अध्याय 5

खण्ड II — अनन्त पूर्वनियति

Calvin's Calvinism · John Calvin

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खण्ड II — अनन्त पूर्वनियति

अनन्त पूर्वनियति — खण्ड 2

परन्तु मैं पूछता हूँ, यह नश्वर मनुष्य किसकी आँखों को ऐसा बेध या फोड़ सकेगा कि वे उसकी मूर्खताओं को देख ही न पाएँ? पौलुस इतने विशेष ढंग से यह क्यों कहता है कि बालकों ने न तो कुछ भला किया था और न बुरा? क्या इसीलिए नहीं कि वह उनमें पुण्य के सब विचार को दूर कर दे? और क्यों? क्या इसीलिए नहीं कि वह निश्चयपूर्वक कह सके कि जब परमेश्वर ने उन जुड़वाँ भाइयों के विषय में ऐसा भिन्न निर्णय सुनाया, तो उसने अपने कारण अपने ही मन और इच्छा के सिवा किसी और स्रोत से नहीं लिए? मैं भली-भाँति जानता हूँ कि परमेश्वर के मन में वर्तमान या भावी पुण्य के इस कल्पित विचार का सहारा लेना कितना प्रचलित बचाव का मार्ग है। परन्तु पहले मैं यह प्रश्न पूछना चाहूँगा: यदि एसाव और याकूब अपने साझे स्वभाव की चाल पर ही छोड़ दिए जाते, तो परमेश्वर को उनमें से पहले की अपेक्षा दूसरे में कितने अधिक भले कर्म मिलते? निस्सन्देह दोनों में पत्थर-हृदय की कठोरता ही उद्धार को, जब वह प्रस्तुत किया जाता, ठुकरा देती। परन्तु (पिगियस कहता है) दोनों को एक लचीला हृदय दिया गया था, ताकि वे प्रस्तुत किए गए अनुग्रह को ग्रहण कर सकें; पर एक ने वह करना चाहा जो वह अपनी स्वतंत्र इच्छा से कर सकता था, और दूसरे ने उसे करने से इनकार कर दिया। मानो प्रेरित यह गवाही दे रहा हो कि एसाव की अनिच्छा और इनकार भी परमेश्वर की ओर से दिए गए थे! और मानो परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा नहीं की कि वह अपने इस्राएल को अपनी आज्ञाओं पर चलने के योग्य बनाएगा!

परन्तु पिगियस के निर्णय के अनुसार यूहन्ना ऊँचे स्वर में इस बात का खण्डन करता है कि परमेश्वर हमें “परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार” देता है। अब यह पागल मनुष्य पहले तो इसी में पूरी तरह चूक जाता है कि वह “अधिकार” का अर्थ सामर्थ्य या योग्यता लेता है, जबकि उसका अर्थ तो योग्य ठहरना अथवा सम्मान का अधिकार या स्वत्व है। परन्तु वह घोर मूर्खता से भी बढ़कर मूर्खता प्रकट करता है जब वह इस “अधिकार” के कारण को, जिसे सुसमाचार-लेखक ने इतने स्पष्ट रूप से बताया है, मानो आँखें मूँदकर छोड़ देता है; क्योंकि वह घोषणा करता है कि परमेश्वर की सन्तान वे बनते हैं जो मसीह को ग्रहण करते हैं, और तुरन्त आगे कहता है कि “ये न तो मांस से, न लहू से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।” इसलिए परमेश्वर उन्हें लेपालकपन के सम्मान के योग्य ठहराता है जो उसके पुत्र पर विश्वास करते हैं, परन्तु जिन्हें वह पहले ही अपने आत्मा से उत्पन्न कर चुका था; अर्थात् जिन्हें उसने अपने लिए अपनी सन्तान होने को रचा था, उन्हें वह अन्त में प्रकट रूप से वैसा घोषित करता है। क्योंकि यदि विश्वास हमें परमेश्वर की सन्तान बनाता है, तो अगला विचारणीय प्रश्न यह है कि विश्वास कहाँ से आता है? उसे हमें कौन देता है? वह आत्मा के उस बीज का फल है जिसके द्वारा परमेश्वर हमें नए जीवन के लिए फिर से उत्पन्न करता है।

सारांश यह कि अगस्तीन की गवाही अत्यन्त सत्य है: “छुड़ाए हुए लोग विनाश की सन्तानों से केवल अनुग्रह के द्वारा ही अलग किए जाते हैं; और उन छुड़ाए हुओं को भी मूल भ्रष्टता का वह साझा पिण्ड परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह के बिना उसी विनाश में समेट ले जाता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस अनुग्रह का प्रचार किया जाना चाहिए वह वही है जिसके द्वारा वह मनुष्यों को अपने चुने हुए बनाता है, वह नहीं जिसके द्वारा वह उन्हें वैसा पाता है।” और यही बात वही पवित्र पिता निरन्तर सिखाता रहता है। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि यदि परमेश्वर अपने चुने हुओं में कुछ ऐसा पहले से देखता है, जिसके कारण वह उन्हें त्यागे हुओं से अलग करता है, तो प्रेरित का यह तर्क देना कि यह “कर्मों से नहीं, परन्तु बुलानेवाले की ओर से है”, इस कारण कि परमेश्वर ने कहा था, “बड़ा छोटे का दास होगा”, जब बालक अभी जन्मे भी नहीं थे, सर्वथा निरर्थक होता। इसलिए परमेश्वर की अनन्त पूर्वनियति की कठिनाई को सुलझाने का यह व्यर्थ प्रयास कि चुने हुओं के भावी जीवन के कर्मों और पुण्यों का पूर्वज्ञान मान लिया जाए, प्रेरित पौलुस और उसकी ईश्वरीय गवाही का खुला अपमान है। पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर के अपने लोगों के चुनाव में कर्मों का कोई विचार नहीं था, क्योंकि उसने याकूब को उसके भाई के ऊपर उनके जन्म से पहले, और उनके “भला या बुरा” कुछ करने से पहले ही चुन लिया। परन्तु चुनाव के ये विरोधी अपने सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिए, कि परमेश्वर ने उन्हीं को चुना जिन्हें भलाई के किसी चिह्न ने त्यागे हुओं से अलग किया था, यह दिखाना चाहेंगे कि परमेश्वर ने पहले से देख लिया था कि प्रत्येक व्यक्ति में प्रस्तुत अनुग्रह को ग्रहण करने या ठुकराने की कैसी प्रवृत्ति होगी। और मान लीजिए कि प्रेरित का यह कथन, “न तो कुछ भला किया था न बुरा”, इन लोगों द्वारा स्वीकार भी कर लिया जाए; तो भी उनके सिद्धान्त के अनुसार परमेश्वर कर्मों के अनुसार ही चुनाव कर रहा होगा, क्योंकि उसका चुनाव उसके द्वारा पहले से देखे गए भावी कर्मों पर निर्भर होगा। परन्तु चूँकि प्रेरित उस बात को स्वीकृत तथ्य मानता है जिसे इन उत्कृष्ट धर्मवेत्ताओं ने सर्वथा अस्वीकार कर दिया है, कि सब मनुष्य समान रूप से अयोग्य हैं और सबका स्वभाव समान रूप से भ्रष्ट है, इसलिए वह निश्चिन्त होकर यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर ने जिन्हें चुना उन्हें अपनी ही सद्इच्छा और ठहराव से चुना, इसलिए नहीं कि उसने पहले से देखा था कि वे उसके आज्ञाकारी सन्तान होंगे। फिर, प्रेरित यह गहराई से विचार कर रहा है कि परमेश्वर के चुनाव के बिना मनुष्यों का स्वभाव कैसा होता। परन्तु ये लोग इस स्वप्न में हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य में कौन-सी भलाई पहले से देखी, जो भलाई कभी हो ही नहीं सकती थी जब तक वह स्वयं उसे उत्पन्न न करता।

यद्यपि ये बातें अपने आप में बहुत स्पष्ट हैं, तो भी प्रेरित का सन्दर्भ हमें इस पवित्र विषय में और भी गहराई में ले जाता है। वह इस प्रकार आगे बढ़ता है: “तो हम क्या कहें? क्या परमेश्वर के यहाँ अन्याय है?” अब या तो यह कल्पित आपत्ति बिना किसी कारण के प्रस्तुत की गई है, या फिर पौलुस की शिक्षा में पहले से देखे गए कर्मों के लिए कोई स्थान नहीं है। क्योंकि जहाँ परमेश्वर सब को समान रूप से अनुग्रह देता है, और जो उसके योग्य ठहरते हैं उन्हें उसका आनन्द लेने देता है, वहाँ अन्याय का क्या सन्देह उठ सकता है? संक्षेप में, जब ये आपत्ति करनेवाले चुनाव या त्याग का कारण आगामी जीवन के मनुष्यों के कर्मों में रखते हैं, तो वे मानो उसी प्रश्न से, जिसे पौलुस उनकी ओर से आपत्ति के रूप में उठाया गया मानता है, बच निकलते हैं और अपने ही सन्तोष के अनुसार उसे सुलझा लेते हैं। इससे पूरी तरह स्पष्ट है कि प्रेरित को इस नई बुद्धि की शिक्षा नहीं मिली थी। क्योंकि मान लीजिए कि प्रेरित ऐसे लोगों को, जो परमेश्वर के न्याय से झगड़ते हैं, बिलकुल अनुचित रूप से और बिना किसी तर्क के सामने ला रहा है। तो भी देखें कि वह जिस आपत्ति की कल्पना करता है उसे किस रीति से हटाता है: “कदापि नहीं! क्योंकि वह मूसा से कहता है, मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उसी पर कृपा करूँगा।”

