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आपत्तियाँ
यह तर्क उठाया जाता है: यदि दोष और गुण स्वतंत्र इच्छा से उत्पन्न नहीं होते, तो मनुष्यों को पुरस्कार या दण्ड देना अनुचित ठहरता है। यद्यपि यह धारणा अरस्तू से आई है, तथापि मैं मानता हूँ कि सन्त क्राइसोस्टम और सन्त जेरोम भी इस विषय को छूते हैं। सन्त जेरोम खुलकर स्वीकार करते हैं कि यह विचार-धारा पेलागियसवादियों को प्रिय थी। उन्होंने उनके ये शब्द बताए हैं: "यदि परमेश्वर का अनुग्रह हमारे भीतर कार्य करता है, तो पुरस्कार उसी अनुग्रह को मिलना चाहिए, हमें नहीं, जो कार्य नहीं करते।" जहाँ तक पापों के लिये परमेश्वर के दण्ड का प्रश्न है, मेरा उत्तर यह है कि हम ऐसे दण्डों के योग्य ठीक ही ठहरते हैं, क्योंकि पाप के उत्तरदायी हम ही हैं। इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि हम स्वतंत्र निर्णय से पाप करें या बँधे हुए निर्णय से, जब तक वह स्वेच्छा की वासना से उठता है। विशेषकर इसलिये कि मनुष्य पाप की दासता के कारण ही पापी ठहरता है। रहा भले कामों का प्रतिफल, तो यह मानना कितनी निरर्थक बात है कि वह हमें परमेश्वर की कृपा से मिलता है, न कि हमारे पुण्य से कमाई हुई मजदूरी के रूप में! सन्त अगस्तीन प्रायः यही बात दोहराते हैं: "परमेश्वर हमारे पुण्यों को नहीं, अपनी ही दी हुई देनों को मुकुट पहनाता है। हमें जो प्रतिफल दिया जाता है, वह इसलिये प्रतिफल नहीं कहलाता कि वह हमारे पुण्यों का देय है, वरन् इसलिये कि वह पहले दिये गये अनुग्रहों के बदले में दिया जाता है।" यह कहना कि पुण्य तभी हो सकते हैं जब वे मनुष्य की भले कामों की अपनी सामर्थ्य से निकलें, उचित नहीं है। प्रेरित इस भ्रान्त धारणा का खण्डन करता है; वह कहता है कि जिस आशीष और अनन्त महिमा की हम बाट जोहते हैं, वह प्रभु की दया, चुनाव, बुलाहट और धर्मी ठहराए जाने से उत्पन्न होती है। वह घोषणा करता है: "जिन्हें उसने चुना, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी" (रोमियों 8:30)।
तो फिर विश्वासियों को प्रतिफल क्यों मिलता है? प्रेरित की व्याख्या के अनुसार यह प्रभु की दया के कारण है, उनके अपने कामों के कारण नहीं। इसलिये यह निराधार आशंका दूर हो जाए, जो कहती है कि स्वतंत्र इच्छा को न मानने से पुण्य जाता रहता है। जिस बात की ओर पवित्रशास्त्र हमें ले जाता है, उससे भागना बेतुका है। सन्त पौलुस चेतावनी देता है: "यदि तूने सब कुछ पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है मानो नहीं पाया?" (1 कुरिन्थियों 4:7)। उसका आशय स्पष्ट है: स्वतंत्र इच्छा की धारणा को जड़ से उखाड़ना और सब पुण्यों को घटाना। तथापि परमेश्वर, जो भलाई में धनी है, अपने दिये हुए अनुग्रहों को ऐसे प्रतिफल देता है मानो वे हमसे उत्पन्न गुण हों।
एक और आपत्ति उठती है, जो सन्त क्राइसोस्टम की बताई जाती है: "यदि भला और बुरा चुनना हमारे वश में न होता, तो सब मनुष्य या तो सद्गुणी होते या दुष्ट, क्योंकि उनका स्वभाव एक ही है।" यह कथन "अन्यजातियों की बुलाहट" नामक पुस्तक के कथन से मेल खाता है, जो प्रायः सन्त अम्ब्रोस की ठहराई जाती है। उसमें यह बात कही गई है कि यदि परमेश्वर का अनुग्रह मनुष्य की इच्छा को परिवर्तनशील न बनाता, तो कोई भी विश्वास से न भटकता। मुझे आश्चर्य है कि ऐसे आदरणीय पुरुष कैसे भटक गए। क्राइसोस्टम परमेश्वर के चुनाव के उस तत्त्व को कैसे भूल गए जो मनुष्यों के बीच भेद करता है? यह मानना अनिवार्य है कि परमेश्वर का चुनाव ही लोगों को अलग करता है। जो बात सन्त पौलुस निश्चय के साथ कहता है, उसे स्वीकार करने में हमें हिचकना नहीं चाहिए: "सब भ्रष्ट हैं और दुष्टता के वश में कर दिए गए हैं।" फिर भी साथ ही हम उसके साथ यह भी मानते हैं कि परमेश्वर की दया कुछ लोगों की सहायता करती है, ताकि सब के सब भ्रष्टता में न रहें। चूँकि हम सब एक ही रोग से पीड़ित हैं, इसलिये केवल वे ही बच निकलते हैं जिनके लिये परमेश्वर उपचार आवश्यक ठहराता है। जिन्हें परमेश्वर के न्यायपूर्ण निर्णय ने त्याग दिया, वे अपनी दुष्टता में पड़े रहते हैं जब तक नाश न हो जाएँ। कुछ लोग क्यों टिके रहते हैं और कुछ क्यों लड़खड़ा जाते हैं, इसका कारण भी उसी स्रोत से निकलता है। अन्त तक स्थिर रहना स्वयं परमेश्वर का दान है, जो सब को बिना भेद के नहीं दिया जाता, परन्तु जिसे वह चाहता है उसे दिया जाता है। यदि कोई पूछे कि इस अन्तर का कारण क्या है, कि कुछ लोग क्यों टिकते हैं और कुछ क्यों डगमगाते हैं, तो सीधा उत्तर यह है: जो टिके रहते हैं, उन्हें परमेश्वर की सामर्थ्य सँभाले रखती है कि वे नष्ट न हों, जबकि दूसरों में यह सामर्थ्य नहीं होती, और वे मनुष्य की चंचलता के उदाहरण ठहरते हैं।
