अध्याय 8

खण्ड V: अनन्त पूर्वनियति

Calvin's Calvinism · John Calvin

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खण्ड V: अनन्त पूर्वनियति

अनन्त पूर्वनियति — खण्ड 5

इसके बाद पिगियस की एक और आपत्ति आती है: “यह निरर्थक नहीं है (वह कहता है) कि पौलुस सब विश्वासियों को चेतावनी देता है कि ध्यान रखो ‘परमेश्वर का अनुग्रह व्यर्थ न पाओ’; और यह भी निरर्थक नहीं कि मसीह अपने सब चेलों को ‘जागते और प्रार्थना करते रहने’ का उपदेश देता है।” परन्तु यदि हम शरीर की निश्चिन्त सुरक्षा-भावना और उस शान्त स्थिरता में, जो विश्वास मन में उत्पन्न करता है, जो महत्त्वपूर्ण भेद है उसे समझ लें और दृढ़ता से थामे रहें, तो इस आपत्ति की गाँठ तुरन्त खुल जाती है। विश्वासियों को अपने उद्धार की निश्चयता में विश्राम करना चाहिए। परन्तु किस उद्देश्य से? क्या इसलिए कि वे नींद-भरी शान्ति में पड़े रहें? क्या इसलिए कि वे कायरतापूर्ण आलस्य में लोटते रहें? नहीं, कदापि नहीं! बल्कि इसलिए कि जब वे परमेश्वर में इस प्रकार शान्त विश्राम का आनन्द लें, तो प्रार्थना में और भी अधिक लगे रहें। पौलुस ऐसे लोगों को उपदेश देता है कि वे “डरते और काँपते हुए (timore) (tremore) अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ” (फिलिप्पियों 2:12)। यह उपदेश क्यों? क्या इसलिए कि वे परिणाम के विषय में भय और अनिश्चितता में जीवन बिताएँ? कदापि नहीं। बल्कि इसलिए कि परमेश्वर के पंखों की छाया में दुबककर वे निरन्तर अपने आपको उसकी देखरेख में सौंपे रहें, केवल उसी पर निर्भर रहें, और उसकी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य में ऐसा विश्राम पाएँ कि अन्त तक विजयी होने में सन्देह न करें। क्योंकि पौलुस तुरन्त कारण भी जोड़ देता है कि विश्वासियों को परमेश्वर के पंखों और सर्वसामर्थी शक्ति की शरण लेने के लिए क्यों इतना आतुर होना चाहिए: “क्योंकि परमेश्वर ही है (वह कहता है) जिसने अपनी सुइच्छा के निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)। इसके अतिरिक्त, कि विश्वासी दुविधा और अनिश्चितता में न रहें, उसने उन्हें पहले ही हर सम्भव सन्देह से मुक्त कर दिया था: “मुझे इस बात का भरोसा है (वह कहता है) कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)। इसलिए पवित्र आत्मा कहीं भी हमें प्रार्थना की चिन्ता और अभ्यास का उपदेश इस विचार से नहीं देता कि हमारा उद्धार अनिश्चितता या सन्देह की स्थिति में डोलता रहता है, क्योंकि वह तो परमेश्वर के हाथ में सुरक्षित है। वह कहीं भी हम पर ऐसा भय नहीं डालता जो परमेश्वर के निःशुल्क प्रेम पर हमारे भरोसे को किसी भी रीति से हिला दे। नहीं! धन्य आत्मा इन उपदेशों के द्वारा केवल हमारे स्वाभाविक आलस्य और उदासीनता को जगाना चाहता है।

पिगियस अपनी इस अन्तिम आपत्ति को भी पूरा करने और बल देने के लिए रोमियों के नाम पत्र के ग्यारहवें अध्याय में प्रेरित के शब्दों को निन्दापूर्वक मरोड़ता और बिगाड़ता है: “और यदि कुछ डालियाँ तोड़ दी गईं, और तू जंगली जैतून होकर उनमें साटा गया, और उनके साथ जैतून की जड़ की चिकनाई में भागी हुआ; तो डालियों पर घमण्ड न करना। यदि तू घमण्ड करे, तो जान रख कि तू जड़ को नहीं, परन्तु जड़ तुझे सम्भालती है। तू कहेगा, डालियाँ इसलिए तोड़ी गईं कि मैं साटा जाऊँ। भला, वे तो अविश्वास के कारण तोड़ी गईं, और तू विश्वास के कारण बना रहता है। अभिमानी न हो, परन्तु भय मान; क्योंकि जब परमेश्वर ने स्वाभाविक डालियों को न छोड़ा, तो सावधान रह कि वह तुझे भी न छोड़े। इसलिए परमेश्वर की कृपा और कठोरता को देख: जो गिर गए उन पर कठोरता, परन्तु तुझ पर कृपा, यदि तू उसकी कृपा में बना रहे; नहीं तो तू भी काट डाला जाएगा” (रोमियों 11:17-22)। परन्तु इस खण्ड का वास्तविक अर्थ यह है: इस अध्याय में प्रेरित अपनी जाति के दोहरे चुनाव (जातीय और अनन्त) की चर्चा कर चुका था, और यह दिखा चुका था कि उनमें से बहुतों के गिर जाने से ऐसा हुआ कि जो पहले उस वाचा के द्वारा, जो परमेश्वर ने उनके पूर्वजों से बाँधी थी, जीवन के वैध और यथार्थ उत्तराधिकारी थे, वे “तोड़ दिए गए” और उसके राज्य से निर्वासित जनों के समान निकाल दिए गए; अपनी जाति के विषय में इस प्रकार कहने के बाद पौलुस अन्यजातियों को सम्बोधित करता है और उन्हें चेतावनी देता है कि वे यहूदियों पर विजय का आनन्द न मनाएँ और न उनका किसी प्रकार अपमान करें, क्योंकि परमेश्वर ने उनके स्थान पर उन्हें ग्रहण किया है। अब यहाँ हमें ध्यानपूर्वक यह देखना है कि जैसे यहूदियों के सार्वभौमिक त्याग ने परमेश्वर के अटल चुनाव को बदला या हिलाया नहीं, कि वह उनमें से कोई “बचा हुआ भाग” भी न बचा सके, वैसे ही अन्यजातियों के सार्वभौमिक चुनाव में अन्यजातियों का एक-एक व्यक्ति सम्मिलित नहीं था कि वे सब अनन्त जीवन के भागी हो जाएँ। मैं दोहराता हूँ, पौलुस यहाँ यहूदी जाति के विषय में परमेश्वर के दोहरे चुनाव की ही बात कर रहा है। क्योंकि अब्राहम का सारा घराना किसी अर्थ में परमेश्वर का चुना हुआ था। परन्तु चूँकि उनमें से बहुतेरे परमेश्वर के गुप्त निर्णय और युक्ति के द्वारा अनन्त जीवन के लिए नियुक्त नहीं थे, इसलिए अधिकांश नाश हो गए, यद्यपि परमेश्वर का चुनाव “बचे हुए भाग” पर बना रहा। अब जब जीवन की वाचा अन्यजातियों को हस्तान्तरित हो गई है, तब अब्राहम के घराने की वह सामान्य गोद-लेनी हमारी है। परन्तु इससे अब्राहम के घराने के उन थोड़े लोगों को, जो परमेश्वर की गुप्त सुइच्छा और आज्ञा से उसके लिए नियुक्त किए गए थे, अपनी गोद-लेनी का आनन्द लेने में कोई बाधा नहीं पहुँचती।

इसलिए पौलुस, जब अन्यजातियों की यहूदियों से इस प्रकार तुलना करता है, तो पहले वर्ग को “जंगली जैतून के वृक्ष” कहता है, जो उसकी स्वाभाविक डालियों के तोड़े जाने के बाद मूल पवित्र जड़ में साटे गए। प्रेरित यहाँ न तो निजी अर्थ में व्यक्तियों की बात कर रहा है, न परमेश्वर के गुप्त चुनाव को अमूर्त रूप से विचार रहा है। वह यह दिखा रहा है कि जब वैध सन्तान ठुकरा दी गई और परदेशी उनके स्थान पर रख दिए गए, तब कितना बड़ा परिवर्तन हुआ। पौलुस का यह सारा उपदेश उन विश्वासियों को इतना सम्बोधित नहीं है जिन्होंने सचमुच और हृदय से परमेश्वर का अनुग्रह ग्रहण किया था, जितना अन्यजातियों के सारे समुदाय को, जो भाँति-भाँति के सदस्यों से, विश्वासियों और अविश्वासियों से, मिला-जुला बना था। और फिर भी इसमें कोई अनोखी बात नहीं कि परमेश्वर अपनी अन्यजाति सन्तानों में शरीर के गर्व और ढिठाई को रोके, क्योंकि वे सब इसी बिगड़ी हुई दुर्बलता से ग्रस्त हैं। परन्तु पिगियस प्रेरित के उपर्युक्त उपदेश से अत्यन्त हास्यास्पद ढंग से यह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर के चुनाव की निश्चयता और उसकी अन्तिम पूर्ति मनुष्यों की स्थिरता पर निर्भर है। पिगियस का यह निष्कर्ष, हम फिर कहते हैं, अत्यन्त बेतुका है, क्योंकि सब मनुष्यों के सामान्यतः परमेश्वर से दूर हो जाने पर भी उसका अनन्त चुनाव फिर भी स्थिर रहेगा और प्रबल होगा।

