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वर्तमान कर्तव्य और आनेवाली घटनाएँ
क्या कोई पाठक पूछता है कि "समयों के चिन्हों" से मेरा क्या अभिप्राय है? वह नीचे दी गई बातों को भली-भाँति तौले, तो वह समझ जाएगा कि मेरा अभिप्राय क्या है।
1. अन्यजातियों के बीच उन मिशनों के विषय में हम क्या कहें जो इन पिछले दिनों में आरम्भ किए गए हैं? सत्तर वर्ष पहले प्रोटेस्टेंट कलीसियाएँ मिशनों के विषय में पूरी तरह सोई हुई प्रतीत होती थीं। सारे ग्रेट ब्रिटेन से अन्यजातियों के पास भेजा गया एक भी मिशनरी मुश्किल से मिलता था। जंगली लोगों और मूर्तिपूजकों को सुसमाचार सुनाने की बात पर लोग हँसते थे। मिशनों के आरम्भिक समर्थकों के साथ बहुतेरे ऐसे लोगों ने भी उदासीनता का व्यवहार किया जिन्हें भली-भाँति जानना चाहिए था। परन्तु अब यह भावना पूरी तरह बदल गई है। हम पृथ्वी के हर कोने में सैकड़ों मिशनरी लगाए हुए हैं। और पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा" (मत्ती 24:14)।
2. इन पिछले दिनों में यहूदी जाति के प्रति जो आश्चर्यजनक रुचि दिखाई देती है, उसके विषय में हम क्या कहें? सत्तर वर्ष पहले यहूदी होना ताने, कहावत और उपहास का विषय था। अब्राहम की सन्तानों की आत्माओं की चिन्ता किसी को न थी। वे तिरस्कृत, अपमानित और पाँव तले रौंदे हुए लोग थे। सचमुच कहा जा सकता था, "यह तो सिय्योन है, इसकी खोज कोई नहीं करता" (यिर्मयाह 30:17)। परन्तु अब यह भावना पूरी तरह बदल गई है। यहूदियों की आत्मिक भलाई सच्चे मसीहियों की गहरी चिन्ता का विषय है। यहूदियों के नागरिक अधिकारों का ध्यान तो अति की सीमा तक रखा जाता है। स्वयं यरूशलेम नगर का राजाओं की सभाओं में वज़न है। और पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "तू उठकर सिय्योन पर दया करेगा; क्योंकि उस पर दया करने का समय है, वरन् उसके लिये ठहराया हुआ समय आ पहुँचा है। क्योंकि तेरे दास उसके पत्थरों को चाहते हैं, और उसकी धूल पर भी तरस खाते हैं। तब जातियाँ यहोवा के नाम का, और पृथ्वी के सब राजा तेरे प्रताप का भय मानेंगे। क्योंकि यहोवा ने सिय्योन को फिर बसाया है, और वह अपनी महिमा के साथ दिखाई दिया है" (भजन संहिता 102:13-16)।
3. इन दिनों में ज्ञान के आश्चर्यजनक प्रसार और जातियों के बीच आपसी संचार के विषय में हम क्या कहें? सत्तर वर्ष पहले किसी ऐसे गरीब आदमी को ढूँढ़ना जो पढ़ सकता हो, एक असामान्य बात थी। कुछ ही वर्षों में ऐसा आदमी जो पढ़ नहीं सकता, एक दुर्लभ दृश्य होगा। सत्तर वर्ष