इसके अतिरिक्त एक और तर्क उठता है: "उपदेश और चेतावनियाँ व्यर्थ हैं, और डाँट-फटकार निष्फल है, यदि पापी उनका पालन करने में समर्थ नहीं।" जब ये आपत्तियाँ सन्त अगस्तीन के सामने आईं, तो उन्हें "डाँट और अनुग्रह के विषय में" नामक पुस्तक लिखनी पड़ी। यद्यपि उन्होंने इस विषय को विस्तार से सुलझाया, तथापि अन्त में वे उसका सार इस प्रकार देते हैं: "हे मनुष्य, जो आज्ञा दी गई है उससे अपना कर्तव्य जान, जिसे न करने पर तुझे डाँटा जाता है उससे अपनी कमियाँ पहचान, और जब तू परमेश्वर से प्रार्थना करे तो यह जान ले कि जिस वस्तु की तुझे आवश्यकता है, उसे किससे माँगना है।" इस मत का समर्थन केवल हम ही नहीं करते; मसीह और उसके प्रेरित भी इसे मानते हैं। इसलिये हमारे विरोधियों को ऐसे प्रबल विरोधियों के सामने खड़े होने में सावधान रहना चाहिए। यद्यपि मसीह कहता है कि "उसके बिना हम कुछ नहीं कर सकते" (यूहन्ना 15:5), तथापि वह अपने से बाहर के लोगों को उनके बुरे कामों के लिये डाँटता रहता है और हर एक को भले कामों के लिये उभारता है। सन्त पौलुस कुरिन्थियों को उनके प्रेम की कमी के लिये कड़ी फटकार लगाकर फिर परमेश्वर से बिनती करता है कि वह उन्हें प्रेम दे। वह रोमियों के सामने साक्षी देता है कि धार्मिकता मनुष्य की इच्छा या परिश्रम में नहीं वरन् परमेश्वर की दया से उत्पन्न होती है। फिर भी वह निरन्तर उन्हें चिताता, उभारता और सुधारता है। तो ये आपत्ति करनेवाले प्रभु से यह बिनती क्यों नहीं करते: "अपना परिश्रम व्यर्थ न कर, मनुष्यों से वह न माँग जो केवल तू ही दे सकता है, और अपने अनुग्रह के अभाव के कारण उनकी चूकों पर उन्हें न डाँट"? क्या वे सन्त पौलुस को यह नहीं समझा रहे कि वह उन्हें क्षमा करे जिनमें भला चाहने या करने की सामर्थ्य नहीं, सिवाय परमेश्वर की दया के, जो उनके चूकने पर उन्हें नहीं मिलती? परन्तु यह मूर्खता निराधार है, क्योंकि परमेश्वर की शिक्षा ठोस तर्क और गम्भीर विचार पर आधारित है।
सच तो यह है कि सन्त पौलुस दर्शाता है कि केवल शिक्षा, उपदेश और डाँट-फटकार में हृदय को बदलने की सामर्थ्य सीमित है। वह कहता है कि "न तो लगानेवाला कुछ है, न सींचनेवाला, परन्तु सारा प्रभाव प्रभु का है, जो बढ़ाता है" (1 कुरिन्थियों 3:7)। कोई पूछ सकता है, "तो फिर उपदेशों का प्रयोजन क्या है?" यदि हठीला मन इन उपदेशों की अवहेलना करे, तो वे उस व्यक्ति के विरुद्ध साक्षी ठहरते हैं और ईश्वरीय न्याय के समय प्रमाण बनते हैं। व्याकुल विवेक भी इसी जीवन में उभारा और विवश किया जाता है; वह इन उपदेशों का उपहास तो कर सकता है, परन्तु उन्हें दोषी नहीं ठहरा सकता। यदि कोई कहे, "जब अभागे पापी को आज्ञा मानने के लिये आवश्यक हृदय की प्रवृत्ति ही नहीं दी जाती, तो वह क्या करे?" तो मैं उत्तर देता हूँ: जब वे अपने हठ के लिये स्वयं ही उत्तरदायी हैं, तो वे बहाना कैसे बना सकते हैं? इसलिये यद्यपि दुष्ट चाहते हैं कि परमेश्वर की आज्ञाएँ और चेतावनियाँ भ्रम होतीं (यदि ऐसा हो सकता), तथापि वे चाहे न चाहें, इन शिक्षाओं और चेतावनियों की प्रभावशीलता उन्हें विवश करती है। आज्ञाओं और चेतावनियों की मुख्य उपयोगिता विश्वासियों के लिये मूल्यवान मानी जानी चाहिए। यद्यपि प्रभु सब कुछ अपने आत्मा के द्वारा पूरा करता है, तथापि वह उनके भीतर अपना कार्य करने के लिये अपने वचन का साधन काम में लाता है और उसे एक सामर्थी औज़ार के रूप में बरतता है। जब यह स्थापित हो जाए, जैसा होना भी चाहिए, कि धर्मियों की सामर्थ्य परमेश्वर के अनुग्रह में है, तो कोई पूछ सकता है: "उन्हें केवल पवित्र आत्मा से चलाए जाने के बदले अपना कर्तव्य निभाने के लिये क्यों प्रोत्साहित किया जाता है? उन्हें उपदेशों से क्यों उभारा जाता है, जब वे आत्मा के चलाने से अधिक तेज़ चल ही नहीं सकते? जब वे लड़खड़ाते हैं तो उन्हें सुधारा क्यों जाता है, जबकि वे अपने शरीर की निर्बलता के कारण अनिवार्य रूप से लड़खड़ाए?" इसका उत्तर यह है: तू कौन है जो परमेश्वर पर व्यवस्थाएँ थोपे? यदि परमेश्वर उपदेश के द्वारा हमें इस योग्य बनाना चाहता है कि हम उसके उपदेश को मानने के लिये आवश्यक अनुग्रह पाएँ, तो इस क्रम और रीति पर दोष लगाने या आलोचना करने का तेरे पास क्या आधार है? यदि उपदेश केवल विश्वासियों को उनके पापों का दोषी ठहराने का ही काम करें, तो भी उन्हें व्यर्थ नहीं ठहराना चाहिए। इन उपदेशों का बड़ा मूल्य है, क्योंकि वे हृदय में धार्मिकता के प्रति प्रेम जगाते और पाप के प्रति घृणा उत्पन्न करते हैं। जब पवित्र आत्मा इस बाहरी साधन को मनुष्यों के उद्धार के लिये काम में लाता है, तो कौन इन उपदेशों को अनावश्यक कहकर ठुकराने का साहस करेगा?
यदि कोई अधिक स्पष्ट उत्तर चाहे, तो मैं संक्षेप में निष्कर्ष दिये देता हूँ। परमेश्वर हमारे भीतर दो प्रकार से कार्य करता है: भीतर अपने आत्मा के द्वारा, और बाहर अपने वचन के द्वारा। अपने आत्मा से वह बुद्धि को प्रकाशित करता और हृदयों में धार्मिकता और निर्दोषता के प्रति प्रेम उपजाता है, और इस प्रकार मनुष्यों को नई सृष्टि बना देता है। अपने वचन से वह मनुष्यों को इस नवीनीकरण की लालसा और खोज के लिये उभारता और प्रेरित करता है। दोनों रीतियों में उसका सामर्थी हाथ प्रकट होता है, जैसा वह उचित समझता है। जब वह अपना वचन दुष्टों और निराश लोगों की ओर भेजता है, तो भले ही वह उन्हें सुधार की ओर न ले जाए, फिर भी उसका एक प्रयोजन है। अभी वह उनके विवेक पर दबाव डालता है, और न्याय के दिन उनके पास बहाने कम रह जाएँगे।
