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"परमेश्वर ने जगत के अधिकांश भाग को विनाश के लिए सृजा।"
शोध-वाक्य
जॉन कैल्विन की लातीनी तथा फ्रांसीसी, दोनों पुस्तकों से उद्धृत, विषय:
पूर्वनियति।
शोध-वाक्य I।
(अर्थात् अपवाद I।)
"परमेश्वर ने अपनी निरी और केवल अपनी इच्छा से जगत के अधिकांश भाग को विनाश के लिए सृजा।"
यह पहला शोध-वाक्य है जिसे मैं प्रस्तुत करूँगा। और अब सुनिए कि आपके विरोधी इसके विरुद्ध कौन-कौन से तर्क लाते हैं।
निन्दक के
कथन और टीका-टिप्पणियाँ।
आपके विरोधी कहते हैं कि यह शोध-वाक्य प्रकृति के विरुद्ध है और पवित्रशास्त्र के भी विरुद्ध है। प्रकृति के विषय में वे यह दावा करते हैं कि हर प्राणी अपनी सन्तान से प्रेम रखता है। अब यह स्वभाव परमेश्वर का दिया हुआ है; इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर भी अपनी सन्तान से प्रेम रखता है; क्योंकि यदि परमेश्वर स्वयं अपनी सन्तान से प्रेम न रखता, तो वह सब प्राणियों से उनकी अपनी-अपनी सन्तान से प्रेम न करवाता। और इस बात को वे यशायाह 66:9 से इस प्रकार सिद्ध करते हैं: "क्या मैं प्रसव के समय तक पहुँचाकर बच्चा न उत्पन्न होने दूँ?" मानो उसने कहा हो, "जो कुछ मैं दूसरों से करवाता हूँ, वह मैं स्वयं भी करता हूँ। अब मैं दूसरों से प्रसव करवाता हूँ; इसलिए मैं भी प्रसव करता हूँ।" इसी समानता के आधार पर वे यह तर्क और उसका निष्कर्ष निकालते हैं: परमेश्वर सब प्राणियों से उनकी अपनी सन्तान से प्रेम करवाता है। इसलिए वह स्वयं भी अपनी सन्तान से प्रेम रखता है। अब सब मनुष्य परमेश्वर की सन्तान हैं। क्योंकि परमेश्वर आदम का पिता है, जिससे सब मनुष्य उत्पन्न हुए। परन्तु मनुष्यों को विनाश के लिए सृजना प्रेम का नहीं, वरन् घृणा का कार्य है। इसलिए परमेश्वर ने किसी को भी विनाश के लिए नहीं सृजा। और फिर वे यह तर्क देते हैं: "सृष्टि प्रेम का कार्य है, घृणा का नहीं। इसलिए परमेश्वर ने सब मनुष्यों को प्रेम से सृजा, घृणा से नहीं।" और फिर, "कोई पशु इतना क्रूर नहीं (मनुष्य की तो बात ही क्या) कि वह अपने बच्चों को दुर्दशा के लिए उत्पन्न करना चाहे। तब परमेश्वर में ऐसी इच्छा कितनी कम पाई जाएगी! क्या ऐसी सृष्टि के मामले में परमेश्वर उस भेड़िये से भी कम दयालु और कृपालु न ठहरेगा जिसे उसी ने सृजा है?" मसीह इसी प्रकार तर्क करता है: "सो जब तुम बुरे होकर अपने लड़कों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो परमेश्वर कितना अधिक देगा?" (मत्ती 7:11)। आपके विरोधी ठीक इसी प्रकार तर्क करते हैं। वे कहते हैं, यदि कैल्विन बुरा मनुष्य होकर भी किसी सन्तान को दुर्दशा के लिए उत्पन्न करना न चाहता, तो परमेश्वर ऐसा करना कितना कम चाहेगा? प्रकृति के विषय में आपके विरोधी ये और ऐसे ही तर्क प्रस्तुत करते हैं।
परन्तु पवित्रशास्त्र के सम्बन्ध में वे इस प्रकार तर्क करते हैं: परमेश्वर ने देखा कि "सब कुछ" जो उसने बनाया था "बहुत ही अच्छा" था। इसलिए मनुष्य भी ऐसा ही था, जिसे उसने "बहुत ही अच्छा" बनाया था। पर क्या होगा यदि परमेश्वर ने उसे विनाश के लिए सृजा हो? यदि ऐसा है, तो परमेश्वर ने जो "बहुत ही अच्छा" था उसे विनाश और नाश के लिए सृजा, और इसलिए उसे नाश करना भाता होगा! परन्तु यह तो विचार में भी अधर्म की बात है। और फिर वे तर्क देते हैं: परमेश्वर ने एक मनुष्य को सृजा और उसे अदन की वाटिका में रखा, जो सुख का जीवन है। इसलिए परमेश्वर ने सब मनुष्यों को सुखी जीवन के लिए सृजा, क्योंकि सब मनुष्य उसी एक मनुष्य में सृजे गए थे। और यदि सब मनुष्य आदम में गिरे, तो इससे यह निकलता है कि सब मनुष्य आदम में स्थिर भी थे, और उसी दशा में थे जिसमें आदम था। और आगे, परमेश्वर कहता है, "मैं पापी के मरने से प्रसन्न नहीं होता"; और फिर, लिखा है कि परमेश्वर "यह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, वरन् यह कि सब मनुष्य सत्य की पहचान तक पहुँचें" (1 तीमुथियुस 2:4)। इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्वर ने जगत के अधिकांश भाग को विनाश के लिए सृजा, तो इससे यह निकलता है कि उसका क्रोध उसकी दया से बड़ा है, और इसलिए यह भी निकलता है कि उसका क्रोध "तीसरी और चौथी पीढ़ी तक" प्रकट होता है। जबकि, "इसके विपरीत यह प्रत्यक्ष है कि उसकी दया "हज़ारवीं पीढ़ी तक" बनी रहती है!"
