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14. भीतरी और बाहरी प्रकाशन।
14. भीतरी और बाहरी प्रकाशन।
बहुत-से लोग मानते हैं कि हमारे देश में, विशेषकर जवानों के बीच, एक ढीली-ढाली और अनिश्चित नास्तिकता इस समय जितनी फैली हुई है, उतनी शायद ही कभी—यदि कभी—फैली हो। मैं यह कहने को तैयार नहीं हूँ कि यह एक ईमानदार नास्तिकता है, फिर भी बहुत सम्भव है कि यह वास्तविक हो। जवान सचमुच मसीही पवित्रशास्त्र की ईश्वरीय प्रेरणा पर सन्देह कर सकते हैं—इसलिए नहीं कि उन्होंने उस पवित्रशास्त्र और उसके अनगिनत प्रमाणों का ईमानदारी से अध्ययन किया है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उसे बहुत कम पढ़ा है और उस पर उचित रीति से तर्क उससे भी कम किया है। विशेष रूप से, वे लगभग सब के सब अपने ही मन की अन्तर्बोधी पुष्टियों का अध्ययन करने से चूक गए हैं। उन्होंने उस मूल प्रकाशन की जाँच नहीं की है जो परमेश्वर ने हर एक मनुष्य के प्राण में किया है, यह देखने के लिए कि वह उन्हें कहाँ तक ले जाएगा, और वह परमेश्वर के वचन में दिए गए प्रकाशन को समझने के लिए, और वास्तव में उसे अपनाने के लिए भी, कितनी अद्भुत रीति से मार्ग खोल देता है।
इन बातों को, और इनसे मिलती-जुलती बातों को, आपके मन के सामने रखने के लिए मैंने पौलुस के ये शब्द अपने पाठ के रूप में लिए हैं: “सत्य को प्रगट करके, परमेश्वर के सामने हर एक मनुष्य के विवेक में अपनी भलाई बैठाते हैं।”—2 कुरिन्थियों 4:2।
पौलुस उस सुसमाचार की सेवकाई की चर्चा कर रहा है जो उसे मिली थी, और बता रहा है कि उसने उसे कैसे पूरा किया। वह साफ़ दिखाता है कि उसने मनुष्य के विवेक को सम्बोधित करके प्रचार करने का प्रयत्न किया। उसने हर एक मनुष्य के हृदय में एक विवेक पाया जिससे वह अपील कर सकता था, और जिसमें सत्य का प्रगट होना आप ही अपनी भलाई बैठा देता था।
सम्भवतः कोई भी विचारशील मनुष्य बाइबल को यह ध्यान दिए बिना कभी नहीं पढ़ पाया कि किसी न किसी रीति से मनुष्य को पहले ही एक प्रकाशन दिया जा चुका है। वह बहुत-सी बातों को पहले से ज्ञात मानकर चलती है। शायद मैंने आप में से कुछ लोगों के सुनते हुए कहा होगा कि जब मैंने अपनी पहली बाइबल खरीदी, तब मैं अपने वकालत के दफ़्तर में क़ानून की पढ़ाई कर रहा था, और मैंने उसे अपनी क़ानून की पुस्तकों में से एक के रूप में खरीदा था। मैंने उसे
खोला ही था कि मैं यह देखकर चकित रह गया कि वह कितनी बातों को पहले से ज्ञात मान लेती है, और इसलिए उन्हें प्रमाणित करने का कोई प्रयत्न किए बिना ही कह देती है। उदाहरण के लिए, बाइबल का पहला पद: “आदि में
परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।” यह परमेश्वर के अस्तित्व को मानकर चलता है। यह इस सत्य को प्रमाणित करने का प्रयत्न नहीं करता; यह इस धारणा पर आगे बढ़ता है कि यह प्रकाशन—अर्थात् एक परमेश्वर का अस्तित्व—उन सब पर पहले ही प्रगट किया जा चुका है जो उसे समझने के लिए पर्याप्त परिपक्व हैं। प्रेरित
पौलुस भी रोमियों के नाम अपनी पत्री में दृढ़ता से कहता है कि उस एक परमेश्वर का वास्तविक परमेश्वरत्व और सनातन सामर्थ, यद्यपि किसी अर्थ में “अनदेखी बातें” हैं, फिर भी जगत की सृष्टि में “स्पष्ट दिखाई देते हैं,” और “उसके बनाए हुए कामों के द्वारा समझे जाते हैं,” यहाँ तक कि सब दुष्ट मनुष्य निरुत्तर हैं। उसकी शिक्षा यह है कि सृजा हुआ विश्व परमेश्वर को प्रगट करता है। और यदि यह हमारे बाहर के विश्व के विषय में सच है, तो हमारे भीतर के विश्व के विषय में भी यह कम सच नहीं है। हमारे अपने मन—उनकी दृढ़ धारणाएँ, उनकी अनिवार्य पुष्टियाँ—सचमुच परमेश्वर को प्रगट करते हैं, और उन बहुत-से महान सत्यों को भी जो उसके साथ और उसके शासन के साथ हमारे सम्बन्धों से जुड़े हैं।
जब हम बाइबल को ध्यान से पढ़ते हैं, और देखते हैं कि वह अत्यन्त महत्त्व की कितनी बातों को, उन्हें प्रमाणित करने का प्रयत्न किए बिना, मानकर चलती है और अपनी आज्ञाओं को उन्हीं पर आधारित करती है, तो हम यह पूछे बिना नहीं रह सकते—क्या ये मान्यताएँ उचित रूप से मानी गई हैं?