उन अधर्मियों के विषय में, जो परमेश्वर के न्याय पर कलंक लगाते हैं, उसे सर्वथा झूठे रंग में प्रस्तुत करते हैं और कहते हैं, “निकम्मे ठहराए हुओं का धार्मिकता और पवित्रता के पीछे प्रयत्न करना व्यर्थ है, क्योंकि चुनाव के सिद्धान्त के अनुसार उन्हें अन्ततः और अनिवार्यतः नाश होना ही है।” ऐसी निन्दा, जो घोर अज्ञान की सन्तान है, एक बहुत छोटे उत्तर से हमारे ऊपर से झटकी जा सकती है, वह यह: मनुष्यों में भला करने की कोई सच्ची इच्छा हो ही नहीं सकती जो परमेश्वर द्वारा उनके चुने जाने से उत्पन्न न हुई हो। परन्तु निकम्मे ठहराए हुए लोग, जो अनादर के पात्र बनाए गए हैं, अपने ऊपर परमेश्वर का प्रतिशोध भड़काना कभी नहीं छोड़ते; और इस प्रकार मानो लिखित अक्षरों में स्पष्ट प्रमाणित करते हैं कि वे विनाश के लिए नियुक्त किए गए हैं। फिर भी पिगियस को यह सिद्धान्त मूर्खता की चरम सीमा लगता है। इतना कि वह घोषणा करता है कि इस विषय की सारी चर्चाओं को एकत्र करने पर भी उसके समान कोई राक्षसी बात नहीं मिलेगी। परन्तु इसी एक घोषणा से प्रकट है कि वह सब भली बातों को कोसने की उन्मत्त लालसा में इतना बह गया है कि बिना किसी वास्तविक कारण के गालियाँ उसके हृदय से उबल पड़ती हैं। पवित्रशास्त्र स्पष्ट सिखाता है कि परमेश्वर के चुने हुओं को छोड़ और कोई उसके आत्मा के द्वारा चलाया या “अगुवाई” पाया हुआ नहीं होता। तो पवित्र आत्मा की “अगुवाई” के बिना मनुष्य में कौन-सी सीधाई या भला कार्य हो सकता है? इसीलिए पौलुस कहता है, “शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात् व्यभिचार, कुकर्म, अशुद्धता, लुचपन, मूर्ति-पूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म, डाह, हत्या, पियक्कड़पन, लीलाक्रीड़ा और इसी प्रकार के और काम” (गलातियों 5:19-21)। और वह अन्यत्र घोषणा करता है कि शारीरिक मन के सारे विचार “परमेश्वर से बैर” हैं (रोमियों 8:7)।

तो फिर मेरे यह कहने में कौन-सी असंगति है कि वे सब जो परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म नहीं पाए हैं, पाप के दास हैं और शरीर की इच्छा से सिर के बल बहाए जाते हैं? जिन्हें परमेश्वर चुनता है, उन्हें वह अपनी ही धार्मिकता से धर्मी ठहराता है। तो इसमें क्या आश्चर्य कि निकम्मे ठहराए हुए लोग, जो परमेश्वर की धार्मिकता से वंचित हैं, पाप के सिवा कुछ न करें, न कुछ करना जानें? परन्तु परमेश्वर ने अपनों को इसी उद्देश्य से चुना कि वे “पवित्र और निष्कलंक” हों। यदि पवित्रता निःशुल्क चुनाव का फल है, तो कौन स्वीकार किए बिना रह सकता है कि शेष सब मनुष्य स्वभाव की गन्दगी और अपवित्रता में डूबे रहते हैं? मसीह घोषणा करता है कि उसकी भेड़ों को छोड़ कोई उसका शब्द नहीं सुन सकता। और दूसरी ओर वह दृढ़ता से कहता है कि वे सब जो उसके मुख से सुनाई देते पिता के शब्द को सुनना नहीं चाहते, “अपने पिता शैतान से हैं” (यूहन्ना 8:43, 44)। जब पिगियस यह दिखाना चाहता है कि निकम्मे ठहराए हुए लोग भले कर्म करने का यत्न करते हैं, तो अपनी संगति के लिए उसे यह भी दिखाना होगा कि उनकी हठ परमेश्वर को प्रिय है। परन्तु पिगियस अपने इस सिद्धान्त के समर्थन में कि निकम्मे ठहराए हुए लोग सचमुच भले कर्मों में लगे रहते हैं, यह तर्क देता है कि शाऊल बहुत से गुणों में श्रेष्ठ था। यहाँ तक कि वह परमेश्वर को प्रसन्न भी करता था। कि निकम्मे ठहराए हुओं में जो गुण चमकते हैं वे अपने आप में प्रशंसनीय हैं, इसका मैं किसी रीति से खण्डन नहीं करता। और पवित्रशास्त्र का यही अर्थ है जब वह कहता है कि शाऊल और उस जैसे अन्य लोगों ने “वह किया जो ठीक था।” परन्तु क्योंकि परमेश्वर हृदय को देखता है, उस सोते को जिससे सारे कर्म बहते हैं, इसलिए कोई कर्म जो सामान्य अर्थ में अपने आप में भला है, तब भी “परमेश्वर की दृष्टि में घृणित” हो सकता है। वास्तव में समस्त भक्ति का यह पहला सिद्धान्त पिगियस को सर्वथा अज्ञात है: “ऐसा कुछ भी इतना शुद्ध नहीं जिसे मनुष्य की अशुद्धता मैला न कर दे।” इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि हमारा विरोधी, शाऊल के कर्मों को उसके बाहरी मुखौटे के साथ देखकर उसकी निर्दोषता और गुणों की प्रशंसा करता है। जब पिगियस यह तर्क देता है कि शाऊल ने एक अवसर पर परमेश्वर को प्रसन्न किया, तो मैं इसे मान लेता हूँ, और इस मामले को अपनी सामान्य टिप्पणी का अपवाद ठहराता हूँ। परमेश्वर ने सचमुच उसके राजा के पद में उसे ऐसा आदर दिया कि इस्राएल के घराने ने, जैसा हम पवित्रशास्त्र में पाते हैं, उसे कभी एक बार भी दोषी न ठहराया, जैसा यहेजकेल भी गवाही देता है। इसी प्रकार यहूदा प्रेरिताई के पद के लिए चुना गया था। क्या पिगियस इससे यह निष्कर्ष निकालेगा कि यहूदा इसलिए परमेश्वर की सन्तान में गिना गया? परन्तु मेरा विरोधी मेरी इस सारी गवाही की निन्दा करता है, मानो मैं सारे समय जीवन के अलग-अलग कार्यों के विषय में अमूर्त रूप से बोल रहा हूँ; जबकि मैं तो जीवन की निरन्तर चाल और स्वरूप के विषय में बोल रहा हूँ। एक शब्द में, यदि हम मनुष्य में पाई जानेवाली सारी भलाई और धार्मिकता को पवित्र करनेवाले आत्मा से उत्पन्न न मानें, तो पवित्रशास्त्र की सारी गवाही हिल जाएगी।

अपने विरोधी की अन्य छिद्रान्वेषी बातों के उत्तर में और अधिक समय और परिश्रम व्यय करना व्यर्थ है। उसकी अगली आपत्ति हर शत्रु के मुँह में है: “यदि आज्ञा मानने की शक्ति और सामर्थ्य पूरी तरह परमेश्वर के चुनाव पर निर्भर है, तो सारी शिक्षा व्यर्थ और सारा उपदेश निकम्मा है।” और यह अगली छिद्रान्वेषी बात उसी के समान है: “जब मनुष्यों को इस प्रकार परमेश्वर की अनन्त युक्ति में विश्राम करना सिखाया जाएगा, तो वे अनिवार्य परिणाम के रूप में आलस्य और उदासीनता में जा पड़ेंगे।” इन आपत्तियों के जो उत्तर मैं अपने “उत्तरों” में पहले ही दे चुका हूँ, उन पर पिगियस ने अपनी रीति के अनुसार ऐसी गालियों से आक्रमण किया है कि मैं उन्हें शान्त पड़े रहने दूँगा, और उसके हाथों फिर से अपवित्र होने के लिए यहाँ दोहराऊँगा नहीं।

