भाग VI

पवित्रशास्त्र खुलकर गवाही देता है कि बुरे कर्म ठहराए जाते हैं, केवल इच्छा से ही नहीं

Calvin's Calvinism · John Calvin

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पवित्रशास्त्र खुलकर गवाही देता है कि बुरे कर्म ठहराए जाते हैं, केवल इच्छा से ही नहीं

भाग V: परमेश्वर की इच्छा के हस्तक्षेप के बिना कोई व्यभिचार, चोरी या हत्या नहीं की जाती

अनुच्छेद V.

(अर्थात् अपवाद V.)

कोई व्यभिचार, चोरी या हत्या नहीं की जाती

बिना

("संस्थान," अध्याय 14. 44.)

अनुच्छेद VI.

(अर्थात् अपवाद VI.)

पवित्रशास्त्र खुलकर गवाही देता है कि बुरे कर्म ठहराए जाते हैं, केवल परमेश्वर की इच्छा से ही नहीं, वरन् उसके अधिकार से,

परमेश्वर के।

अपवादी के

कथन और टिप्पणियाँ।

इस पाँचवें और छठे अनुच्छेद के विरुद्ध तेरे विरोधी ये और बहुत-से अन्य तर्क देते हैं। यदि (वे कहते हैं) परमेश्वर पाप की इच्छा करता है, तो परमेश्वर पाप का रचयिता है। और फिर, यदि परमेश्वर पाप की इच्छा करता है (वे तर्क करते हैं), तो पाप की इच्छा शैतान नहीं करता, क्योंकि शैतान तो परमेश्वर का मात्र सेवक है। और वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर पाप की इच्छा करता है, तो वह बहुत-से मनुष्यों से निम्न ठहरेगा, क्योंकि बहुत-से मनुष्य पाप करना नहीं चाहते। वरन् जो मनुष्य जितना प्रकृति की व्यवस्था के निकट पहुँचता है, उतना ही कम पाप करेगा। नहीं तो पौलुस यह क्यों कहता है, "जिस भले काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह नहीं करता; परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही करता हूँ।" यदि पौलुस स्वभाव से पाप की इच्छा करता है (जैसा कैल्विन कहता है), तो पौलुस वह क्यों नहीं चाहता जो परमेश्वर चाहता है? और पौलुस उस भलाई की इच्छा कैसे करता है जिसकी इच्छा परमेश्वर (कैल्विन के अनुसार) नहीं करता? अन्त में, तेरे विरोधी तुझसे पूछते हैं कि पवित्रशास्त्र कौन-सी गवाही देता है कि बुरे कर्म परमेश्वर के द्वारा न केवल उसकी इच्छा से, वरन् उसके अधिकार से ठहराए जाते हैं?

अनुच्छेद V. और VI. का जॉन कैल्विन द्वारा उत्तर,

और उन पर अपवादी के कथनों और

टिप्पणियों का भी।

इस पाँचवें अनुच्छेद के विषय में, यह परमेश्वर के विधान के विशेष हस्तक्षेप के बिना नहीं हुआ कि तूने मेरे "संस्थान" के उस स्थल का हवाला देने का ढोंग किया जिससे तू झूठमूठ कहता है कि यह लिया गया है। इस उदाहरण में पाठक देखेंगे कि मैं इन अनुच्छेदों (अर्थात् अपवादों) में वे बातें, जो मेरे विरोधी मेरी शिक्षाओं के विरुद्ध लाते हैं, ठीक वैसे ही और उतनी ही सच्चाई से बताता हूँ, मानो वे स्वयं बता रहे हों।