इस प्रश्न का उत्तर तब मिलता है जब हम अपनी दृष्टि भीतर की ओर मोड़ते हैं और अपने ही मन की अन्तर्बोधी पुष्टियों को खोजते हैं। तब हम देखेंगे कि हमारे पास एक बौद्धिक और नैतिक स्वभाव है, जो परमेश्वर के विषय में, और उसके तथा व्यवस्था के साथ हमारे सम्बन्धों के विषय में, महान सत्यों को उतनी ही सच्चाई से प्रगट करता है, जितनी सच्चाई से भौतिक जगत उसकी सनातन सामर्थ और परमेश्वरत्व को प्रगट करता है।
उदाहरण के लिए, हम देखेंगे कि मनुष्य का एक नैतिक स्वभाव है जो आत्मिक और नैतिक सत्य से उतना ही वास्तविक रूप से सम्बन्धित है, जितना उसका शारीरिक स्वभाव भौतिक जगत से सम्बन्धित है। जैसे उसकी इन्द्रियाँ—देखना, छूना, सुनना—बाहरी जगत के विषय में कुछ सत्यों को सहज बोध से ग्रहण करती हैं, वैसे ही उसका आत्मिक स्वभाव आत्मिक जगत के विषय में कुछ सत्यों को सहज बोध से ग्रहण करता है। कोई भी मनुष्य पहली श्रेणी के सत्यों पर भली-भाँति विचार करे, तो वह दूसरी श्रेणी के सत्यों पर विचार करने और उन पर विश्वास करने के लिए विवश हुए बिना नहीं रह सकता।
आइए, देखें कि क्या यह सच है।
कुछ ही समय पहले मेरी एक काफ़ी बुद्धिमान युवती से कई बार भेंट हुई, जो संशयवादी थी। वह एक परमेश्वर में, और उसके गुणों से सम्बन्धित उन महान सत्यों में विश्वास करने का दावा करती थी जो देववाद (डीइज़्म) में सम्मिलित हैं; परन्तु वह बाइबल को, और उद्धार के प्रगट किए गए मार्ग से सम्बन्धित हर बात को, पूरी तरह अस्वीकार करती थी।
मैंने आरम्भ में उसके मन के सामने कुछ ऐसे महान सत्य रखे जो परमेश्वर, उसके गुणों और उसके शासन के विषय में मन की अपनी ही पुष्टियों के द्वारा सिखाए जाते हैं; और फिर वहाँ से आगे बढ़कर मैंने उसे दिखाया कि किस प्रकार बाइबल आकर सत्य की एक ऐसी पूर्ण प्रणाली बनाती है जो एक खोए हुए पापी के रूप में मनुष्य के लिए आवश्यक है। पहली बात को तो उसने स्वाभाविक रूप से मान लिया; और तब उसने देखा कि यदि पहली बात सच है तो दूसरी भी अवश्य सच होनी चाहिए, नहीं तो मनुष्य के लिए निराशाजनक विनाश के सिवा और कुछ नहीं रह जाता। निराशा की खाई से भय के मारे पीछे हटते हुए उसने देखा कि केवल उसका अविश्वास ही उसके प्राण का नाश कर रहा था; और तब उसे त्यागकर उसने अपना हृदय परमेश्वर को सौंप दिया और विश्वास करने में सुसमाचार की शान्ति और आनन्द पाया।
अब मैं आपके सामने लगभग विचारों का वही क्रम रखना चाहता हूँ जो मैंने उसके सामने रखा था।
और यहाँ पहला बड़ा प्रश्न यह है—हमारा अपना स्वभाव, जो परमेश्वर का पहला प्रकाशन है, हमें कौन-से विचार देता है?
(1.) निःसन्देह, परमेश्वर का विचार। हमारे अपने मन यह पुष्टि करते हैं कि एक परमेश्वर है और अवश्य होना चाहिए; कि उसके पास सारी सामर्थ और सारा ज्ञान अवश्य होना चाहिए। हमारा मन हमें परमेश्वर के नैतिक गुण भी देता है। कोई भी मनुष्य इस पर सन्देह नहीं कर सकता कि परमेश्वर भला और न्यायी है। मनुष्य कभी यह नहीं डरते कि परमेश्वर कोई ग़लत काम करेगा।
यदि वे परमेश्वर से डरते भी हैं, तो इसलिए कि वह भला है—न्यायी और पवित्र है।
(2). मनुष्य का स्वभाव उसे व्यवस्था का—नैतिक व्यवस्था का—विचार देता है। वह एक ऐसी नैतिक व्यवस्था के अस्तित्व पर, जो स्वयं उस पर भी लागू की गई है, उतना ही कम सन्देह कर सकता है जितना वह अपने प्राण और शरीर के अस्तित्व पर। वह जानता है कि उसे स्वार्थी नहीं होना चाहिए—परोपकारी होना चाहिए। वह जानता है कि वह अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के लिए बाध्य है—और आवश्यकता हो तो निम्नतर भलाई का बलिदान करके भी उच्चतर भलाई को खोजने के लिए बाध्य है।
मनुष्यों को ये विचार कैसे मिलते हैं? मैं उत्तर देता हूँ, उन्हें ये स्वभाव से ही मिले होने चाहिए; मनुष्य के होंठों से मिलनेवाली किसी भी प्रत्यक्ष शिक्षा से पहले ही ये मन में अवश्य होने चाहिए, नहीं तो आप किसी बच्चे को ये विचार कभी न सिखा सकते, ठीक वैसे ही जैसे आप इन्हें किसी घोड़े को नहीं सिखा सकते। बच्चा सिखाए जाने से पहले ही इन बातों को जानता है, और उसे याद नहीं कि ये विचार पहली बार उसमें कब आए।
मान लीजिए कि आप अपनी बाइबल बन्द कर दें और पूछें, अब, इस पुस्तक की सारी शिक्षा को अलग रखकर, मैं कितना जानता हूँ? मुझे कितना मानना ही पड़ेगा? आप पाएँगे कि आपका नैतिक स्वभाव आपको एक परमेश्वर का विचार देता है, और उसके अस्तित्व की पुष्टि करता है; वह आपको उसके स्वाभाविक और नैतिक गुण देता है, और उसके प्रति तथा अपने संगी प्राणियों के प्रति आपके अपने नैतिक सम्बन्ध भी देता है। इसके प्रमाण में मैं आप ही से अपील कर सकता हूँ—आप में से एक भी यह नहीं कह सकता,