परन्तु यदि कुछ अत्यन्त रूखे स्वभाववाले लोग हैं जो अब तक सन्तुष्ट नहीं हुए, और जो समझते हैं कि अगस्तीन की गवाही में अधिक वज़न है (जिसे मैंने स्वयं भी बार-बार और प्रसन्नता से स्वीकार किया है), तो मैं इस विषय पर उसके विचार उसी के शब्दों में प्रस्तुत करूँगा, और इस प्रकार उनके सत्य होने पर अपनी सहमति की गवाही दूँगा। “धीरज के वरदान के विषय में” नामक उसकी पुस्तक में उसके शब्द ये हैं: “लोग कहते हैं कि पूर्वनियति का सिद्धान्त सारे प्रचार के विरुद्ध खड़ा है और उसे सर्वथा व्यर्थ कर देता है। इस हिसाब से तो स्वयं पौलुस का प्रचार, जो इसी सिद्धान्त से भरा था, सर्वथा व्यर्थ था। क्या अन्यजातियों के इस महान शिक्षक ने निरन्तर पूर्वनियति के सिद्धान्त का प्रचार नहीं किया? परन्तु क्या हमने कभी सुना कि उसने परमेश्वर के वचन का प्रचार करना इसलिए छोड़ दिया कि उसे अपना प्रचार व्यर्थ लगा? पौलुस ने प्रचार किया, ‘परमेश्वर ही है जो अपनी सुइच्छा के निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डालता है।’ परन्तु क्या हम कहीं पाते हैं कि इस कारण उसने हमें उन बातों की ‘इच्छा’ करने और चाहने का, जो परमेश्वर को भाती हैं, और अपनी पूरी शक्ति से स्वयं ‘काम’ करने का उपदेश देना छोड़ दिया? पौलुस ने प्रचार किया, ‘जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।’ परन्तु क्या उसने कभी मनुष्यों को यह समझाना छोड़ा कि वे स्वयं आरम्भ करें और अन्त तक स्थिर रहें? वरन् प्रभु ने स्वयं मनुष्यों को अपने ऊपर विश्वास करने के लिए बुलाया। फिर भी उसकी घोषणा सदा के लिए सत्य है, और उसका कथन निरुद्देश्य नहीं, जब वह गवाही देता है, ‘कोई मेरे पास नहीं आ सकता (अर्थात् कोई मुझ पर विश्वास नहीं कर सकता) जब तक पिता की ओर से उसे यह दान न दिया जाए’ (यूहन्ना 6:65)। और दूसरी ओर, प्रभु का विश्वास करने का उपदेश इसलिए व्यर्थ नहीं ठहरता कि उसका यह वर्णन सत्य है कि केवल कौन विश्वास करते हैं। यह कैसे कहा जा सकता है कि पूर्वनियति का सिद्धान्त प्रचार, उपदेश और ताड़ना के विरुद्ध खड़ा है और उन्हें व्यर्थ ठहराता है (जो पवित्रशास्त्र में सब के सब बार-बार प्रयुक्त हुए हैं), जबकि वही पवित्रशास्त्र पूर्वनियति के विषय में भी इतना कुछ कहता है?”

थोड़ा आगे चलकर पवित्र पिता कहता है, “ये बातें वे सुनते हैं और करते हैं जिन्हें यह दिया गया है; परन्तु जिन्हें नहीं दिया गया, वे उन्हें नहीं करते, चाहे वे सुनें या न सुनें। इसलिए फलवन्त और स्थिर विश्वास का प्रचार इस कारण रोका नहीं जाना चाहिए कि पूर्वनियति का प्रचार करना आवश्यक है, ताकि मनुष्य पहले के प्रचार से जान लें कि उन्हें क्या करना चाहिए, और वे जिन्हें यह दिया गया है उसे करें। ‘परन्तु (जैसा प्रेरित तर्क करता है) वे बिना प्रचारक के कैसे सुनें?’ और दूसरी ओर, पूर्वनियति का प्रचार इस कारण रोका नहीं जाना चाहिए कि उस विश्वास का प्रचार करना आवश्यक है जो फलवन्त है और अन्त तक स्थिर रहता है, ताकि जो विश्वास और आज्ञाकारिता में जीता है वह अपनी आज्ञाकारिता पर इस प्रकार घमण्ड न करे मानो वह उसकी अपनी है, परन्तु परमेश्वर का दान जाने, जैसा लिखा है, ‘जो घमण्ड करे, वह प्रभु पर घमण्ड करे।’” “और फिर (अगस्तीन आगे कहता है), जैसे जिसे ठीक प्रकार से ऐसा करने का दान मिला है वह उपदेश और प्रचार करता है, वैसे ही जिसे ऐसा करने का दान मिला है वह सुनता और आज्ञा मानता है। इसी से प्रभु इतनी बार कहता है, ‘जिसके पास सुनने के कान हों, वह सुन ले।’ और जिन्हें यह दान मिला है वे इसे किससे पाते हैं, यह प्रभु स्वयं हमें दिखाता है: ‘मैं उन्हें (वह कहता है) ऐसा हृदय दूँगा जो मुझे जाने, और ऐसे कान जो मेरी सुनें।’ इसलिए सुनने के कान ही सारी आज्ञाकारिता का दान हैं, जिनसे सम्पन्न किए गए सब लोग मसीह के पास आते हैं। इसलिए हम प्रचार भी करते हैं और उपदेश भी देते हैं। जिनके पास सुनने के कान हैं वे हमारी सुनते और मानते हैं; परन्तु जिनके पास नहीं हैं उनमें वह गम्भीर वचन पूरा होता है: ‘कि सुनते हुए सुनें और न समझें’; अर्थात् शरीर के बाहरी कान से तो सुनते हैं, परन्तु हृदय के भीतरी कान से नहीं। परन्तु यह क्यों कि एक को सुनने का दान दिया जाता है और दूसरे को नहीं; क्यों पिता की ओर से कुछ को पुत्र के पास आने का दान दिया जाता है और दूसरों को नहीं? क्या हम यह प्रश्न पूछते हैं? उत्तर यह है, ‘प्रभु का मन किसने जाना है?’ तो क्या हम इसलिए कि जो छिपा है उसे समझ नहीं सकते, जो प्रकट है उसका इनकार कर दें?

“इससे स्पष्ट दिखाई देता है (वह पवित्र जन आगे कहता है) कि उन लोगों की अत्यधिक सावधानी कितनी उलटी है, जो उसमें किसी कल्पित बेतुकेपन या विरोध के भय से एक ऐसे सिद्धान्त को, जिसका जानना अत्यन्त आवश्यक है, छिपाना या सर्वथा दबा देना चाहते हैं। परन्तु मान लो कि कुछ लोग पूर्वनियति का सिद्धान्त सुनकर आलस्य और उदासीनता में पड़ जाएँ, और लगन और परिश्रम से निकलकर वासना में सिर के बल गिर पड़ें और अपनी अभिलाषाओं के पीछे चलें, तो क्या पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की पूर्वज्ञान के विषय में जो कुछ कहा गया है वह इस कारण असत्य माना जाए? यदि परमेश्वर ने पहले से जाना होता कि वे भले होंगे, तो क्या वे भले न होते, यद्यपि अब वे दुष्टता में रंगरलियाँ मना रहे हैं? और यदि परमेश्वर ने पहले से जाना कि वे बुरे होंगे, तो वे बुरे होंगे ही, चाहे वे अभी जितनी भी भलाई में चमकते दिखाई दें। तो क्या वे सब बातें जो पवित्रशास्त्र परमेश्वर के पूर्वज्ञान के विषय में सच्चाई से कहता है, नकार दी जाएँ या चुप्पी में दबा दी जाएँ, क्योंकि मनुष्यों में ऐसे उदाहरण पाए जाते हैं? और वह भी तब, जब यह निश्चित है कि यदि ये सत्य घोषित न किए जाएँ, तो भी मनुष्य किसी न किसी और प्रकार की भूलों में सिर के बल जा पड़ेंगे?

