उपदेश 28 (31 में से)

21. जिससे परमेश्वर घृणा करता है, उसे मनुष्य प्रायः बहुत ऊँचा समझते हैं

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21. जिससे परमेश्वर घृणा करता है, उसे मनुष्य प्रायः बहुत ऊँचा समझते हैं।

21. जिससे परमेश्वर घृणा करता है, उसे मनुष्य प्रायः बहुत ऊँचा समझते हैं।

“तुम तो मनुष्यों के साम्हने अपने आप को धर्मी ठहराते हो: परन्तु परमेश्वर तुम्हारे मन को जानता है, क्योंकि जो वस्तु मनुष्यों की दृष्टि में महान है, वह परमेश्वर के निकट घृणित है।”—लूका 16:15।

मसीह ने अभी-अभी अन्यायी भण्डारी का दृष्टान्त कहा था, जिसमें उसने एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण प्रस्तुत किया जिसने दूसरों की उस सम्पत्ति का, जो उसे सौंपी गई थी, अन्यायपूर्वक इस उद्देश्य से उपयोग किया कि उन्हें ऐसा उपकृत कर दे कि अपने पद से निकाले जाने के बाद वे उसके भरण-पोषण का प्रबन्ध करें। हमारा

प्रभु भण्डारी के इस आचरण को इस अर्थ में बुद्धिमानी का बताता है कि वह दूरदर्शी था और अपने लिए प्रबन्ध करनेवाला था—यह संसार की बुद्धि है, जो हर प्रकार की नैतिकता से शून्य है। वह इस उदाहरण का उपयोग यह समझाने और यह सिफारिश करने के लिए करता है कि हम धन का उपयोग इस प्रकार करें कि अपने लिए ऐसे मित्र बनाएँ जो हमारी मृत्यु पर “अनन्त निवासों” में हमारा स्वागत करें। फिर और गहराई में जाकर, उस मूल सिद्धान्त तक पहुँचकर जिसे धन के हमारे समस्त उपयोग को नियंत्रित करना चाहिए, वह यह ठहराता है कि कोई मनुष्य परमेश्वर और धन (मैमन) दोनों की सेवा नहीं कर सकता। जो धनी और लोभी मनुष्य

मैमन की सेवा कर रहे थे, उन्हें यह नहीं समझना चाहिए कि वे उसी समय परमेश्वर की सेवा भी कर सकते हैं। एक की सेवा का दूसरे की सेवा के साथ मेल नहीं बैठाया जा सकता।

लोभी फरीसियों ने ये सब बातें सुनीं, और उसका ठट्ठा करने लगे। मानो वे कह रहे हों, “सचमुच, तुम तो बड़े पवित्र बनते दिखाई देते हो, जो हम से कहते हो कि हम परमेश्वर की सेवा ग्रहणयोग्य रीति से नहीं करते! पोदीने का ऐसा कौन-सा दसवाँ अंश कभी रहा है जो हमने न दिया हो?” वे फरीसी किसी भी रीति से उसके सिद्धान्त की खराई को स्वीकार नहीं करते थे। वे सोचते थे कि वे परमेश्वर और मैमन दोनों की सेवा कर सकते हैं। कोई भी कहे कि वे मैमन की सेवा करते थे, वे तो जानते थे कि वे परमेश्वर की सेवा भी करते हैं; और जो शिक्षाएँ दो परस्पर-विरोधी देवताओं की उपासना करने और दो परस्पर-विरोधी स्वामियों की सेवा करने की उनकी असंगति और मूर्खता को प्रकट करती थीं, उनके लिए उनके मन में तिरस्कार के सिवा और कुछ न था।

हमारे प्रभु ने हमारे पाठ के शब्दों में उन्हें उत्तर दिया, “तुम तो मनुष्यों के साम्हने अपने आप को धर्मी ठहराते हो: परन्तु परमेश्वर तुम्हारे मन को जानता है, क्योंकि जो वस्तु मनुष्यों की दृष्टि में महान है, वह परमेश्वर के निकट घृणित है।”

इस प्रकार प्रस्तुत विषय पर आगे बढ़ते हुए, मैं यह दिखाऊँगा कि मनुष्य उस बात को कैसे और क्यों बहुत ऊँचा समझते हैं जिससे परमेश्वर घृणा करता है।

1. उनके न्याय करने का नियम भिन्न है। परमेश्वर एक नियम से न्याय करता है; वे दूसरे से।

परमेश्वर का नियम सार्वभौमिक परोपकार की माँग करता है; उनका नियम किसी भी मात्रा के स्वार्थ से संतुष्ट हो जाता है, बशर्ते वह इतना परिष्कृत हो कि ज़माने के अनुरूप बैठ जाए। परमेश्वर मनुष्यों से माँग करता है कि वे अपने आप को अपने हितों के लिए नहीं, बल्कि उसके हितों और उसके महान परिवार के हितों के लिए समर्पित करें। वह केवल एक ही महान लक्ष्य स्थापित करता है—अपने नाम और अपने राज्य की सर्वोच्च महिमा। वह उनसे कहता है कि वे ईश्वरीय अर्थ में देशभक्त बनें, और अपने आप को अपने सृष्टिकर्ता के प्रति और उसके प्राणियों की भलाई के लिए समर्पित करें।

संसार एक बिलकुल भिन्न नियम अपनाता है, जो मनुष्यों को अपनी ही प्रसन्नता को अपना लक्ष्य ठहराने की अनुमति देता है। यह विचित्र बात है कि कुछ तथाकथित दार्शनिकों ने भी यही नियम निर्धारित किया है, अर्थात्: कि मनुष्यों को सर्वोपरि रूप से अपनी ही प्रसन्नता का पीछा करना चाहिए, और केवल इतना ध्यान रखना चाहिए कि दूसरों की प्रसन्नता पर बहुत अधिक आघात न करें। उनका सिद्धान्त मनुष्यों को स्वार्थपूर्ण मार्ग पर चलने की अनुमति देता है, बस इस प्रकार नहीं कि वह दूसरों के अधिकारों और हितों पर बहुत प्रत्यक्ष रूप से आघात करे।

परन्तु परमेश्वर का नियम यह है, “अपनी भलाई न ढूँढ़।” उसकी व्यवस्था स्पष्ट है, “तू (अपने आप से नहीं, परन्तु) प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से प्रेम रख।” “प्रेम रखना व्यवस्था को पूरा करना है।” “प्रेम (यही प्रेम) अपनी भलाई नहीं चाहता।” यही उस प्रेम की विशेषता है जिसकी माँग परमेश्वर की व्यवस्था करती है—वह अपनी भलाई नहीं चाहता। “कोई अपनी ही भलाई को न ढूँढ़े, वरन औरों की।” 1 कुरिन्थियों 10:24। “हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करे।”

