अध्याय 58 / 78

मुझे विश्वास हो गया है कि यदि मुझे इस प्रकार का कुछ भी प्रयास करना है, तो मुझे

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मुझे विश्वास हो गया है कि यदि मुझे इस प्रकार का कुछ भी प्रयास करना है, तो मुझे

'नए नियम पर टिप्पणियाँ' (NOTES UPON THE NEW TESTAMENT)।

इसे 4 जनवरी को तैयार किए गए प्रस्तावना-प्रारूप की साफ़ प्रति कहा जा सकता है।

हम देखते हैं कि इस साफ़ प्रति पर 6 जनवरी, 1754 की तिथि है, और यह 'हॉट वेल्स, ब्रिस्टल के निकट' लिखी गई थी।

मार्च 1914 में हमने वेस्ली हिस्टोरिकल सोसाइटी की कार्यवाही (Proceedings) में 'मिस्टर वेस्ली की नए नियम पर टिप्पणियाँ' विषय पर एक लेख दिया था, और उसमें मूल प्रस्तावना की एक प्रति भी प्रस्तुत की थी।

उस समय हमें अपने पुराने शोध-साथी नहेमायाह कर्नॉक से जो सहायता मिली, उसे हम कभी नहीं भूल सकते।

अन्य बातों के साथ उन्होंने हमें पुरानी नोट-बुक के दस पृष्ठों के चित्र भेजे।

यदि 'साथी' (companion) वह है जो अपनी रोटी दूसरे के साथ बाँटता है, तो जहाँ तक ज्ञान की रोटी का प्रश्न है, हमें कहना होगा कि जॉन

वेस्ली की जर्नल के संपादक उन सबसे 'मिलनसार' मनुष्यों में से थे जिनसे हम कभी मिले हैं।

अब हम मूल प्रस्तावना की एक प्रति देंगे।

प्रस्तावना

1. कई वर्षों से मेरी यह उत्कट इच्छा रही है कि मैं कुछ ऐसा लिखूँ जिससे गंभीर लोगों को, जिन्हें विद्या का लाभ प्राप्त नहीं है, नया नियम अधिक भली-भाँति समझने में सहायता मिले।

परन्तु अपनी अयोग्यता के गहरे बोध के कारण मैं ऐसा कोई भी प्रयास करने से निरंतर रुकता रहा हूँ।

ऐसे कार्य के लिए मुझमें न केवल पर्याप्त विद्या की कमी है, वरन अनुभव की उससे भी अधिक कमी है। इसी कारण मैंने कई बार इस विचार को बिलकुल छोड़ दिया; और जब बहुत आग्रह करने पर मुझे इसे फिर से हाथ में लेने के लिए मनाया गया, तब भी मैंने निश्चय किया कि इसे जहाँ तक हो सके टालता रहूँ, ताकि (यदि परमेश्वर को भाए) मैं इस कार्य को और अपने जीवन को एक साथ समाप्त करूँ।

2. परन्तु हाल ही में परमेश्वर की ओर से उठ खड़े होने और यहाँ से चल देने की एक ऊँची पुकार सुनकर मुझे विश्वास हो गया है कि यदि मुझे इस प्रकार का कुछ भी प्रयास करना है, तो अब और विलंब नहीं करना चाहिए; और मैं अब जो थोड़ा-बहुत कर सकता हूँ उसे करने के लिए इसलिए और अधिक प्रेरित हूँ कि मैं और कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी वर्तमान दुर्बलता के कारण मैं न यात्रा कर सकता हूँ, न प्रचार।

परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, मैं अब भी सोच सकता हूँ, पढ़ सकता हूँ और लिख सकता हूँ।

काश कि यह उसकी महिमा के लिए हो!

3. जो कुछ मैं पहले कह चुका हूँ उसी से सहज ही समझ में आ जाएगा कि मैं विद्वानों के लिए नहीं लिख रहा; और परमेश्वर के मार्गों और कार्य में गहरे अनुभवी लोगों के लिए तो और भी कम। मैं उनके चरणों में बैठना और उनसे सीखना चाहता हूँ, यदि वे कदाचित मुझे शिक्षा के योग्य समझें।

परन्तु मैं सीधे-सादे, अनपढ़ लोगों के लिए लिखता हूँ, जो केवल अपनी मातृभाषा समझते हैं और अपनी आत्मा का उद्धार चाहते हैं।

4. इन लोगों की, जितनी मुझसे बन पड़े, सहायता करने के लिए मेरा विचार है कि पहले पाठ को स्वयं सामान्य अंग्रेज़ी अनुवाद में लिख दूँ, जो सामान्यतः उन सब अनुवादों में सर्वोत्तम है जो मैंने किसी प्राचीन या आधुनिक भाषा में देखे हैं।

फिर भी मैं यह नहीं कहता कि कुछ स्थानों पर उसे मूल के और निकट नहीं लाया जा सकता।

न ही मैं यह दावा करूँगा कि जिन यूनानी प्रतियों से यह अनुवाद किया गया, वे सदा सर्वाधिक शुद्ध ही थीं।

और इसलिए अवसर के अनुसार मैं यह स्वतंत्रता लूँगा कि

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