ये लोग यदि गुणवत्ता में हमें पराजित नहीं कर सकते, तो संख्या के बल से पराजित करने का यत्न करते हुए पवित्रशास्त्र की अनेक साक्षियाँ परिश्रम से इकट्ठी करते हैं। यह उस सेनापति के समान है जो युद्ध के लिये अप्रशिक्षित सेना जुटाकर शत्रु को डराना चाहता है। वे कार्रवाई में उतरने से पहले बड़ा प्रदर्शन करते हैं; परन्तु जब युद्ध छिड़ता है, तो पहली ही चुनौती पर तितर-बितर हो जाते हैं। इसलिये इन आपत्तियों को, जो केवल दिखावा और व्यर्थता हैं, ढा देना सरल होगा। इन आपत्तियों को वर्गों में बाँटा जा सकता है, और वर्गों में बाँट देने पर एक सम्पूर्ण उत्तर अनेक उदाहरणों को सन्तोषजनक रीति से सुलझा देगा। हर एक का अलग-अलग उत्तर देने की आवश्यकता नहीं। परमेश्वर की आज्ञाओं की एक लम्बी शृंखला बनाकर वे मनुष्य की सामर्थ्य को नापते हैं। वे तर्क करते हैं: "या तो परमेश्वर परिहास करता है जब वह पवित्रता, भक्ति, आज्ञाकारिता, शुद्धता, प्रेम और दयालुता जैसे गुणों की आज्ञा देता है, या वह केवल वही माँगता है जो हमारे सामर्थ्य में है।" परन्तु ये इकट्ठी की हुई आज्ञाएँ तीन वर्गों में आती हैं: कुछ परमेश्वर की ओर फिरने को उभारती हैं, कुछ व्यवस्था के पालन को प्रेरित करती हैं, और कुछ पाए हुए अनुग्रह में स्थिर रहने को प्रोत्साहित करती हैं।
विशेष बातों पर विचार करने से पहले हम इन वर्गों पर सामूहिक रूप से विचार करें। मैं मानता हूँ कि ईश्वरीय आज्ञाओं से मनुष्य की सामर्थ्य को नापने की प्रथा का ऐतिहासिक उदाहरण मिलता है, और पहली दृष्टि में यह युक्तिसंगत भी लगती है। फिर भी यह दृष्टिकोण गहरे अज्ञान से उपजा है। जो लोग यह सिद्ध करना चाहते हैं कि यदि मनुष्य द्वारा इन आज्ञाओं का पालन असम्भव है तो ये आज्ञाएँ पालन-योग्य हो ही नहीं सकतीं, वे दुर्बल तर्क देते हैं। वे कहते हैं कि अन्यथा व्यवस्था व्यर्थ दी गई होती। परन्तु सन्त पौलुस इसी विषय को सीधे सम्बोधित करता है। मैं पूछता हूँ, इन कथनों का क्या अर्थ है? "जहाँ पाप बढ़ा, वहाँ अनुग्रह उससे भी अधिक बढ़ गया" (रोमियों 5:20)। "व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है" (रोमियों 3:20)। व्यवस्था पाप को उत्पन्न करती है; वह अपराधों को बढ़ाती है (रोमियों 7:8)। इन वचनों का यह अर्थ नहीं कि व्यवस्था को व्यर्थ न होने के लिये हमारी सामर्थ्य के अनुरूप होना चाहिए। सन्त पौलुस इन वचनों से यह दिखाता है कि परमेश्वर वह आज्ञा देता है जो हमारी सामर्थ्य से परे है, ताकि हमारी जन्मजात असमर्थता प्रकट हो।
यदि पवित्रशास्त्र केवल यही कहता कि व्यवस्था जीवन का मानक है, जिससे हमारे कामों को मापा जाए, तो मैं सहर्ष सहमत होता। परन्तु चूँकि पवित्रशास्त्र अपने अनेक उपयोग बताता है, इसलिये हमें अपनी कल्पना के बदले इसी व्याख्या पर टिके रहना चाहिए। जहाँ व्यवस्था हमारे कर्तव्य निर्धारित करती है, वहीं वह यह भी बल देकर कहती है कि आज्ञा मानने की सामर्थ्य परमेश्वर के अनुग्रह से आती है। इस प्रकार वह हमें प्रार्थना में अनुग्रह माँगना सिखाती है। आज्ञाओं के साथ प्रतिज्ञाओं का होना इस बात को रेखांकित करता है कि हम परमेश्वर की सहायता पर निर्भर हैं। ये प्रतिज्ञाएँ प्रकट करती हैं कि हमारी सामर्थ्य केवल उसके अनुग्रह से है, और निस्सन्देह यह दर्शाती हैं कि हमारी केवल अपर्याप्तता ही नहीं, वरन् व्यवस्था को पूरा करने में हमारी पूर्ण असमर्थता है। हम इस बात में न उलझें कि हमारी शक्ति और परमेश्वर की आज्ञाओं के बीच अनुपात क्या है, मानो परमेश्वर ने जो धार्मिकता प्रदान की है उसे हमारी सीमाओं के अनुसार ढाला हो। इसके बजाय प्रतिज्ञाएँ हमें हमारी अपर्याप्तता की स्मृति दिलाएँ, और उसके अनुग्रह की हमारी निरन्तर आवश्यकता को उजागर करें।
वे पूछते हैं, "परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था किसे दी? क्या तुम कहना चाहते हो कि लकड़ी और पत्थर जैसी निर्जीव वस्तुओं को?" मैं उत्तर देता हूँ, कोई ऐसा नहीं कहता, क्योंकि दुष्ट न लकड़ी हैं न पत्थर। परमेश्वर की व्यवस्था से सामना होने पर वे, यह जानकर कि उनकी अभिलाषा परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करती है, अपने विवेक में दोषी ठहरते हैं। उसी प्रकार जब विश्वासियों को उनकी निर्बलता का बोध कराया जाता है, तो वे परमेश्वर के अनुग्रह की शरण लेते हैं। सन्त अगस्तीन के इन शब्दों का क्या कहना: "परमेश्वर वह आज्ञा देता है जो हम पूरी नहीं कर सकते, ताकि हम जान लें कि हमें उससे क्या माँगना चाहिए।" और, "आज्ञाएँ अत्यन्त उपयोगी हैं यदि वे परमेश्वर के अनुग्रह का आदर करें।" और, "व्यवस्था जो आज्ञा देती है, उसे विश्वास प्राप्त करता है।" "परमेश्वर हम से विश्वास माँगता है, और जो वह खोजता है वह उसे तब तक नहीं पाता जब तक कि उसने उसे पहले हमारे भीतर न रखा हो।" "परमेश्वर वही दे जो वह आज्ञा देता है, और वही आज्ञा दे जो वह चाहता है।"
आज्ञाओं की इन तीन श्रेणियों की जाँच करने पर हमारा तर्क स्पष्ट हो जाता है। अपनी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के लेखों में प्रभु बार-बार हमें अपनी ओर फिरने का आग्रह करता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता दूसरे पक्ष से उत्तर देते हैं: "मुझे फेर दे, हे प्रभु, तो मैं फिर जाऊँगा। क्योंकि तेरे फेरने के बाद मैंने पश्चाताप किया" (यिर्मयाह 31:18)। वह हृदयों के खतने की आज्ञा देता है (यिर्मयाह 4:4), फिर भी मूसा साक्षी देता है कि यह खतना वह स्वयं करता है (व्यवस्थाविवरण 30:6)। वह बार-बार मनुष्यों को नया हृदय पाने की आज्ञा देता है, और साथ ही साक्षी देता है कि हृदय को नया वही करता है (यहेजकेल 11:19; 36:26; यिर्मयाह 31:33)। तो जो लोग परमेश्वर की आज्ञाओं का हवाला देकर मनुष्य की सामर्थ्य का बखान करते हैं और परमेश्वर के उस अनुग्रह को सीमित करते हैं जो आज्ञा-पालन को सम्भव बनाता है, वे अब क्या कहेंगे?
