उपदेश 29 (31 में से)

22. विश्वास के द्वारा संसार पर विजय

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22. विश्वास के द्वारा संसार पर विजय “क्योंकि जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है हमारा विश्वास है।”—1 यूहन्ना 5:4।

इस पाठ पर विचार करने से हम स्वाभाविक रूप से चार प्रश्न पूछने की ओर अग्रसर होते हैं: I. संसार पर जय पाना क्या है?

II. वे कौन हैं जो जय पाते हैं?

III. वे संसार पर जय क्यों पाते हैं?

IV. वे यह कैसे करते हैं?

ये वे स्वाभाविक प्रश्न हैं जो कोई गंभीर मन इस पाठ को पढ़ने पर पूछेगा।

I. संसार पर जय पाना क्या है?

I. संसार पर जय पाना क्या है?

1. इसका अर्थ है लोभ की उस आत्मा से ऊपर उठ जाना जो संसार के लोगों पर अधिकार जमाए रहती है। संसार की आत्मा मुख्य रूप से लोभ की आत्मा है। यह संसार की वस्तुओं के पीछे लालसा है। कुछ सांसारिक लोग एक वस्तु का लालच करते हैं और कुछ दूसरी का; परन्तु सांसारिक लोगों के सब वर्ग किसी न किसी रूप में लोभ की आत्मा में जी रहे हैं। यह आत्मा उनके मनों पर सर्वोच्च अधिकार रखती है।

अब संसार पर जय पाने में पहली बात यह है कि सांसारिक वस्तुओं और विषयों के सम्बन्ध में लोभ की आत्मा पर जय पाई जाए। जो मनुष्य इस संसार के द्वारा प्रस्तुत की जानेवाली भलाई के पीछे दौड़-धूप और छीना-झपटी करने की इस आत्मा पर जय नहीं पाता, उसने किसी भी प्रकार संसार पर जय नहीं पाई है।

2. संसार पर जय पाने का अर्थ है उसकी तल्लीनताओं से ऊपर उठ जाना। जब किसी मनुष्य ने संसार पर जय पा ली है, तो उसके विचार फिर सांसारिक वस्तुओं में तल्लीन और डूबे हुए नहीं रहते। निश्चय ही कोई मनुष्य तब तक संसार पर जय नहीं पाता जब तक वह उसके कामों में तल्लीन और मग्न रहने से ऊपर नहीं उठ जाता।

अब हम सब जानते हैं कि सांसारिक लोग किसी न किसी प्रकार की सांसारिक भलाई में कितने अधिक तल्लीन रहते हैं। कोई अध्ययन में डूबा रहता है; कोई राजनीति में; तीसरा धन कमाने में; और चौथा शायद फ़ैशन और भोग-विलास में; परन्तु प्रत्येक अपने चुने हुए ढंग से पार्थिव भलाई को ही अपना सर्वग्रासी लक्ष्य बना लेता है।

जो मनुष्य संसार पर विजय प्राप्त करता है, उसे उसके कामों के केवल एक ही रूप पर नहीं, वरन् हर रूप पर जय पानी होगी—उसे स्वयं संसार पर और उन सब वस्तुओं पर जय पानी होगी जिन्हें वह मनुष्य के हृदय के सामने प्रलोभन के रूप में प्रस्तुत करता है।

3. संसार पर जय पाने का अर्थ है संसार के भय पर जय पाना।

यह एक दुःखद तथ्य है कि अधिकांश लोग, और वास्तव में सांसारिक स्वभाव के सब लोग, लोकमत का इतना अधिक ध्यान रखते हैं कि जब अपने विवेक के आदेशों के अनुसार चलने से लोगों की नाराज़गी मोल लेनी पड़े, तब वे उसके अनुसार चलने का साहस नहीं करते। किसी को यह डर है कि यदि उसका मार्ग लोकमत के विरुद्ध गया तो उसके व्यापार को हानि पहुँचेगी; दूसरा डरता है कि यदि वह सत्य के पक्ष में खड़ा हुआ तो उसकी प्रतिष्ठा को ठेस लगेगी, और वह विचित्र रूप से यह कल्पना करता है और यह विश्वास करने का प्रयत्न करता है कि किसी अलोकप्रिय सत्य का समर्थन करने से उसका अच्छा प्रभाव घट जाएगा और शायद नष्ट हो जाएगा—मानो कोई मनुष्य सत्य को थामे रहने के अतिरिक्त किसी और सम्भव रीति से अच्छा प्रभाव डाल सकता हो।

यह मानना पड़ेगा कि बहुत बड़ी भीड़ संसार से डरने के इस प्रभाव के अधीन है; फिर भी उनमें से कुछ, शायद बहुत से, इस बात से अनजान हैं। यदि आप, या वे स्वयं, कर्तव्य में उनके पीछे रहने के कारणों की पूरी थाह ले सकें, तो संसार का भय उन कारणों में प्रमुख पाया जाएगा। संसार की अप्रसन्नता का उनका भय परमेश्वर की अप्रसन्नता के उनके भय से इतना अधिक प्रबल है कि वे पूरी तरह उसके दास बन गए हैं। कौन नहीं जानता कि कुछ पादरी वह प्रचार करने का साहस नहीं करते जिसे वे सत्य जानते हैं, और यहाँ तक कि जिसे वे महत्वपूर्ण सत्य जानते हैं, इस डर से कि कहीं वे उन लोगों को नाराज़ न कर दें जिनकी अच्छी राय वे बनाए रखना चाहते हैं? शायद मण्डली कमज़ोर है, और उसमें किसी धनी व्यक्ति की कृपा उसके अस्तित्व के लिए ही अनिवार्य जान पड़ती है। इसलिए

जब वे उपदेश लिखते हैं, या प्रचार करते हैं, या किसी ऐसे सत्य या उद्देश्य के पक्ष में खड़े होने के लिए बुलाए जाते हैं जो भक्ति या विवेक से अधिक धन रखनेवाले लोगों को अप्रिय हो, तब इन धनी लोगों का आतंक निरन्तर उनकी आँखों के सामने रहता है। हाय! मनुष्य की यह दासता! बहुत से

सुसमाचार के सेवक इससे इतने ग्रस्त हैं कि उनकी अवसरवादी नीति वास्तव में मसीह का इन्कार करना और संसार की सेवा करना है।

