उपदेश 19 (31 में से)

12. प्रायश्चित के विषय में

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12. प्रायश्चित के विषय में।

12. प्रायश्चित के विषय में।

“कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिये मर गया।”—1 कुरिन्थियों 15:3

“जो पाप से अज्ञात था, उसी को उस ने हमारे लिये पाप ठहराया, कि हम उस में होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।”—2 कुरिन्थियों 5:21

“परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।”—रोमियों 5:8

“यहोवा अपनी धार्मिकता के निमित्त प्रसन्न है; वह व्यवस्था की बड़ाई करेगा और उसे आदरयोग्य ठहराएगा।”—यशायाह 42:21

“उसे परमेश्वर ने उसके लोहू के कारण एक ऐसा प्रायश्चित ठहराया, जो विश्वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहिले किए गए, और जिन की परमेश्वर ने अपनी सहनशीलता से आनाकानी की, उन के विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे। वरन इसी समय उस की धार्मिकता प्रगट हो; कि जिस से वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करे, उसका भी धर्मी ठहरानेवाला हो।”—रोमियों 3:25, 26

इस अन्तिम पद में प्रेरित असाधारण विस्तार के साथ हमारे संसार में मसीह के आने के ईश्वरविज्ञान-सम्बन्धी, और मैं तो यह भी कह सकता हूँ कि दार्शनिक, अभिप्राय को बताता है—अर्थात् सृजे गए प्राणियों के सामने पापों को क्षमा करने में परमेश्वर की धार्मिकता को प्रगट करना। यहाँ कहा गया है कि मसीह को प्रायश्चित के रूप में ठहराया गया है ताकि परमेश्वर पाप को क्षमा करने में न्यायी ठहरे; यह मानते हुए कि यदि मसीह को पहले बलिदान के रूप में न ठहराया गया होता, तो परमेश्वर विश्व के प्रति न्यायी नहीं हो सकता था।

जब हम परमेश्वर और उसके शासन के साथ अपने सम्बन्धों के विषय में अपने मन के अदम्य निश्चयों पर गम्भीरता से विचार करते हैं, तो हम यह देखे बिना नहीं रह सकते कि हम पापी हैं, और व्यवस्था और न्याय के आधार पर आशा से परे खोए हुए हैं। यह तथ्य कि हम परमेश्वर के विरुद्ध घोर पापी हैं, मानवीय चेतना का एक मूल तथ्य है, जिसकी गवाही हमारे अदम्य निश्चय देते हैं, और जिसका इन्कार उतना ही असम्भव है जितना इस तथ्य का कि गलत नाम की कोई वस्तु है।

अब, यदि परमेश्वर पवित्र और भला है, तो अवश्य है कि वह गलत काम को अस्वीकार करे, और उसे दण्ड दे। उसकी व्यवस्था का दण्ड उसके विरुद्ध सुनाया गया है। इस दण्ड के अधीन हम दोषी ठहराए हुए खड़े हैं, और किसी ऐसे पर्याप्त प्रायश्चित के सिवा हमारे लिए कोई छुटकारा नहीं जो परमेश्वर को सन्तुष्ट करनेवाला हो, क्योंकि वह उसके राज्य के हितों के लिए सुरक्षित हो।

यहाँ तक हम प्रकृति के साधारण प्रकाश के द्वारा सुरक्षित रूप से और ठोस भूमि पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि बाइबल न भी होती, तब भी हम इतना पूर्ण निश्चय के साथ जान सकते थे। यहाँ तक तो नास्तिक भी जाने को विवश हैं।

तो फिर हम यहाँ हैं, पूर्ण और सर्वथा न्यायपूर्ण दण्ड-आज्ञा के अधीन। क्या बच निकलने का कोई मार्ग है? यदि है, तो वह हम पर बाइबल में ही प्रगट होना चाहिए; क्योंकि किसी और स्रोत से वह नहीं आ सकता। बाइबल बच निकलने की एक विधि प्रगट करने का दावा करती है। यही उसके सन्देश का मुख्य भार है।

वह उन परिस्थितियों की ओर एक बहुत संक्षिप्त संकेत से आरम्भ होती है जिनमें पाप संसार में आया। पाप किस रीति से प्रवेश करता है इस विषय में बहुत विस्तार में गए बिना, वह मनुष्यजाति में पाप के तथ्य को दिखाने में अत्यन्त पूर्ण, स्पष्ट और निश्चित है। कि परमेश्वर मनुष्यजाति को पाप और विद्रोह में पड़ा हुआ मानता है, यह बात उतनी स्पष्ट की गई है जितनी भाषा उसे स्पष्ट कर सकती है। यह ध्यान देने योग्य है कि यह तथ्य और इससे जुड़ा हुआ सम्भव क्षमा का तथ्य, एक ही अधिकार के आधार पर पुष्ट किए गए हैं