जॉन कैल्विन का उत्तर,
शोध-वाक्य I के विषय में
(अर्थात् अपवाद I।)
और उस पर निन्दक की टिप्पणियों के विषय में।
जिसे आप अपना पहला शोध-वाक्य बनाकर पकड़ बैठे हैं, वह यह है, "कि परमेश्वर ने अपनी निरी और केवल अपनी इच्छा से जगत के अधिकांश भाग को विनाश के लिए सृजा।" अब यह सब, अर्थात् "जगत का अधिकांश भाग विनाश के लिए" और "उसकी अपनी निरी और केवल अपनी इच्छा से", पूरी तरह कल्पित बात है और आपके अपने मस्तिष्क की कार्यशाला की उपज है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने निश्चय ही आदि से हर उस बात को ठहराया जो मनुष्य जाति पर घटित होनी थी, तथापि ऐसी कथन-शैली कि सृष्टि के कार्य का अन्त या उद्देश्य विनाश या नाश था, मेरे लेखों में कहीं नहीं पाई जाती। इसलिए किसी अशुद्ध सूअर के समान आप अपने गन्दे थूथन से उस सारी शिक्षा को खोद डालते हैं जो सुगन्धित है, इस आशा से कि उसमें कुछ घिनौना और आपत्तिजनक पा जाएँ।
फिर, यद्यपि मेरी शिक्षा यह है कि परमेश्वर की इच्छा सब वस्तुओं का प्रथम और सर्वोच्च कारण है, तथापि मैं सर्वत्र यह सिखाता हूँ कि जहाँ कहीं उसकी योजनाओं और कार्यों में कारण स्पष्ट नहीं दिखता, वहाँ भी एक कारण है जो उसी में छिपा हुआ है, और उसी के अनुसार उसने केवल वही ठहराया है जो बुद्धिमत्तापूर्ण, पवित्र और न्यायसंगत है। इसलिए स्कूली विद्वानों के उन विचारों के विषय में जो परमेश्वर की निरंकुश, अर्थात् अत्याचारी इच्छा के सम्बन्ध में हैं, मैं उन्हें केवल अस्वीकार ही नहीं करता, वरन् उन सबसे घृणा करता हूँ, क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता को उसके शासन-अधिकार से अलग कर देते हैं। अब देख, हे अशुद्ध कुत्ते, कि तूने अपने इस ढीठ भौंकने से कितना कमाया है और अपने पक्ष को कितना आगे बढ़ाया है। मैं तो, जब सारी मानव जाति को परमेश्वर की इच्छा के अधीन करता हूँ, तब साथ ही यह भी सदा कहता हूँ कि परमेश्वर कभी कुछ नहीं ठहराता, सिवाय अत्यन्त धर्ममय कारण के, और वह कारण (चाहे वर्तमान समय में हम पर प्रकट न हो) अन्तिम दिन में अपनी सारी अनन्त धार्मिकता और ईश्वरीय पूर्णता के साथ हम पर निश्चय ही प्रकट किया जाएगा।
आप मेरे मुँह पर "परमेश्वर की निरी और केवल उसकी इच्छा" की बात ठूँसते हैं और ढिठाई से मुझे उसका उलाहना देते हैं, जबकि इस विचार को मैं अपनी पुस्तकों के सौ से भी अधिक स्थलों में सर्वथा अस्वीकार करता हूँ। इस बीच, मैं खुलकर मानता हूँ कि मेरी शिक्षा यह है: कि आदम केवल परमेश्वर की अनुमति से नहीं, वरन् उसकी गुप्त योजना और आज्ञा से गिरा; और यह कि आदम अपने पतन के द्वारा अपनी समस्त सन्तान को अपने साथ अनन्त विनाश में खींच ले गया। ये दोनों बातें, जान पड़ता है, आपको बहुत अखरती हैं, क्योंकि (आपके कथनानुसार) वे "प्रकृति के और पवित्रशास्त्र के विरुद्ध" हैं। आप इसे प्रकृति के विरुद्ध सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि हर प्राणी स्वभावतः अपनी सन्तान से प्रेम करता है; इससे आप तर्क करते हैं कि इसलिए परमेश्वर ने, जिसने बुद्धिहीन पशुओं को ऐसा स्वाभाविक स्नेह दिया, निश्चय ही सब मनुष्यों से कम प्रेम नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे उसकी सन्तान हैं। आपका तर्क और विचार अत्यन्त ही स्थूल और निम्न है, और विषय की महानता के सामने अत्यन्त तुच्छ है, जब आप प्रकृति के अनादि रचयिता परमेश्वर से वही माँगते हैं जो वह बैल और गधे से उचित रीति से माँगता है, जिन्हें उसी ने सृजा है। मानो परमेश्वर स्वयं उन्हीं नियमों से बँधा हो जो उसने अपनी रची हुई सृष्टि के लिए ठहराए हैं! हर प्राणी अपनी जाति को बढ़ा सके, इसलिए उसने हर प्राणी में उस वंश-वृद्धि की चाह रोपी है। जा, तब परमेश्वर से वाद-विवाद कर, और उससे पूछ कि अनादि काल से वह अपने आप में सन्तुष्ट क्यों रहा, और अपनी स्वाभाविक उत्कृष्टता और महिमा को मानो बाँझ और अनुत्पादक ही क्यों बनाए रखा! परमेश्वर को निश्चय ही सदा अपने आप से संगत रहना चाहिए। इसलिए यदि तू इस विशाल और विस्मयकारी विषय में हमारा न्यायी ठहरे, तो परमेश्वर ने क्रम को तोड़ दिया है, क्योंकि उसने अपनी उर्वरता का प्रयोग करने के बदले बिना किसी सन्तान के रहना चुना!