संसार पर जय पाना मनुष्यों के प्रति इस दासवृत्ति को पूरी तरह वश में कर लेना है।

4. संसार पर जय पाने का अर्थ है सांसारिक चिन्ता की दशा पर जय पाना। आप जानते हैं कि बड़ी व्याकुलता और चिन्ता की एक दशा होती है जो सांसारिक लोगों में आम और लगभग सर्वव्यापी है। यह बिलकुल स्वाभाविक है, यदि हृदय सांसारिक भलाई प्राप्त करने पर लगा हो और उसने सारी भलाई एक महान पिता के हाथ से ग्रहण करना और उस पर भरोसा रखना नहीं सीखा हो कि वह अपनी अचूक बुद्धि से दे या रोक रखे। परन्तु जो संसार से प्रेम रखता है वह परमेश्वर का शत्रु है, और इसलिए उसमें एक पिता-समान उपकारी के प्रति यह सन्तान-सुलभ भरोसा कभी नहीं हो सकता, और न वह प्राण की वह शान्ति पा सकता है जो यह भरोसा प्रदान करता है। इसलिए सांसारिक लोग लगभग लगातार चिन्ता के ज्वर में रहते हैं कि कहीं उनकी सांसारिक योजनाएँ विफल न हो जाएँ। जब सब कुछ ठीक चलता दिखाई देता है तब उन्हें कभी-कभी क्षण भर की राहत मिल जाती है; परन्तु शीघ्र ही किसी न किसी बात में कोई न कोई विपत्ति उन पर अवश्य आ पड़ती है, यहाँ तक कि शायद ही कोई दिन बीतता हो जो अपने साथ कोई खा जानेवाली चिन्ता न लाता हो। उनके हृदय उस लहराते हुए समुद्र के समान हैं जो स्थिर नहीं रह सकता, और जिसका जल मैल और कीच उछालता है।

परन्तु जो मनुष्य संसार से ऊपर उठ जाता है, वह इस निरन्तर और खा जानेवाली चिन्ता की दशा से भी ऊपर उठ जाता है।

5. जिस विजय पर हम विचार कर रहे हैं उसका अर्थ है कि हम किसी भी रूप में संसार के दास और उसके बन्धन में रहना छोड़ दें।

एक सांसारिक आत्मा होती है और एक स्वर्गीय आत्मा भी होती है; और इन दोनों में से एक या दूसरी हर मनुष्य के हृदय में रहती है और उसके सम्पूर्ण अस्तित्व को नियंत्रित करती है। जो लोग संसार के नियंत्रण में हैं, उन्होंने निश्चय ही संसार पर जय नहीं पाई है। कोई मनुष्य तब तक संसार पर जय नहीं पाता जब तक उसका हृदय स्वर्ग की आत्मा से भर नहीं जाता।

संसार की आत्मा जो रूप धारण करती है उनमें से एक है उस समय के रीति-रिवाजों और फ़ैशनों का दास बन जाना।

यह देखकर आश्चर्य होता है कि फ़ैशन कैसी देवी बन जाता है। किसी भी अन्यजाति देवी की आराधना कभी इससे अधिक महँगे चढ़ावों से, या इससे अधिक श्रद्धापूर्ण भक्ति से, या इससे अधिक अंधी अधीनता से नहीं की गई।

और निश्चय ही जगत के आरम्भ से किसी भी अन्यजाति देवता को इससे अधिक व्यापक संरक्षण कभी नहीं मिला।

आप ऐसा सांसारिक पुरुष या सांसारिक स्त्री कहाँ ढूँढ़ने जाएँगे जो उसकी वेदी पर आराधना करने के लिए उतावली न करता हो?

परन्तु संसार पर जय पाने का अर्थ है कि इस देवी का जादू टूट गया है।

जिन्होंने संसार पर जय पाई है वे संसार की राय से ऊपर उठ चुके हैं; संसार की भली या बुरी राय उनके लिए एक छोटी सी बात है। पौलुस ने कहा, “मेरी दृष्टि में यह बहुत छोटी बात है कि मनुष्यों का कोई न्यायी मुझे परखे।” यही बात हर सच्चे मसीही के विषय में है; उसकी चिन्ता परमेश्वर की स्वीकृति पाने की होती है; उसकी मुख्य चिन्ता यही है कि वह अपने आप को परमेश्वर के सामने और अपने विवेक के सामने योग्य ठहराए। कोई मनुष्य तब तक संसार पर जय नहीं पाता जब तक वह मन की इस दशा को प्राप्त न कर ले।

I. संसार पर जय पाना क्या है?

मसीही चरित्र का शायद ही कोई लक्षण इससे अधिक प्रभावशाली या इससे अधिक निर्णायक हो—अर्थात् संसार की रायों के प्रति उदासीनता।

जब से मैं सेवकाई में आया हूँ, मुझे कुछ ऐसे लोगों से परिचय की आशीष मिली है जो चरित्र के इस गुण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। आप में से कुछ ने शायद फ़िलाडेल्फ़िया के स्वर्गीय रेवरेंड जेम्स पैटरसन को जाना होगा। यदि ऐसा है, तो आप जानते हैं कि वे इस विषय में अत्यन्त विशिष्ट थे। उनमें मनुष्यों की प्रशंसा पाने या उनकी निन्दा से बचने की प्रवृत्ति कम से कम जान पड़ती थी। अपने आप को मनुष्यों की दृष्टि में योग्य ठहराना उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता था। उनके लिए इतना ही पर्याप्त था कि वे परमेश्वर को प्रसन्न कर सकें।

इसलिए आप उन्हें पाप के विरुद्ध—सब पापों के विरुद्ध—निरन्तर युद्ध में लगा हुआ अवश्य पाते, चाहे वह पाप कितना ही लोकप्रिय क्यों न हो, रीति-रिवाज ने उसे कितनी ही दृढ़ता से जमा क्यों न रखा हो, या धन या लोकमत उसे कितना ही सहारा क्यों न देते हों। फिर भी वे सदा अत्यन्त उल्लेखनीय आत्मा के साथ पाप का विरोध करते थे—ऐसी आत्मा जिसमें अटल दृढ़ता थी और फिर भी बड़ी कोमलता और करुणा थी। जब वे अत्यन्त दृढ़ भाषा में अत्यन्त कठोर बातें कह रहे होते थे, तब आप उनके गालों पर बड़े-बड़े आँसू ढलकते हुए देख सकते थे।

यह आश्चर्य की बात है कि अधिकांश लोगों ने कभी यह शिकायत नहीं की कि उनकी आत्मा बुरी है। यद्यपि वे उनकी डाँट से बहुत डरते थे और दुष्टता के उनके प्रबल और साहसी पर्दाफ़ाश के नीचे तिलमिलाते थे, तौभी वे कभी यह नहीं कह सके कि फ़ादर पैटरसन में अच्छी आत्मा के अतिरिक्त कोई और आत्मा थी। संसार पर जय पाने का यह एक अत्यन्त सुन्दर और प्रभावशाली उदाहरण था।