—उसी प्रकार की स्पष्टता और साफ़ शब्दों के साथ। ये तथ्य साथ-साथ खड़े रहते हैं या साथ-साथ गिरते हैं। स्पष्ट है कि परमेश्वर का अभिप्राय यह था कि सभी मनों पर ये दो महान सत्य अंकित हों—पहला, कि मनुष्य अपने ही पाप से नष्ट हुआ है; दूसरा, कि वह यीशु मसीह के द्वारा उद्धार पा सकता है। पहले का इन्कार करना हमारे अपने अदम्य निश्चयों और परमेश्वर की सबसे स्पष्ट प्रकट गवाही, दोनों का खण्डन करना है; दूसरे का इन्कार करना, अपने ही स्वतंत्र कार्य और इच्छा से, अपने उद्धार की सारी आशा के विरुद्ध द्वार बन्द कर देना है।

प्रायश्चित के कारणों और शासन-सम्बन्धी प्रभावों की दार्शनिक व्याख्याओं को प्रायश्चित के तथ्य के साथ गड़बड़ नहीं करना चाहिए। मनुष्य उस तथ्य के द्वारा उद्धार पा सकते हैं यदि वे केवल उस पर विश्वास करें, चाहे वे उसकी दार्शनिक व्याख्या के विषय में कुछ भी न जानते हों। प्रेरितों ने व्याख्या को बहुत महत्त्व नहीं दिया, परन्तु उन्होंने तथ्य की अत्यन्त उत्साह से घोषणा की, परमेश्वर की ओर से अपने अधिकार को सिद्ध करने के लिए आश्चर्यकर्मों को गवाही के रूप में दिया, और इस प्रकार मनुष्यों से विनती की कि वे तथ्य पर विश्वास करें और उद्धार पाएँ। तो फिर, तथ्य पर उद्धार देनेवाला विश्वास किया जा सकता है, चाहे व्याख्या अज्ञात ही रहे। निस्सन्देह हजारों-हजार लोगों के साथ यही हुआ है।

फिर भी प्रायश्चित के कारणों और शासन-सम्बन्धी आधारों को समझना बहुत उपयोगी है। इससे प्रायः सन्देहवाद दूर हो जाता है। वकीलों में यह बहुत सामान्य है कि वे तथ्य को तब तक अस्वीकार करते हैं जब तक वे प्रायश्चित के कारणों और शासन-सम्बन्धी प्रभावों को न देख लें; यह देख लेने पर वे प्रायः तथ्य को मान लेते हैं। ऐसे मनों का एक बड़ा वर्ग है जिन्हें शासन-सम्बन्धी प्रभावों को देखने की आवश्यकता है, अन्यथा वे तथ्य को अस्वीकार कर देंगे। तथ्य पर इतना अधिक सन्देह किए जाने का कारण यह है कि जो व्याख्याएँ दी गई हैं वे असन्तोषजनक रही हैं। उन्होंने परमेश्वर का गलत चित्रण किया है। कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य उन्हें अस्वीकार करें, और उनके साथ ही किसी भी प्रायश्चित के तथ्य को भी।

प्रायश्चित शासन का एक उपाय है, जिसके द्वारा पापी पर व्यवस्था के दण्ड को लागू किए बिना व्यवस्था को बनाए रखा जाता है। निस्सन्देह, किसी भी शासन में दण्ड लागू किए बिना व्यवस्था के अधिकार और उसके प्रति उचित आदर को बनाए रखना सदा कठिन बात होगी। फिर भी परमेश्वर ने इसे अत्यन्त सिद्ध रीति से पूरा किया है।

यहाँ सार्वजनिक न्याय और प्रतिफलात्मक न्याय में भेद करना आवश्यक है।

दूसरा, अर्थात् प्रतिफलात्मक न्याय, व्यक्तिगत पापी के सिर पर उसके अपराध के स्वरूप के अनुरूप दण्ड लाता है। पहला, अर्थात् सार्वजनिक न्याय, केवल सामान्य भलाई की ओर देखता है, और उसे वही करना चाहिए जो व्यवस्था के अधिकार और प्रभाव को उतनी ही अच्छी तरह सुरक्षित करे जितना दण्ड का लागू किया जाना करता। वह एक स्थानापन्न को स्वीकार कर सकता है, बशर्ते वह व्यवस्था को बनाए रखने और आज्ञापालन को सुनिश्चित करने में उतना ही प्रभावशाली हो।