“सत्य को घोषित न करने का कारण (अगस्तीन आगे कहता है) एक बात है; सत्य को घोषित करने की आवश्यकता दूसरी बात है। सत्य को घोषित न करने की उचितता के लिए जो भाँति-भाँति के कारण बताए जाते हैं, उन्हें गिनाना हमारी सीमा और हमारे उद्देश्य, दोनों से परे होगा। एक कारण यह बताया जाता है: कहीं ऐसा न हो कि जो नहीं समझते वे और बिगड़ जाएँ, जबकि हम चाहते हैं कि जो समझते हैं वे और बुद्धिमान और अच्छे बनें। परन्तु जो लोग हमारे सिखाए किसी निश्चित सत्य-सिद्धान्त से और बुद्धिमान और अच्छे नहीं बनते, वे निश्चय ही और बिगड़ते भी नहीं। परन्तु जहाँ वास्तविकता यह है कि जब हम किसी सत्य-सिद्धान्त की घोषणा करते हैं, तो जो उसे नहीं समझ सकता वह हमारी घोषणा से और बिगड़ जाता है, और जो समझ सकता है वह हमारे चुप रहने से बिगड़ता है, तब पूछा जाता है, ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? क्या यह कहीं अच्छा नहीं कि सत्य की घोषणा की जाए, ताकि जो उसे ग्रहण कर सकता है वह ग्रहण करे, बजाय इसके कि उसे चुप्पी में रोके रखा जाए कि कोई भी ग्रहण न कर सके? क्योंकि इस चुप्पी से दोनों बिगड़ते हैं, वह जो समझता है और वह जो नहीं समझता। जबकि जो समझता है, वह सत्य को सुनकर और ग्रहण करके औरों को भी सिखा सकता है। इसी कारण हममें से कुछ लोग वह घोषित करने और सिखाने को तैयार नहीं जिसे पवित्रशास्त्र की गवाही के अनुसार हमें घोषित करना और सिखाना चाहिए। और हमारे इस भय का कारण यह है कि कहीं हमारे खुलकर बोलने से वह ठोकर न खाए जो हमें नहीं समझ सकता। जबकि हमें यह भी डरना चाहिए कि कहीं हमारी चुप्पी से वह, जो हमारी बात समझ लेता यदि हम बोलते, औरों की झूठी शिक्षा में बह जाने के लिए छोड़ दिया जाए।”

इस भाव को, जो यहाँ संक्षेप में व्यक्त हुआ है, अगस्तीन आगे इस प्रकार विस्तार और पुष्टि देता है: “इसलिए यदि प्रेरितों और कलीसिया के उन शिक्षकों ने जो उनके बाद हुए, दोहरी सेवा निभाई, अर्थात् परमेश्वर के अनन्त चुनाव के सिद्धान्त को गम्भीरता से प्रस्तुत किया, और साथ ही विश्वासियों को भक्तिपूर्ण जीवन के अनुशासन में बनाए रखा, तो हमारे दिनों के ये मनुष्य अपनी शिक्षा के विषय में यह क्यों सोचें कि वे ठीक करते हैं जब वे अपने आपको अजेय सत्य के सुदृढ़ गढ़ के भीतर चुप्पी में बन्द रखते हैं, और मानते हैं कि यद्यपि चुनाव के विषय में जो कहा जाता है वह सदा सत्य है, फिर भी उसे लोगों के सामने खुलकर प्रचार नहीं करना चाहिए? इसके विपरीत, चुनाव के सिद्धान्त का प्रचार निरन्तर और पूरी रीति से होना चाहिए, ताकि जिसके पास ‘सुनने के कान’ हैं वह सुने। और ये ‘कान’ उसके सिवा किसके पास हैं जिसने उन्हें उससे पाया है जिसने उन्हें देने की प्रतिज्ञा की है? इसलिए जो सत्य ग्रहण नहीं करता वह उसे ठुकरा दे; परन्तु जो सत्य को सुनता और समझता है, वह उसे ग्रहण करे और पिए, और पिए और जीए! इसलिए जैसे भक्ति का प्रचार किया जाना चाहिए कि परमेश्वर की ठीक रीति से आज्ञा मानी और आराधना की जाए; वैसे ही पूर्वनियति का भी प्रचार किया जाना चाहिए, कि जिसके पास परमेश्वर के निःशुल्क अनुग्रह को ‘सुनने के कान’ हैं, वह परमेश्वर पर घमण्ड करे, अपने ऊपर नहीं।”

इसलिए यद्यपि इस पवित्र जन अगस्तीन में कलीसिया की उन्नति के लिए अनुपम समर्पण था, फिर भी वह सत्य के प्रचार की पद्धति को इतनी बुद्धिमानी से सन्तुलित करता है कि जहाँ वैध रीति से सम्भव हो, वहाँ वह पूरी विवेकशीलता से ठोकर से बचाव चाहता है। उसकी चेतावनी यह है कि जो कुछ सत्य प्रचारित किए जाएँ वे एक ही समय में संगति के साथ प्रचारित किए जाएँ। वह कहता है: “यदि कोई लोगों से कहे, यदि तुम विश्वास नहीं करते तो इसलिए कि तुम परमेश्वर द्वारा अनन्त विनाश के लिए पूर्वनियत किए गए हो, तो ऐसा मनुष्य न केवल अपने आलस्य को बढ़ावा देगा, वरन् अपने सुननेवालों के प्रति द्वेष भी पालेगा। यदि कोई प्रचारक अपने विचारों को भविष्य तक बढ़ाकर कहे कि उसके सुननेवाले कभी विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि वे निकम्मे ठहराए हुए हैं, तो ऐसा प्रचार शाप होगा, शिक्षा नहीं!” अगस्तीन ऐसे शिक्षकों को मूर्ख या कपटी भविष्यद्वक्ता जानकर तुरन्त (और बिलकुल उचित रूप से) कलीसिया से निकाल देता, जिनसे किसी भलाई की आशा नहीं की जा सकती। और वह पवित्र पिता अन्यत्र ठीक ही तर्क देता है कि प्रचारक तब दूसरों को लाभ पहुँचाता है जब वह उन पर तरस खाता और उन्हें आगे बढ़ाता है, और जिन्हें वह लाभ पहुँचाना चाहता है उन्हें बिना ताने-भरी झिड़की के रूप में किसी अपील के, ठीक मार्ग पर चलने को बुलाता है। परन्तु कुछ लोग वचन के प्रचार से लाभ पाते हैं और कुछ नहीं, इसके विषय में यह कहना हमसे दूर रहे कि यह ‘मिट्टी’ के निर्णय या बुद्धि के अनुसार है, जबकि यह सब ‘कुम्हार’ की इच्छा और बुद्धि के अनुसार है!

“जब मनुष्य पवित्र ताड़ना या झिड़की के द्वारा धार्मिकता के मार्ग में आते हैं, या उसमें लौट आते हैं, तो उनके हृदयों में उद्धार का कार्य उसके सिवा कौन करता है जो ‘बढ़ानेवाला’ है, चाहे कोई बोए या कोई सींचे? मनुष्य की कोई स्वतन्त्र इच्छा उसका सामना नहीं कर सकती जो बचाना चाहता है। इसलिए हमें निश्चय रखना चाहिए कि कोई मानवीय इच्छा परमेश्वर की इच्छा का सामना नहीं कर सकती, जो स्वर्ग और पृथ्वी में सब कुछ अपनी इच्छा के अनुसार करता है, और जो अपनी इच्छा से वे बातें पहले ही कर चुका है जो होनेवाली हैं। मनुष्यों की कोई इच्छा, हम दोहराते हैं, परमेश्वर की इच्छा का सामना नहीं कर सकती कि उसे वह करने से रोक दे जो वह चाहता है, क्योंकि वह समस्त मानव-जाति की इच्छाओं के साथ ही जो चाहता है वह करता है। और जब उसकी यह इच्छा होती है कि मनुष्यों को किसी निश्चित मार्ग से, जैसा उसे अच्छा लगे, लाए, तो क्या वह, मैं पूछता हूँ, उनके शरीरों को जंजीरों से बाँधता है? नहीं, कदापि नहीं! वह भीतर काम करता है; वह भीतर उनके हृदयों को थाम लेता है; वह भीतर उनके हृदयों को प्रेरित करता है; और उनकी उन्हीं अब नई इच्छाओं के द्वारा, जो उसने स्वयं उनमें उत्पन्न की हैं, उन्हें खींच लेता है।” परन्तु जो बात अगस्तीन आगे जोड़ता है उसे किसी रीति से छोड़ा नहीं जाना चाहिए। “क्योंकि हम नहीं जानते (वह कहता है) कि कौन पूर्वनियत लोगों की गिनती में है और कौन नहीं, इसलिए हमारी भावना ऐसी होनी चाहिए कि हम चाहें कि सब का उद्धार हो। इससे यह होगा कि जो कोई भी हमारे मार्ग में आए, हम उसे उस शान्ति का भागी बनाना चाहेंगे जिसका आनन्द हम स्वयं लेते हैं। ‘हमारी शान्ति’ तो फिर भी ‘शान्ति के पुत्रों पर ठहरेगी।’ इसलिए जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम सब मनुष्यों के प्रति स्वस्थ और कठोर ताड़ना को भी सदा औषधि के रूप में काम में लाएँगे, ताकि वे स्वयं नाश होने से बचें और दूसरों के नाश का कारण बनने से भी रोके जाएँ। परन्तु उस औषधि को उन लोगों के लिए लाभदायक बनाना केवल परमेश्वर का काम होगा जिन्हें उसने पहले से जाना और पूर्वनियत किया।” यदि ये बातें सत्य हैं, और यदि पवित्र पिताओं के प्रमुख जैसे एक उत्कृष्ट गवाह द्वारा ये इस प्रकार प्रमाणित की गई हैं, तो वे कैल्विन के सिर पर उसके अज्ञानी और बुरी इच्छा रखनेवाले सताने वालों के घृणा-भरे मुँह से उगली न जाएँ। फिर भी मैं चाहूँगा कि ये नीरस सावधान जन, जो अपनी आँसू-भरी मध्यमार्गिता से प्रसन्न करने के लिए इतने आतुर हैं, ज़रा यह विचार करें कि अगस्तीन, जिसे वे ईश्वरीय बातों के ज्ञान में इतनी सहजता से पहला स्थान देते हैं, विनम्रता में भी उनसे उतना ही आगे है। यह प्रतीति उन्हें अपनी खट्टी हो गई भीरुता को सच्ची विनम्रता बताकर बेचने से रोकेगी।

