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अगस्तीन के अनुसार सब कुछ अनुग्रह करता है
अब हम सन्त अगस्तीन के वचनों की ओर मुड़ें और आधुनिक पेलागियुस-वादियों—सोरबोन के कुतर्कियों—के आरोपों को चुप कराएँ, जो अपने पूर्वज पेलागियुस के समान यह कहकर हम पर अन्याय से दोष लगाते हैं कि आदिम कलीसिया के पिता हमारे विरोध में हैं। यह वैसा ही है जैसा पेलागियुस ने पहले सन्त अगस्तीन की शिक्षाओं पर सन्देह डालने का यत्न किया था। अपनी रचना “ताड़ना और अनुग्रह के विषय में” में सन्त अगस्तीन इसी विषय पर विचार करते हैं, और उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए मैं उनके वचनों का संक्षिप्त चयन प्रस्तुत करूँगा। वे लिखते हैं, “आदम में सामर्थ्य थी, यदि वह चाहता, परन्तु उसे प्रयोग में लाने की इच्छा उसमें न थी; हमारे लिए इच्छा और सामर्थ्य दोनों दिए जाते हैं। आदि स्वतन्त्रता का अर्थ था पाप से दूर रह सकने की शक्ति; वर्तमान दशा कहीं श्रेष्ठ है, जिसमें हम पाप कर ही नहीं सकते।” सोरबोन के अनुयायी इस बात को सिद्धता के भावी जीवन पर लगाते हैं, जो उपहास योग्य धारणा है। सन्त अगस्तीन तुरन्त इसका खण्डन करते हुए कहते हैं कि विश्वासियों की इच्छा पवित्र आत्मा के द्वारा चलाई जाती है, जिससे वे भला कर पाते हैं क्योंकि वे उसे चाहते हैं, और वे उसे इसलिए चाहते हैं कि परमेश्वर ने उनकी इच्छा को गढ़ा है। उन्हीं के शब्दों में, “उनकी इच्छा बनी रहती है, यद्यपि दुर्बल है, ताकि यदि वे चाहें तो परमेश्वर की सहायता से भला कर सकें। इस ईश्वरीय हस्तक्षेप के बिना उनकी निर्बल इच्छा परीक्षाओं के आक्रमण के आगे हार जाती, और स्थिर न रह पाती। इसलिए परमेश्वर मनुष्य की दुर्बल इच्छा की सहायता करता है, उसे दृढ़ता की ओर निर्देशित करता है कि वह डिग न सके, और उसे इस प्रकार चलाता है कि वह भटक न जाए। दुर्बल होते हुए भी इच्छा अडिग बनी रहती है।” सन्त अगस्तीन आगे इस पर विचार करते हैं कि जब परमेश्वर बुलाता है तब हमारे हृदयों को उसकी प्रेरणा के पीछे कैसे चलना चाहिए, और कहते हैं, “परमेश्वर मनुष्यों को उनकी इच्छा के अनुसार खींचता है, बलपूर्वक नहीं। परन्तु वह इच्छा वही है जिसे उसने उनके भीतर रचा है।”
सन्त अगस्तीन के इन वचनों से हमारे वचन-विवाद का केन्द्रीय प्रश्न प्रमाणित हो जाता है। ईश्वरीय अनुग्रह स्वीकार या अस्वीकार करने का ऐसा विकल्प मात्र नहीं जो व्यक्ति की मनमानी से बने। वरन् वही एकमात्र शक्ति है जो हमारे हृदयों को परमेश्वर की बुलाहट के पीछे चलने को उभारती है, और चुनाव तथा इच्छा, दोनों को जगाती है। फलस्वरूप आगे के सभी सद्गुणी कर्म उसी का फल हैं, और अनुग्रह जीवितों को तब तक प्राप्त नहीं होता जब तक वह उनके हृदयों को आज्ञाकारिता में नहीं ढाल देता। इसी कारण वही सन्त एक अन्य स्थान पर कहते हैं, “केवल परमेश्वर का अनुग्रह हमारे भीतर हर भला कर्म सम्पन्न करता है।” कुछ प्रसंगों में वे यह बताते हैं कि अनुग्रह इच्छा को नष्ट नहीं करता, वरन् उसे बुराई से भलाई में बदल देता है, ताकि वह अनुग्रह के साथ सहकार करे और भली मनसा से काम करे। बोनिफेस को सम्बोधित करते हुए वे कहते हैं, “हम जानते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह सब को नहीं दिया जाता, और जब दिया जाता है तब वह योग्यताओं के कारण नहीं, वरन् परमेश्वर की मुफ़्त कृपा की अभिव्यक्ति है। इसके विपरीत, उसका न दिया जाना ईश्वरीय न्याय से होता है।” उसी पत्र में वे इस मत का दृढ़ता से खण्डन करते हैं कि दूसरा अनुग्रह योग्यता का पुरस्कार है, और यह कहना कि जो प्रथम अनुग्रह को ठुकराते नहीं वे दूसरे के योग्य ठहरते हैं। वे पेलागियुस को यह स्वीकार करने पर विवश करते हैं कि “हर कार्य के लिए हमें अनुग्रह की आवश्यकता है, और वह योग्यता के पुरस्कार के रूप में नहीं दिया जाता; वरन् वह शुद्ध अनुग्रह ही जाना जाता है।”
इस विषय को शीघ्र ही निपटाने वाला प्रसंग सन्त अगस्तीन की “ताड़ना और अनुग्रह के विषय में” के आठवें अध्याय में मिलता है। पहले वे समझाते हैं कि मनुष्य की इच्छा स्वतन्त्रता के द्वारा अनुग्रह को नहीं पाती, वरन् परमेश्वर के अनुग्रह से स्वतन्त्रता पाती है। दूसरे, वे कहते हैं कि यह अनुग्रह इच्छा को सद्गुण में स्थिर करता है, जिससे वह प्रेम करने और अन्त तक टिके रहने में समर्थ होती है। तीसरे, वे घोषणा करते हैं कि बुराई का सामना करने के लिए इच्छा को अजेय बल से सुदृढ़ किया जाता है। चौथे, वे इस पर बल देते हैं कि अनुग्रह से चलाए जाने पर इच्छा अडिग रहती है, जबकि अनुग्रह के छोड़ देने पर वह तुरन्त लड़खड़ा जाती है। सन्त अगस्तीन पुष्टि करते हैं, “परमेश्वर के दयालु अनुग्रह से इच्छा सद्गुण की ओर बदल दी जाती है और उसी में बनी रहती है।” वे यह भी कहते हैं, “जब मनुष्य की इच्छा भलाई की ओर चलाई जाती और उसमें दृढ़ की जाती है, तब यह केवल परमेश्वर की इच्छा से होता है, किसी योग्यता से नहीं।” अतः चुनाव की एक विशिष्ट स्वतन्त्रता बनी रहती है, जैसा सन्त अगस्तीन एक अन्य स्थान पर बल देते हैं, जहाँ परमेश्वर की ओर फिरना और उसमें स्थिर रहना केवल उसके अनुग्रह से होता है। इस प्रकार इच्छा के सारे कार्य अन्ततः अनुग्रह की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
