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उसके मन के सामने आया। वह देखने में सुन्दर था और खाने में अच्छा जान पड़ता था। उसकी भूख जाग उठती है और तृप्ति के लिए मचल उठती है। फिर, उसके विषय में कहा गया था कि वह “बुद्धि देने के लिये” उपयुक्त है, और उसे खाकर वह “भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य” हो सकती थी। इसने उसकी जिज्ञासा को उकसाया। इस परीक्षा के आगे झुककर और स्वयं को प्रसन्न करने का निश्चय करके उसने अपने लिए पाप का एक नया मन बना लिया; उसने अपने मन को पवित्रता से पाप की ओर बदल दिया, और अपनी पहली नैतिक स्थिति से गिर गई। जब
आदम परीक्षा के आगे झुका, तो उसने भी अपने मन में वही परिवर्तन किया; उसने अपने आप को स्वार्थ और पाप के हाथ सौंप दिया। इसी से आगे के जीवन में स्वार्थ के सब भावी कार्यों का कारण समझ में आता है।
आदम और हव्वा को फिर परमेश्वर के सामने लाया जाता है। परमेश्वर आदम से कहता है—अपना मन मुझे दे।
अपना मन बदल। आदम कहता है, क्या! मैं अपना मन स्वयं नहीं बदल सकता! परन्तु परमेश्वर उत्तर देता है, तुझे ऐसा किए कितना समय हुआ है? कल ही तो तूने अपना मन पवित्रता से पाप की ओर बदला था; तू उसे फिर से वापस क्यों नहीं बदल सकता?
सब दशाओं में ऐसा ही है। मुख्य बात है प्रधान रुचि को, मन के शासन करनेवाले उद्देश्य को बदलना; और कौन कह सकता है कि मैं यह नहीं कर सकता? क्या आप यह नहीं कर सकते? क्या आप अपने आप को परमेश्वर को नहीं दे सकते?
आप अपने बाहरी कार्यों में परमेश्वर को इसलिए प्रसन्न नहीं कर सकते कि आपका शासन करनेवाला उद्देश्य ठीक नहीं है। जब तक आपका मुख्य प्रेरक ग़लत है, तब तक आप जो कुछ करते हैं वह स्वार्थपूर्ण है, क्योंकि वह सब केवल इसी एक लक्ष्य से किया जाता है कि आप अपने आप को प्रसन्न करें। आप परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए, और उसकी सारी पवित्र इच्छा पूरी करने के शासन करनेवाले अभिप्राय और उद्देश्य से, कुछ भी नहीं करते; इसलिए आप जो कुछ करते हैं, यहाँ तक कि आपके धार्मिक कर्तव्य भी, परमेश्वर को केवल अप्रसन्न ही करते हैं। यदि बाइबल ने कहीं भी परमेश्वर को आपकी कपटपूर्ण सेवाओं से प्रसन्न होते दिखाया होता, तो वह झूठी सिद्ध हो जाती, क्योंकि यह पूर्णतः असम्भव है।
परन्तु आप कहते हैं कि बाइबल मुझसे माँग करती है कि मैं भीतरी मनुष्य से—मन से—आरम्भ करूँ; और आप कहते हैं कि आप उस तक पहुँच नहीं सकते; कि आप अपने ही मन या इच्छा तक पहुँचकर उसे बदल नहीं सकते।
वास्तव में आप पूरी तरह भूल में हैं। यही तो वह बात है जो सबसे अधिक पूरी तरह आपके वश में है। जितनी बातों की कल्पना की जा सकती है, उन सब में यही वह बात है जिसे आप सबसे अधिक निश्चय के साथ कर सकते हैं—जो सबसे अधिक पूर्ण रूप से आपके वश में है। यदि परमेश्वर ने आपके उद्धार को कमरे के आर-पार चलने पर निर्भर किया होता, तो सम्भव था कि आप ऐसा न कर पाते; या यदि पलकें उठाने पर, या अपने आसन से उठने पर, या अपनी मांसपेशियों की किसी छोटी-से-छोटी हरकत पर, तो हो सकता था कि आप उसे करने में बिलकुल असमर्थ रहते। आप आवश्यक हरकत की इच्छा कर सकते थे, और प्रयत्न कर सकते थे; परन्तु हो सकता था कि मांसपेशियों में काम करने की शक्ति ही न होती। आप प्रायः सोचते हैं कि यदि परमेश्वर ने आपके उद्धार को केवल आपकी मांसपेशियों की कुछ हरकतों पर निर्भर किया होता, तो यह कितना सहज होता; यदि उसने केवल बाहरी भाग को वश में रखने को कहा होता; परन्तु, ओह, आप कहते हैं, मैं भीतरी भाग को कैसे वश में करूँ? भीतरी भाग ही तो वह वस्तु है जिसे आप हिला सकते हैं और वश में रख सकते हैं। यदि बात बाहरी भाग की होती, तो आप मरते दम तक संघर्ष करते और कराहते रह सकते थे, और अनन्त नरक के दण्ड के भय से भी एक मांसपेशी तक न हिला पाते। परन्तु अब, क्योंकि परमेश्वर केवल यह कहता है, “अपनी इच्छा बदलो,” सब कुछ आपके वश में ला दिया गया है। यही ठीक वह बात है जिसे आप सदा कर सकते हैं; आप अपनी इच्छा को सदा मोड़ सकते हैं। आप अपनी ही इच्छा से अपना मन सदा दे सकते हैं। तो फिर आपकी कठिनाई और आपत्ति कहाँ है? परमेश्वर आपसे माँगता है कि आप अपनी स्वतंत्रता के साथ काम करें; उस स्वतंत्र, स्वैच्छिक कार्य की शक्तियों का प्रयोग करें जो उसने आपको दी हैं। वह आपसे
