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कैसे रियेती के उस पुरोहित की दाख की बारी, जिसके घर में संत फ्रांसिस ने प्रार्थना की, लूटी गई और उसके अंगूर उजाड़ दिए गए, और फिर उसने आश्चर्यकर्म के द्वारा पहले से कहीं अधिक दाखरस दिया
कैसे रियेती के उस पुरोहित की दाख की बारी, जिसके घर में संत फ्रांसिस ने प्रार्थना की, उनके पास आनेवाली बड़ी भीड़ के द्वारा लूटी गई और उसके अंगूर उजाड़ दिए गए; और फिर उसने आश्चर्यकर्म के द्वारा पहले से कहीं अधिक दाखरस दिया, जैसा संत फ्रांसिस ने उससे प्रतिज्ञा की थी। और कैसे परमेश्वर ने संत फ्रांसिस पर प्रकट किया कि अपनी मृत्यु पर वे स्वर्गलोक के अधिकारी होंगे
एक बार संत फ्रांसिस अपनी आँखों के रोग से बहुत पीड़ित थे, तब धर्मसंघ के संरक्षक कार्डिनल उगोलिनो ने, उनके प्रति अपने बड़े स्नेह के कारण, उन्हें लिखा कि वे रियेती में उनके पास आएँ, जहाँ आँखों के अत्यन्त निपुण वैद्य रहते थे। तब संत फ्रांसिस कार्डिनल की चिट्ठी पाकर पहले संत डेमियन गए, जहाँ मसीह की भक्त दुल्हिन संत क्लेयर थीं, कि उन्हें कुछ सांत्वना दें और उसके बाद कार्डिनल के पास जाएँ। संत फ्रांसिस के वहाँ पहुँचने पर, उसके अगली ही रात उनकी आँखें इतनी अधिक बिगड़ गईं कि वे तनिक भी उजाला न देख सकते थे; इसलिये, क्योंकि वे अपने मार्ग पर न जा सकते थे, संत क्लेयर ने उनके लिये सरकंडों की एक छोटी कोठरी बनवाई, जिसमें वे और अच्छी रीति से विश्राम कर सकें। परन्तु संत फ्रांसिस, कुछ तो अपनी बीमारी की पीड़ा के कारण, और कुछ चूहों की भीड़ के कारण, जो उन्हें अत्यन्त बड़ा कष्ट देते थे, न दिन को, न रात को, कुछ भी विश्राम न पा सके। और जब उन्हें ऐसी और भी पीड़ाएँ और क्लेश सहने पड़े, तो वे सोचने और समझने लगे कि यह उनके पापों के कारण परमेश्वर की ओर से एक कोड़ा है; और वे अपने सारे हृदय से और अपने मुँह से परमेश्वर का धन्यवाद करने लगे, और तुरन्त ऊँचे शब्द से पुकारकर कहा: “हे मेरे प्रभु, मैं इस सब के योग्य हूँ, और इससे कहीं बुरे के भी। हे मेरे प्रभु यीशु मसीह, तू जो अच्छा चरवाहा है, और जो हम पापियों पर शरीर की अनेक प्रकार की पीड़ाओं और वेदनाओं में अपनी दया प्रकट करता है, मुझे, अपनी छोटी भेड़ को, ऐसा अनुग्रह और ऐसी शक्ति दे कि किसी भी रोग और यातना या पीड़ा के कारण मैं कभी तुझसे अलग न होऊँ।” जब वे इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, तो स्वर्ग से एक शब्द आया जिसने कहा: “फ्रांसिस, मुझे उत्तर दे: यदि सारा संसार सोना होता, और सारे समुद्र और नदियाँ और सोते सुगन्धित बलसान होते, और सारे पहाड़ और पहाड़ियाँ और चट्टानें बहुमूल्य रत्न होते; और तुझे इन सब वस्तुओं से भी बढ़कर उत्तम एक ऐसा खज़ाना मिलता, जितना सोना मिट्टी से, और बलसान पानी से, और बहुमूल्य रत्न पहाड़ों और चट्टानों से उत्तम हैं, और यदि तेरी इस बीमारी के बदले वह उत्तम खज़ाना तुझे दिया जाता, तो क्या तू उससे भली-भाँति सन्तुष्ट और बहुत आनन्दित न होता?” संत फ्रांसिस ने उत्तर दिया: “हे प्रभु, मैं ऐसे बहुमूल्य खज़ाने के योग्य नहीं हूँ;” और