“क्योंकि सब अपने स्वार्थ की खोज में रहते हैं, न कि यीशु मसीह की।” फिलिप्पियों 2:4, 21। अपने ही हितों की खोज करना, न कि यीशु मसीह के हितों की—इसे पौलुस सच्ची मसीहियत के नियम से पूरी तरह हट जाना मानता है।

परमेश्वर लक्ष्यों के प्रति समर्पण के सिवा और किसी बात को सद्गुण नहीं मानता। सही लक्ष्य अपना निजी हित नहीं, बल्कि सर्वसाधारण की भलाई है। इसलिए परमेश्वर का नियम सद्गुण की माँग करता है, जबकि मनुष्य का नियम अधिक से अधिक केवल दुर्गुण पर अंकुश लगाता है। सब मानवीय शासन-व्यवस्थाएँ इसी सिद्धान्त पर आधारित हैं, जैसा कि इस विषय का अध्ययन करनेवाले सब लोग जानते हैं। वे परोपकार की माँग नहीं करतीं, वे केवल स्वार्थ पर अंकुश लगाती हैं। हमारी शासन-व्यवस्था के मूल सिद्धान्तों में यह घोषित किया गया है कि मनुष्यों के कुछ अहस्तान्तरणीय अधिकार हैं, जिनमें से एक यह अधिकार है कि हर एक अपनी प्रसन्नता का पीछा करे। इसे अहस्तान्तरणीय अधिकार घोषित किया जाता है, और सदा यह मान लिया जाता है कि यह अपने आप में उचित है, बशर्ते यह दूसरों के प्रसन्नता के अधिकारों पर आघात न करे। परन्तु परमेश्वर का नियम सक्रिय परोपकार की माँग करता है और सर्वोच्च भलाई के प्रति समर्पण के सिवा और किसी बात को सद्गुण नहीं मानता। मनुष्य का नियम किसी बात को दोषी नहीं ठहराता, बशर्ते मनुष्य अपने आप को इतना रोके रखे कि दूसरों के अधिकारों पर आघात न करे।

नैतिक चरित्र उस लक्ष्य के अनुसार होता है जिसकी खोज की जाती है। उसे मांसपेशियों की क्रिया के विषय में नहीं कहा जा सकता, बल्कि वह सदा उस लक्ष्य पर निर्भर करता है जो मन के सामने होता है। मनुष्य वास्तव में सदा यह मानकर चलते हैं और इसे जानते हैं। वे जानते हैं कि नैतिक चरित्र वास्तव में उस लक्ष्य के अनुसार होता है जिसके लिए मनुष्य अपने आप को समर्पित करता है। इसलिए, जब परमेश्वर की व्यवस्था और मनुष्य की व्यवस्था ऐसी हैं, तो परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करना पवित्रता है; केवल मनुष्य की व्यवस्था का पालन करना पाप है।

मनुष्य बड़ी असावधानी से अपना और दूसरों का न्याय परमेश्वर के नियम से नहीं, बल्कि मनुष्य के नियम से करते हैं।

वे ऐसा सचमुच आश्चर्यजनक सीमा तक करते हैं। मनुष्यों के वास्तविक विचारों में झाँककर देखिए, और आप इसे देख लेंगे। प्रायः, बिना इस बात का तनिक भी ध्यान हुए, मनुष्य अपना न्याय परमेश्वर के नियम से नहीं, बल्कि अपने ही नियम से करते हैं।

यहाँ मुझे इसके कुछ प्रमाणों पर ध्यान देना होगा, और कुछ उदाहरण प्रस्तुत करने होंगे।

उदाहरण के लिए, कुछ लोग मात्र निषेधात्मक नैतिकता को बहुत ऊँचा समझते हैं। यदि कोई मनुष्य किसी समाज में रहता है और कोई हानि नहीं करता, किसी का हक़ नहीं मारता, धोखा नहीं देता, झूठ नहीं बोलता, समाज को कोई प्रत्यक्ष हानि नहीं पहुँचाता; अपना व्यापार ऐसी रीति से करता है जो बहुत सम्मानजनक और सद्गुणपूर्ण समझी जाती है—तो संसार के मापदण्ड के अनुसार यह मनुष्य बड़ी प्रतिष्ठा पाता है। परन्तु वास्तव में इस सब का मूल्य क्या है?

वह मनुष्य बस अपनी ही देखभाल कर रहा है; बस इतना ही। उसकी नैतिकता पूरी तरह इसी निषेधात्मक प्रकार की है।

उसके विषय में आप बस इतना ही कह सकते हैं, वह कोई हानि नहीं करता। फिर भी इस नैतिकता की चर्चा प्रायः ऐसी रीति से की जाती है जिससे प्रकट होता है कि संसार इसे बहुत ऊँचा समझता है। परन्तु क्या परमेश्वर इसे बहुत ऊँचा समझता है? नहीं, वरन यह उसकी दृष्टि में घृणित है।

फिर, ऐसा धर्म जो मात्र निषेधात्मक है, प्रायः बहुत ऊँचा समझा जाता है। इस धर्म के लोग सावधान रहते हैं कि कोई गलत काम न करें; परन्तु गलत काम करना है क्या? अपने पड़ोसियों के प्राणों की उपेक्षा करना कोई गलत काम नहीं समझा जाता। वे किस बात को गलत समझते हैं? ठगी, झूठ, चोरी। ये और ऐसी ही बातें, वे मान लेंगे, गलत हैं। परन्तु वे कर क्या रहे हैं? यहाँ भी अपने चारों ओर देखिए कि इस वर्ग के लोग क्या कर रहे हैं। उनमें से बहुत से कभी किसी प्राण को बचाने का प्रयत्न नहीं करते।

अपने निर्दोष जीवन के कारण वे बहुत ऊँचे समझे जाते हैं; वे कोई गलत काम नहीं करते; परन्तु किसी प्राण को बचाने के लिए वे कुछ नहीं करते। उनका धर्म मात्र एक निषेध है। शायद वे सब्त के दिन नाव से नदी भी पार न करें; परन्तु वे किसी प्राण को मृत्यु से कभी न बचाएँगे। वे अपने ही मुंशियों को, उन्हें बचाने का एक भी सच्चा प्रयत्न किए बिना, नरक में जाने देंगे। क्या ऐसा धर्म परमेश्वर के लिए घृणित नहीं होना चाहिए?