मुझ पर परमेश्वर से प्रेम करने का कोई दायित्व नहीं है; मैं अपने संगी मनुष्यों से प्रेम करने के लिए बाध्य नहीं हूँ। आपका नैतिक स्वभाव आपको ये बातें देता है—वह इन सत्यों की पुष्टि आपके सामने उससे भी अधिक सीधे और निर्विवाद रूप से करता है, जितना आपकी इन्द्रियाँ आपको बाहरी जगत के तथ्य देती हैं। इसके अतिरिक्त, आपका नैतिक स्वभाव न केवल आपको परमेश्वर से सर्वोच्च प्रेम की, और अपने संगी मनुष्यों के प्रति समान और निष्पक्ष प्रेम की व्यवस्था देता है, बल्कि वह यह भी पुष्टि करता है कि आप पापी हैं; कि आपने
परमेश्वर को अप्रसन्न किया है—उसे प्रसन्न करने में पूरी तरह असफल रहे हैं, और इसलिए निश्चय ही आप उसकी धर्मी व्यवस्था के द्वारा दोषी ठहराए गए हैं। आप जानते हैं कि परमेश्वर की भली व्यवस्था आपको अवश्य दोषी ठहराएगी, क्योंकि आप उस अर्थ में भले नहीं रहे जिसकी वह व्यवस्था माँग करती है। इसलिए आप अवश्य जानते हैं कि आप व्यवस्था से बहिष्कृत एक अपराधी की स्थिति में हैं, व्यवस्था के द्वारा दोषी ठहराए गए, और न्याय के प्रशासन से कोई आशा न रखनेवाले।
एक और बात वह आपको देता है, अर्थात् यह कि आप अब भी पश्चाताप-रहित दशा में हैं (मैं उनकी बात कर रहा हूँ जो जानते हैं कि उनकी दशा यही है); आपका अपना विवेक हर प्रकार के खण्डन से परे यह बात आपके सामने पुष्ट करता है।
वह पुष्टि करता है कि आप अब भी पाप में जी रहे हैं, और ऐसे अर्थ में सुधरे नहीं हैं कि परमेश्वर आपके सुधार को ग्रहण कर सके। आप जानते हैं कि आप अपने ही विवेक पर अत्याचार करते हैं, और जब तक आप ऐसा कर रहे हैं, तब तक न तो आप अपना आदर कर सकते हैं और न परमेश्वर आपका आदर कर सकता है। आप जानते हैं कि जब तक आपकी यह दशा है, परमेश्वर आपको क्षमा नहीं कर सकता। नहीं, इससे भी बढ़कर, यदि वह क्षमा कर भी दे, तो उससे आपका कोई भला न होगा; आप सुखी न हो सकेंगे; यदि आपसे कह भी दिया जाए कि आप क्षमा कर दिए गए हैं, तब भी आप अपना आदर न कर सकेंगे। वास्तव में, यदि आपका स्वभाव बिना पक्षपात के बोलता, तो जब तक आप विवेक पर अत्याचार कर रहे हैं, वह आपको यह विश्वास ही न करने देता कि आप सचमुच क्षमा कर दिए गए हैं। मुझे वह समय याद है जब ये विचार मेरे मन में आग के समान थे। मैंने देखा कि कोई मनुष्य इन पर उतना ही कम सन्देह कर सकता है जितना अपने अस्तित्व पर। इसी प्रकार आप भी इन सत्यों को देख सकते हैं और उनकी शक्ति को अनुभव कर सकते हैं। तो आप जानते हैं कि अपने पापों के द्वारा आपने परमेश्वर की कृपा खो दी है, और न्याय के आधार पर उस पर आपका कोई भी दावा नहीं है। आपने उसके अधिकार को उतार फेंका है, उसकी व्यवस्था और शासन की अधीनता को अस्वीकार किया है; सच तो यह है कि आपने उसकी सारी आज्ञाओं को अपने पैरों तले डाल दिया है। अब आप परमेश्वर के सामने आकर यह नहीं कह सकते, “तुझे मुझे त्यागना नहीं चाहिए; मैंने तेरे हाथ से ऐसा पाने योग्य कुछ नहीं किया।” आप ईमानदारी से यह उतना ही कम कह सकते हैं जितना अपने अस्तित्व का इनकार कर सकते हैं।
क्या आपने कभी इस पर विचार किया है? क्या आपने कभी यह आज़माकर देखा है कि आप परमेश्वर के सामने ईमानदारी से क्या कर और कह सकते हैं? क्या आपने कभी परमेश्वर की उपस्थिति में जाकर गम्भीरता से उससे यह कहने का प्रयत्न किया है कि उसे आपको दण्ड देने का कोई अधिकार नहीं है? आप में से एक भी व्यक्ति अपने भीतर परमेश्वर-निन्दा का बोध हुए बिना उससे ऐसा नहीं कह सकता।
यह एक अच्छी विधि है, क्योंकि इससे आपको यह दिखाई दे सकता है कि वास्तव में मामला कैसा है। तो मान लीजिए कि आप इसे आज़माते हैं। देखिए कि जब आपका प्राण उसकी उपस्थिति के बोध से गहराई से प्रभावित हो, तब आप परमेश्वर के सामने ईमानदारी से और अपने विवेक की स्वीकृति के साथ क्या कह सकते हैं। ध्यान दीजिए, मैं आपसे यह नहीं पूछ रहा कि क्या आप अपना हृदय इतना कठोर कर सकते हैं और अपने विवेक का इतना उल्लंघन कर सकते हैं कि परमेश्वर के मुँह पर उसकी निन्दा करें; यह नहीं, परन्तु मैं आपसे कह रहा हूँ कि अपने विवेक की ईमानदार दृढ़ धारणाओं को परखकर देखिए कि वे क्या हैं और परमेश्वर के सामने वे आपको क्या करने और कहने देंगी। क्या आप उसके सामने घुटने टेककर कह सकते हैं, “मैं इस बात से इनकार करता हूँ कि मैंने
परमेश्वर को त्याग दिया है। मैंने कभी उसके साथ मित्र का-सा व्यवहार करने से इनकार नहीं किया। मैंने कभी उसके साथ शत्रु का-सा व्यवहार नहीं किया?”
