अध्याय 14

निन्दक की प्रस्तावना का जॉन कैल्विन द्वारा उत्तर

Calvin's Calvinism · John Calvin

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निन्दक की प्रस्तावना का जॉन कैल्विन द्वारा उत्तर

निन्दक की प्रस्तावना।

मेरे सिद्धान्त के अनेक विरोधी हैं, यह मैं भली-भाँति जानता हूँ और इस पर आश्चर्य नहीं करता। क्योंकि यह कोई नई बात नहीं कि झगड़ालू लोग चारों ओर से मसीह के विरुद्ध मुँह खोलें, जिसके झण्डे के नीचे मैं लड़ता हूँ। इस पवित्र विषय में मेरा एकमात्र दुःख यह है कि मेरी दुर्बल देह के द्वारा परमेश्वर के उस गम्भीर और अनन्त सत्य पर वार किया जाता है, जिसे सारे संसार को श्रद्धा और आराधना के साथ देखना चाहिए। परन्तु जब मैं देखता हूँ कि परमेश्वर का यही सत्य आदि से ही दुष्टों की निन्दाओं के सम्मुख रहा है, और स्वयं मसीह को भी अपने स्वर्गीय पिता की आज्ञा से सदा "ठोकर की चट्टान" और विरोध का चिन्ह बने रहना है (रोमियों 9:33; यशायाह 8:14, 15), तो मैं समझता हूँ कि सत्य के रक्षकों को यह ठोकर पूरे धीरज के साथ सहनी चाहिए। फिर भी दुष्टों के उग्र काटने मुझे कभी उस शिक्षा पर पछताने को विवश नहीं करेंगे जो मैंने दी है, क्योंकि मुझे पूरा निश्चय है कि परमेश्वर ही उसका स्रोत और रचयिता है। और न मैंने उन अनेक संघर्षों से इतना कम लाभ उठाया है, जिनमें परमेश्वर ने स्वयं मुझे लगाया है, कि अब आपके खोखले और निरर्थक शोर से घबरा जाऊँ।

वरन् जहाँ तक स्वयं आपका सम्बन्ध है, बेचारे नकाबपोश उपदेशक, मुझे इस विचार से कुछ सान्त्वना मिलती है कि आप उस मनुष्य के प्रति, जिसने आपके साथ आपकी योग्यता से कहीं अधिक भलाई का व्यवहार किया है, कृतघ्न नहीं हो सकते, बिना यह प्रकट किए कि आपकी परमेश्वर के विरुद्ध घृणित दुष्टता भी है। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि आप अकादमी वालों को इससे अधिक प्रिय कोई खेल नहीं कि भक्तों के सारे प्रिय विश्वासों पर सन्देह की छाया डालकर उनके हृदयों से सारा विश्वास उखाड़ फेंकें। और "परमेश्वर के गुप्त प्रावधान" के विरुद्ध जो निन्दाएँ आप करते हैं, वे आपको भीतर ही भीतर कितनी मीठी लगती हैं, यह आपकी कलम की नोक से ही प्रकट है, चाहे आप अपने नीच सुख को छिपाने का कितना भी प्रयत्न करें। परन्तु मैं आपको और आपके सब साथियों को उस न्यायपीठ के सामने बुलाता हूँ जिस पर स्वर्ग का न्यायी बैठा है, जिसके मुँह से किसी दिन आप सब पर आँधी और वज्र गिरेगा और आपको धूल में मिला देगा। फिर भी मुझे भरोसा है कि मैं स्वयं, अपना काम पूरा करने से पहले, परमेश्वर के विरुद्ध आपकी इस ढिठाई-भरी बोली को सब भले और भक्त मनुष्यों की भावनाओं में उतना ही घिनौना बना दूँगा जितनी वह आपके अपने हृदय को भीतर से सुखद लगती है।