मुझे नहीं दिखता कि इस अंश की व्याख्या में अगस्तीन के शब्दों का यहाँ उपयोग करने से अधिक उपयुक्त कुछ और होगा: “यह देखकर आश्चर्य होता है (वह कहता है) कि हमारे विरोधी जब इन भारी संकटों में अपने को घिरा पाते हैं तो सत्य के जालों से बचने के लिए किन खाइयों में कूद पड़ते हैं। वे कहते हैं कि परमेश्वर ने उन बालकों में से एक से घृणा की और दूसरे से प्रेम किया, जबकि वे अभी जन्मे नहीं थे, क्योंकि उसने पहले से देख लिया था कि उनके भावी जीवन के कर्म कैसे होंगे। कैसा आश्चर्य है कि इतने बड़े विषय में परमेश्वर के मन की यह तीक्ष्ण दृष्टि प्रेरित से बिलकुल छूट गई! उसने ऐसा कुछ नहीं देखा, कठिनाई का ऐसा सरल समाधान नहीं देखा जैसा उसके विरोधी चाहते हैं। उसके उत्तर से प्रकट होता है कि मामला उतना संक्षिप्त, उतना सीधा, उतना स्पष्ट सत्य, उतना सर्वथा स्पष्ट नहीं था जितना ये विरोधी समझते हैं। क्योंकि जब उसने हमारे मनन के लिए ऐसी विस्मयकारी बात रखी कि दो बालकों के विषय में, जो अभी जन्मे नहीं थे और जिन्होंने न भला किया था न बुरा, यह कैसे ठीक कहा जा सकता है कि परमेश्वर ने एक से प्रेम किया और दूसरे से घृणा; तब उसने संक्षेप में और गम्भीरता से जोड़ा, ‘तो हम क्या कहें? क्या परमेश्वर के यहाँ अन्याय है?’ अब यही वह स्थान था जहाँ हमारे विरोधियों की गढ़ी हुई व्याख्या डाली जा सकती थी: ‘क्योंकि परमेश्वर ने उनके भावी कर्मों को पहले से देख लिया था।’ परन्तु प्रेरित ऐसा कुछ नहीं करता। इसके विपरीत, कि कोई अपने कर्मों के पुण्य पर घमण्ड करने का साहस न करे, वह मूसा से कहे गए परमेश्वर के उस निर्णायक वचन को सामने रखकर केवल परमेश्वर के अनुग्रह की सराहना करता है: ‘क्योंकि वह मूसा से कहता है, मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उसी पर कृपा करूँगा।’ अब पुण्य कहाँ रहे? कर्म कहाँ हैं, चाहे बीते हुए हों या आनेवाले, चाहे पूरे किए गए हों या पूरे किए जाने को हों, मानो स्वतंत्र इच्छा के बल या सामर्थ्य से? क्या प्रेरित केवल सेंतमेंत अनुग्रह की प्रशंसा में अपना मन खुलकर प्रकट नहीं करता?” अगस्तीन के शब्दों पर मेरा विचार यहीं तक है।

पर क्षण भर के लिए मान लें कि प्रेरित ने इसहाक के दो पुत्रों वाला कोई तर्क प्रस्तुत किया ही नहीं। (और वास्तव में, यदि समाधान इतना सरल और सन्तोषजनक है कि परमेश्वर ने दोनों बालकों में उनके भावी कर्मों को ध्यान में रखकर भेद किया, तो प्रेरित अपने आप को और अधिक क्यों उलझाता, और यह क्यों कहता कि किए गए भेद का कारण केवल परमेश्वर की इच्छा में है?) तो भी परमेश्वर ने आरम्भ में ही मूसा से अपनी बातचीत में अपने लिए यह स्वतंत्र अधिकार माँगा था कि वह जैसे और जिन पर चाहे अपनी दया करे। और यह उसने इसलिए किया कि कोई भी उसके कार्यों के लिए व्यवस्था निर्धारित करने का साहस न करे। तब उसने खुलकर घोषणा की कि वह लोगों की सारी भीड़ में से जिन्हें चाहेगा निकाल लेगा और उन्हें छुड़ाएगा; और सब के सब समान रूप से वाचा तोड़नेवाले थे। उसने यह नहीं कहा कि उनका चुनाव उन्हीं पर निर्भर होगा; कि यदि वह किसी को क्षमा के योग्य पाएगा तो ऐसों पर दया करेगा। परन्तु उसने स्पष्ट घोषणा की कि वह अपनी दया का स्वामी, प्रभु और निर्णायक होगा; कि वह जिसे बचाना चाहेगा बचाएगा, किसी आवश्यकता से बँधा हुआ नहीं कि इसे या उसे चुने। और तब प्रेरित वह निष्कर्ष निकालता है जो मूसा से कही गई परमेश्वर की उस घोषणा से अनिवार्य रूप से निकलता है: कि “यह न तो चाहनेवाले की न दौड़नेवाले की, परन्तु परमेश्वर की दया से है।” क्योंकि यदि मनुष्यों का उद्धार केवल परमेश्वर की दया पर निर्भर है, और यदि परमेश्वर उन्हीं को बचाता है जिन्हें उसने अपनी गुप्त सद्इच्छा से चुना, तो उद्धार के विषय में मनुष्यों के करने, चाहने या निश्चय करने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह जाता।

अब पिगियस इस गम्भीर प्रसंग की व्याख्या यों करता है: कि उद्धार हमारे किसी प्रयत्न या हमारे किसी कर्म के कारण नहीं है, इसलिए कि परमेश्वर हमें उस उद्धार के लिए सेंतमेंत बुलाता है। वह अपने मतों से निश्चिन्त होकर मन बहलाता है, यह कल्पना करते हुए कि अपने एक ही शब्द से वह प्रेरित की पूरी शिक्षा को एक साथ सहज ही मिटा सकता है। जबकि पौलुस का निष्कर्ष इस प्रकार निकलता है: क्योंकि परमेश्वर जिन्हें बचाता है उन्हें अपनी ही निरपेक्ष सद्इच्छा से चुनता है, उनके जीवन के कर्मों के दूसरों के कर्मों और जीवन से भिन्न होने के कारण नहीं; इसलिए “यह न तो चाहनेवाले की न दौड़नेवाले की, परन्तु परमेश्वर की दया से है”; और इस प्रकार सब कुछ केवल परमेश्वर की दया पर टिका देता है। परन्तु पिगियस समझता है कि जब वह यह बात करता है कि अनुग्रह सब पर फैलाया गया है, जबकि वह किसी का अधिकार नहीं है, तब वह साफ बच निकला है। और जब वह कहता है कि अनुग्रह के भागी वे बनते हैं जिन्हें प्रभु अपने प्रति भली मनोवृत्ति वाला और आज्ञाकारी पाता है, तो अन्त में उसे यह मानने को विवश होना पड़ता है कि “चाहना” और “दौड़ना” दोनों कुछ तो काम आते हैं; परन्तु चूँकि वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए विजय का मुकुट परमेश्वर की दया को ही दिया जाना चाहिए।

इन सब मूर्खताओं का वही अगस्तीन अत्यन्त उत्कृष्ट रीति से खण्डन करता है: “यदि (वह कहता है) मूसा इसलिए कहता है, ‘यह न तो चाहनेवाले की न दौड़नेवाले की, परन्तु परमेश्वर की दया से है,’ कि वह दोनों से होता है — अर्थात् मनुष्य की इच्छा और परमेश्वर की दया, दोनों से — तो यह कहने के समान है कि केवल मनुष्य की इच्छा पर्याप्त नहीं, जब तक उसमें परमेश्वर की दया न मिले; और न केवल परमेश्वर की दया ही पर्याप्त है जब तक उसमें मनुष्य की इच्छा न मिले। फिर, यदि कोई मसीही यह कहने का साहस नहीं करता कि यह दया करनेवाले परमेश्वर की ओर से नहीं, परन्तु चाहनेवाले मनुष्य की ओर से है, तो स्पष्टतः हमें यह समझना चाहिए कि यह न चाहनेवाले की न दौड़नेवाले की है, ताकि सारी महिमा परमेश्वर को दी जाए, जो मनुष्य की इच्छा को, जब वह भली बना दी जाती है, अपनी सहायता पाने के योग्य तैयार करता है, और इस प्रकार तैयार होने पर उसकी सहायता करता है। इसलिए उन कुछ लोगों की चतुराई-भरी युक्ति और भी अधिक मूर्खतापूर्ण है जो इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों से यह निष्कर्ष तानते हैं कि परमेश्वर की दया और मनुष्य के प्रयत्नों के बीच एक प्रकार का सहयोग, या आधे रास्ते का मिलन होता है। मानो पौलुस का अर्थ यह हो कि मनुष्य दौड़कर बहुत थोड़ा ही कर सकते हैं जब तक परमेश्वर का अनुग्रह उनकी सहायता न करे! जबकि प्रेरित और सब कुछ को शून्य कर देता है ताकि परमेश्वर की दया को पूरा और खाली स्थान दे। क्योंकि सब सही दौड़ का आरम्भ कहाँ से है? क्या कोई अपने आप परमेश्वर से मिलने जा सकता है? क्या वह यह कर सकता है, जब तक पवित्र आत्मा उसे न चलाए और न दिखाए?”