आप जानते हैं कि आप अपने ही मन की झिड़कियाँ सहे बिना परमेश्वर के साथ इस प्रकार का कोई विवाद खड़ा नहीं कर सकते। फिर, आप व्यवस्था के अधीन क्षमा की आशा का कोई कारण नहीं देख सकते। अपने देववाद के सारे प्रकाश के साथ भी आप क्षमा का कोई आधार नहीं देख पाते। बाइबल के बाहर सब कुछ मृत्यु के समान अँधेरा है।
कोई आशा नहीं है। यदि आप कोई … संजोए हुए हैं [मूल स्कैन का अपठनीय अंश] … आपके विचार में किसी विवेकी गवर्नर को क्षमा देने के लिए राज़ी करना इतना कठिन क्यों है? जब जेरोम बोनापार्ट स्पेन का राजा था, तब नेपोलियन ने कुछ अपराधियों को क्षमा कर देने के लिए उसे वह कड़ी फटकार क्यों भेजी थी? उस उल्लेखनीय रूप से योग्य राजकीय पत्र के मूल में कौन-से सिद्धान्त थे? क्या आपने कभी उन सिद्धान्तों का अध्ययन किया है, जिस रूप में नेपोलियन के शक्तिशाली मन ने उन्हें समझा और इतनी प्रबलता से प्रस्तुत किया था?
आप परमेश्वर की भलाई से कभी यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि वह क्षमा कर सकता है; यह तो और भी नहीं कि उसे अवश्य क्षमा करना चाहिए। मैंने जिन आरम्भिक यूनिवर्सलिस्ट प्रचारकों को सुना, उनमें से एक ने आरम्भ में ही घोषणा की कि वह परमेश्वर की भलाई से यह निष्कर्ष निकालेगा कि वह सब मनुष्यों का उद्धार करेगा। मुझे अच्छी तरह याद है कि उसका कुतर्क मुझे कितना पूरी तरह उथला और उसकी मान्यताएँ कितनी बेतुकी लगी थीं। उस समय मैं मसीही नहीं था, परन्तु मैंने एक ही दृष्टि में देख लिया कि परमेश्वर की भलाई से यह निष्कर्ष निकालना कि वह सब को क्षमा करेगा, इसकी अपेक्षा कहीं अधिक उचित होता कि वह यह निष्कर्ष निकाले कि वह किसी को भी क्षमा न करेगा। मुझे यह बिलकुल स्पष्ट लगा कि यदि परमेश्वर भला है और उसने एक भली व्यवस्था बनाई है, तो वह उसे बनाए रखेगा। क्यों नहीं? मुझे यह मानना ही होगा कि उसकी व्यवस्था भली है; असीम बुद्धि और प्रेम का कोई प्राणी भली व्यवस्था के सिवा कोई और व्यवस्था कैसे लागू कर सकता है? और यदि वह भली व्यवस्था है, तो उसे कोई भला उद्देश्य पूरा करना है; और एक भला परमेश्वर उसके प्रशासन की अक्षमता के कारण उसे व्यर्थ होने देकर उसे उन उद्देश्यों को पूरा करने से चूकने नहीं दे सकता। उस समय भी मैं व्यवस्था और शासन के विषय में इतना जानता था कि देख सकूँ कि कोई व्यवस्था चाहे कितनी भी भली क्यों न हो, उससे कोई भी अच्छा परिणाम पाने के लिए प्रशासन में दृढ़ हाथ आवश्यक है। निस्सन्देह मैं जानता था कि यदि व्यवस्था को कठोर और निन्दक अपराधियों के पैरों तले रौंदे जाने के लिए छोड़ दिया जाए, और फिर सब से बढ़कर, बिना भेदभाव के क्षमा दे दी जाए, और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कुछ भी न किया जाए, तो सारे अधिकार का अन्त हो जाएगा और उसके प्रशासन के अधीन जिस भलाई की आशा की गई थी उसका पूरी तरह विनाश हो जाएगा। तो क्या विवेकशील मनुष्य परमेश्वर की भलाई से यह निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करेंगे कि वह सब पापियों को क्षमा कर देगा? मान लीजिए कि उपद्रव और अराजकता की वह भावना, जो इस समय एरी, पेन्सिलवेनिया में इतनी फैली हुई है, बद से बदतर होती चली जाए; कि उपद्रवी अपनी शक्ति भर हर प्रकार की शरारत करें; वे पटरियाँ उखाड़ दें, पुल जला दें, रेल के डिब्बों पर गोलियाँ चलाएँ, पूरी की पूरी गाड़ियों को पटरी से उतार दें और सैकड़ों लोगों के काँपते हुए शरीरों को एक साथ कुचलकर लहू और हड्डियों के ढेर बना दें; और आगे चलकर, जब दोषी पकड़े जाएँ और क़ानून की उचित प्रक्रिया से दोषी ठहराए जाएँ, तब यह प्रश्न उठे, क्या गवर्नर उन्हें क्षमा कर दे? यदि वह बुद्धिमानी से ऐसा कर सकता, तो शायद वह ऐसा करने के लिए बहुत इच्छुक भी होता; परन्तु प्रश्न यह है—क्या एक भला गवर्नर ऐसा कर सकता है? यदि वह पूर्ण रूप से भला और सचमुच बुद्धिमान हो, तो वह क्या करेगा? क्या आप कहेंगे, ओह, वह दण्ड देने के लिए बहुत भला है—वह इतना भला है कि निश्चय क्षमा कर देगा? क्या आप कहेंगे कि बिना भेदभाव के, सब को, और ऊपर से पहले दिए गए आश्वासन के अनुसार दी गई क्षमा व्यवस्था के लिए सर्वोच्च आदर और सबसे अच्छी आज्ञाकारिता सुनिश्चित करेगी? हर कोई जानता है कि यह परले दर्जे की मूर्खता है। कोई भी मनुष्य जिसे कभी शासन की ज़िम्मेदारियों के अधीन कुछ भी करना पड़ा हो, या जिसने इस सम्बन्ध में मानव स्वभाव का क ख ग भी सीखा हो, एक क्षण के लिए भी यह नहीं मान सकता कि इस प्रकार की क्षमा दण्ड का स्थान ले सकती है और उसका परिणाम पूरे विनाश के सिवा कुछ और होगा। नहीं: यदि शासक भला है, तो वह निश्चय दण्ड देगा; और उसके चरित्र में भलाई का तत्व जितना अधिक प्रधान होगा, वह उतने ही अधिक निश्चय से दण्ड देगा।