आप मुझसे अपनी उस व्यर्थ लिखावट का खण्डन माँगते हैं, जिसे आपने स्विट्ज़रलैंड के एक नगर से गुप्त रूप से पेरिस भेजा, ताकि मेरे नाम पर दूर-दूर तक विष उँडेला जाए और मुझे इसका पता भी न चले, और उपचार लगाने की सम्भावना भी न रहे। फिर भी आप सत्य जानने की इच्छा का ढोंग करते हैं, और साथ ही अपना नाम छिपाए रखते हैं; किस उद्देश्य से, मैं नहीं जानता, सिवाय इसके कि आप भली-भाँति जानते थे कि मेरे हाथ में यह सामर्थ्य था कि मैं तुरन्त उस हर साख को नष्ट कर दूँ जो लोग आपको या आपके साथियों को देने को तैयार हों। मैं आपकी पुस्तक में दिए गए अनेक प्रमाणों से एक क्षण में अनुमान लगा सकता था, वरन् निश्चय कर सकता था, कि आप कौन हैं। परन्तु आपने उसे अपने हाथ से लिखा या स्कोटस को लिखवाया, जो आपके पागलों के दल का तुरही बजानेवाला है, कि वह पेरिस वे बातें ले जाए जिन्हें कहने का साहस आप यहाँ नहीं कर सके, यह मेरे लिए सर्वथा अचिन्त्य है। मैं तो चाहता कि पुस्तक का रचयिता कोई और होता, या आप स्वयं जैसे हैं उससे भिन्न मनुष्य होते। परन्तु यह तब तक कभी नहीं होगा जब तक आप एक बार यह न चख लें कि सच्चा सद्गुण और खराई क्या है। क्योंकि यद्यपि आपने मुझसे सदा आदर से बात की है, तथापि आपकी स्वाभाविक प्रवृत्ति कितनी छिद्रान्वेषी है, यह जानना और इसका पूरा निश्चय करना मेरे लिए कभी कठिन नहीं रहा। इस बुरी प्रवृत्ति को, जिसे आपने अनेक बचकाने और निरर्थक प्रदर्शनों में प्रश्रय दिया है, मैंने सुधारने का प्रयत्न किया, परन्तु व्यर्थ; क्योंकि उस स्वाभाविक प्रवृत्ति के साथ सदा एक भ्रष्ट बनावट जुड़ी रही, जो आपको विद्वत्ता और चतुराई की प्रशंसा के पीछे भगाती थी, चाहे ईश्वरीय विषयों पर हास्य के अत्यन्त नीरस और फीके से भी फीके प्रयत्नों के द्वारा ही क्यों न हो। और न आप किसी रीति से अपने इन व्यर्थ प्रयत्नों को सुकरात के अधिकार की छाया में ढक सकते हैं, जो (आप कहते हैं) अपने सिद्धान्त के विरुद्ध कही गई अनेक बातों पर तीखे व्यंग्य से प्रत्युत्तर देने का अभ्यासी था। वह उत्तम मनुष्य अनेक और उत्कृष्ट गुणों से सम्पन्न था, जिन सबकी चमक उसने इसी एक दुर्बलता और दोष से धूमिल कर दी, जिसकी नकल आप जितनी चिन्ता से करते हैं उतनी ही असफलता से।

आप इसके अतिरिक्त मुझसे माँगते हैं कि मैं आपको "आपकी इस व्यर्थ लिखावट का ऐसा खण्डन भेजूँ जो साधारण लोग समझ सकें।" मैंने सदा शिक्षा की अत्यन्त शुद्ध और सरल भाषा अपनाकर अपने को सबसे दीन और अनपढ़ पाठक की समझ के अनुकूल बनाने का ही यत्न किया है। परन्तु यदि आप तर्क की कोई और रीति स्वीकार नहीं करेंगे सिवाय उसके जिसे किसी पार्थिव मरणशील मनुष्य का स्वाभाविक मन ग्रहण कर सके, तो आप अभिमान और तिरस्कार से स्वयं अपने विरुद्ध उस सिद्धान्त की समझ तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग बन्द कर देते हैं, जिसके ज्ञान का पहला पग श्रद्धा है। मैं आपके और आप जैसे सब लोगों के व्यंग्यात्मक उपहासों से अनजान नहीं हूँ, जो परमेश्वर के गहन भेदों को ऐसे तिरस्कार से देखते हैं जिससे प्रकट होता है कि आपकी दृष्टि में हर वह वस्तु अपनी शोभा और अधिकार खो देती है जो आपके मत और अनुमोदन से तुरन्त मेल नहीं खाती। क्योंकि भला इस सबका अर्थ क्या है कि जैसे ही कोई मेरे विरुद्ध मुँह खोलना चाहे, मुझे उसकी निन्दाओं का खण्डन प्रस्तुत करने को बुलाया जाए? अब सुकरात, जिसका नाम आप इस प्रकार अपने सामने लहराते हैं, अपने को ऐसी स्थिति में न डालने देता। वह अपने ऊपर ऐसे नियम का आदेश न मानता। ऐसा नहीं कि मैं हर बात में किसी मनुष्य का अनुसरण करूँगा। परन्तु यदि किसी को, न केवल इस युग में वरन् किसी भी अन्य युग में, कभी यह अनुमति मिली कि वह क्रोध के साथ निरन्तर दुष्टों के विरुद्ध खड़ा हो और उनकी निन्दाओं का, जो उसके विरुद्ध हों, खण्डन करे जैसा सुकरात ने किया, तो निश्चय ही अत्यन्त द्वेषी और अधर्मी भी मुझे अपनी रक्षा में उसी प्रकार का परिश्रम करने का उचित अवसर देंगे। इसलिए आपका भौंकना और भी असह्य है। क्योंकि आप अन्धे अज्ञान से मेरी आत्मरक्षा और मेरे विरोधियों को उत्तर देनेवाली अनेक पुस्तकों को रौंदते हैं, और मुझसे वही खण्डन का काम दो-तीन बार दोहराने को कहते हैं।