इसी प्रकार उस धर्म के विषय में भी, जो अधिक से अधिक रीतियों और प्रार्थनाओं से बना है और इनमें परोपकारी प्रयत्न की शक्ति नहीं जोड़ता। ऐसा धर्म पूरी तरह खोखला है। क्या अपने लिए कृपाएँ माँगने के सिवा और कुछ न करना परमेश्वर की सेवा करना है?

कुछ लोग सब्त के कर्तव्यों को, जैसा उन्हें कहा जाता है, और पारिवारिक प्रार्थना को बनाए रखते हैं, परन्तु उनका सारा धर्म अपनी आराधना की रीतियों को बनाए रखने में ही है। यदि वे इनमें कुछ नहीं जोड़ते, तो उनका धर्म परमेश्वर के सामने केवल घृणित है।

और भी तथ्य हैं जो दिखाते हैं कि मनुष्य लापरवाही से एक झूठा मापदण्ड खड़ा कर लेते हैं, जिसे वे बहुत ऊँचा समझते हैं, परन्तु जिससे परमेश्वर घृणा करता है। उदाहरण के लिए, वे सच्चे धर्म की माँग केवल पादरियों से करेंगे; किसी और से वास्तविक धर्म की कोई माँग नहीं करेंगे। सब मनुष्य इस बात पर सहमत हैं कि पादरियों को सचमुच भक्त होना चाहिए। वे उनका न्याय सही नियम से करते हैं। उदाहरण के लिए, वे माँग करते हैं कि पादरी परोपकारी हों। उन्हें अपने पेशे में भलाई करने के ऊँचे उद्देश्य से प्रवेश करना चाहिए, न कि केवल रोज़ी-रोटी के लिए—नीच कमाई के लिए नहीं, बल्कि प्राणों के लिए और निःस्वार्थ प्रेम से। नहीं तो उन्हें किसी पादरी पर कोई भरोसा न होगा।

परन्तु इस बात को उलटकर व्यापारियों पर लागू कीजिए। क्या वे अपना न्याय इस नियम से करते हैं?

क्या वे एक-दूसरे का न्याय इस नियम से करते हैं? किसी व्यापारी या कारीगर पर मसीही भरोसा करने से पहले, क्या वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वे भी लाभ के लोभ से उतने ही ऊपर हों जितना एक पादरी को होना चाहिए? कि वे बीमारों को अपना समय देने के लिए उतने ही इच्छुक हों जितना एक पादरी—अधिक भलाई करने के लिए बेहतर वेतन छोड़ने को उतने ही तैयार हों, जितना वे एक पादरी से होने का आग्रह करते हैं? कौन नहीं जानता कि वे व्यापारियों से मसीही चरित्र की ऐसी कोई शर्तें नहीं माँगते जैसी वे सुसमाचार के सेवकों पर लादते हैं? आइए देखें। यदि कोई व्यापारी आपकी कोई सेवा करता है, तो वह अपना बिल बनाता है, और यदि आवश्यक हो, तो उसे वसूल भी करता है। अब मान लीजिए कि मैं किसी बीमार मनुष्य को आत्मिक परामर्श देने के लिए उससे मिलने जाऊँ—परामर्श और प्रार्थना के लिए समय-समय पर उसके पास जाता रहूँ, जब तक वह मर न जाए, और फिर उसके अन्तिम संस्कार में उपस्थित होऊँ; और यह सेवा कर चुकने के बाद अपना बिल बनाकर भेज दूँ, और उसे वसूल भी कर लूँ; तो क्या कुछ चर्चा न होगी? लोग कहेंगे, उसे ऐसा करने का क्या अधिकार है? उसे यह सेवा प्राणों के प्रेम के कारण करनी चाहिए, और इसके लिए कुछ शुल्क नहीं लेना चाहिए। यह बात उन पादरियों पर लागू होती है जो इस सेवा को करने के लिए वेतन पर नियुक्त नहीं हैं, और ऐसे बहुत से हैं। इनमें से कोई भी व्यक्ति बीमारों के बीच या अन्तिम संस्कारों में चाहे कितना ही परिश्रम करे, उसे पैसा नहीं लेना चाहिए। परन्तु इनमें से कोई पादरी अपनी आरी पर धार लगवाने के लिए भेजे, तो उसे उसका दाम चुकाना ही पड़ेगा।

वह उसे उसी मनुष्य के पास भेज सकता है जिसके बीमार परिवार से वह दिन-रात मिलने जाता रहा है, और जिसके मृतकों को उसने बिना शुल्क के, और “प्राणों के प्रेम के कारण” दफ़नाया है; परन्तु ऐसा कोई “प्राणों का प्रेम” उस कारीगर को उसकी सेवा में बाँधता नहीं। सच्चाई यह है कि जिस बात को वे एक पादरी में पाप कहते हैं, उसी को एक साधारण विश्वासी में धर्म कहते हैं। यही तथ्य है। मैं इस बात की शिकायत नहीं करता कि मनुष्य परिश्रम का दाम लेते हैं, बल्कि इस बात की कि वे वही सिद्धान्त एक पादरी पर लागू नहीं करते।

फिर, व्यापारियों के व्यापारिक लक्ष्य और व्यवहार लगभग सर्वत्र परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं। इनमें से लगभग सभी उसी सिद्धान्त पर आधारित हैं जिस पर मानवीय शासन-व्यवस्थाएँ, अर्थात् यह कि केवल इतने ही प्रतिबन्ध लगाए जाएँ कि मनुष्य बहुत अधिक स्वार्थी न हो जाएँ, और उन्हें उतना ही स्वार्थी होने दिया जाए जितना वे हो सकते हैं, फिर भी दूसरों के लिए भी स्वार्थी होने का बराबर अवसर छोड़ते हुए।

क्या हम व्यापारियों के उन सिद्धान्तों की गिनती करने बैठें जो उनके उद्देश्यों और व्यापार करने की रीतियों से सम्बन्धित हैं? उस सब का निचोड़ क्या होगा? अपने ही लक्ष्यों की खोज करना; कुछ करना, पर दूसरों के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए। बशर्ते वे ऐसा उस रीति से करें जो मनुष्यों के बीच ईमानदार और सम्मानजनक समझी जाती है, तो उन पर और कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाएगा।