हे पापियो, आप व्यवस्था के अधीन हैं। यदि आप पाप करते हैं, तो आपको अवश्य दिखाई देना चाहिए कि परमेश्वर के पास दण्ड देने और क्षमा न करने का बड़ा कारण है।
यहाँ एक और तथ्य है। जब आप अपने आप पर और अपनी नैतिक स्थिति पर दृष्टि डालते हैं, तो आप अपने को दोहरी रीति से मरा हुआ पाते हैं। आप नागरिक रूप से मरे हुए हैं, इस अर्थ में कि आप व्यवस्था के द्वारा दोषी ठहराए गए हैं, शासन की कृपा से निकाले हुए हैं। आप नैतिक रूप से भी मरे हुए हैं, क्योंकि आप परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, न
उसकी सेवा करते हैं, और आप में ऐसी कोई प्रवृत्ति नहीं जो आपको परमेश्वर के साथ सहानुभूति में वापस खींचे; परन्तु, इसके विपरीत, आप उन सब बातों के प्रति मरे हुए हैं जो इस दिशा की ओर संकेत करती हैं। आप अपने नीच, स्वार्थी हितों के प्रति तो अवश्य जीवित हैं, परन्तु परमेश्वर के हितों के प्रति मरे हुए हैं; आपको परमेश्वर की कोई चिन्ता नहीं, सिवाय इसके कि उससे बचें और उसके न्याय से छूट जाएँ। यह सब आप निःसन्देह जानते हैं।
इस दशा में, किसी और प्रकाशन के बिना, आपकी आशा कहाँ है? आपके पास कोई आशा नहीं है, और किसी आशा का कोई आधार भी नहीं है।
इसके अतिरिक्त, यदि आगे कोई प्रकाशन दिया जाना है, जो क्षमा का कोई आधार प्रगट करे, तो जो प्रकाश अभी आपके सामने है उसी से आप देख सकते हैं कि वह किस आधार पर टिका होना चाहिए। आप देख सकते हैं कि आपको परमेश्वर से और क्या चाहिए। पहला प्रकाशन आपको परमेश्वर पर ही निर्भर छोड़ देता है—आपको दिखाता है कि यदि कभी सहायता आएगी, तो वह आपके अपने भीतर से नहीं आ सकती, परन्तु उसे परमेश्वर से ही आना होगा—वह उसके न्याय से नहीं आ सकती, परन्तु उसकी दया से ही आनी होगी—वह व्यवस्था से नहीं आ सकती, परन्तु किसी ऐसे अतिरिक्त प्रबन्ध से आनी होगी जिसके द्वारा व्यवस्था की माँगें अपराधी पर उसका दण्ड लागू करने के सिवा किसी और रीति से पूरी हो सकें। आप देख सकते हैं कि किसी को आपके लिए बीच में पड़ना होगा, जो आपका पक्ष ले सके और अपमानित व्यवस्था के सामने आपके स्थान पर खड़ा हो सके।
क्या आपने कभी इस पर विचार नहीं किया? जिस स्थिति में आप खड़े हैं, और जहाँ आपका अपना स्वभाव और आपकी अपनी दृढ़ धारणाएँ आपको खड़ा करती हैं, वहाँ आप यह कहने के लिए विवश हैं—मेरी दशा आशाहीन है!
मुझे दोहरे उद्धार की आवश्यकता है—दण्ड की आज्ञा से और पाप करते रहने से; पहले तो श्राप से, और दूसरे पाप की ओर झुके हुए हृदय से—पाप करने की प्रवृत्ति और मनोवृत्ति से। अपने खोए हुए प्राण की इन आवश्यकताओं को पूरा करनेवाले प्रकाशन की खोज करते हुए, मैं उसे कहाँ पा सकता हूँ? क्या वह प्रकृति की सारी पुस्तक में कहीं मिलता है? कहीं नहीं। अपने नैतिक अस्तित्व की अटल दृढ़ धारणाओं में झाँककर देखिए; वे आपको आपकी आवश्यकताओं के बारे में बताती हैं, परन्तु उनकी कोई पूर्ति नहीं करतीं। वे दिखाती हैं कि आपको क्या चाहिए, परन्तु उसे देने में पूरी तरह असफल रहती हैं। आपका अपना नैतिक स्वभाव दिखाता है कि आपको एक प्रायश्चित करनेवाले उद्धारकर्ता और नया बनानेवाले आत्मा की आवश्यकता है। इससे कम कुछ भी उस पापी की दशा के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता जो दोषी ठहराया गया है, व्यवस्था से बहिष्कृत है, और अपनी सारी इच्छाधीन शक्तियों के नैतिक भ्रष्टाचार के कारण दोहरी रीति से मरा हुआ है।
नास्तिकता की सबसे बड़ी बुराई यह है कि वह इस सब की उपेक्षा करती है; वह हमारे स्वभाव के एक पूरे पक्ष पर, और वह भी सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष पर, कोई ध्यान नहीं देती; वह दर्शनशास्त्र के विषय में बड़ी-बड़ी बातें तो करती है, फिर भी अपने आप को बाहरी जगत के दर्शनशास्त्र तक ही सीमित रखती है और भीतरी तथा उच्चतर स्वभाव के लिए उसके पास कोई दृष्टि नहीं है। वह इस तथ्य की उपेक्षा करती है कि हमारा नैतिक स्वभाव महान सत्यों की एक पूरी श्रेणी की पुष्टि करता है, और वह भी उससे अधिक बल और निश्चय के साथ जितना इन्द्रियाँ बाहरी जगत के तथ्यों की पुष्टि करती हैं। सचमुच, यह एक बहुत बड़ी और घातक चूक है!