अब, इस कटे-छँटे स्थल को पकड़कर, क्या तू इस योग्य नहीं कि जो कोई तेरे पास से गुज़रे वह तेरे मुँह पर थूके? और यद्यपि छठे अनुच्छेद के विषय में तू कोई हवाला देने का प्रयत्न भी नहीं करता, तथापि तेरी असली ढिठाई इससे भी लम्बी छलाँग लगाती है। अब मुझे बता, क्या मैंने, जो अपने सब लेखों में इतनी श्रद्धा और गम्भीरता से यह घोषणा करता हूँ कि जब कभी और जहाँ कहीं पाप की चर्चा हो, परमेश्वर का नाम पूरी गम्भीरता के साथ उससे बहुत दूर रखा जाए, कभी, या कहीं भी, यह कहा कि बुरे कर्म परमेश्वर की युक्ति से ही नहीं, वरन् उसके अधिकार से किए जाते हैं? निश्चय ही ऐसी राक्षसी निन्दा की भर्त्सना में कुछ भी इतना प्रबल या इतना कठोर नहीं कहा जा सकता कि वह अधिक हो। इसकी घृणा में जो कुछ तू या कोई भी मनुष्य कह सके, वह सब मैं सुनने को तैयार हूँ। इसलिए मेरा नाम कभी इसकी भयानक अपवित्रता के साथ न जोड़ा जाए।

मूर्खों को धोखा देने में तू कितना सफल होता है, यह मैं नहीं जानता; परन्तु एक बात मैं निश्चय जानता हूँ: कि यदि कोई तेरी घृणित कल्पनाओं की मेरे सच्चे लेखों से तुलना करने का कष्ट उठाए, तो तेरी बेईमानी और दुष्टता तुझे तेरे सच्चे और घृणास्पद रंगों में चित्रित छोड़ देगी। तू अपवित्रता से यह तर्क करता है कि यदि परमेश्वर पाप से प्रेम करता है, तो वह धार्मिकता से घृणा करता होगा; और इसी प्रकार की अपवित्रता की बहुत-सी बातें तू कहता है। और तू उन्हें क्यों कहता है, इसके सिवाय कि अन्त में तू अपनी ही प्रतीतियों के कारण मेरी लिखी हुई शिक्षाओं पर हस्ताक्षर करने को विवश हो जाए? क्योंकि केवल कल या परसों से नहीं, वरन् इन कई वर्षों से मैं अय्यूब के विषय में यों लिखता और कहता आया हूँ: यदि उस कुलपति को लुटेरों द्वारा लूटे जाने में, कार्य को अलग से देखने पर, परमेश्वर का, और शैतान का, और लुटेरों का कार्य एक ही था, तो परमेश्वर उस सारे दोष से निर्दोष कैसे है (जैसा कि वह पवित्रता से है) जिसके दोषी शैतान और लुटेरे हैं? इसका उत्तर यह है: यदि मनुष्यों के कार्यों में, जब उन कार्यों के अभिप्रायों और उद्देश्यों पर उचित रीति से विचार किया जाए, पूरा भेद पाया जाता है, यहाँ तक कि उस मनुष्य की क्रूरता की निन्दा की जाती है जो कौवे की आँखें निर्दयता से फोड़ता है, या उसके अपवित्र कार्य की जो सारस को (वह पक्षी जो प्राचीन लोगों में इतनी धार्मिक श्रद्धा से देखा जाता था) मार डालता है, जबकि उस न्यायी के निर्णय की प्रशंसा की जाती है जो हत्यारे को प्राणदण्ड देकर अपने हाथ पवित्र करता है; तो परमेश्वर की स्थिति को मनुष्य की स्थिति से निम्न क्यों माना जाए? उसकी असीम धार्मिकता उसे निर्दोष क्यों न ठहराए, और उसे बुराई करनेवाले मनुष्यों के दोष में भागी होने से अलग क्यों न रखे? पाठक केवल इतना ध्यान दें कि मैं अब क्या जोड़ने पर हूँ। वरन् वे मेरे "संस्थान" के उस सारे भाग को ध्यान से पढ़ें जहाँ मैं परमेश्वर के विधान पर चर्चा करता हूँ, और वह तुरन्त देख लेगा कि तेरी सब धुंधली-बुद्धि की आपत्तियों की वहाँ चर्चा, पर्दाफाश, उत्तर और खण्डन हो चुका है।