तो फिर, सार्वजनिक न्याय दो में से किसी एक रीति से सन्तुष्ट हो सकता है, अर्थात्—या तो दण्ड को पूरी तरह लागू करने के द्वारा, या किसी ऐसे स्थानापन्न के द्वारा जो शासन के उद्देश्यों को कम से कम उतनी ही अच्छी तरह पूरा करे। इसलिए जब हम पूछते हैं—सार्वजनिक न्याय के उद्देश्यों के लिए क्या आवश्यक है?

तो उत्तर यह है, 1. दण्ड का अक्षरशः लागू किया जाना नहीं; क्योंकि यदि ऐसा हो, तो वह अनिवार्य रूप से पापी पर ही पड़ना चाहिए, और किसी और पर नहीं।

इसके अतिरिक्त, विश्व के लिए इसमें कोई लाभ नहीं हो सकता था कि मसीह हर उस खोए हुए पापी के लिए ठहराया गया पूरा और ठीक-ठीक दण्ड भोगे, जो उसके द्वारा उद्धार पानेवाला था। जब दुःख की मात्रा एक स्थिति में भी उतनी ही है जितनी दूसरी में, तो लाभ कहाँ है? और इससे भी आगे, यदि न्याय का प्रशासन प्रतिफलात्मक होना है, तो वह मसीह पर नहीं पड़ सकता, और पापी पर ही पड़ना चाहिए।

यदि वह प्रतिफलात्मक नहीं है, तो निश्चय ही वह पापी के लिए ठहराए गए दण्ड की तुलना में प्रकार में बहुत भिन्न और मात्रा में कम हो सकता है।

कभी-कभी यह कहा गया है कि मसीह ने मात्रा में उतना सब और प्रकार में वैसा ही दुःख उठाया जितना सब उद्धार पानेवालों को अन्यथा उठाना पड़ता; परन्तु मानवीय बुद्धि इस धारणा से विद्रोह करती है, और निश्चय ही पवित्रशास्त्र इसकी पुष्टि नहीं करता।

2. कुछ लोग ऐसा चित्रण करते हैं कि परमेश्वर को शान्त किए जाने की, और उसकी भावनाओं को मनाए जाने की आवश्यकता है।

यह एक घोर भूल है। यह परमेश्वर का पूरी तरह गलत चित्रण करती है और प्रायश्चित को पूरी तरह गलत समझती है।

3. सार्वजनिक न्याय का यह कोई भाग नहीं है कि एक निर्दोष प्राणी इन शब्दों के उचित अर्थ में दण्ड या सज़ा भोगे। सज़ा अपराध की ओर संकेत करती है—और मसीह में कोई अपराध नहीं था।

तो फिर, मसीह को सज़ा नहीं दी गई।

यह बात स्पष्ट रूप से समझ ली जाए कि ईश्वरीय व्यवस्था परमेश्वर के परोपकार से उत्पन्न होती है, और उसके सामने परोपकारी उद्देश्यों के सिवा और कोई उद्देश्य नहीं है। वह केवल और एकमात्र इसलिए प्रगट की गई कि आज्ञापालन के द्वारा अधिक से अधिक सम्भव भलाई को बढ़ावा दिया जाए। अब, ऐसी व्यवस्था क्षमा की अनुमति दे सकती है, बशर्ते कोई ऐसी अभिव्यक्ति दी जा सके जो आज्ञापालन को उतना ही सुनिश्चित करे—व्यवस्था देनेवाले की दृढ़ता, खराई और प्रेम का उतना ही प्रकाशन करे। व्यवस्था सिद्ध होने के कारण, और अपने प्राणियों की भलाई के लिए अत्यन्त आवश्यक होने के कारण, परमेश्वर को आज्ञापालन के लिए प्रेरित करनेवाले किसी समतुल्य प्रभाव के बिना उसके दण्ड को एक ओर नहीं हटाना चाहिए।

दण्ड का अभिप्राय यह था कि वह परमेश्वर की व्यवस्था की आज्ञा के प्रति उसके आदर की, और उसे बनाए रखने के उसके उद्देश्य की गवाही हो। इसलिए, कोई भी प्रायश्चित, जो इस दण्ड को लागू करने के स्थानापन्न के रूप में काम करे, ऐसा होना चाहिए जो परमेश्वर की व्यवस्था की आज्ञा और दण्ड, दोनों के प्रति उसके आदर को दिखाए। वह आज्ञापालन को लागू करने के योग्य होना चाहिए। इस सम्बन्ध में उसकी नैतिक सामर्थ पापी पर दण्ड लागू किए जाने की सामर्थ के बराबर होनी चाहिए।

