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हैं? मेरी बुद्धि जिन बातों की पुष्टि करती है, वह उनका खण्डन करती है। आप भी मानते हैं और मैं भी मानता हूँ कि परमेश्वर ने मेरे स्वभाव को, शारीरिक और नैतिक दोनों को, रचा है। यहाँ एक पुस्तक है जिसके विषय में कहा जाता है कि वह परमेश्वर की ओर से है, परन्तु वह मेरे स्वभाव का खण्डन करती है। इसलिए मैं जानता हूँ कि वह परमेश्वर की ओर से नहीं हो सकती।
इससे स्वाभाविक रूप से मेरे लिए यह द्वार खुल गया कि मैं उससे बाइबल के विरुद्ध उसकी आपत्ति की वे विशेष बातें निकलवाऊँ, जिनके विषय में उसका कहना था कि बाइबल ऐसी बातें सिखाती है जिनका उसका स्वभाव खण्डन करता है। ये बातें और उनके प्रति मेरा उत्तर ही मेरे इस वर्तमान उपदेश का मुख्य भाग होंगे।
1. बाइबल सच्ची नहीं हो सकती, क्योंकि वह परमेश्वर को अन्यायी के रूप में प्रस्तुत करती है। मैं अपने भीतर यह दृढ़ धारणाएँ पाता हूँ कि क्या न्यायसंगत है और क्या अन्यायपूर्ण। बाइबल इन धारणाओं का घोर अपमान करती है। वह
परमेश्वर को ऐसा दिखाती है कि वह मनुष्यों को रचता है और फिर किसी दूसरे के पाप के लिए उन्हें दोषी ठहराता है।
मैंने कहा, सचमुच? और कहाँ? बताइए, बाइबल यह बात कहाँ कहती है?
उसने कहा, क्यों, क्या वह ऐसा नहीं कहती? नहीं। क्या आप प्रेस्बिटेरियन हैं? उसने पूछा। हाँ। तब वह प्रश्नोत्तरी (कैटेकिज़्म) उद्धृत करने लगा। मैंने कहा, ठहरिए, ठहरिए, वह बाइबल नहीं है। वह तो केवल मनुष्यों की बनाई हुई प्रश्नोत्तरी है।
उसने कहा, सच है, परन्तु क्या बाइबल सारी मानवजाति के सार्वभौमिक पाप को आदम के पाप के साथ नहीं जोड़ती? मैंने कहा, हाँ, जोड़ती है, एक विशेष रीति से; परन्तु हमारे उद्देश्य के लिए यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि किस रीति से। बाइबल इस सम्बन्ध को आनुषंगिक (परोक्ष) बताती है, प्रत्यक्ष नहीं; और वह सदा दोषी ठहराए गए पापी को ऐसा दिखाती है कि उसने स्वयं सचमुच पाप किया है, और वह अपने ही पाप के कारण दोषी ठहराया गया है।
उसने आगे कहा, परन्तु बच्चे तो अपने पिता के पापों का दुःख भोगते ही हैं। मैंने कहा, हाँ, एक विशेष अर्थ में ऐसा है, और ऐसा होना ही चाहिए। क्या आप स्वयं हर जगह नहीं देखते कि बच्चों को अपने माता-पिता के पापों का दुःख भोगना ही पड़ता है? और अपने माता-पिता की भक्ति के कारण वे आशीष भी पाते हैं? आप यह देखते हैं और इसमें कोई दोष नहीं पाते। आप देखते हैं कि बच्चे अपने माता-पिता के भले या बुरे आचरण में अवश्य ही उलझे रहते हैं; बच्चों के रूप में उनका सम्बन्ध इसे पूरी तरह अनिवार्य बना देता है। क्या यह बुद्धिमानी और भलाई की बात नहीं कि बच्चों का सुख या दुःख उनके माता-पिता पर निर्भर हो, और इस प्रकार वह माता-पिता के लिए अपने बच्चों को सद्गुण में पालने-पोसने का एक सबसे प्रबल प्रेरक बन जाए? फिर भी यह सच है कि पुत्र को अपने माता-पिता के पापों के लिए न कभी प्रतिफल दिया जाता है और न कभी दण्ड के रूप में दण्डित किया जाता है। अपने माता-पिता के साथ उसके सम्बन्ध के कारण जो विपत्ति उस पर आती है, वह सदा अनुशासन के लिए होती है—दण्ड के लिए कभी नहीं।
उसने फिर कहा, बाइबल निश्चय ही परमेश्वर को ऐसा दिखाती है कि वह मनुष्यों को पापी रचता है, और उनके पापमय स्वभाव के लिए उन्हें दोषी ठहराता है। मैंने उत्तर दिया, नहीं; क्योंकि बाइबल पाप की परिभाषा व्यवस्था का स्वेच्छा से किया गया उल्लंघन बताती है, और यह मानना बेतुका है कि कोई स्वभाव स्वेच्छा से उल्लंघन करनेवाला हो सकता है।
इसके अतिरिक्त, बात के स्वरूप से ही यह असम्भव है कि परमेश्वर कोई पापमय स्वभाव बनाए। वास्तव में यह दोहरा असम्भव है, क्योंकि यह बात स्वाभाविक रूप से असम्भव है, और यदि ऐसा न भी होता, तो भी उसके लिए ऐसा करना नैतिक रूप से असम्भव होता। वह ऐसा उसी कारण से नहीं कर सकता जिस कारण से वह पाप नहीं कर सकता।
इसी के अनुरूप यह तथ्य है कि बाइबल कहीं भी परमेश्वर को मनुष्यों को उनके स्वभाव के लिए दोषी ठहराते हुए नहीं दिखाती, न यहाँ और न न्याय के दिन। बाइबल में कहीं भी इस बात का तनिक-सा भी संकेत नहीं है कि परमेश्वर मनुष्यों को उनके सृजे हुए स्वभाव के लिए उत्तरदायी ठहराता है; वह उन्हें केवल अपने स्वभाव के घृणित और हठीले दुरुपयोग के लिए उत्तरदायी ठहराता है। इस विषय के अन्य विचार, जो इससे भिन्न हैं, बाइबल नहीं हैं, बल्कि केवल झूठी व्याख्याएँ हैं जो प्रायः उन लोगों ने उस पर थोपी हैं जिनके दर्शनशास्त्र ने