यहाँ भी मुझे अगस्तीन की ही भाषा अपनाने दें। “प्रतिदिन वे लोग मसीह की ओर खींचे जाते हैं (वह कहता है) जो उसके शत्रु थे। ‘कोई मेरे पास नहीं आ सकता (मसीह कहता है) जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले।’ वह यह नहीं कहता कि ‘उसे ले आए’, मानो मनुष्य की इच्छा किसी रीति से पहले आती हो; क्योंकि जो पहले से जाने को तैयार है उसे खींचा कैसे जाए? परन्तु जो परमेश्वर का चुना हुआ है वह उसके द्वारा आश्चर्यजनक रीति से खींचा जाता है, जो मनुष्यों के हृदयों में काम करना जानता है। इसलिए नहीं कि वे अपनी इच्छा के विरुद्ध, या अनिच्छा से, विश्वास करने को विवश किए जाएँ, परन्तु इसलिए कि जो पहले अनिच्छुक थे वे इच्छुक बनाए जाएँ। इससे हम देखते हैं कि मनुष्य का परमेश्वर द्वारा अनन्त चुनाव इस पीछे आनेवाली ‘दौड़’ से प्रमाणित होता है; परन्तु इस प्रकार प्रमाणित होता है कि केवल परमेश्वर की दया (जो गिरे हुओं को उठाती है, भटके हुओं को मार्ग पर लौटा लाती है; वरन् मरे हुओं को जिलाती है और जो नहीं हैं उन्हें ऐसे बुलाती है मानो वे हैं) को ही सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।”

अब हमें त्यागे हुओं के विषय में प्रेरित के वाक्य के शेष अंगों पर विचार करना है। इनमें से पौलुस हमारे सामने फिरौन को सबसे प्रमुख उदाहरण के रूप में रखता है। क्योंकि परमेश्वर स्वयं मूसा के द्वारा उसके विषय में यों कहता है: “वरन् सचमुच इसी कारण मैंने तुझे खड़ा किया है कि तुझे अपनी सामर्थ्य दिखाऊँ।” इस अंश को प्रेरित ने विश्वासयोग्यता से, मानो शब्द-दर-शब्द, यों प्रस्तुत किया है: “मैंने तुझे इसी लिए खड़ा किया कि तुझ में अपनी सामर्थ्य दिखाऊँ।” यहाँ प्रयुक्त क्रिया हिफ़ील रूप की है, जो मूल धातु आमद से बनी है, जिसका अर्थ है “खड़ा होना।” इसलिए फिरौन के विषय में यह घोषित किया गया है कि उसे खुले रूप में और प्रमुखता से आगे रखा गया, ताकि परमेश्वर उसे अपनी सामर्थ्य का एक स्मरणीय उदाहरण बना सके। अब परमेश्वर ने फिरौन को किस दशा या अवस्था से लिया कि उसे उस स्थान पर रखे? पिगियस चाहता है कि परमेश्वर ने उसे, जब वह मृत्यु के योग्य था, कुछ समय तक अपनी सामर्थ्य से सम्भाले रखा। मान लीजिए मैं उसे बचाव के ऐसे आवरण की शरण लेने दूँ; तो भी वह इस तथ्य में उलझा और जकड़ा रहता है कि परमेश्वर ने फिरौन को उसकी अपनी इच्छा और झुकाव पर छोड़कर उसे विनाश के लिए ठहराया।

यदि पिगियस यहाँ परमेश्वर की धीरजवन्तता पर ठहरना चाहता है, तो मैं उससे पूरी तरह सहमत हूँ; तो भी यह तथ्य स्थिर और अटल रहता है कि त्यागे हुए लोग परमेश्वर के ठहराव में उसी उद्देश्य के लिए अलग रखे गए हैं कि उनमें परमेश्वर अपनी सामर्थ्य प्रकट करे। और यह कि इस उदाहरण में परमेश्वर की धीरजवन्तता प्रेरित के मन और तर्क से बहुत दूर है, इससे प्रमाणित होता है कि वह तुरन्त ही यह निष्कर्ष निकालता है: “वह जिसे चाहता है कठोर कर देता है।” यह उसने तब तक नहीं जोड़ा होता जब तक “तुझे खड़ा किया” कथन के अन्तर्गत उसका आशय परमेश्वर के उस ठहराव को सम्मिलित करना न होता, जिससे फिरौन इसलिए ठहराया गया कि अपने हठ के द्वारा परमेश्वर के लोग इस्राएल के छुटकारे को महिमा दे। क्योंकि यदि कोई कहे कि फिरौन का “खड़ा किया जाना” उसके ऊपर से राजकीय सम्मान के शिखर तक उठाए जाने का सूचक था, तो वह बात का कुछ भाग तो है, पर सम्पूर्ण नहीं। क्योंकि सत्तर अनुवादकों ने यहाँ वही शब्द प्रयुक्त किया है जिससे वे उस हिफ़ील क्रिया का अनुवाद करते हैं जो मूल धातु कूम, “उठना”, से निकली है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह उसे “खड़ा करता” है जिसे वह मानो बढ़ाई हुई भुजा से इसलिए सम्पन्न कराता है कि वह उस उद्देश्य को पूरा करे जो उसने ठहराया है। पवित्रशास्त्र यहाँ मुख्यतः जिस बात का वर्णन कर रहा है उसके आरम्भ या प्रथम कारण को देखता है, ताकि सब कुछ केवल परमेश्वर को ही सौंपे। इसी रीति से परमेश्वर के विषय में यह भी कहा जाता है कि वह भविष्यद्वक्ताओं और उद्धार के सेवकों को “खड़ा करता” है, ताकि कोई मनुष्य इनमें से किसी बात को अपने परिश्रम के आधार पर अपना न ठहराए। इसलिए मूसा का अर्थ “खड़ा किया” शब्द द्वारा विश्वासयोग्यता से प्रकट किया गया है, यदि आप उसे वैसे ही ग्रहण करें; और पौलुस ने भी उसे किसी और रूप में ग्रहण नहीं किया। और निश्चय ही “खड़ा किया” कथन उस बात को, जिसे उसने चुने हुओं और त्यागे हुओं दोनों के विषय में छुआ था, उतनी ही स्पष्टता से जितनी संक्षेप से समेटता है; क्योंकि वह परमेश्वर के लिए यह अधिकार और सामर्थ्य माँग रहा है कि वह अपनी इच्छा और ठहराव के अनुसार जिस पर चाहे दया करे और जिसे चाहे कठोर करे। इसलिए प्रेरित यह दृढ़ता से कहता है कि कठोर करने और दया दिखाने का अधिकार केवल परमेश्वर के हाथ में है, और उसके कार्यों के लिए कोई व्यवस्था मापदण्ड के रूप में उस पर नहीं थोपी जा सकती, क्योंकि उसकी अपनी इच्छा से अधिक अच्छी, बड़ी या न्यायपूर्ण कोई व्यवस्था या मापदण्ड सोचा ही नहीं जा सकता!

परन्तु जैसे कुछ लोग पहले यह चाहते थे कि प्रेरित यहाँ दुष्टों को परमेश्वर के विरुद्ध बकवाद करते हुए प्रस्तुत कर रहा है, वैसे ही पिगियस भी इसी शरण की ओर भागता है। और मान लीजिए यह उसे दे दिया जाए, तब भी गाँठ किसी प्रकार नहीं खुलती। क्योंकि पहली बात तो यह कि प्रेरित बिना कारण कोई प्रश्न नहीं उठाता। और दूसरी बात यह कि उसका उत्तर ऐसा है कि वह विरोधियों की आपत्ति को सच मान लेता है। और इस प्रकार की चालाकी से पिगियस को क्या मिलता है? वह इन कुतर्कों से केवल यही प्रमाणित करता है कि उसका पक्ष बुरा है। परन्तु कौन उसे वह देने को तैयार होगा जो वह माँगता है, जब वह एक ओर तो इतने सीधे जुड़ी हुई बातों को बलपूर्वक अलग कर देता है, और दूसरी ओर स्पष्टतः अलग और भिन्न बातों को एक ही गट्ठर में बाँध देता है? जब प्रेरित यह दिखा चुका कि परमेश्वर ने अपनी अगम्य इच्छा से चुने हुओं और त्यागे हुओं के बीच भेद किया, तब वह उसी सन्दर्भ में यह निष्कर्ष निकालता है: “वह जिस पर चाहता है दया करता है, और जिसे चाहता है कठोर कर देता है।” जिसके तुरन्त बाद वह जोड़ता है, “तू मुझसे कहेगा, फिर वह क्यों दोष लगाता है?” जब पौलुस इस प्रकार बोलनेवाले व्यक्तियों को स्पष्ट और भिन्न कर देता है, तो कौन पौलुस के अपने शब्दों को छोड़कर उन पर की गई किसी बाहरी टिप्पणी पर ध्यान देगा? अगस्तीन यहाँ भी, जैसा बहुत स्थानों पर, अत्यन्त बुद्धिमानी से कहता है: “इसका बहुत कम महत्त्व है कि जो बात प्रेरित अपने उत्तर से सत्य ठहराता है, उसे आप किस व्यक्ति के मुख से कही गई मानें। यदि वह आपत्ति झूठी होती, तो यह सम्भव नहीं कि प्रेरित चुप रहता, यदि विरोधियों का पक्ष इतना अच्छा, इतना स्पष्ट और इतना विश्वसनीय होता। क्योंकि यदि यह झूठ है कि परमेश्वर जिसे चाहता है कठोर करता है, तो यह गाँठ, जो सारी मानवीय बुद्धि के लिए अघुलनशील है, प्रेरित द्वारा एक ही शब्द में सुलझाई जा सकती थी।”

