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आनेवाली घटनाएँ और वर्तमान कर्तव्य
2. इस्राएल की वर्तमान दशा।
3. इस्राएल के भविष्य की आशाएँ।
4. अन्यजाति कलीसियाओं का इस्राएल के प्रति कर्तव्य।
1. "इस्राएल" शब्द का अर्थ। धर्मविज्ञान में शब्दों की परिभाषा सबसे पहले ज़रूरी है। जब तक हम अपने धार्मिक कथनों में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं करते, तब तक हमारे तर्क प्रायः व्यर्थ जाते हैं, और हम हवा में मुक्के मारनेवालों के समान दिखाई देते हैं। "इस्राएल" शब्द बाइबल में लगभग सात सौ बार आया है। मुझे केवल तीन अर्थ मिलते हैं जिनमें यह प्रयुक्त हुआ है।
पहला, यह याकूब का एक नाम है, जो बारह गोत्रों का पिता था; यह नाम उसे परमेश्वर ने विशेष रूप से दिया था।
दूसरा, यह उन दस गोत्रों का नाम है जो रहबाम के दिनों में यहूदा और बिन्यामीन से अलग हो गए और एक पृथक राज्य बन गए। इस राज्य को यहूदा के राज्य से भेद करने के लिए प्रायः इस्राएल कहा जाता है।
तीसरा और अन्तिम, यह सम्पूर्ण यहूदी जाति का नाम है, अर्थात् याकूब से उत्पन्न उन बारहों गोत्रों के सब लोगों का, जो मिस्र से निकालकर कनान देश में लाए गए। बाइबल में इस शब्द का यही अर्थ सबसे अधिक प्रचलित है। सम्पूर्ण नए नियम में मुझे "इस्राएल" शब्द केवल इसी अर्थ में प्रयुक्त मिलता है। जिस पाठ पर मैं आज विचार कर रहा हूँ, उसमें भी यह शब्द इसी अर्थ में आया है। वह इस्राएल, जिसे परमेश्वर ने तितर-बितर किया है और जिसे वह फिर इकट्ठा करेगा, सम्पूर्ण यहूदी जाति है।
अब मैं इस बात पर क्यों ठहरता हूँ? कुछ पाठकों को यह समय और शब्दों की बरबादी लग सकती है। जो बातें मैं कह रहा हूँ, वे उन्हें स्वयंसिद्ध-सी लगती हैं। इस्राएल का अर्थ इस्राएल ही है, इसमें उन्हें कभी कोई सन्देह नहीं हुआ। यदि इस सम्बोधन को पढ़नेवाले किसी का मन ऐसा ही हो, तो मैं इसके लिए धन्यवादी हूँ। परन्तु खेद है कि बहुत-से मसीही इस विषय को आपकी दृष्टि से नहीं देखते। उन्हीं के लिए मुझे इस बात पर थोड़ा और ठहरना पड़ेगा।
अनेक शताब्दियों से मसीह की कलीसियाओं में "इस्राएल" शब्द के साथ एक विचित्र और मेरी समझ में अनुचित व्यवहार चला आ रहा है। भजन संहिता और भविष्यद्वक्ताओं के अनेक अंशों में उसका ऐसा अर्थ लिया गया है मानो उसका मतलब मसीही विश्वासियों के सिवाय कुछ और है ही नहीं। क्या इस्राएल को प्रतिज्ञाएँ दी गई हैं? लोगों से निरन्तर कहा गया है कि वे अन्यजाति के सन्तों को सम्बोधित हैं। क्या इस्राएल के लिए संचित महिमामय बातों का वर्णन किया गया है? लोगों से बार-बार कहा गया है कि वे मसीही कलीसियाओं में सुसमाचार की विजयों और जयजयकार का वर्णन करती हैं। इन बातों के प्रमाण इतने अधिक हैं कि उन्हें उद्धृत करने की आवश्यकता नहीं। अधिकांश टीकाओं और लोकप्रिय गीतों को पढ़कर कोई भी इस व्याख्या-पद्धति को देख सकता है जिसकी मैं यहाँ चर्चा कर रहा हूँ।
इस पद्धति के विरुद्ध मैंने बहुत समय से विरोध किया है, और आशा करता हूँ कि जब तक जीवित हूँ, करता रहूँगा। मैं इनकार नहीं करता कि इस्राएल एक विशेष प्रतीकात्मक जाति था, और इस्राएल के साथ परमेश्वर का सम्बन्ध सारे संसार में उसके विश्वासी लोगों के साथ उसके सम्बन्ध का एक प्रतिरूप होना ठहराया गया था। मैं यह भी नहीं भूलता कि लिखा है, "जैसे जल में मुख की परछाई मुख से मिलती है, वैसे ही मनुष्य का मन मनुष्य से" (नीतिवचन 27:19), और भविष्यद्वाणी में इस्राएली हृदयों के विषय जो आत्मिक सत्य सिखाए गए हैं, वे अन्यजातियों के हृदयों पर भी लागू होते हैं। मैं चाहता हूँ कि यह बात बिलकुल स्पष्ट रूप से समझ ली जाए कि अलग-अलग यहूदियों और अन्यजातियों के साथ परमेश्वर का व्यवहार ठीक एक ही है। मन फिराव, मसीह में विश्वास और हृदय की पवित्रता के बिना कोई भी यहूदी या अन्यजाति का व्यक्ति कभी उद्धार नहीं पाएगा।
