे धन्यवाद और स्तुति की दलील दे सकता है।
क्या आप नहीं सोचते कि सद्गुणी प्राणियों का सारा परिवार हमारे वकील के रूप में मसीह के बीच में पड़ने के लिए, और उस दया, सहनशीलता और प्रेम के लिए, जिसने हमारी जाति को बचाया है, सदा तक आभारी रहेगा?
टिप्पणियाँ — आप देखते हैं कि मसीही बनना क्या है। यह अपना मुकद्दमा पूरी तरह मसीह को सौंपकर उसे अपना वकील नियुक्त करना है। आप अपने कामों से उद्धार नहीं पा सकते, आप अपने दुःखों से उद्धार नहीं पा सकते, अपनी प्रार्थनाओं से भी नहीं—किसी भी रीति से नहीं, सिवाय इस
वकील के बीच में पड़ने के। “वह आपके लिए विनती करने को सर्वदा जीवित है।”
वह आपका मुकद्दमा अपने हाथ में लेने का प्रस्ताव रखता है; और मसीही होने का अर्थ है तुरन्त अपना सारा मुकद्दमा, अपना सारा जीवन और अस्तित्व अपने वकील के रूप में उसे सौंप देना।
2. वह ऐसा वकील है जो कोई मुकद्दमा नहीं हारता। हर वह मुकद्दमा जो उसे सौंपा जाता है और उसके हाथों में बना रहता है, निश्चित रूप से जीता जाता है। उसकी वकालत सर्वप्रबल है। परमेश्वर ने उसे वकील नियुक्त किया है; और जहाँ कहीं वह किसी ऐसे पापी के पक्ष में उपस्थित होता है जिसने अपना मुकद्दमा उसे सौंप दिया है, उसका एक शब्द भी निश्चित रूप से प्रबल होता है। इसलिए आप देखते हैं,
3. विश्वासियों की सुरक्षा। मसीह सदा अपने पद पर है, उन सब की सारी बातों पर ध्यान देने के लिए सदा तैयार है जिन्होंने उसे अपना वकील बनाया है। जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, वह उनका पूरा पूरा उद्धार कर सकता है; और उसमें बने रहकर आप सदा के लिए सुरक्षित हैं।
4. आप अविश्वासियों की स्थिति देखते हैं। आपका कोई वकील नहीं है। परमेश्वर ने एक वकील नियुक्त किया है; परन्तु आप उसे ठुकराते हैं। आप सोचते हैं कि उसके बिना ही काम चला लेंगे। शायद आप में से कुछ सोचते हैं कि आप अपने पापों का दण्ड भुगत लेंगे, और क्षमा नहीं माँगेंगे। आप में से दूसरे शायद सोचते हों कि आप अपने ही नाम से परमेश्वर के पास जाएँगे; और बिना किसी प्रायश्चित के, या बिना किसी वकील के, आप अपना मुकद्दमा स्वयं लड़ेंगे। परन्तु परमेश्वर इसकी अनुमति नहीं देगा। उसने आपकी ओर से कार्य करने के लिए एक वकील नियुक्त किया है, और जब तक आप उसके द्वारा नहीं आते, परमेश्वर आपकी नहीं सुनेगा।
मसीह से बाहर, वह आपके लिए भस्म करनेवाली आग है। जब न्याय की सभा बैठेगी, और आप अपने ही नाम से उपस्थित होंगे, तो आप निश्चय ही अपवित्र और उद्धार-रहित दशा में उपस्थित होंगे। आप अपना सिर न उठा सकेंगे, और आपको उस वकील के मुँह की ओर देखने में लज्जा आएगी, जो तब न्यायी और वकील दोनों के रूप में बैठा होगा।
5. मैं पूछता हूँ, क्या आपने उसे अपना वकील नियुक्त किया है? क्या आपने अपनी सहमति से उसे अपना वकील बनाया है?
इतना पर्याप्त नहीं है कि परमेश्वर ने उसे इस सम्बन्ध में कार्य करने के लिए नियुक्त किया है।
वह इस सम्बन्ध में आपके लिए कार्य नहीं कर सकता, जब तक आप व्यक्तिगत रूप से स्वयं को और अपने मामले को उसकी वकालत में नहीं सौंप देते।
जैसा मैंने कहा है, यह अपने उद्धार का सारा प्रश्न उस पर भरोसा करके उसे सौंप देने के द्वारा होता है।
6. क्या आप में से कोई कहता है कि आप उसे नियुक्त करने में असमर्थ हैं? परन्तु स्मरण रखिए, जो फ़ीस वह आपसे माँगता है, वह आपका हृदय है। आपके पास हृदय है। वह धन नहीं, वरन् आपका हृदय चाहता है।
तो कंगाल भी उसे उतना ही नियुक्त कर सकते हैं जितना धनी; बच्चे भी, जिनके पास अपना एक पैसा भी नहीं है, उतना ही जितना उनके धनी माता-पिता। सब उसे नियुक्त कर सकते हैं, क्योंकि सब के पास हृदय है।
7. वह अपनी सेवाएँ सब को निःशुल्क अर्पित करता है, और उनसे भरोसे, कृतज्ञता, प्रेम और आज्ञाकारिता के सिवाय और कुछ नहीं माँगता। यह कंगाल और धनी दोनों को समान रूप से देना है; और यह देने में दोनों समान रूप से समर्थ हैं।
8. क्या आप में से कोई उसके बिना काम चला सकता है? क्या आपने कभी सोचा है कि आपका क्या होगा?
