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उस अद्भुत धर्मसंघ की सभा (चैप्टर) के विषय में जो संत फ्रांसिस ने स्वर्गदूतों की संत मरियम में की, और जिसमें पाँच हज़ार से अधिक भाई थे
मसीह के विश्वासयोग्य सेवक फ्रांसिस ने एक बार स्वर्गदूतों की संत मरियम में धर्मसंघ की एक आम सभा (चैप्टर) की, और उस सभा में पाँच हज़ार से अधिक भाई इकट्ठे हुए; और वहाँ संत डोमिनिक भी आए, जो प्रचारक भाइयों के धर्मसंघ के प्रधान और संस्थापक थे, और जो उस समय बोर्गोन्या से रोम की ओर जा रहे थे। और उस सभा के समागम का समाचार सुनकर, जो संत फ्रांसिस स्वर्गदूतों की संत मरियम के मैदान में कर रहे थे, वे अपने धर्मसंघ के सात भाइयों के साथ उसे देखने गए। उस सभा में एक कार्डिनल भी था जो संत फ्रांसिस का अत्यन्त भक्त था, और जिसके विषय में उन्होंने भविष्यद्वाणी की थी कि वह पोप होगा, और ऐसा ही हुआ; वह कार्डिनल जान-बूझकर पेरूजिया से, जहाँ पोप का दरबार था, असीसी आया था; वह प्रतिदिन संत फ्रांसिस और उनके भाइयों को देखने आता था, और कभी वह मिस्सा गाता, और कभी सभा में भाइयों को उपदेश देता; और जब कभी वह इस पवित्र मण्डली से भेंट करने आता, तब उस कार्डिनल को अत्यन्त बड़ा आनन्द और भक्ति का अनुभव होता था। और भाइयों को संत मरियम के चारों ओर मैदान में टोलियाँ बाँधकर बैठे देखकर, कहीं चालीस, कहीं सौ, कहीं अस्सी एक साथ, और सब के सब परमेश्वर की चर्चा में, प्रार्थनाओं में, आँसुओं में, और प्रेम के कामों में लगे हुए, और सब ऐसी चुप्पी और ऐसी मर्यादा में रहते हुए कि कोई शोर या झगड़े का कोई शब्द सुनाई न देता था; और इतनी बड़ी भीड़ को ऐसे क्रम से व्यवस्थित देखकर अचम्भा करते हुए, उसने आँसुओं और गहरी भक्ति के साथ कहा: “सचमुच यह परमेश्वर के सूरमाओं की छावनी और सेना है।” और इतनी बड़ी भीड़ में न कोई व्यर्थ बात सुनाई देती थी और न कोई मूर्खता भरा ठट्ठा; वरन् जहाँ कहीं भाइयों की कोई टोली इकट्ठी होती, वहाँ वे या तो प्रार्थना करते, या प्रार्थना-विधि पढ़ते, और अपने पापों पर या अपने उपकारियों के पापों पर विलाप करते, या प्राणों के उद्धार के विषय में चर्चा करते थे। उस छावनी में बेंत की टहनियों और सरकंडे की चटाइयों की छतें थीं, जो अलग-अलग प्रान्तों के भाइयों के अनुसार टोलियों में अलग-अलग बनाई गई थीं; और इसी कारण यह सभा “टट्टियों की सभा” या “चटाइयों की सभा” कहलाई; उनका बिछौना नंगी भूमि थी, और जिनके पास था उनके लिये थोड़ा-सा पुआल; उनके तकिये पत्थर या लकड़ी के कुन्दे थे। इस कारण जो कोई उन्हें सुनता या देखता, उसके मन में उनके प्रति ऐसी बड़ी भक्ति उत्पन्न होती थी, और उनकी पवित्रता की ऐसी बड़ी ख्याति थी, कि पोप के दरबार से, जो उस समय पेरूजिया में था, और स्पोलेतो की घाटी के अन्य भागों से बहुत से काउंट, बैरन, और सूरमा, और अन्य कुलीन लोग, और बहुत से देहाती लोग, और कार्डिनल और बिशप