मैं जिसका विरोध करता हूँ, वह यह आदत है कि इस्राएल जाति के भावी इतिहास के विषय परमेश्वर के वचन की स्पष्ट बातों को रूपक बना दिया जाए, और उनकी परिपूर्णता को घटा दिया जाए ताकि उन्हें अन्यजातियों की कलीसिया पर घटाया जा सके! मेरा विश्वास है कि इस आदत का पवित्रशास्त्र में कोई आधार नहीं है, और यह अपने पीछे बुरे परिणामों की एक लम्बी कतार खींच लाती है। मैं साहस के साथ पूछना चाहता हूँ कि सम्पूर्ण नए नियम में "इस्राएल" शब्द को इस्राएल जाति के सिवाय किसी और पर लागू करने का कौन-सा स्पष्ट अधिकार मिलता है? मुझे कोई नहीं मिलता। इसके विपरीत, मैं देखता हूँ कि जब प्रेरित पौलुस सुसमाचार के दिनों में अन्यजातियों के विशेषाधिकारों के विषय पुराने नियम की भविष्यद्वाणियाँ उद्धृत करता है, तो वह ऐसे ही पद चुनता है जिनमें "अन्यजातियों" का नाम विशेष रूप से आया हो। रोमियों की पत्री का पन्द्रहवाँ अध्याय मेरे कथन का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। नए नियम में हमें प्रायः बताया गया है कि सुसमाचार के अधीन विश्वास करनेवाले अन्यजाति विश्वासी यहूदियों के "संगी वारिस और एक ही आशा के भागी" हैं (इफिसियों 3:6)। परन्तु विश्वासी अन्यजातियों को "इस्राएली" कहा जा सकता है, यह मुझे कहीं भी दिखाई नहीं देता।
भजन संहिता और भविष्यद्वक्ताओं की भाषा की उस ढीली व्याख्या-पद्धति का, और सुसमाचार के प्रचार द्वारा सारे संसार के मन फिराने की उन अतिशयोक्तिपूर्ण अपेक्षाओं का, जो अनेक मसीही लेखकों में दिखाई देती हैं, हम क्या कारण बताएँ? मेरा विश्वास है कि इसका सबसे बड़ा कारण "इस्राएल" शब्द की गलत व्याख्या की आदत है, और फलस्वरूप उन प्रतिज्ञाओं को अन्यजाति कलीसियाओं पर लागू करना, जिनसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं!
धर्मविज्ञान की छोटी-से-छोटी भूल भी फल लाती है। जब कोई मनुष्य पवित्रशास्त्र की व्याख्या का कोई गलत सिद्धान्त अपना लेता है, तो वह सिद्धान्त अवश्य ही अप्रिय परिणाम लाता है और उसके सारे धर्म के स्वर को रंग देता है। पाठक, मैं अपने विषय के इस भाग को यहीं छोड़ता हूँ। मुझे निश्चय है कि इसके महत्त्व को बढ़ाकर नहीं आँका जा सकता। वास्तव में इसकी सही समझ सम्पूर्ण यहूदी विषय और यहूदियों के विषय की भविष्यद्वाणियों की जड़ में ही है। मसीहियों का एक जाति के रूप में इस्राएल के प्रति जो कर्तव्य है, वह तब तक स्पष्ट रूप से समझा नहीं जाएगा, जब तक मसीही यह स्पष्ट रूप से न देख लें कि पवित्रशास्त्र में इस्राएल का क्या स्थान है।
आगे बढ़ने से पहले मैं इस सम्बोधन के सब पाठकों से एक सीधा व्यावहारिक प्रश्न पूछूँगा। मैं आपसे शान्त मन से विचार करने को कहता हूँ: जब आप पुराने नियम के भजनों और भविष्यद्वाणियों में "इस्राएल," "याकूब" और इसी प्रकार के शब्दों को पाते हैं, तो आप उनका क्या अर्थ लेते हैं? हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब बाइबल पढ़नेवाले बहुत हैं। बहुत-से लोग नियमित रूप से पवित्रशास्त्र में खोज करते हैं और पढ़ते हैं