1. पहले प्रकाशन के बिना दूसरा प्रकाशन सन्तोषजनक रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता था। जब बाइबल परमेश्वर को प्रगट करती है, तो वह मानकर चलती है कि हमारे मन उसके अस्तित्व की पुष्टि करते हैं और हमें किसी ऊँचे प्रमाण की आवश्यकता नहीं। जब वह उसकी व्यवस्था प्रगट करती है, तो वह पहले से मानती है कि हम उसे समझने और उसके नैतिक दावों का मूल्य पहचानने के योग्य हैं। जब वह कर्तव्य ठहराती है, तो वह मानकर चलती है कि हमें उसका पालन करने के दायित्व का बल अनुभव करना चाहिए।
अब, यह तथ्य कि बाइबल इस प्रकार की बहुत-सी मान्यताएँ लेकर चलती है, एक ओर उसके और दूसरी ओर मानव मन के नियमों के बीच एक घनिष्ठ और परस्पर-निर्भर सम्बन्ध स्थापित करता है। यदि ये मान्यताएँ ठीक और सच्चाई से मानी गई हैं, तो मनुष्य के बौद्धिक और नैतिक स्वभाव के साथ उसके मेल और सामंजस्य के द्वारा बाइबल का ईश्वरीय अधिकार भरपूर रूप से प्रमाणित होता है। वह उन प्राणियों के ठीक अनुरूप है जिन्हें वह दी गई है। परन्तु, दूसरी ओर, यदि ये मान्यताएँ जाँचने पर झूठी सिद्ध होतीं, तो पवित्रशास्त्र की यह प्रतिष्ठा बनाए रखना असम्भव होता कि वह एक बुद्धिमान और सच्चे प्राणी की ओर से आया है। 2. पहला प्रकाशन पास होते हुए दूसरे को अस्वीकार करना अत्यन्त बेतुका है। दूसरा प्रकाशन बहुत हद तक पहले की ही पुनः पुष्टि है, जिसमें पूरक प्रकार की विविध महत्त्वपूर्ण बातें जोड़ी गई हैं, जैसे प्रायश्चित, और इसलिए क्षमा की सम्भावना; आत्मा का वरदान और कार्य, और इसलिए उसी के अनुरूप पाप करते रहने से बचाए जाने की सम्भावना।
अब वे बातें जिनकी पुष्टि पहला प्रकाशन करता है और दूसरा फिर से करता है, नैतिक प्राणियों के प्रति नैतिक कर्तव्य के किसी भी प्रकाशन में इतनी मूलभूत हैं कि जब वे हमें इतने अन्तर्बोधी रूप से, इतने निर्विवाद रूप से सिखाई गई हैं, तब यदि हम दूसरे को अस्वीकार करें तो हम अपने ही द्वारा घोर बेतुकेपन के दोषी ठहरते हैं। तर्क की दृष्टि से, लिखित प्रकाशन का इनकार करने के लिए कोई आधार शेष नहीं दिखता। यह सच है कि उसकी पूरक शिक्षाएँ अन्तर्बोधी सत्य नहीं हैं, परन्तु वे एक खोए हुए पापी के रूप में मनुष्य की आवश्यकताओं से ऐसी सम्बन्धित हैं, और उन आवश्यकताओं को इतनी भरपूरी से पूरा करती हैं; इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के शासन की आवश्यकताओं से इतनी सुन्दरता से सम्बन्धित हैं, और उन्हें इतनी पूर्णता से पूरा करती हैं, कि कोई भी समझदार मन, जो इन सब बातों को एक बार उनके वास्तविक सम्बन्धों में समझ ले, उनकी सच्चाई को पहचाने बिना नहीं रह सकता।
3. पहले का अध्ययन दूसरे को बौद्धिक रूप से ग्रहण करवाता है। मैं नहीं मानता कि किसी मनुष्य के लिए यह सम्भव है कि वह पहले प्रकाशन को भली-भाँति पढ़े और समझे, और फिर दूसरे के पास आकर उसके अपने नैतिक स्वभाव और नैतिक दृढ़ धारणाओं से, और अपनी नैतिक आवश्यकताओं से भी, उसके सम्बन्ध को ठीक-ठीक समझे, और फिर भी यह कहने के लिए विवश न हो—सब कुछ सच है; यह पुस्तक पूरी की पूरी सच है!
दोनों इतनी अद्भुत रीति से मेल खाते हैं, और पहला दूसरे का इतनी उत्तमता से और इतनी विजयपूर्ण रीति से समर्थन करता है, कि मनुष्य अपने सारे नैतिक सम्बन्धों को जान लेने के बाद बाइबल का उतना ही कम इनकार कर सकता है जितना अपने अस्तित्व का।
4. आप देखते हैं कि इतने लोग बाइबल को क्यों अस्वीकार करते हैं। उन्होंने स्वयं को भली-भाँति नहीं पढ़ा है। उन्होंने भीतर झाँककर उस पुस्तक को ध्यान से नहीं पढ़ा जिसे परमेश्वर ने वहाँ लिखकर रखा है। उन्होंने अपने नैतिक स्वभाव की निरन्तर उठती हुई दृढ़ धारणाओं को चुप कराने और दबा देने की युक्ति निकाल ली है।
उन्होंने आवश्यकता की उस पुकार को सुनने से इनकार किया है जो उनके दोष से व्याकुल हृदय में से उमड़ती है। इसलिए प्रकाशन की एक पूरी पुस्तक अब भी ऐसी है जिससे वे आश्चर्यजनक रूप से अनजान हैं। यही अज्ञानता बाइबल को उनके अस्वीकार करने का कारण है।