इसके अतिरिक्त, जब सब बुद्धिहीन पशु अपनी सन्तान के लिए मृत्यु तक लड़ते हैं, तब (आपकी शिक्षा के अनुसार) यह कैसे हुआ कि परमेश्वर अपनी असहाय सन्तान को बाघों, रीछों, सिंहों और भेड़ियों से फाड़े और खाए जाने देता है? क्या इसलिए कि उसका हाथ छोटा है, और वह स्वर्ग से उनकी रक्षा के लिए उसे बढ़ा नहीं सकता! देखिए कि मेरे सामने कितना विस्तृत क्षेत्र खुला है, यदि मैं आपके सब व्यर्थ और बेतुके तर्कों का भण्डाफोड़ करने और उनकी निन्दा करने पर उतारू होता! परन्तु मैं केवल एक ही बात पर ठहरकर सन्तोष करूँगा, और उतना ही पर्याप्त हो। सारी मानव जाति के प्रति परमेश्वर के प्रेम के असंख्य प्रमाण विद्यमान हैं, जो सब उन लोगों की कृतघ्नता को प्रकट करते हैं जो नाश होते हैं या "विनाश को" पहुँचते हैं। फिर भी यह किसी रीति से इस बात का कारण नहीं बनता कि परमेश्वर अपना विशेष या निजी प्रेम थोड़े-से लोगों तक ही सीमित न रखे, जिन्हें उसने अपनी अनन्त कृपालुता में शेष लोगों में से चुन लेना चाहा है!
जब परमेश्वर ने अब्राहम के घराने को अपना बना लेना चाहा, तब उसने इसके द्वारा अत्यन्त स्पष्ट रूप से साक्षी दी कि वह सारी मानव जाति को एक समान प्रेम से नहीं अपनाता। फिर जब परमेश्वर ने बड़े भाई एसाव को ठुकराया और छोटे भाई याकूब को चुना, तब उसने अपने स्वतंत्र प्रेम का, उस प्रेम का जिससे वह केवल उन्हीं से प्रेम करता है जिनसे वह चाहता है, प्रत्यक्ष और विशिष्ट प्रमाण दिया। मूसा ऊँचे स्वर में घोषणा करता है कि एक विशेष जाति परमेश्वर को प्रिय थी, जबकि अन्य सब जातियाँ उसके विशेष प्रेम के सम्बन्ध में छोड़ दी गईं और उनकी उपेक्षा की गई। भविष्यद्वक्ता सर्वत्र साक्षी देते हैं कि यहूदी उत्कृष्टता और महत्त्व में अन्य सब जातियों से बढ़कर थे, इसके सिवाय किसी और कारण से नहीं कि परमेश्वर ने उनसे सेंत-मेंत प्रेम किया।
फिर, मसीह सारी मानव जाति को, और न सारी यहूदी जाति को, वरन् परमेश्वर के चुने हुए छोटे झुण्ड को ही सम्बोधित करता है, जब वह कहता है, और व्यर्थ नहीं कहता, "हे छोटे झुण्ड, मत डर; क्योंकि तुम्हारे पिता को यह भाया है कि तुम्हें राज्य दे" (लूका 12:32)। इसके द्वारा मसीह यह जताता है कि अनन्त जीवन की आशा के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव केवल उन्हीं को होता है जिन्हें उसने अपने एकलौते पुत्र के द्वारा अपने लिए ग्रहणयोग्य और प्रिय ठहराया है! परन्तु यदि आप परमेश्वर को प्रकृति के नियमों के अधीन ही करने पर अड़े हैं, तो आपको अनिवार्यतः उस पर अन्याय का आरोप लगाना और उसे दोषी ठहराना पड़ेगा, क्योंकि एक मनुष्य के दोष के कारण हम सब अनन्त मृत्यु के अपराध और दण्ड में फँसे हैं। एक मनुष्य ने पाप किया, और हम सब दण्ड की ओर घसीटे गए। और केवल इतना ही नहीं, वरन् एक की अशुद्धता से हम सब संक्रमण में खिंच गए, और भ्रष्ट तथा प्राणघातक रोग से ग्रस्त उत्पन्न होते हैं। इस उदात्त शिक्षक और न्यायी से आप क्या कहेंगे? क्या आप धन्य परमेश्वर पर क्रूरता का आरोप लगाएँगे, क्योंकि उसने एक मनुष्य के पतन के द्वारा अपनी सारी सन्तान को इस प्रकार विनाश में गिरा दिया? क्योंकि यद्यपि आदम ने अपने आप को और अपनी सारी सन्तान को नाश किया, तथापि उस एक मनुष्य के पतन की भ्रष्टता और दोष को अनिवार्यतः परमेश्वर की गुप्त योजना और आज्ञा के सिर ही मढ़ना होगा! क्योंकि एक मनुष्य का दोष हमसे कोई सम्बन्ध नहीं रख सकता था, यदि हमारे स्वर्गीय न्यायी को उसके कारण हमें अनन्त विनाश के हवाले करना न भाया होता!