दूसरी श्रेणी में सीधी आज्ञाएँ आती हैं: परमेश्वर का आदर करना, उसकी इच्छा पर चलना, उसकी आज्ञाओं का पालन करना और उसकी शिक्षाओं पर ध्यान देना। असंख्य साक्षियाँ दर्शाती हैं कि सारी धार्मिकता, पवित्रता, भक्ति और शुद्धता परमेश्वर के सेंत-मेंत दिये हुए दान हैं।
तीसरी श्रेणी सन्त पौलुस और सन्त बरनबास के उस उपदेश में दिखाई देती है कि परमेश्वर के अनुग्रह में बने रहो (प्रेरितों के काम 13:43)। अन्यत्र सन्त पौलुस इस सामर्थ्य के स्रोत पर बल देते हुए चिताता है: "अन्त में, प्रभु में बलवन्त बनो" (इफिसियों 6:10)। वह पवित्र आत्मा को शोकित न करने की भी चेतावनी देता है, जिसके द्वारा हम छुटकारे के दिन के लिये मुहर लगाए गए हैं (इफिसियों 4:30)। फिर भी जिस बात की आज्ञा वह अन्यत्र देता है, उसी को वह प्रार्थना के द्वारा प्रभु से माँगता है, यह मानते हुए कि वह मनुष्य की सामर्थ्य में नहीं है। वह प्रभु से बिनती करता है कि वह थिस्सलुनीकियों को अपनी बुलाहट के योग्य ठहराए और उनमें अपनी भली इच्छा को पूरा करे (2 थिस्सलुनीकियों 1:11)। कुछ लोग अपनी भ्रान्त धारणाओं से उत्साहपूर्वक चिपके रहकर इन साक्षियों को चुनौती देते हैं। वे तर्क देते हैं कि ये साक्षियाँ इस सम्भावना को नहीं नकारतीं कि हमारी निर्बलताओं को दूर करने के लिये मनुष्य का प्रयास परमेश्वर के अनुग्रह के साथ जोड़ा जाए। वे भविष्यद्वक्ताओं के ऐसे अंश प्रस्तुत करते हैं जिनमें परमेश्वर मानो मन-फिराव का उत्तरदायित्व अपने और हमारे बीच बाँट देता है, जैसे, "मेरी ओर फिरो, तो मैं भी तुम्हारी ओर फिरूँगा" (जकर्याह 1:3; मलाकी 3:7)। परमेश्वर से मिलनेवाली सहायता के विषय में हम पहले कह चुके हैं, और इस सन्दर्भ में उस विषय को फिर उठाना अनावश्यक होगा।
यहाँ ध्यान इस बात को प्रकट करने पर है कि केवल इसलिये कि परमेश्वर आज्ञा-पालन का आदेश देता है, मनुष्यों को व्यवस्था पूरी करने की सामर्थ्य का श्रेय देना व्यर्थ है। यह प्रकट है कि उसकी आज्ञाओं को पूरा करने के लिये परमेश्वर का अनुग्रह अनिवार्य है, और इसी उद्देश्य से उसकी प्रतिज्ञा की गई है। रहा पहले उल्लिखित अंश, वह उनकी भ्रान्ति की पुष्टि नहीं करता। परमेश्वर का "फिरना" उस अनुग्रह को नहीं दर्शाता जो हमारे हृदयों को धर्मी जीवन के लिये नया करता है; वरन् वह उसकी भलाई और प्रेम को सूचित करता है, समृद्धि को व्यक्त करता है, और यह पुष्टि करता है कि धर्मी जीवन की ओर लौटकर हम उसके निकट आते हैं जो स्वयं धार्मिकता है। इसलिये इस अंश को तोड़-मरोड़कर यह तर्क देना कि हमारा मन-फिराव परमेश्वर और हमारे बीच बँटा हुआ है, भूल है। इस विषय की और गहरी जाँच आवश्यक है, जो हम व्यवस्था-सम्बन्धी अध्याय में करेंगे।
दूसरा समूह पहले के समान ही है। वे ऐसी प्रतिज्ञाएँ सामने लाते हैं जो मानो यह जताती हैं कि परमेश्वर हमारी इच्छा से सहमत है। ऐसे अंशों में ये हैं: "भलाई को ढूँढ़ो, बुराई को नहीं, तब तुम जीवित रहोगे" (आमोस 5:14); "यदि तुम इच्छुक होकर आज्ञा मानो, तो भूमि की उत्तम उपज खाओगे; परन्तु यदि तुम इनकार करो और बलवा करो, तो तलवार से नाश किए जाओगे" (यशायाह 1:19–20); "हे इस्राएल, यदि तू लौटे, तो यहोवा की यह वाणी है, कि मेरे ही पास लौट आ" (यिर्मयाह 4:1); "यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात ध्यान से सुने, और उसकी सब आज्ञाओं को चौकसी से माने... तो तू नगर में धन्य होगा और खेत में भी धन्य होगा" (व्यवस्थाविवरण 28:1; लैव्यव्यवस्था 26:3), और इन्हीं के समान अन्य वचन। उनका तर्क यह है कि यदि ये बातें हमारी इच्छा पर छोड़ी गईं और उनका पूरा होना हमारे वश में न हुआ, तो परमेश्वर परिहास कर रहा होगा। उनकी बात में शिष्ट करुणा का पुट है। कोई यह निष्कर्ष निकाल सकता है: "यह परमेश्वर के लिये अन्यायपूर्ण होगा कि वह कहे कि उसके अनुग्रह में हमारी स्थिति केवल हम पर निर्भर है कि हम उससे सब भलाई पाएँ, जब कि हममें ऐसा करने की सामर्थ्य ही नहीं। इस प्रकार अप्राप्य आशीषें प्रस्तुत करना उसकी प्रतिज्ञाओं को निरर्थक बना देगा।" सार यह कि वे कह सकते हैं कि यदि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ किसी असम्भव बात पर टिकी हों, तो वे विश्वसनीय नहीं ठहरतीं।
जहाँ तक उन प्रतिज्ञाओं का प्रश्न है जो अप्राप्य शर्तों से जुड़ी हैं, उनका विवेचन आगे होगा, जिससे प्रकट होगा कि असम्भव होने पर भी उनमें कोई बेतुकापन नहीं है।
प्रस्तुत सन्दर्भ में मैं इस धारणा को अस्वीकार करता हूँ कि प्रभु हमें अपने अनुग्रहों और आशीषों के योग्य बनने को कहकर निर्दयता या अमानवीयता दिखाता है, जबकि वह जानता है कि हममें ऐसा करने की सामर्थ्य नहीं। प्रतिज्ञाएँ विश्वासियों और भटके हुओं, दोनों के लिये हैं, और दोनों को लाभ पहुँचाती हैं। जैसे प्रभु की आज्ञाएँ दुष्टों के विवेक को कोंचती और जगाती हैं, ताकि वे उसके न्याय को लापरवाही से न ठुकराएँ, वैसे ही उनके प्रति प्रतिज्ञाएँ यह रेखांकित करती हैं कि वे उसकी भलाई के अयोग्य हैं। क्या यह परमेश्वर के लिये उचित नहीं कि जो उसका आदर करें उन्हें प्रतिफल दे और जो उसकी महिमा को तुच्छ जानें उन्हें दण्ड दे? अतः परमेश्वर उचित ही दुष्टों के सामने, जो पाप के जुए में जकड़े हैं, ये शर्तें रखता है। जब वे अपने पापमय मार्गों को छोड़ें, तब वह आशीष देने की प्रतिज्ञा करता है। यदि केवल यही कारण होता, तब भी परमेश्वर यह दिखाने के लिये ऐसा करता है कि दुष्टों को उन आशीषों से बाहर रखा जाना चाहिए जो उसके सेवकों के लिये ठहराई गई हैं। इसके अतिरिक्त, अपने विश्वासियों को अपने अनुग्रह की लगन से खोज करने के लिये उभारने में, यदि वह प्रतिज्ञाओं में वही रीति अपनाता है जो उसने पहले आज्ञाओं में दिखाई, तो इसमें आश्चर्य नहीं। जहाँ उसकी आज्ञाएँ हमें उसकी इच्छा बताती, हमारी अपूर्णताओं को उजागर करती और हमें उसके आत्मा से मार्गदर्शन की बिनती करने को उभारती हैं, वहाँ ये प्रतिज्ञाएँ अपनी कोमलता से उसकी आज्ञाओं के प्रति प्रेम को प्रज्वलित करती हैं। हमारा हृदय जितना धार्मिकता को अपनाता है, उतनी ही उत्कटता से हम परमेश्वर के अनुग्रह की खोज करते हैं। इसलिये उद्धृत कथनों के द्वारा परमेश्वर न तो हमें वह कर सकने की सामर्थ्य का श्रेय देता है जो वह कहता है, और न हमारी निर्बलता का उपहास करता है। वरन् ये कथन उसके सेवकों को लाभ पहुँचाते और दुष्टों के बहाने छीन लेते हैं।
उनके तर्कों के तीसरे समूह में पिछले समूहों से कुछ समानताएँ हैं। वे ऐसे अंश प्रस्तुत करते हैं जहाँ परमेश्वर इस्राएल के लोगों से कहता है कि उनकी दशा केवल उनके चुनावों पर निर्भर है। उदाहरण के लिये उसने कहा: "अमालेकी और कनानी तुम्हारे ठीक सामने हैं, और तुम उनकी तलवार से मारे जाओगे, क्योंकि तुम यहोवा से फिर गए हो" (गिनती 14:43)। और, "इसलिये कि मैंने बुलाया और तुमने उत्तर न दिया, मैं तुम्हें वैसे ही नाश करूँगा जैसे मैंने शीलो को किया" (यिर्मयाह 7:13–14)। और, "इन लोगों ने अपने परमेश्वर की बात नहीं मानी और शिक्षा ग्रहण नहीं की। सच्चाई नष्ट हो गई है; वह उनके मुँह से मिट गई है" (यिर्मयाह 7:28–29)। अन्त में, "तुमने अपने पुरखाओं से भी बढ़कर बुराई की है, क्योंकि तुम में से हर एक अपने हठीले और बुरे मन की इच्छा पर चलता है और मेरी नहीं सुनता। इसलिये मैं तुम्हें इस देश से निकालकर ऐसे देश में फेंक दूँगा जिसे तुम नहीं जानते" (यिर्मयाह 16:12–13)। वे पूछते हैं: "ये अभियोग उन लोगों पर कैसे लागू होते हैं जो उत्तर दे सकते हैं, 'हम समृद्धि चाहते थे और विपत्ति से डरते थे। प्रभु की आज्ञा न मानने और उसकी वाणी न सुनने का, जिससे हम दुर्भाग्य से बचते और आशीषें पाते, कारण पाप में हमारी बन्दी दशा है। यह परमेश्वर के लिये अन्याय है कि जो विपत्तियाँ हम पर पड़ती हैं, जो हमारे वश के बाहर हैं, उनका दोष हम पर लगाए!'" अनिवार्यता के इस तुच्छ और निराधार बहाने को एक ओर रख दें, तो क्या वे अपने आपको दोष से मुक्त कर सकते हैं? यदि वे अपनी चूकें मान लें, तो परमेश्वर का यह कहना निराधार नहीं कि उनकी समृद्धि का अभाव उनकी कुटिलता का फल है। मुझे और पूछने दें: क्या वे इनकार कर सकते हैं कि उनके अपराधों का स्रोत उनकी भ्रष्ट इच्छा है? यदि वे बुराई के इस भीतरी उद्गम को मानते हैं, तो वे बाहरी कारणों की खोज क्यों करते हैं, उत्तरदायित्व टालने का यत्न करते हुए, अपने ही विनाश के विषय में निर्दोष होने का ढोंग क्यों करते हैं?