परन्तु अब मुझे पिगियस के साथ कुछ और व्यवहार करने दो। मेरे पाठकों को तीन विशेष और सारगर्भित बातें स्मरण रखनी चाहिए। पहली, कि मेरे सिद्धान्त को दबाने की मंशा से वह जो भी बेतुकी बातों का पहाड़ खड़ा करके उस पर फेंकता है, वह मुझ पर इतना नहीं जितना स्वयं परमेश्वर पर फेंका जाता है! दूसरी, कि जो पवित्रशास्त्र-खण्ड मेरे पक्ष में हैं उन्हें मेरे हाथों से छीन लेने के लिए वह अपने आपको ऐसा अज्ञानी खिलवाड़ी दिखाता है कि प्रकट हो जाता है कि वह अपने पक्ष को बाइबल को सर्वथा बिगाड़ने और उलट देने के सिवा और किसी रीति से सम्भाल नहीं सकता। और अन्तिम, कि वह ढिठाई की ऐसी चरम सीमा में सिर के बल जा पड़ता है कि अपनी बेतुकी बातों के लिए स्वयं अगस्तीन को प्रमाण के रूप में बिना झिझक प्रस्तुत करता है। “यदि परमेश्वर ने (यह निकम्मा और दुःसाहसी मरणहार तर्क देता है) कुछ मनुष्यों को विनाश के लिए सृजा, तो वह प्रेम किए जाने के योग्य नहीं। वे बेचारे प्राणी, जो जन्म लेने से पहले ही अनन्त जीवन से वंचित कर दिए गए, दण्ड से अधिक दया के योग्य हैं।” अब यदि वे गवाहियाँ, जिन्हें यह निर्भय प्राणी हिलाने का यत्न करता है, मेरी होतीं, तो वह एक नश्वर मनुष्य से लड़ रहा होता। परन्तु चूँकि वह स्वयं परमेश्वर का अपमान और तिरस्कार कर रहा है, इसलिए मैं प्रेरित की उस गम्भीर पुकार को सौ गुना उस पर लागू करने में लज्जित न होऊँगा, “हे मनुष्य, तू कौन है जो अपने सृजनहार से विवाद करता है?” यह अभागा मरणहार अब अनुभव करता है, और उसके सब साथी आगे अनुभव करेंगे, उन निन्दाओं के परिणाम को जो वे अपने गन्दे और अपवित्र मुँह से परमेश्वर पर फेंकते हैं। ऐसी निन्दाएँ स्वर्ग तक पहुँचने से बहुत पहले अपनी ही दुष्टता के बोझ से विफल होकर गिर पड़ती हैं। उनकी एकमात्र निश्चित गति यही है कि अपने पूरे भार के साथ उन्हीं के सिरों पर लौट आएँ जो उन्हें उच्चारते हैं। मुझे केवल इस विद्रोही के पवित्रशास्त्र में मिलावट करने के घृणित उन्माद का एक नमूना प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। पौलुस की रोमियों के नाम पत्री का नौवाँ अध्याय निम्नलिखित रीति से उलझाया भी जाता है और खण्ड-खण्ड भी किया जाता है:—

आरम्भ ही में, गुत्थी-भरी गाँठ खोलने के सारे परिश्रम और कष्ट से बचने के लिए, वह उसे (जैसा वह समझता है) ठीक आधे में काट देता है, इस एक शब्द से। वह कहता है कि इस्राएल परमेश्वर का चुना हुआ था, परन्तु सब इस्राएली नहीं, क्योंकि (वह कहता है) इस्राएल के वंशज सब के सब अपने पिता इस्राएल का सच्चा प्रतिनिधित्व नहीं करते थे, जिसने यह नाम “देखने” से पाया था। और इससे वह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर का चुनाव उन्हीं में यथार्थ और पक्का होता है जो “अपनी आँखें खोलते हैं।” परन्तु स्पष्ट-दृष्टि का यह उत्कृष्ट शिक्षक, इस्राएल नाम की व्याख्या करते हुए, स्वयं अत्यन्त हास्यास्पद रीति से पूरी तरह अन्धा है, जब वह एक भोथरे लट्ठे से व्यर्थ ही तीखी नोक बनाने का यत्न करता है। इस बीच यह अन्धा शिक्षक इस तथ्य के विषय में सोचता ही नहीं कि इस्राएल (उसकी स्पष्ट व्याख्या के अनुसार “खुली आँखों वाला”) परमेश्वर के विशेष अनुग्रह से “खुली आँखों वाला” बनाया गया था, क्योंकि वह तो अपनी माता के गर्भ ही में परमेश्वर द्वारा चुन लिया गया था। न ही किसी और के पास परमेश्वर को, या उसके सत्य को देखने की “आँखें” होती हैं, सिवा उनके जिनके मन को परमेश्वर स्वयं अपने आत्मा से प्रकाशित करता है। और केवल वही उसके आत्मा के प्रकाश के योग्य गिने जाते हैं जिन्हें उसने उनके अन्धेपन की दशा में ही अपने लिए गोद लिया, और जिन्हें वह अपनी सन्तान बनाता है। इसके बाद पिगियस, पिंजरे से छूटे हुए जंगली पशु के समान, मार्ग की सब बाड़ों को लाँघता हुआ उछलता निकलता है, और ऐसी बातें कहता है: “परमेश्वर की दया हर एक पर बढ़ाई गई है, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो; और इसी उद्देश्य से वह हमारे हृदय के द्वार पर खड़ा होकर खटखटाता है, भीतर आना चाहता है। इसलिए जगत की उत्पत्ति से पहले वे चुने गए, जिनके विषय में उसने पहले से जाना कि वे उसे ग्रहण करेंगे। परन्तु परमेश्वर किसी को कठोर नहीं करता, सिवा अपनी सहनशीलता के द्वारा, उसी रीति से जैसे अत्यधिक लाड़ करनेवाले माता-पिता अपनी सन्तान को अत्यधिक लाड़-प्यार से बिगाड़ देते हैं।” मानो कोई इन बचकाने सपनों से उन सब बातों के बल से बच सकता है जो प्रेरित ऐसी भावनाओं के सीधे विरोध में स्पष्ट घोषित करता है! और मानो उसके पाठकों के लिए यह कुछ भी न हो कि पौलुस दृढ़ता से कहता है कि जुड़वाँ बच्चों में से, जब वे अभी अपनी माता के गर्भ ही में थे, एक चुना गया और दूसरा ठुकराया गया! और वह भी दोनों में से किसी के कर्मों का, वर्तमान या भावी, कोई ध्यान किए बिना (जिनमें से पहले प्रकार के तो हो ही नहीं सकते थे), केवल बुलानेवाले परमेश्वर की सुइच्छा से! मानो यह कुछ भी न हो जब प्रेरित गवाही देता है कि “यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है,” जो जिसे चाहता है कठोर करता है, और जिस पर चाहता है दया करता है! मानो यह कुछ भी न हो जब वही प्रेरित घोषणा करता है, “कि परमेश्वर क्रोध के पात्रों में अपनी सामर्थ्य दिखाता है,” इसलिए कि वह दया के पात्रों पर अपने अनुग्रह का धन प्रगट करे! पौलुस यहाँ निर्विवाद गवाही देता है कि इस्राएल में से जितनों का उद्धार हुआ, उनका उद्धार परमेश्वर के निःशुल्क चुनाव के अनुसार हुआ; और इसलिए “चुने हुओं ने तो उसे पा लिया, और शेष अन्धे किए गए” (रोमियों 11:7)। परन्तु इन सब गम्भीर बातों की चर्चा हम अपने पिछले पृष्ठों में उनके क्रम से अधिक विस्तार से कर चुके हैं।