फलस्वरूप, हम पाते हैं कि इस प्रायश्चित में परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था के प्रति और उसके आज्ञापालन के प्रति अपने ऊँचे आदर को प्रगट किया है।

व्यवस्था के दण्ड को लागू करने का अभिप्राय व्यवस्था की महिमा, श्रेष्ठता और उपयोगिता की गहरी छाप डालना था। कोई भी बात स्थानापन्न के रूप में काम कर सकती है जो उतनी ही पूरी तरह पाप की हानि और घृणितता को, उसके प्रति परमेश्वर की घृणा को, और अपनी व्यवस्था को उसकी सारी माँगों सहित लागू करने के उसके दृढ़ निश्चय को प्रमाणित करे। विशेषकर प्रस्तावित स्थानापन्न तब और भी कारगर हो सकता है जब वह पापियों के प्रति परमेश्वर के प्रेम का भी स्पष्ट प्रकाशन करे। मसीह की मृत्यु के द्वारा हुए प्रायश्चित ने यह अत्यन्त प्रबल रीति से किया है।

विद्रोह का हर कार्य व्यवस्था की निन्दा करता है। इसलिए, इससे पहले कि परमेश्वर विद्रोह को क्षमा कर सके, उसे पाप के प्रति अपने रुख का ऐसा प्रदर्शन करना चाहिए जो सृजे गए विश्व के हृदय को कँपा दे, और हर कान को झनझना दे। विशेषकर सर्वोच्च आज्ञापालन के उद्देश्यों के लिए, ऐसा प्रदर्शन करना आवश्यक था जो प्रजा के मन में उनके व्यवस्था देनेवाले के प्रति भरोसे और प्रेम को प्रभावी रूप से सुनिश्चित करे—ऐसा जो यह दिखाए कि वह कोई अत्याचारी नहीं है, और वह केवल अपने प्राणियों के सर्वोच्च आज्ञापालन और उसके फलस्वरूप मिलनेवाले आनन्द को चाहता है। यह हो जाने पर,

परमेश्वर सन्तुष्ट होगा।

अब, इन शिक्षाओं को सिखाने के लिए, और इन्हें विश्व पर बड़े और अनन्त बल के साथ अंकित करने के लिए, क्या किया जा सकता है?

परमेश्वर की गवाही इस प्रकार दी जानी चाहिए कि वह भली-भाँति समझी जाए। स्पष्ट है कि दी जानेवाली गवाही परमेश्वर की ओर से आनी चाहिए, क्योंकि व्यवस्था, दण्ड और स्थानापन्न के विषय में उसी का दृष्टिकोण है जिसे प्रगट किए जाने की आवश्यकता है। हर कोई यह अवश्य देखेगा कि यदि वह पापी पर व्यवस्था लागू करता, तो इससे तुरन्त व्यवस्था के मूल्य के विषय में उसका दृष्टिकोण प्रगट हो जाता। परन्तु स्पष्टतः, किसी प्रस्तावित स्थानापन्न को स्वीकार करने से पहले, उसी बात के विषय में उसका दृष्टिकोण उस स्थानापन्न के द्वारा भी उतने ही बल से दिखाया जाना चाहिए।

फिर, इस कार्य में व्यवस्था की आज्ञा को परमेश्वर के द्वारा और मध्यस्थ के रूप में यीशु के द्वारा, दोनों के द्वारा स्वीकार और सम्मानित किया जाना चाहिए। मध्यस्थ को, मनुष्यजाति के प्रतिनिधि के रूप में, व्यवस्था का पालन करके, और सार्वजनिक रूप से उसका समर्थन करके, उसका सम्मान करना चाहिए—अन्यथा प्रस्तावित प्रायश्चित में ईश्वरीय व्यवस्था को आवश्यक आदर नहीं दिया जा सकता। यह किया गया है।

फिर, मनुष्यजाति पर दया करने के लिए पर्याप्त प्रबन्ध करने के लिए, स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य है कि उनके मध्यस्थ के व्यक्तित्व में ईश्वरीय और मानवीय, दोनों एक हो जाएँ।

