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एक आत्मिक अनुभव के द्वारा, जिसने उन पर स्थायी छाप छोड़ी
उत्तर में प्रगति
विलियम ग्रिम्शॉ के धार्मिक अनुभव के आरम्भ और विकास पर बहुत प्रकाश डालने के लिए हम श्री लेकॉक के ऋणी हैं।
उन्हें 1742 में हावर्थ की पादरी-नियुक्ति दी गई।
अपने मूरभूमि वाले पैरिश में आने से पहले वे एक ऐसे आत्मिक अनुभव से होकर गुज़र चुके थे जिसने उन पर स्थायी छाप छोड़ी थी।
उन्होंने एक स्वप्न देखा जिसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
उसने उन्हें अपने आपको परमेश्वर की सेवा के लिए समर्पित करने को प्रेरित किया।
जब वे हावर्थ में रहने आए तो उन्होंने पाया कि विलियम डार्नी नाम का एक स्कॉटलैंडवासी फेरीवाला पड़ोस में एक अजीब शिक्षा का प्रचार कर रहा था।
यह विचित्र बात है कि ग्रिम्शॉ उस समय यह कच्ची धारणा रखते थे कि 'विश्वास से धर्मी ठहराया जाना' पोप-पन्थियों की शिक्षा है।
उन्होंने सुना कि डार्नी इसका प्रचार कर रहा है, और उन्होंने उसका खण्डन करने की ठान ली।
वे उस स्कॉटलैंडवासी से गुप्त भेंटों में मिले और उससे वाद-विवाद किया।
उनके साथ वही परिणाम हुआ जो उस समय प्रायः होता था।
उन्हें विश्वास हो गया कि वे भूल में थे, और वह फेरीवाला सही था।
उनका धार्मिक अनुभव गहरा हुआ।
मसीह में विश्वास के द्वारा मिलने वाले पापों की क्षमा के ज्ञान ने उनमें जो कुछ भला था उस सबको जीवन्त कर दिया।
उन्होंने अपनी नई धारणाओं के अनुसार कार्य किया; जब डार्नी मूर पर खुली हवा में प्रचार करता था तो वे उसके साथ खड़े रहे, उसकी सभाओं में सहायता की और उसकी सफलता पर आनन्दित हुए।
हमारा विचार है कि यह परिवर्तन 1745 में हुआ, क्योंकि ग्रिम्शॉ द्वारा एक मित्र को लिखे गए पत्र में इसकी ओर संकेत प्रतीत होता है, जिसमें उस वर्ष हावर्थ में डार्नी के प्रचार का उल्लेख है।
इस वाक्य से हम बहुत कुछ समझ सकते हैं:
'प्रभु सचमुच उसके साथ था, और इसके लिए परमेश्वर की स्तुति करने का मेरे पास कारण है।'
हमारी इच्छा है कि विलियम डार्नी के प्रारम्भिक जीवन पर हमें और अधिक प्रकाश मिलता।
ऐसा प्रतीत होता है कि वह स्कॉटलैंड छोड़कर लगभग 1742 में यॉर्कशायर में आ बसा था।
सुझाव दिया जाता है कि स्कॉटलैंड में वह धर्म के उस महान पुनरुत्थान के प्रभाव में आया था जो किल्साइथ के पादरी जेम्स रोब के नाम से अविभाज्य रूप से जुड़ा है।
श्री रोब का सदा का विषय था 'नए जन्म की आवश्यकता।'
डार्नी ने निस्सन्देह उस महान परिवर्तन का अनुभव किया।
दक्षिण की ओर भटकते हुए उसने सीमा पार की और यॉर्कशायर पहुँच गया।
वह पेशे से लकड़ी के जूते बनाने वाला और फेरीवाला था, और शीघ्र ही गाँववासियों में 'स्कॉच विल' के नाम से जाना जाने लगा।
उसके भीतर सुसमाचार-प्रचारक की आग जल रही थी, और मूरभूमियों में अपना माल बेचते हुए घूमते समय वह लोगों की दशा देखकर द्रवित हुआ।
इससे पहले, अक्टूबर 1741 में, उसने
उत्तर में प्रगति