उदाहरण के लिए बाइबल सोसाइटी को लीजिए। यह संस्था कोई मुनाफ़े का सट्टा नहीं है, जो छापने और प्रकाशित करनेवालों की भलाई के लिए आरम्भ किया गया हो। बल्कि इसका लक्ष्य यह है कि बाइबलें खरीदनेवाले को यथासम्भव सस्ती उपलब्ध कराई जाएँ, ताकि हर मनुष्य के हाथ में कम से कम सम्भव दाम पर एक बाइबल पहुँचाई जा सके। अब यह देखना सरल है कि इसके सिवा कोई और मार्ग और इससे भिन्न कोई सिद्धान्त सर्वत्र दोषी ठहराया जाएगा। यदि बाइबल सोसाइटियाँ मात्र सट्टा बन जाएँ, तो वे परोपकारी संस्थाएँ ही न रहेंगी, और इस चरित्र का दावा करना उन पर मनुष्यों के शाप ले आएगा। परन्तु सारा व्यापार उतने ही परोपकार से किया जाना चाहिए जितने परोपकार से बाइबलें बनाई जाती हैं; क्यों नहीं? यदि ऐसा न हो, तो क्या वह परोपकारी व्यापार हो सकता है? और यदि परोपकारी नहीं, तो उसे परमेश्वर की स्वीकृति कैसे मिल सकती है? परोपकारी व्यापार क्या है? अधिक से अधिक भलाई करना—वह जो केवल भलाई करने के एकमात्र लक्ष्य के लिए आरम्भ किया जाता है, और जिसका लक्ष्य बस यही होता है कि अधिक से अधिक सम्भव भलाई करे। ठीक इसी अर्थ में मनुष्यों को देशभक्त और परोपकारी होना चाहिए, और जो कुछ वे करें, चाहे खाएँ या पीएँ या जो कुछ भी करें, उस सब में उनकी दृष्टि एकमात्र परमेश्वर की महिमा पर होनी चाहिए।

फिर भी आपको ऐसा मनुष्य कहाँ मिलता है जो अपने संगी मनुष्यों को मसीही समझे जाने की शर्त के रूप में व्यवहार में इस नियम पर कसता हो, अर्थात् यह कि अपने सारे व्यापार में वे उतने ही परोपकारी हों जितनी बाइबल सोसाइटियाँ हैं? हम ऐसी बाइबल सोसाइटी के विषय में क्या कहेंगे जो खुला सट्टा आरम्भ कर दे और न्यूनतम उचित दाम पर बेचने के बजाय अपनी बाइबलों का जितना हो सके उतना दाम वसूल करे? आप ऐसी बाइबल सोसाइटी के विषय में क्या कहेंगे? आप कहेंगे, “भयानक कपटी!” मुझे हर उस मसीही के विषय में भी यही कहना पड़ता है जो यही काम करता है।

भक्तिहीन मनुष्य किसी मसीही परोपकार का दावा नहीं करते, इसलिए हम यह कपट उन पर नहीं लगाएँगे, परन्तु हम प्रयत्न करेंगे कि यह प्रकाश उनके मन के सामने पहुँचे।

अब एक पादरी को ठीक अपने मन के सामने रखिए, और पूछिए, क्या आप अपना न्याय वैसे ही करते हैं जैसे उसका करते हैं? क्या आप अपने विषय में कहते हैं, मुझे दूसरों के लिए वह सब कुछ बिना मूल्य करना चाहिए जो मैं उससे बिना मूल्य करवाना चाहता हूँ? क्या आप अपना न्याय उसी नियम से करते हैं जिससे आप उसका न्याय करते हैं?

इसे सब व्यापारियों पर लागू कीजिए। आपका व्यापार चाहे जो हो, ऊँचा हो या नीचा, छोटा हो या बड़ा; आरियों पर धार लगाना हो, या बैंक के नोट गिनना; आप बाइबल सोसाइटी को परोपकारी कहते हैं; क्या आप अपने व्यापार को अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों में उतना ही और उतने ही सच्चे रूप में परोपकारी बनाते हैं? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? आपको उन लोगों से कम परोपकारी होने का क्या अधिकार है जो बाइबलें छापते, प्रकाशित करते और बेचते हैं?

यहाँ एक और बात है जो मनुष्यों में बहुत ऊँची समझी जाती है, फिर भी परमेश्वर के सामने घृणित है, अर्थात्: स्वार्थपूर्ण महत्वाकांक्षा। आप कितनी बार इसे बहुत ऊँचा समझा जाता देखते हैं! मैं यह देखकर चकित रह गया हूँ कि मनुष्य इस विषय में कैसे निर्णय बनाते हैं। यहाँ एक युवक है जो इस अर्थ में अच्छा विद्यार्थी है कि वह अपनी पढ़ाई में बड़ी उन्नति करता है (ऐसा काम तो शैतान भी कर सकता है), फिर भी केवल इसी कारण ऐसे युवकों की प्रायः ऊँचे से ऊँचे शब्दों में प्रशंसा की जाती है। बशर्ते वे अपने लिए अच्छा करें, तो उन्हें ऊँची सराहना का अधिकारी ठहराने के लिए इससे अधिक कुछ माँगा या अपेक्षित नहीं लगता।

यही बात पेशेवर लोगों की भी है। मेरे मन की आँखों के सामने एक वकील का उदाहरण है जिसे उसके संगी मनुष्य बहुत आदर देते और सिर-आँखों पर बिठाते थे; जिसकी मसीही लोग भी प्रायः प्रशंसा करते थे; परन्तु वह था क्या? एक महत्वाकांक्षी युवा वकील के सिवा कुछ नहीं, जो सब कुछ महत्वाकांक्षा के लिए करता था—किसी भी समय मंच पर चढ़कर सारे देश में चुनाव-प्रचार करने को तैयार—किस लिए? अपने लिए कुछ लाभ पाने के लिए। फिर भी मसीही परिवार उसे सिर-आँखों पर बिठाते हैं! क्यों? क्योंकि वह अपने लिए अच्छा कर रहा है। डैनियल वेबस्टर को देखिए। उसकी कैसी प्रशंसा की गई, मैं तो कहनेवाला था कि उसे संत का दर्जा दे दिया गया! शायद अभी दे भी दिया जाए। निश्चय ही जो आत्मा हम अब देखते हैं, वह उसे संत घोषित कर देती, यदि यह कोई कैथोलिक देश होता।

परन्तु उसने किया क्या है? उसने बस एक महत्वाकांक्षी वकील और एक महत्वाकांक्षी राजनेता की भूमिका निभाई है; बस इतना ही। उसने अपने लिए बड़ी-बड़ी बातें खोजीं; और इतना कह देने पर, आपने सब कुछ कह दिया। फिर भी मनुष्यों ने डैनियल वेबस्टर की कैसी प्रशंसा की है! जब मैं सिरैक्यूज़ आया, तो मैंने एक विशाल जुलूस देखा। मैंने कहा, क्या, यहाँ किसी का अन्तिम संस्कार है? कौन मरा है? डैनियल वेबस्टर। परन्तु, मैंने कहा, उसे मरे तो बहुत समय हो गया। हाँ, पर वे शोक-यात्रा का प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि वह एक महान व्यक्ति था। डैनियल वेबस्टर क्या था? न मसीही, न परोपकारी मनुष्य; यह तो सब जानते हैं। और मसीहियों को मात्र स्वार्थपूर्ण महत्वाकांक्षा की प्रशंसा करने और उसे संत का दर्जा देने से क्या लेना-देना?