प्रायश्चित में परमेश्वर और मनुष्य दोनों का प्रतिनिधित्व होना है; ईश्वरीय वचन ने परमेश्वरत्व का प्रतिनिधित्व किया; मनुष्य यीशु ने उस मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व किया जिसका छुटकारा होना था। बाइबल जो इस प्रकार कहती है, वह यीशु के इतिहास में सत्य प्रमाणित होता है, क्योंकि उसने ऐसी बातें कहीं और कीं जो तब तक कही और की नहीं जा सकती थीं जब तक वह मनुष्य न होता, और उसी प्रकार तब तक भी नहीं जब तक वह साथ ही

परमेश्वर भी न होता। एक ओर, मानवीय स्वभाव की थकावट के कारण अपना क्रूस उठाने में भी बहुत निर्बल; और दूसरी ओर, ईश्वरीय सामर्थ की परिपूर्णता के कारण आँधी को शान्त करने और मृतकों को जिलाने में पराक्रमी। इस प्रकार यीशु मसीह में परमेश्वर और मनुष्य दोनों का प्रतिनिधित्व है।

तो फिर, जो कार्य किया जाना था उसकी माँग थी कि यीशु मसीह व्यवस्था का सम्मान करे और उसका पूरी तरह पालन करे; यह उसने किया। पापी के स्थान पर खड़े होकर, उसे एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में व्यवस्था का श्राप उठाना था—अक्षरशः दण्ड नहीं, परन्तु इतनी विशाल मात्रा में दुःख, जो परमेश्वर और विश्व के साथ उसके सम्बन्धों को देखते हुए, पाप के विरुद्ध परमेश्वर की अप्रसन्नता का, और फिर भी पापी तथा अपनी सारी नैतिक प्रजा, दोनों के प्रति उसके प्रेम का, आवश्यक प्रदर्शन करने के लिए पर्याप्त हो। एक ओर, यीशु ने मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व किया; दूसरी ओर, उसने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। यह अत्यन्त ईश्वरीय दर्शन है।

कलवरी पर चढ़ाए गए बलिदान को सार्वजनिक न्याय के लिए परमेश्वर की भेंट के रूप में समझना चाहिए—परमेश्वर स्वयं अपने पुत्र को मृत्यु के लिए सौंप देता है, और यह पुत्र पाप के प्रायश्चित के लिए अपने जीवन का लहू उँडेल देता है—और इस प्रकार पाप करनेवाली, खोई हुई मनुष्यजाति के लिए दया के दोहरे फाटक खोल देता है।

इसे पापियों के प्रति उसके प्रेम का प्रकाशन मानना चाहिए। यह उनके लिए परमेश्वर द्वारा दिया गया छुड़ौती का मूल्य है। मामले की दशा को देखिए। सर्वोच्च व्यवस्था देनेवाले का, और वास्तव में विश्व के शासन का, विद्रोह के द्वारा तिरस्कार किया गया था; निस्सन्देह जब तक परमेश्वर और उसकी व्यवस्था का यह अपमान पूरी तरह धो न दिया जाए, तब तक क्षमा नहीं हो सकती। यह इन बड़े पापों के लिए परमेश्वर के द्वारा अपने ही पुत्र की स्वेच्छा से दी गई भेंट के द्वारा किया गया है।

हे पापियो, यह सब आपके लिए किया गया है; आप इसके विषय में क्या सोचते हैं? आप उस विनती के विषय में क्या सोचते हैं जो पौलुस लिखता है और जिसे परमेश्वर उसके द्वारा करता है, “इसलिये हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूँ, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।” उन दयाओं के विषय में सोचिए। सोचिए कि मसीह ने आपके लिए कैसे अपना प्राण उँडेल दिया। मान लीजिए कि वह आज आपके बीच प्रगट हो, और लहू टपकते हुए अपने हाथ ऊपर उठाकर कहे, “परमेश्वर की ओर से तुम पर दिखाई गई दया स्मरण दिलाकर मैं तुम से बिनती करता हूँ, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ!” क्या आप उसकी इस विनती का बल अनुभव नहीं करेंगे कि यह “आत्मिक सेवा” है? क्या मसीह का यह प्रेम आपको विवश नहीं कर देगा?

आप इसके विषय में क्या सोचते हैं? क्या वह सब के लिए इसलिए मरा कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएँ, परन्तु उसके लिये जिसने उनसे प्रेम किया और अपने आप को उनके लिये दे दिया? आप क्या कहते हैं? ठीक जब उठी हुई कुल्हाड़ी अन्यथा आपकी गर्दन पर गिरती, उसने वह वार अपनी गर्दन पर झेल लिया। यदि वह आपके जीवन को बचाने के लिए न मरता, तो आपको जीवन मिल ही नहीं सकता था; तो फिर आप क्या करेंगे?

