अध्याय 45 / 73

मसीहियों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि वे ठोकर के पत्थरों को हटा दें

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मसीहियों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि वे ठोकर के पत्थरों को हटा दें

जो देश सुसमाचार के बिना है, जैसे मंगोलिया या चीन, वह नैतिक रेगिस्तान से बढ़कर कुछ नहीं है। सुसमाचार वाले यूरोप और अमेरिका को उनके सब दोषों के होते हुए भी देखो, और सुसमाचार के बिना अफ्रीका और एशिया को देखो — कितना भारी अन्तर है। परन्तु क्या हम कभी यह विचार करते हैं कि उस सुसमाचार के पहले प्रचारक सब यहूदी थे? जिन लोगों ने अपने प्राणों की कीमत पर क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का धन्य समाचार नगर-नगर पहुँचाया, वे अन्यजाति के लोग नहीं थे। सत्य का दीपक सबसे पहले उठाने वाले, जो हाथों-हाथ चलता हुआ हमारे मूर्तिपूजक पूर्वजों तक पहुँचा — वे सब इस्राएल के लोग थे।

हम मसीह यीशु में आनन्दित होते हैं और उसके व्यक्तित्व और कार्य पर घमण्ड करते हैं। और ऐसा करना उचित भी है! एक जीवित उद्धारकर्ता और क्रूस पर एक ही बार बहाए गए उसके प्रायश्चित के लहू के बिना हम सचमुच अभागे होते। परन्तु क्या हम कभी यह विचार करते हैं कि जब वह उद्धारकर्ता मनुष्य बना, ताकि मनुष्य के स्थानापन्न के रूप में जीए, दुःख उठाए और मरे — तब वह एक यहूदी स्त्री से जन्मा? हाँ, यह बात कभी न भुलाई जाए! जब "परमेश्वर शरीर में प्रकट हुआ" और "स्त्री से जन्मा", तो वह स्त्री दाऊद के घराने की एक कुँवारी थी। जब प्रतिज्ञा किए हुए उद्धारकर्ता ने शरीर और लहू धारण किया, ताकि वह सर्प का सिर कुचले और मनुष्य को छुड़ाए — तब उसने अन्यजातियों के किसी राजघराने का शरीर और लहू नहीं लिया, परन्तु इस्राएल के बारह गोत्रों में से एक का लिया।

पाठक, मैं भली भाँति जानता हूँ कि ये पुरानी बातें हैं। ये बार-बार कही गई हैं, बार-बार दोहराई गई हैं, और कलीसियाओं के ध्यान में बार-बार लाई गई हैं। मैं इन्हें फिर से सामने रखने में लज्जित नहीं हूँ। मैं कहता हूँ कि यदि मनुष्य के हृदय में कृतज्ञता नाम की कोई वस्तु है, तो यहूदियों की भलाई करने के कार्य में विशेष रुचि लेना सब अन्यजातीय मसीहियों का कर्तव्य है।

2. इसके अतिरिक्त मेरा विश्वास है कि सब अन्यजातीय मसीहियों पर यह भी कर्तव्य ठहरता है कि वे विशेष रूप से सावधान रहें कि इस्राएल के मार्ग से ठोकर के पत्थर हटा दें, और ऐसा कुछ न करें जिससे वे मसीही धर्म से घृणा करने लगें या उनके मन फिराने में बाधा पड़े। यह बात पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से कही गई है। वहाँ हम यशायाह को यह कहते पाते हैं, "मेरे लोगों के मार्ग में से ठोकर के पत्थरों को हटा दो" (यशायाह 57:14)। सचमुच भविष्यद्वक्ता का इस विषय में बोलना उचित ही था। अन्यजातीय कलीसियाओं पर दृष्टि डालने वाला कोई भी मनुष्य यह देखे बिना नहीं रह सकता कि उसके पास कारण था। मसीही जगत में परमेश्वर की दस आज्ञाओं की जो घोर अपवित्रता और उपेक्षा इतने व्यापक रूप से फैली है, उसके विषय में हम क्या कहें? रोमन कैथोलिक कलीसियाओं में जो खुली, निर्लज्ज मूर्तिपूजा आँखों को खटकती है, उसके विषय में हम क्या कहें? पुराने नियम के इतिहास की उस बुद्धिवादी व्याख्या-पद्धति के विषय में हम क्या कहें जो आधुनिक टीकाओं में इतनी दूर तक घुस आई है — वह पद्धति जो अब्राहम, याकूब, यूसुफ आदि के वृत्तान्तों को ऐसी मनगढ़न्त कथाएँ या चतुराई से रची गई कहानियाँ मानती है, न कि सचमुच घटी हुई घटनाओं का वर्णन? पुराने नियम की भविष्यद्वाणियों की उस परम्परागत व्याख्या-पद्धति के विषय में हम क्या कहें जिसमें बहुत से मसीही लगे रहते हैं — वह पद्धति जो सब आशीषों को मसीह की कलीसिया के लिए ले लेती है और सब कड़वी बातें बेचारे तिरस्कृत इस्राएल के हाथ सौंप देती है; वह पद्धति जो मसीह के पहले आगमन की सब भविष्यद्वाणियों की अक्षरशः व्याख्या करती है और उसके दूसरे आगमन की सब भविष्यद्वाणियों की लाक्षणिक रूप से; जो यहूदी से माँग करती है कि वह पहली बात को अक्षर-अक्षर माने, और स्वयं दूसरी बात को केवल उसी अर्थ में मानने को तैयार है जिसे (एक खेदजनक भूल से) आत्मिक अर्थ कहा जाता है?

इन सब बातों के विषय में हम इसके सिवा और क्या कहें कि ये ठोकर के पत्थर हैं — यहूदियों के मन फिराने के मार्ग में बड़े ठोकर के पत्थर? ये यहूदी और मसीह के बीच बड़ी दीवारों के सिवा और क्या हैं — और वे भी मसीहियों के हाथों खड़ी की हुई दीवारें?

पाठक, इन ठोकर के पत्थरों को हटाने में हम सबको अपना भाग निभाना चाहिए। कम से कम यहाँ तो सब सहायता कर सकते हैं। यहाँ तो हर अन्यजातीय मसीही यहूदी हित में सहायक हो सकता है। हम अपने पवित्र विश्वास को जितना अधिक शुद्ध और मनोहर बनाएँगे, उतना ही अधिक उसे इस्राएल के सामने उचित ठहरा सकेंगे। हम रोमी धर्मत्याग की प्रगति को जितना रोक सकें और उसकी मूर्तिपूजा और भ्रष्टताओं का विरोध कर सकें, उतना ही यहूदी के लिए यह मानना सम्भव होगा कि मसीही धर्म में कुछ सार है। हम पवित्रशास्त्र की सब बातों को उनके सीधे शाब्दिक अर्थ में लेने की आदत को जितना बढ़ावा देंगे, उतना ही इस्राएल के सच्चे खोजियों के मन के पूर्वाग्रह दूर करने और उन्हें हमारी बात सुनने के लिए तैयार करने की सम्भावना बढ़ेगी।

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