वे इसे बहुत ऊँचा समझें तो समझें, फिर भी वे जान लें कि परमेश्वर इससे उतनी ही पूरी तरह घृणा करता है जितनी पूरी तरह वे इसकी सराहना करते हैं।

संसार की सम्पूर्ण नैतिकता और कलीसिया के एक बड़े भाग की नैतिकता मात्र नकली परोपकार है। आप एक परिवार देखते हैं जो आपस में बहुत एक है, और आप कहते हैं, ये एक-दूसरे से कैसा प्रेम करते हैं!

हाँ, करते तो हैं; परन्तु वे बहुत संकीर्ण और दूसरों से अलग-थलग रहनेवाले हो सकते हैं। वे अपने आप को अलग कर सकते हैं और अपनी सहानुभूति को अन्य सब परिवारों से लगभग पूरी तरह हटा सकते हैं, और फलस्वरूप वे अपने आप को संसार में भलाई करने से भी अलग कर सकते हैं। इसी प्रकार की नैतिकता नगरों और राष्ट्रों में भी देखी जा सकती है। संसार की सम्पूर्ण नैतिकता यही है।

बहुत से लोगों में वह होती है जिसे वे मानवता कहते हैं, पर उसमें कोई भक्ति नहीं होती; और यह प्रायः मनुष्यों में बहुत ऊँची समझी जाती है। वे मनुष्यों से प्रेम करने का दावा करते हैं, परन्तु फिर भी परमेश्वर का आदर नहीं करते, न ही उसका लक्ष्य रखते हैं। और मनुष्यों के प्रति अपने प्रेम में वे कुछ पशुओं से भी नीचे गिर जाते हैं। मुझे सन्देह है कि बहुत से ऐसे मनुष्य जो भक्त नहीं हैं, वह काम करेंगे जो मैंने एक कुत्ते को करते जाना। उसका स्वामी उसे मार डालना चाहता था, और इस उद्देश्य से उसे नाव में नदी में ले गया और उसकी गर्दन में एक पत्थर बाँध दिया। कुत्ते और पत्थर को एक साथ नाव से बाहर फेंकने की छीना-झपटी में नाव उलट गई; मनुष्य नदी में जा गिरा; कुत्ते ने विशेष प्रयत्न करके अपने आप को उस बोझ से छुड़ाया, और अपने स्वामी का कॉलर पकड़कर उसे लिए हुए तैरकर किनारे तक पहुँच गया। बहुत कम मनुष्यों में—बिना भक्ति के—इतनी मानवता होती कि वे ऐसा करते।

वास्तव में, भक्ति के बिना मनुष्य प्रायः एक-दूसरे के प्रति उसके आधे भी दयालु नहीं होते जितने पशु होते हैं। मनुष्य अधिक पतित और अधिक भ्रष्ट हैं। पशु एक-दूसरे के लिए मानव जाति से अधिक बड़े बलिदान करेंगे। किसी व्हेल-शिकारी से जाकर पूछिए कि वह व्हेलों में क्या देखता है जब वे अपने बच्चों के झुण्ड की रक्षा के लिए अपने आप को मार डाले जाने देती हैं। फिर भी बहुत सी माताएँ सोचती हैं कि वे बड़े पुण्य के काम करती हैं क्योंकि वे अपने बच्चों की देखभाल करती हैं।

परन्तु मनुष्यों को, पशुओं की तुलना में, उनसे ऊँचे उद्देश्यों से काम करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो वे दुष्टता करते हैं। अधिक जानते हुए—परमेश्वर का और मरते हुए

उद्धारकर्ता का ज्ञान अपने उदाहरण और नियम के रूप में रखते हुए—उन पर उससे कहीं ऊँची ज़िम्मेदारियाँ हैं जितनी पशुओं पर हो सकती हैं।

मनुष्य प्रायः अपने दास-प्रथा-उन्मूलनवाद को बड़ा सद्गुण बना लेते हैं, चाहे वह केवल नास्तिक छाप का ही क्यों न हो। परन्तु शायद इसमें ऐसा कोई सद्गुण नहीं जो उस सद्गुण से रत्ती भर भी ऊँचा हो जो एक मात्र पशु में भी हो सकता है।

जो कोई दास-प्रथा के विषय को समझता है और मन से भला मनुष्य है, वह निश्चय ही दास-प्रथा-उन्मूलनवादी होगा। परन्तु कोई मनुष्य बिना किसी सद्गुण के भी दास-प्रथा-उन्मूलनवादी हो सकता है। हो सकता है उसके उन्मूलनवाद में परमेश्वर के प्रति तनिक भी आदर न हो, न ही मानव-कल्याण के प्रति कोई सच्ची चिन्ता।

वह ऐसे सिद्धान्त पर खड़ा हो सकता है जो, यदि उसकी परिस्थितियाँ अनुकूल होतीं, तो उसे स्वयं दास-स्वामी बना देता। ऐसे मनुष्य निश्चय ही दास-स्वामियों के सिद्धान्तों पर चलते हैं। वे ऐसे सिद्धान्त प्रकट करते और ऐसे व्यवहार अपनाते हैं जो दिखाते हैं कि यदि उनके पास शक्ति होती, तो वे सारी मानव जाति को दास बना लेते। वे यह विश्वास नहीं करेंगे कि कोई मनुष्य उपनिवेशन-समर्थक होकर भी भला मनुष्य हो सकता है।

मैं उपनिवेशन-समर्थक नहीं हूँ, परन्तु मैं ऐसे भले मनुष्यों को जानता हूँ जो हैं। कुछ मनुष्य न केवल अपने संगी मनुष्यों की देहों पर, बल्कि उनके मनों और प्राणों पर—उनके विचारों और विवेकों पर—प्रभुता जताते हैं, जो केवल देह को दास बनाने से कहीं बढ़कर अत्याचार और निरंकुशता है।