क्या आप इस दी गई दया को ग्रहण करेंगे या उसे अस्वीकार करेंगे? जो जीवन उसने ऐसी दया से बचा रखा है, उसे क्या आप उसके आगे समर्पित करेंगे, या समर्पित करने से इन्कार करेंगे?

1. इस योजना के शासन-सम्बन्धी प्रभाव पूरी तरह स्पष्ट हैं। यह सारा कार्य परमेश्वर की व्यवस्था को बनाए रखने की ओर, और पापियों के प्रति उसके प्रेम और यहाँ तक कि उसकी दया को प्रगट करने की ओर प्रबल रूप से प्रवृत्त है।

यह दिखाता है कि वह व्यक्तिगत रूप से क्षमा करने को तैयार है, और उसे केवल इस बात की आवश्यकता है कि ऐसा प्रबन्ध किया जाए जिससे वह अपने शासन के विषय में सुरक्षित रूप से क्षमा कर सके। क्षमा करने की उसकी तत्परता को इससे अधिक प्रभावशाली रूप से और क्या दिखा सकता था? देखिए, वह क्षमा के दुरुपयोग से कितनी सावधानी से रक्षा करता है! सदा क्षमा करने को तैयार, फिर भी आज्ञापालन और आनन्द के महान हितों पर सदा चौकस, कहीं ऐसा न हो कि क्षमा के सेंत-मेंत और भरपूर होने से वे संकट में पड़ जाएँ!

2. यह क्यों कभी अविश्वसनीय समझा जाए कि परमेश्वर प्रायश्चित की ऐसी योजना बनाए? क्या इसमें कोई बात है जो परमेश्वर के स्वभाव के विपरीत हो या उसके प्रगट चरित्र से मेल न खाती हो? मुझे सन्देह है कि कोई नैतिक कर्ता इस व्यवस्था को समझकर भी इसे अविश्वसनीय समझ सकता है। जो लोग इसे अविश्वसनीय कहकर अस्वीकार करते हैं, वे अवश्य ही इसे समझने में असफल रहे होंगे।

3. यह प्रश्न पूछा जा सकता है—यदि हमारे लिए नहीं, तो मसीह मरा ही क्यों? उसने कभी पाप नहीं किया था; वह एक पापी के रूप में अपने कारण नहीं मरा; न ही वह वैसे मरा जैसे हमारी जाति के शिशु मरते हैं, जिनका नैतिक स्वभाव अभी विकसित नहीं हुआ, पर जो फिर भी एक पापी जाति के हैं। उसकी मृत्यु का एकमात्र कारण जो बताया जा सकता है वह यह है कि वह अपने लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए मरा।

यह भी पूछा जा सकता है—वह इस प्रकार क्यों मरा? उसे दो चोरों के बीच प्राण त्यागते हुए, और दुःख के पहाड़ जैसे बोझ के नीचे कुचले हुए देखिए। ऐसा क्यों था? अन्य शहीद जयजयकार करते हुए मरे हैं; वह पीड़ा और शोक में मरा, अपने पिता के मुख के छिप जाने के कारण गिरा हुआ और व्याकुल।

सारी प्रकृति उसके दुःखों में सहानुभूति प्रगट करती-सी जान पड़ी। ध्यान दीजिए—सूर्य अन्धकार से ढक गया है; चट्टानें तड़क गई हैं; पृथ्वी आपके पाँवों तले काँप रही है; सारी प्रकृति उथल-पुथल में है। यहाँ तक कि एक अन्यजाति दार्शनिक चिल्ला उठा—निश्चय ही विश्व का अन्त आ रहा है, या विश्व का रचयिता मर रहा है! सुनिए, वह भेदनेवाली पुकार, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?”

