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स्वाभाविक झुकाव में विवेक का अभाव है
अब हम इच्छा की ओर बढ़ें—जो स्वतंत्रता का भण्डार है, यदि स्वतंत्रता वास्तव में कहीं है—और उसके स्वरूप की परख करें। हम देख चुके हैं कि चुनाव समझ की अपेक्षा इच्छा से अधिक मेल खाता है। स्वतंत्रता के विषय में हमें जल्दबाजी में यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि दार्शनिकों का वह सर्वमान्य कथन मानवीय इच्छा में स्वाभाविक भलाई का सूचक है। जब वे कहते हैं कि सब वस्तुएँ स्वभाव से भले की ओर झुकती हैं, तब हमें समझना चाहिए कि स्वतंत्र चुनाव की शक्ति को उस झुकाव के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए जो प्रकृति के स्वभाव से उठता है, परन्तु उसे सोच-विचार से उत्पन्न होना चाहिए। विद्वान् धर्मशास्त्री भी सहमत हैं और कहते हैं कि स्वतंत्र चुनाव में बुद्धि दोनों विकल्पों पर विचार करती है। इसका अर्थ है कि अभिलाषा का विषय चुने जाने के योग्य हो, और चुनने के कार्य से पहले विचार-विमर्श हो। मनुष्य की भले के प्रति स्वाभाविक लालसा पर विचार करें तो हम देखते हैं कि वह पशुओं की भूख के समान है। ये प्राणी जो कुछ उनके कल्याण के काम आए उसे चाहते हैं, और जो कुछ उनकी इन्द्रियों को अच्छा लगे उसका पीछा करते हैं। इस स्वाभाविक झुकाव में उस बात का विवेक नहीं है जो हमारे अमर स्वभाव की उत्कृष्टता के अनुसार बुद्धि निर्धारित करती है। फलस्वरूप वह उस पर सच्ची समझ के साथ विचार नहीं करती, और पशुओं के व्यवहार के समान सहज प्रवृत्ति के आगे झुक जाती है।
यह झुकाव, जब उभरता है, तब स्वतंत्र चुनाव से सम्बन्ध नहीं रखता। सच्चा स्वतंत्र चुनाव अपेक्षा करता है कि भले को सही बुद्धि से पहचाना जाए, यह जानते हुए कि क्या चुना जा रहा है, और उसे उद्देश्य के साथ चुना जाए।
भ्रम को दूर करने के लिए हमें दो सम्भावित गलत अर्थों को पहचानना होगा। इस सन्दर्भ में "भूख" इच्छा की किसी विशेष गति का नहीं, वरन् स्वाभाविक झुकाव का सूचक है। इसके अतिरिक्त, "भला" शब्द धार्मिकता या सद्गुण को नहीं दर्शाता, परन्तु सब प्राणियों की अपने स्वभाव की सीमा के भीतर सुख पाने की लालसा को समेटता है। यह स्वाभाविक अभिलाषा मानवीय स्वतंत्रता के अस्तित्व को प्रमाणित नहीं करती, जैसे अचेतन वस्तुओं का अपने स्वभाव को पूरा करने की ओर प्रवृत्त होना स्वतंत्रता को नहीं दर्शाता। अब हम आगे की पूछताछ करें। क्या मानवीय इच्छा इतनी गहराई से दूषित है कि केवल बुराई ही उत्पन्न करती है, या उसका कोई पक्ष निष्कलंक है जिससे सद्गुणी अभिलाषाएँ उठती हैं?
