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हृदय के नए होने के बिना इच्छा निर्बल है
कोई यह कह सकता है, “मनुष्य की इच्छा धार्मिकता और सीधाई की ओर केवल परमेश्वर की सामर्थ्य से फिरती है; स्वभाव से तो वह इन गुणों से विमुख हो चुकी है। तौभी परमेश्वर की ओर से तैयार किए जाने पर इच्छा भी इसमें सहभागी होती है।” सन्त अगस्तीन समझाते हैं कि “अनुग्रह हर सद्गुणी कर्म से पहले चलता है, और भला करने में इच्छा अनुग्रह की अगुवाई नहीं करती, वरन् अनुग्रह इच्छा को चलाता है; इच्छा पीछे चलती है, आगे नहीं।” परन्तु मैं देखता हूँ कि भविष्यद्वक्ता के वचनों से दो बातें निकलती हैं: पहली यह कि प्रभु हमारी बिगड़ी हुई इच्छा को सुधारता है—या यों कहें कि उसे तोड़ डालता है; फिर वह अपनी ओर से हमें भली इच्छा प्रदान करता है। इसलिए जहाँ तक हमारी इच्छाओं को अनुग्रह पहले से आ घेरता है, मैं मानता हूँ कि उन्हें सेविकाएँ कहा जा सकता है। परन्तु उनके बदले जाने में जो कुछ होता है, वह परमेश्वर का ही कार्य है। अतः मनुष्यों के विषय में यह कहना उचित नहीं कि वे अपनी इच्छा से पहले से चले आते अनुग्रह का पालन करते हैं। इसलिए क्राइसोस्टम का यह कथन कि “अनुग्रह इच्छा के बिना निष्फल है, जैसे इच्छा अनुग्रह के बिना निष्फल है” ठीक नहीं बैठता। रही सन्त अगस्तीन की बात, तो जब उन्होंने मनुष्य की इच्छा को अनुग्रह की सेविका कहा, तब उनका आशय भले कर्मों की प्रशंसा का कोई अंश इच्छा को बाँट देना नहीं था। वरन् वे पेलागियुस की उस भ्रान्त शिक्षा का खण्डन करना चाहते थे जिसने मनुष्य की योग्यता को उद्धार का मुख्य कारण ठहराया था। इस प्रकार सन्त अगस्तीन ने दिखाया कि अनुग्रह सब योग्यताओं से पहले आता है; हमारे भीतर अनुग्रह के आगे चलनेवाले प्रभाव को उन्होंने यहाँ छोड़ दिया—जिस विषय पर वे अन्यत्र भली-भाँति चर्चा करते हैं। जब वे बार-बार कहते हैं, “प्रभु अनिच्छुकों के आगे-आगे चलता है कि वे इच्छुक हों; और इच्छुकों की सहायता करता है कि उनकी इच्छा डगमगा न जाए,” तब वे सारी भलाई का कर्ता उसी को ठहराते हैं।
