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किस प्रकार असीसी के पवित्र भाई बर्नार्ड को संत फ्रांसिस ने बोलोन्या भेजा और वहाँ उन्होंने एक मठ की स्थापना की
किस प्रकार असीसी के पवित्र भाई बर्नार्ड को संत फ्रांसिस ने बोलोन्या भेजा और वहाँ उन्होंने एक मठ की स्थापना की
इसलिये कि संत फ्रांसिस और उनके साथी परमेश्वर के द्वारा बुलाए गए और चुने गए थे कि वे मसीह के क्रूस को अपने हृदयों में और अपने कामों में धारण करें और अपनी जीभ से उसका प्रचार करें, वे अपने चोगे के कारण भी और अपने कठोर जीवन, कामों और करनी के कारण भी सचमुच क्रूस पर चढ़ाए हुए मनुष्य दिखाई देते थे और वास्तव में थे भी; और इसी कारण वे संसार के आदर और मनुष्यों के सम्मान और प्रशंसा की अपेक्षा मसीह के प्रेम के लिये लज्जा और अपमान सहने की अधिक लालसा रखते थे; अपमान में वे आनन्दित होते थे और आदर पाकर उदास हो जाते थे; और इस प्रकार वे परदेशियों और यात्रियों के समान संसार में से होकर चलते थे, और क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु मसीह को छोड़ और कुछ भी अपने साथ नहीं रखते थे। और इसलिये कि वे सच्ची दाखलता की, अर्थात् मसीह की, सच्ची डालियाँ थे, वे आत्माओं का बड़ा और अच्छा फल लाए, जिन्हें उन्होंने परमेश्वर के लिये जीत लिया। धर्मसंघ के आरम्भ में ऐसा हुआ कि संत फ्रांसिस ने भाई बर्नार्ड को बोलोन्या भेजा, इस अभिप्राय से कि वह वहाँ उस अनुग्रह के अनुसार जो परमेश्वर ने उसे दिया था, परमेश्वर के लिये फल लाए; और भाई बर्नार्ड परम पवित्र क्रूस का चिन्ह बनाकर पवित्र आज्ञाकारिता के कारण चल पड़े और बोलोन्या में आ पहुँचे। और बालकों ने उन्हें दीन और घिसे-फटे चोगे में देखकर उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया और उनका बहुत ठट्ठा किया, मानो वे कोई मूर्ख हों; परन्तु भाई बर्नार्ड ने मसीह के प्रेम के लिये धीरज और आनन्द के साथ सब कुछ सह लिया; वरन् जान-बूझकर, कि उनके साथ और भी अधिक बुरा व्यवहार किया जाए, वे नगर के चौक में जा बैठे; जिससे, जब वे वहाँ बैठे थे, बहुत से बालक और पुरुष उनके चारों ओर इकट्ठे हो गए, और कुछ पीछे से और कुछ आगे से उनका टोप खींचने लगे; कुछ ने उन पर धूल फेंकी और कुछ ने पत्थर; कुछ ने उन्हें इधर धकेला और कुछ ने उधर; और भाई बर्नार्ड सदा उसी रीति से और उसी धीरज के साथ, प्रसन्न मुख से, न तो शिकायत करते थे और न तनिक भी बदलते थे; और बहुत दिनों तक वे उसी स्थान पर लौट आते रहे, केवल इसलिये कि वैसा ही व्यवहार सहें। और इसलिये कि धीरज सिद्धता का काम और सद्गुण का प्रमाण है, व्यवस्था के एक विद्वान पण्डित ने भाई बर्नार्ड की बड़ी दृढ़ता और सद्गुण को देखकर और उस पर विचार करके, कि इतने दिनों तक न कोई ताना और न कोई अपमान कभी उन्हें व्याकुल कर सका, अपने मन में यों कहा: “निश्चय यह कोई पवित्र मनुष्य होगा;” और उनके निकट आकर उसने पूछा: “तू कौन है? और तू यहाँ किसलिये आया है?” और भाई बर्नार्ड ने उत्तर में अपना हाथ अपनी छाती में डालकर संत फ्रांसिस का नियम निकाला और उसे दे दिया कि वह पढ़े; और जब उसने उसे पढ़ लिया, तो उसकी अति उच्च सिद्धता की दशा पर विचार करते हुए, अत्यन्त बड़े अचम्भे और विस्मय के साथ वह अपने साथियों की ओर मुड़ा और कहा: “सचमुच यह धर्मसंघी जीवन की सबसे ऊँची दशा है जिसके विषय में मैंने कभी सुना है; इसलिये यह मनुष्य और इसके साथी इस संसार के सबसे पवित्र मनुष्य हैं, और जो कोई इसके साथ अन्याय करता है वह अति गम्भीर पाप करता है; हमें इसका सबसे अधिक आदर करना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्वर का सच्चा मित्र है।” और उसने भाई बर्नार्ड से कहा: “यदि आपकी इच्छा एक मठ स्थापित करने की है, जिसमें आप सुविधा से परमेश्वर की सेवा कर सकें, तो मैं अपने प्राण के उद्धार के लिये बड़ी प्रसन्नता से वह आपको दूँगा।” भाई बर्नार्ड ने उत्तर दिया: “हे भले महोदय, मुझे लगता है कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने यह विचार आपके हृदय में डाला है; और इसलिये मसीह के आदर के लिये मैं आपकी भेंट को आनन्द से स्वीकार करता हूँ।” तब उस न्यायी ने बड़े आनन्द और प्रेम के साथ भाई बर्नार्ड को अपने घर ले जाकर तुरन्त वह प्रतिज्ञा किया हुआ मठ उन्हें दे दिया, और उसे पूरी रीति से तैयार किया और अपने ही खर्च से उसमें आवश्यक वस्तुएँ जुटाईं; और उस समय से वह भाई बर्नार्ड और उनके साथियों का पिता और विशेष रक्षक बन गया। और भाई बर्नार्ड अपने पवित्र जीवन के कारण लोगों में बहुत आदर पाने लगे, यहाँ तक कि जो कोई उन्हें छू और देख पाता, वह अपने आप को उससे धन्य समझता था; परन्तु उन्होंने, मसीह के और दीन फ्रांसिस के सच्चे चेले के समान, इस भय से कि संसार का आदर उनके प्राण की शान्ति और उद्धार में बाधा न डाले, एक दिन वहाँ से चलकर संत फ्रांसिस के पास लौट आए और उनसे यों कहा: “हे पिता, बोलोन्या नगर में मठ की स्थापना हो गई है; वहाँ भाइयों को भेजिए कि वे उसे सम्भालें और उसमें रहें; क्योंकि अब मुझे वहाँ कोई लाभ नहीं, वरन् मुझे दिए गए अत्यधिक आदर के कारण मुझे डर है कि जितना मैंने पाया उससे अधिक खो दिया है।” तब संत फ्रांसिस ने सब बातें क्रम से जानकर, कि परमेश्वर ने भाई बर्नार्ड के द्वारा कैसे कार्य किया, परमेश्वर का धन्यवाद किया, जो इस प्रकार क्रूस के दीन-हीन छोटे चेलों को बढ़ाने लगा था; और तुरन्त उन्होंने अपने साथियों में से कुछ को बोलोन्या और लोम्बार्डी में भेजा, जिन्होंने भिन्न-भिन्न स्थानों में बहुत से मठ स्थापित किए।