पिगियस इस दृष्टिकोण के अनुसार दिखावा करता है कि प्रेरित ने स्पष्ट और सीधा उत्तर देना इसलिए अस्वीकार किया कि वह ढीठ लोगों को बातचीत के योग्य नहीं समझता था; ताकि वे परमेश्वर के कार्यों का कारण घमण्ड से माँगने के स्थान पर दीनता से सोचना सीखें। जैसे हम अन्यत्र पढ़ते हैं (वह कहता है) कि जिन यहूदियों ने मसीह से पूछा कि वह किस अधिकार से अपने काम करता है, उन्हें भी उसी प्रकार के एक प्रश्न से ही लौटा दिया गया था। परन्तु पौलुस के अपने शब्द ऐसी कल्पना के सीधे विरुद्ध खड़े हैं, क्योंकि वह आगे उन सब की ढिठाई पर लगाम लगाता है जो परमेश्वर के भेदों की छानबीन करने में निडर जिज्ञासा में लिप्त होते हैं। फिर भी ऐसा करते हुए वह इस तथ्य को दृढ़ता से स्थापित करता है कि त्यागे हुए लोग परमेश्वर के क्रोध के पात्र हैं, जिनमें वह अपनी सामर्थ्य प्रकट करता है।

इसलिए अगस्तीन पिगियस से बहुत भिन्न और कहीं अधिक यथार्थ रीति से तर्क करता है, जब वह कहता है: “जब पौलुस ने यह प्रश्न माना कि ‘फिर वह क्यों दोष लगाता है?’ तो क्या वह यह उत्तर देता है कि हे मनुष्य, जो तूने कहा वह झूठ है? ऐसा कुछ नहीं। उसका उत्तर यह है, ‘हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है?’” अगस्तीन अन्यत्र जो कहता है वह ध्यान देने योग्य है। “पौलुस (वह कहता है) विरोधियों की बात को कठोर डाँट से नहीं काटता जब वे अपवित्र चंचलता से परमेश्वर के विरुद्ध झगड़ते हैं, मानो परमेश्वर के न्याय को किसी गम्भीर बचाव की आवश्यकता हो, परन्तु वह उसी रीति से अपनी बात कहता है जो उसने सबसे उचित समझी। कुछ मूर्ख लोग समझते हैं कि प्रेरित इस अवसर पर उत्तर देने में चूक गया, और उसके पास कोई कारण न होने से उसने केवल विरोधियों की ढिठाई को दबा दिया। परन्तु प्रेरित के शब्दों में अकल्पनीय भार है। ‘हे मनुष्य, तू कौन है?’ ऐसे प्रश्नों में प्रेरित मनुष्य को इस विचार की ओर लौटा देता है कि वह क्या है और उसके मन की क्षमता कितनी है। यह एक प्रबल कारण है, जो थोड़े शब्दों में दिया गया है परन्तु बड़ी वास्तविकता के साथ। क्योंकि जो प्रेरित की इस अपील को नहीं समझता, वह परमेश्वर को क्या उत्तर देगा? और जो इसे समझता है, वह उत्तर देने को कुछ पा ही कैसे सकता है?

इसलिए (अगस्तीन अन्यत्र कहता है), “यदि पौलुस के ये तर्क हम पर मनुष्य होने के नाते कुछ भी प्रभाव रखते हैं, तो आइए, जब वह तुरन्त बाद उन प्रभावशाली शब्दों में हमसे अपील करता है, ‘हे मनुष्य, तू कौन है?’ आदि, तब हम भी गम्भीरता से प्रेरित की सुनें। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्यों के पाप नहीं रचे, तथापि मनुष्यों के स्वभावों को स्वयं परमेश्वर के सिवा और किसने रचा? जो अपने आप में निस्सन्देह भले हैं, परन्तु जिनसे उसकी इच्छा की प्रसन्नता के अनुसार बुराइयाँ और पाप निकलने को ठहराए गए थे, और बहुतों में ऐसे पाप जिनका दण्ड अनन्त दण्ड होगा। यदि पूछा जाए कि परमेश्वर ने ऐसे स्वभाव क्यों रचे? उत्तर यह है कि इसलिए कि उसने उन्हें रचना चाहा। उसने ऐसा क्यों चाहा? ‘हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है?’ यदि व्यर्थ तर्क करनेवालों के पास कहने को और कुछ है, तो देखो! मनुष्य को यहाँ एक कारण दिया गया है! उसके लिए पर्याप्त कारण, और जो कुछ उसके योग्य है वह सब, यदि वह इसे भी ग्रहण करे, जो अपनी निर्बलता की दासता में होकर भी अपनी इच्छा की स्वतंत्रता के लिए झगड़ने को तैयार है। परन्तु यदि परमेश्वर से झगड़ने की बिगड़ी हुई लालसा अब भी किसी को बेचैन करती है, तो ऐसा मनुष्य (अगस्तीन कहता है) वैसे ही बोले और सुने जैसा मनुष्य को शोभा देता है: ‘हे मनुष्य, तू कौन है?’ परन्तु वह सुने और तुच्छ न जाने। और यदि कोई तुच्छ जाननेवाला है, तो वह यह मान ले कि वह ‘परमेश्वर द्वारा कठोर किया गया’ है कि वह तुच्छ जाने। यदि कोई तुच्छ नहीं जानता, तो वह यह मान ले कि उसे परमेश्वर की ओर से वरदान और सहायता मिली है कि वह तुच्छ न जाने। परन्तु एक यह माने कि वह अपनी योग्यता के अनुसार कठोर किया गया है, दूसरा यह कि वह अनुग्रह के अनुसार सहायता पाया है।” और मनुष्य की योग्यता क्या है, यह अगस्तीन पहले इन शब्दों में दिखा चुका था: “हर पापी निरुत्तर है, चाहे अपने मूल पाप और पापमय स्वभाव के कारण, या अपनी इच्छा के अतिरिक्त कार्य के कारण, चाहे वह जानता था कि वह पाप कर रहा है या नहीं जानता था; चाहे उसे उचित का विवेक था या नहीं था। क्योंकि अज्ञानता भी, उनमें जो समझना नहीं चाहते, निस्सन्देह पाप है; और जो समझ नहीं सकते उनमें अज्ञानता पाप का दण्ड है।”

परन्तु अब अगस्तीन की गवाही हमारी और सहायता न करे। हे पाठको, मेरे साथ इस महत्त्वपूर्ण विषय को स्वयं उसी में विचार करो। पौलुस यहाँ मनुष्य की परमेश्वर से तुलना करते हुए दिखाता है कि मनुष्यों को चुनने और त्यागने में परमेश्वर की युक्ति निस्सन्देह इतनी गहरी और इतनी छिपी हुई है कि मानव मन उसमें प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिए, हे मनुष्य, (जैसी प्रेरित तुझे सलाह देता है) विचार कर कि तू कौन और क्या है, और परमेश्वर को अपने स्वभाव के नाप और सीमा से अधिक दे। परन्तु मान लें कि हम एक क्षण के लिए पिगियस के दार्शनिक विचार को स्थान दें: कि सब मनुष्यों की दशा समान है, सिवाय उनके जो अपने आप को अनन्त जीवन से वंचित करते हैं, जो तो भी औरों के समान चुने गए थे। यहाँ अस्पष्ट या कठिन क्या रहेगा? ऐसा क्या होगा जिसे साधारण बुद्धि ग्रहण न कर सके? ऐसा क्या जिसे स्वाभाविक विवेक स्पष्ट न कर सके? परन्तु जब तुम ऐसे रहस्य की बात सुनते हो जो सारी मानवीय समझ से परे है, तो तुम तुरन्त निष्कर्ष निकाल सकते हो कि मनुष्यों के सब समाधान, जो साधारण स्वाभाविक विवेक से निकले हैं और जो किसी सांसारिक न्यायालय में काम आ सकते थे, तुच्छ और व्यर्थ हैं। तो भी यहाँ पिगियस हमसे यह टिप्पणी करके निपटने का प्रयत्न करता है कि जो अपने मन को दीनता से अधीन रखते हैं उन्हें परमेश्वर कभी ठुकराता नहीं और न सन्देह में भेजता है; इसलिए जो इस प्रकार परमेश्वर के विरुद्ध झगड़ते हैं वे केवल हठीले और घमण्डी हैं; और ऐसा झगड़ा किसी और में नहीं पाया जाता। इस कथन से मैं बिना कठिनाई सहमत हूँगा, इस शर्त पर कि पिगियस अपनी ओर से यह स्वीकार करे कि प्रेरित उन सब को अधर्मी घमण्ड का दोषी ठहराता है जो परमेश्वर के न्याय को अपनी समझ से नापते हैं। परन्तु पिगियस के निर्णय के अनुसार परमेश्वर अपने न्याय की प्रशंसा पाने के लिए अपने हर काम का स्पष्ट कारण बताने को बाध्य है। जबकि हमारी नम्रता का नियम यह होना चाहिए कि जहाँ परमेश्वर के कार्यों का कारण छिपा है, वहाँ भी हम उसे धर्मी मानें।