जो लोग इस प्रकार संसार के लिए मरे हुए नहीं हैं, वे उसके बन्धन से नहीं छूटे हैं। विजयी मसीही ऐसी दशा में होता है जिसमें वह फिर मनुष्य के बन्धन में नहीं रहता। वह केवल परमेश्वर की सेवा करने के लिए बँधा हुआ है।

II. वे कौन हैं जो संसार पर जय पाते हैं?

II. वे कौन हैं जो संसार पर जय पाते हैं?

हमारा पाठ तुरन्त इसका उत्तर देता है: “जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है।”

आप यह देखे बिना नहीं रह सकते कि यह एक सार्वभौमिक कथन है—जितने परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं वे सब संसार पर जय पाते हैं—ये सब, और स्पष्ट रूप से इसमें यह निहित है कि और कोई नहीं। आप इस लक्षण से जान सकते हैं कि कौन परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं—वे संसार पर जय पाते हैं। इस प्रकार दूसरे प्रश्न का उत्तर मिल जाता है।

III. विश्वासी संसार पर जय क्यों पाते हैं? यह परिणाम किस सिद्धान्त पर उत्पन्न होता है?

मेरा उत्तर यह है कि संसार पर यह विजय आत्मिक या स्वर्गीय जन्म से उतनी ही स्वाभाविक रीति से उत्पन्न होती है, जितनी स्वाभाविक रीति से संसार के बन्धन में आ जाना शारीरिक जन्म से उत्पन्न होता है।

अच्छा होगा कि हम क्षण भर के लिए उस दूसरी बात में सम्बन्ध के नियम पर लौटें, अर्थात् शारीरिक जन्म के द्वारा संसार में आने और संसार के बन्धन के बीच के सम्बन्ध पर। इस नियम की स्पष्टतः एक दार्शनिक व्याख्या हो सकती है, जो एक ही साथ सरल भी है और हर किसी के अवलोकन के लिए प्रत्यक्ष भी।

शारीरिक जन्म मन के सामने इन्द्रियों के विषयों को, और केवल उन्हीं को, प्रगट करता है। वह मन को सांसारिक वस्तुओं के सम्पर्क में लाता है। निश्चय ही यह स्वाभाविक है कि मन इन विषयों में, जो इस प्रकार उसकी बाहरी इन्द्रियों के द्वारा उसके सामने प्रस्तुत किए जाते हैं, गहरी रुचि लेने लगे, विशेषकर इसलिए कि उनमें से अधिकांश का हमारे संवेदनशील स्वभाव से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है और वे हमारे सुख के पहले और मुख्य स्रोत बन जाते हैं।

इसलिए हमारे स्नेह धीरे-धीरे इन विषयों के चारों ओर लिपट जाते हैं, और इससे पहले कि हमारी आँखों को इस संसार पर खुले कई महीने बीतें, हम पूरी तरह इस संसार के प्रेमी बन जाते हैं।

अब इस सार्वभौमिक तथ्य के साथ-साथ एक और तथ्य को रखिए जो उतना ही महत्वपूर्ण है और उससे कम सार्वभौमिक नहीं, अर्थात् यह कि मन की वे अन्तर्बोधी शक्तियाँ, जो हमारे नैतिक सम्बन्धों को पहचानने के लिए, और इसलिए सांसारिक विषयों के अत्यधिक प्रभाव का प्रतिकार करने के लिए रची गई थीं, बहुत धीरे-धीरे क्रियाशील होती हैं, और वे इतनी विकसित नहीं होतीं कि प्रबलता से काम कर सकें जब तक कि उतने वर्ष न बीत जाएँ जितने महीने इन्द्रियों के बाहरी अंगों के विषय में गिने जाते हैं। इन्द्रियों का यह बहुत आरम्भिक और प्रबल विकास प्राण को सांसारिक विषयों के नियंत्रण में इतना पूरी तरह ले आता है कि जब बुद्धि और विवेक बोलने लगते हैं, तब उनकी आवाज़ पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। वास्तव में हम इसे सार्वभौमिक रूप से सत्य पाते हैं कि जब तक ईश्वरीय सामर्थ बीच में न पड़े, इस प्रकार प्राण पर लाया गया संसार का बन्धन कभी नहीं टूटता।

परन्तु जिस बात को मैं विशेष रूप से स्पष्ट करना चाहता था वह केवल यह थी कि शारीरिक जन्म, अपने साथ जुड़े शारीरिक और मानसिक विकास के नियमों सहित, इस संसार के बन्धन का कारण बन जाता है।

ठीक इसके विपरीत आत्मा के द्वारा परमेश्वर के राज्य में जन्म है। इसके द्वारा प्राण नए सम्बन्धों में लाया जाता है—बल्कि हम कह सकते हैं, आत्मिक वस्तुओं के घनिष्ठ सम्पर्क में लाया जाता है। परमेश्वर का आत्मा प्राण को आत्मिक जगत में ऐसी रीति से प्रवेश कराता जान पड़ता है जो हमारे भौतिक अस्तित्व पर शारीरिक जन्म के परिणाम के ठीक समान है। परमेश्वर के आत्मा के प्रकाश के द्वारा आत्मिक जगत के महान सत्य हमारी दृष्टि के सामने खोल दिए जाते हैं; हम मानो नई आँखों से देखते हैं, और हमारे चारों ओर आत्मिक विषयों का एक नया जगत होता है।

जैसे प्राकृतिक विषयों के सम्बन्ध में मनुष्य केवल उनके विषय में अनुमान ही नहीं लगाते, वरन् उन्हें वास्तविक रूप में अनुभव करते हैं; वैसे ही आत्मिक सन्तानों के लिए आत्मिक बातें केवल अनुमान के विषय नहीं, वरन् पूर्ण और व्यावहारिक अनुभूति के विषय भी बन जाती हैं। जब परमेश्वर मन पर अपने आप को प्रगट करता है, तब आत्मिक बातें अपने वास्तविक प्रकाश में दिखाई देती हैं, और वास्तविकताओं की छाप छोड़ती हैं।