और मठाधीश, और बहुत से अन्य याजकवर्ग के लोग इस पवित्र समागम को देखने आए, जो इतना बड़ा और इतना दीन था, और जैसा संसार ने पहले कभी नहीं देखा था, कि इतने सारे पवित्र पुरुष एक साथ हों: और सबसे बढ़कर वे उस पवित्र दल के प्रधान और परम पवित्र पिता को देखने आए, जिसने संसार से ऐसा सुन्दर शिकार छीन लिया था, और सच्चे चरवाहे यीशु मसीह के पदचिह्नों पर चलने के लिये ऐसा भक्त और सुन्दर झुंड इकट्ठा किया था। जब आम सभा पूरी रीति से इकट्ठी हो गई, तब सबके पवित्र पिता और मिनिस्टर-जनरल संत फ्रांसिस ने आत्मा के जोश में परमेश्वर का वचन सुनाया, और जैसे पवित्र आत्मा ने उन्हें बोलने की शक्ति दी वैसे ही ऊँचे शब्द से उन्हें उपदेश दिया; और अपने उपदेश के विषय के रूप में उन्होंने उनके सामने ये वचन रखे: “हे मेरे बालको, हमने परमेश्वर से बड़ी-बड़ी बातों की प्रतिज्ञा की है, परमेश्वर ने हमसे उनसे कहीं बढ़कर बड़ी बातों की प्रतिज्ञा की है, यदि हम वह पूरा करें जिसकी प्रतिज्ञा हमने उससे की है; और निश्चय हम वह देखेंगे जिसकी प्रतिज्ञा हमसे की गई है। संसार का आनन्द थोड़े दिन का है; उसके पीछे आनेवाली पीड़ा अनन्त है; इस जीवन के दुःख थोड़े हैं, परन्तु दूसरे जीवन की महिमा असीम है।” और इन वचनों पर अत्यन्त भक्ति से उपदेश देते हुए उन्होंने भाइयों को शान्ति दी, और उनके हृदयों को पवित्र माता कलीसिया के प्रति आज्ञाकारिता और आदर की ओर, और भाईचारे के प्रेम की ओर फेरा, कि सब मनुष्यों के लिये परमेश्वर से प्रार्थना करें, और संसार की विपत्तियों में धीरज रखें, और समृद्धि में संयम रखें, मर्यादा और स्वर्गदूतों के समान पवित्रता (ब्रह्मचर्य) का पालन करें, और परमेश्वर के साथ और मनुष्यों के साथ और अपने विवेक के साथ शान्ति और मेल रखें, और परम पवित्र दरिद्रता से प्रेम करें और उसका पालन करें। और इसके साथ उन्होंने उनसे कहा:
“हे यहाँ इकट्ठे हुए तुम सब लोगो, मैं तुम्हें पवित्र आज्ञाकारिता के पुण्य की दुहाई देकर आज्ञा देता हूँ कि तुम में से कोई भी खाने की किसी वस्तु के लिये या शरीर की किसी आवश्यकता के लिये कोई चिन्ता या विचार न करे, वरन् अपने सारे विचार प्रार्थना और परमेश्वर की स्तुति में लगाओ; और अपने शरीर की सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको कोमलता से तुम्हारा ध्यान है।” और उन सब ने यह आज्ञा आनन्दित हृदय और प्रफुल्लित मुख से ग्रहण की; और जब संत फ्रांसिस का उपदेश समाप्त हुआ, तो वे सब प्रार्थना में गिर पड़े। इस पर संत डोमिनिक, जो इन सब बातों के समय वहाँ उपस्थित थे, संत फ्रांसिस की इस आज्ञा पर अत्यन्त अचम्भित हुए, और उन्हें अविवेकी समझा, क्योंकि उनकी समझ में न आता था कि इतनी बड़ी भीड़ शरीर की आवश्यकताओं का विचार या चिन्ता किए बिना कैसे जीवित रह सकती है। परन्तु प्रधान चरवाहे, धन्य मसीह ने, यह दिखाना चाहकर कि उसे अपनी भेड़ों की कैसी चिन्ता है और