अब सीराख का पुत्र परमेश्वर की इस प्रशंसा के साथ उसे ऊँचा करने में लज्जित नहीं होता कि वह कुम्हार के समान अपनी इच्छा के अनुसार बरतनों को अलग-अलग करता है; और मनुष्य भी परमेश्वर के हाथों में मिट्टी के समान हैं, जो उन्हें रचता है और अपने ठहराव के अनुसार उन्हें प्रतिफल देता है। क्योंकि इस अंश में krivsi", यदि आप उसे पिछली बात से मिलाकर देखें, तो कारीगर या कुम्हार की सद्इच्छा के सिवा और कुछ अर्थ नहीं रख सकता। और हमें स्वयं प्रेरित के सिवा किसी और व्याख्याकार को खोजने की आवश्यकता भी नहीं, जो उसी उपमा के अधीन उन सब की ढिठाई को खुले रूप में डाँटता है जो परमेश्वर से उसके कार्यों का कारण माँगते हैं। “क्या मिट्टी कुम्हार से (प्रेरित पूछता है) कहेगी, तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया?” इसलिए वही सचमुच प्रेरित की मर्यादा में रहेगा, जो परमेश्वर की इच्छा को, चाहे वह छिपी हो, सर्वोच्च न्याय मानता है और उसे जिसे चाहे नाश करने या बचाने की स्वतंत्र सामर्थ्य देता है। इसलिए पिगियस चाहे जितना प्रेरित के शब्दों को मरोड़ने में अपने आप को मरोड़े, वह इस उपमा को वर्तमान उदाहरण में उससे भिन्न रूप में लागू नहीं कर सकता जैसा प्रेरित ने किया, जो इसे यह दिखाने के लिए लाता है कि परमेश्वर अपने ही अधिकार से सब मनुष्यों को जिस भी नियति के लिए चाहे और ठहराए, गढ़ता और रूप देता है।

यदि यह पहली दृष्टि में किसी को अटपटा या समझ से बाहर लगे, तो वह उत्कृष्ट अगस्तीन की और एक चेतावनी सुने: “यदि (वह कहता है) पशु बोल सकते और अपने बनानेवाले से इसलिए झगड़ते कि उसने उन्हें हमारे समान मनुष्य नहीं बनाया, तो हम में से कोई ऐसा न होगा जो क्षण भर में उन पर क्रोध से भड़क न उठे। तब हम अपने विषय में क्या सोचते हैं? हम कौन या क्या हैं कि परमेश्वर से इसलिए झगड़ें कि उसने हम में से हर एक को जैसा हम हैं वैसा बनाया? वह मनुष्य निश्चय ही पागल है जो परमेश्वर में उस उत्कृष्टता से कहीं बड़ी और ऊँची उत्कृष्टता नहीं मानता जो उसमें और मानव जाति में पृथ्वी के पशुओं की तुलना में है। तब इसके सिवा और क्या बचता है कि परमेश्वर के झुण्ड की भेड़ें शान्ति और चुपचाप अपने आप को उसके अधीन कर दें?” यह उससे कहीं अधिक शोभा देता, जितना पिगियस के उदाहरण पर परमेश्वर के स्थान पर मनुष्यों को कुम्हार बनाना और हर एक को अपनी ही सद्गुणों से अपनी नियति गढ़ने के लिए छोड़ देना।

परन्तु पिगियस कहता है, “जो बात यहाँ अस्पष्ट है वह अन्यत्र स्पष्ट कर दी गई है। जैसे भट्ठी कुम्हार के बरतनों को परखती है, वैसे ही परीक्षा धर्मी को परखती है।” यह सच है। परन्तु इससे वह यह निष्कर्ष निकालता है कि इसलिए, यदि कोई धर्मी विश्वास और भक्ति में स्थिर रहेगा, तो वह आदर का बरतन होगा; परन्तु यदि वह साहस और स्थिरता की कमी से गिर जाए, तो अनादर का बरतन होगा। और चूँकि उसके अनुसार हर एक अपनी इच्छा से, ईश्वरीय अनुग्रह की सहायता पाकर (जो वह कहता है, सब मनुष्यों के लिए साझा और सब के लिए तैयार है), अन्त में स्थिर रहता है, इसलिए वह निष्कर्ष निकालता है कि हम अपनी अजेय दृढ़ता से आदर के बरतन बनाए जाते हैं। अब मैं यह कहने के लिए नहीं रुकूँगा कि पिगियस यहाँ दो सर्वथा भिन्न बातों को — बरतन के गढ़े जाने और गढ़े हुए बरतन के परखे जाने को — कितनी मूर्खता से एक में मिला देता है; मैं केवल इतना कहूँगा कि परमेश्वर का अपने लोगों को नाना प्रकार की परीक्षाओं और परीक्षणों से परखना उनके जन्म से पहले अपनी अनन्त इच्छा और युक्ति द्वारा उन्हें पूर्वनियत करने को बिलकुल नहीं बदलता और न उसमें बाधा डालता है। और न यह उसके उनको अनादिकाल से वैसा गढ़ने को बदलता है जैसा वह चाहता था कि वे आगे समय में हों। और न पौलुस का वह अंश, जहाँ प्रेरित कहता है, “यदि कोई इनसे अपने आप को शुद्ध करेगा तो वह आदर का बरतन होगा”, पिगियस के इन विचारों का किसी प्रकार समर्थन करता है। पौलुस यहाँ यह नहीं दिखा रहा कि अपनी गन्दगी से निकाले और शुद्ध किए गए मनुष्य किस प्रकार आदर के बरतन बनाए जाते हैं; परन्तु यह कि विश्वासी, जो पहले ही चुने और बुलाए जा चुके हैं, परमेश्वर के पवित्र उपयोगों के योग्य कैसे बनते हैं। और अब देखिए कि पिगियस के मन और प्रेरित के मन में कैसा सटीक मेल है! पिगियस के शब्द ये हैं: “प्रेरित में जो यहाँ अस्पष्ट है, उसे वह अन्यत्र बिलकुल स्पष्ट कर देता है — कि परमेश्वर कुछ बरतनों को आदर के लिए क्यों और कैसे बनाता है, औरों को नहीं। इस प्रकार, ताकि याकूब दया का पात्र हो, उसकी आत्मा ने अपने आप को शुद्ध किया, जिसके कारण वह उचित रूप से आदर का बरतन बनाया गया; और इस प्रकार परमेश्वर ने इस आत्म-शुद्धि को, जिसे वह पहले से जानता था, ध्यान में रखकर कुलपति से जन्म से पहले प्रेम किया और उसे चुना।”

यह पिगियस है। अब पौलुस को सुनिए। वह, इसके विपरीत, जब विश्वासियों को इस प्रकार अपने आप को शुद्ध करने के लिए समझाता है, तो इस शिक्षा की “नींव” डालने के लिए उसकी भूमिका यह कहकर बाँधता है, “प्रभु अपनों को जानता है।” इसी रीति से वह अन्यत्र परमेश्वर के लोगों को पवित्रता के लिए यह तर्क देकर समझाता है: “क्योंकि हम उसकी रचना हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से तैयार किया कि हम उन पर चलें।” इसलिए पौलुस, जो पूरी गम्भीरता के साथ एक बुद्धिमान राजमिस्त्री होने पर गर्व करता है, सारे उद्धार की नींव केवल परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह में डालता है। इसके विपरीत पिगियस अपनी इमारत पृथ्वी की समतल सतह से, बिना किसी नींव के, आरम्भ करता है। और उसी रीति से, यिर्मयाह के उस अंश (अध्याय 19:11) को सँभालते हुए वह बिना किसी प्रयोजन के शब्दों की भीड़ खर्च कर देता है। उस अंश में भविष्यद्वक्ता हमारे गढ़े जाने का मूल वर्णन नहीं कर रहा, परन्तु पहले से गढ़े और पूरे किए हुए बरतनों को तोड़ने और नष्ट करने की परमेश्वर की उचित सामर्थ्य को घोषित और स्थापित कर रहा है। इसलिए प्रेरित का इस उपमा के प्रयोग में जो मन और आशय है, उसे ध्यान से देखा और थामे रखा जाए — कि परमेश्वर, मनुष्यों का रचयिता, अपने हाथों में उसी पिण्ड में से अपनी प्रभुतापूर्ण और निरपेक्ष इच्छा के अनुसार एक बरतन, अर्थात् एक मनुष्य, को आदर के लिए और दूसरे को अनादर के लिए गढ़ता है। क्योंकि वह जीवन के लिए सेंतमेंत कुछ को चुनता है जो अभी जन्मे भी नहीं, और औरों को उनके अपने विनाश पर छोड़ देता है, जिस विनाश के योग्य सब मनुष्य स्वभाव से समान रूप से हैं। और जब पिगियस यह मानता है कि परमेश्वर के अनुग्रह के चुनाव का त्यागे हुओं से उसकी घृणा के साथ कोई सम्बन्ध या जुड़ाव नहीं है, तो मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि वह सम्बन्ध और जुड़ाव सत्य है। क्योंकि परमेश्वर की उचित कठोरता उस सेंतमेंत प्रेम के समान और साझा कारण में उत्तर देती है, जिससे वह अपने चुने हुओं को गले लगाता है।