यदि सचमुच यह सत्य है कि पापी अपनी ही अधर्मिता से परमेश्वर की आशीषों से वंचित किए जाते और उसके दण्ड के अधीन होते हैं, तो ये अभियोग उचित ही अपना स्थान पाते हैं। यदि वे अपनी दुष्टता में बने रहें, तो इन फटकारों से वे सीख सकते हैं कि अपने दुःख का कारण परमेश्वर की कथित कठोरता पर दोष लगाने के बदले अपने अपराधों को ठहराएँ। यदि वे पूरी तरह कठोर नहीं हो गए हैं, और भीतर सीखने का मन बनाए रखें, तो वे पहचान सकते हैं कि उनके पापों का कलंक ही उनकी विपत्ति का मूल कारण है। तब अपने अपराधों के प्रति अप्रसन्नता और घृणा से प्रेरित होकर वे भलाई के मार्ग पर लौट सकते हैं। इसमें यह भी सम्मिलित होगा कि वे परमेश्वर की फटकार को सच्ची और विश्वसनीय स्वीकार करें। विश्वासी दानिय्येल की प्रार्थना से सीख सकते हैं कि ऐसे वचन इस उद्देश्य को प्रभावी रीति से पूरा करते थे (दानिय्येल 9:4 आगे)। पहला लाभदायक परिणाम यहूदियों में देखा जा सकता है। परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार यिर्मयाह ने उन पर उनके संकट का स्रोत प्रकट किया (यिर्मयाह 7:13)। परन्तु हम स्मरण रखें कि परमेश्वर के पूर्व-कथन के बिना कुछ नहीं होता। उसका यह पहले से बता देना कि वह अपना सन्देश भेजेगा और वे उसकी अवहेलना करेंगे, और उन्हें बुलाएगा और वे अनसुना करेंगे, सच ठहरता है (यिर्मयाह 7:27–28)। कोई प्रतिवाद कर सकता है: "बहरों से बात करने का क्या प्रयोजन?" प्रयोजन यह है कि उनके भ्रम के होते हुए भी वे सत्य को जान लें। उन विपत्तियों के लिये परमेश्वर को दोषी ठहराना घोर पवित्र-निन्दा है जो उन्हीं के भीतर से उत्पन्न होती हैं। इन तीन रीतियों से, परमेश्वर के अनुग्रह के विरोधी पापियों के प्रति आज्ञाओं, प्रतिज्ञाओं और चेतावनियों से जो साक्षियों की अनन्त पंक्ति इकट्ठी करते हैं, वह सँभालने योग्य हो जाती है। ये विरोधी, जो मनुष्य में स्वतंत्र इच्छा की धारणा स्थापित करने का यत्न करते हैं, जो अप्राप्य है, इन निष्कर्षों से रोके जा सकते हैं।
फिर भी ये लोग मूसा की व्यवस्था से एक साक्षी प्रस्तुत करते हैं जो हमारे पहले के निष्कर्ष के विरुद्ध प्रतीत होती है। व्यवस्था सुनाने के बाद मूसा ने लोगों के सामने कहा, "यह आज्ञा जो मैं आज तुझे सुनाता हूँ, वह तेरे लिये न तो कठिन है, और न दूर है... परन्तु यह वचन तेरे बहुत निकट है। यह तेरे मुँह में और तेरे हृदय में है, ताकि तू इसे माने" (व्यवस्थाविवरण 30:11, 14)। यदि ये शब्द केवल आज्ञाओं के लिये कहे गए होते, तो मैं मानता हूँ कि उनका उत्तर देना कठिन होता। यद्यपि कोई कह सकता है कि ये शब्द आज्ञाओं को समझने की सामर्थ्य के विषय में हैं, न कि उन्हें पूरा करने के, फिर भी शंकाएँ बनी रहती हैं। परन्तु हमारे पास एक विश्वसनीय व्याख्याकार है जो सब अस्पष्टता को मिटा देता है, अर्थात् सन्त पौलुस। वह समझाता है कि मूसा ने सुसमाचार की शिक्षाओं का उल्लेख किया था (रोमियों 10:6–8)। यदि कोई हठीला मनुष्य कहे कि सन्त पौलुस ने अंश के स्वाभाविक अर्थ को तोड़-मरोड़कर सुसमाचार से मिला दिया (ऐसा कथन सहन करने योग्य नहीं), तो हम प्रेरित की व्याख्या का बचाव कर सकते हैं। यदि मूसा ने केवल आज्ञाओं के विषय में कहा होता, तो वह लोगों को झूठे भरोसे से धोखा देता। यदि वे व्यवस्था को सरल मानकर अपनी ही शक्ति से उसका पालन करने का यत्न करते, तो अपने नाश के सिवा और क्या कर सकते थे? मानव स्वभाव की जन्मजात निर्बलता और हमारे गिर पड़ने की प्रवृत्ति को देखते हुए, व्यवस्था को थामे रखने की सामर्थ्य हमें कहाँ मिलती है? यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि मूसा ने इन शब्दों को उस दया की वाचा के प्रकाश में समझा जो उसने व्यवस्था के द्वारा स्थापित की। सुसमाचार में दिये गये उद्धार पर विचार करते हुए, मूसा ने उन कठोर, कठिन, बल्कि अप्राप्य शर्तों के स्थान पर, जो व्यवस्था ने ठहराईं, एक और मार्ग देखा। इसलिये सन्त पौलुस इस साक्षी को परमेश्वर की दयालु भेंट पर बल देने के लिये प्रयोग करता है, जिससे यह साक्षी मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा की धारणा को प्रमाणित करने के लिये अपर्याप्त ठहरती है।
कुछ और अंश भी प्रायः उद्धृत किए जाते हैं, जो ऐसे अवसरों को दर्शाते हैं जब परमेश्वर कुछ समय के लिये अपना अनुग्रह रोक लेता है कि देखे मनुष्य कौन-सी दिशा चुनते हैं। उदाहरण के लिये होशे घोषणा करता है: "मैं फिर अपने स्थान को लौट जाऊँगा, जब तक वे अपना दोष मानकर मेरे दर्शन के खोजी न हों" (होशे 5:15)। वे कहते हैं, "प्रभु के लिये मनुष्यों की गतिविधि पर विचार करना बेतुका होगा, जब तक कि उनके हृदयों में अपनी ही इच्छा से प्रेरित होकर झुकने की सामर्थ्य न हो।" ऐसी धारणा इस बात को अनदेखा करती है कि परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बार-बार घोषणा करता है कि वह अपने लोगों को निकाल देगा और त्याग देगा जब तक वे अपने मार्ग न सुधारें। जो तर्क वे प्रस्तुत करना चाहते हैं, उसे परखें। यदि वे कहें कि परमेश्वर से त्यागे हुए मनुष्य अपने आपको सुधार सकते हैं, तो सारा पवित्रशास्त्र उनका खण्डन करता है। यदि वे मान लें कि मनुष्य के मन-फिराव के लिये परमेश्वर का अनुग्रह अनिवार्य है, तो ये अंश हमारे विरुद्ध उनके काम नहीं आते। फिर भी वे कह सकते हैं कि वे मनुष्य की सामर्थ्य के साथ अनुग्रह की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। परन्तु उनका प्रमाण इन अंशों या इनके समान अंशों से नहीं मिलता। ये अंश दो स्पष्टतः भिन्न विषयों की चर्चा करते हैं: उनके आगे के कामों को देखने के लिये ईश्वरीय अनुग्रह का कुछ समय के लिये हटा लिया जाना, और मनुष्य की निर्बलता को थामना ताकि उसकी सीमित शक्ति को बल मिले।