प्रायः उनमें एक कड़वी और तीखी आत्मा होती है—जो किसी भी प्रकार मसीह की आत्मा नहीं है; क्योंकि यद्यपि मसीह निस्सन्देह दास-स्वामी को दोषी ठहराता है, वह उससे घृणा नहीं करता। कुकर्मियों के प्रति यह चुभनेवाली घृणा आखिरकार केवल दुर्भावना ही है; और मनुष्य इसे चाहे कितना ही ऊँचा समझें, परमेश्वर इससे घृणा करता है।

दूसरी ओर, बहुत से लोग उसे भक्ति कहते हैं जिसमें कोई मानवता नहीं होती। अपने दासों को कोड़े मार-मारकर काम कराओ ताकि बाइबल सोसाइटी को देने के लिए पैसा मिले! टोली को तेज़ करो; नौ-पट्टी वाला कोड़ा चलाओ; एजेंट बाइबल सोसाइटी के लिए पैसा लेने आ रहा है! यह है मानवता के बिना (तथाकथित) भक्ति। मैं ऐसी भक्ति से, जिसके साथ और जिसमें मानवता न हो, उतनी ही गहराई से घृणा करता हूँ जितनी गहराई से मैं उसके उलटे को दोषी ठहराता हूँ—भक्ति के बिना मानवता को। परमेश्वर भक्ति और मानवता दोनों से प्रेम करता है। तो जब इनमें से कोई भी दूसरी से अस्वाभाविक रूप से अलग कर दी जाती है, तब वह उससे कितनी अधिक घृणा करता होगा!

वे सब तथाकथित धार्मिक प्रयत्न जो मनुष्य करते हैं, जिनका लक्ष्य केवल स्वयं होता है, परमेश्वर के लिए घृणित हैं।

एक धनी मनुष्य है जो एक भव्य गिरजाघर बनाने के लिए दो सौ डॉलर देने को राज़ी होता है। वह सोचता है कि यह बहुत परोपकारी भेंट है, और मनुष्यों में यह बहुत ऊँची समझी जा सकती है। परन्तु इसे स्वीकार करने से पहले परमेश्वर देनेवाले के उद्देश्यों को जाँचेगा; और यदि हम चाहें, तो हम भी जाँच सकते हैं। हम पाते हैं कि उस मनुष्य के पास गाँव में बहुत सी अचल सम्पत्ति है, जिसके विषय में उसे आशा है कि जिस दिन गिरजाघर बनाने का निर्णय होगा, उसी दिन उसका मूल्य इतना बढ़ जाएगा कि जितना वह देता है उसका दुगना या तिगुना उसकी जेब में लौट आए। इसके अतिरिक्त उसके और भी उद्देश्य हैं। वह एक सुन्दर भवन होने से, और उसमें स्वयं सबसे अच्छी बैठक पाने से बढ़नेवाली प्रतिष्ठा के विषय में सोचता है। और इससे भी आगे, गाँव में अच्छी नैतिकता बनाए रखने में उसका कुछ हित है, क्योंकि दुराचार धनी लोगों के लिए परेशानी का कारण होता है और साथ ही कुछ खतरनाक भी।

और फिर उसे एक अनिर्वचनीय सी आशा है कि यह नया गिरजाघर और उसे बनाने के लिए उसका उदार दान किसी न किसी रीति से स्वर्ग के लिए उसकी सम्भावनाओं को सुधार देगा। क्योंकि ये सम्भावनाएँ अधिक से अधिक धुँधली ही हैं, इसलिए यह सुधार, चाहे अनिश्चित ही क्यों न हो, निश्चय ही पाने योग्य लक्ष्य है। अब यदि आप इन उद्देश्यों की जाँच करें, तो आप देखेंगे कि आरम्भ से अन्त तक वे पूरी तरह स्वार्थपूर्ण हैं। निस्सन्देह वे परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं।

किसी लोकप्रिय पादरी को लाने के उद्देश्य भी प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। लक्ष्य यह नहीं होता कि परमेश्वर का भेजा हुआ ऐसा मनुष्य मिले जो परमेश्वर के लिए और परमेश्वर के साथ परिश्रम करे, और जिसके साथ लोग प्राणों के लिए और परमेश्वर के राज्य के लिए परिश्रम और प्रार्थना कर सकें। परन्तु जब लक्ष्य इसके सिवा कुछ और होता है, तो वह परमेश्वर के सामने घृणित है।

संसार की नैतिकता के सर्वोच्च रूप भी परमेश्वर की दृष्टि में केवल घृणित हैं। संसार में वे होते हैं जिन्हें वह अच्छे पति, अच्छी पत्नियाँ, अच्छी सन्तान कहता है; परन्तु यह भलाई किस प्रकार की है? पति अपनी पत्नी से प्रेम करता है और उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न करता है। वह भी उससे प्रेम करती है और उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न करती है। परन्तु क्या इन सम्बन्धों में उनमें से कोई भी परमेश्वर से प्रेम करता या उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न करता है? कदापि नहीं।

इससे बढ़कर उनके विचारों से दूर कुछ नहीं हो सकता। वे स्वार्थ के संकीर्ण घेरे से आगे कभी नहीं जाते।

इन सब मानवीय सम्बन्धों को उनके सर्वोत्तम सांसारिक रूप में लीजिए, और आप पाएँगे कि वे निचले पशुओं की नैतिकता से ऊपर कभी नहीं उठते। वे एक-दूसरे को दुलारते और पुचकारते हैं, और अपने बच्चों की देखभाल में कुछ रुचि लेते प्रतीत होते हैं। आपकी पालतू मुर्गियाँ भी ऐसा ही करती हैं, इससे कम नहीं, और शायद इससे भी अधिक। प्रायः आपके मुर्गीखाने की ये मुर्गियाँ उन गुणों में, जिन्हें संसार अच्छा कहता है, संसार की नैतिकता से भी आगे निकल जाती हैं।

क्या मनुष्यों के लक्ष्य इनसे कहीं अधिक ऊँचे नहीं होने चाहिए? यदि वास्तव में वे पालतू पशुओं के स्तर से भी नीचे हैं, तो क्या परमेश्वर उनके उन बहुत ऊँचे समझे जानेवाले गुणों को घृणित के सिवा और कुछ समझ सकता है?