परिणामस्वरूप, जब आत्मिक विषय इस प्रकार मन पर प्रगट किए जाते हैं, और इस प्रकार समझे जाते हैं, तो वे उस मन को सर्वोच्च रूप से अपनी ओर आकर्षित करेंगे। हमारी मानसिक रचना ऐसी है कि परमेश्वर का सत्य, जब पूरी तरह समझ लिया जाता है, तो हमें आकर्षित किए बिना नहीं रह सकता। यदि ये सत्य पृथ्वी के सबसे दुष्ट मनुष्य पर इतनी स्पष्टता से प्रगट किए जाएँ कि वह उन्हें वास्तविकताओं के रूप में समझ ले, तो वे उसके प्राण को अत्यन्त तीव्र क्रिया के लिए जगाए बिना नहीं रह सकते। हो सकता है कि वह ज्योति से बैर रखे, और अपने हृदय पर परमेश्वर के दावों का हठपूर्वक विरोध करे, परन्तु वह उन सत्यों में रोमांचित कर देनेवाली रुचि का अनुभव किए बिना नहीं रह सकता जो मनुष्य के कल्याण की महान और अत्यावश्यक बातों को इस प्रकार पकड़ लेते हैं।

मैं पूछता हूँ, क्या इस भवन में कोई पापी है, या क्या इस विशाल पृथ्वी पर कोई ऐसा पापी हो सकता है, जो यह न देखता हो कि यदि परमेश्वर की उपस्थिति उसके मन पर उतनी ही प्रगट और वास्तविक कर दी जाए जितनी उसके संगी मनुष्यों की उपस्थिति है, तो वह उसके प्राण को सर्वोच्च रूप से तल्लीन कर लेगी, चाहे वह उसके हृदय को वश में न भी करे।

परमेश्वर की उपस्थिति और चरित्र का यह प्रकाशन शायद उसका मन-परिवर्तन न करे, परन्तु कम से कम उस समय के लिए वह संसार की ओर से उसके ध्यान को मार डालेगा।

आप इसे प्रायः उन लोगों के विषय में देखते हैं जिन्हें गहरा पाप का बोध हुआ हो। आपने निस्सन्देह ऐसे लोगों को देखा है जिन्हें पाप का इतना भयानक बोध हुआ कि उन्होंने अपने भोजन या अपने वस्त्रों की तनिक भी चिन्ता नहीं की। वे अपने प्राणों की वेदना में चिल्ला उठे, हाय, इन सब बातों से हमें क्या लाभ, चाहे ये सब हमें मिल भी जाएँ, और फिर हमें नरक में पड़ना पड़े!

परन्तु पाप के ये रोमांचित कर देनेवाले और सर्वग्रासी बोध अनिवार्य रूप से प्राण का मन-परिवर्तन नहीं करते, और मैंने यहाँ उनका उल्लेख केवल यह दिखाने के लिए किया है कि ईश्वरीय सत्य के वास्तविक अनुभव करानेवाले दर्शन में कितनी नियंत्रक सामर्थ होती है।

जब वास्तविक मन-परिवर्तन हो गया हो, और प्राण परमेश्वर से उत्पन्न हो गया हो, तब सत्य के वास्तविक अनुभव करानेवाले दर्शन केवल रुचि ही नहीं जगाते, जैसा कि वे बिना नया हुए मन में भी जगा सकते हैं, वरन् वे इन सत्यों के प्रति गहरा और उत्कट प्रेम भी उत्पन्न करते हैं। वे हृदय को अपनी ओर खींच लेते हैं। अब आत्मिक सत्य उसके मन पर अधिकार कर लेता है, और उसे अपने उष्ण और जीवनदायी आलिंगन में खींच लेता है।

पहले भ्रम, झूठ और मृत्यु ने उसे अपनी शक्ति के अधीन खींच रखा था; अब परमेश्वर का आत्मा उसे स्वयं परमेश्वर के आलिंगन में खींच लेता है। अब वह परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, और उसमें पुत्रत्व की आत्मा की साँस चलती है। अब, बाइबल के अनुसार, “परमेश्वर का बीज उसमें बना रहता है,” वही सत्य, और आत्मा की वे प्रेरणाएँ जिन्होंने उसे परमेश्वर के राज्य में जन्म दिया, उसके मन पर अब भी सामर्थ के साथ बनी रहती हैं, और इसलिए वह मसीही बना रहता है, और जैसा बाइबल कहती है, “वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि परमेश्वर से जन्मा है।” परमेश्वर का बीज उसमें है, और उसका फल उसके प्राण को स्वर्ग में रहनेवाले उसके अपने पिता के साथ गहरी सहानुभूति में ले आता है।

फिर, पहला जन्म हमें पार्थिव वस्तुओं से परिचित कराता है, दूसरा परमेश्वर से; पहला सीमित से, दूसरा असीम से; पहला उन वस्तुओं से जो हमारे पशु-स्वभाव से सम्बन्ध रखती हैं, दूसरा उन महान वस्तुओं से जो हमारे आत्मिक स्वभाव से जुड़ी हैं, ऐसी वस्तुएँ जो इतनी मनोहर और इतनी महिमामय हैं कि संसार के सब फन्दों पर जय पा लेती हैं।

फिर, पहला एक सांसारिक स्वभाव उत्पन्न करता है, और दूसरा एक स्वर्गीय स्वभाव। पहले के अधीन मन फन्दे में फँसा दिया जाता है, दूसरे के अधीन वह उस फन्दे से छुड़ाया जाता है। पहले के अधीन चाल-चलन पार्थिव होता है; दूसरे के अधीन, “हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है।”

परन्तु अब हमें आगे बढ़कर यह पूछना चाहिए कि, IV. संसार पर यह विजय कैसे प्राप्त की जाती है।

IV. संसार पर यह विजय कैसे प्राप्त की जाती है।

इसका महान कर्ता पवित्र आत्मा है। उसके बिना मसीही के हृदय या जीवन में कभी कोई अच्छा परिणाम प्राप्त नहीं होता। आप देखते हैं कि पाठ कहता है, “वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है हमारा विश्वास है।” परन्तु यहाँ यह प्रश्न उठाया जा सकता है: क्या इसका अर्थ यह है कि विश्वास अपने आप में संसार पर जय पाता है, या इसका अर्थ यह है कि हम अपने विश्वास के द्वारा या उसके माध्यम से जय पाते हैं? निस्सन्देह ठीक-ठीक अर्थ दूसरा ही है। परमेश्वर पर विश्वास करते हुए, और उस पवित्र आत्मा के द्वारा जो सच्चे विश्वास करनेवालों को दिया जाता है, अपने मन पर उसके सत्य और चरित्र की वास्तविक अनुभव करानेवाली छाप पाकर, हम संसार पर विजय प्राप्त करते हैं।

विश्वास में तीन बातें निहित हैं। 1. सत्य का बोध। 2. उसमें रुचि। 3. मन को सौंप देना या समर्पित कर देना कि वह विश्वास के इन विषयों के द्वारा आकर्षित और नियंत्रित हो।