अब ज़रा क्षण भर विचार कीजिए कि आप यशायाह भविष्यद्वक्ता के उन अंशों को अपनी भूल के आवरण के रूप में कितनी चतुराई से काम में लाते हैं (यशायाह 54:1; 49:19-21, आदि)। चूँकि यह सब विश्वास से बाहर प्रतीत होता था कि परमेश्वर की कलीसिया, अपनी बाबुली बन्धुआई में, न केवल अपनी सन्तानों से रहित होकर, वरन् और सन्तान उत्पन्न करने की अपनी सामर्थ्य में भी बाँझ होकर, अपनी शक्ति के पुनः लौटने से पहले से भी अधिक फलवन्त हो जाएगी, इसलिए परमेश्वर इन अंशों में मानो उससे यों कहता है: "क्या मैं, जिसकी सामर्थ्य से स्त्रियाँ गर्भवती होती और जनती हैं, तेरे लिए भी सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं?" क्योंकि परमेश्वर अपनी कलीसिया से इस प्रकार बोलता है, इसलिए आप इस बहाने उसे किसी भी जाति के पशु की भावनाएँ धारण करने को विवश करना चाहते हैं। और आप साहसपूर्वक तर्क करते हैं कि, क्योंकि परमेश्वर सब प्राणियों से उनकी अपनी सन्तान से प्रेम करवाता है, इसलिए वह भी अपनी सारी सन्तान से, अर्थात् समस्त मानव जाति से प्रेम करता है। और मान लीजिए, क्षण भर के लिए मैं आपको यह दे दूँ; तो भी इससे तुरन्त यह नहीं निकलेगा कि परमेश्वर अपनों से उसी रीति से प्रेम रखता है जैसे पशु अपनों से रखते हैं। और फिर, यदि परमेश्वर अपनों से प्रेम रखता है, तो इससे यह निष्कर्ष कम नहीं होता कि उसे अधिकार है कि वह एक धर्मी न्यायी के रूप में उन्हें ठुकरा दे, जिन पर उसने उनके सारे जीवन-भर अत्यन्त दयालु पिता के रूप में अपना प्रेम और कृपा व्यर्थ ही दिखाई।
परन्तु आप आगे उत्तर देने को तैयार हैं कि "सृजना प्रेम का कार्य है, घृणा का नहीं; और इसलिए परमेश्वर ने प्रेम से सृजा, घृणा से नहीं।" परन्तु आप यह नहीं देखते कि यद्यपि पतित आदम में सब मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में घृणित हैं, तथापि उनकी मूल सृष्टि में परमेश्वर का प्रेम अपने सारे तेज के साथ चमकता है। इसलिए वह तर्क, जिसे आप बहुत ही विश्वसनीय समझते हैं, कोई भी अन्य व्यक्ति जो अत्यन्त साधारण विवेक और सामान्य न्यायबुद्धि से सम्पन्न हो, तुरन्त ही तुच्छ और व्यर्थ मान लेता है। जो आप आगे जोड़ते हैं, उसका खण्डन करना मैं अपना कर्तव्य उतना नहीं समझता जितना उसे तलवार के एक ही वार से काट डालना। यह तो प्रत्यक्ष है कि मनुष्य दुर्दशा के लिए उत्पन्न होते हैं। परन्तु क्या इसका कारण मेरे लेखों के सिर मढ़ा जाए? हम सबकी यह दुखद दशा कहाँ से आती है कि हम न केवल सांसारिक दुःखों के, वरन् अनन्त मृत्यु के भी अधीन हैं? क्या यह इस गम्भीर तथ्य से नहीं आती कि एक मनुष्य के पतन और दोष के द्वारा परमेश्वर को यह भाया कि हम सबको साझे अपराध के नीचे डाल दे? इसलिए सारी मानव जाति के इस दुखद विनाश में केवल मेरा ही मत स्पष्ट नहीं दिखता, वरन् स्वयं परमेश्वर का कार्य इतने खुले और निर्विवाद रूप से प्रकट है।
इस बीच, आप अपना यह अपवित्र और घृणित मत उगलने में हिचकिचाते नहीं कि परमेश्वर किसी भी भेड़िये से बुरा है, जो इस प्रकार मनुष्यों को दुर्दशा के लिए सृजना चाहता है। स्मरण रहे कि कुछ मनुष्य अन्धे उत्पन्न होते हैं, कुछ बहरे, कुछ गूँगे, कुछ भयंकर विकृति के साथ। अब यदि इन पवित्र और गहन विषयों में आपके मत को न्यायी मानकर चलें, तो परमेश्वर क्रूर भी ठहरता है, क्योंकि वह अपनी सन्तान को ऐसे दुःखों से पीड़ित करता है, और वह भी उनके प्रकाश देखने से पहले। परन्तु निश्चित जान कि वह दिन आएगा जब तू मन से चाहेगा कि तू अन्धा ही होता, बजाय इसके कि अनादि परमेश्वर के इन रहस्यों में इस प्रकार छेद करने में तू कभी इतना आश्चर्यजनक रूप से तीक्ष्ण-दृष्टि होता!
आप परमेश्वर पर अन्याय का आरोप लगाते हैं; वरन् आप उसे एक राक्षस से बढ़कर कुछ नहीं ठहराते, यदि वह मनुष्यों के विषय में कुछ भी वैसा ठहराने का साहस करे जैसा हम अपनी सन्तान के विषय में स्वयं नहीं ठहराते। यदि ऐसा है, तो हम इसका क्या कारण बताएँ कि परमेश्वर ने कुछ को मन्दबुद्धि, कुछ को और भी अधिक असमर्थ, और कुछ को सर्वथा मूर्ख सृजा? क्या आप सचमुच समझते हैं कि ऐसे अपूर्ण मनुष्यों के विषय में परमेश्वर की सृष्टि का कार्य वास्तव में फौनों और सैटरों के विषय में कुछ यहूदियों की कथाओं के अनुसार था? क्योंकि वे कहते हैं कि सब्त के आ जाने से परमेश्वर इन दूसरे राक्षसों का रूप पूरा करने से रोक दिया गया, और इसलिए वे अधबने ही उसके हाथों से गिर पड़े। नहीं! हमें तो इन त्रुटिपूर्ण मनुष्यों जैसे दुखद दृश्यों से गहरी और दीन करनेवाली शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, न कि अपने मस्तिष्क की कल्पनाओं के आधार पर आकाश और पृथ्वी के कर्ता से उसके कार्यों के विषय में, या हमारी राय में वे कैसे होने चाहिए थे, इस पर झगड़ा आरम्भ करना चाहिए। जब कोई मूर्ख मुझे मिल जाता है, तब मुझे चेतावनी मिलती है कि विचार करूँ कि यदि परमेश्वर को यही भाता तो वह मुझे क्या बना सकता था। संसार में जितने मन्दबुद्धि और मूर्ख हैं, उतने ही दृश्य परमेश्वर मेरे सामने रखता है जिनमें मैं उसकी सामर्थ्य को देखूँ; जो भय का विषय उतना ही है जितना आश्चर्य का।