जो शिक्षा पवित्र न की गई हो, वह भी इसी श्रेणी में आती है। अच्छी शिक्षा सचमुच एक बड़ी भलाई है; परन्तु यदि वह पवित्र न की गई हो, तो वह परमेश्वर के लिए और भी अधिक घिनौनी है। हाँ, मैं आपसे कहता हूँ, यदि उसका उपयोग परमेश्वर के लिए न किया जाए, तो जिस अनुपात में आप कर्तव्य के विषय में प्रकाश पाते हैं और उस प्रकाश के विरुद्ध और अधिक पाप करते हैं, उसी अनुपात में वह उसके लिए और भी घिनौनी होती जाती है। वे ही उपलब्धियाँ जो आपको मनुष्यों में अधिक आदर दिलाएँगी, यदि पवित्र न की गईं, तो परमेश्वर के सामने आपके चरित्र को और भी पूरी तरह घिनौना बना देंगी। आप एक परिष्कृत लेखक और सुन्दर वक्ता हैं। इन महत्वपूर्ण बातों में आप कॉलेज में सबसे आगे हैं। आपके मित्र आशा भरी रुचि से उस समय की बाट जोहते हैं जब सीनेट के मंच पर आपकी चर्चा होगी, और आप अपनी वाक्पटुता से उन्हें प्रशंसा से भर देंगे। परन्तु हाय, आपमें भक्ति नहीं है! जब हम पूछते हैं कि परमेश्वर ऐसी पवित्र न की गई प्रतिभाओं को किस दृष्टि से देखता है, तो हमें विवश होकर उत्तर देना पड़ता है—केवल एक घृणित वस्तु के रूप में। यह वाक्पटु युवा विद्यार्थी अपनी सब पवित्र न की गई शक्तियों के कारण परमेश्वर के लिए और भी अधिक घिनौना है। वे ही बातें जो मनुष्यों में आपको अधिक सम्मान दिलाती हैं, आपको नरक का केवल उपहास-पात्र बना देंगी। अधोलोक के गड्ढे की आत्माएँ आपसे वैसे ही मिलेंगी जैसे वे बाबुल के गिरे हुए राजा से मिली थीं, और ताना मारते हुए कहेंगी, “क्या, तू यहाँ है? तू जो अपनी वाक्पटुता से राज्यों को हिला सकता था, क्या तू गड्ढे की छोर तक उतारा गया है? तू जो ज्योति का स्वर्गदूत हो सकता था—तू जो ओबरलिन में रहता था; तू, एक स्वार्थी, विनाश के लिए ठहराया गया पापी—दूर हो, और हमारी संगति से निकल जा! हमारे यहाँ ऐसा कोई नहीं जो तेरे जितना दोषी हो और तेरे जितना गहरे दण्ड में पड़ा हो!”

इसी प्रकार सब पवित्र न की गई प्रतिभाओं के विषय में भी—सुन्दरता, शिक्षा, गुण-कौशल; ये सब, यदि पवित्र न किए गए हों, परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं। वे सब बातें जो आपको परमेश्वर की दृष्टि में अधिक उपयोगी बना सकती हैं, यदि उनका दुरुपयोग किया जाए, तो उसकी दृष्टि में केवल और भी बड़ी घृणित वस्तु हैं।

इसी प्रकार विधिवादी धर्म भी, जिसके साथ आप परमेश्वर की सेवा केवल इसलिए करते हैं क्योंकि आपको करनी पड़ती है। आप आराधना में जाते हैं, फिर भी परमेश्वर या उसकी आराधना के प्रति प्रेम से नहीं, बल्कि अपनी प्रतिष्ठा, अपनी आशा, या अपने विवेक का ध्यान रखकर। क्या ऐसा धर्म सब बातों में सबसे अधिक परमेश्वर के लिए घृणित नहीं होना चाहिए?

संसार ने धर्म का सच्चा विचार मुख्य रूप से खो दिया है। मैंने जो कुछ कहा है, उससे यह इतना स्पष्ट है कि और उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं।

बहुत हद तक यही बात कलीसिया के विषय में भी सच है। मसीही होने का अंगीकार करनेवाले अपना झूठा न्याय करते हैं, क्योंकि वे एक झूठे मापदण्ड से न्याय करते हैं।

सबसे सामान्य और घातक भूलों में से एक है मात्र निषेधात्मक मापदण्ड को अपनाना।

यहाँ ऐसे लोग हैं जो पाप के बोध की कमी की शिकायत करते हैं। वे सही मापदण्ड क्यों नहीं अपनाते और उससे अपना न्याय क्यों नहीं करते? मान लीजिए आपने एक घर को जल जाने दिया और उसे बचाने का कोई प्रयत्न नहीं किया; तो वहाँ आप अपनी सुस्ती और आलस्य के दोष के विषय में क्या सोचेंगे? उस अग्निकाण्ड में दो स्त्रियाँ और पाँच बच्चे जलकर राख हो गए; जब आपने आग को पकड़ते देखा, तो आपने चेतावनी क्यों नहीं दी? आप दौड़कर भवन में क्यों नहीं घुसे और भीतर बेसुध पड़े लोगों को घसीटकर बाहर क्यों नहीं निकाला? ओह, उस सुबह आप सुस्ती महसूस कर रहे थे—ठीक वैसे ही जैसे लोग धर्म में

“सुस्त” होने की बात करते हैं! अच्छा, आप आशा करते हैं कि आपका न्याय बहुत कठोरता से न किया जाएगा, क्योंकि आपने घर में आग नहीं लगाई; आपने बस उसे वैसे ही छोड़ दिया; आपने जो किया वह बस यह था कि कुछ नहीं किया! बहुत से लोग अपने धार्मिक कर्तव्यों के विषय में बस यही सफ़ाई देते हैं। वे पापियों को आग में से झपटकर निकालने के लिए कुछ नहीं करते, और ऐसा लगता है कि वे सोचते हैं कि यह बड़ा आदरणीय धर्म है! क्या यह यीशु मसीह का या पौलुस का धर्म था? क्या यह सच्चे परोपकार का धर्म है? या सामान्य बुद्धि का?

आप देखते हैं कि कितने लोग जिनके पास मसीही आशा है, उसे मात्र निषेधात्मक आधारों पर पाले रखते हैं। मैं प्रायः लोगों से पूछता हूँ कि धर्म में वे कैसे चल रहे हैं। वे उत्तर देते हैं, काफ़ी अच्छे; और फिर भी वे ऐसा कुछ नहीं कर रहे जो वास्तव में धार्मिक हो। वे प्राणों को बचाने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहे—परमेश्वर की सेवा के लिए कुछ नहीं कर रहे। वे कर क्या रहे हैं? ओह, वे प्रार्थना की रीतियाँ बनाए रखते हैं! मान लीजिए आप एक सेवक को नौकरी पर रखें और हर सप्ताह उसे वेतन चुकाएँ, फिर भी वह सारा लम्बा दिन आपसे प्रार्थना करने के सिवा और कुछ न करे!