क्रम में सत्य का बोध पहले आना ही चाहिए, क्योंकि अज्ञात और अनदेखे सत्य पर विश्वास नहीं हो सकता। इसके बाद सत्य में ऐसी रुचि होनी चाहिए जो मन को स्थिर और सक्रिय ध्यान के लिए जगा दे; और तीसरे, मन को स्वेच्छा से सत्य के नियंत्रण में सौंप देना चाहिए। मन को अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर के हाथ में सौंप देना चाहिए, कि वह पूर्ण रूप से उसकी इच्छा के द्वारा शासित हो, और उस पर, और केवल उसी पर, अपने वर्तमान और अनन्त भाग के रूप में भरोसा रखे।

फिर, विश्वास मसीह को ग्रहण करता है। मन पहले मसीह के चरित्र को और हमसे उसके सम्बन्धों को पहचानता है—देखता है कि वह हमारे लिए क्या करता है, और फिर ऐसे उद्धारकर्ता की, और ऐसे कार्य की जो केवल यीशु ही हम में और हमारे लिए कर सकता है, अपनी आवश्यकता को गहराई से अनुभव करके, वह आगे बढ़कर यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करता और गले लगाता है। मसीह को ग्रहण करने और गले लगाने में प्राण की यह क्रिया सुस्त नहीं होती—यह ऊँघती हुई निष्क्रियता की दशा नहीं है। नहीं; इसमें प्राण की सबसे कठोर सक्रियता सम्मिलित है। और प्राण का यह समर्पण एक महिमामय, जीवित, सामर्थ देनेवाला सिद्धान्त बन जाना चाहिए—मन न केवल पहचानता है, वरन् अत्यन्त उत्कट तीव्रता के साथ अपने आप को सौंप देता है कि वह मसीह का हो जाए और उसके उद्धार के सब लाभ हमारे अपने प्राणों में ग्रहण करे।

फिर, विश्वास मसीह को राजा के रूप में, उसके सब सम्बन्धों में, प्राण में ग्रहण करता है, कि वह सम्पूर्ण अस्तित्व पर राज्य करे—कि हमारे हृदय का सर्वोच्च भरोसा और स्नेह उसी का हो—कि वह हमारी आज्ञाकारिता और आराधना की सम्पूर्ण श्रद्धा प्राप्त करे; संक्षेप में, कि वह हम पर राज्य करे, और हमारे सम्पूर्ण नैतिक अस्तित्व पर सर्वोच्च राजा के सब कार्य पूरे करे। हम अपने प्राणों के भीतर ही मसीह को ग्रहण करते हैं कि वह वहाँ जीवित रहे और सामर्थ दे, और वहाँ अपने न्यायसंगत सिंहासन के समान सदा राज्य करे।

अब बहुत से लोग अपने सम्पूर्ण प्राण को मसीह के हाथ में इस प्रकार पूर्ण और सिद्ध रूप से सौंपने से पहले ही रुक जाते जान पड़ते हैं। शायद वे केवल सत्य को पहचानने पर ही रुक जाते हैं, इस बात से सन्तुष्ट और प्रसन्न होकर कि उन्होंने सुसमाचार का सिद्धान्त सीख लिया है। या शायद कुछ लोग एक कदम और आगे बढ़ते हैं, और रुचि लेने पर ही रुक जाते हैं—अर्थात् सुसमाचार की बातों से उनकी भावनाएँ उत्तेजित हो जाने पर, और इस प्रकार वे केवल दूसरी सीढ़ी तक ही जाते हैं; या शायद वे विश्वास को तो ग्रहण करते जान पड़ते हैं, परन्तु मसीह को नहीं; वे सोचते हैं कि वे विश्वास करते हैं, परन्तु आखिरकार वे हार्दिकता से और पूरे मन से स्वयं मसीह का अपने प्राण में स्वागत नहीं करते।

ये सब विभिन्न कदम वास्तव में मसीह को थाम लेने से पहले ही रुक जाते हैं। इनमें से कोई भी संसार पर विजय नहीं दिलाता।

IV. संसार पर यह विजय कैसे प्राप्त की जाती है।

विश्वास का सच्चा बाइबलीय सिद्धान्त मसीह को स्वयं प्राण के भीतर आते हुए दिखाता है। “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ।” इस सिद्धान्त को इससे अधिक प्रबलता और सुन्दरता से और कौन सी बात सिखा सकती है कि विश्वास के द्वारा मसीह विश्वासी के प्राण में ही लाया जाता है, कि वह अपनी अनुग्रहपूर्ण उपस्थिति के द्वारा वहाँ वास करे?

जब से मेरा मन इस विषय की ओर खिंचा है, मैं यह देखकर चकित हुआ हूँ कि विश्वास के इस विशेष पहलू के सम्बन्ध में मैं कितने समय तक अधदेखी दशा में रहा हूँ। बहुत समय तक मैंने इसे मुश्किल से देखा था; अब मैं इसे लगभग हर पृष्ठ पर महिमा की रेखाओं में चमकते हुए देखता हूँ। बाइबल इस महिमामय सत्य से जगमगाती हुई जान पड़ती है—प्राण में मसीह, महिमा की आशा;

परमेश्वर, मसीह, हमारी देह में जैसे एक मन्दिर में वास करता है। मैं चकित हूँ कि इतना समृद्ध और इतना आशीषित सत्य इतनी धुँधली रीति से देखा गया, जबकि बाइबल उसे इतनी स्पष्टता से प्रगट करती है। विश्वास के द्वारा मसीह स्वयं प्राण में ग्रहण किया जाता है, और इस प्रकार हमारे हृदय और जीवन के साथ निकट से निकट सम्बन्ध में लाया जाता है; स्वयं मसीह हमारे भीतर सब कुछ सँभालनेवाली सामर्थ बन जाता है, और इस प्रकार संसार पर विजय सुनिश्चित करता है; मसीह हमारे हृदयों में जीवित रहता और सामर्थ देता है—यही पवित्रीकरण की योजना का महान केन्द्रीय सत्य है, और किसी भी मसीही को इसे समझने से नहीं चूकना चाहिए, यदि वह संसार पर विजय को और अपने सृजनहार के साथ प्राण की जीवित संगति को मूल्यवान समझता है।