इस विषय पर थोड़ा ध्यान देने से आप देखेंगे कि यहाँ संकेत किया गया आधार निःसन्देह वही है जिस पर हर मसीही देश में जनसाधारण वास्तव में बाइबल पर अपना विश्वास टिकाते हैं। उनमें से दस हज़ार में से मुश्किल से एक ने ईश्वरीय प्रकाशन के पक्ष में ऐतिहासिक तर्क का विस्तार से और ध्यानपूर्वक ऐसा अध्ययन किया होगा कि समझ-बूझकर उसे बाइबल पर अपने विश्वास की आधारशिला बना सके। उनसे ऐसी माँग करना उचित भी नहीं है। एक ऐसा तर्क है जो छोटा भी है और असीम रूप से अधिक विश्वास दिलानेवाला भी। यह एक सरल प्रश्न है; दिया गया है: एक प्राण जो दोषी, दण्ड की आज्ञा पाया हुआ और नष्ट है; ज्ञात करना है: कोई पर्याप्त उपाय। सुसमाचार इस प्रश्न को हल कर देता है। कौन इस हल को स्वीकार न करेगा? यह हर शर्त को पूरी तरह पूरा करता है; इसलिए यह अवश्य परमेश्वर की ओर से आया है; कम से कम इसे स्वीकार करना हमारी सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।
यदि इसके उत्तर में यह कहा जाए कि ऐसा प्रश्न केवल उन्हीं की दशा पर लागू होता है जो अपना हृदय परमेश्वर को दे देते हैं, तो उसे एक और वर्ग के लिए इस प्रकार बदला जा सकता है: दिया गया है: एक नैतिक स्वभाव जो परमेश्वर, व्यवस्था, दायित्व, दोष और विनाश की पुष्टि करता है; ज्ञात करना है: कि क्या एक ऐसा लिखित प्रकाशन भरोसे योग्य है, जो मनुष्य की अन्तर्बोधी पुष्टियों की विस्तृत नींव पर बना है; जो उन्हें मनुष्य के सृष्टिकर्ता की स्वीकृति देता है; जो उनके साथ कर्तव्य और उद्धार की एक ऐसी प्रणाली जोड़ता है जो मनुष्य के लिए अन्तर्बोधी सत्य के साथ अविभाज्य रूप से गुँथ जाती है, और स्पष्ट रूप से नैतिक शिक्षाओं और साधनों की ऐसी पूर्ति करती है जो मनुष्य और उसके रचयिता दोनों के लिए पूर्ण रूप से उपयुक्त है। बाइबल में हमारे पास ठीक वही वस्तु है जिसकी आवश्यकता है। जो चाबी ऐसे ताले के अनगिनत खाँचों में से होकर ठीक-ठीक घूम जाती है, वह अवश्य उसी में बैठने के लिए बनाई गई होगी। दोनों एक ही रचयिता से आए हैं। आप मनुष्य की उत्पत्ति परमेश्वर से मानें, तो आपको बाइबल की उत्पत्ति भी वहीं से माननी ही पड़ेगी।
जब मैं अपनी दृढ़ धारणाओं के प्रकाश में इन बातों की जाँच करने लगा, तो मुझे आश्चर्य हुआ कि मैंने इन्हें पहले सच्चे रूप में क्यों नहीं देखा था। मान लीजिए कि मैं यहाँ खड़े होकर आपके सामने नैतिक व्यवस्था की दो बड़ी आज्ञाओं की घोषणा करूँ; क्या उनका स्पष्ट स्वरूप और उनके प्रभाव आपके मन पर यह दृढ़ धारणा न बैठा देंगे कि ये आज्ञाएँ अवश्य सच्ची हैं और अवश्य परमेश्वर की ओर से हैं? जैसे-जैसे मैं विस्तार की बातों में उतरता जाता, आप फिर भी यही पुष्टि करते—ये अवश्य सच हैं; ये निश्चय ही स्वर्ग से उतरी हैं।
यदि मैं मूसा की व्यवस्था तक भी पीछे जाऊँ (एक ऐसी व्यवस्था जिस पर बहुत-से लोग आपत्ति करते हैं, क्योंकि वे उन परिस्थितियों को नहीं समझते जिनके कारण ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता पड़ी)—फिर भी यदि मैं उनकी विशेष परिस्थितियों को, और ऐसी विधियों के कारणों को समझाऊँ, तो हर मनुष्य को उन विधियों की भी उचितता की पुष्टि करनी ही पड़ेगी। मैं जानता हूँ कि पुराना नियम सत्य को एक परदे के नीचे प्रगट करता है, क्योंकि उस समय संसार उसके अधिक स्पष्ट प्रकाशन के लिए तैयार नहीं था। वह परदा तब हटा दिया गया जब, समय के पूरे होने पर, लोग शरीर में प्रगट हुए परमेश्वर के बादल-रहित प्रकाशनों के लिए तैयार हो गए।
इसलिए, जनसाधारण बाइबल को इस कारण ग्रहण नहीं करते कि वे भोले-भाले हैं और इसलिए बेतुकी बातों को आसानी से निगल जाते हैं; परन्तु कारण यह है कि वह हर मनुष्य के अपने स्वभाव के सामने और उसकी गहरी और अटल दृढ़ धारणाओं के सामने अपने आप को इतनी अनिवार्य रीति से उचित ठहराती है कि वह उसे ग्रहण करने के लिए विवश हो जाता है—यदि वह उसे अस्वीकार करे तो उसे अपनी भीतरी दृढ़ धारणाओं पर अत्याचार करना पड़ेगा। मनुष्य का सारा स्वभाव पुकार उठता है—मुझे ठीक इसी की आवश्यकता है! वह युवती, जिसकी मैंने चर्चा की, जब इस बिन्दु पर पहुँची तो
अपनी नास्तिकता को छोड़कर अपना हृदय परमेश्वर को सौंपे बिना न रह सकी।
मैंने कहा—क्या आप मानती हैं कि परमेश्वर है? उसने उत्तर दिया—हाँ। क्या आप मानती हैं कि व्यवस्था है? हाँ। क्या आप अपना व्यक्तिगत दोष मानती हैं? हाँ। और उद्धार की अपनी आवश्यकता को भी? ओह, हाँ। क्या आप अपनी सहायता आप कर सकती हैं? मैंने पूछा।
आह, कदापि नहीं, उसने कहा, मुझे विश्वास नहीं कि मैं कभी उद्धार पा सकूँगी।
परन्तु परमेश्वर आपका उद्धार कर सकता है। निश्चय ही उसके लिए कोई बात कठिन नहीं है।
हाय, उसने उत्तर दिया, मेरे अपने स्वभाव ने मुझे घेरकर बन्द कर दिया है—मैं निराशा में हूँ; मेरे लिए बच निकलने का कोई मार्ग नहीं है; बाइबल को तो, आप जानते हैं, मैं मानती नहीं; और यहाँ मैं अन्धकार और निराशा में पड़ी हूँ!