धर्म बहुत बोधगम्य है और आसानी से समझा जा सकता है। यह एक युद्ध है। एक योद्धा की सेवा क्या है? वह अपने आप को अपने देश की सेवा में समर्पित करता है। यदि आवश्यक हो, तो वह उसकी वेदी पर अपना प्राण दे देता है। उससे यही करने की अपेक्षा की जाती है।

इसी प्रकार मनुष्य को अपना प्राण परमेश्वर की वेदी पर अर्पित करना है, ताकि जीवन में या मृत्यु में, जैसा परमेश्वर चाहे, उसकी सेवा में उसका उपयोग हो।

जो बातें मनुष्यों में सबसे ऊँची समझी जाती हैं, वे प्रायः ठीक वही बातें होती हैं जिनसे परमेश्वर सबसे अधिक घृणा करता है।

उदाहरण के लिए, विधिवादी का धर्म लीजिए। वह विवेक में जितना अधिक बँधा और दासत्व में होता है, सामान्यतः मसीही के रूप में उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही अधिक बढ़ती है।

वह पाप के प्रति अपने बन्धन के नीचे जितनी अधिक गम्भीरता से कराहता है, और जितनी अधिक सच्चाई से उसे कहना पड़ता है— “बुद्धि की बात मैं सुनता हूँ, उसकी सलाहों को तौलता हूँ, और उसके सब वचनों को ठीक मानता हूँ; फिर भी आज्ञा मानना मुझे कठिन लगता है, और प्रेम करना उससे भी कठिन,”- उतना ही अधिक संसार उसके धर्म का आदर करता है और परमेश्वर उससे घृणा करता है। वे कहते हैं, वह भला मनुष्य—वह जीवन भर दासत्व में फँसा रहा! वह सारी उम्र सन्देहों और भयों में रहा!

परन्तु वह विश्वास के द्वारा उस स्वतंत्रता में क्यों नहीं आया जिससे मसीह अपने लोगों को स्वतंत्र करता है?

सबसे परिष्कृत स्वार्थ पर आधारित नैतिकता मनुष्यों में सबसे ऊँचे आदर में रहती है। वे कहते हैं, संसार का कितना भला मनुष्य है—लगभग संत; फिर भी परमेश्वर उसे पूरी तरह घृणित ही समझता होगा।

संसार की दृष्टि में अच्छा मसीही कभी रूखा नहीं होता, कभी आक्रामक नहीं होता, फिर भी उसकी बहुत सराहना की जाती है। उसमें मनुष्यों को प्रसन्न करने की एक स्वार्थपूर्ण लगन होती है, जिससे बढ़कर किसी बात की सराहना नहीं होती। मैंने एक ऐसे पादरी के विषय में सुना जिसका संसार में एक भी शत्रु नहीं था। कहा जाता था कि जितने लोगों को वे जानते थे, उन सब में वह सबसे अधिक मसीह के समान था। मुझे यह विचित्र लगा कि मसीह के इतने समान मनुष्य का कोई शत्रु न हो, क्योंकि मसीह के, जो स्वयं अपने समान इतना था जितना कोई दूसरा मनुष्य कभी नहीं हो सकता, बहुत से शत्रु थे, और वे भी बहुत कड़वे शत्रु। वास्तव में, कहा गया है, “जितने मसीह

यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएँगे।” परन्तु जब मैंने उस मामले के तथ्य जाने, तो मैं उस मनुष्य को समझ गया। वह अपने आप को कभी कोई ऐसी बात प्रचार करने नहीं देता था जिससे यूनिवर्सलिस्ट भी अप्रसन्न हो सकें।

वास्तव में, उसकी कलीसिया की प्राचीन-सभा (सेशन) में दो यूनिवर्सलिस्ट थे। उसकी प्राचीन-सभा के सदस्यों में कुछ कैल्विनवादी भी थे, और उसे किसी भी हाल में उन्हें अप्रसन्न नहीं करना था। उसका प्रचार सचमुच अपने प्रकार का एक आदर्श था। उसका आदर्श-वाक्य था—लोगों को प्रसन्न करो—लोगों को प्रसन्न करने के सिवा और कुछ नहीं। जागृति के बीच में, वह सभाएँ छोड़कर किसी दावत में चला जाता था; क्यों? लोगों को प्रसन्न करने के लिए।

अब यह मनुष्यों में बहुत ऊँचा समझा जा सकता है; परन्तु क्या परमेश्वर इससे घृणा नहीं करता?

मनुष्य के न्याय से परखा जाना एक छोटी बात है, और तब तो और भी छोटी, जब वे झूठे मापदण्ड से न्याय करने की ओर इतने झुके रहते हैं। यदि केवल परमेश्वर मुझे स्वीकार करे, तो मनुष्य मुझे दोषी ठहराएँ, इससे मुझे क्या? मैं जितना अधिक जीता हूँ, सही और गलत के महान प्रश्नों पर, जैसे परमेश्वर उन्हें देखता है, मानवीय विचारों को उतना ही कम महत्व देता हूँ। वे अपना और दूसरों का, दोनों का झूठा न्याय करेंगे। कलीसिया भी कभी-कभी अपने सबसे अच्छे लोगों को दोषी ठहराती और बहिष्कृत कर देती है। मैं ऐसे मामले जानता हूँ, और उनके नाम बता सकता हूँ, जिनमें मुझे पूरा भरोसा है कि उन्होंने ठीक यही काम किया है। उन्होंने लोगों को अपनी संगति से काट दिया है, और अब हर कोई देखता है कि जिन लोगों को बहिष्कृत किया गया था, वे कलीसिया के सबसे अच्छे लोग थे।

यह एक धन्य विचार है कि हमें केवल एक ही बात की चिन्ता करनी है, परमेश्वर को प्रसन्न करना। हमें केवल एक ही प्रश्न पूछना है—परमेश्वर इसके विषय में क्या सोचेगा? हमें केवल एक ही मन को प्रसन्न करना है, और वह है विश्व का महान मन। यही हमारा एकमात्र लक्ष्य हो, तो हम उसे प्रसन्न करने में

असफल न होंगे। परन्तु यदि हम इसका लक्ष्य नहीं रखते, तो जो कुछ हम कर सकते हैं वह सब उसकी दृष्टि में केवल घृणित है।

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