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तुच्छ बातें—मुझे बताइए, वे क्या थीं? मान लीजिए मसीह आपसे प्रश्न करे और पूछे—पृथ्वी पर ऐसा क्या है कि तुम उससे इतना प्रेम करो? पाप में ऐसा क्या है कि तुम उसे मेरी कृपा और मेरे प्रेम से बढ़कर मूल्यवान समझो? वे छोटे-छोटे भोग-विलास क्या हैं—वे अति तुच्छ वस्तुएँ जो काम में लाते-लाते सदा नाश हो जाती हैं? व्यर्थ ही व्यर्थ, सब कुछ व्यर्थ है। अत्यन्त तिरस्कार के योग्य! आप बिना किसी उचित कारण के पाप को पकड़े रहे हैं। परन्तु ओह, सोचिए कि आपने किन प्रेरणाओं से लड़ाई की है और किनका विरोध किया है—लगभग असीम बलवाली प्रेरणाओं का! परमेश्वर की व्यवस्था से उत्पन्न होनेवाली प्रेरणाओं के विषय में सोचिए—वह व्यवस्था जो अपने आप में इतनी उत्तम है, परन्तु उल्लंघन करनेवालों के विरुद्ध अपने दण्डों में इतनी भयानक है; और फिर सुसमाचार में परमेश्वर के असीम प्रेम के विषय में भी सोचिए; कैसे उसने अपने महान हृदय की जीवन-धाराएँ खोल दीं, और परमेश्वर के योग्य परिपूर्णता से आशीषें बहने दीं! फिर भी सोचिए कि इस प्रेम के होते हुए भी आपने अपने परमेश्वर का कितना अधिक अनादर किया है। आप ऐसे चलते रहे हैं मानो पाप की प्रेरणाएँ ही सबसे अधिक मनानेवाली हों, और मानो भलाई के विषय में पाप की प्रतिज्ञाएँ
परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से अधिक भरोसे योग्य हों। जब परमेश्वर ने स्वर्ग की महिमाओं को, जो पवित्रता की शोभा में सब प्रकार से आकर्षक और मनोहर बनाई गई हैं, आपके सामने फैलाया, तो आपने ठण्डेपन से उत्तर दिया—पृथ्वी कहीं अच्छी है! जब तक
मुझे पृथ्वी मिल सकती है, तब तक मुझे पृथ्वी दो, और स्वर्ग केवल तब, जब पृथ्वी मेरे पास और न रह सके! हे पापी, यदि आपने परमेश्वर का विरोध न किया होता और उसके निमंत्रणों और उसकी विनतियों को पाँवों तले न रौंदा होता, तो आपका मन-परिवर्तन बहुत पहले हो चुका होता।
ओह, यह नैतिक कर्ता होना कैसी बात है! इसकी शक्ति कितनी भयानक है, और इसलिए इसके उत्तरदायित्व कितने महत्वपूर्ण होने चाहिए। जब परमेश्वर एक प्रकार की नैतिक सर्वशक्ति के साथ ज्योति और सामर्थ की लहरों में अपने प्रभाव उँडेल रहा होता है, तब आप उन सबका विरोध करते और उनके सामने अड़े रहते हैं! मानो आप परमेश्वर के होते हुए भी जो चाहें कर सकते हों! मानो आपके मन को पाप करने के उसके अपने दृढ़ उद्देश्य से हटाने में उसका प्रभाव लगभग पूरी तरह शक्तिहीन हो!
क्या अपने हथियार डाल देने के लिए बड़ी शक्ति चाहिए? सचमुच, यह तो बिलकुल नई बात है; क्योंकि कोई भी यही समझेगा कि बड़ी शक्ति तो विरोध करने और लड़ने के लिए चाहिए। और इस प्रकार आप अपनी बड़ी शक्ति परमेश्वर के विरुद्ध लड़ने में लगाते हैं, और यह विश्वास करना चाहते हैं कि आपके पास अपने हथियार डाल देने भर की शक्ति नहीं है! ओह, पाप की और पाप करने के लिए पापी के बहानों की यह कैसी मूर्खता है!
परन्तु आप कहते हैं—मुझे पवित्र आत्मा अवश्य मिलना चाहिए। मैं उत्तर देता हूँ, हाँ; परन्तु केवल आपके स्वेच्छा से किए गए विरोध पर जय पाने के लिए। बस इतना ही।
जब मैं अपने उस मित्र के साथ, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ, इन सब बातों पर विचार कर चुका, तो वह बहुत व्याकुल हो गया। उसके रोम-रोम से पसीना फूट निकला; उसकी भावनाएँ उस पर हावी हो गईं; उसने अपना सिर घुटनों पर टिका दिया, और गहरे-से-गहरे विचार में डूब गया और भावना से भर गया। मैं उठकर सभा में चला गया। सभा कुछ देर चल चुकी थी कि वह भीतर आया; परन्तु ओह, वह कितना बदल गया था! उसने कहा, “प्रिय पत्नी, मैं नहीं जानता कि मेरी नास्तिकता का क्या हुआ। मुझे तो नरक में भेजा जाना चाहिए!
मैं परमेश्वर पर कैसे-कैसे दोष लगाता रहा हूँ! और फिर भी मेरे परमेश्वर ने कैसी अद्भुत दया के साथ मुझे सहा और मुझे जीवित रहने दिया!” वास्तव में उसने पाया कि वह पूरी तरह ग़लत था, और वह पूरी तरह टूट गया और परमेश्वर के सामने एक छोटे बालक के समान बन गया।
और हे पापी, आप भी जानते हैं कि आपको परमेश्वर के लिए जीना चाहिए, फिर भी आप नहीं जिए; आप जानते हैं कि यीशु ने उस व्यवस्था की आहत प्रतिष्ठा के लिए, जिसका आपने उल्लंघन किया, अपने आप को बलिदान कर दिया, फिर भी