परन्तु जहाँ तक आपका प्रश्न है, आप समस्त अधर्म और अपवित्रता के साथ स्वयं परमेश्वर से यह कहकर झगड़ते हैं कि वह "भेड़िये से भी कम दयालु" है, क्योंकि (आपके मत में) उसने अपनी सन्तान की भलाई और सुख का इतना कम विचार किया! अब मसीह के इस वचन को कि "परमेश्वर, क्योंकि वह भला है, अपने बच्चों के साथ मनुष्यों से, जो बुरे हैं, अधिक भलाई करता है" (मत्ती 7:11) आपके मतों और तर्कों के पक्ष में बुलाया जा सके, इससे पहले आपको यह सिद्ध करना होगा कि सब मनुष्य समान रूप से परमेश्वर की सन्तान हैं। परन्तु यह प्रत्यक्ष है कि सब मनुष्यों ने आदम में अनन्त जीवन खो दिया, और इसलिए परमेश्वर का गोद लेना विशेष अनुग्रह का कार्य है; जिससे यह निकलेगा कि वे सब जो इस प्रकार उससे अलग और पराए हो गए हैं, परमेश्वर की ओर से और भी अधिक घृणा के पात्र हैं। पवित्रशास्त्र की वे सब साक्षियाँ जो आप उद्धृत करते हैं, मात्र बर्छे हैं जिन्हें किसी उन्मत्त के हाथ ने अन्धाधुन्ध फेंका है, जैसे वहाँ जहाँ आप यह वचन उद्धृत करते हैं, "और परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, और देखो, वह बहुत ही अच्छा था" (उत्पत्ति 1:31)। क्योंकि इस पद से आप निष्कर्ष निकालते हैं कि मनुष्य भी "बहुत ही अच्छा" था। और इससे आप आगे अनुमान लगाते हैं कि परमेश्वर ने "अच्छे" को विनाश के लिए सृजकर अन्याय किया।
परन्तु मनुष्य स्वभाव से किस अर्थ में खरा सृजा गया, यह मैं अपने लेखों के अनेक स्थलों में समझा चुका हूँ। मनुष्य निश्चय ही शैतान से अच्छा नहीं था, उस समय जब तक उसने अपनी स्वर्गदूतीय खराई नहीं खोई थी। और अब, मान लीजिए मैं क्षण भर के लिए आपको यह दे दूँ कि मनुष्य और विद्रोही स्वर्गदूत दोनों उद्धार के लिए सृजे गए थे, फिर भी परमेश्वर ने उनके भावी पतन को देखते हुए दोनों को अनन्त विनाश का दण्ड दिया, तो इस स्वीकृति से आपको अपने तर्कों का समर्थन करने में क्या सहायता मिलेगी? परमेश्वर निश्चय ही जानता था कि मनुष्यों और विद्रोही स्वर्गदूतों दोनों में क्या होगा, और उसने उसी समय यह भी ठहराया कि वह स्वयं क्या करेगा।
अनुमति के सिद्धान्त के विषय में हम उसके उचित स्थान पर आगे बात करेंगे। परन्तु अभी, यदि आप यह उत्तर देना चाहें कि परमेश्वर का पूर्वज्ञान बुराइयों का कारण नहीं है, तो मैं आपसे केवल यही एक प्रश्न पूछूँगा: यदि परमेश्वर ने मनुष्य और शैतान दोनों को सृजने से पहले उनका विनाश पहले से देख लिया था, और साथ ही उनका विनाश नहीं ठहराया था, तो उसने समय रहते कोई पर्याप्त उपाय क्यों नहीं किया, जो उनके पतन और उसकी सम्भावना को रोक देता? शैतान ने जगत के आरम्भ से ही अपने आप को उद्धार की आशा से अलग कर लिया। और मनुष्य ने, सृजे जाते ही, अपने आप को और अपनी सन्तान को प्राणघातक विनाश से नाश कर दिया। यदि इसलिए दोनों की रक्षा परमेश्वर के हाथ में थी, तो यह कैसे हुआ कि (यदि उसने उनका विनाश नहीं ठहराया था) उसने उनके नाश की अनुमति दी? वरन् उसने प्रत्येक को स्थिर रहने की थोड़ी-सी भी सामर्थ्य क्यों न दी? इसलिए आप चाहे कितने ही घुमावदार तर्कों का सहारा लें, मैं आपको इस सिद्धान्त पर पकड़े रख सकूँगा कि यद्यपि मनुष्य निर्बल और गिरने के योग्य सृजा गया, तथापि इस निर्बलता में एक बड़ी आशीष थी, क्योंकि मनुष्य के पतन ने उसे तुरन्त पश्चात् सिखा दिया कि परमेश्वर से बाहर कुछ भी न सुरक्षित है, न निरापद, न टिकाऊ। अतः इससे प्रकट होता है कि मनुष्यों के उद्धार के लिए सृजे जाने के विषय में आप जो कुछ बकते हैं, वह एक अंग-भंग और लंगड़ा तर्क है, जो पर्याप्त विचार के बिना प्रस्तुत किया गया है। क्योंकि सच्चाई यह है कि जब मैं यह मानता हूँ कि सृजे जाते समय मनुष्य में उद्धार के विपरीत कुछ भी न था, तब मैं उसी के द्वारा और उसी में यह सिद्ध कर रहा हूँ कि उद्धार सब मनुष्यों के लिए पूर्वनियत था।
अब मैं इसी तर्क को बहुत संक्षेप में अन्य शब्दों में दोहराता हूँ। मेरा आशय यह है कि यदि हम उस प्रकृति की पूर्णता के आधार पर तर्क करें जिससे आदम अपनी प्रथम सृष्टि में सम्पन्न था, तो हम कह सकते हैं कि वह उद्धार के लिए सृजा गया, क्योंकि अपनी प्रथम सृजी हुई अवस्था की उस पूर्णता में मृत्यु का कोई कारण नहीं पाया गया। परन्तु यदि हम प्रश्न को परमेश्वर की गुप्त पूर्वनियति तक ले जाएँ, तो हम उस गहरे अथाह कुण्ड से टकराते हैं जो हमें तुरन्त विस्मय और श्रद्धा में पहुँचा देना चाहिए। बात यह है कि यदि आप में भक्तिमय श्रद्धा की थोड़ी-सी भी अनुभूति होती, तो आप तुरन्त मान लेते कि यह प्रश्न मनुष्य की आदि पूर्णता की सम्पूर्णता के विषय में नहीं है, वरन् परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की आज्ञा के विषय में है। इस पवित्र विषय की स्थिति ऐसी है मानो पवित्र आत्मा ने आपसे कहा हो, "सृजे जाने के समय किसी भी प्राणी में उत्कृष्टता की कोई कमी न थी; वरन् तुमसे और तुम जैसे सब लोगों से परमेश्वर से झगड़ने का सारा अवसर छीन लिया गया।" क्योंकि आप और आपके साथी चाहे कितने ही ऊँचे स्वर से इनकार करें कि मनुष्य के इस प्रकार सृजे और स्थापित किए जाने में कोई "भलाई" थी, कि वह अपने तुरन्त पतन से अपना और सारे जगत का नाश कर दे, तो भी स्वयं परमेश्वर घोषणा करता है कि ऐसी दशा उसे भाई! इसलिए वह अत्यन्त न्यायसंगत और धर्ममय था।