उनके इस प्रश्न के उत्तर में, "ऐसी अभिव्यक्तियों का क्या अर्थ है?" मैं समझाता हूँ: उनका वही महत्त्व है मानो परमेश्वर कह रहा हो, "चूँकि यह हठीली प्रजा मेरी सम्मति, उपदेशों और फटकारों पर ध्यान नहीं देती, मैं कुछ समय के लिये हट जाऊँगा। मेरे मौन के समय मैं उन पर विपत्ति पड़ने दूँगा। इस प्रकार मैं देखूँगा कि दीर्घ क्लेश सहने के बाद वे मुझे स्मरण करते और पूरे मन से मेरी उपस्थिति को खोजते हैं या नहीं।" समझ लो कि जब कहा जाता है कि परमेश्वर "हट जाता है", तो उसका अर्थ है कि वह अपना ईश्वरीय वचन उठा लेता है। जब कहा जाता है कि वह अपनी अनुपस्थिति में उनके कामों को "देखता है", तो उसका अर्थ है कि वह अपनी उपस्थिति प्रकट किए बिना उन्हें ताड़ना देता है। यह दुहरी रीति हमें दीन बनाने के लिये है। यदि उसका आत्मा हमें शिक्षा ग्रहण करने योग्य न बनाता, तो उसकी ताड़नाएँ और दण्ड बिना रोक-टोक के हमारे सुधार के बदले हमारे पूर्ण विनाश की ओर ले जाते। इसलिये यह निष्कर्ष निराधार है कि मनुष्य में परमेश्वर की ओर फिरने की सामर्थ्य है, इस आधार पर कि परमेश्वर हमारे हठीले हृदयों से अप्रसन्न होकर अपना वचन, जिसके द्वारा वह अपनी उपस्थिति जताता है, रोक लेता है और अपनी अनुपस्थिति में हमारे कामों को देखता है। ये काम केवल यह प्रकट करने के लिये हैं कि हमारी सामर्थ्य है ही नहीं।
एक और तर्क उस प्रचलित भाषा से उठता है जो न केवल मनुष्यों द्वारा, वरन् पवित्रशास्त्र में भी बरती जाती है। भले कामों को "हमारे" कहा जाता है, और जैसे हम "बुराई करते हैं", वैसे ही कहा जाता है कि हम "भलाई करते हैं।" वे तर्क देते हैं, "यदि पाप ठीक ही हमारे ठहराए जाते हैं क्योंकि वे हम से उत्पन्न होते हैं, तो उसी तर्क से भले कामों का श्रेय भी हमें मिलना चाहिए। यह कहना असंगत है कि चूँकि हम उन्हें अपने बल से नहीं कर सकते, इसलिये हम निर्जीव पत्थरों के समान हैं जिन्हें परमेश्वर के प्रभाव से हमारे कामों में चलाया जाता है।" इसलिये वे निष्कर्ष निकालते हैं, "यद्यपि परमेश्वर का अनुग्रह मुख्य शक्ति बना रहता है, ऐसे वाक्यांश सूचित करते हैं कि हममें भलाई की जन्मजात सामर्थ्य है।" केवल पहली आपत्ति का सामना करते हुए, अर्थात् कि भले काम हमारे ठहराए जाते हैं, मैं यों उत्तर दूँगा: दैनिक भोजन, वह रोटी जो हम परमेश्वर से माँगते हैं कि हमें दे, उसे हम "हमारी" कहते हैं (मत्ती 6:11; लूका 11:3)। इस शब्द का केवल यही अर्थ लिया जा सकता है कि जो बिना कमाए है, वह परमेश्वर की असीम कृपा से हमारा हो जाता है। इसलिये उन्हें या तो हमारे प्रभु पर ऐसे वाक्यांश बरतने का दोष लगाना होगा, या भले कामों को "हमारे" कहे जाने पर अपना आश्चर्य छोड़ना होगा, भले ही उसमें हमारा योगदान अत्यल्प है और केवल परमेश्वर की उदारता से सम्भव हुआ है।
परन्तु उनका अगला तर्क अधिक विचार का पात्र है। वे कहते हैं, "पवित्रशास्त्र प्रायः कहता है कि विश्वासी परमेश्वर की सेवा करते हैं, उसकी धार्मिकता को थामे रहते हैं, उसकी व्यवस्था का पालन करते हैं और भलाई में लगे रहते हैं। चूँकि ये कार्य मानव बुद्धि और इच्छा के अपने उत्तरदायित्व हैं, तो हम ऐसे गुणों का श्रेय परमेश्वर के आत्मा और अपने आपको, दोनों को कैसे दे सकते हैं, जब तक कि हमारी सामर्थ्य और परमेश्वर के अनुग्रह के बीच कोई सम्बन्ध न हो?" इन तर्कों का प्रभावी उत्तर देने के लिये हमें ठीक-ठीक समझना होगा कि परमेश्वर अपने सेवकों में किस रीति से कार्य करता है। सबसे पहले, उनका चुना हुआ रूपक यहाँ लागू नहीं होता। कौन यह सोच सकता है कि मनुष्यों को परमेश्वर उसी प्रकार चलाता है जैसे कोई पत्थर फेंकता है? यह भावना हमारे सिद्धान्त से मेल नहीं खाती। हम मानते हैं कि मनुष्य में स्वीकार करने, ठुकराने, चाहने, रुकने, यत्न करने और विरोध करने की स्वाभाविक सामर्थ्य है, अर्थात् व्यर्थता को स्वीकार करने, सच्ची भलाई को ठुकराने, बुराई को चाहने, भलाई की इच्छा से रुकने, पाप को अपनाने का यत्न करने और धार्मिकता का विरोध करने की। इन कामों में प्रभु कहाँ तक सम्मिलित है? यदि वह मनुष्य की कुटिलता को अपने क्रोध का साधन बनाए, तो वह उसे अपनी इच्छा के अनुसार ढालता और चलाता है, और एक दुष्ट हाथ को अपने धर्ममय और भले कामों को पूरा करने के लिये प्रयोग करता है। तो क्या हम ऐसे दुष्ट मनुष्य को, जो इस रूप में परमेश्वर की सेवा करता है, यद्यपि उसका अपना अभिप्राय दुष्टता में लिप्त होना है, किसी निश्चल पत्थर के समान मानें? इन धारणाओं के बीच जो अन्तर हैं, वे अकाट्य हैं।
तब हमारा विचार धर्मी जनों की ओर मुड़ता है, जो गहरी जाँच के योग्य हैं। जब प्रभु उनके भीतर अपना राज्य स्थापित करना चाहता है, तो वह उनकी इच्छा को रोकता और शासित करता है ताकि वह उच्छृंखल आवेगों के आगे झुक न जाए। यह उनकी जन्मजात प्रवृत्तियों के विपरीत है। साथ ही वह उनकी इच्छा को ढालता है, उसे अपनी धार्मिकता के दिशासूचक के अनुसार मोड़ता और चलाता है, और उसमें पवित्रता और शुद्धता की लालसा जगाता है। अन्त में वह अपने आत्मा की सामर्थ्य से उनकी इच्छा को दृढ़ और पक्का करता है कि वह स्थिर और अडिग रहे। यह जटिल प्रक्रिया दर्शाती है कि परमेश्वर का अनुग्रह मानव इच्छा के लिये मार्गदर्शक और लगाम के समान कार्य करता है, उसे चलाता और शासित करता है। इच्छा को शासित करने के लिये उसे सुधारना, नया रूप देना और नवीकृत