तब प्रेरित इस निष्कर्ष पर पहुँचता है: “तो क्या हुआ यदि परमेश्वर ने अपना क्रोध दिखाने और अपनी सामर्थ्य प्रगट करने की इच्छा करके क्रोध के बरतनों को, जो विनाश के लिए तैयार किए गए थे, बड़े धीरज से सहा; और ताकि वह दया के बरतनों पर, जिन्हें उसने पहले से महिमा के लिए तैयार किया, अपनी महिमा के धन को प्रगट करे?” यह (प्रेरित का आशय है) किसी के लिए परमेश्वर से प्रश्न करने या उससे झगड़ने का कोई आधार या कारण नहीं बनाता। पिगियस यहाँ (जैसा उसके जैसे लोग किया करते हैं) धीरजवन्तता शब्द को पकड़ लेता है। वरन् वह उस शब्द पर क्रूरता की सीमा तक पहुँचते हुए ऊँचे घमण्ड के साथ अटका रहता है, मानो परमेश्वर चुने हुओं को पैतृक ढील के सिवा किसी और रीति से कठोर नहीं करता। “परमेश्वर (वह कहता है) मनुष्यों को अनादर के बरतन किसी और रीति से नहीं बनाता, सिवाय इसके कि वह उन्हें कृपापूर्वक सहता है जब वे उसकी धीरजवन्तता का दुरुपयोग करते हैं और अपने लिए क्रोध के दिन के लिए क्रोध इकट्ठा करते हैं।” तब उस भेद का क्या होता है जो परमेश्वर ने दो भाइयों के बीच उनके जन्म से पहले किया? यदि हम पिगियस की मानें, तो यह भेद इसलिए किया गया कि परमेश्वर ने पहले से देखा कि एसाव का हृदय कितना कठोर होगा। तब यह कैसे है कि याकूब के उदाहरण में अनुग्रह का चुनाव इतना स्पष्ट प्रकट है, जब एसाव याकूब के समान ही श्रेणी और स्थिति में था, जब तक उसने अपने आप को इसहाक की सन्तान और घराने की गिनती से बाहर न कर लिया? परन्तु पिगियस की यह चालबाज़ी और हेरा-फेरी प्रेरित पौलुस के एक अत्यन्त छोटे वाक्य से इतनी पूरी तरह खण्डित हो जाती है कि खण्डन के लिए तर्क खोजने को और आगे जाना सर्वथा अनावश्यक है। इब्रानी लोग “बरतनों” और “साधनों” शब्दों का किस अर्थ में प्रयोग करते हैं, यह हर कोई जानता है जिसे पवित्रशास्त्र का थोड़ा-सा भी परिचय है। जहाँ कहीं हम “साधनों” की बात सुनते हैं, वहाँ हम परमेश्वर को भी जो कुछ किया जाता है उसके कर्ता और संचालक के रूप में सम्मिलित पाएँगे, जबकि उसका हाथ सब को निर्देशित करता है। और मनुष्य क्रोध के “बरतन” क्यों कहलाते हैं? इसीलिए न कि परमेश्वर ऐसों पर अपनी वह धर्ममय कठोरता दिखाता है जिसे वह औरों पर दिखाने से रुका रहता है? और वे “क्रोध के बरतन” क्यों बनाए जाते हैं? पौलुस हमें बताता है: कि परमेश्वर उनमें “अपना क्रोध प्रगट करे और अपनी सामर्थ्य जताए।” प्रेरित कहता है कि वे “विनाश के लिए तैयार किए गए” थे। कब? और कैसे? उनकी पहली उत्पत्ति और आदिम स्वभाव से ही। क्योंकि सारी मानव जाति का स्वभाव आदम के व्यक्तित्व में भ्रष्ट हो गया। ऐसा नहीं कि परमेश्वर का और भी ऊँचा और गहरा ठहराव सब से पहले न था। परन्तु इसी स्रोत से परमेश्वर के शाप ने अपना कार्य आरम्भ किया। इसी स्रोत से, वास्तव में, मानव जाति का विनाश आरम्भ हुआ। उसी के अनुरूप प्रेरित गवाही देता है कि परमेश्वर ने “दया के बरतनों” को महिमा के लिए “पहले से तैयार” किया था।

अब यदि महिमा के लिए यह “पहले से तैयार” किया जाना चुने हुओं के लिए विशेष और निजी है, तो स्पष्ट निष्कर्ष यह निकलता है कि शेष, अर्थात् न चुने हुए, समान रूप से “विनाश के लिए तैयार किए गए” थे, क्योंकि अपने स्वभाव पर छोड़ दिए जाने के कारण वे पहले ही निश्चित विनाश के लिए समर्पित थे। यह विचार कि वे अपनी ही दुष्टता से “विनाश के लिए तैयार” हुए थे, इतना मूर्खतापूर्ण है कि उस पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं। यह सच है कि त्यागे हुए लोग अपने लिए परमेश्वर का क्रोध अर्जित करते हैं और प्रतिदिन उसके भार को अपने सिरों पर गिरने के लिए शीघ्र बुलाते हैं। परन्तु सब को यह स्वीकार करना चाहिए कि प्रेरित यहाँ चुने हुओं और त्यागे हुओं के बीच किए गए उस भेद की चर्चा कर रहा है, जो केवल परमेश्वर की गुप्त इच्छा और ठहराव से निकलता है। पौलुस यह भी कहता है कि परमेश्वर के “अनुग्रह” का “धन” “दया के बरतनों” पर प्रगट किया जाता है; जबकि इसके विपरीत “क्रोध के बरतन” विनाश की ओर दौड़ पड़ते हैं। निश्चय ही यहाँ पिगियस की उस मूर्खतापूर्ण बकबक का कुछ भी नहीं सुनाई देता — कि अनुग्रह सब के प्रति समान है, पर परमेश्वर की भलाई क्रोध के बरतनों को सहने से और अधिक उज्ज्वल रूप से प्रकट होती है, जब वह उन्हें अपने अन्त तक पहुँचने देता है। परन्तु परमेश्वर की धीरजवन्तता के सम्बन्ध में, उसके कार्य का समाधान बिलकुल स्पष्ट है। वह तुरन्त उसकी सामर्थ्य से जुड़ा है। परमेश्वर अपनी धीरजवन्तता से केवल किसी बात को होने या बने रहने की अनुमति ही नहीं देता, परन्तु जो कुछ किया जाता है उस पर अपनी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से शासन और संचालन करता है।

और परमेश्वर की वह अटल प्रतिज्ञा भी इन्हीं आधारों के सिवा किसी और पर स्थिर नहीं रह सकती, जहाँ वह कहता है, “मैं यहोवा तेरा परमेश्वर जलन रखनेवाला परमेश्वर हूँ; हजारों पीढ़ियों तक दया करनेवाला, परन्तु तीसरी और चौथी पीढ़ी तक कठोर दण्ड देनेवाला।” मैं कहता हूँ, यह वाचा तब तक स्थिर नहीं रह सकती जब तक प्रभु अपनी ही इच्छा से यह न ठहराए कि वह किस पर दया करेगा और किसे अनन्त मृत्यु के लिए समर्पित रहने देगा। वह (वह घोषणा करता है) अपना अनुग्रह हजारों पीढ़ियों तक बढ़ाता है। अब मैं पूछना चाहूँगा, क्या परमेश्वर भक्तों की सन्तानों को उनके अपने पुण्यों के अनुसार देखता है जब वह उस अनुग्रह को, जो उनके पूर्वजों पर दिखाया गया था, उन पर भी इसी आधार पर बनाए रखता है कि उसने ऐसा करने की प्रतिज्ञा की थी? अब्राहम को, जिसने ऐसी किसी कृपा के योग्य कुछ नहीं किया था, परमेश्वर ने सेंतमेंत विश्वासयोग्यता से अपने आप को बाँध लिया कि वह (परमेश्वर) कुलपति के कारण उसके वंश का परमेश्वर होगा। इसी से कुलपति की मृत्यु के बाद परमेश्वर से वह गम्भीर पुकार निकली: “हे प्रभु, अपने दास अब्राहम को स्मरण कर” (व्यवस्थाविवरण 9:27)। यहाँ निश्चय ही मनुष्यों का चुनाव और उनके बीच भेद किया गया है; और वह प्रत्येक के पुण्यों के अनुसार नहीं, परन्तु उनके पूर्वजों से बाँधी गई वाचा के अनुसार। ऐसा नहीं कि अब्राहम का सारा वंश, जो शरीर के अनुसार उससे उत्पन्न होता है, यह विशेषाधिकार रखता है; परन्तु उन सब का विश्वास और उद्धार, जो अब्राहम के वंश में से अनन्त जीवन के लिए चुने गए हैं, इसी प्रतिज्ञा से जोड़ा जाना चाहिए।