और ताकि आप मूसा को और ठीक से समझ सकें, (स्मरण रहे!) वह यह घोषणा नहीं करता कि मनुष्य कितना खरा और सिद्ध था, वरन् आप जैसे सब कुत्तों का भौंकना बन्द करने के लिए वह यह सिखाता है कि सृष्टि का सारा क्रम परमेश्वर द्वारा ऐसा संतुलित किया गया था कि इससे अधिक न्यायसंगत या सिद्ध कुछ कल्पना नहीं किया जा सकता। इसलिए जब मूसा परमेश्वर के सब विभिन्न कार्यों के विषय में एक साथ बोलने लगता है, तब वह कहता है कि "परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, और देखो, वह बहुत ही अच्छा था" (उत्पत्ति 1:31)। परन्तु मूसा मनुष्य के विषय में, व्यक्तिगत, विशेष और निरपेक्ष रूप से, हर अर्थ में, ऐसा कुछ नहीं कहता। मनुष्य की सृष्टि का भी वर्णन कर चुकने पर, पवित्र इतिहासकार उन शब्दों में समाप्त करता है जो सारी सृष्टि पर सामान्य रूप से लागू होते हैं, कि सब वस्तुएँ जो परमेश्वर ने बनाई थीं "बहुत ही अच्छी" थीं; इन शब्दों में निःसन्देह उनके अनुरूप सुलैमान के वे शब्द भी समझे जाने चाहिए, जहाँ वह कहता है कि दुष्ट "विपत्ति के दिन के लिए" सृजे गए। "यहोवा ने सब वस्तुएँ विशेष उद्देश्य के लिए बनाई हैं, वरन् दुष्ट को भी विपत्ति के दिन के लिए" (नीतिवचन 16:4)।
तो अब सारे विषय का सार यह समझिए: यद्यपि मनुष्य अपनी प्रथम सृष्टि में अपनी नवसृजित प्रकृति में "अच्छा" था, तथापि यह खराई, जो निर्बल, नाज़ुक और गिरने के योग्य थी, परमेश्वर की पूर्वनियति के विरुद्ध नहीं जाती, और न उसके विपरीत ठहरती है; उसी पूर्वनियति के द्वारा मनुष्य अपने पाप और दोष से नाश हुआ, यद्यपि उसकी प्रकृति सृष्टि के समय शुद्ध थी। वरन्, उसकी आदि स्वाभाविक उत्कृष्टता को देखते और उससे तर्क करते हुए, इसी दृष्टि और अर्थ में मनुष्य उद्धार के लिए सृजा गया। फिर भी इसी तर्क-पद्धति से आप व्यर्थ, बेतुके और उलटे ढंग से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मनुष्य "अच्छा" इसलिए सृजा गया कि वह नाश हो, यद्यपि "अच्छा" या अच्छे मनुष्य के रूप में। जबकि यह खुलेआम और निर्विवाद रूप से प्रकट है कि वह अपनी निर्बलता और पाप से नाश हुआ; और इसलिए वह धर्मी दण्ड और विनाश के योग्य ठहरकर नाश हुआ। और ये दोनों प्रस्थापनाएँ और स्थितियाँ एक-दूसरे से कैसे मेल खाती और संगत बैठती हैं, यह हम आगे दिखाएँगे, जैसा कि हम पहले भी बार-बार दिखा चुके हैं।
यहाँ आप वह सामान्य आपत्ति डालते हैं कि "परमेश्वर को पापी के मरने से प्रसन्नता नहीं", जैसा यहेजकेल भविष्यद्वक्ता ने घोषित किया है (यहेजकेल 33:11)। परन्तु मैं आपसे विनती करता हूँ कि भविष्यद्वक्ता में जो इसके तुरन्त बाद आता है उसे सुनिए, "क्योंकि परमेश्वर सब मनुष्यों को मन फिराने के लिए बुलाता है" (यहेजकेल 18:30-32)। इसलिए ऐसे सब लोगों के लिए जो जीवन के मार्ग में लौट आते हैं, क्षमा सेंत-मेंत प्रस्तुत है। परन्तु इसमें अगली और मुख्य बात जिस पर विचार करना है, वह यह है कि वह मन-परिवर्तन या "लौटना" जिसे परमेश्वर माँगता है (पद 30), मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा के वश में है, अथवा परमेश्वर का एक विशेष और प्रभुता-सम्पन्न दान है! इसलिए, चूँकि सब मनुष्य परमेश्वर द्वारा मन फिराव के लिए बुलाए और उसके लिए समझाए जाते हैं, भविष्यद्वक्ता इसी आधार पर उचित रूप से घोषणा करता है कि परमेश्वर को "पापी के मरने से प्रसन्नता नहीं।" परन्तु परमेश्वर सब मनुष्यों को एक-सा अपनी ओर क्यों नहीं फेरता या मन नहीं फिराता, यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर उसी में छिपा है। और प्रेरित पौलुस के उस वचन के विषय में, जिसे आप अपनी रीति से उद्धृत करते हैं, "कि परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो और वे सत्य की पहचान तक पहुँचें" (1 तीमुथियुस 2:4), कि वह आपकी भूल को सँभालने के लिए कितना निरर्थक टेक है, यह मैं समझता हूँ कि मैं पहले ही यथेष्ट स्पष्टता से और बार-बार दिखा चुका हूँ। क्योंकि यह (यों कहें) निश्चितता से भी अधिक निश्चित है कि प्रेरित उस अंश में व्यक्तियों के विषय में बिलकुल नहीं, वरन् अपने नागरिक और जातीय व्यवसायों में विभिन्न श्रेणी के मनुष्यों के विषय में बोल रहा है। उसने अभी पहले आज्ञा दी थी कि कलीसिया की सार्वजनिक प्रार्थनाएँ राजाओं और अन्य अधिकारियों के लिए, और उन सब के लिए जो न्यायिक पदों पर थे, वे किसी भी प्रकार और स्तर के हों, चढ़ाई जाएँ। परन्तु चूँकि उस समय जो लगभग सब सार्वजनिक न्याय की तलवार से सज्जित थे, वे कलीसिया के खुले और प्रकट शत्रु थे, और इसलिए कलीसिया को यह विचित्र या बेतुका लग सकता था कि उनके लिए सार्वजनिक प्रार्थनाएँ चढ़ाई जाएँ, प्रेरित सब ऐसी स्वाभाविक आपत्तियों का समाधान कलीसिया को यह सुझाकर करता है कि वह उनके लिए भी प्रार्थना करे, और परमेश्वर से विनती करे कि वह अपना अनुग्रह और कृपा उन पर भी बढ़ाए, कलीसिया की शान्ति, चैन और सुरक्षा के लिए।