करना आवश्यक है। इसका अर्थ है कि हमारे नए जन्म का आरम्भ हमारी स्वाभाविक प्रवृत्तियों का उन्मूलन है। इसके अतिरिक्त, इच्छा को सुधारने के लिये उसे मार्ग दिखाना, उभारना, दिशा देना और थामे रखना आवश्यक है। इसलिये हम कहते हैं कि इच्छा से निकलनेवाले सब काम केवल उसी से उत्पन्न होते हैं। फिर भी हम सन्त अगस्तीन के इस ज्ञानपूर्ण कथन को नहीं नकारते: "परमेश्वर का अनुग्रह हमारी इच्छा को नष्ट नहीं करता, वरन् उसे पुनःस्थापित करता है।" ये कथन पूर्ण रूप से मेल खाते हैं। यह कहना कि मानव इच्छा पुनःस्थापित की जाती है, यह दर्शाता है कि उसकी जन्मजात अधर्मिता के सुधारे जाने के बाद उसे फिर से व्यवस्थित किया जाता और धार्मिकता की दिशा में मोड़ा जाता है। तब वह भलाई और शुद्धता की ओर निर्देशित होती है। यह पुनःस्थापन मनुष्य में एक नई इच्छा उत्पन्न करता है, क्योंकि जन्मजात इच्छा इतनी गहराई से दूषित है कि पूर्ण नवीनीकरण अनिवार्य हो जाता है। अन्त में, हमें यह कहने में कोई बाधा नहीं दिखती कि परमेश्वर का आत्मा हमारे भीतर जो काम करता है, वही काम हम करते हैं, यद्यपि हम अपनी जन्मजात शक्ति से उसके अनुग्रह के साथ सक्रिय रूप से सहयोग नहीं करते। इसके दो कारण हैं। पहला, परमेश्वर हमारे भीतर जो कुछ करता है, उसे वह स्वभावतः हमारा ठहराना चाहता है, इस समझ के साथ कि वह हमारे किए का फल नहीं है। दूसरा, हमारी जन्मजात बुद्धि, इच्छा और संकल्प भलाई की ओर निर्देशित होते और उत्तम प्रयोजनों के लिये काम में लाए जाते हैं, जो हमारे स्वाभाविक स्वभाव से मिला गुण है।
अन्य आपत्तियाँ, जो वे विभिन्न स्रोतों से लेते हैं, विवेकी निर्णय रखनेवालों को विचलित न करेंगी, विशेषकर यदि इन उलझनों के पहले दिये गए समाधान भली-भाँति स्मरण हों। वे उत्पत्ति के एक अंश का हवाला देते हैं: "उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तू उस पर प्रभुता करेगा" (उत्पत्ति 4:7), और उसे पाप के सम्बन्ध में समझते हैं। वे प्रस्तावित करते हैं कि परमेश्वर ने कैन से प्रतिज्ञा की कि यदि वह उसे जीतने की इच्छा दिखाए, तो अपने हृदय में पाप को वश में करने का अधिकार उसे मिलेगा। इसके विपरीत हम कह सकते हैं कि यह कथन हाबिल पर अधिक उपयुक्त बैठता है। इस प्रसंग में परमेश्वर उस घृणा को डाँटना चाहता है जो कैन अपने भाई के लिये रखता था, जो दो बातों से भड़की थी। पहली, कैन ने अपने आपको धोखा दिया कि परमेश्वर के सामने उसका स्थान उसके भाई से ऊँचा होना चाहिए, यह भूलकर कि परमेश्वर केवल धार्मिकता और खराई को मान देता है। दूसरी, उसने परमेश्वर की दी हुई आशीषों के प्रति ऐसी कृतघ्नता दिखाई कि वह अपने उस भाई से बैर रखने लगा जो उसकी देखरेख में सौंपा गया था। फिर भी, निष्पक्षता के लिये, और इस दिखावे से बचने के लिये कि हम विरोधी व्याख्याओं से कतरा रहे हैं, मान लें कि परमेश्वर पाप की ओर संकेत करता है। तब भी आधार-वाक्य वही रहता है: परमेश्वर का सम्बोधन कैन के लिये एक उपदेश है, जो उसका कर्तव्य बताता है, उसकी सामर्थ्य नहीं, भले ही वह उसे अप्राप्य पाए। वे प्रेरित की घोषणा से भी अपने पक्ष को दृढ़ करते हैं कि "यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु परमेश्वर की दया की बात है" (रोमियों 9:16)। इसलिये वे निष्कर्ष निकालते हैं कि परमेश्वर की दया के साथ-साथ मानव इच्छा और प्रयास का भी अस्तित्व है। परन्तु यदि वे इस अंश के सन्दर्भ पर विचारपूर्वक मनन करें, तो इसकी धारणाओं को सरलता से लागू करना बन्द कर देंगे। मैं मानता हूँ कि वे अपनी व्याख्या की पुष्टि के लिये ओरिजन और सन्त जेरोम पर निर्भर हो सकते हैं। फिर भी ध्यान इस पर होना चाहिए कि हम समझें सन्त पौलुस का आशय क्या है: कि उद्धार केवल परमेश्वर की दया से आता है। जिन्हें उसके चुनाव ने छोड़ दिया, उनके लिये विनाश और अव्यवस्था है। यह बात फ़िरौन की कथा से दर्शाई गई है, जो त्यागे हुओं का प्रतीक है (रोमियों 9:17)। सन्त पौलुस मूसा की साक्षी से विश्वासियों के अटल और सेंत-मेंत चुनाव पर भी बल देता है, "मैं जिस पर दया करने से प्रसन्न हुआ, उस पर दया करूँगा।" इसलिये वह निष्कर्ष निकालता है कि उद्धार मनुष्य की इच्छा या प्रयास पर नहीं, वरन् केवल परमेश्वर की दया पर निर्भर है (रोमियों 9:15 आगे)। इन शब्दों का अर्थ मनुष्य की जन्मजात सामर्थ्य के संकेत के रूप में लगाने का कोई भी प्रयास त्रुटिपूर्ण और मूर्खतापूर्ण है। इसलिये हमें इस तर्कहीन कुतर्क को ठुकरा देना चाहिए।
"उद्धार चाहनेवाले या दौड़नेवाले के हाथ में नहीं है" कहकर इच्छा और क्रियाशीलता की उपस्थिति का समर्थन करने का तर्क असंगत है। सन्त पौलुस का कथन अधिक सीधा है: उद्धार मानव इच्छा या प्रयास से नहीं, वरन् केवल दया के क्षेत्र से प्राप्त होता है (रोमियों 9:16)। यह सिद्धान्त सन्त पौलुस की उस भावना से मेल खाता है जो वह अन्यत्र व्यक्त करता है, जहाँ वह कहता है, "परमेश्वर की कृपा और मनुष्यों के प्रति उसका प्रेम इसलिये प्रकट नहीं हुआ कि हमने धार्मिकता के काम किए, परन्तु अपनी असीम दया के अनुसार" (तीतुस 3:4-5)। यदि मैं इसी आधार पर यह तर्क दूँ कि हम सचमुच भले काम करते हैं, और सन्त पौलुस के इस कथन को नकार दूँ कि परमेश्वर का अनुग्रह धार्मिकता के कामों से उत्पन्न नहीं होता, तो वे निश्चय ही मेरे दावे को ठुकरा देंगे। उनका वर्तमान तर्क इसी के समान है। इसलिये उन्हें अपने कथनों पर सावधानी से विचार करना चाहिए, और ऐसे निराधार तर्क पर निर्भर रहने से बचना चाहिए।