प्रचार आरम्भ किया था; फिर वह कुछ समय के लिए रुक गया।
परन्तु जब वह पश्चिमी यॉर्कशायर की पहाड़ियों पर चढ़ा तो बुलावा फिर आया।
वह उसका विरोध नहीं कर सका।
उसने सब प्रकार के स्थानों में प्रचार किया और यहाँ-वहाँ लोगों के छोटे-छोटे समूहों को मसीह के लिए जीता।
उसने देखा कि यदि वे सोसाइटियों में एक साथ संगठित न किए गए तो शीघ्र ही बिखर जाएँगे।
उसने वही पाठ सीखा जो जॉन वेस्ली को सिखाया गया था।
यॉर्कशायर और लंकाशायर में सोसाइटियाँ खड़ी की गईं।
फिर विलियम ग्रिम्शॉ से उसकी भेंट हुई, जिन्होंने उसके कार्य के परिणामों से बहुत प्रभावित होकर उसकी सहायता करने का निश्चय किया।
उस निर्णय का प्रभाव शीघ्र ही प्रकट हो गया, और उसकी सोसाइटियों की सफलता धीरे-धीरे सुनिश्चित हो गई।
विलियम ग्रिम्शॉ का डार्नी के साथ सहयोग एक दूरगामी परिणाम लाया, जिसे अब हमें बताना है।
अगस्त 1747 में जॉन वेस्ली को लिखे एक पत्र में ग्रिम्शॉ कहते हैं कि लगभग एक महीना पहले वे डार्नी की एक सोसाइटी से मिले थे।
इस कथन के सम्बन्ध में वे एक रोचक तथ्य का उल्लेख करते हैं।
यह पत्र लिखने से कुछ दिन पहले वे जॉन बेनेट के साथ उन सोसाइटियों में गए थे जिन्हें बेनेट ने लंकाशायर और चेशायर में स्थापित किया था।
अन्य स्थानों के अतिरिक्त वे रॉशडेल, मैनचेस्टर और बूथ बैंक गए थे।
मैनचेस्टर की दूसरी यात्रा के बाद बेनेट से अलग होकर उन्होंने यॉर्कशायर और लंकाशायर में डार्नी की कुछ सोसाइटियों का दौरा किया।
इस यात्रा ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी।
जॉन वेस्ली को लिखते हुए वे कहते हैं:
इसलिए मैंने ठान लिया है कि ईश्वरीय सहायता से, अपने पैरिश की देखभाल के साथ-साथ, श्री बेनेट की सोसाइटियों का इतनी बार दौरा भी करूँ,
तथा विलियम डार्नी की, लीड्स और बर्स्टाल की सोसाइटियों का भी, जैसा मेरी सुविधा अनुमति दे और उनकी परिस्थितियाँ क्रमशः माँग करें; और इस पूरे समय मेरे लिए प्रभु की इच्छा और उद्देश्यों पर दृष्टि रखूँ।
यदि मुझे प्रभु की यही इच्छा जान पड़ी कि मैं और आगे बढ़ूँ, तो मैं आज्ञा मानूँगा।
उपर्युक्त सोसाइटियों का निरीक्षण करने के विषय में मेरा जो विचार है, उसके विषय में मेरे पास यह मानने का बड़ा कारण है कि वह प्रभु की इच्छा है, क्योंकि मैं अपने हृदय में उसके प्रति जो स्वतन्त्रता
अनुभव करता हूँ; अतः मुझे सन्देह नहीं कि वह आपकी धारणा के भी अनुकूल होगा।
मैं आपके साथ पूर्ण मेल और सहमति के बिना कुछ भी करना नहीं चाहता, और इसलिए आपसे विनती करता हूँ कि आप मुझसे पूरी तरह स्वतन्त्र, खुले और संवादशील रहें।
मैं परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि इस समय मुझे धर्म के विषय में हमारी भावनाओं, सिद्धान्तों आदि और मेरी अपनी भावनाओं, सिद्धान्तों आदि के बीच हर प्रकार से पूर्ण सहमति के सिवा और कुछ नहीं दिखाई देता; और इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप
(जैसा कि मैं आपके साथ करता हूँ) समय-समय पर मेरे सामने ऐसे नियम, स्थान, प्रस्ताव आदि रखें जो आपके विचार में कलीसिया के कल्याण, उसके सदस्यों के निजी लाभ और सब मिलाकर प्रभु की महिमा के लिए सबसे अधिक सहायक हों।
मुझे आशा है कि मेरा मंच सदा आपकी और
उत्तर में प्रगति
आपके भाई की सेवा में रहेगा, और मेरा घर, जब तक मेरे पास एक है, आपके लिए स्वागत-योग्य घर रहेगा।'1
वर्ष 1747 की पहली छमाही की घटनाओं पर विचार करते हुए हम उनके महत्त्व से प्रभावित होते हैं, जो
हावर्थ और उसके आस-पास के क्षेत्र से जुड़ी हैं।
जब चार्ल्स वेस्ली जनवरी में हावर्थ से चले, तो वे विलियम डार्नी की सोसाइटियों का दौरा करने गए; जब जॉन वेस्ली मई में ग्रिम्शॉ से अलग हुए तो उनकी भेंट डार्नी से हुई, जिसने उनसे आग्रहपूर्वक अनुरोध किया कि वे उसकी स्थापित की हुई सोसाइटियों की जाँच करें।
वेस्ली ने उसके अनुरोध का उत्तर दिया।
जब हम उनकी जर्नल में उनके अभिलेखों का अनुसरण करते हैं तो देखते हैं कि उन्होंने बेनेट की सोसाइटियों का भी दौरा किया, और उनकी यात्राएँ एक सप्ताह में फैली रहीं।
अपने दौरे के क्रम में 7 मई को वे मैनचेस्टर पहुँचे।
कुछ युवकों ने एक कमरा ले रखा था, जिसमें एक सोसाइटी की सभा होती थी, और वे उसे देखने गए।
उनका मैनचेस्टर में प्रचार करने का कोई विचार नहीं था, परन्तु उन्हें बताया गया कि जॉन नेल्सन ने सार्वजनिक सूचना दी थी कि वे एक बजे प्रचार करेंगे।
वे थके-माँदे और निढाल थे, क्योंकि उमस भरे दिन में कई घण्टे तेज़ दुलकी चाल से घोड़ा दौड़ाकर आए थे।
वह छोटा कमरा एकत्र हुए लोगों के दसवें भाग को भी नहीं समा सकता था, इसलिए वे पैदल सैलफ़र्ड
क्रॉस की ओर गए।
जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, भीड़ उनके आगे दौड़ती या पीछे चलती रही।
उनके विचार अतीत में व्यस्त थे।
क्रॉस पर पहुँचकर वे कुछ देर रुके, चारों ओर देखा, और लोगों से पूछा, 'तुम ऐसे क्यों देख रहे हो मानो तुमने मुझे पहले कभी देखा ही न हो?
तुम में से बहुतों ने मुझे पास के गिरजाघर में प्रचार करते और प्रभु-भोज देते देखा है।' *
अतीत को परे हटाकर उन्होंने इन आग्रहपूर्ण शब्दों को अपना पाठ बनाया, 'जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो।'
कोई उल्लेखनीय गड़बड़ी नहीं हुई।
सभा के अन्त में मैक्लेसफ़ील्ड के जॉर्ज पियर्सन नामक एक व्यक्ति ने उनसे भेंट की और उस नगर की यात्रा के लिए उनसे सफलतापूर्वक विनती की।
सन्ध्या को वेस्ली डेवीह्यूम पहुँचे और प्रचार करने तथा सोसाइटी से मिलने, दोनों से बहुत तरोताज़ा हुए।
डेवीह्यूम की यात्रा का उनका उल्लेख महत्त्वपूर्ण है।
वे सोसाइटी के विषय में कहते हैं:
'यहाँ उनके पड़ोसी उन्हें बहुत सताया करते थे; परन्तु परमेश्वर का भय मानने वाले एक न्यायाधीश ने दंगाइयों के सरगनाओं के विरुद्ध उन्हें वारण्ट दे दिया, और तब से वे शान्ति में रहे।'
1 देखें Walker's Methodism in Halifax, 54, 55.
®देखें John Wesley and the Religious Societies, 99.