यदि हमारा विरोधी अपने से सौ गुना अधिक तीव्र बुद्धि और चतुर होता, तो भी उसकी जुटाई हुई सारी छिद्रान्वेषी बातें बहरे को भी प्रेरित की उपर्युक्त घोषणाओं की ऊँची गर्जना सुनने से कभी न रोक पातीं। फिर भी, शब्दों पर शब्दों का पहाड़ खड़ा कर चुकने के बाद, वह अपना यह दुर्बल पहाड़ अन्त में खड़ा छोड़ता है: “परमेश्वर ने उन निकम्मे ठहराए हुओं को नहीं सृजा जिनके विषय में उसने पहले देखा कि वे ऐसे होंगे, परन्तु उसने जाना कि जिन्हें वह सृजेगा उनमें से कुछ निकम्मे ठहराए जानेवाले होंगे।” परन्तु यह सारी मूर्खता, कम या अधिक, कुम्हार की आँखों और उसके हाथों पर भी लेप पोतने के सिवा और क्या है, ताकि हम उसका वास्तविक रूप और मुख-मुद्रा न पहचान सकें, न उसका कार्य देख सकें? और ठीक यही बात तब होती है जब वह प्रेरित के उस ईश्वरीय जाल से, जो इफिसियों के नाम उसकी पत्री के पहले अध्याय में छिपा है, अपने आपको छुड़ाने का यत्न करता है। वह अपनी फूली हुई भाषा के साथ ऐसा खिलवाड़ और प्रदर्शन करता है, मानो अपने ऊँचे, खोखले शोर से वह स्वयं प्रेरित को भी गूँगा कर सकता और उसे चुप रहने पर विवश कर सकता है। “परमेश्वर ने (यह घमण्डी मरणहार कहता है) हमें मसीह में चुना, क्योंकि उसने पहले से जाना कि उसका अनुग्रह, जो अन्यथा सब के लिए मुक्त था, केवल हम में ही स्थान पाएगा, और हम ही उसे ग्रहण करेंगे। उसने हमें सब मनुष्यों में से चुना, क्योंकि उसने पहले से देखा कि जो सब मनुष्यों के ग्रहण करने के लिए सामने रखा गया था वह हमारा विशेष अधिकार बन जाएगा, जो अकेले उसे ग्रहण करेंगे। इसी रीति से उसने हमें ‘अपने अनुग्रह की महिमा की स्तुति के लिए’ चुना, जो हमें पवित्र करता है; ठीक वैसे ही जैसे सब की प्रशंसा शिक्षक की होती है, जबकि शिक्षा और उसका लाभ शिष्य का होता है।” मानो वह अनन्त युक्ति, जिसे पौलुस अन्यत्र सब मानवीय कर्मों के विरोध में प्रस्तुत करता है, केवल परमेश्वर की युक्ति न हो! मानो निःशुल्क अनुग्रह की महिमा इस खण्ड में “परमेश्वर की सुइच्छा” के वाक्यांश से किसी अन्य शब्दों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली रीति से प्रगट न की गई हो! अरे! परमेश्वर ने हमें “अपनी सुइच्छा के अनुसार, जो उसने अपने आप में ठहराई थी” इसी कारण बचाया कहा गया है कि हम में कोई कारण न पाकर उसने अपने आपको हमारे उद्धार का कारण ठहराया। क्या तुम समझते हो कि प्रेरित पाँच बार यह दोहराता है कि हमारा सारा उद्धार परमेश्वर की उसी अनन्त आज्ञा, युक्ति और सुइच्छा का परिणाम है और उसी पर निर्भर है, यह यों ही है? क्या प्रेरित यह घोषणा बिना किसी उद्देश्य के करता है कि हम मसीह में “आशीषित” हैं क्योंकि हम मसीह में “चुने गए”? क्या प्रेरित सारी पवित्रता और हर भले कार्य को परमेश्वर के चुनाव से उसी प्रकार नहीं जोड़ता, जैसे जल अपने उद्गम-स्रोत तक पहुँचाए जाते हैं? क्या पौलुस इसी अनुग्रह को नहीं ठहराता कि हम “परमेश्वर की कारीगरी हैं, जो भले कामों के लिए सृजे गए, जिन्हें परमेश्वर ने पहले से तैयार किया कि हम उन पर चलें”? परमेश्वर ने हमें क्यों छाँटा और शेष से अलग किया, सिवा इसके कि हम जानें कि हम जो कुछ हैं वह हैं, और कि केवल परमेश्वर की निःशुल्क कृपा से हम सब औरों से अधिक आशीषित हैं? तो हे पाठको, देखो कि पिगियस के सिद्धान्त के अनुसार, हम में भले कर्मों का परमेश्वर का पूर्वज्ञान इफिसियों के नाम पत्री के पहले अध्याय में प्रेरित के सन्दर्भ के साथ कितना मधुर (!) मेल खाता है! हमारे विरोधी के लिए कितना अच्छा होता यदि वह प्रेरित के प्रशंसक का वह रूप, जो उसे क्षण-भर के लिए धारण करना पड़ा, बनाए रखता, बजाय इसके कि अचानक घमण्डी कल्पनाओं की ओर मुड़ जाए और प्रशंसक का मुखौटा सर्वथा उतार फेंके, जिससे उसकी अपनी ही पोल खुल गई। फिर भी ये महान विषय, जिन्हें मैं इस ग्रन्थ के पहले भाग में अधिक पूर्णता से निपटा चुका था, उन्हें मैंने अब केवल ऊपर-ऊपर से, होंठ से ही छुआ है।

यह निकम्मा प्राणी पिगियस वास्तव में अगस्तीन को इस बात के लिए कड़ी मार लगाता है कि वह (जैसा वह कहता है) ऐसा मनुष्य है जो इस महान विषय की चर्चा में शान्त विवेक की अपेक्षा अधिक प्रचण्ड उतावलापन दिखाता है; जो मार्ग में आनेवाली हर बात और हर व्यक्ति से टकरा जाता है, और ऐसी बातें सामने लाता है जो परमेश्वर की भलाई से सर्वथा विपरीत लगती हैं। फिर भी यही घमण्डी मरणहार, लज्जा की हर भावना से रहित होकर, अपनी बेतुकी बातों की पुष्टि में इसी पवित्र पिता के अधिकार की दुहाई देता है। और वह यह कितनी ढिठाई से करता है, इसे मैं थोड़े से शब्दों में प्रमाणित करूँगा। वह उस पवित्र जन के परिश्रम की प्रशंसा करता है कि उसने सिम्प्लिशियन को लिखी अपनी पुस्तक में, जो मेदियोलम के धर्माध्यक्ष था, इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न को इतनी सावधानी से फटका है। परन्तु क्या इस व्यक्ति ने वह पुस्तक कभी सचमुच खोली भी? मुझे सन्देह है; क्योंकि वह उसे दो पुस्तकों के स्थान पर एक पुस्तक बना देता है! और यह कुछ आश्चर्य की बात भी है कि इस अत्यन्त प्रतिष्ठित व्याख्याकार ने अगस्तीन की अन्य सब रचनाओं में से इसी रचना को चुना, जिसके विषय में वह पवित्र पिता स्वयं स्वीकार करता है कि उसने इसे अपनी धर्माध्यक्षता के आरम्भ में लिखा था। क्योंकि यद्यपि अगस्तीन ने वह पुस्तक पेलागियस के विरुद्ध लिखी थी, तो भी वह निष्कपटता से यह स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाता कि उसने बाद में उस विषय पर कहीं अधिक पूर्णता और ठोस रीति से लिखा। उसके अपने शब्द ये हैं: “सन्तों की पूर्वनियति का वर्णन तो वास्तव में मैंने उस पुस्तक में किया है। परन्तु बाद में आवश्यकता ने मुझे विवश किया कि जब मैं पेलागियसवादियों के विरुद्ध सत्य के लिए संघर्ष कर रहा था, तब उस सिद्धान्त की रक्षा अधिक परिश्रम और श्रम से करूँ। क्योंकि मैंने सदा पाया कि हर विधर्म, जैसे ही उठता था, कलीसिया में अपने ही प्रश्न ले आता था, जिनके विरुद्ध ईश्वरीय पवित्रशास्त्र की रक्षा उससे अधिक सावधानी से करना आवश्यक था जितनी तब करनी पड़ती यदि ऐसी आवश्यकता उत्पन्न ही न हुई होती।”

