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उन्हें बेतुकी व्याख्याओं तक पहुँचा दिया है। बाइबल में हर जगह मनुष्य केवल अपने स्वेच्छा से किए गए पापों के लिए दोषी ठहराए जाते हैं, और उनसे इन्हीं पापों का, और केवल इन्हीं का, पश्चाताप करने की माँग की जाती है। वास्तव में इनके अतिरिक्त और कोई पाप हो ही नहीं सकते।
फिर यह कहा जाता है कि बाइबल परमेश्वर को क्रूर दिखाती है, क्योंकि उसने यहूदियों को आज्ञा दी थी कि वे प्राचीन कनानियों के विरुद्ध सर्वनाश का युद्ध करें।
परन्तु इसे क्रूर क्यों कहा जाए? बाइबल हमें स्पष्ट रूप से बताती है कि परमेश्वर ने यह आज्ञा उनकी भयानक दुष्टता के कारण दी थी। वे इतने भयानक रूप से दुष्ट थे कि जीवित रहने योग्य न थे। परमेश्वर उन्हें पृथ्वी को अशुद्ध करने और समाज को भ्रष्ट करने नहीं दे सकता था। इसलिए वह मानवजाति के कल्याण के लिए अपनी जलन में उठा, और आज्ञा दी कि देश को ऐसी अकथनीय घृणित बातों से धोकर शुद्ध कर दिया जाए। मानवजाति की भलाई इसकी माँग करती थी। क्या यह क्रूरता थी? नहीं, कदापि नहीं; यह तो केवल परोपकार था। ऐसी जाति को मार गिराना और उसे पृथ्वी पर से मिटा देना परोपकार के सर्वोच्च कार्यों में से एक था। और यहूदियों को अपने दण्ड देनेवालों के रूप में काम में लाना, और उन्हें स्पष्ट रूप से यह समझा देना कि उसने उन्हें ऐसा करने की आज्ञा क्यों दी, उन्हें इस घटना से सर्वोच्च नैतिक लाभ प्राप्त करने के मार्ग पर रखना था। किसी और रीति से उनके मन पर यहोवा के पवित्र न्याय की इतनी गम्भीर छाप नहीं पड़ सकती थी। तो क्या अब कोई मनुष्य इस बात के लिए परमेश्वर में दोष निकालेगा?
कोई भी उचित रूप से ऐसा नहीं कर सकता।
परन्तु बाइबल दासता की अनुमति देती है।
क्या? बाइबल दासता की अनुमति देती है? किस अर्थ में अनुमति देती है? और किन परिस्थितियों में? और किस प्रकार की दासता की? यदि हम जो बातें कहते हैं उनकी निश्चितता और उनका अर्थ जानना चाहते हैं, तो ये सब बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
बाइबल ने सचमुच यहूदियों को यह अनुमति दी थी कि युद्ध में बन्दी बनाए गए लोगों के विषय में वे मृत्युदण्ड को सेवा-दासत्व में बदल दें। जब उस समय की जातियों की रीतियों के अनुसार युद्ध में पकड़े गए बन्दियों को मार डाला जाता था,
तब परमेश्वर ने यहूदियों को कुछ विशेष दशाओं में यह अधिकार दिया कि वे अपने बन्दियों को जीवित छोड़ दें और उन्हें सेवकों के रूप में काम में लाएँ।
इस उपाय से वे मूर्तिपूजक जातियों के बीच से निकाले जाते थे और सच्चे परमेश्वर की आराधना और विधियों के सम्पर्क में लाए जाते थे।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर ने इब्रानी सेवक की रक्षा के लिए ऐसी विधियाँ ठहराईं जिनसे उसकी दशा अपने पापों में नाश किए जाने की अपेक्षा असीम रूप से अच्छी हो गई। तो कौन इसे क्रूरता कहेगा? यहूदियों की सेवा-व्यवस्था अमेरिकी दासता नहीं थी, और न उसके लगभग समान ही थी। इस विषय के विस्तार में यहाँ जाने के लिए बहुत अधिक समय चाहिए। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त है। फिर यह आपत्ति की जाती है कि परमेश्वर निर्दयी, बदला लेनेवाला और कभी न पसीजनेवाला है। जिन सज्जन का मैंने उल्लेख किया है, उन्होंने कहा—मैं यह विश्वास नहीं करता कि बाइबल परमेश्वर की ओर से है, जबकि वह उसे ऐसा बदला लेनेवाला और न पसीजनेवाला दिखाती है कि वह तब तक पाप क्षमा न करता जब तक उसने पहले अपने ही पुत्र को मरवा डालने का प्रबन्ध न कर लिया।
अब, जो शिक्षा उसे मिली थी उसे देखते हुए, उसका ऐसा सोचना कदापि अस्वाभाविक नहीं था। मैं स्वयं भी ऐसा ही अनुभव कर चुका था। इसी आपत्ति ने मुझे भी ठोकर खिलाई थी। परन्तु बाद में मैंने इसका उत्तर इतनी स्पष्टता से देखा कि और कुछ चाहने को शेष न रहा। वास्तव में उत्तर अत्यन्त सरल है। परमेश्वर में कोई न पसीजनेवाला स्वभाव नहीं था जिसके कारण उसने क्षमा के आधार के रूप में मसीह की मृत्यु की माँग की। यह केवल अपने राज्य की सुरक्षा और धन्यता के प्रति उसकी परोपकारी चिन्ता थी। वह भली-भाँति जानता था कि पाप को क्षमा करना असुरक्षित होता,