यदि यह माना जाए कि वह पापियों के लिए उद्धारकर्ता के रूप में मरा, तो सब कुछ स्पष्ट है। वह परमेश्वर के शासन के लिए मरता है, और पाप के प्रति परमेश्वर की घृणा की उचित अभिव्यक्ति करने के लिए उसे ये बातें सहनी ही पड़ती हैं। जब वह दोषी पापियों के स्थान पर खड़ा है, तब परमेश्वर को उस पर क्रोध की दृष्टि करनी और अपना मुख छिपाना ही होगा। यह परमेश्वर के शासन की आत्मा और उसकी अपनी असीम बुद्धि, दोनों को प्रगट करता है।

4. कुछ लोगों ने प्रायश्चित पर यह दोष लगाया है कि यह पाप को प्रोत्साहन दे सकता है। परन्तु ऐसे लोग किसी वस्तु के उचित उपयोग और उसके दुरुपयोग के बीच के बहुत महत्त्वपूर्ण भेद की उपेक्षा करते हैं। निस्सन्देह विश्व की सबसे उत्तम वस्तुओं का दुरुपयोग किया जा सकता है, और दुरुपयोग के द्वारा उन्हें बुराई के लिए विकृत किया जा सकता है, और वे अपने उचित उपयोग में जितनी उत्तम हैं, उतना ही अधिक।

प्रायश्चित की भलाई की ओर स्वाभाविक प्रवृत्ति के विषय में, ऐसा प्रतीत होता है कि कोई भी मनुष्य तर्कसंगत रूप से सन्देह नहीं कर सकता। हमारे लिए ऐसे प्रेम, नम्रता और आत्म-बलिदान के प्रगट किए जाने की प्रवृत्ति यह है कि पापी भरोसा और प्रेम करे, और टूटे और पिसे हुए मन के साथ क्रूस के सामने झुक जाए। परन्तु बहुत से लोग इसका दुरुपयोग करते हैं; और सबसे उत्तम वस्तुएँ, दुरुपयोग किए जाने पर, सबसे बुरी बन जाती हैं।

प्रायश्चित का दुरुपयोग ही वह वास्तविक कारण है जिसके लिए परमेश्वर पापियों को नरक में भेजता है। वह कहता है, “जब कि मूसा की व्यवस्था का न माननेवाला दो या तीन जनों की गवाही पर, बिना दया के मार डाला जाता है। तो सोच लो कि वह कितने और भी भारी दण्ड के योग्य ठहरेगा, जिस ने परमेश्वर के पुत्र को पाँवों से रौंदा, और वाचा के लोहू को अपवित्र जाना है, और अनुग्रह की आत्मा का अपमान किया?”

इसलिए, यदि कोई पापी प्रायश्चित करनेवाले लहू का दुरुपयोग करेगा, और पवित्र व्यवस्था को, और पश्चाताप और प्रेम में परमेश्वर की ओर लौटने के विचार तक को, रौंद डालेगा, तो परमेश्वर उसके विषय में कहेगा, “वह कितने और भी भारी दण्ड के योग्य ठहरेगा” उस व्यक्ति से, जिसने मूसा की व्यवस्था को तुच्छ जाना और उसके प्रतिशोध के नीचे गिर पड़ा?

5. यह एक तथ्य है कि मसीह में परमेश्वर का यह प्रकाशन पापियों के हृदय को सचमुच तोड़ देता है। इसने बहुत से हृदयों को वश में किया है, और हजारों और हृदयों को करेगा। यदि वे इस पर विश्वास करें और इसे एक वास्तविकता के रूप में थामे रहें, तो क्या यह उनके हृदय को प्रेम और शोक के वश में न कर देगा? क्या आप ऐसा नहीं सोचते? निश्चय ही, यदि आप इसे वैसा ही देखते जैसा यह है, और अपने हृदय में इसका बल अनुभव करते, तो आप अपने आसन पर ही सिसक उठते, टूट जाते और पुकार उठते—क्या यीशु ने मुझसे ऐसा प्रेम किया? और क्या मैं अब भी पाप से प्रेम करूँ? आह, आपका हृदय पिघल जाता, जैसे हर युग में हजारों लोगों के हृदय टूटे और पिघले हैं, जब उन्होंने क्रूस पर प्रगट हुए यीशु के प्रेम को देखा है। वह सुन्दर भजन इस बात को सच्चाई से प्रस्तुत करता है— “मैंने एक को वृक्ष पर लटकते देखा, पीड़ा और लहू में; जिसने अपनी शिथिल आँखें मुझ पर टिकाईं, जब मैं क्रूस के निकट खड़ा था।”

परन्तु पहली दृष्टि ने ही उसका हृदय पूरी तरह नहीं तोड़ा। केवल तब, जब— “उसने दूसरी दृष्टि डाली, जिसने कहा, मैं सब कुछ सेंत-मेंत क्षमा करता हूँ; यह लहू तेरी छुड़ौती के लिए चुकाया गया, मैं मरता हूँ कि तू जीवित रहे,” तब उसका सारा हृदय टूट गया, आँसू वर्षा के समान गिरने लगे, और उसने इस उद्धारकर्ता के प्रति अपने प्राण के पूर्ण समर्पण में अपने अस्तित्व की कोई भी शक्ति नहीं रोकी।

