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परमेश्वर दुष्टों को भी विशेष वरदानों से अनुगृहीत कर सकता है
कोई यह आपत्ति उठा सकता है कि यह समाधान अपर्याप्त है। उसका तात्पर्य यह है कि दो ही बातें सम्भव हैं—या तो कैटिलाइन बदलकर कैमिल्लस जैसा हो जाए, या कैमिल्लस इस बात का प्रमाण ठहरे कि स्वभाव, जब उचित रीति से दिशा पा ले, तो उसमें कुछ भलाई बनी रहती है। यद्यपि कैमिल्लस में जो सद्गुण विद्यमान थे वे निस्सन्देह परमेश्वर के वरदान हैं और प्रशंसा के योग्य हैं, फिर भी कैमिल्लस के स्वभाव की अन्तर्निहित भलाई के सम्बन्ध में उनके महत्त्व की जाँच होनी चाहिए। इसके लिए हृदय की ओर लौटना आवश्यक है, और यह तर्क देना कि यदि कोई मनुष्य ऐसी हृदय-प्रेरित खराई दिखाता है, तो मानव-स्वभाव में अवश्य ही भलाई को बढ़ाने की क्षमता है। परन्तु क्या हो यदि हृदय दूषित, विरोधी और धार्मिकता के अनुसरण से अनजान हो? यदि कैमिल्लस को स्वाभाविक मनुष्य भी मान लिया जाए, तो उसका हृदय निस्सन्देह भ्रष्टता का कलंक लिए होगा। जब खराई का शिखर ही भ्रष्टता की ओर झुकाव दिखाता है, तो हम मानव-स्वभाव में भलाई की कौन-सी सम्भावना मान सकते हैं? इसलिए, जैसे सद्गुणों का वेश धरे दुर्गुणों में लिपटा मनुष्य सद्गुणी नहीं ठहरता, वैसे ही भ्रष्टता में जमी मानवीय इच्छा को हम भले की चाह करने की शक्ति नहीं दे सकते। अतः सबसे सरल और सबसे निश्चित निष्कर्ष यह है कि ऐसे सद्गुण स्वभाव से नहीं निकलते, वरन् प्रभु के दिए हुए विशेष अनुग्रह हैं। वह उन्हें दुष्टों को भी अपनी इच्छा और नाप के अनुसार देता है। इसलिए हमारे बोलचाल में यह सामान्य है कि लोगों को स्वभाव से अच्छा या स्वभाव से बुरा कहें, अर्थात् अच्छे या बुरे स्वभाववाला, यह जानते हुए भी कि वे मानवीय भ्रष्टता के सार्वभौमिक क्षेत्र के भीतर हैं। यह प्रथा उस विशेष अनुग्रह को दर्शाती है जो परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से देता है—किसी को वह देता है जो दूसरों को नहीं देता।