टिप्पणियाँ 1. यह बात विषय के स्वभाव में ही असम्भव है कि यदि विश्वास मसीह को प्राण में ग्रहण करे, तो वह संसार पर जय न पाए। यदि नया जन्म वास्तव में मन को इस नई दशा में ले आता है, और मसीह को प्राण में ले आता है, तो निश्चय ही मसीह उस प्राण में राज्य करेगा; सर्वोच्च स्नेह अत्यन्त आनन्द के साथ उसी को सौंप दिए जाएँगे, और उस मन पर संसार की शक्ति टूट जाएगी। मसीह किसी भी प्राण में उस प्राण की सर्वोच्च रुचि को अपने में समेटे बिना वास नहीं कर सकता। और यह, निश्चय ही, संसार पर विजय देने के बराबर है।

2. जो व्यक्ति आदतन संसार पर जय नहीं पाता, वह परमेश्वर से उत्पन्न नहीं हुआ है। यह कहने में मेरा अभिप्राय यह दावा करना नहीं है कि सच्चा मसीही कभी-कभी पाप से पराजित नहीं हो सकता; परन्तु मैं यह दावा अवश्य करता हूँ कि संसार पर जय पाना सामान्य नियम है, और पाप में गिरना केवल अपवाद है। हमारे पाठ की भाषा से और बाइबल में बार-बार आनेवाले ऐसे ही कथनों से कम से कम इतना तो अभिप्रेत हो ही सकता है। ठीक जैसे इस वचन में, “जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता, और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि परमेश्वर से जन्मा है,” इससे कम कुछ अभिप्रेत नहीं हो सकता कि—वह निरन्तर पाप नहीं कर सकता; पाप करना अपना धन्धा नहीं बना सकता, और यदि पाप करे भी, तो केवल कभी-कभार और अपने जीवन की सामान्य धारा से हटकर ही कर सकता है। इसी रीति से हम ऐसे मनुष्य के विषय में, जो सामान्यतः सच बोलनेवाला है, कहेंगे कि वह झूठा नहीं है।

इन दोनों में से किसी भी वचन के विषय में मैं इससे अधिक के लिए आग्रह नहीं करूँगा; परन्तु इतने के लिए मुझे अवश्य आग्रह करना है कि जिन नए जन्मे प्राणों का यहाँ वर्णन है वे सामान्यतः संसार पर जय पाते हैं। उनके विषय में सामान्य तथ्य यह है कि वे पाप नहीं करते और शैतान के बन्धन में नहीं हैं। उनके विषय में पवित्रशास्त्र के कथनों में कम से कम उनका सामान्य चरित्र अवश्य सम्मिलित होना चाहिए।

3. ऐसा धर्म किस काम का है जो संसार पर जय नहीं पाता? ऐसे धर्म में जन्म लेने से क्या लाभ, यदि वह संसार को अब भी हमारे हृदयों पर अपना प्रभुत्व चलाने दे? ऐसे नए जन्म से क्या लाभ जो आखिरकार हमें परमेश्वर की समानता में, उसके परिवार और उसके राज्य की सहानुभूतियों में लाने में विफल रहता है; जो हमें अब भी संसार और शैतान के बन्धन में छोड़ देता है? ऐसे धर्म में नाम से अधिक और क्या हो सकता है? कोई मनुष्य किस आधार पर यह मान सकता है कि ऐसा धर्म उसके हृदय को स्वर्ग के योग्य बनाता है, जबकि वह उसे पार्थिव मन वाला, विषय-भोगी और स्वार्थी ही छोड़ देता है।

4. हम देखते हैं कि नास्तिकों ने मसीह के सुसमाचार को विफल क्यों घोषित किया है।

शायद आपको पता न हो कि हाल ही में नास्तिकों ने यह पक्ष लिया है कि मसीह का सुसमाचार विफल है। वे कहते हैं कि वह मनुष्यों को संसार से बाहर निकाल लाने का दावा करता है, परन्तु ऐसा करने में विफल रहता है; और इसलिए स्पष्ट रूप से विफल है। अब आपको ध्यान देना चाहिए कि बाइबल सचमुच यह दावा करती है, जैसा नास्तिक कहते हैं, कि जो सचमुच परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं वे संसार पर जय पाते हैं। इसका हम इन्कार नहीं कर सकते, और हमें इसका इन्कार करना चाहना भी नहीं चाहिए। अब, यदि नास्तिक यह दिखा सके कि नया जन्म यह परिणाम उत्पन्न करने में विफल रहता है, तो उसने अपनी बात सिद्ध कर दी, और हमें अपनी बात छोड़नी पड़ेगी। यह बिलकुल स्पष्ट है, और हमारे लिए बच निकलने का कोई मार्ग नहीं हो सकता।

परन्तु नास्तिक की आधार-बातों में दोष है। वह इस युग की प्रचलित मसीहियत को वास्तविक धर्म का नमूना मान लेता है, और अपना आकलन इसी पर खड़ा करता है। वह अपनी समझ में सिद्ध करता है, और शायद सचमुच सिद्ध करता है, कि प्रचलित मसीहियत संसार पर जय नहीं पाती।

हमें उसके इस प्रचलित मसीहियत को वास्तविक धर्म मान लेने पर आपत्ति करनी होगी। क्योंकि नाम मात्र के अंगीकार करनेवालों की भीड़ का यह धर्म परमेश्वर के वचन में दिए गए सच्ची भक्ति के वर्णनों से मेल नहीं खाता। और इसके अतिरिक्त, यदि धर्म का यह प्रचलित रूप ही वह सब कुछ होता जो सुसमाचार और ईश्वरीय आत्मा खोए हुए मनुष्य के लिए कर सकते हैं, तो हम नास्तिक के साथ विवाद के विषय को छोड़ ही दें तो अच्छा; क्योंकि ऐसा धर्म हमें परमेश्वर की ओर से आने का अधिक प्रमाण नहीं दे सकता, और मनुष्य के लिए बहुत कम मूल्य का होता; इतना कम कि उसके लिए संघर्ष करना भी शायद ही सार्थक हो। सचमुच, यदि हमें मसीही कहलानेवाले संसार को बाइबल के मसीही मानना पड़े, तो नास्तिक का सामना करने का प्रयत्न करते हुए कौन लज्जित और घबराया हुआ न होगा? हम भली-भाँति जानते हैं कि अंगीकार करनेवाले मसीहियों की बड़ी भीड़ संसार पर जय नहीं पाती, और यदि हम यह कहें कि वे जय पाते हैं, तो हम शीघ्र ही निरुत्तर हो जाएँगे। वे अंगीकार करनेवाले मसीही स्वयं जानते हैं कि वे संसार पर जय नहीं पाते। निश्चय ही वे अपने विषय में यह गवाही नहीं दे सकते कि उनके अपने जीवन में सुसमाचार की सामर्थ का उदाहरण दिखाई देता है।

ऐसे तथ्यों को देखते हुए, मैं प्रायः यह देखकर चकित हुआ हूँ कि पादरी अपने लोगों को यह विश्वास दिलाने में लगे रहते हैं कि उनका वास्तव में मन-परिवर्तन हो गया है, उनके भय को शान्त करने और उनकी डगमगाती आशाओं को सहारा देने का प्रयत्न करते हैं। व्यर्थ प्रयत्न! ऐसा जान पड़ता है कि वे ही पादरी अवश्य जानते होंगे कि वे स्वयं संसार पर जय नहीं पाते; और उतनी ही भली-भाँति उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उनके लोग भी जय नहीं पाते। तो फिर प्राण के लिए ऐसे प्रयत्न कितने घातक होंगे, जो “परमेश्वर के अंगीकार करनेवाले लोगों के घाव को ऊपर ही ऊपर चंगा करके कहते हैं, शान्ति है, शान्ति, परन्तु शान्ति कुछ भी नहीं!”