पतरस के कुछ शब्दों में सम्भवतः अधिक प्रबल रंग है, जो आपके प्रयोजन के अधिक अनुकूल हो सकता था, जहाँ वह कहता है कि परमेश्वर "यह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, वरन् यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले" (2 पतरस 3:9)। और यदि इस अंश के प्रथम भाग में कुछ ऐसा है जो पहली दृष्टि में समझना कठिन लगे, तो आगे आनेवाली व्याख्या से वह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है। क्योंकि जहाँ तक परमेश्वर "चाहता है कि सब मन फिराव तक पहुँचें", वहाँ तक वह चाहता है कि कोई नाश न हो; परन्तु इसके लिए कि वे इस प्रकार परमेश्वर से ग्रहण किए जाएँ, उन्हें "आना" होगा। परन्तु पवित्रशास्त्र सर्वत्र यह कहता है कि उनके "आने" के लिए आवश्यक है कि परमेश्वर उनसे पहले पहुँचे; अर्थात् परमेश्वर को पहले उनके पास आकर उन्हें खींचना होगा; क्योंकि जब तक वे परमेश्वर से खींचे नहीं जाते, वे वहीं पड़े रहेंगे जहाँ हैं, शरीर की हठ के हवाले। अब यदि आप में सही विवेक का एक भी कण होता, तो आप तुरन्त मान लेते कि इन दो बातों में बहुत बड़ा और अद्भुत अन्तर है, कि मनुष्यों के हृदय परमेश्वर द्वारा "पत्थर" से "माँस" के हृदय बनाए जाते हैं, और इस प्रकार वे अपने आप से अप्रसन्न और असन्तुष्ट किए जाते हैं, और विनती करनेवालों के रूप में परमेश्वर से दया और क्षमा माँगने के लिए लाए जाते हैं; और यह कि इस प्रकार बदल जाने के बाद वे सब अनुग्रह में ग्रहण कर लिए जाते हैं।
अब परमेश्वर घोषणा करता है कि ये दोनों बातें उसकी निरी भलाई और दया से हैं; कि वह हमें ऐसा हृदय देता है कि हम मन फिराएँ, और फिर हमारे मन फिराने और विनती करने पर हमें अनुग्रहपूर्वक क्षमा करता है। क्योंकि यदि परमेश्वर हमें ग्रहण करने को तैयार न होता, जब हम सचमुच उसकी दया की याचना करते हैं, तो वह न कहता, "मेरी ओर फिरो, तो मैं तुम्हारी ओर फिरूँगा" (जकर्याह 1:3)। परन्तु यदि मन फिराव मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा के वश में होता, तो पौलुस न कहता, "क्या जाने परमेश्वर उन्हें मन फिराव का मन दे कि वे सत्य को पहचानें" (2 तीमुथियुस 2:26)। वरन्, यदि स्वयं परमेश्वर, जो अपनी वाणी से सब मनुष्यों को मन फिराव की चेतावनी देता है, यदि स्वयं परमेश्वर, मैं दोहराता हूँ, जो इस प्रकार चेतावनी देता है, अपने चुने हुओं को अपने आत्मा के गुप्त कार्य से न खींचता, तो यिर्मयाह लौटनेवालों का वर्णन इस प्रकार न करता: "मुझे फेर तो मैं फिर जाऊँगा, क्योंकि तू मेरा परमेश्वर यहोवा है। निश्चय फिरने के बाद मैंने पश्चाताप किया" (यिर्मयाह 31:19)। इस विषय का यह समाधान (मैं दोहराता हूँ) यदि तुझ जैसे ढीठ कुत्ते में तनिक भी लज्जा या संकोच होता, तो तुझे मेरे लेखों में सौ भिन्न स्थानों पर विद्यमान जान पड़ना चाहिए था। और यद्यपि तू इस समाधान को ठुकराना अपने ऊपर ले ले, तथापि यह प्रेरित पौलुस और यहेजकेल भविष्यद्वक्ता दोनों के द्वारा समर्थित और पुष्ट है।
परन्तु परमेश्वर किस रीति से और किस अर्थ में सब मनुष्यों का उद्धार चाहता है, यह ऐसा विषय है जिस पर यहाँ जिज्ञासापूर्वक चर्चा नहीं करनी है। एक बात निश्चित है, कि ये दो बातें, उद्धार और सत्य की पहचान, सदा अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं। अब तब मुझे उत्तर दे, यदि परमेश्वर चाहता कि उसका सत्य सब मनुष्यों को ज्ञात हो, तो सुसमाचार के प्रथम प्रचार से अब तक ऐसी इतनी जातियाँ क्यों हैं जिनके पास उसने अपना शुद्ध सत्य कभी भेजा ही नहीं, और इसलिए वह उन तक कभी पहुँचा ही नहीं? और फिर, यदि सब मनुष्यों के विषय में परमेश्वर की ऐसी ही इच्छा होती, तो उसने सबकी आँखें कभी क्यों नहीं खोलीं? क्योंकि आत्मा का वह आन्तरिक प्रकाश, जिससे परमेश्वर ने इतने थोड़ों को ही आशीषित करना चाहा है, विश्वास के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। और तेरे खोलने के लिए एक और गाँठ भी है। चूँकि आत्मा के गुप्त प्रभाव से खिंचा हुआ मनुष्य ही परमेश्वर के निकट आ सकता है, तो यदि वह सचमुच "चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो" (इस वाक्यांश के सामान्य अर्थ में), तो परमेश्वर सब मनुष्यों को बिना भेद के अपनी ओर क्यों नहीं खींचता?
