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आने वाली घटनाएँ और वर्तमान कर्तव्य
परमेश्वर के अनुग्रह में बहाल किया जाएगा, और वह एक पवित्र जाति तथा संसार के लिए आशीष बन जाएगा।
हमारे पाठ की व्याख्या के विषय में इतना ही। अब मैं अपने पाठकों का ध्यान इस्राएल के विषय में चार बातों की ओर दिलाना चाहता हूँ, जिन्हें "यहूदियों" के प्रत्येक मित्र को अपने मन में सदा हरा-भरा रखने का प्रयत्न करना चाहिए। कुछ लोगों को वे चाहे कितनी ही साधारण और जानी-पहचानी क्यों न लगें, दूसरे उन्हें अनदेखा कर देते हैं और भूल जाते हैं। परन्तु मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इन चारों बातों पर दृढ़ पकड़ ही यहूदी विषय और उनके उद्देश्य में सच्ची और स्थायी रुचि की नींव है।
1. तो सबसे पहले मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि इस इस्राएल के अत्यन्त अनोखे अतीत के इतिहास पर विचार कीजिए, जिसका किसी दिन "उद्धार होना" है।
उस इतिहास के तथ्यों के लिए मैं आपको केवल बाइबल की ओर संकेत करूँगा। आधुनिक संशयवाद चाहे जो कुछ कहना पसन्द करे, उस पूज्य प्राचीन ग्रन्थ में लिखा इस्राएल का वृत्तान्त संसार की किसी भी प्राचीन जाति के वृत्तान्त के समान विश्वसनीय है। उसकी यथार्थता पर आपत्ति करने का हमारे पास उतना ही कम आधार है जितना हेरोदोतस द्वारा बताए गए मिस्र, अश्शूर, फ़ारस और यूनान के वर्णनों पर आपत्ति करने का। इसके विपरीत, प्रमाण निरन्तर बढ़ता जा रहा है कि यहूदी लोगों के विषय में पुराने नियम के वृत्तान्त पूर्णतः विश्वसनीय और सत्य हैं।
तब हम पाते हैं कि इस्राएल लगभग 1,500 वर्ष तक परमेश्वर की ओर से संसार की किसी भी जाति से अधिक अनुग्रहित और विशेषाधिकार-प्राप्त रहा। दाऊद ठीक ही कह सका, "तेरी प्रजा इस्राएल के तुल्य और कौन सी जाति पृथ्वी पर है जिसे परमेश्वर ने जाकर अपनी निज प्रजा करने को छुड़ा लिया?" (2 शमूएल 7:23)। पृथ्वी पर वही एक जाति थी जिस पर परमेश्वर ने अपने आपको प्रकट करना चाहा। "परमेश्वर के वचन उन्हें सौंपे गए।" (रोमियों 3:2)। जब अन्य सब जातियों को अपनी ही चाल चलने और नैतिक तथा आत्मिक अन्धकार में जीने दिया गया, तब केवल यहूदियों को बहुत बड़ी मात्रा में ज्योति और ज्ञान प्राप्त था। सुलैमान के मन्दिर का एक साधारण से साधारण याजक भी होमर से कहीं उत्तम धर्मविज्ञानी था। दानिय्येल, एज्रा और नहेम्याह परमेश्वर के विषय में उतना जानते थे जितना सुकरात, अफ़लातून, पाइथागोरस और सिसरो सब मिलकर भी नहीं जानते थे।
यहूदियों को चमत्कारी हस्तक्षेप से मिस्र से निकाला गया, पृथ्वी के एक अति उत्तम कोने फ़िलिस्तीन में बसाया गया, और विशिष्ट रीति-रिवाजों तथा विधियों के द्वारा अन्य जातियों से घेरकर अलग रखा गया। उन्हें स्वर्ग से ऐसी सिद्ध नैतिक व्यवस्था दी गई कि आज तक उसमें न कुछ जोड़ा जा सकता है और न घटाया जा सकता है। उन्हें औपचारिक विधियों और नियमों के साथ परमेश्वर की आराधना करना सिखाया गया, जो हमें चाहे कितने ही बोझिल लगें, मानव-इतिहास की उस आरम्भिक अवस्था में मानव स्वभाव के लिए अद्भुत रूप से उपयुक्त थे और उन्हें एक उच्चतर व्यवस्था के लिए तैयार करने के योग्य थे। भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें निरन्तर चेतावनी और शिक्षा दी जाती रही, और चमत्कारों के द्वारा उनकी रक्षा और बचाव किया जाता रहा। संक्षेप में, यदि केवल दया और कृपा ही लोगों को भला बना सकती, तो पृथ्वी पर कोई जाति इस्राएल जितनी भली न होती। जब मिस्र, बाबुल और यूनान अपने ही हाथों की बनाई वस्तुओं की पूजा करते थे, तब अकेला यहूदी ही एक सच्चे परमेश्वर का आराधक था।
परन्तु दुर्भाग्य से हम पाते हैं कि इस्राएल सदा परमेश्वर से फिर जाने और भटक जाने की ओर प्रवृत्त रहने वाली प्रजा थी। बार-बार वे मूर्तिपूजा और दुष्टता में पड़े, और अपने पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा को त्याग दिया। बार-बार उन्हें उनके पापों के कारण ताड़ना दी गई और उनके आसपास की जातियों के हाथ में सौंपा गया। मिद्यानी, पलिश्ती, अम्मोनी, अरामी, अश्शूरी और बाबुली वे छड़ियाँ थीं जिनसे उन्हें बार-बार पीटा गया। न्यायियों के समय से लेकर इतिहास की पुस्तकों के अन्त तक हम परमेश्वर के विरुद्ध निरन्तर होने वाले विद्रोहों और निरन्तर होने वाले दण्डों का शोकपूर्ण वृत्तान्त देखते हैं। ऐसी हठीली और अड़ियल जाति, शिक्षा को भूल जाने में इतनी तत्पर, जिसके साथ इतनी दया का व्यवहार किया गया फिर भी जो इतनी अपश्चातापी और अविश्वासी रही, कदाचित् कभी न हुई।
अन्त में हम पाते हैं कि 1,500 वर्ष के बीतने पर इस्राएल को परमेश्वर ने एक भयानक दण्ड के लिए छोड़ दिया, और उसे अपने ही पापों का फल भोगने दिया गया। परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं को बार-बार ठुकराने के बाद उन्होंने परमेश्वर के एकलौते पुत्र को ठुकराकर अपनी दुष्टता को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। उन्होंने अपने सच्चे राजा, दाऊद के पुत्र को अस्वीकार किया, और कैसर को छोड़ किसी राजा को न चाहा। तब अन्त में उनकी अधर्म की कटोरी भर गई। यरूशलेम रोमियों के हाथ में सौंप दिया गया। पवित्र और सुन्दर मन्दिर जला दिया गया।