परन्तु अब देखें कि वह प्रमाण क्या है जो यह ढीठ व्यक्ति अगस्तीन की रचनाओं में से प्रस्तुत करता है। “मेरे लेखक की (वह कहता है) यह सम्मति है कि बुलाहट का ठुकराना या उसकी अवहेलना निकम्मा ठहराए जाने का कारण है, और इस सम्मति की वह पूर्ण रूप से पुष्टि करता है।” वास्तविकता यह है कि अगस्तीन का मन इसके सर्वथा विपरीत है। क्योंकि अपनी “पुनरावलोकन” नामक पुस्तक में वह कहता है, “मैंने एक समय मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा के लिए बहुत परिश्रम किया, जब तक कि परमेश्वर के अनुग्रह ने अन्त में मुझे जीत न लिया।” परन्तु मैं यहाँ उस बात का उल्लेख छोड़ता हूँ जो वह इस विचाराधीन पुस्तक में और अन्य स्थानों में, जिन्हें मैं पहले उद्धृत कर चुका हूँ, अपना मन समझाते हुए आगे कहता है, जो कम से कम विश्वासियों के लिए पिगियस या उस जैसे किसी भी अन्य व्यक्ति की हज़ार सम्मतियों से अधिक मूल्यवान है। तो फिर पिगियस ढिठाई से भी बढ़कर साहस के साथ अगस्तीन को उन विचारों के लिए प्रमाण कैसे ठहराता है जिन्हें वह अपनी सारी रचना में उतने ही दृढ़ संकल्प से ठुकराता है जितनी निष्कपटता से उनकी निन्दा करता है? परन्तु इन टिप्पणियों को अधिक न बढ़ाऊँ, इसलिए मैं केवल यह कहता हूँ कि जो प्रमाण पिगियस प्रस्तुत करता है वे अगस्तीन की उस रचना में अवश्य पाए जाते हैं; परन्तु तथ्य यह है कि जिस पृष्ठ पर वे मिलते हैं उसी पृष्ठ पर उनका खण्डन भी हो जाता है। “यदि (अगस्तीन तर्क देता है) पवित्रशास्त्र कहता है, ‘यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है’; इसलिए कि अकेली मनुष्य की इच्छा उसे न्याय और धार्मिकता से जीने में समर्थ करने के लिए पर्याप्त नहीं, जब तक उसे परमेश्वर की दया की सहायता न मिले; यदि बात ऐसी है, तो हम उतने ही अच्छे ढंग से यह तर्क दे सकते थे, और पवित्रशास्त्र उतने ही अच्छे ढंग से कह सकता था, ‘यह दया करनेवाले परमेश्वर की नहीं, परन्तु चाहनेवाले मनुष्य की बात है।’ क्योंकि इसके अनुसार तो परमेश्वर की दया पर्याप्त नहीं, जब तक हमारी इच्छा की सहमति से उसे सहायता न मिले। परन्तु सत्य और तथ्य यह है कि हमारा चाहना व्यर्थ है जब तक परमेश्वर दया न करे। परन्तु यह कैसे कहा जाए (मैं नहीं जानता) कि परमेश्वर का दया करना व्यर्थ है जब तक हम भी न चाहें? क्योंकि जहाँ परमेश्वर दया करता है वहाँ हम निश्चय ही इच्छा रखेंगे, क्योंकि उस दया का स्वभाव ही, जब वह प्रगट होती है, हमें इच्छुक बनाना है, प्रेरित के उस वचन के अनुसार, ‘क्योंकि परमेश्वर ही है जो तुम में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डालता है।’ क्योंकि यदि यह पूछा जाए कि भली इच्छा परमेश्वर का दान है या नहीं, तो कौन इतना दुःसाहसी मिलेगा जो इसका इनकार करे?”

थोड़ा आगे अगस्तीन यह निष्कर्ष निकालता है: “इसलिए सत्य यह है कि ‘यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है’, क्योंकि यद्यपि परमेश्वर बहुतों को बुलाता है, तो भी वह दया केवल उन्हीं पर करता है जिन्हें वह इस प्रकार बुलाता है कि उनमें उस बुलाहट को प्रभावकारी बना दे, ताकि वे उसके पीछे चलें। इसलिए यदि कोई यह कहे, ‘यह दया करनेवाले परमेश्वर की नहीं, परन्तु चाहनेवाले मनुष्य की बात है’, तो वह सर्वथा असत्य होगा; क्योंकि परमेश्वर किसी पर निष्फल या व्यर्थ दया नहीं करता। परमेश्वर जिस किसी पर दया करता है, उसे वह इस प्रकार बुलाता है कि उसकी बुलाहट की रीति को प्रभावकारी बना देता है, कि वह बुलानेवाले को ठुकराएगा नहीं।” इसलिए पिगियस ने अत्यन्त सत्य कहा जब उसने अपनी प्रस्तावना की टिप्पणियों में कहा कि पूर्वनियति का यह महान प्रश्न अगस्तीन ने सिम्प्लिशियन को सम्बोधित अपनी पुस्तक में परिश्रम से फटका है। परन्तु वह स्वयं इस विषय में अत्यन्त गम्भीर रूप से चूक करता है। क्योंकि वह वायु में उड़ाई गई भूसी को पकड़ने में लगा है, और उस गेहूँ की सर्वथा उपेक्षा करता है जो खलिहान में स्पष्ट रूप से छूट गया है।

परन्तु अब सिसिली के जॉर्जियस से निपटने के लिए कुछ थोड़ा स्थान निकालना होगा। इस अभागे प्राणी से जुड़ी सब बातें इतनी नीरस, व्यर्थ और घिनौनी हैं कि उसके खण्डन में कोई भी समय या परिश्रम लगाते हुए मुझे सचमुच लज्जा आती है। और मैं इस छाया के साथ मैदान में उतरने की कृपा भी न करता, यदि बहुतों की उसके दावों पर मूर्खतापूर्ण घबराहट मुझे ऐसा करने को विवश न करती। और मुझे सन्देह नहीं कि बहुत से लोग होंगे जो यह विचार करके कि उसकी तुच्छ बचकानी बातों पर मुझे अनिवार्यतः कितनी सरल विजय मिलेगी, मेरे इस अनावश्यक प्रयास की खूब हँसी उड़ाएँगे। वास्तव में यदि वह हानिकारक व्यक्ति न होता, तो मैं उसे शब्दों से खण्डन किए जाने की अपेक्षा तिरस्कारपूर्वक पैरों तले रौंदे जाने के कहीं अधिक योग्य समझता। परन्तु चूँकि उसकी पुस्तकें इटली भर में उड़कर हर ओर बहुतों को पागल कर रही हैं, इसलिए ऐसी आवश्यकता में मैं ऐसे पागल के साथ स्वयं थोड़ा पागलपन दिखाना अधिक पसन्द करूँगा, बजाय इसके कि चुप रहकर उसके पागलपन से कलीसिया में इतनी हानि होने दूँ। प्राचीन काल में जब भविष्यद्वक्ता यहेजकेल ने देखा कि कुछ बूढ़ी भविष्यद्वक्तिनें लोगों की आँखों को अन्धा कर रही हैं, तो उसे स्त्रियों के साथ युद्ध में उतरने में लज्जा नहीं हुई (यहेजकेल 13:17)। इसलिए यदि हम मसीह के सच्चे सेवक होना चाहते हैं, तो उन लोगों को, चाहे वे कोई भी हों, जो अपनी पूरी शक्ति से अपनी भूसी प्रभु के अन्न-भण्डार में डालने का परिश्रम कर रहे हैं, भगाने के लिए हमें शस्त्र उठाने को विवश होने पर बुरा नहीं मानना चाहिए।

जब हम गवाही देते हैं कि मनुष्य परमेश्वर की अनन्त युक्ति से या तो उद्धार के लिए या विनाश के लिए पूर्वनियत हैं, तो जॉर्जियस समझता है कि हम इस विषय में विशेष रूप से तीन कारणों से भ्रम में हैं और धोखा खा रहे हैं। उनमें पहला, वह कहता है, यह है कि हम इस बात से अनजान हैं कि पवित्रशास्त्र में “चुनाव” शब्द भिन्न-भिन्न अर्थों में लिया जाता है। “क्योंकि परमेश्वर के विषय में, वह कहता है, कभी-कभी कहा जाता है कि वह किसी अस्थायी पद के लिए कुछ व्यक्तियों को चुनता या छाँटता है, जहाँ अनन्त जीवन का कोई उल्लेख नहीं होता, न उसका कोई विचार किया जाता है।” परन्तु यह मूर्ख खिलवाड़ी किस प्रकार के तर्कों से हमें यह विश्वास दिलाने का यत्न करेगा कि हम पवित्रशास्त्र में इतने अनुभवहीन हैं कि अब तक यह भी नहीं जानते कि शाऊल, जो वास्तव में निकम्मा ठहराया हुआ था, फिर भी राजा होने के लिए चुना या छाँटा गया था? और कि यहूदा, जो बारह में से एक था, जिन्हें मसीह घोषणा करता है कि उसने स्वयं चुना था, मसीह द्वारा शैतान कहा गया? यह घमण्डी जन पवित्रशास्त्र के कुछ ऐसे खण्ड क्यों नहीं दिखाता जो हमारी गवाही के समर्थन में हमारे द्वारा बुरी और अधर्मी रीति से प्रस्तुत किए गए हों, जिनसे हमारी भूलें प्रकट हो जाएँ?

