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परमेश्वर का उपाय: नये हृदय
अब परमेश्वर के अनुग्रह के उस उपाय पर विचार करने का समय है—वह साधन जिसके द्वारा हमारा गिरा हुआ स्वभाव सुधारा जाता है। प्रभु अपनी सहायता से हमारी कमियों की पूर्ति करता है। हमारे भीतर उसके कार्यों को देखने से हम अपनी निर्धनता की अन्तर्दृष्टि पाते हैं। जब प्रेरित फिलिप्पियों को आश्वस्त करता है कि वह "इस बात का भरोसा रखता है कि जिसने उनमें अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे पूरा भी करेगा" (फिलिप्पियों 1:6), तो "अच्छे काम का आरम्भ" निस्सन्देह उनके मन-फिराव के आरम्भ को सूचित करता है—जब उनकी इच्छाएँ परमेश्वर की ओर फेरी गईं। यहीं से प्रकट होता है कि प्रभु हमारे भीतर अपना कार्य कैसे आरम्भ करता है: हमारे हृदयों में धार्मिकता के लिए प्रेम, अभिलाषा और उत्साह उँडेलकर। और ठीक कहें तो वह हमारे हृदयों को धार्मिकता की ओर झुकाता, ढालता और चलाता है। यह कार्य हमारी स्थिरता को दृढ़ करने से पूरा होता है।
उन आपत्तियों को पहले ही रोकने के लिए जो यह कहें कि भलाई हममें इसलिए आरम्भ होती है कि ईश्वरीय सहायता हमारी स्वभावतः दुर्बल इच्छा की पूर्ति करती है, पवित्र आत्मा अन्यत्र स्पष्ट करता है कि हमारी इच्छा अकेले कितनी सामर्थ्य रखती है। वह घोषणा करता है, "मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम्हें माँस का हृदय दूँगा। और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर दूँगा, और ऐसा करूँगा कि तुम मेरी आज्ञाओं पर चलोगे" (यहेजकेल 36:26–27)। तब कौन यह कह सकता है कि मानवीय इच्छा की अन्तर्निहित दुर्बलता इस हद तक दृढ़ की जाती है कि वह उत्साह से भले को चुने, जबकि प्रकट है कि इच्छा को सम्पूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है? यदि पत्थर को दबाने पर वह ढाला जा सके, यह मानते हुए कि वह इतना लचीला है कि उसे मनचाहा आकार दिया जा सके, तो मैं इसका विरोध नहीं करता कि मानवीय हृदय में परमेश्वर की आज्ञा मानने की कुछ क्षमता और झुकाव हो सकता है, बशर्ते उसकी अन्तर्निहित दुर्बलता को बल दिया जाए। परन्तु यदि इस उपमा के द्वारा हमारा प्रभु यह दर्शाना चाहता है कि हमारे हृदयों को सर्वथा भिन्न बनाए बिना उनमें से कोई भलाई निकालना असम्भव है, तो जो प्रशंसा केवल उसी की है, उसमें हम साझी न हों। यदि प्रभु जब हमें भलाई की ओर फेरता है, तो वह पत्थर को माँस में बदलने के समान है, तो निश्चय ही हमारे अपने चुनाव से उत्पन्न सब योगदान निरस्त हो जाते हैं, और उसके बाद जो कुछ होता है वह सब परमेश्वर की ओर से है।