इस बिन्दु पर मैंने सुसमाचार की बात करनी आरम्भ की। मैंने उससे कहा—देखिए; जैसा सुसमाचार में प्रगट किया गया है, परमेश्वर ने ऐसे-ऐसे काम किए हैं; वह नीचे उतर आया और मनुष्य के शरीर में वास किया ताकि आप जैसे पापियों की दशा का उपाय करे; उसने पाप के लिए भरपूर प्रायश्चित किया; अब, इसके विषय में आप क्या सोचती हैं? “मुझे ठीक इसी की आवश्यकता है,” उसने कहा, “काश, यह सच होता।”
यदि यह सच नहीं है, मैंने कहा, तो आप आशा से परे खोई हुई हैं! तो फिर विश्वास क्यों नहीं करतीं?
मैं इस पर विश्वास नहीं कर सकती, उसने कहा, क्योंकि यह अविश्वसनीय है। यह इतना अधिक अच्छा है कि सच नहीं हो सकता!
और क्या परमेश्वर भला नहीं है, मैंने कहा—असीम रूप से भला? तो फिर आप यह आपत्ति क्यों करती हैं कि उसका कोई काम इतना अधिक अच्छा है कि सच नहीं हो सकता?
“मुझे इसी की आवश्यकता है,” उसने फिर दोहराया, “परन्तु यह कैसे हो सकता है?”
तो आप परमेश्वर को इतना भला होने का श्रेय नहीं दे सकतीं! मैंने कहा।
हाय, मैं देखती हूँ कि यह मेरा अविश्वास है; परन्तु मैं विश्वास नहीं कर पाती। मुझे इसी की आवश्यकता है, यह मैं साफ़ देख सकती हूँ; परन्तु मैं इस पर विश्वास कैसे करूँ? इस बिन्दु पर मैं उठ खड़ा हुआ और गम्भीरता से उससे कहा—निर्णय की घड़ी आ पहुँची है!
अब आपके लिए केवल एक ही प्रश्न है—क्या आप सुसमाचार पर विश्वास करेंगी? उसने अपनी आँखें उठाईं, जो आधे घंटे या उससे भी अधिक समय से झुकी और ढँकी हुई थीं; उसके चेहरे का हर भाव तीव्रतम व्याकुलता प्रगट कर रहा था; और मैं दोहरा रहा था—क्या आप परमेश्वर पर विश्वास करेंगी? क्या आप उसे सच्चे मन का होने का श्रेय देंगी? वह घुटनों के बल गिर पड़ी, और फूट-फूटकर ज़ोर से रोने लगी। कैसा दृश्य था—एक संशयवादी को अपने परमेश्वर को प्रेम और सच्चाई का श्रेय देना आरम्भ करते देखना! ज्योति और आशा का द्वार खुलते देखना, और स्वर्ग के धन्य प्रकाश को एक उजड़े हुए प्राण में फूटकर प्रवेश करते देखना! क्या आपने कभी ऐसा दृश्य देखा है?
जब उसने फिर अपने होंठ खोले, तो एक उद्धारकर्ता की स्तुति प्रगट करने के लिए खोले!
बाइबल यह मानकर चलती है कि आपके पास देखने के लिए, अपना कर्तव्य करने के लिए, और स्वर्ग का मार्ग पाने के लिए पर्याप्त प्रकाश है। आप में से बहुत-से लोग शायद अपने धार्मिक विचारों के विषय में उलझन में हैं, और ढीली-ढाली तथा संशयपूर्ण धारणाएँ रखते हैं। आपने यह नहीं देखा है कि इस महिमामय सत्य को मानना और अपनाना संसार की सबसे अधिक तर्कसंगत बात है। क्या आप यह विचार किए बिना उलझन में ही आगे बढ़ते रहेंगे कि आप स्वयं सत्य का एक जीवित, चलता-फिरता प्रकाशन हैं?
क्या आप परमेश्वर और मसीह के साथ ऐसे सम्बन्धों में आने से इनकार करेंगे जो आपके प्राण का उद्धार करेंगे?
मेरे आरम्भिक जीवन में, जब मैं संशयवाद की परीक्षा में पड़ा था, मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने अपने आप से कहा—इसकी कहीं अधिक सम्भावना है कि पादरी और बाइबल पर विश्वास करनेवाले भले मनुष्यों की भीड़ सही हों, बजाय इसके कि मैं सही होऊँ। उन्होंने इस विषय की जाँच की है, परन्तु मैंने नहीं की। इसलिए मेरा सन्देह करना पूरी तरह अनुचित है।
आप क्यों न कहें—मैं जानता हूँ कि सुसमाचार मेरी आवश्यकताओं के अनुकूल है। मैं जानता हूँ कि मैं जीवन के विशाल सागर पर बह रहा हूँ, और यदि कोई सुसमाचार नहीं है, तो ऐसा कुछ भी नहीं जो मुझे बचा सके। इसलिए मेरे लिए यहाँ खड़े होकर मीन-मेख निकालना कोई उचित मार्ग नहीं है। मुझे जाँच करनी ही होगी—इस बात की गहराई में जाना ही होगा। कम से कम मैं इतना तो देख सकता हूँ कि यदि परमेश्वर मुझे दया प्रदान करता है, तो मुझे उसे अस्वीकार नहीं करना चाहिए। क्या यह
सुसमाचार आपको नहीं दिखाता कि आप नरक से और पाप से कैसे बचाए जा सकते हैं? ओह, तो उस पर विश्वास कीजिए! इस धन्य सत्य को अपने प्रवेश के लिए एक खुला हृदय पाने दीजिए। जब आप परमेश्वर को उसके सारे प्रेम और सच्चाई का श्रेय देने का साहस करेंगे, और जब आप अपने हृदय को इस सत्य की सामर्थ के अधीन कर देंगे, और अपने आप को उसके धन्य शासन के हाथ सौंप देंगे, तब वह आपके प्राण के लिए भोर का उदय होगा!
जो कोई चाहे, वह आए और जीवन का जल सेंतमेंत ले।