यह पापी के सुसमाचार को समझने का, और खोए हुओं के लिए मरने में यीशु मसीह की करुणा पर भरोसा करने का वास्तविक परिणाम है। इस प्रकार विश्वास पत्थर जैसे हृदय को तोड़ देता है।

यदि मसीह में परमेश्वर के प्रेम का यह प्रदर्शन आपका हृदय नहीं तोड़ता, तो और कुछ नहीं तोड़ेगा।

यदि मसीह की यह मृत्यु और यह प्रेम आपको विवश नहीं करते, तो और कुछ नहीं कर सकता।

परन्तु यदि आप इस पर दृष्टि नहीं करेंगे, और इस पर अपना मन नहीं लगाएँगे, तो यह केवल आपका विनाश करेगा। इस सुसमाचार को केवल इतना जानना कि उसे अस्वीकार करें और उससे मुँह मोड़ें, इसके सिवा और किसी काम का नहीं कि आपका दोष और बड़ा हो जाए, और आपका दण्ड और भी भयानक।

6. यीशु हमारे लिए पापबलि बनाया गया। मूसा की व्यवस्था की पद्धति में यह कितनी सुन्दर रीति से चित्रित किया गया था! बलिपशु को वध के लिए बाहर लाया जाता था; उसका लहू भीतर ले जाया जाता था और प्रायश्चित के ढकने पर छिड़का जाता था। यह प्रायश्चित का ढकना और कुछ नहीं, वरन सन्दूक का पवित्र ढकना या ढक्कन था

जिसमें व्यवस्था की पटियाएँ और परमेश्वर की प्राचीन दयाओं के अन्य पवित्र स्मृति-चिह्न रखे थे।

वे वहीं थे, उस गहरे भीतरी स्थान में—जिसमें महायाजक के सिवा कोई भी मृत्यु-दण्ड के भय से प्रवेश नहीं कर सकता था, और वह भी वर्ष में केवल एक बार, प्रायश्चित के महान दिन पर। इस महत्त्वपूर्ण दिन पवित्र विधियाँ अपनी सर्वोच्च गम्भीरता तक पहुँच जाती थीं। दो बकरे आगे लाए जाते थे, जिन पर महायाजक अपने हाथ रखता था और सार्वजनिक रूप से अपने पापों और सारी प्रजा के पापों का अंगीकार करता था। फिर एक को दूर जंगल में खदेड़ दिया जाता था, यह दर्शाने के लिए कि परमेश्वर हमारे पापों को इतनी दूर कर देता है जितनी दूर उदयाचल अस्ताचल से है; दूसरे को बलि किया जाता था, और उसका लहू महायाजक परमपवित्र स्थान में ले जाता था, और वहाँ करूबों के नीचे प्रायश्चित के ढकने पर छिड़कता था। इस बीच, विशाल मण्डली बाहर खड़ी होकर अपने पापों का अंगीकार करती थी, और केवल लहू बहाए जाने के द्वारा ही पापमोचन की आशा रखती थी। यह ऐसा था मानो सारा संसार कलवरी के तले चारों ओर खड़ा होकर अपने पापों का अंगीकार कर रहा हो, जबकि यीशु अपना क्रूस चोटी तक उठाए ले जा रहा था, कि उस पर लटके, और मनुष्यों के पापों के लिए अपना लहू बहाए और मरे। कितना उचित है कि जब मसीह मर रहा है, तब हम अपने पापों का अंगीकार कर रहे हों!

आप में से कुछ लोग सोच सकते हैं कि विदेशी मिशन पर जाना बड़ी बात है। परन्तु यीशु ने मार्ग दिखाया है। उसने विदेशी मिशन पर स्वर्ग को छोड़ा; इस अन्यजातियों से भी बढ़कर अन्धकारमय संसार में उतर आया, और किसी ने भी कभी ऐसे आत्म-त्याग का सामना नहीं किया। फिर भी वह बिना तनिक भी हिचकिचाहट के निडर होकर परिणामों का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। वह कभी अपमान, दीनता या यातना से पीछे नहीं हटा।

और क्या आप ऐसे अगुवे के पदचिह्नों पर चलने से पीछे हट सकते हैं? जब आप अपने उद्धार के ऐसे कर्ता के पीछे चल रहे हैं, तो क्या कोई भी दुःख आपके सहने के लिए बहुत अधिक है?

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