आइए हम इस विषय को तह तक छानें, और यह प्रश्न आगे बढ़ाएँ—क्या अंगीकार करनेवाले मसीहियों की बड़ी भीड़ सचमुच संसार पर जय पाती है? यह एक निर्विवाद तथ्य है कि उनके लिए इस संसार की बातें ही वास्तविकताएँ हैं, और परमेश्वर की बातें केवल सिद्धान्त हैं। कौन नहीं जानता कि नाम मात्र की कलीसिया में बहुत बड़ी भीड़ की वास्तविक दशा यही है?

यह खोजनेवाला प्रश्न इस मण्डली में हर एक के मन में उतर जाए—वे कौन सी बातें हैं जो आपके प्राण में आग लगा देती हैं—जो आपकी सबसे उष्ण भावनाओं को जगाती हैं और आपके स्नायु-तंत्र को गहराई से झकझोर देती हैं? क्या ये पृथ्वी की बातें हैं, या स्वर्ग की बातें? समय की बातें, या अनन्तकाल की बातें? स्वयं की बातें, या परमेश्वर की बातें?

जब आप अपनी कोठरी में जाते हैं, तब क्या होता है? क्या आप वहाँ परमेश्वर को खोजने और पाने के लिए जाते हैं? क्या आप वास्तव में वहाँ परमेश्वर को उपस्थित पाते हैं, और क्या आप वहाँ उसके साथ ऐसी संगति करते हैं जैसे मित्र मित्र से करता है?

अब आपको निश्चय ही जानना चाहिए कि यदि आपकी दशा ऐसी है कि आत्मिक बातें आपके लिए केवल सिद्धान्त और अनुमान हैं, तो आप पूरी तरह सांसारिक हैं और इससे अधिक कुछ नहीं। आपको आत्मिक मन वाला कहना घोर मूर्खता और असत्य होगा, और आपका स्वयं को आत्मिक समझना सबसे घातक और मूर्खतापूर्ण आत्म-छल होगा। आप परमेश्वर से उत्पन्न होने का कोई भी उचित प्रमाण नहीं देते। आपकी दशा उस व्यक्ति की सी नहीं है जो परमेश्वर से व्यक्तिगत रूप से परिचित है, और जो सर्वोच्च स्नेह के साथ उससे व्यक्तिगत रूप से प्रेम रखता है।

5. जब तक हम मनुष्यों के मन से यह आम भ्रम दूर न कर दें कि कलीसिया की प्रचलित मसीहियत ही सच्ची मसीहियत है, तब तक हम संसार का मन फिराने में बहुत कम प्रगति कर सकते हैं। क्योंकि पहली बात तो यह है कि हम स्वयं कलीसिया को भी न इस जीवन में संसार के बन्धन से बचा सकते हैं, और न अगले जीवन में कपटी के सबसे भयानक दण्ड से। हम कलीसिया को एक करके और हथियारबन्द करके शैतान के राज्य पर प्रबल आक्रमण के लिए तैयार नहीं कर सकते, जिससे संसार का मन परमेश्वर की ओर फिराया जा सके। हम संसार के बुद्धिमान लोगों को यह भी विश्वास नहीं दिला सकते कि हमारा धर्म परमेश्वर की ओर से है, और पतित मनुष्यों के लिए उनकी भ्रष्टता का उपचार लाता है। क्योंकि यदि इस युग की आम मसीहियत ही सबसे अच्छी सम्भव मसीहियत है, और यह मनुष्यों को संसार पर विजय नहीं देती, तो वह किस काम की है? और यदि वह वास्तव में बहुत कम मूल्य की है या बिलकुल मूल्यहीन है, तो हम सोचनेवाले लोगों से यह आशा कैसे कर सकते हैं कि वे उसे बहुमूल्य समझें?

6. ऐसे नास्तिक बहुत ही कम हैं जो इन बातों के विषय में उतने अंधकार में हों जितना वे होने का दावा करते हैं। उस वर्ग के ऐसे बहुत कम लोग हैं जो कुछ ऐसे दीन मसीहियों से परिचित न हों जिनके जीवन मसीहियत की सराहना कराते हैं और उनकी अपनी भक्तिहीनता को दोषी ठहराते हैं।

निश्चय ही वे सत्य जानते हैं, कि बाइबल के धर्म में वास्तविकता है, और जब वे यह विश्वास करने का प्रयत्न करते हैं कि बाइबल का धर्म विफल है, और इसलिए बाइबल मनगढ़न्त है, तब वे स्वार्थवश और अत्यन्त मूर्खता से अपनी ही आँखें अंधी करते हैं। उनके हृदय की गहराई में यह दृढ़ धारणा बैठी है कि यहाँ-वहाँ कुछ मनुष्य ऐसे हैं जो वास्तविक मसीही हैं, जो संसार पर जय पाते हैं और ऐसे विश्वास से जीते हैं जिससे वे स्वयं अनजान हैं। कितने ही मामलों में परमेश्वर उन दुष्ट, सन्देहवादी मनुष्यों के सामने मसीही जीवन के कुछ ज्वलन्त उदाहरण रख देता है, कि उन्हें उनके पाप और उनके सन्देहवाद के लिए डाँटे—शायद उनकी अपनी पत्नी या उनके बच्चे, उनके पड़ोसी या उनके नौकर। ऐसे साधनों से सत्य उनके मन में बैठा दिया जाता है, और उनके विवेक में परमेश्वर का अपना एक गवाह होता है।

मैंने शायद पहले भी एक घटना का उल्लेख किया है जो दक्षिण में घटी थी, और जिसे मुझे सुसमाचार के एक सेवक ने बताया था जो उस घटना की परिस्थितियों से परिचित था।