पाठक, यदि चाहें, तो यह भी विचार करें कि मैंने प्रेरितों के काम के दूसरे अध्याय की अपनी टीका में क्या लिखा है। मैंने वहाँ दिखाया है कि मनुष्य, जब चोरी या हत्या करते हैं, तो परमेश्वर के विरुद्ध पाप करते हैं क्योंकि वे चोर और हत्यारे हैं, और क्योंकि उनकी चोरी और उनकी हत्या में दुष्ट अभिप्राय है। परन्तु परमेश्वर, जो उनकी दुष्टता का प्रभुता के साथ उपयोग करता है, सब मनुष्यों, और कर्मों, और वस्तुओं के ऊपर असीम रूप से भिन्न और सर्वोच्च स्थान पर खड़ा है। और परमेश्वर के उद्देश्य और लक्ष्य मनुष्यों के उद्देश्यों और लक्ष्यों से असीम रूप से भिन्न और उनसे ऊँचे हैं। मनुष्यों के दुष्ट कार्यों के द्वारा परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि कुछ को ताड़ना दे और दूसरों के धीरज की परीक्षा करे। इसलिए मनुष्यों के बुरे कर्मों के इन सब उपयोगों में परमेश्वर कभी अपने स्वभाव से, अर्थात् अपनी असीम सिद्ध खराई से, तनिक भी नहीं हटता। यदि तब किसी बुरे कर्म का मूल्यांकन इस प्रकार उसके लक्ष्य और उद्देश्य के अनुसार किया जाना है, तो यह पूरी तरह प्रकट है कि परमेश्वर पाप का रचयिता न है, न हो सकता है!

इस सारे बड़े विषय का सार यह है: चूँकि मनुष्यों में बुरी इच्छा प्रत्येक और सब पाप का कारण है, इसलिए परमेश्वर, मनुष्यों के हाथों से अपनी धर्ममय युक्तियों को पूरा करते हुए, मनुष्यों के साथ उसी पाप और दोष में सम्मिलित होने से इतना दूर है कि वह आश्चर्यजनक रीति से उन्हीं के द्वारा अन्धकार में से अपनी महिमा का प्रकाश चमकाता है। और वास्तव में, "परमेश्वर के विधान पर" मेरी उसी पुस्तक में, जिसने मेरे विरुद्ध नरक के गहरे गड्ढों की ये सारी ज्वालाएँ जला दीं, यह विशिष्ट घोषणा निरन्तर मिलेगी कि इससे अधिक अधर्मी या इससे अधिक असंगत कुछ नहीं कि परमेश्वर को मनुष्य के साथ पाप या दोष में सम्मिलित किया जाए, जबकि वह मनुष्यों और शैतान के हाथों से अपने गुप्त न्याय पूरे कर रहा होता है, क्योंकि परमेश्वर के अभिप्रायों और लक्ष्यों का मनुष्यों और शैतानों के अभिप्रायों और लक्ष्यों से कोई नाता नहीं। परन्तु बारह वर्ष से अधिक हुए मेरे द्वारा एक पुस्तक प्रकाशित की गई थी, जो मुझे भी और मेरी शिक्षा को भी इन सब घृणित निन्दाओं से स्पष्टतः निर्दोष ठहराती है, और जिसे मुझे इस वर्तमान क्लेश से भी मुक्त रखना चाहिए, यदि तुझ में या तेरे साथियों में ईमानदारी या मानवता की एक चिनगारी भी होती। परन्तु लिबर्टाइनों के उस उन्मत्त और अधर्मी स्वप्न के विषय में, कि परमेश्वर पाप का रचयिता है, जिसने इतनों को मोह लिया, मैंने उस भयानक विचार का कितनी पूर्णता से खण्डन किया है, इसका मैं अब घमण्ड नहीं करूँगा। निश्चय ही मैंने उसमें परमेश्वर के पक्ष का समर्थन जान-बूझकर हाथ में लिया, और पूरी सम्भव स्पष्टता से प्रमाणित किया कि परमेश्वर किसी अर्थ, किसी मात्रा या किसी रीति से पाप का रचयिता नहीं है।

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