अपने दीनों से कैसा कोमल प्रेम है, तुरन्त पेरूजिया, स्पोलेतो, फ़ुलिन्यो, स्पेल्लो और असीसी के लोगों के, और आसपास के बाकी सारे देश के लोगों के हृदयों में यह बात डाली कि वे इस पवित्र मण्डली के लिये खाना और पीना ले आएँ। और देखो! पूर्वोक्त स्थानों से एकाएक लोग लदुए पशुओं, घोड़ों और गाड़ियों के साथ आए, जिन पर रोटी, दाखरस, मधु के छत्तों, और पनीर, और खाने की अन्य अच्छी वस्तुओं के बोझ लदे थे, जैसी मसीह के दीनों को आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त वे इतनी बड़ी भीड़ की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये अंगोछे, सुराहियाँ, प्याले, गिलास और अन्य बर्तन भी लाए; और जो कोई सबसे अधिक ला सकता या सबसे अधिक लगन से सेवा कर सकता, वह अपने आप को धन्य समझता था; यहाँ तक कि वे सूरमा और बैरन और अन्य कुलीन लोग भी जो देखने आए थे, बड़ी भक्ति और दीनता से उनकी सेवा करते थे। इस कारण संत डोमिनिक ने, ये बातें देखकर और सचमुच यह जानकर कि परमेश्वर का प्रबन्ध उनमें काम कर रहा है, दीनता से पछताए कि उन्होंने संत फ्रांसिस को झूठमूठ अविवेकी ठहराया था; और उनके सामने आकर उन्होंने घुटने टेके, और दीनता से अपना दोष मान लिया, और यह भी कहा: “सचमुच परमेश्वर इन पवित्र दीन छोटों की विशेष चिन्ता करता है, और मैं यह नहीं जानता था; और अब से मैं सुसमाचार की पवित्र दरिद्रता का पालन करने की प्रतिज्ञा करता हूँ; और परमेश्वर के नाम में मैं अपने धर्मसंघ के उन सब भाइयों को शाप देता हूँ जो उक्त धर्मसंघ में सम्पत्ति रखने का साहस करेंगे।” इस प्रकार संत डोमिनिक ने परम पवित्र फ्रांसिस के विश्वास से, और इतनी बड़ी और सुव्यवस्थित मण्डली की दरिद्रता की आज्ञाकारिता से, और ईश्वरीय प्रबन्ध से, और सब अच्छी वस्तुओं की भरपूर बहुतायत से बहुत आत्मिक उन्नति पाई। उसी सभा में संत फ्रांसिस को बताया गया कि बहुत से भाई अपने नंगे शरीर पर लोहे के छोटे-छोटे हृदय और पट्टे पहनते हैं, जिस कारण बहुत से दुर्बल हो गए थे और कुछ तो उसके कारण मर रहे थे, और बहुतों को प्रार्थना करने में रुकावट और बाधा होती थी। इसलिये संत फ्रांसिस ने एक अत्यन्त बुद्धिमान पिता के समान पवित्र आज्ञाकारिता के अधीन यह आज्ञा दी कि जिस किसी के पास लोहे का छोटा हृदय या पट्टा हो, वह उसे उतारकर उनके सामने रख दे; और उन्होंने वैसा ही किया; और पूरे पाँच सौ लोहे के छोटे हृदय गिने गए, और उनसे कहीं अधिक पट्टे, बाँहों के भी और कमर के भी; यहाँ तक कि उनका एक बड़ा ढेर लग गया; और संत फ्रांसिस ने उन्हें वहीं छोड़ दिलवाया। सभा समाप्त होने के बाद संत फ्रांसिस ने उन्हें भले कामों में दृढ़ करते हुए, और यह सिखाते हुए कि उन्हें इस दुष्ट संसार से पाप के बिना कैसे बच निकलना चाहिए, परमेश्वर की और अपनी आशीष के साथ उन्हें फिर से उनके प्रान्तों को लौटा दिया, और वे सब आत्मिक आनन्द से सांत्वना पाए हुए थे।