परमेश्वर के शब्द ने उनसे कहा: “आनन्द कर, फ्रांसिस, क्योंकि यह अनन्त जीवन का खज़ाना है, जिसे मैंने तेरे लिये रख छोड़ा है, और इसी घड़ी से मैं इसे तेरे अधिकार में देता हूँ; और यह बीमारी और क्लेश उस धन्य खज़ाने का बयाना है।” तब संत फ्रांसिस ने ऐसी महिमामय प्रतिज्ञा के कारण बड़े आनन्द के साथ अपने साथी को बुलाया और कहा: “आओ, हम कार्डिनल के पास चलें;” परन्तु सबसे पहले पवित्र वचनों से संत क्लेयर को सांत्वना देकर, और दीनता से उनसे विदा लेकर, वे रियेती के मार्ग पर चल पड़े। और जब वे उसके निकट पहुँचे, तो लोगों की ऐसी बड़ी भीड़ उनसे मिलने को निकल आई कि इस कारण वे नगर में प्रवेश करना न चाहते थे; वरन् वे नगर के बाहर, कोई दो मील की दूरी पर स्थित एक गिरजाघर में चले गए। नगर के लोग यह जानकर कि वे उस गिरजाघर में गए हैं, उन्हें देखने के लिये ऐसे झुंड के झुंड दौड़े आए कि गिरजाघर की दाख की बारी पूरी तरह उजड़ गई, और उसके सारे अंगूर तोड़ लिये गए; इस पर पुरोहित अपने मन में बहुत दुःखी हुआ, और पछताने लगा कि उसने संत फ्रांसिस को अपने गिरजाघर में ठहराया। पुरोहित का यह विचार परमेश्वर की ओर से संत फ्रांसिस पर प्रकट हुआ, और उन्होंने उसे बुलवाकर कहा: “प्रिय पिता, जिस वर्ष यह दाख की बारी सबसे अच्छी उपज देती है, उस वर्ष यह तुम्हें कितने माप दाखरस देती है?” पुरोहित ने उत्तर दिया: “बारह माप।” संत फ्रांसिस ने कहा: “हे पिता, मैं तुमसे विनती करता हूँ कि यदि मैं यहाँ कुछ दिन ठहरूँ तो धीरज के साथ मुझे सह लेना, क्योंकि मुझे यहाँ बहुत विश्राम मिलता है; और जो कोई चाहे उसे परमेश्वर के प्रेम के कारण और मेरे, उसके दीन छोटे जन के कारण, तुम्हारी इस दाख की बारी के अंगूर तोड़ने देना; और मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के नाम में तुमसे प्रतिज्ञा करता हूँ कि यह तुम्हें हर वर्ष बीस माप देगी।” और संत फ्रांसिस ने वहाँ ठहरने के बदले में यह इसलिये किया कि वहाँ आनेवाले लोगों में से प्राणों का बड़ा फल प्रत्यक्ष रूप से बटोरा जा रहा था; उनमें से बहुत से ईश्वरीय प्रेम में मतवाले होकर लौटे, और उन्होंने संसार को त्याग दिया। पुरोहित ने संत फ्रांसिस की प्रतिज्ञा पर भरोसा किया, और अपने पास आनेवाले सब लोगों के लिये उस बारी को उदारता से छोड़ दिया। और यह देखना अचम्भे की बात थी कि दाख की बारी कैसे पूरी तरह उजड़ गई और तोड़ ली गई, यहाँ तक कि अंगूरों के गुच्छे मुश्किल से ही कहीं बचे मिलते थे। दाख तोड़ने का समय आया; और पुरोहित ने जितने गुच्छे बचे थे उन्हें इकट्ठा किया, और उन्हें कुण्ड में डालकर रौंदा, और संत फ्रांसिस की प्रतिज्ञा के अनुसार उसमें से सबसे अच्छे दाखरस के बीस माप निकले। इस आश्चर्यकर्म के द्वारा मनुष्यों के समझने के लिये यह प्रत्यक्ष रूप से दिखाया गया कि जैसे अंगूरों से उजाड़ी गई वह दाख की बारी संत फ्रांसिस के पुण्य के द्वारा दाखरस से भरपूर हुई; वैसे ही मसीही लोग, जो पाप के कारण सद्गुणों से बाँझ हो गए थे, संत फ्रांसिस के पुण्य और शिक्षा के द्वारा बहुधा पश्चाताप के अच्छे फलों से भरपूर हुए।
