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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
उस परम पवित्र आश्चर्यकर्म के विषय में जो संत फ्रांसिस ने किया, जब उन्होंने अगोबियो के खूँखार भेड़िये का मन फिरा दिया
जिस समय संत फ्रांसिस अगोबियो नगर में रहते थे, उस समय अगोबियो के प्रदेश में एक अत्यन्त बड़ा भेड़िया प्रकट हुआ, जो भयानक और खूँखार था, और जो न केवल पशुओं को, वरन् मनुष्यों को भी फाड़ खाता था, यहाँ तक कि नगर के सब लोग बड़े भय में रहते थे, क्योंकि वह बहुधा नगर के निकट आ जाता था; और सब लोग जब बाहर निकलते तो मानो युद्ध के लिये हथियार बाँधकर निकलते थे, तौभी जब कभी कोई अकेला उससे आमना-सामना कर बैठता, तो वे उससे अपनी रक्षा न कर पाते थे; और उस भेड़िये के भय से उनकी ऐसी दशा हो गई थी कि कोई भी उस स्थान से बाहर जाने का साहस न करता था। इस कारण संत फ्रांसिस ने उस देश के लोगों पर तरस खाकर उस भेड़िये के पास जाना चाहा, यद्यपि नगर के सब लोगों ने उसके विरुद्ध सलाह दी; और परम पवित्र क्रूस का चिन्ह बनाकर, अपना सारा भरोसा परमेश्वर पर रखकर, वे अपने साथियों के साथ उस स्थान से निकल पड़े। और जब दूसरे आगे जाने से हिचकिचाए, तो संत फ्रांसिस ने उस स्थान का मार्ग पकड़ा जहाँ भेड़िया रहता था। और देखो! नगर के बहुत से लोगों के देखते-देखते, जो यह आश्चर्यकर्म देखने को बाहर आए थे, वह भेड़िया मुँह फाड़े संत फ्रांसिस पर झपटा; और जब वह उनके पास आया, तो संत फ्रांसिस ने उस पर परम पवित्र क्रूस का चिन्ह बनाया, और उसे अपने पास बुलाया, और उससे यों कहा: “इधर आ, भाई भेड़िये: मैं तुझे मसीह के नाम में आज्ञा देता हूँ कि तू न मेरी और न किसी और की कोई हानि करे।” अहा, कैसी अद्भुत बात! ज्योंही संत फ्रांसिस ने क्रूस का चिन्ह बनाया, त्योंही उस भयानक भेड़िये ने अपने जबड़े बन्द कर लिये और अपनी दौड़ रोक दी; और आज्ञा पाते ही मेम्ने के समान नम्रता से आया और संत फ्रांसिस के पाँवों के पास लेट गया। तब संत फ्रांसिस ने उससे यों कहा: “भाई भेड़िये, तूने इन प्रदेशों में बहुत हानि की है और बड़ी बुराई की है, परमेश्वर की अनुमति के बिना उसके प्राणियों को उजाड़ा और मार डाला है; और तूने केवल पशुओं को ही मारकर नहीं खाया, वरन् परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए मनुष्यों को भी मार डालने का साहस किया है; इस कारण तू एक चोर और अत्यन्त नीच हत्यारे के समान फाँसी के योग्य है; और सब लोग तेरे विरुद्ध चिल्लाते और कुड़कुड़ाते हैं, और यह सारा देश तेरा बैरी है। परन्तु, भाई भेड़िये, मैं चाहता हूँ कि तेरे और इनके बीच मेल करा दूँ; कि तू इन्हें फिर कभी हानि न पहुँचाए, और ये तेरे सारे पिछले अपराध क्षमा कर दें, और न मनुष्य और न कुत्ते फिर कभी तेरा पीछा करें।” इन बातों पर भेड़िये ने अपने शरीर, पूँछ और आँखों की हरकतों से, और अपना सिर झुकाकर, यह संकेत दिया कि संत फ्रांसिस ने जो कहा उसमें उसकी सहमति है, और वह उसका पालन करना चाहता है। तब संत फ्रांसिस ने फिर कहा: “भाई भेड़िये, जब तुझे यह मेल करना और उसे बनाए रखना भाता है, तो मैं तुझसे प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं इसका प्रबन्ध करूँगा कि इस स्थान के लोग जब तक तू जीवित रहे, तुझे सदा भोजन देते रहें, कि तू फिर कभी भूख न सहे; क्योंकि मैं भली-भाँति जानता हूँ कि भूख ही के कारण तूने यह सारी बुराई की है। परन्तु जब मैं तेरे लिये यह अनुग्रह प्राप्त करता हूँ, तो, भाई भेड़िये, मैं चाहता हूँ कि तू मुझसे प्रतिज्ञा करे कि फिर किसी की हानि न करेगा, चाहे वह मनुष्य हो या पशु; क्या तू मुझसे यह प्रतिज्ञा करता है?” और भेड़िये ने अपना सिर झुकाकर स्पष्ट संकेत दिया कि वह प्रतिज्ञा करता है। तब संत फ्रांसिस ने कहा: “भाई भेड़िये, मैं चाहता हूँ कि तू इस प्रतिज्ञा के लिये मुझे वचन दे, कि मैं तुझ पर पूरा भरोसा कर सकूँ।” और जब संत फ्रांसिस ने उसके वचन की ज़मानत लेने के लिये अपना हाथ बढ़ाया, तो भेड़िये ने उनके सामने