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परमेश्वर के प्रकाश के बिना मनुष्य आत्मिक रूप से अन्धा है
दूसरे पक्ष के विषय में समझ की कमी सबसे अधिक प्रकट है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर की इच्छा के विषय में कभी निश्चय की झलक भी न मिली। यह अज्ञानता मानवीय बुद्धि को अस्त-व्यस्त कर देती है और उसमें उन्मत्त कर देनेवाली उलझन उत्पन्न करती है। इसलिए मानवीय बुद्धि इस सत्य तक पहुँचने के योग्य नहीं कि एक सच्चा परमेश्वर कौन है और हमारे प्रति उसके अभिप्राय क्या हैं। परन्तु मनुष्य के अहंकार का स्वभाव ही कुटिल है कि वह दुष्ट घमण्ड के नशे में इस बात पर सन्देह करता है कि बुद्धि ईश्वरीय बातों को समझने में असमर्थ है। इस कथन को सिद्ध करने का अधिक भरोसेमन्द उपाय जटिल तर्कों में नहीं, वरन् पवित्रशास्त्र की साक्षियों में है। सन्त यूहन्ना इसी रीति का उत्तम उदाहरण देता है, जब वह बल देकर कहता है, "उसमें जीवन था; और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था। और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया" (यूहन्ना 1:4–5)। इन वचनों से वह दर्शाता है कि यद्यपि मनुष्यों के प्राण परमेश्वर की ज्योति से थोड़े-बहुत प्रकाशित हैं, फिर भी वे परमेश्वर के स्वरूप के विषय में समझ से रहित हैं। ऐसा क्यों है? परमेश्वर के ज्ञान के लिए उनकी आत्मिक शक्तियाँ अन्धकार में डूबी हैं। इसलिए वे निरन्तर अँधेरे में घिरे रहते हैं। यही बात इस तथ्य से भी प्रतिध्वनित होती है कि पवित्र आत्मा ने मनुष्य को "अन्धकार" की संज्ञा दी है। यह संज्ञा उन्हें हर प्रकार की आत्मिक समझ से वंचित ठहराती है।
इसलिए जब सन्त यूहन्ना कहता है कि जो विश्वासी मसीह को ग्रहण करते हैं वे "न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं" (यूहन्ना 1:13), तो यह उचित ही है। इससे प्रकट होता है कि शरीर पवित्र आत्मा के प्रकाश के बिना परमेश्वर की गहन बुद्धि और उसके ईश्वरीय गुणों को समझने के योग्य नहीं। इस विचार की पुष्टि मसीह की उस स्वीकारोक्ति से भी होती है जो उसने सन्त पतरस से की, कि पतरस ने उसे जो जाना वह पिता परमेश्वर के आत्मिक प्रकाशन से जाना (मत्ती 16:17)। इस आधार पर कि नये जन्म के आत्मा द्वारा चुने हुओं को दिए जानेवाले सब वरदान हमारे स्वभाव में नहीं हैं, इस तर्क की दृढ़ता निर्विवाद है। इसलिए विश्वासी घोषणा करते हैं, "क्योंकि तेरे ही पास जीवन का सोता है; तेरे प्रकाश में हम प्रकाश पाएँगे" (भजन संहिता 36:9)। सन्त पौलुस इसकी पुष्टि करता है और कहता है, "कोई पवित्र आत्मा के बिना नहीं कह सकता कि यीशु प्रभु है" (1 कुरिन्थियों 12:3)। इसी प्रकार यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला अपने चेलों की अज्ञानता को देखकर कहता है कि "जब तक किसी मनुष्य को स्वर्ग से न दिया जाए, तब तक वह कुछ नहीं पा सकता" (यूहन्ना 3:27)। यहाँ "दिया जाए" शब्द का अर्थ स्वभाव की साधारण समझ नहीं, वरन् आत्मिक प्रकाशन है—जिसे उसके इस विलाप से बल मिलता है कि मसीह के विषय में उसके लम्बे प्रचार ने उसके चेलों को ईश्वरीय समझ न दी। इसलिए "दिया जाना" आत्मिक प्रकाशन से सम्बन्ध रखता है, स्वभाव की साधारण समझ से नहीं। मूसा लोगों पर भूल जाने का दोष लगाते हुए साथ ही यह भी बताता है कि अनुग्रह दिए बिना वे परमेश्वर के भेदों को समझने में असमर्थ हैं। वह कहता है, "तौभी यहोवा ने आज तक तुम्हें न तो समझने का मन, न देखने की आँखें, और न सुनने के कान दिए हैं" (व्यवस्थाविवरण 29:2–4)। मूसा के इस कथन की तुलना यों की जा सकती है मानो वह परमेश्वर के कार्यों को देखते हुए उन्हें मन्दबुद्धि कह रहा हो।
अपनी बुद्धि से प्रभु अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा इस्राएलियों से प्रतिज्ञा करता है और आश्वासन देता है कि वह उन्हें समझ देगा—ऐसा ज्ञान जिससे वे उसे जानेंगे (यिर्मयाह 24:7)। यह आश्वासन इस सत्य की गूँज है कि परमेश्वर के अपने प्रकाश के बिना मानवीय बुद्धि आत्मिक ज्ञान तक नहीं पहुँच सकती। सन्त पौलुस के वचन और भी अधिक स्पष्टता से गूँजते हैं, जब वह कहता है कि "शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं; और न वह उन्हें जान सकता है, क्योंकि उनकी जाँच आत्मिक रीति से होती है" (1 कुरिन्थियों 2:14)। यह "शारीरिक मनुष्य" कौन है? वह जो केवल स्वाभाविक तर्क के प्रकाश पर निर्भर रहता है। इसलिए प्रकट है कि आत्मिक बातें स्वाभाविक समझ की पहुँच से बाहर हैं। ऐसा क्यों है? केवल उपेक्षा के कारण नहीं, वरन् इसलिए कि सबसे परिश्रमी प्रयत्न भी ऐसा ज्ञान उत्पन्न करने में असमर्थ ठहरता है। सन्त पौलुस स्पष्ट करता है कि ऐसी समझ के लिए आत्मिक विवेक आवश्यक है। इससे यह रेखांकित होता है कि ये सत्य, जो मानवीय बुद्धि से छिपे हैं, प्रकाश में आने के लिए आत्मा के प्रकाशन की अपेक्षा रखते हैं। इसी सिद्धान्त के अनुसार परमेश्वर की सारी बुद्धि मनुष्य को तब तक चकरा देनेवाली पागलपन बनी रहती है जब तक ईश्वरीय अनुग्रह उसे प्रकाशित न करे। सन्त पौलुस स्वयं दृष्टि, श्रवण और मानवीय समझ की सीमाओं से ऊपर उठा और उन भेदों की अन्तर्दृष्टि पाई जो परमेश्वर ने अपने सेवकों के लिए तैयार किए हैं। उसने साक्षी दी कि मानवीय बुद्धि एक परदे का काम करती है जो परमेश्वर के स्पष्ट दर्शन में बाधा डालता है (2 कुरिन्थियों 3:13–18; 4:3; 12:1–4)। यह चेतावनी पर्याप्त है। प्रेरित घोषणा करता है कि "इस संसार का ज्ञान मूर्खता है," और जैसा परमेश्वर ने ठहराया है, वह वैसा ही रहे। तब क्या हम इस सांसारिक बुद्धि को यह गहरा विवेक दे सकते हैं कि वह ईश्वरीय भेदों को भेद सके और उसके राज्य के रहस्यों को खोज निकाले? ऐसे भ्रम को त्याग देना चाहिए।
