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आने वाली घटनाएँ और वर्तमान कर्त्तव्य
जिन बातों का मैंने अभी नाम लिया है, उनके विरुद्ध सब सच्चे मसीही जितने साहस और दृढ़ता से अपना मुख करेंगे, और उनके साथ किसी भी प्रकार की भागीदारी से अपने हाथ धो लेंगे, उतना ही अधिक यहूदियों के बीच मसीही धर्म को बढ़ावा देने के उनके प्रयास फलदायी और सफल होंगे।
और अब मैं इस सब का समापन कुछ सीधे-सादे व्यावहारिक शब्दों से करना चाहता हूँ। इस लेख को पढ़ने वाले सब लोगों से मेरा आग्रह है कि वे निम्नलिखित कारणों से यहूदी मिशन-सभा के उद्देश्य को और यहूदी विषय को अपनाएँ।
1. इस विषय को इसलिए अपनाइए कि पवित्रशास्त्र में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। भविष्यद्वाणी को पढ़ते समय उसके व्यक्तिवाचक नामों के शाब्दिक अर्थ पर एकाग्र दृष्टि रखने की आदत डालिए। उस पुराने परम्परागत विचार को त्याग दीजिए कि याकूब, इस्राएल, यहूदा, यरूशलेम और सिय्योन का अर्थ सदा अन्यजातियों की कलीसिया ही होता है, और यह कि दूसरे आगमन की भविष्यद्वाणियों को आत्मिक अर्थ में और पहले आगमन की भविष्यद्वाणियों को शाब्दिक अर्थ में लेना चाहिए। न्यायी, ईमानदार और निष्पक्ष बनिए। यदि आप यहूदियों से आशा रखते हैं कि वे यशायाह 53 को शाब्दिक रूप में लें, तो यह सुनिश्चित कीजिए कि आप यशायाह 54, 60 और 62 को भी शाब्दिक रूप में लें। प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधारक सिद्ध नहीं थे। मैं साहस के साथ कहता हूँ कि किसी भी बात में वे इतने भूल में नहीं थे जितने पुराने नियम की भविष्यद्वाणी की व्याख्या में। हमारे आदरणीय स्वीकृत बाइबल-अनुवाद में भी भविष्यद्वाणी की पुस्तकों में बहुत-से "विषय-सूची" वाले शीर्षक हैं जो खेदजनक रूप से भ्रम में डालने वाले हैं। जब संशोधित अनुवाद निकलेगा, तो मुझे आशा है कि इस विषय में हम बड़ा सुधार देखेंगे।
2. दूसरे, यहूदी विषय को इसलिए अपनाइए कि हम किन दिनों में जी रहे हैं। वह मनुष्य सचमुच अन्धा होगा जो यह न देखे कि इन दिनों राजनीतिज्ञों और राजनेताओं का ध्यान फिलिस्तीन के आस-पास के देशों पर कितना केन्द्रित हो रहा है। मिस्र में परिस्थितियों की विचित्र स्थिति, स्वेज़ नहर का निर्माण, साइप्रस पर अधिकार, फ़रात रेलमार्ग की योजना, तुर्की साम्राज्य का क्षीण होते जाना, फिलिस्तीन का त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण, ये कैसी विचित्र घटनाएँ हैं! इनका क्या अर्थ है? आगे क्या होने वाला है? जो विश्वास करता है वह उतावली नहीं करेगा। मैं कोई निर्णय देने का दिखावा नहीं करूँगा। परन्तु मुझे लगता है कि मैं परमेश्वर की वाणी सुन रहा हूँ, जो कहती है, "यहूदियों को स्मरण करो, यरूशलेम की ओर देखो।"
