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यह माँगता है कि आप अपनी सारी सामर्थ के मूल स्रोत पर हाथ रखें, ठीक वहीं काम करें जहाँ आपकी केन्द्रीय सामर्थ स्थित है—जहाँ, जब तक आपके पास विवेकशील मन और नैतिक स्वभाव है, तब तक आपमें सदा-सर्वदा सामर्थ रहती ही है। आपकी स्वतंत्रता अपनी इच्छा के अनुसार अपनी मांसपेशियों को हिलाने की शक्ति में नहीं है, क्योंकि आपकी मांसपेशियों और आपकी इच्छा के बीच का सम्बन्ध टूट सकता है, और हर हाल में वह सम्बन्ध तभी अनिवार्य रूप से बना रहता है जब आपकी देह अपनी सामान्य दशा में हो; इसलिए परमेश्वर आपसे मांसपेशियों की कोई विशेष हरकत करने की माँग नहीं करता, बल्कि केवल अपनी इच्छा बदलने की। अन्य सब बातों की तुलना में यही वह बात है जिसे आप सदा कर सकते हैं, और किसी भी अन्य बात से अधिक निश्चय के साथ कर सकते हैं।
फिर, यदि हम संकल्पों को अन्तिम उद्देश्यों से भिन्न मानें, और उन्हें बाहरी कार्यों से ठीक पहले आनेवाला समझें, तो परमेश्वर संकल्पों की माँग नहीं करता, बल्कि वह अपनी माँग सीधे अन्तिम उद्देश्यों पर रखता है। जब अन्तिम उद्देश्य निश्चित हो जाते हैं, तो ये अधीनस्थ संकल्प स्वाभाविक रूप से और अनिवार्य रूप से उनके पीछे-पीछे आते हैं। इसलिए ठीक-ठीक कहें तो आपकी स्वतंत्रता इन अधीनस्थ संकल्पों में नहीं है—जैसे बैठने, चलने, बोलने का संकल्प। परन्तु वह अन्तिम उद्देश्य जो सब संकल्पों को नियंत्रित करता है, और उस मुख्य लक्ष्य से सम्बन्ध रखता है जिसके पीछे आप चलेंगे—उदाहरण के लिए, यह कि आप सब बातों में परमेश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करेंगे, या इसके विपरीत अपने आप को प्रसन्न करने का प्रयत्न करेंगे—यही वह ठीक बिन्दु है जिसमें आपके स्वतंत्र कार्य की स्वतंत्रता निहित है, और यही वह बिन्दु है जिस पर परमेश्वर अपनी नैतिक माँगें रखता है। सारा प्रश्न यह है कि आप परमेश्वर को प्रसन्न करेंगे या अपने आप को? क्या आप अपना मन उसे देंगे, या अपने स्वार्थपूर्ण भोग-विलास को? जब तक आप अपना मन स्वार्थपूर्ण सुख को देते रहेंगे और उसे परमेश्वर से रोके रखेंगे, तब तक आपके लिए पाप करना पूरी तरह स्वाभाविक रहेगा। ठीक यही कारण है कि पापियों के लिए पाप करना इतना स्वाभाविक है। इसका कारण यह है कि उनकी इच्छा, उनका मन, उसी पर लगा हुआ है, और उन्हें केवल इस शासन करनेवाली प्रवृत्ति और उद्देश्य को पूरा करना होता है। परन्तु केवल इस शासन करनेवाले उद्देश्य को बदल दीजिए, और आप पाएँगे कि आज्ञापालन अपने सब बाहरी कार्यों में उतना ही स्वाभाविक और उतना ही सहज है। तब हर बात में परमेश्वर को प्रसन्न करना स्वाभाविक हो जाएगा। अभी तो अपने आप को प्रसन्न करना काफ़ी स्वाभाविक है। क्यों? क्योंकि आप अपने आप को प्रसन्न करने के लिए समर्पित हैं। परन्तु इस उद्देश्य को बदल दीजिए; एक नया और पूरी तरह विपरीत समर्पण कीजिए; जिस मन को आपने सौंप रखा है उसकी दिशा उलट दीजिए, और उसे अपने लिए नहीं, परमेश्वर के लिए कर दीजिए; तब सारा कर्तव्य उसी कारण से सहज हो जाएगा जिस कारण से अभी सारा पाप इतना सहज है।
यह बात सच होने से इतनी दूर है कि आप अपना मन नया करने में असमर्थ हैं, कि सच्चाई यह है कि यदि आपने परमेश्वर का विरोध न किया होता जब वह आपको पश्चाताप की ओर प्रेरित करने का प्रयत्न कर रहा था, तो आप बहुत पहले ही ऐसा कर चुके होते। क्या आप नहीं जानते कि आपने बार-बार परमेश्वर के आत्मा का विरोध किया है? आप इसे भली-भाँति जानते हैं। आपका यह बोध इतना स्पष्ट था कि आपको परमेश्वर के लिए जीना चाहिए, कि आपको अपने ही विवेक की हर पुकार का विरोध करना पड़ा, और जाने-पहचाने कर्तव्य के ठीक सामने से होकर चलना पड़ा, और सीधे परमेश्वर के विरुद्ध अपना रास्ता बनाना पड़ा। यदि आपने केवल अपनी बुद्धि की आवाज़ और अपने विवेक की माँगों को सुना होता, तो आपके पास बहुत पहले ही नया मन होता। परन्तु आपने परमेश्वर का विरोध किया जब
उसने आपको नया मन पाने के लिए समझाने का प्रयत्न किया। हे पापी, परमेश्वर का विरोध करने में आप कितने बलवन्त रहे हैं! आपकी समझ और आपकी बुद्धि के सामने रखे गए हर विचार का विरोध करने में कितने बलवन्त! पाप करने के पक्ष में दिए गए तर्कों को आपने कैसी विचित्र रीति से सुना है! ओह, वे दयनीय