ठीक वैसा ही उस प्रतिशोध का स्वरूप है जो परमेश्वर तीसरी और चौथी पीढ़ी पर भी लेता है। कुछ लोग जो यह कहते हैं कि सब पापी पीढ़ी-दर-पीढ़ी दण्डित होते हैं, प्रत्येक अपने समय और क्रम में, वह तुच्छ से भी बढ़कर बहाना है। इसी रीति से प्राचीन पेलागियसवादी, जब उन्होंने देखा कि वे पवित्रशास्त्र की उन गवाहियों के जालों से अपने को नहीं छुड़ा सकते जो स्पष्ट करती हैं कि सब मनुष्यों ने आदम में पाप किया, तो सत्य पर कुतर्क करने लगे और यह सिद्धान्त गढ़ लिया कि आदम का सारा वंश उसके अनुकरण से पापी हुआ, उससे प्राप्त स्वभाव की सम्पूर्ण भ्रष्टता के द्वारा नहीं। और जैसे तब भक्त शिक्षकों ने उन पर आक्रमण किया, यह सच्चाई से कहते हुए कि सब आदम के पाप और दोष के कारण वस्तुतः दण्डित हैं, जिस पाप और दोष से केवल मसीह का अनुग्रह उन्हें छुड़ाता है; वैसे ही वर्तमान उदाहरण में, ताकि प्रतिलोम और समानान्तर एक-दूसरे से मेल खाएँ और उत्तर दें, अनिवार्यतः यह निकलता है कि परमेश्वर बच्चों के व्यक्तित्व में उन पापों का बदला लेता है जिन्हें उसने उनके पूर्वजों में दोषी ठहराया था। और पवित्रशास्त्र के और भी बहुत से अंश किसी और रीति से नहीं समझाए जा सकते, जहाँ परमेश्वर घोषणा करता है कि वह “पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके पीछे उनके बच्चों की गोद में चुकाता है।” विरोधी यहेजकेल का वह अंश हमारे विरुद्ध व्यर्थ ही लाते हैं, “पुत्र पिता के अधर्म का भार न उठाएगा: जो प्राणी पाप करे वही मरेगा”; क्योंकि जब परमेश्वर मनुष्यों को अपने आत्मा से रहित और वंचित छोड़ देता है, तो वह पाप पर उसके प्रतिशोध का एक विशेष भाग है। क्योंकि इस प्रकार वंचित छोड़े जाने पर, हर एक अपने ही पाप के परिणाम उठाता है। इसलिए बच्चों के विषय में कहा जाता है कि वे अपने पूर्वजों के पाप उठाते हैं, और “अनुचित रूप से नहीं” (जैसा अपवित्र कवि संकेत करेगा), क्योंकि वे इसी आधार पर दोषी हैं कि, (जैसा प्रेरित कहता है) क्रोध की सन्तान होकर, इस प्रकार अपनी स्वाभाविक इच्छा और झुकाव पर छोड़े जाकर, और अपनी उत्पत्ति से ही अनन्त मृत्यु के उत्तराधिकारी होकर, वे निरन्तर और अटूट क्रम में अपने ही विनाश को बढ़ाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते।

हम यहाँ यशायाह के उस अंश की व्याख्या अत्यन्त उपयुक्त रीति से कर सकते हैं, जिसे पवित्र आत्मा ने नए नियम में विशेष प्रयोजन के साथ छः बार दोहराना उचित समझा। भविष्यद्वक्ता यशायाह एक ऐसी आज्ञा के साथ भेजा जाता है जो पहली दृष्टि में बहुत भयावह दिखती है: “जा, और इन लोगों से कह, सुनते तो रहो, परन्तु समझो नहीं; और देखते तो रहो, परन्तु बूझो नहीं। इन लोगों के मन को मोटा कर, और इनके कानों को भारी कर, और इनकी आँखों को बन्द कर; ऐसा न हो कि वे आँखों से देखें, और कानों से सुनें, और मन से समझें, और फिरें, और चंगे हो जाएँ।” यहाँ भविष्यद्वक्ता का अन्धेपन का सेवक के रूप में चित्रित किया जाना, स्वीकृत रूप से, उस कार्य के स्वरूप से, जो उसे करना था, और उन परिणामों से उत्पन्न होता है जिनके उसके पीछे आने का निश्चय था। हमारा बड़ा प्रश्न उस अन्धेपन के कारण में है। यह भी स्वीकार किया जाएगा कि यह उस कृतघ्न और विद्रोही लोगों पर दिया गया योग्य दण्ड है कि उनके लिए ज्योति अन्धकार बन गई। और उनमें पहले से दुर्भावनापूर्ण और हठीला अविश्वास भी था, जो ऐसे प्रतिफल के योग्य था। परन्तु जैसा कि भविष्यद्वक्ता गवाही देता है कि एक निश्चित चुना हुआ समूह था जिन पर परमेश्वर के वचन के प्रचार से उद्धार चमका, सुलझाने योग्य प्रश्न यह है: क्या वे कृपापात्र लोग अपने ही किसी गुण से उस भयानक दण्ड से बचे जो शेष पर आया, या वे परमेश्वर के हाथ में सुरक्षित और सुदृढ़ रखे गए?

और इससे भी भारी प्रश्न हमारे सामने दबाव डालता है: यह कैसे हुआ कि उस बड़ी भीड़ में से कुछ ने पश्चाताप किया, जबकि औरों का रोग असाध्य बना रहा?

यदि कोई इसे मानवीय न्याय के तराजू में तौले, तो वह यही निर्णय देगा कि भेद का कारण स्वयं उन मनुष्यों में था। परन्तु परमेश्वर हमें यहीं रुकने नहीं देगा। वह घोषणा करता है कि वे सब जो साझे विनाश की धारा के साथ नहीं बहते, उसके अनुग्रह से बचाए जाते हैं। पश्चाताप उसी का कार्य है या नहीं, यह विवाद में नहीं लाया जाना चाहिए। अगस्तीन का यह कथन इतना स्पष्ट रूप से सत्य है: “जिन्हें प्रभु चाहता है कि वे मन फिराएँ, उन्हें वह स्वयं फिराता है; जो न केवल अनिच्छुकों को इच्छुक बनाता है, वरन् भेड़ियों को भेड़ें और सतानेवालों को शहीद बना देता है, उन्हें अपने सर्वशक्तिमान अनुग्रह से रूपान्तरित करके।” यदि चुने हुओं और न चुने हुओं के बीच भेद के कारण के रूप में मनुष्य की दुष्टता पर अब भी बल दिया जाए, तो यह दुष्टता वास्तव में परमेश्वर के उस अनुग्रह से, जो वह अपने चुने हुओं पर दिखाता है, अधिक शक्तिशाली दिखाई जा सकती थी, यदि यह गम्भीर सत्य ऐसे तर्क के मार्ग में खड़ा न होता: “मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा!” परन्तु हमारे सामने के यशायाह के अंश की पौलुस की व्याख्या कोई सन्देह शेष नहीं छोड़ती। क्योंकि यह कहने के बाद कि परमेश्वर का चुनाव निर्धारित और स्थिर किया गया था, वह जोड़ता है, “परन्तु शेष कठोर किए गए, ताकि वह वचन पूरा हो जो भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था,” आदि।

मैं मानता हूँ कि यहूदियों में यह अन्धापन स्वैच्छिक था, और उसमें उनके पाप को मैं खुले मन से स्वीकार करता हूँ। परन्तु मैं देखता हूँ कि पौलुस इस अन्धेपन से किन्हें अलग रखता है; वे वही हैं जिन्हें शेष में से चुनना परमेश्वर को अच्छा लगा। परन्तु उसने कुछ को औरों से अधिक क्यों चुना? तब कोई इस बात से ठोकर न खाए कि वह अब भी समय-समय पर कुछ को चुनता है, औरों को नहीं; और हम भी पौलुस के समान इन चुने हुओं को अन्धे किए हुओं की सामान्य भीड़ से अलग रखें। और न हम यह कारण पूछें कि परमेश्वर यह भेद क्यों करता है। क्योंकि, जैसा पौलुस कहता है, मनुष्य को परमेश्वर से झगड़ना शोभा नहीं देता। वही प्रेरित, जब अन्यत्र उन यहूदियों से बोलता है जिनकी विषैली दुर्भावना से उसने इतना कठोर दुःख उठाया था, कहता है: “पवित्र आत्मा ने यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा तुम्हारे बापदादों से ठीक कहा, कि इन लोगों के पास जाकर कह, कि सुनते तो रहोगे परन्तु न समझोगे, और देखते तो रहोगे परन्तु न बूझोगे।” (प्रेरितों के काम 28:25, 26)। वह उनका पाप उन्हीं पर जमकर लगाता है, जैसा वे पूरी तरह योग्य थे। कुछ लोग यहाँ भूल से और अज्ञानता से यह निष्कर्ष निकालेंगे कि यहूदियों में इस हठ का कारण और आरम्भ उनकी दुर्भावनापूर्ण दुष्टता थी। मानो स्वयं दुष्टता का कोई और गहरा और अधिक गुप्त कारण न हो, अर्थात् स्वभाव की मूल भ्रष्टता! और मानो वे इसी भ्रष्टता में इसलिए डूबे न रहे हों क्योंकि जन्म से पहले परमेश्वर की गुप्त युक्ति से त्यागे जाने के कारण वे अनछुड़ाए छोड़ दिए गए थे!