वास्तविकता यह है कि यह स्वप्नदर्शी अपने ही सपने गढ़ता है जो उसके अपने मस्तिष्क की सन्तानें हैं, और उन्हीं के विरुद्ध ऐसे युद्ध करता है मानो वे सचमुच हमारे सपने हों। और फिर भी यह आश्चर्य की बात है कि इस बीच वह अपने आपको और “चुनाव” शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थों के विषय में अपने ही नियम को कितना भूल जाता है, जब वह हम पर आक्रमण करता है और हम पर प्रेरित के ये शब्द लागू करता है: “ऐसा न हो कि औरों को सुसमाचार सुनाकर मैं आप ही निकम्मा (या त्यागा हुआ) ठहरूँ।” क्योंकि वह इस खण्ड से यह निष्कर्ष निकालता है कि पौलुस ने (चुनाव के सिद्धान्त के अनुसार) निश्चय ही झूठ कहा जब उसने यह भय प्रगट किया कि कहीं परमेश्वर का अटल चुनाव उसके विषय में विफल न हो जाए; और कि वह वास्तव में अपने चुनाव को जानता ही नहीं था, या उसके विषय में निश्चित नहीं था। अब यह अभागा नहीं देखता कि इस खण्ड में “निकम्मा” (या “अस्वीकृत”) “ग्रहणयोग्य” के विपरीत है; और “ग्रहणयोग्य” का अर्थ यह होगा कि ऐसे “ग्रहणयोग्य” ने अपनी भक्ति के पक्के चिह्न और प्रमाण दिए हैं। “निकम्मा” शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ हमारे मूर्ख विरोधी के मन में क्यों नहीं आए? क्योंकि जब भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा “निकम्मी चाँदी” की बात कही जाती है (यिर्मयाह 6:30), और इब्रानियों के नाम पौलुस की पत्री में “निकम्मी भूमि” की (इब्रानियों 6:8), तो इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसी “निकम्मी चाँदी” या “निकम्मी भूमि” परमेश्वर द्वारा अनन्त विनाश के लिए नियुक्त की गई थी; परन्तु यह कि वह चाँदी और भूमि थी जो खोटी मिलावटी, निष्फल और व्यर्थ हो गई थी। और कि “निकम्मा” शब्द इस खण्ड में प्रेरित के द्वारा मनुष्यों पर लागू होता है, जैसा वह दूसरी पत्री में भी होता है, प्रत्येक स्थान में सन्दर्भ से तुरन्त प्रकट है। और फिर भी किसी अस्थायी पद का चुनाव उस अनन्त चुनाव से इतना स्पष्ट रूप से भिन्न है, जिसके द्वारा परमेश्वर हमें चुनता और अनन्त जीवन के लिए गोद लेता है, कि पवित्रशास्त्र कभी-कभी उन दोनों को उनके निकट सम्बन्ध के कारण एक ही व्यक्ति में जोड़ देता है।

इस प्रकार, जब पौलुस घमण्ड करता है कि परमेश्वर ने उसे “माता के गर्भ ही से” “अलग किया,” तो वह अपनी प्रेरिताई के पद की बात कर रहा है। परन्तु वही प्रेरित और ऊँचा चढ़कर साथ ही परमेश्वर के उस अनुग्रह पर भी घमण्ड करता है जिसके द्वारा वह उद्धार की आशा के लिए बुलाया गया था। इसी प्रकार मसीह, यद्यपि वह घोषणा करता है कि जिन्हें उसने प्रेरिताई के पद के लिए चुना था उनमें से एक शैतान है, फिर भी अन्यत्र गोद लेने के अनुग्रह को प्रेरिताई के आदर के साथ जोड़ता है, यह कहते हुए, “तुमने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैंने तुम्हें चुना है; कि तुम जाकर फल लाओ, और तुम्हारा फल बना रहे।” क्योंकि वह घोषणा करता है कि उसके अपने लोग पिता की ओर से उसे इसी उद्देश्य से दिए गए थे कि वह उनमें से किसी को नाश न होने दे, सिवा उसके जो पहले ही “विनाश का पुत्र” था। इसलिए यद्यपि हम पवित्रशास्त्र में सर्वत्र पढ़ते हैं कि परमेश्वर ने इन या उन लोगों को इस या उस प्रकार के जीवन के लिए, या इस या उस अस्थायी पद के लिए चुना, तो भी ऐसी बातें उस बड़ी बात को बिलकुल नहीं बदलतीं कि परमेश्वर ने उन्हें उद्धार के लिए चुना जिन्हें वह बचाना चाहता था। न ही एक चुनाव ने दूसरे का विरोध किया, उसका खण्डन किया, उसके विपरीत गया, या उसमें बाधा डाली।

दूसरा कारण जिससे जॉर्जियस घोषणा करता है कि हम भूल और भ्रम में हैं, यह है कि हम यह नहीं मानते कि नए नियम के सब विश्वासी (जैसा वह उन्हें कहता है) उद्धार के लिए चुने गए थे, जैसे वे लोग थे जिनके विषय में प्रेरित इफिसियों के नाम अपनी पत्री के पहले अध्याय में कहता है। परन्तु हम पहले ही आवश्यकता से अधिक दिखा चुके हैं कि पौलुस उस अध्याय में उस विश्वास को, जिसके द्वारा परमेश्वर की सन्तान अपने उद्धार के अधिकार में प्रवेश करती है, अनन्त चुनाव तक उसके सच्चे और एकमात्र स्रोत के रूप में पहुँचाता है; और निश्चय ही विश्वास विशेष रूप से उन आत्मिक सम्पदाओं में गिना जाना चाहिए जो हमें मसीह में निःशुल्क दी गई हैं। और पौलुस गवाही देता है कि हमारी सब और प्रत्येक आत्मिक आशीष उस अनन्त और गुप्त सोते से, अर्थात् परमेश्वर की निःशुल्क गोद-लेनी से, नहीं तो और कहाँ से बहती है? फिर प्रेरित ये शब्द प्रयोग करता है, “जो उसने सब प्रकार की बुद्धि और समझ सहित हम पर बहुतायत से किया।” परमेश्वर ने ऐसी बहुतायत कैसे की? और यह बहुतायत किस स्रोत से बही? प्रेरित इसके तुरन्त बाद हमें बताता है, “उसकी सुइच्छा के अनुसार, जो उसने अपने आप में ठहराई थी” (पद 8, 9)।

इसलिए यदि विश्वास ईश्वरीय चुनाव का फल है, तो तुरन्त प्रकट है कि सब विश्वास के लिए प्रकाशित नहीं किए जाते। इसीलिए यह भी निर्विवाद तथ्य है कि जिन्हें परमेश्वर ने अपने आप में विश्वास देना ठहराया, वे उसके द्वारा अनादिकाल से इसी उद्देश्य के लिए चुने गए थे। फलस्वरूप अगस्तीन की भावनाएँ सत्य हैं जहाँ वह यों लिखता है: “परमेश्वर के चुने हुए उसके द्वारा इसलिए अपनी सन्तान होने के लिए चुने गए कि वे विश्वास करने वाले बनाए जाएँ, इसलिए नहीं कि उसने पहले से देखा कि वे विश्वास करेंगे।” मैं यहाँ प्रेरित के उपर्युक्त के समान अन्य खण्डों को उद्धृत करने से रुकता हूँ, क्योंकि उन पर बहुत शीघ्र उनके उचित स्थान पर विचार करना होगा। परन्तु चूँकि इंजीलकार मत्ती में एक खण्ड है जहाँ परमेश्वर के चुने हुओं की बात असंख्य संख्या के रूप में की गई प्रतीत होती है, जहाँ मसीह स्वयं कहता है कि “झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्ता ऐसे बड़े चिह्न और अद्भुत काम दिखाएँगे कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें;” जॉर्जियस इस स्थान पर “चुने हुओं” का अर्थ उन सब से लेता है जो विश्वास और धार्मिकता में स्थिर रहते हैं। और यह व्याख्या बिलकुल ठीक है, बशर्ते वह साथ ही यह स्वीकार करे कि यह स्थिरता अकेले चुनाव पर निर्भर है। परन्तु जॉर्जियस, विशेष या व्यक्तिगत चुनाव के सारे विचार को बन्द करने के लिए, मनुष्यों में से प्रत्येक को उसके अपने चुनाव का कर्ता बना देता है।

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