उस क्षेत्र में एक बहुत ही सांसारिक और अत्यन्त भक्तिहीन मनुष्य रहता था, जिसके पास बहुत से दास थे, और जो साथ ही घुड़दौड़ का भी बहुत शौकीन था। सारे धर्म से बेपरवाह और खुले तौर पर सन्देहवादी होकर, उसने अपनी हर बुरी प्रवृत्ति को खुली छूट दे रखी थी। परन्तु दुष्ट मनुष्यों को एक दिन संकट देखना ही पड़ता है; और यह मनुष्य बीमार पड़ गया और कब्र के द्वार तक पहुँच गया। उसकी रोती हुई पत्नी और मित्र उसके बिछौने के चारों ओर इकट्ठे होते हैं, और सोचने लगते हैं कि मरते हुए मनुष्य के प्राण के लिए प्रार्थना करने को किसी मसीही को बुलाया जाए। व्याकुल पत्नी ने कहा, हे मेरे पति, क्या मैं अपने पादरी को बुलवा भेजूँ कि आपके मरने से पहले वे आपके साथ प्रार्थना करें? उसने कहा, नहीं, मैं उसे पुराने समय से जानता हूँ; मुझे उस पर कोई भरोसा नहीं; मैंने उसे बहुत बार घुड़दौड़ में देखा है; वहाँ वह मेरा मित्र था और मैं उसका; परन्तु अब मैं उसे देखना नहीं चाहता।

पत्नी ने आगे पूछा, तो फिर हम किसे बुलाएँ? उसने उत्तर दिया, मेरे दास टॉम को बुलवाओ; वह मेरे घोड़ों की देखभाल करनेवाले साईसों में से एक है। मैंने बहुत बार उसे प्रार्थना करते हुए चुपके से सुना है और मैं जानता हूँ कि वह प्रार्थना कर सकता है; इसके अतिरिक्त,

मैंने उसके जीवन और उसके स्वभाव को ध्यान से देखा है, और मैंने उसमें कभी कोई ऐसी बात नहीं देखी जो मसीही चरित्र से मेल न खाती हो; उसे बुलाओ, मुझे उसकी प्रार्थना सुनकर प्रसन्नता होगी।

टॉम धीरे-धीरे और नम्रता से भीतर आता है, द्वार पर अपनी टोपी रख देता है, और अपने बीमार और मरते हुए मालिक को देखता है। मरते हुए सन्देहवादी ने कहा, टॉम, क्या तुम कभी प्रार्थना करते हो? क्या तुम प्रार्थना करना जानते हो? क्या तुम अपने मरते हुए मालिक के लिए प्रार्थना कर सकते हो और उसे क्षमा कर सकते हो? हाँ मालिक, पूरे मन से; और वह घुटनों के बल गिरकर उसके प्राण के लिए प्रार्थना उँडेल देता है।

अब इस कहानी की शिक्षा स्पष्ट है। सन्देहवादी को उसकी मृत्युशय्या पर लिटा दीजिए, उस गम्भीर घड़ी को आने दीजिए, और उसके हृदय की भीतरी धारणाओं को प्रगट होने दीजिए, तो वह कम से कम एक ऐसे मनुष्य को जानता है जो मसीही है। वह एक ऐसे मनुष्य को जानता है जिसकी प्रार्थनाओं को वह अपने सब पुराने साथियों की सारी मित्रता से अधिक मूल्यवान समझता है। अब वह जानता है कि मसीहियत नाम की कोई वास्तविक वस्तु है; और फिर भी आप यह नहीं मान सकते कि उसने यह पाठ इसी क्षण सीखा है जिसे वह पहले कभी नहीं जानता था।

नहीं, वह पहले भी इतना ही जानता था; एक ईमानदार घड़ी ने उसके प्राण की भीतरी धारणाओं को प्रकाश में ला दिया है। नास्तिक सामान्यतः जितना मानने की ईमानदारी रखते हैं, उससे अधिक जानते हैं।

7. उन लोगों की बड़ी भूल, जो धर्म का अंगीकार करते हैं परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न नहीं हुए, यह है: वे परमेश्वर से उत्पन्न हुए बिना मसीही बनने का प्रयत्न कर रहे हैं। उन्हें आवश्यकता है कि उनके साथ वह किया जाए जो आदम के विषय में कहा गया है, “परमेश्वर ने उसमें जीवन का श्वास फूँक दिया, और वह जीवता प्राणी बन गया।” उनके धर्म में परमेश्वर का श्वास कुछ भी नहीं है: वह एक ठंडा, निर्जीव सिद्धान्त है; उसमें परमेश्वर की जीवित प्राणशक्ति कुछ भी नहीं है। शायद वह एक हृदयहीन रूढ़िवादिता है, और हो सकता है कि वे अपने मन को यह झूठी तसल्ली दें कि उनका मत-वचन सही है; परन्तु क्या वे उस सत्य से प्रेम रखते हैं जिस पर विश्वास करने का वे दावा करते हैं? शायद वे सोचते हैं कि उनमें जोश है, और उनका जोश ठीक है और उनका हृदय ठीक है; परन्तु क्या उनका प्राण परमेश्वर और उसके कार्य के लिए आग से जल रहा है? वे कहाँ हैं, और वे क्या कर रहे हैं? क्या वे किसी प्रिय सिद्धान्त का ताना-बाना बुन रहे हैं, या तलवार की नोक पर उसकी रक्षा कर रहे हैं? आह, क्या उन्हें प्राणों की चिन्ता है? क्या सिय्योन के हितों के लिए उनका हृदय काँपता है?

क्या उनकी नसें तक थरथराती हैं? क्या परमेश्वर और प्राणों के लिए उनका प्रेम उनकी रूढ़िवादिता और उनके मत-वचनों में ऐसी आग लगा देता है कि हर सत्य उनके प्राणों में जलता है और उनके चेहरों से चमक उठता है? यदि ऐसा है, तो आप उन्हें प्रार्थना-सभाओं से अनुपस्थित नहीं देखेंगे; वरन् आप देखेंगे कि ईश्वरीय बातें उनके प्राण को प्रबल रुचि और सामर्थ के साथ पकड़ लेती हैं। आप उन्हें जीवित मसीही, संसार में जलते और चमकते हुए दीपक पाएँगे। भाइयो, यह बात हर मन पर जितनी दृढ़ता से अंकित की जाए उतना ही कम है कि सच्चे धर्म का निर्णायक लक्षण ऊर्जा है, उदासीनता नहीं: कि उसका प्राणभूत सार जीवन है, मृत्यु नहीं।

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