अपना दाहिना पंजा उठाया और उसे धीरे से संत फ्रांसिस के हाथ पर रख दिया, और इस प्रकार जितना वह दे सकता था उतना सच्चाई का चिन्ह दिया। तब संत फ्रांसिस ने कहा: “भाई भेड़िये, मैं तुझे यीशु मसीह के नाम में आज्ञा देता हूँ कि अब कुछ भी सन्देह न करके मेरे साथ चल, और आ, हम परमेश्वर के नाम में इस मेल को पक्का करने चलें।” और वह भेड़िया आज्ञाकारी होकर एक नम्र मेम्ने की नाईं उनके साथ चल पड़ा; जिसे देखकर नगर के लोगों ने बड़ा अचम्भा किया। और तुरन्त इसकी चर्चा सारे नगर में फैल गई, यहाँ तक कि सब लोग, पुरुष और स्त्रियाँ, बड़े और छोटे, जवान और बूढ़े, संत फ्रांसिस के साथ भेड़िये को देखने के लिये बाज़ार के चौक में इकट्ठे हुए। और जब सब लोग इकट्ठे हो गए, तो संत फ्रांसिस उपदेश देने को खड़े हुए, और अन्य बातों के साथ उन्हें यह चिताया कि परमेश्वर उनके पापों के कारण ऐसी बातें, और महामारियाँ भी, होने देता है; और यह कि नरक की ज्वाला, जो दण्ड पाए हुओं को अनन्त काल तक सताती रहेगी, उस भेड़िये के क्रोध से कितनी अधिक भयानक है जो केवल शरीर को मार सकता है; तो फिर मनुष्यों को नरक के जबड़ों से कितना डरना चाहिए, जब इतनी बड़ी भीड़ एक इतने छोटे पशु के जबड़ों से इतनी भयभीत रहती है! “तो हे प्रियो, परमेश्वर की ओर फिरो, और अपने पापों के लिये उचित पश्चाताप करो; और परमेश्वर तुम्हें इस वर्तमान समय में भेड़िये से, और आनेवाले समय में नरक की आग से छुड़ाएगा।” और उपदेश समाप्त करके संत फ्रांसिस ने कहा: “हे मेरे भाइयो, कान लगाओ: भाई भेड़िये ने, जो यहाँ तुम्हारे सामने खड़ा है, मुझसे प्रतिज्ञा की है और वचन दिया है कि वह तुम्हारे साथ मेल करेगा, और फिर किसी बात में अपराध न करेगा; और तुम उससे प्रतिज्ञा करो कि जो कुछ उसे चाहिए वह उसे प्रतिदिन दोगे; और मैं तुम्हारे सामने उसका ज़मानतदार बनता हूँ कि वह मेल की इस वाचा का दृढ़ता से पालन करेगा।” तब सब लोगों ने एक मन होकर उसे सदा भोजन देते रहने की प्रतिज्ञा की। तब संत फ्रांसिस ने सबके सामने भेड़िये से कहा: “और तू, भाई भेड़िये, क्या तू प्रतिज्ञा करता है कि मेल की इस वाचा को दृढ़ता से मानेगा, कि न मनुष्य की, न पशु की, न किसी प्राणी की हानि करेगा?” और भेड़िये ने घुटने टेके और अपना सिर झुकाया; और अपने शरीर, पूँछ और आँखों की नम्र हरकतों से, जैसे वह सबसे अच्छी रीति से कर सकता था, संकेत दिया कि वह उनकी वाचा को पूरी तरह निभाएगा। संत फ्रांसिस ने कहा: “भाई भेड़िये, मैं चाहता हूँ कि जैसे तूने फाटक के बाहर इस प्रतिज्ञा के लिये मुझे अपना वचन दिया, वैसे ही सब लोगों के सामने भी अपनी प्रतिज्ञा के लिये मुझे अपना वचन दे, और मेरी प्रतिज्ञा के विषय में, और उस ज़मानत के विषय में जो मैंने तेरे लिये दी है, मुझे धोखा न दे।” तब भेड़िये ने अपना दाहिना पंजा उठाकर संत फ्रांसिस के हाथ में रख दिया। इस पर इस काम ने, और ऊपर बताए गए अन्य कामों ने, सब लोगों में ऐसा बड़ा आनन्द और अचम्भा उत्पन्न किया, संत के प्रति भक्ति के कारण भी, और आश्चर्यकर्म के नयेपन के कारण भी, और भेड़िये के साथ हुए मेल के कारण भी, कि सब लोग स्वर्ग की ओर अपना शब्द उठाकर परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करने लगे, जिसने संत फ्रांसिस को उनके पास भेजा था, जिन्होंने अपने पुण्य के द्वारा उन्हें उस निर्दयी पशु के जबड़ों से छुड़ाया था। और उसके बाद वही भेड़िया दो वर्ष तक अगोबियो में रहा; और एक पालतू पशु के समान घरों में आता-जाता, द्वार-द्वार फिरता था, न वह किसी की हानि करता था और न कोई उसकी हानि करता था, और लोग शिष्टता से उसका पालन-पोषण करते थे; और जब वह इस प्रकार देश में और घरों में होकर जाता था, तो कभी कोई कुत्ता उसके पीछे नहीं भौंकता था। अन्त में, कोई दो वर्ष के बाद, भाई भेड़िया बुढ़ापे के कारण मर गया: जिस पर नगर के लोग बहुत दुःखी हुए, क्योंकि उसे इतनी नम्रता से नगर में होकर जाते देखकर उन्हें संत फ्रांसिस के सद्गुण और पवित्रता का और भी अच्छी रीति से स्मरण होता था।