तत्पश्चात् वे एक्लेसियास्टिकस की साक्षी का हवाला देते हैं, एक ऐसे लेखक की जिसका अधिकार विवादित है। फिर भी यदि हम यह बात मान लें, तो उसका उद्धृत किया जाना उनके तर्क की कोई पुष्टि नहीं करता। एक्लेसियास्टिकस का कथन है कि "अपनी सृष्टि के बाद मनुष्य अपनी ही इच्छा पर छोड़ दिया गया। परमेश्वर ने आज्ञाएँ दीं, और उन्हें मानकर मनुष्य अपनी रक्षा करता। जीवन और मृत्यु, भला और बुरा, उसके सामने रखे गए, कि मनुष्य जो चाहे चुन ले" (एक्लेसियास्टिकस 15:14 आगे)। इस वृत्तान्त के अनुसार मनुष्य में आरम्भ में जीवन या मृत्यु चुनने की सामर्थ्य थी। यदि हम मान लें कि वह सामर्थ्य बाद में खो गई, तो क्या? मैं सुलैमान का खण्डन नहीं करना चाहता, जो पुष्टि करता है कि "परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकालीं" (सभोपदेशक 7:29)। अतः जब मनुष्य अपनी मूल दशा से हटकर परमेश्वर से भटक गया, तो उसकी जन्मजात भलाई अन्य सब सद्गुणों के साथ बिगड़ गई। मनुष्य की आदिम सृष्टि के सन्दर्भों को उसकी वर्तमान दशा पर लागू नहीं करना चाहिए, जो अपूर्णता और भ्रष्टता से बिगड़ी हुई है। इसलिये मैं हमारे विरोधियों और एक्लेसियास्टिकस, चाहे उसका लेखक कोई भी हो, दोनों को इस प्रकार उत्तर देता हूँ: यदि तुम्हारा अभिप्राय मनुष्यों को यह सिखाना है कि वे अपने भीतर उद्धार की सामर्थ्य खोजें, तो तुम्हारा अधिकार परमेश्वर के वचन को निर्बल करने के लिये पर्याप्त नहीं, जो निस्सन्देह तुम्हारे आधार-वाक्य का खण्डन करता है। यदि तुम्हारा उद्देश्य केवल शरीर की निन्दा को डाँटना है, क्योंकि उसकी प्रवृत्ति अपने दोषों का दोष परमेश्वर पर लगाकर अपने आपको निर्दोष ठहराने की है, और तुम मनुष्य की भली उत्पत्ति और उसके बाद के पतन को दिखाकर ऐसा करते हो, तो मैं इस धारणा को स्वीकार करने को तैयार हूँ। परन्तु हमें परस्पर सहमत होना चाहिए कि मनुष्य अपनी वर्तमान दशा में उन आभूषणों और अनुग्रहों से वंचित हो चुका है जो परमेश्वर ने आरम्भ में उसे दिये थे।
हमारे विरोधी जो एक बार-बार दोहराया जानेवाला विवादित बिन्दु प्रस्तुत करते हैं, वह दयालु सामरी का दृष्टान्त है, जिसमें सड़क पर अधमरा छोड़ा गया मनुष्य मानव दशा का रूपक है (लूका 10:30-35)। यह सच है कि यह एक प्रचलित व्याख्या है कि यह मनुष्य मानवजाति की दुर्दशा का प्रतीक है। इससे वे एक विशेष तर्क निकालते हैं: कि मनुष्य पाप और शैतान के द्वारा पूरी तरह अशक्त नहीं किया गया, जैसा कि उस मनुष्य की आंशिक जीवन-शक्ति से संकेत मिलता है। उनका दावा है कि हमारे संघर्ष की गहराइयों में भी कुछ समझ और इच्छा अक्षुण्ण रहती है। परन्तु यदि मैं उनके रूपकात्मक दृष्टिकोण को अनदेखा करना चुनूँ, तो वे और क्या मार्ग अपना सकते हैं? यह निर्विवाद है कि आदि कलीसिया के पिता इस अंश की शाब्दिक और सीधी व्याख्या पर टिके रहे। रूपकात्मक व्याख्याएँ केवल उतनी ही मान्य हैं जितनी वे पवित्रशास्त्र से ही निकलती हों, और तब भी वे धार्मिक सिद्धान्तों की सत्यता स्थापित करने में कोई बल नहीं रखतीं। इसके अतिरिक्त, उनके दावों का खण्डन करने के लिये हमारे पास पर्याप्त कारण हैं। पवित्रशास्त्र स्वयं मनुष्य के अधमरे होने की धारणा को ठुकराता है और इसके बदले यह कहता है कि सच्चे और अनन्त सुख के विषय में हम सर्वथा मृत हैं। सन्त पौलुस, हमारे छुटकारे की चर्चा करते हुए, यह साक्षी नहीं देता कि हम आंशिक मृत्यु से चंगे किए गए; वरन् वह घोषणा करता है कि हम मृत्यु से ही जिलाए गए (इफिसियों 2:5)। वह मसीह के अनुग्रह को अपनाने के लिये अधमरों को नहीं, वरन् उन्हें बुलाता है जो मर चुके और गाड़े जा चुके हैं। यह प्रभु की इस घोषणा से मेल खाता है: "वह समय आता है, वरन् अब है, जब मृतक परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएँगे" (यूहन्ना 5:25)। क्या उन्हें यह विचलित करनेवाली बात नहीं लगती कि अपनी रूपकात्मक व्याख्याओं को, वे कितनी भी प्रकाशमान क्यों न हों, प्रचुर और स्पष्ट साक्षियों की पूरी पंक्ति के विरुद्ध खड़ा करें?
फिर भी, यदि हम उनके रूपक को मान्य मानकर भी चलें, तो वे हमारे विरुद्ध क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? उनका तर्क यह है कि मनुष्य आंशिक रूप से जीवित है, अतः किसी न किसी प्रकार की जीवन-शक्ति सुरक्षित है। मैं मानता हूँ कि मानव आत्मा में समझने की सामर्थ्य है, यद्यपि यह बोध परमेश्वर की स्वर्गीय बुद्धि तक नहीं पहुँचता। भले और बुरे का निर्णय हमारे भीतर है, और परमेश्वर के अस्तित्व का कुछ आभास हो सकता है, यद्यपि वह सही ज्ञान तक नहीं पहुँचता। फिर भी, इन अवलोकनों का क्या ठोस प्रभाव पड़ता है? खेद है कि वे सन्त अगस्तीन के बुद्धिमत्तापूर्ण शब्दों को निरस्त करने में असफल रहते हैं: "उद्धार के लिये आवश्यक सेंत-मेंत दान मनुष्य के पतन के बाद खो गए; जो जन्मजात गुण उद्धार की ओर नहीं ले जा सकते थे, वे दूषित और कलंकित किए गए।" अतः सन्त अगस्तीन का कथन अडिग रहता है: मानव बुद्धि परमेश्वर की धार्मिकता से इतनी गहराई से पराई हो चुकी है कि वह दुष्टता, पाप और भ्रष्टता के सिवा कुछ भी समझ, कल्पना या ग्रहण नहीं कर सकती। उसी प्रकार मानव हृदय पाप से इतना असाध्य रूप से दूषित है कि वह सब भ्रष्ट वस्तुओं का जनक है। भले ही कुछ कार्य सद्गुणी प्रतीत हों, बुद्धि सदा पाखण्ड और व्यर्थता में उलझी रहती है, और हृदय निरन्तर बुराई में लिप्त रहता है।
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मोनरजिज़्म बुक्स
मनुष्य की पतित दशा: स्वतंत्र या बँधी हुई?, लेखक जॉन कैल्विन, कॉपीराइट © 2024
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