परन्तु अब प्रश्न यह है—क्या आप अपने पापों को छोड़ने, और अपने प्राणों को मसीह की वकालत पर भरोसा करके सौंपने के लिए सहमत होंगे? क्या आप उसे वह फ़ीस देंगे जो वह माँगता है—अपना हृदय, अपना भरोसा, अपना कृतज्ञतापूर्ण प्रेम, अपनी आज्ञाकारिता?
क्या वह आपका वकील होगा या नहीं? मान लीजिए कि वह आपके सामने खड़ा हो, जैसे मैं खड़ा हूँ, और उसके हाथ में जीवन की पुस्तक हो और स्वर्ग के प्रकाश में ही डुबोई हुई एक कलम हो, और वह पूछे,
“आप में से कौन अब मुझे अपना वकील बनाने के लिए सहमत होगा?” मान लीजिए कि वह आपसे पूछे, हे पापी, “क्या मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूँ? हे मरते हुए पापी, क्या मैं आपके लिए कुछ कर सकता हूँ? क्या
मैं किसी भी रीति से आपका मित्र बनकर आपकी सहायता कर सकता हूँ? क्या मैं आपके पक्ष में कोई अच्छी बात कह सकता हूँ? क्या मैं आपको नरक की गहराइयों से बचाने के लिए अपना लहू, अपनी मृत्यु, अपना जीवन, अपनी वकालत बीच में डाल सकता हूँ? और क्या आप सहमत होंगे? क्या मैं आपका नाम लिख लूँ? क्या मैं उसे जीवन की पुस्तक में लिख दूँ? क्या आज स्वर्ग में यह बताया जाए कि आपने उद्धार पाया है? और क्या मैं यह समाचार दूँ कि आपने अपना मुकद्दमा मुझे सौंप दिया है, और इस प्रकार स्वर्ग में आनन्द हो? या क्या आप मुझे ठुकरा देंगे, अपने ही बचाव पर खड़े रहेंगे, और उस गम्भीर न्याय के दिन अपना मुकद्दमा स्वयं लड़ने का प्रयत्न करेंगे?”
हे पापी, मैं आपको मसीह के नाम से चेतावनी देता हूँ कि अब मुझे ‘नहीं’ न कहें।
अभी और यहीं सहमत हो जाइए, और इसे स्वर्ग में लिखा जाने दीजिए।
9. क्या आप में से किसी ने सब कुछ उसे सौंपकर उसकी वकालत को निश्चित कर लिया है? यदि आपने ऐसा किया है, तो उसने आपके मुकद्दमे पर ध्यान दिया है, क्योंकि उसने आपकी क्षमा प्राप्त करा दी है; और इसका प्रमाण आपके मन की शान्ति में है। क्या उसने आपके मुकद्दमे पर ध्यान दिया है? क्या आपके भीतर मेल-मिलाप का अनुभव है, यह भीतरी गवाही है कि आप विश्वास करते हैं कि आपको क्षमा मिल गई है, कि आप ग्रहण किए गए हैं, कि मसीह ने आपका उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया है, और कि वह पहले ही प्रबल हो चुका है और आपके लिए क्षमा प्राप्त करा चुका है, और उसने आपके अपने प्राण में परमेश्वर की वह शान्ति दी है जो समझ से बिलकुल परे है, कि वह आपके हृदय में राज्य करे? मसीही अनुभव में यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि जब कभी हम सचमुच अपना मुकद्दमा यीशु को सौंप देते हैं, तो वह बिना देर किए हमारी क्षमा प्राप्त करा देता है, और उसके बाद आनेवाली भीतरी शान्ति में हमें इस बात का निश्चय देता है कि हम ग्रहण किए गए हैं, कि उसने अपना लहू बीच में डाल दिया है, कि उसका लहू हमारे लिए स्वीकार कर लिया गया है, कि उसकी वकालत प्रबल हुई है, और कि हमने उद्धार पाया है।
इससे कम पर न रुकिए; क्योंकि यदि परमेश्वर के साथ आपका सचमुच मेल हो गया है—यदि आपको वास्तव में क्षमा मिल गई है—तो पछतावे का डंक जाता रहा है; आपकी आत्मा और परमेश्वर के आत्मा के बीच अब कोई रगड़ या कोई खीज नहीं रही; दोषी ठहराए जाने और पछतावे की भावना के स्थान पर सुसमाचार की स्वतंत्रता, शान्ति और प्रेम की आत्मा आ गई है।
पत्थर का हृदय जाता रहा है; उसके स्थान पर मांस का हृदय आ गया है; सूखी भावनाएँ पिघल गई हैं, और शान्ति नदी के समान बहती है। क्या आपके पास यह है? क्या आप अपने भीतर इसका अनुभव करते हैं?
यदि ऐसा है, तो निरन्तर अपना मुकद्दमा मसीह की वकालत को सौंपते रहकर उसे उसी पर छोड़ दीजिए; उसमें बने रहिए, और उसे अपने में बने रहने दीजिए, और आप उतने ही सुरक्षित हैं जितना सर्वशक्तिमान की भुजाओं का घेरा आपको सुरक्षित बना सकता है।