अब हम सुसमाचार-लेखक यूहन्ना की सुनें। वह भविष्यद्वक्ता यशायाह के इसी अंश का कोई अस्पष्ट व्याख्याकार नहीं होगा। “परन्तु (यूहन्ना कहता है) यद्यपि यीशु ने उनके सामने इतने चिह्न दिखाए थे, तो भी उन्होंने उस पर विश्वास नहीं किया; ताकि यशायाह भविष्यद्वक्ता का वह वचन पूरा हो जो उसने कहा, हे प्रभु, हमारे समाचार की प्रतीति किसने की? और प्रभु का भुजबल किस पर प्रगट हुआ? इस कारण वे विश्वास न कर सके, क्योंकि यशायाह ने फिर भी कहा है, उसने उनकी आँखों को अन्धा, और उनके मन को कठोर कर दिया है,” आदि। अब निश्चय ही यूहन्ना यहाँ हमें यह नहीं समझाता कि यहूदी अपने पापीपन के कारण विश्वास करने से रोके गए। क्योंकि यद्यपि एक अर्थ में यह बिलकुल सच है, तो भी उनके विश्वास न करने के कारण का पता बहुत ऊँचे स्रोत तक लगाना होगा। परमेश्वर के गुप्त और अनन्त ठहराव और युक्ति को उनके अन्धेपन और अविश्वास का मूल कारण मानना चाहिए। जब अज्ञानियों और निर्बलों ने सुना कि परमेश्वर के लोगों के बीच (क्योंकि यहूदी वैसे ही थे) मसीह के लिए कोई स्थान नहीं था, तो वे कुछ कम नहीं घबराए। यूहन्ना इसका कारण यह दिखाकर समझाता है कि विश्वास वही करते हैं जिन्हें यह दिया गया है, और थोड़े ही हैं जिन पर परमेश्वर अपना भुजबल प्रगट करता है। “प्रभु के भुजबल” की यह दूसरी भविष्यद्वाणी सुसमाचार-लेखक इसी महान सत्य को सिद्ध करने के लिए अपने तर्क में बुनता है। और उसके शब्दों में भारी वजन है।

वह कहता है, “इस कारण वे विश्वास न कर सके।” इसलिए मनुष्य जितनी देर चाहें तर्कों से अपने को सताते रहें, किए गए भेद का कारण — परमेश्वर अपना भुजबल सब पर समान रूप से प्रगट क्यों नहीं करता? — उसकी अपनी अनन्त आज्ञा में छिपा है। सुसमाचार-लेखक का सारा तर्क स्पष्टतः इसी पर आ पहुँचता है: कि विश्वास एक विशेष दान है, और मसीह की बुद्धि इतनी ऊँची और इतनी गहरी है कि मनुष्य की समझ की सीमा में नहीं आ सकती। इसलिए संसार का अविश्वास हमें चकित न करे, यदि मनुष्यों में सबसे बुद्धिमान और सबसे तीक्ष्ण भी विश्वास करने में चूक जाते हैं। इसलिए, जब तक हम सुसमाचार-लेखक के उस स्पष्ट और स्वीकृत अर्थ को टालना न चाहें कि थोड़े ही सुसमाचार को ग्रहण करते हैं, हमें पूरी तरह यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि इसका कारण परमेश्वर की इच्छा है; और कि उस सुसमाचार की बाहरी ध्वनि कान पर व्यर्थ ही पड़ती है जब तक परमेश्वर उसके द्वारा भीतर के हृदय को छूना न चाहे।

यशायाह के इस अंश को उद्धृत करने का भिन्न अवसर अन्य तीन सुसमाचार-लेखकों के सामने आता है, जब वे प्रत्येक हमारे प्रभु के जीवन और सेवकाई का वर्णन करते हैं। मत्ती में हमारा उद्धारकर्ता अपने चेलों को मनुष्यों की साधारण भीड़ से अलग और भिन्न करता है। वह घोषणा करता है कि उन (उसके चेलों) को स्वर्ग के राज्य के भेदों को जानने का वरदान दिया गया था, परन्तु वह औरों से दृष्टान्तों में बोलता था, कि सुनते हुए वे सुनें पर न समझें, ताकि यशायाह का वचन पूरा हो। अब मैं मानने को तैयार हूँ कि जिनसे मसीह ने दृष्टान्तों में बात की वे अपने आप में अधिक ज्योति के अयोग्य थे। परन्तु दूसरी ओर, मैं पूछना चाहूँगा कि प्रेरितों में अपने आप में ऐसा कौन-सा बड़ा पुण्य था कि वे सेंतमेंत मसीह की घनिष्ठता में लिए गए? जिस घनिष्ठता में मसीह ने उन्हें सेंतमेंत लिया। यहाँ प्रतिलोम स्पष्ट रूप से स्थापित हो जाता है, कि अनुग्रह थोड़ों को सेंतमेंत दिया गया, जबकि वह न्यायसंगत रूप से सब से समान रूप से रोका जा सकता था। क्योंकि क्या हम कहेंगे कि प्रेरितों ने अपने ही पुण्यों से वह कमाया जो प्रभु घोषणा करता है कि उन्हें सेंतमेंत “दिया” गया? न ही हमें इस बात को विशेष टिप्पणी के बिना छोड़ देना चाहिए कि उद्धारकर्ता उन बातों को, जो उसने उन्हें सिखाईं, “भेद” कहता है। और निश्चय ही आत्मिक शिक्षा के सारे दायरे में ऐसा कुछ नहीं जो मनुष्य की क्षमता से बहुत ऊपर न हो और उसकी अधिकतम पहुँच को चकरा न दे। इसलिए शब्दों की कोई व्याख्या, चाहे कितनी ही स्पष्ट हो, परमेश्वर के राज्य के भेदों को समझाने के लिए पर्याप्त न होगी, जब तक पवित्र आत्मा उसी समय भीतर से न सिखाए। परन्तु मसीह चाहता था कि उसके चेले इसे परमेश्वर की कृपा का मूल्यवान प्रतिभू मानकर बड़ा जानें, कि उसने उन्हें मनुष्यों की साधारण भीड़ से ऊपर आदर दिया, उन्हें शिक्षा के बाहरी साधनों से आशीष देकर। यद्यपि वह इस पूरे समय धीरे-धीरे उन्हें उस ऊँचे और अनोखे विशेषाधिकार की ओर ले जा रहा था जो “मित्रों” को “दासों” से अलग करता है, जैसा यूहन्ना कहता है (यूहन्ना 15:15): “अब से मैं तुम्हें दास न कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है: परन्तु मैंने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि मैंने जो बातें अपने पिता से सुनीं वे सब तुम्हें बता दीं।” ये मित्र इस प्रकार अन्त तक ऊपर से सिखाए जाते हैं, कि वे उन बातों को समझें जो सारी स्वाभाविक समझ से परे हैं। इसी कारण मसीह ऐसे अवसरों पर बार-बार वह ऊँची पुकार कहता था, “जिसके पास सुनने के लिए कान हों वह सुन ले।” इस कथन से मसीह ने न केवल ध्यान से सुननेवालों को असावधान सुननेवालों से अलग किया, परन्तु यह भी जताया कि सब बहरे हैं सिवाय उनके जिनके कान परमेश्वर खोलना चाहे कि वे सुनें, इस ईश्वरीय आशीष की प्रशंसा दाऊद परमेश्वर की सारी कलीसिया के नाम पर करता है (भजन संहिता 40:6): “बलिदान और भेंट तू ने न चाही, तू ने मेरे कान खोल दिए हैं।”

परन्तु मैं इस गहरे और ईश्वरीय विषय से सम्बन्धित परमेश्वर के वचन के अलग-अलग भागों की चर्चा में और आगे नहीं बढ़ूँगा। यह सार पर्याप्त हो: यदि हम यह मानें कि परमेश्वर का वही आत्मा, जिसने प्रेरितों के द्वारा बात की, भविष्यद्वक्ता यशायाह का व्याख्याकार है, तो हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि परमेश्वर का वह गुप्त और अगम्य निर्णय, जो मनुष्यों के अधिकांश को अन्धा करता है, “कि देखते हुए वे देखें पर न बूझें,” आदि, ऐसा करते हुए आराधना के योग्य है। यहाँ हर प्रकार के मानवीय तर्क, जो हमारे मनों में कभी भी उठ सकते हैं, सदा के लिए थम जाएँ। क्योंकि यदि हम अपने विचारों को परमेश्वर के अनुग्रह और अनन्त ठहराव से अलग, केवल मनुष्यों तक सीमित रखें, तो पहली बात जो हमें प्रभावित करेगी वह यह है कि परमेश्वर माँगनेवालों को सेंतमेंत देता है, और औरों की अपनी आवश्यकता में डूबकर मृत्यु हो जाती है, जिसका वे उपाय नहीं खोजते। परन्तु यदि हमारे मन और समझ में वह बात न हो जो अगस्तीन कहता है, “कि ईश्वरीय भलाई का स्वभाव केवल खटखटानेवालों के लिए खोलना ही नहीं, परन्तु उन्हें खटखटाने और माँगने के योग्य बनाना भी है;” जब तक, मैं कहता हूँ, हम यह न समझें, हम उस वास्तविक आवश्यकता को कभी नहीं जानेंगे जिसके अधीन हम परिश्रम करते हैं।

यदि हम सहायता की ओर आएँ, तो सार्वभौमिक अनुभव प्रमाणित करता है कि सब पवित्र आत्मा की उस सामर्थ्य को नहीं समझते जिससे वह सब किया जाता है जो किया जाना चाहिए। कोई व्यर्थ आत्म-प्रशंसा से अपने को धोखा न दे। जो मसीह के पास आते हैं वे पहले उसके ईश्वरीय हृदय में परमेश्वर की सन्तान थे, जबकि वे अपने आप में उसके शत्रु थे। और क्योंकि वे अनन्त जीवन के लिए पहले से ठहराए गए थे, इसलिए वे मसीह को दिए गए। इसी से अगस्तीन की यह विश्वासयोग्य चेतावनी है: “जो इस प्रकार मसीह के पास आते हैं वे स्मरण रखें कि वे अनुग्रह के ‘बरतन’ हैं, पुण्य के नहीं। क्योंकि उन सब के लिए अनुग्रह ही पुण्य है! और न हम किसी ऐसे ज्ञान में आनन्दित हों जो विस्मय में आरम्भ और विस्मय में समाप्त न हो! वे हमारी हँसी उड़ाएँ जिनकी इच्छा हो, यदि परमेश्वर स्वर्ग से हमारी मूर्खता (जैसा मनुष्य सोचते हैं) पर अपनी स्वीकृति का सिर हिला दे, और स्वर्गदूत उसकी सराहना ही करें!”

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