आप यह दावा करते हैं कि एक प्रश्न विशेष है जिस पर मेरे शत्रुओं के मेरे विरुद्ध तर्क इतने सबल हैं कि इस विषय पर मेरी अब तक लिखी किसी भी पुस्तक की सामग्री से उनका खण्डन नहीं हो सकता। वह प्रश्न, आप कहते हैं, पूर्वनियति या भाग्य का महान विषय है। मैं चाहता कि आप या तो उस विषय की नम्रता से जाँच करने का, या उस पर ईमानदारी से तर्क करने का निश्चय कर सकते, बजाय इसके कि इस प्रकार सारी लज्जा त्यागकर एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न बातों को एक में मिला दें, ताकि उन पर कोई सच्चा प्रकाश पड़ ही न सके। भाग्य स्तोइकों द्वारा अपने अनिवार्यता के सिद्धान्त को दिया गया नाम है, जिसे उन्होंने परस्पर-विरोधी तर्कों की एक बहुमुखी भूलभुलैया से गढ़ा था; एक ऐसा सिद्धान्त जो स्वयं परमेश्वर को अनुशासन में बुलाने और उसके लिए वे नियम ठहराने के योग्य है जिनके अनुसार वह कार्य करे। परन्तु पूर्वनियति को मैं पवित्रशास्त्र के अनुसार परमेश्वर की उस स्वतंत्र और अबाध युक्ति के रूप में परिभाषित करता हूँ जिससे वह अपनी अनन्त बुद्धि और अगम्य न्याय से समस्त मानव-जाति पर, सब मनुष्यों और वस्तुओं पर, और संसार के सब भागों और कणों पर शासन करता है। अब यदि मन की भ्रष्टता, छिद्रान्वेषण की लालसा और शैतानी अभिमान ने आपको ऐसा अन्धा कर दिया है कि आप दोपहर के प्रकाश में भी कुछ नहीं देख पाते; तो भी उन पाठकों के लिए जिनके पास सचमुच देखनेवाली आँखें हैं, मेरे द्वारा ठहराया हुआ यह भेद एक क्षण में दिखा देता है कि परमेश्वर के "गुप्त प्रावधान" के गहन विषय में उससे झगड़ने का आपका काम कितना न्यायपूर्ण और समतापूर्ण (!) है।

इसके अतिरिक्त, यदि आप मेरी पुस्तकों में झाँकने को तैयार होते, तो आप तुरन्त मान लेते कि भाग्य का यह अपवित्र शब्द मुझे कितना अप्रिय है; वरन् मेरी रचनाएँ पढ़कर आप जान जाते कि यही घृणित शब्द अगस्तीन के समय के दुष्टों और निकम्मों की द्वेष-भरी घृणा द्वारा उसके मुँह पर फेंका गया था; और आप मेरी गवाही में यह भी पाते कि उस पवित्र पिता और भक्त शिक्षक ने इन आपत्तियों का ऐसा उत्तर दिया है जो वर्तमान अवसर पर मेरे अपने पक्ष और बचाव के हर प्रयोजन को पूरी तरह पूरा करता है।