इसलिए परमेश्वर जो यह भेद करता है, उससे यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास एक गुप्त कारण है कि वह इतनों को उद्धार से बाहर रखता है। इसलिए परमेश्वर की दया हज़ारवीं पीढ़ी तक कैसे दिखाई जाती है, इसे तू कभी नहीं मानेगा (जब तक वह अहंकार जिससे तू फूला हुआ है तेरी बुद्धि को अन्धा और मन्द करता रहेगा)। क्योंकि ऐसी दया की प्रतिज्ञा नहीं की गई जो उस श्राप को सर्वथा मिटा दे जिसके नीचे आदम की सारी जाति पड़ी है; परन्तु ऐसी दया की प्रतिज्ञा की गई है जो (जहाँ स्वभाव से विद्यमान सब बाधाएँ दूर कर दी जाएँ) अत्यन्त अयोग्यों पर फूट निकलेगी और सदा बनी रहेगी।
इसी रीति से परमेश्वर ने अब्राहम की बहुत-सी सन्तानों को छोड़ दिया जब उसने उनमें से एक, इसहाक, को चुना। इसी प्रकार, जब इसहाक के जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए, तब उसी परमेश्वर ने चाहा कि उसकी दया उनमें से केवल एक पर, अर्थात् याकूब पर ठहरे। और फिर, यद्यपि परमेश्वर बहुतों में अपने क्रोध के प्रमाण प्रकट करता है, तथापि यह अनन्त काल तक सत्य बना रहता है कि वह "अति भला" और "क्रोध करने में धीमा" है; और इसलिए उसी धीरज में जिससे वह ठुकराए हुओं को सहता है, उसकी महान भलाई की कोई धुँधली दीप्ति नहीं चमकती। इसलिए बस यह देख कि तेरी तुच्छ और छिद्रान्वेषी आपत्तियाँ, जिनसे मैं क्षण भर में अपने आप को छुड़ा सकता हूँ, किस कारगर रीति से तुझे ही उलझाती, फँसाती और कैद करती हैं!
परमेश्वर की दया को उसके क्रोध से बड़ा बनाने के लिए आप चाहेंगे कि विनाश के लिए नहीं, उद्धार के लिए अधिक लोग चुने जाएँ। और मान लीजिए मैं क्षण भर के लिए यह आपको दे दूँ, तो इससे परमेश्वर को कौन-सी बड़ी महिमा मिल जाएगी? कोई नहीं। परमेश्वर फिर भी उन थोड़ों के प्रति जो खो जाते हैं उतना ही अन्यायी रहेगा (यदि आपकी निन्दाएँ मान ली जाएँ और उन पर विश्वास किया जाए)। जब तक परमेश्वर अपनी सब सृजी हुई सन्तान से एक-सा प्रेम न करे, आप फिर भी अपवित्र और भयानक रीति से उसे भेड़िये से भी कम दयालु और कृपालु घोषित करेंगे! वरन् यदि केवल एक ही हो जिस पर परमेश्वर धर्म से अपना क्रोध प्रकट करे, तो आपके अन्धे और अपवित्र निर्णय में वह क्रूरता के आरोप से कैसे बच या छूट सकेगा! और आगे, आप परमेश्वर में क्रूरता के इन अधर्मी और अपवित्र आरोपों के अपवाद के रूप में यह भी नहीं मानेंगे कि स्वयं मनुष्यों में उसके ईश्वरीय क्रोध को भड़कानेवाले घोर अपराध हैं! परन्तु केवल क्रोध की दया से तुलना करते हुए, आप केवल इसी पर बहस करते हैं कि इनमें से कौन बड़ा है। मानो परमेश्वर विनाश की अपेक्षा अधिक लोगों को उद्धार के लिए चुनकर, केवल उसी से अपने आप को दयालु परमेश्वर प्रमाणित करेगा! परन्तु परमेश्वर अपने अनुग्रह की महानता हम पर इससे बिलकुल भिन्न रीति से प्रकट करता है। वह अपने चुने हुओं में इतने और ऐसे विविध पापों को न केवल क्षमा करता है, वरन् ठुकराए हुओं की हठीली द्वेष-भावना से भी तब तक संघर्ष करता और उसे सहता है, जब तक वह अपने अधर्म का पैमाना भर न ले (मत्ती 23:32)।