मेरी पुस्तकों से उद्धृत कहे जानेवाले उन अनुच्छेदों में भी, जिन्हें आप कहते हैं कि अपने प्रस्तावित क्रम में जनता को देंगे, आप पाएँगे कि मेरे तर्क का ढंग और सार ठीक वही है जो उस धन्य स्मृतिवाले पवित्र पिता का है। फिर भी द्वेषी लोगों ने, यह जानकर कि यह सिद्धान्त भली-भाँति जाना हुआ नहीं है और न सामान्यतः ग्रहण किया गया है, इन अनुच्छेदों को (जो कुछ झूठे और कुछ कटे-छँटे हैं) डींग के साथ चारों ओर प्रकाशित किया है, ताकि अज्ञानी और अनुभवहीन लोग उनकी विषयवस्तु के प्रति घृणा से भड़क उठें, और उनके विषय में अत्यन्त प्रतिकूल निर्णय के सिवाय कोई और निर्णय न बना सकें। और यद्यपि अनेक लोगों ने उन्हें पहली बार देखने पर सोचा कि अगस्तीन के दिनों में प्रचारित अनुच्छेद सचमुच उसकी रचनाओं से उद्धृत अंश थे; फिर भी वह पवित्र पिता कटुता से शिकायत करता है कि वे उस पर झूठे आरोपित किए गए थे। क्योंकि उनके संकलनकर्ताओं ने या तो बुरे परिश्रम से वाक्यों के छोटे-छोटे अंश जोड़ दिए थे, या कुटिल कला से सम्पूर्ण, सच्चे और भक्तिमय वाक्यों को कुछ शब्दों की चालाक घुसपैठ से भ्रष्ट कर दिया था, और मूल को ऐसा पूरी तरह बदल दिया था कि उससे सीधे-सादे लोगों के मन में ठोकर उत्पन्न हो। और सब ईमानदार और सच्चे पाठक (जिनमें से अनेक मेरे सिद्धान्त की तुलना आपकी नीच निन्दाओं से करने का कष्ट सहर्ष उठाएँगे) जान लेंगे कि जिन अनुच्छेदों को आप अब डींग मारते हैं कि मेरी रचनाओं से उद्धृत करके प्रकाशित करेंगे, वे ठीक उसी प्रकार के हैं जैसे वे थे जो अगस्तीन के दिनों में उसकी पुस्तकों से सच्चे उद्धरण होने का दावा करते हुए चारों ओर फैलाए गए थे।

और सबसे पहले मैं आपके विरुद्ध यह रुख लेता हूँ कि आप न दयालुता से काम करते हैं न ईमानदारी से, क्योंकि आप मेरी पुस्तकों से उद्धृत कहे जानेवाले अंशों पर कोई संकेत या सन्दर्भ-चिह्न नहीं लगाते, कि पाठक मूल ग्रन्थों को देख सकें और स्वयं निश्चय कर सकें कि मैंने सचमुच वैसा लिखा था जैसा उद्धरण दर्शाते हैं। और इससे बढ़कर अन्याय क्या हो सकता है कि बिना किसी क्रम के यह कहा जाए कि मेरे लिखे पचास या अधिक खण्डों में ऐसे-ऐसे स्वरूप के कोई चौदह अनुच्छेद मिले? अब यदि आपमें साधारण ईमानदारी की एक बूँद भी होती, तो आप स्वाभाविक रूप से मेरे वाक्यों को शब्दशः उद्धृत करते; या यदि ऐसा करने में आपको वास्तविक मूल ग्रन्थों के अभाव के कारण कोई सन्देह या खतरा दिखता, तो आप अपने पाठकों को ऐसे स्थलों में पाठ की संदिग्धता के विरुद्ध चेतावनी देते; जबकि अब आप मेरी सब रचनाओं पर एक साथ सन्देह की छाया डालते हैं, इस आशा से कि इस प्रकार पृथ्वी से उनकी सारी अच्छी स्मृति मिटा दें। और इस प्रकार मेरी पुस्तकों में जो कुछ बिना किसी ठोकर के पढ़ा जा सकता था, उसे आपने अपनी सुविधा के लिए द्वेष से भ्रष्ट करके घृणा और तिरस्कार के सामने रख दिया है। और यद्यपि मैं अगस्तीन की उसकी विवेकशीलता के लिए पूरी तरह निन्दा नहीं करता, जहाँ वह अपने शत्रुओं की चालाकी और अन्याय का सामना करने की इच्छा से अपने उत्तरों को ऐसा संयमित करता है कि द्वेष से बचे; फिर भी मेरे विचार में इस महान विषय में आपकी निन्दाओं का मेरा खण्डन तब अधिक सार्वजनिक रूप से उपयोगी होगा जब मैं उनका स्वतंत्रता, खुलेपन और बिना किसी संकोच के खण्डन करूँ, बजाय इसके कि इस रीति से लिखूँ जिससे पीछे हटने या टालमटोल का तनिक भी आभास हो।

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